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Rafale deal scam Rafale deal scam

ओपिनियन

2019 में भी मोदी जीते तो 36 नहीं बल्कि 72 राफ़ेल मिलेंगे और वो भी बिल्कुल मुफ़्त!

अब तक सवा सौ करोड़ भारतवासियों के सामने 9, 20, 26 और 40 फ़ीसदी कम पर राफ़ेल सौदा करने का दावा किया जा चुका है! इसमें ग़ौर करने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा है, वैसे-वैसे राफ़ेल सौदे पर हुई बचत का आँकड़ा भी विकास के नये-नये कीर्तिमान बना रहा है! बिल्कुल पेट्रोल-डीज़ल, सीएनजी और रसोई गैस के क़ीमतों की तरह!

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क्या आप जानते हैं कि फ़्राँस से अन्ततः भारत को 36 राफ़ेल विमान बिल्कुल मुफ़्त मिलने वाले हैं! जानकारों का तो यहाँ तक कहना है कि नरेन्द्र मोदी सरकार की राष्ट्रभक्ति और ईमानदारी को देखते हुए मुमकिन है कि भारतीय वायु सेना को आख़िरकार 36 की जगह 72 राफ़ेल हासिल हो जाएँ! और, वो भी बिल्कुल मुफ़्त! जी हाँ, ‘एक के साथ एक फ़्री’ के रूप में! मुमकिन है कि आपको ये ख़बर फ़ेक लगे! लेकिन ये फ़ेक नहीं हो सकती क्योंकि राफ़ेल सौदे के बारे में मोदी सरकार के मंत्री जिस तरह से आये-दिन सनसनीखेज़ ख़ुलासे कर रहे हैं, उसे देखते हुए वो दिन दूर नहीं जब परम माननीय प्रधानसेवक श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी महाराज की ओर से ऐलान कर दिया जाए कि वास्तव में पूरा का पूरा राफ़ेल सौदा ही सवा सौ करोड़ भारतवासियों को मुफ़्त में हासिल होने वाला है!

विदेश राज्यमंत्री जनरल वीके सिंह ने शनिवार 30 सितम्बर 2018 को दुबई में भारतीय वाणिज्य दूतावास में जुटे भारतीय समुदाय के सामने दावा किया कि “संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार ने 126 विमानों के लिए जिस मूल क़ीमत को लेकर बातचीत की थी और उड़ान की स्थिति आते-आते राफ़ेल विमान की जो प्रभावी क़ीमत बैठेगी, यदि दोनों की तुलना की जाए तो मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदा 40 प्रतिशत कम में किया है।”

मुमकिन है कि इतना पढ़ते ही आप उछल पड़े हों, क्योंकि अभी तक तो आपको यही बताया गया था कि मनमोहन सिंह सरकार के मुक़ाबले मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदे में 20 फ़ीसदी की बचत हासिल करके दिखाया है। 29 अगस्त 2018 को भारत के सबसे बड़े गणितज्ञ और वित्त मंत्री अरूण जेटली ने रहस्योद्घाटन किया था कि “राफ़ेल डील की तुलना यदि 2007 की क़ीमतों से की जाए तो साल 2016 में हुई डील 20 फ़ीसदी कम क़ीमत पर की गयी है। दरअसल, एनडीए सरकार की डील, लोडेड एयरक्राफ्ट की है, जो हथियारों से लैस है। जबकि काँग्रेस ने सिर्फ़ बेसिक या ढाँचा एयरक्राफ्ट का सौदा किया था।”

उसी वक़्त जेटली ने कृतज्ञ राष्ट्र को ये भी समझाया कि राफ़ेल की क़ीमत में जो अन्तर है वो बेसिक और लोडेड की वजह से है। लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी, काँग्रेस को इतनी सी बात भी समझने की अक़्ल नहीं है। इसीलिए उसके अध्यक्ष राहुल गाँधी सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ग़ुमराह कर रहे हैं और पूर्व फ़्राँसिसी राष्ट्रपति फ्रॉस्वा ओलांद के साथ साज़िश रचकर मोदी सरकार को दुनिया भर में बदनाम कर रहे हैं। राफ़ेल सौदे की अद्भुत विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए जेटली ने बताया था कि “2007 के लोडेड एयरक्राफ्ट की तुलना यदि 2016 के लोडेड एयरक्राफ्ट से की जाए तो मोदी सरकार ने क़रीब 20 फ़ीसदी पैसा बचाया है।”

अब ज़रा और पीछे चलिए। 24 जुलाई 2018 को मोदी सरकार के एक और बेहद विद्वान, ईमानदार, निष्ठावान और साहसी मंत्री श्रीमान रविशंकर प्रसाद जी ने दुनिया भर में बिखरे हुए भारतवंशियों को ज्ञानालोकित किया था कि “2011 में काँग्रेस के शासन में हुई डील में एक राफ़ेल जेट की क़ीमत 813 करोड़ रुपये रखी गयी थी। 2016 में हमारी सरकार के दौरान हुए समझौते में इसकी क़ीमत 739 करोड़ रुपये तय हुई। जो यूपीए सरकार की कुल क़ीमत से 9% कम है।”

