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ओपिनियन

बधाई हो! भीड़-तंत्र ने भारत को अब भीड़-युग में पहुँचा दिया!

अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है।

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ये विरोधी दल के किसी नेता या अवार्ड वापसी गैंग का नहीं, बल्कि माननीय सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया है कि ‘भारत में भीड़-तंत्र की इजाज़त नहीं दी सकती। नया क़ायदा नहीं बन सकता कि भीड़ ही सड़कों पर इंसाफ़ करने लगे। कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता। भय, अराजकता और हिंसा फ़ैलाने वालों को सख़्ती से रोकना पुलिस और राज्य सरकार की ज़िम्मेदारी है। राज्यों को भीड़-तंत्र के पीड़ितों के लिए महीने भर में मुआवज़ा नीति बनानी होगी। भीड़-तंत्र की रोकथाम करने में विफल रहे पुलिस अफ़सरों के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई के अलावा सीधा ज़ुर्माना भी ठोंका जाएगा। भीड़ की अराजकता से जुड़े मामलों में अदालतों को रोज़ाना सुनवाई करके छह महीने में अपराधियों को अधिक से अधिक सज़ा देनी होगी। यही नहीं, भीड़-तंत्र यानी Mobocracy के ख़िलाफ़ संसद को भी सख़्त क़ानून बनाना चाहिए।’

यदि आप भीड़-तंत्र को भारतीय लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक मानते हैं तो शायद आपको सुप्रीम कोर्ट के ताज़ा फ़ैसले से तसल्ली मिले। हालाँकि, ये अफ़सोसनाक तो है कि लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक प्रवृत्ति यानी भीड़-तंत्र के प्रति न्याय के सर्वोच्च मन्दिर को अपनी संवेदनशीलता ज़ाहिर करने में ख़ासा वक़्त लग गया। आप कह सकते हैं कि ‘हुज़ूर, आते-आते बहुत देर कर दी!’ क्योंकि मोदी राज में ही गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर अब तक 80 से ज़्यादा हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। भीड़-तंत्र अब तक 33 इंसानों की बलि चढ़ा चुका है! मोदी और उनकी भक्त मंडली भले ही इस दौर को आधुनिक भारत का ‘स्वर्ण-युग’ बताते ना अघाते हों, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कर दिया कि भारत अब ‘भीड़-युग’ में आ चुका है!

mob lynching

सोशल मीडिया पर तैनात ‘भक्तों’ और अफ़वाह गढ़ने और फ़ैलाने वालों के लिए सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला किसी मुबारक़बाद या बधाई से कम नहीं है। इसकी साज़िशों ने ही सवा सौ करोड़ भारतवासियों को ‘भीड़-युग’ में पहुँचाया है! भीड़-युग के शुरुआती चार वर्षों में ही आदिकाल से मौजूद ‘भीड़’ का ऐसा ज़बरदस्त और ऐतिहासिक ‘विकास’ हुआ, जैसा ‘विकास-विरोधी’ पिछली सरकारें बीते 70 वर्षों में भी नहीं कर पायीं! सदियों से शैशवकाल में मचलने वाली ‘भीड़’ ने अब चार साल में बाल-काल और यौवन को पार करके गबरू जवान वाला व्यक्तित्व पा लिया। वैसे तो आधुनिक भारत का इतिहास असंख्य साम्प्रदायिक दंगों से अटा पड़ा है। हमारा कोई सियासी दल ऐसा नहीं है, जिसके दामन पर दंगों के ख़ून के छींटे ना रंगे हों। लेकिन गोरक्षा और बच्चा चोर के नाम पर कहीं भी, कभी भी ‘भीड़’ का किसी को भी पीट-पीटकर मार डालना, भीड़-युग का अद्भुत आयाम है!