इसके एक दिन पहले यानी 23 जुलाई 2018 को केन्द्रीय क़ानून और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने राष्ट्रसेवा की बड़ी मिसाल पेश करते हुए ट्वीट करके एक ही झटके में कई लोगों को चरित्र प्रमाणपत्र बाँट दिया। उन्होंने लिखा कि “एके एंटनी 8 साल तक देश के रक्षामंत्री थे। वो देश के रक्षा क्षेत्रों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों को समझते हैं। लेकिन जब एक पार्टी किसी परिवार के इर्द-गिर्द हो जाती है, तो सभी नेताओं को भीड़ की तरह ही बोलना पड़ता है। 2004 से 2014 तक काँग्रेस की सरकार भ्रष्टाचार से ग्रस्त थी। आज जब हम ईमानदारी से काम कर रहे हैं। देश विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था बन रही है। राहुल गाँधी ने राफ़ेल डील के बारे में लोकसभा में झूठ बोला। फ़्राँस के राष्ट्रपति से बातचीत को लेकर बोले गये झूठ ने तो मनमोहन सिंह और आनन्द शर्मा को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। राहुल गाँधी को देश के संवेदनशील मुद्दों की कितनी समझ है? जनता ये समझ गयी है।”

मोदी सरकार में रविशंकर प्रसाद से कोई कम समझदार और विदुषी नहीं हैं माननीय रक्षा मंत्री सुश्री निर्मला सीतारमन! ये देवी भी नारी-शक्ति की महान भारतीय परम्पराओं को निभाते हुए 18 सितम्बर 2018 को दोहराती हैं कि “यूपीए के मुक़ाबले एनडीए का सौदा 9 प्रतिशत सस्ता है।” हालाँकि, सीतारमन के 9 फ़ीसदी के दावे को उनके महकमे के ही वायु सैनिक अधिकारी एयर मार्शल रघुनाथ नाम्बियार ने भी फ़ुस्स साबित कर दिया। वायुसेना के उपप्रमुख नाम्बियार कह चुके हैं कि 2008 में जिस स्तर से यूपीए सरकार ने सौदेबाज़ी या मोलतोल शुरू की थी, उसके मुक़ाबले मोदी सरकार ने 40 फ़ीसदी कम दाम पर सौदा किया है।

इसी तरह, आपको ये जानकर भी शायद ही आश्चर्य हो कि संसद में राफ़ेल सौदे को गोपनीय बताने वाली मोदी सरकार ने 19 अप्रैल 2016 को बेहद की कलात्मक ब्यौरे के साथ ट्वीट करके विश्व को बताया था कि ‘मोदी सरकार ने 12 अरब डॉलर के सौदे में 3.2 अरब डॉलर बचा लिये हैं।’ हिसाब लगाएँ तो ये बचत 26 फ़ीसदी से ऊपर बैठती है! यानी, अब तक सवा सौ करोड़ भारतवासियों के सामने 9, 20, 26 और 40 फ़ीसदी कम पर राफ़ेल सौदा करने का दावा किया जा चुका है! इसमें ग़ौर करने वाली सबसे महत्वपूर्ण बात ये है कि जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा है, वैसे-वैसे राफ़ेल सौदे पर हुई बचत का आँकड़ा भी विकास के नये-नये कीर्तिमान बना रहा है! बिल्कुल पेट्रोल-डीज़ल, सीएनजी और रसोई गैस के क़ीमतों की तरह!

विकास की ऐसी ऐतिहासिक लीला कोई साधारण बात नहीं है। 70 साल में कभी इतना शानदार विकास, देखा था किसी ने? राफ़ेल सौदे से जुड़ी ये उपलब्धि इसलिए भी मामूली नहीं है, क्योंकि ये जानकारियाँ भारतवर्ष की उन जीती-जागती महान विभूतियों के हवाले से है जो हमारे संवैधानिक पदों पर आसीन हैं और जिनके चाल-चरित्र और चेहरे की सौगन्ध खाकर देवलोक के देवतागण भी अपनी सत्ता संचालित करते हैं! बहरहाल, अब जल्द ही आपको एक और परम विदुषी और नाट्य शास्त्र के प्रणेता भरत मुनि की वंशज सुश्री स्मृति इरानी का ये बयान सुनने को मिलेगा कि राफ़ेल सौदे पर मोदी सरकार ने 60 फ़ीसदी का बचत की है!