भीड़-युग में भीड़ के तुष्टिकरण की नीति लागू होना स्वाभाविक है। आप चाहें तो माननीय सुप्रीम कोर्ट की मंशा पर तरस खा सकते हैं कि उसे अब भी उम्मीद है कि उसके सख़्त तेवर से भगवा सरकारें जाग जाएँगी, संघियों का वो अफ़वाह-तंत्र ख़ुदकुशी कर लेगा, जिन्हें इसी भीड़-तंत्र की भीड़ से संजीवनी मिलती है! सकारात्मक होने की यदि कोई सीमा नहीं होगी तभी तो जिन्होंने ‘विकास’ की ख़ातिर अपने कलेज़े के टुकड़े ‘लोकपाल’ की क़ुर्बानी दे दी हो, उनसे ये अपेक्षा की जा सकती है कि वो सुप्रीम कोर्ट की तसल्ली के लिए संसद में क़ानून बनाकर भीड़-तंत्र रूपी अपनी ही धमनियों को काट डालने का फ़ैसला ले लेंगे! जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उसी दिन से बैल भी दूध देने लगेंगे! देख लीजिएगा, मई 2019 तक भारत की संसद भीड़-युग का बाल भी बाकाँ नहीं कर पाएगी!

भीड़-तंत्र, बुनियादी तौर पर बोतल में बन्द ज़िन्न की तरह है, जो एक बार बोतल से बाहर आ जाए तो फिर उसे वापस बोतल में नहीं डाला जा सकता! ये अंडे से निकला वो चूजा है, जिसे कोई वापस अंडे में नहीं डाल सकता! इसीलिए भीड़-युग से वापसी बहुत मुश्किल है। हालाँकि, असम्भव कुछ भी नहीं होता! सम्भव बनाने के लिए सरकार को वैसे ही व्यापक उपाय करने होंगे जैसे उफ़नती नदी की बाढ़ से रोकथाम के लिए विशाल बाँधों और नहरों का नेटवर्क बनाया जाता है। इसके लिए भी सबसे पहले तो हमें ये स्वीकार करना होगा कि भीड़-राज को महज ये उपदेश देकर क़ाबू में नहीं लाया जा सकता कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

अरे, ये किससे छिपा है कि भारत में भीड़ से बड़ा कोई क़ानून नहीं! भीड़ कब अराजक नहीं होती! भीड़ का तो स्वभाव ही है बेक़ाबू होना! इसमें नया क्या है! भीड़ तो हड़ताल, चक्का-जाम, रेल-रोको, तोड़फोड़-उपद्रव-आगजनी और हिंसा करती रही है। 70 साल में लाखों बसों और अन्य वाहनों की होली क्या भीड़ ने नहीं जलायी! तो क्या अब इंसानों की बलि ले रही भीड़, सुप्रीम कोर्ट की हाय-तौबा से अपना चरित्र बदल लेगी! किस राजनीतिक दल ने और कब ये ख़्वाहिश नहीं रखी कि उसके पीछे ‘भीड़’ खड़ी हो! राजनीति के लिए ‘भीड़’ ज़रूरी है। आमलोगों के पास ‘भीड़’ नहीं है, इसीलिए वो राजनेता नहीं हैं।

COW-VIGILANTE

भीड़ को भीड़ बनने से रोकने का काम क़ानून और संवेदनशील सरकार का है। संवेदनशील सरकार का कर्त्तव्य है कि वो छोटे-छोटे जनसमूह और संगठन की माँगों, उम्मीदों और अपेक्षाओं का वक़्त रहते निराकरण करे, ताकि वो भीड़ में तब्दील ना हों। अभी तो भारत का संस्कार ही ये हो चुका है कि सरकारें सिर्फ़ हिंसा-हड़ताल और चक्का जाम वग़ैरह की भाषा ही समझती हैं। समाज का जो तबक़ा सरकारी व्यवस्था की चूलें नहीं हिला सकता, मौजूदा व्यवस्था में उसकी तब तक कोई सुनवाई नहीं है, जब तक कि सड़कों पर हिंसा नहीं करता। ढीठ नौकरशाही और विधायिका को तो अदालतों के फ़ैसलों की भी तब तक कोई परवाह नहीं होती, जब तक कि बात अवमानना तक न पहुँच जाए।

अब तो सरकारी तंत्र को भी सड़क का अतिक्रमण हटाने के लिए भी कोर्ट के आदेश की ज़रूरत पड़ती है! नौकरशाही को अपना फ़र्ज़ निभाने के लिए अदालत की अवमानना का वास्ता देना पड़ता है। जब तक अदालत की लाठी सिर पर नहीं हो, तब तक वही सरकारी अमला अतिक्रमण को पैदा करके उगाही करता है, जिस पर अतिक्रमण ख़त्म करने का ज़िम्मा होता है। सबकी उगाही बँधी हुई है! इसीलिए जब अदालती आदेश के बग़ैर जब सरकारी तंत्र, अतिक्रमण हटाने पहुँचता है तो उसका वास्ता जनता के सहयोग और समर्थन से नहीं, बल्कि भीड़ के विरोध से पड़ता है! सबको, सब कुछ पता है! अदालतें भी अनजान नहीं हैं! जज साहब को भी सब पता है! फिर भी सिर्फ़ अदालती आदेश ही ये बोल पाता है कि ‘कोई भी क़ानून हाथ में नहीं ले सकता!’

भीड़ की असलियत भी किसी से छिपी नहीं है। भीड़, जब इंसानों की होती है तो वो वोट भी होती है। ‘जहाँ वोट, वहाँ तुष्टिकरण!’ तुष्टिकरण की विकृति से लोकतंत्र को बचाने का दारोमदार जिस क़ानून पर है, उसके तीन अंग हैं। विधायिका, पुलिस या कार्यपालिका और अदालत। पुलिस और अदालतों में पर्याप्त निवेश करके यदि उन्हें कारगर बना दिया जाए तो वो कमज़ोर क़ानून की भी भरपायी कर देंगे। अन्यथा, कठोर क़ानून भी किताबों में ही बन्द पड़े रहेंगे। हत्या, बलात्कार, दहेज-उत्पीड़न, बाल-विवाह जैसे मामलों में जो क़ानून भारत में हैं, उससे सख़्त सज़ा कहीं नहीं हो सकती।

हमारी न्याय-व्यवस्था किसी को इंसाफ़ नहीं दे पाती। हमारी अदालतों से किसी को इंसाफ़ नहीं मिलता। छोटा-बड़ा, अमीर-ग़रीब सभी अदालतों में लगने वाले असामान्य वक़्त के शिकार हैं। भारतीय जेलों में अपराधियों से दोगुनी संख्या विचाराधीन क़ैदियों की है। मुक़दमों के निपटारे में 20-25 साल लगना सामान्य बात है। पुलिस जिन मुट्ठी भर अपराधियों को पकड़ पाती है, उनमें से भी महज 6 फ़ीसदी का ज़ुर्म अदालत में साबित हो पाता है। मज़े की बात ये भी है कि क़ानून किसी के हाथ में नहीं, बल्कि कहीं है ही नहीं। आज़ाद भारत में पुलिस-अदालत की दशा हमेशा चिन्ताजनक ही रही है। भीड़-युग में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना आया है कि ये पूरी तरह से चौपट हो चुका है। सियासत और लगातार बढ़ती आबादी ने पुलिस-अदालत को कभी सुधरने नहीं दिया। पुलिस, राज्य सरकारों की वर्दीधारी लठैत है। ये न्याय-व्यवस्था की पहली सीढ़ी है। लेकिन खंडहर से भी ज़्यादा जर्जर हो चुकी है। ये सिर्फ़ साधन-सम्पन्न लोगों का ख़्याल रख पाती है।

भीड़ को ऐतबार नहीं है कि क़ानून अपना काम ज़रूर करेगा। मोदी राज से पहले भी कभी-कभार ऐसी ख़बरें मिलती थीं कि भीड़ ने किसी चोर या जेबकतरे को रंग हाथ पकड़ लिया और फिर उसे पुलिस के हवाले करने से पहले ही भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला। अब तो भीड़, पुलिस को भी पीट डालती है। क़ानून को हाथ में लेने वालों का पुलिस-अदालत कुछ नहीं बिगाड़ पाती। यही आलम दंगाइयों का भी होता है। उनके चेहरे पर भी भीड़ का मुखौटा ही होता है। कुख़्यात अपराधियों को भी ज़मानत पर ज़मानत मिलते जाना, उनका एक के बाद एक जघन्य अपराधों को करते जाना, दाग़ी लोगों का सियासी क्षेत्र में चमककर सफ़ेदपोश बनना और दशकों तक अदालत की कार्यवाही का पूरा नहीं होना भी भीड़ को यही सन्देश देता है कि पुलिस-अदालत उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी।