इसके कुछ समय बाद महान शिक्षा शास्त्री और समाज सुधारक श्रीमान प्रकाश जावड़ेकर का ये ख़ुलासा सामने होगा कि मोदी सरकार ने राफ़ेल सौदे में मनमोहन सिंह सरकार के मुक़ाबले 80 फ़ीसदी की बचत की है! इसीलिए ये सारी की सारी रक़म भारत के एक अन्य महान सपूत और कर्ज़ों में डूबे हुए उद्योगपति अनिल अम्बानी को तोहफ़े के रूप में दे दी जाएगी! इसके भी कुछ वक़्त बाद, सदाचार के सबसे बड़े पुरोधा श्रीमान राजनाथ सिंह का बयान आएगा कि पाकिस्तान को मुँहतोड़ जबाब देने के संकल्प को देखते हुए फ़्राँस की डसॉल्ट एविएशन कम्पनी ने फ़ैसला किया है कि वो भारत को 36 लोडेड राफ़ेल बिल्कुल मुफ़्त देगा!

फिर 2019 का चुनाव नज़दीक आते-आते बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का बयान आएगा कि फ़्राँस के मौजूदा राष्ट्रपति इम्मुअल मैक्रों ने प्रस्ताव भेजा है कि युगपुरुष नरेन्द्र मोदी जी की चतुर्दिक तपस्या को देखते हुए भारत को ‘एक के साथ एक फ़्री’ वाला ऑफ़र दिया जाएगा! इसके लिए बस एक ही शर्ते होगी कि 2019 में मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनवाया जाए! यदि मोदी प्रधानमंत्री बने तो पाकिस्तान में दिवाली मनायी जाएगी, क्योंकि आख़िर राफ़ेल के रूप में आने वाले 72 विमानों से पाकिस्तान का ही तो काम तमाम होना है!

अमित शाह, तब देश को ये भी बताएँगे कि संयुक्त राष्ट्र से सम्मानित नरेन्द्र मोदी, भारत के लिए तभी 72 आँधियाँ या राफ़ेल (फ़्रेंच शब्द राफ़ेल का हिन्दी में अर्थ आँधी या तेज़ हवा होता है) ला पाएँगे, जब जनता बीजेपी को 350 सीटें जिताएगी! आख़िर में, धुआँधार चुनाव प्रचार करते हुए नरेन्द्र मोदी ख़ुलासा करेंगे कि राहुल गाँधी जानना चाहते हैं कि मैंने अनिल भाई को फ़ायदा क्यों पहुँचाया? तो जान लीजिए कि अनिल के अलावा राफ़ेल का मेल और किसी से हो ही नहीं सकता! क्योंकि अनिल का मतलब भी वही है जो राफ़ेल का है। यानी, ‘पवन, वायु, हवा’!

फिर मोदी गरजेंगे कि भाईयों-बहनों, मैं पूछना चाहता हूँ कि अनिल और राफ़ेल के मेल को कोई तेल और पानी का मिलन कह सकता है क्या? लेकिन नामदार को इतनी समझ कहाँ है! इसीलिए वो कहते फिरते हैं कि राफ़ेल सौदा दुनिया का सबसे बड़ा घोटाला है! मैं पूछता हूँ कि 70 साल में काँग्रेस एक भी ऐसा घोटाला क्यों नहीं कर सकी? क्योंकि इसकी नीयत ठीक नहीं थी। जबकि मेरी नीयत पहले दिन से साफ़ थी। इसीलिए आज तक काले धन का एक रुपया भी विदेश से नहीं आया। अच्छे दिन तो बस, आते ही रह गये।

भाईयों-बहनों,

नोटबन्दी और 2000 के नोट के ज़रिये मैंने काला धन रखने वालों की कितनी बड़ी मुसीबत दूर कर दी, ये उनसे पूछिए जिनके पास काला धन है और जिन्हें काले कारोबार में महारत हासिल है! नोटबन्दी में मैंने पूरे देश को लाइन में लगा दिया। लेकिन क्या कहीं किसी को कोई धन्ना सेठ या अफ़सर कभी लाइन में दिखायी दिया? नहीं ना! ऐसा सिर्फ़ इसलिए हुआ कि मेरे दोस्तों को पता था नोटबन्दी का असली मक़सद ही सारे काले धन को सफ़ेद बनाना था! इस काम को काँग्रेस 70 साल में भी नहीं कर पायी, लेकिन मैंने 50 दिन से भी कम में करके दिखा दिया! ये कोई मामूली उपलब्धि नहीं है। इसकी वजह से किसी भी रईस व्यक्ति ने ख़ुदकुशी क्यों नहीं की? क्योंकि उसे मालूम था कि नोटबन्दी का मक़सद, ग़रीबों को सबक सिखाना था, उनके पास दबे रुपयों को बाहर निकालना था!

भाईयों-बहनों,

ऐसी ही गर्व करने वाली कहानी जीएसटी की भी है। लेकिन इसकी बात फिर कभी। अभी तो आप से जानकार गदगद रहिए कि राफ़ेल दिनों-दिन सस्ता होते-होते, कैसे नसीबवालों की वजह से बिल्कुल मुफ़्त मिलने वाला है। वो भी ‘एक के साथ एक फ़्री’! अलबत्ता, इतना ज़रूर है कि मैं अनिल भाई से कह दूँगा कि वो काँग्रेस को 36 करोड़ रुपये का चन्दा पेटीएम से भेज दें, ताकि 2019 में काँग्रेस भी 44 से घटकर 36 पर ही सिमट जाए!

भाईयों-बहनों,

आपको मेरे मंत्रियों की देश भक्ति की ख़ास तौर पर दाद देनी चाहिए क्योंकि दिन-रात तरह-तरह की बयानबाज़ी करने में निपुण मेरे किसी भी मंत्री को, कभी नहीं लगा कि राफ़ेल सौदा करके मैंने काँग्रेस को भारी नुक़सान नहीं पहुँचाया है! राहुल गाँधी और उनके सहयोगी दलों को तथा यशवन्त सिन्हा और अरूण शौरी जैसे लोगों को भले ही राफेल सौदे में भारी घोटाले की बू आ रही हो, लेकिन देशप्रेम और राष्ट्रभक्ति के सबसे बड़े मन्दिर तथा मेरे प्रिय गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का हरेक सिपाही राफ़ेल की सुगन्ध से गदगद है!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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काले धन को सफेद करने के लिए भावांतर योजना शुरू की गई थी : कमलनाथ

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प्रमुख राज्यों और सहयोगियों को संभालने वाले एक सशक्त कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस महासचिव कमलनाथ ने मध्यप्रदेश की सत्ता के केंद्र भोपाल को बखूबी अपना लिया है। विशुद्ध राजनीति की कला में माहिर राज्य के 18वें मुख्यमंत्री जिन्होंने भारत को कांग्रेस मुक्त करने की भाजपा के विजय रथ को रोक दिया है, उन पर अब एक बड़ी जिम्मेदारी है। जन्मजात रणनीतिक और सामरिक सोच के धनी नेता अब राज्य में हर उस चीज को दुरुस्त करने के काम में जुट गए हैं जो गड़बड़ाई हुई है।

राज्य में खेती और ग्रामीण संकट के साथ ही संभवत: बेरोजगारी वह एकमात्र सबसे बड़ा कारण रही, जिसने कांग्रेस को जीत दिलाई।

इस संकट की गंभीरता के बारे में पूछे जाने पर नाथ ने इसके उन्मूलन के उपायों पर बात करते हुए कहा, “राज्य में रोजगार की स्थिति बहुत बुरी है। जिन संसाधनों का प्रयोग राज्य के विकास को गति देने के लिए किया जा सकता था, उनका व्यर्थ जाना बेहद दुखद है। पद संभालने के पहले दिन ही, मैंने राज्य में 70 प्रतिशत स्थानीय युवाओं को उद्यमों में रोजगार देना अनिवार्य कर दिया ताकि उन्हें औद्योगिक प्रोत्साहन मिले।”

उन्होंने कहा, “समय के साथ हम ऐसी और योजनाएं लेकर आएंगे, जिनसे रोजगार पैदा होंगे और उद्यमों के सशक्तीकरण के लिए काम करेंगे। हमारी सरकार युवाओं के कौशल विकास, रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए उद्यमों के विकास और शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दे रही है। गणतंत्र दिवस के मौके पर हमने एक नई योजना ‘युवा स्वाभिमान योजना’ की घोषणा की। इसके तहत हम साल में पूरे 100 दिन राज्य के युवाओं को काम देंगे। कृषि संकट के मामले में, पिछले कुछ सालों में मंदसौर दो बार किसानों के लिए कृषि संकट के क्षेत्र में भाजपा की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलने का मुख्य केंद्र बना।”

दिल्ली में बैठे हुए भी, हर किसी ने मध्यप्रदेश में कृषि संकट और किस प्रकार मंदसौर इसके खिलाफ विरोध का केंद्र बना, इस बारे में सुना।

कमलनाथ ने भाजपा सरकार की भावांतर योजना शुरू होने और फिर उसे बंद करने के बारे में बात करते हुए कहा, “मध्यप्रदेश भारत के सबसे बड़े कृषि प्रधान राज्यों में से एक है। इसकी करीब 70 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कृषि से जुड़ी है। यह बेहद दुख की बात है कि किसानों की आत्महत्या के मामले में मध्यप्रदेश देश में सबसे ऊपर है। अगर राज्य किसानों के लिए किसी आदर्श स्थिति में होता, जैसा कि पिछली भाजपा सरकार द्वारा कहा जा रहा था, तो स्थिति काफी अलग होती।”