रही-सही क़सर तब पूरी हो जाती है, जब भीड़ को राजनीतिक आश्रय मिलने लगता है। भीड़ में से अपराधी को ढूँढ़ना और अदालत में उसका अपराध साबित करना, बेशक़ पुलिस की उपलब्धि है। लेकिन इन्हीं अपराधियों को चटपट जमानत मिल जाना और मंत्रियों की ओर से उनका माल्यार्पण होना, भीड़-युग के वैभव का गुणगान करता है। जब वाचाल प्रधानमंत्री के पास भी ऐसी प्रवृत्तियों की भर्त्सना करने का भी वक़्त नहीं हो, जब भीड़ में हिन्दू-मुसलिम ढूँढ़े जाएँ, जब भीड़ में तिरंगा, राष्ट्रवाद और देशद्रोह का तड़का लगे, जब भीड़ में पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण वाला क्षेत्रवाद घुसेड़ा जाए, तब जो भीड़-तंत्र पैदा होगा, उसे किसी अदालती फ़रमान और क़ानून से काबू में नहीं लाया जा सकता! फ़िलहाल, भारत के नसीब में यही भीड़-युग लिखा है।

रात कितनी भी लम्बी हो, वो भोर को रोक नहीं पाती! भीड़-वादियों में ग़लतफ़हमी फैलायी गयी है कि भीड़, उनके बग़ैर रह नहीं पाएगी! सत्ता तंत्र की मन्दबुद्धि सवर्ण हिन्दुओं में यही धारणा फैलायी जा रही है कि ‘जनता को कुछ याद ही नहीं रहता!’ जबकि सच्चाई ये है कि जनता ने हमेशा अपनी यादाश्त का लोहा मनवाया है। दांडी मार्च में महात्मा गाँधी की तस्वीरों में दिखने वाली जनता हाशिये पर दिखती ज़रूर है, लेकिन चुटकी बजाकर सत्ता को उखाड़ फेंकती है। इसी जनता ने इमरजेंसी और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद संविधान की रक्षा की थी। भीड़-राज को ख़ुशफ़हमी है कि वही जनता लिंचिंग, दंगे, एनकाउंटर, कठुआ, उन्नाव रेप, ऊना कांड, महंगाई, नोटबन्दी, बेरोज़गारी सब भूल जाएगी और उसकी साज़िश के मुताबिक, फिर से साम्प्रदायिकता के नशे में टूट जाएगी। लेकिन काठ की हाँडी कब बार-बार चढ़ी है!

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

ओपिनियन

समाज में बदलाव के लिए अपने घर में झांकने की जरूरत : निकिता आनंद

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

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नई दिल्ली, 7 दिसंबर | साल 2003 की मिस इंडिया टाइटल विजेता व अभिनेत्री निकिता आनंद का मानना है कि समाज में कोई भी सुधार लाने के लिए हमें सबसे पहले अपने घर में झांककर देखना चाहिए और घर से सुधार व बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए।

निकिता हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में ‘इंटरनेशनल वीमेन पॉलिटेक्निक’ द्वारा आयोजित ‘मिराकी 2018’ कार्यक्रम का हिस्सा बनीं, जहां उन्होंेने आईएएनएस से बात की।

निकिता से जब पूछा गया कि मॉडलिंग में उनका कैसे आना हुआ तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “मैं आर्मी बैकग्राउंड से हूं मेरे पिता डॉक्टर हैं। 10वीं के बाद या 12 वीं के आसपास मेरी मॉडलिंग शुरू हो गई थी और मैंने काफी लोकल पेजेन्ट्स भी जीते हैं और साथ ही साथ प्रोफेशनल रैंप वॉक भी शुरू कर दिया था और मैं एनआईएफटी की स्टूडेंट थीं तो फैशन डिजाइनिंग भी हो रही थी और फैशन रैंप वॉक भी हो रहा था। मुझे मिस इंडिया के लिए पार्टिसिपेट करने का ख्याल आया और थोड़ा सोचने के बाद हिस्सा ले लिया और फिर मैंने मिस इंडिया का टाइटल जीत लिया।”