उन्होंने कहा, “किसानों का आक्रोश और उनके प्रति सरकार की बेरुखी मंदसौर की घटना से ही स्पष्ट है। कृषि संकट का एक बड़ा कारण यह है कि किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलता। भावांतर योजना केवल काले धन को सफेद करने के लिए शुरू की गई थी, इस संकट को दूर करने के लिए नहीं। यह पूरी तरह त्रुटिपूर्ण थी और इसलिए इसका विफल होना तय था।”

कमलनाथ ने कहा, “हम ‘भावांतर योजना’ को नए रूप में पेश करने जा रहे हैं और ऐसे उपाय लेकर आ रहे हैं, जिनसे किसानों को उनका हक मिलेगा। अपने वादे पर कायम रहते हुए हमने सरकार में आते ही किसानों के ऋण माफ कर दिए और राज्य के किसानों के कल्याण के लिए ऐसी और भी नीतियां बनाएंगे।”

फिर से कांग्रेस के केंद्र की सत्ता में आने के सवाल पर कमलनाथ ने कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि हम बहुमत के साथ सत्ता में आएंगे। पिछले चुनाव में भाजपा की जीत और कुछ नहीं, बस एक संयोग था। हालांकि आप लोगों को लंबे समय तक मूर्ख नहीं बना सकते। नोटबंदी और जीएसटी जैसी चीजें पूरी तरह विफल हुई हैं और लोग अब बदलाव चाहते हैं।”

उन्होंने कहा, “लोगों में भाजपा विरोधी भावना है और हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों में यह साफ दिखाई दे रहा है। अगर हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की बात करें तो यह कम होने लगी है। हमारे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ जहां नीचे गिर रहा है, राहुल गांधी का ऊपर बढ़ रहा है।”

भाजपा और कांग्रेस का वोट शेयर काफी ज्यादा था और अंत में केवल मामूली अंतर से ही कांग्रेस को जीत हासिल हुई। कांग्रेस के पक्ष में बाजी जाने में किस चीज की भूमिका रही?

इस सवाल पर दून स्कूल और कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल से शिक्षित कमलनाथ ने कहा, “वक्त है बदलाव का। राज्य के लोग विकास की धीमी गति से थक चुके थे और बदलाव चाहते थे। हमारी रैलियों में भी सरकार विरोधी भावना साफ नजर आई।”

उन्होंने कहा, “अब राज्य के लोग दोनों सरकारों के बीच के अंतर को साफ महसूस कर रहे हैं। एक प्रदर्शन कर रही है और दूसरी ने कभी नहीं किया। मुझे पूरा भरोसा है कि लोग कांग्रेस को समर्थन देंगे जिसकी राज्य के विकास और सम्पन्नता के लिए काम करने की मजबूत इच्छाशक्ति है।”

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मोदी की किसान आय योजना सही उपाय नहीं : चिदंबरम

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नई दिल्ली, 9 फरवरी | पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने अंतरिम बजट में सरकार द्वारा किसानों के लिए की गई सीधी आय सहयोग योजना (डायरेक्ट इनकम सपोर्ट स्कीम) को विलाप बताया।

उन्होंने कहा कि यह सही उपाय के बदले एक विलाप है क्योंकि इसका लाभ सिर्फ भूस्वामी को ही मिलेगा और गरीबों का एक बड़ा वर्ग वंचित रह जाएगा।

उधर, राहुल गांधी ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी के सत्ता में आने पर देशभर के किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा। उनकी इस घोषणा की आलोचनाओं को खारिज करते हुए चिदंबरम ने कहा कि कृषि क्षेत्र के लिए इसकी जरूरत है।

कांग्रेस द्वारा गरीबों के लिए किए गए न्यूनतम आय गारंटी के वादे का बचाव करते हुए पूर्व वित्तमंत्री ने कहा कि यह लागू होने योग्य योजना है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में इस योजना की रूपरेखा की व्याख्या की जाएगी कि यह किस प्रकार लागू होगी।

चिदंबरम ने अपनी किताब ‘अनडॉटेड-सेविंग द आइडिया ऑफ इंडिया’ के विमोचन के मौके पर आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा, “यह (सरकार की किसान राहत योजना) एक विलाप है। यह कहना सही युक्ति नहीं कि मैं आपके हर परिवार को 6,000 रुपये देता हूं। ये 6,000 रुपये किनको मिलेंगे? भूस्वामियों को यह रकम मिलेगी। भू-स्वामी खुद कृषक हो सकते हैं। लेकिन अनेक मामलों में भूस्वामी नदारद रहते हैं क्योंकि वे राज्य की राजधानी में बैठे होते हैं।”

उन्होंने कहा, “काश्तकार किसानों को पैसे नहीं मिलते हैं। खेतिहर मजदूरों को पैसे नहीं मिलते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले खेती नहीं करने वाले सुनार, बढ़ई, लुहार, दुकानदार और दर्जी को पैसे नहीं मिलते हैं।”

कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर सरकार गरीबों की मदद की बात कर रही है तो फिर वह अधिकांश गरीबों को छोड़कर सिर्फ भू-स्वामियों को क्यों इस योजना का लाभ दे रही है। हालांकि उनमें गरीब भूस्वामी हो सकते हैं, लेकिन उनमें अनुपस्थित रहने वाले भू-स्वामी (ऐसे लोग हैं जो गांव में रहते ही नहीं हैं और अपनी जमीन खेती के लिए किराए पर किसी काश्तकार को देते हैं।) भी शामिल हैं।

उन्होंने कहा, “इसलिए इससे गरीबों को फायदा नहीं होता है।”

मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम समेत अन्य लोगों द्वारा कृषि कर्जमाफी की आलोचना किए जाने पर चिदंबरम ने कहा कि कर्ज के बोझ तले दबे लोगों की मदद करना सरकार का कर्तव्य है।

कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम ने कृषि कर्जमाफी को नैतिक संकट बताया है।

चिदंबरम ने कहा, “कर्जमाफी को अनैतिक बताने पर मुझे हंसी आती है। तो फिर आप उद्योपतियों के लिए बैंकों को राहत (हेयरकट) देने के लिए क्यों कहते हैं। इसलिए नैतिकता के तर्क को इससे अलग रखें और सरल अर्थशास्त्र और कृषि से जुड़े लोगों की समस्या पर गौर करें।”

उन्होंने कहा, “कर्जदार किसान 90,000 से लेकर एक लाख रुपये का कर्ज कैसे चुका सकता है, क्योंकि वह आईसीयू में है। आपको सबसे पहले उनकी जिंदगी बचानी है। उनको तंदुरुस्त करना है। कर्जमाफी का यही मकसद है। अगर लोग सूखा या बाढ़ या अन्य कारणों से कर्ज में दबे हुए हैं तो सरकार कैसे कह सकती है कि मैं आपको कर्ज से राहत नहीं दूंगा।”

हालांकि वह इस बात से सहमत हैं कि यह पूर्ण समाधान नहीं है। कांग्रेस ने कहा, “इसके बाद आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्पादकता और उत्पादन में बढ़ोतरी हो और किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम मिले। अगर आप ऐसा करने में विफल होंगे तो 10 साल बाद आपको वैसी ही समस्या से जुझना पड़ेगा।”

रोजगार सृजन से जुड़े सवालों पर चिदंबरम ने कहा, “कांग्रेस को मालूम है कि रोजगार का सृजन कैसे होता है। हमें मालूम है कि नौकरियां देनेवाले क्षेत्र कौन-कौन से हैं। हमारे घोषणा पत्र में यह बताया जाएगा कि नौकरियां देने वाले क्षेत्रों के माध्यम से नौकरियां कैसे पैदा की जा सकती हैं।”

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मप्र में गायों की दशा ने गौशाला निर्माण की प्रेरणा दी : कमलनाथ

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Kamal Nath

देश के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री रह चुके कमलनाथ एक समय संकट में फंसी विश्व व्यापार वार्ता में भारत का चेहरा थे।

वह कृषि सब्सिडी पर एक समन्वित पश्चिमी गतिरोध के आगे कभी नहीं झुके और एक तरह से विश्व व्यापार संगठन को ठेंगा दिखाते हुए उन्होंने भारतीय किसानों के हितों की पैरवी की।

संप्रग-2 और इसके पहले की कांग्रेस सरकारों में भी कई महत्वपूर्ण पद संभाल चुके और लोकसभा के लिए नौ निर्वाचित हो चुके कमलनाथ हाल ही में मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का चेहरा थे।

इस 72 वर्षीय राजनेता ने अपने जोरदार चुनावी अभियान के जरिए शिवराज सिंह चौहान के शासन (13 साल) को समाप्त कर दिया। कमलनाथ ने आईएएनएस के साथ एक बेबाक बातचीत में मध्य भारत के प्रमुख राज्य के बारे में अपनी योजनाएं गिनाई।

भाजपा के 15 वर्षो के शासन के बाद, निश्चित रूप से ऐसी कई सारी चीजें होंगी, जिसे उनकी अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार राज्य में दुरुस्त करना चाहती है। आईएएनएस ने उनसे पूछा कि उनके एजेंडे में ऐसी कौन-सी पांच चीजें शीर्ष पर हैं?

नाथ ने कहा, “यह कहना गलत नहीं होगा कि 15 वर्षो के खराब शासन के कारण मध्यप्रदेश बुरी हालत में है। ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जिन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है। हमारी पहली प्राथमिकता राज्य में किसानों की बेहतरी और कृषि क्षेत्र का विकास होगी। किसान भाजपा शासित राज्य में सबसे ज्यादा पीड़ित थे। उन्हें बमुश्किल ही कभी उनके काम का इनाम मिला।”

उन्होंने कहा, “कृषि क्षेत्र को मजबूत करने और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में तेजी लाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। पूर्ववर्ती सरकार ने कई सारे वादे किए थे। हालांकि इस बाबत बहुत कम काम किया गया। दूसरा काम राज्य की वित्तीय सेहत सुधारने का होगा। भाजपा सरकार के अंधाधुंध खर्च के कारण राज्य की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है।”

उन्होंने कहा, “हमें इसे दुरुस्त करने की जरूरत है। हम राज्य में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। बीते दशक के दौरान संसाधनों को बर्बाद किया गया है, उसे दुरुस्त करने की जरूरत है। जैसा कि हमने वादा किया है, हम महिलाओं के लिए भी राज्य में सुरक्षित और स्वस्थ्य माहौल बनाएंगे। इनसब के अलावा, आपूर्ति प्रणाली को भी मजबूत करने की जरूरत है, ताकि लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।”

उन्होंने सत्ता संभालते ही कृषि ऋण माफ करने के अपने वादे को पूरा किया, जिसे कईयों ने खराब आर्थिक निर्णय कहा। लेकिन क्या उनकी सोच ने किसान समुदाय की बुरी दशा को प्रतिपादित किया है, जिसके कारण उन्हें यह विकल्प चुनना पड़ा?

उन्होंने कहा, “जब से मैं मुख्यमंत्री की भूमिका में हूं, यहां तक कि इसके पहले भी मुझसे बार-बार यह प्रश्न पूछा गया है। मध्यप्रदेश के किसानों की दशा देखते हुए, हमें उनकी बेहतरी के लिए कोई कदम उठाना था और कर्जमाफी एक तर्कसंगत समाधान था। हम एक कृषि प्रधान देश हैं, इसके बावजूद यहां कई किसान कर्ज में पैदा होते हैं और कर्ज में ही मर जाते हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।”

उन्होंने कहा, “हम राज्य के किसानों की मदद करके उनपर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। वे हमारे प्रमुख अन्नदाता हैं और उनके ऋण माफ करना उनकी दशा सुधारने और राज्य में विकास का सूत्रपात करने की दिशा में एक प्रयास है। मैं इसे राज्य की भलाई में किए गए दीर्घकालिक निवेश के तौर पर देखता हूं। इसके अलावा मुझे विश्वास है कि जो इसे खराब अर्थशास्त्र कह रहे हैं, वे कृषि व अर्थव्यवस्था के बारे में बहुत कम जानते हैं। हम सभी इस तथ्य से वाकिफ हैं कि बैंक उद्योगों और व्यापारिक घरानों के ऋण माफ करते हैं, कई मामलों में ऋण 50 प्रतिशत तक माफ किया जाता है। अगर व्यापारिक समुदाय के लिए ऋण माफ करना एक अच्छा अर्थशास्त्र है, तो यह कैसे गलत हो गया जब हम इसे आर्थिक रूप से गरीब किसानों के लिए करते हैं?”

कमलानाथ कई केंद्रीय कैबिनेट में लंबे समय तक शीर्ष मंत्री रहे हैं। उनकी नई जिम्मेदारी बिल्कुल अलग है। ऐसे में राज्य की राजनीति में वह कैसे सामंजस्य बिठाते हैं?

उन्होंने कहा, “राज्य की राजनीति केंद्रीय राजनीति से बहुत अलग होती है। कैबिनेट मंत्री और एक मुख्यमंत्री होने में बड़ा अंतर है। राज्य की राजनीति का दायरा बहुत बड़ा होता है और एक मुख्यमंत्री के तौर, चीजें आपके आस-पास सिमटी रहती हैं।”

कमलनाथ ने कहा, “इसके अलावा, चुनौतियां और जिम्मेदारियां बहुत बड़ी होती हैं। केंद्रीय मंत्री के तौर पर मैंने जो बदलाव किए थे, उसके सकारात्मक नतीजे भी आए थे और मैंने राज्यस्तर पर भी इसे फिर से दोहराने का विचार किया है। हालांकि दोनों के बीच जो एक सामान्य बात है, वह जनसेवा है। जो भी राजनीति में मौजूद है, वह जनता और देश की सेवा करने को उत्सुक रहता है और मैं भी यही कर रहा हूं। पिछले चार दशकों के दौरान मैंने जो भी जिम्मेदारी निभाई, उसका मूल उद्देश्य हमेशा जनता की सेवा ही रहा है। मेरा एक मात्र मकसद जनसेवा है।”

निश्चित ही मध्यप्रदेश जैसे पिछड़े राज्य के लिए अपेक्षाकृत यह चुनौती कठिन होगी, क्योंकि आकार के मामले में देश के एक सबसे बड़े राज्य की अपनी अलग समस्याएं हैं? कमलनाथ ने तपाक से जवाब दिया, “किसान आत्महत्या, बेरोजगारी के लिहाज से मध्य प्रदेश में कई सारी चुनौतियां हैं। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में राज्य का स्तर काफी नीचे है।”

उन्होंने कहा, “राज्य के पिछड़ेपन के पीछे कुछ बड़े कारण हैं। भारत के दूसरे सबसे बड़े राज्य के रूप में, हमारा क्षेत्रफल बहुत बड़ा है और संभावनाएं असीमित हैं। हालांकि पूर्ववर्ती सरकार ने अवसरों का इस्तेमाल करने के बारे में कभी नहीं सोचा और वे संसाधनों का दोहन करने में व्यस्त रहे। राज्य को ‘बीमारू राज्य’ की श्रेणी से बाहर निकालने के उनके सभी दावे झूठ का पुलिंदा के अलाव कुछ नहीं थे।”

उन्होंने कहा, “पिछले 15 वर्षो में, राज्य की आर्थिक दशा सुधारने से शायद ही कुछ किया गया। विकास का हमारा मॉडल विकेंद्रीकरण का है। हम सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करा रहे हैं, जिससे राज्य का समग्र विकास होगा। हम जिलास्तर पर शासन खड़ा करना चाहते हैं और जमनी स्तर पर विकास सुनिश्चित करना चाहते हैं। सभी सुविधाएं जमीनी स्तर पर मुहैया होंगी, ताकि लोगों को अपना काम कराने के लिए बड़े शहरों में न आना पड़े। राज्य में ऐसे विभाग, परिषद, बोर्ड और विश्वविद्यालय हैं, जहां बदलाव की जरूरत है। हम इन क्षेत्रों की भी पहचान कर रहे हैं।”

कईयों का मानना है कि नाथ एक चालाक राजनेता की तरह प्रतिस्पर्धा में गौ राजनीति कर रहे हैं। गौशालाओं के निर्माण का काम कैसा चल रहा है? सभी जानते हैं कि यह कांग्रेस की एक चुनाव पूर्व योजना थी, लेकिन क्या यह प्रतिगामी नहीं है?

उन्होंने कहा, “‘प्रतिगामी’ शब्द मुझे परेशान करता है, क्योंकि मुझे यह समझ में नहीं आता कि मवेशियों के लिए छत का निर्माण प्रतिगामी कैसे हो सकता है। प्रारंभ में गौशाला का निर्माण हमारे घोषणा-पत्र का हिस्सा नहीं था, लेकिन बाद में इसे शामिल किया गया। एक रैली में मैंने देखा कि कैसे गायों के साथ बुरा बर्ताव किया जा रहा है। यह परेशान करने वाला दृश्य था और इसलिए मैंने अपने घोषणा-पत्र के जारी होने के तीन महीने पहले इसकी घोषणा की।”

कमलनाथ ने कहा, “यह कोई चुनाव पूर्व की योजना नहीं थी, क्योंकि एक पार्टी के नाते हम मवेशी राजनीति में विश्वास नहीं करते हैं। एक देश में जहां गायों को इतना ज्यादा सम्मान दिया जाता है, मैं उनकी रक्षा करने में विश्वास करता हूं और सभी पंचायतों में गौशाला का निर्माण करना महत्वपूर्ण है।”

मुख्यमंत्री ने कहा, “यह न तो कोई चुनाव-पूर्व की योजना थी और न कोई प्रतिस्पर्धी योजना ही है। अब, चार महीनों में हम मध्यप्रदेश के विभिन्न गांवों में एक हजार गौशालाओं का निर्माण करने जा रहे हैं, जहां अनाथ गायों की देखभाल की जाएगी। इसमें छत, चापाकल, बायोगैस संयंत्र आदि सुविधाएं होंगी।”

कमलनाथ ने कहा, “गौशालाओं का मॉडल इस तरह से डिजाइन किया गया है कि समाज, किसान और आम आदमी गौशाला को चलाने में बड़ी भूमिका निभाएंगे। इससे जनभागीदारी बढ़ेगी और यह मॉडल अधिक विश्वसनीय बनेगा। शहरी विकास विभाग इस परियोजना का नोडल विभाग होगा।”

उन्होंने कहा, “इस परियोजना से ग्रामीण इलाकों में रोजगार सृजन होगा। इससे विभिन्न तरीके से लोगों की भागीदारी के अवसर पैदा होंगे। लोग सरकार द्वारा आवंटित जमीन पर गौशाला बनाकर, गौशाला निर्माण की देखभाल कर, और गौ अभियान व गौ सदन की जिम्मेदारी अपने हाथों में लेकर इसमें अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं।”

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