टीएलसी के शो ‘ओ माई गोल्ड’ की मेजबानी कर चुकीं निकिता को वास्तविक जीवन में गोल्ड के बजाय प्लेटिनम ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। शो के बारे में उन्होंने कहा, “इस शो के लएि हमने पूरे देशभर में ट्रैवल किया जो दिलचस्प था। इसमें हमने गोल्ड के बारे में बात की थी, क्योंकि भारत में पारंपरिक आभूषण के तौर पर ज्यादातर पीले सोने का इस्तेमाल होता है। शो करके मुझे मुझे दक्षिण भारतीय और बंगाली ज्यूलरी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला, लेकिन मुझे निजी तौर पर गोल्ड के बजाय प्लेटिनम और डायमंड ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। मैं इनेक आभूषण ज्यादातर पहनती हूं।”

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

उन्होंने कहा, “महिलाओं के साथ उत्पीड़न की बहुत सारी घटनाएं होती हैं। भारत में हर रोज हर क्षण कहीं न कहीं नाइंसाफी होती है। ऐसे लाखों केस होते होंगे जो कि रिपोर्ट नहीं होते हैं। किसी भी क्षेत्र में किसी भी किस्म के इंसान में बदलाव लाने का काम हमेशा शिक्षा से ही होता है। अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं यह मायने रखता है। लोगों की मानसिकता होती है कि पहले बाहर देखो, वहां क्या खराब हो रहा है। लेकिन अपने घर में नहीं झांककर देखते कि उनके घर में क्या हो रहा है।”

निकिता ने कहा कि बच्चा स्कूल से ज्यादा वक्त घर में बिताता है, तो घर में अच्छे संस्कार व माहौल देने की कोशिश करनी चाहिए, तभी वह अच्छा नागरिक बन सकेगा। समाज में सुधार और बदलाव लाने की कोशिश घर से की जानी चाहिए। इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाने और समाज में बदलाव लाने के मानसिकता में बदलाव लाना बेहद जरूरी है।

उनका मानना है कि ‘हैशटैगमीटू’ मूवमेंट को आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे और महिलाओं को भी आगे आकर अपनी दास्तां बयां करने का प्रोत्साहन मिले।

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इस मूवमेंट को आगे बढ़ाना चाहिए, आवाज तो हर किसी की है तो क्यों एक हिस्से को बोलने दिया जाए और एक हिस्से को दबाया जाए वो नहीं होना चाहिए। जब हम समानता की और सशक्तिकरण की बात करते हैं तो इसका मतलब यही है न कि सबको समान अधिकार मिले। अगर किसी और के आगे आने से और उसकी कहानी आगे आने से किसी और को प्रोत्साहन मिलता है तो ये एक अच्छी बात है। किसी भी महिला के लिए अपने हुए दर्दनाक वाकये को याद करना मुश्किल होता है। उसकी भावना को समझने की कोशिश करनी चाहिए।”

मॉडलिंग में आने की ख्वाहिश रखने वाली लड़कियों के लिए दिए संदेश में उन्होंने कहा, “सबसे पहले आपको तय करना चाहिए कि आपको कहां जाना है, क्योंकि यह आसान लाइन नहीं है, आपके पास जरूरी क्राइटेरिया होनी चाहिए जैसे रैंप वॉक के लिए एक परफेक्ट बॉडी स्ट्रक्चर और हाइट होनी चाहिए। अगर, आपको प्रिंट मॉडलिंग के लिए जाना है तो फिर आपके पास वैसा चेहरा-मोहरा, भाव-भंगिमा होनी चाहिए, जिसे कैमरा अच्छे से कैप्चर कर सकें। आप किसी भी फील्ड को बस इसलिए नहीं चुने कि वो आपको आकर्षित कर रहा है, बल्कि अच्छे से आकलन कर लें कि आप उसके लायक है या नहीं।”

निकिता ने ‘लाइफ में कभी-कभी’ और ‘फोर टू का वन’ जैसी फिल्मों में भी काम किया है। लेकिन अब वह फिल्में नहीं कर रही हैं। फिल्मों से दूरी बनाने के बारे में उन्होंने कहा, “मैंने फिल्मों में काम किया है, लेकिन मुझे टेलीविजन प्रेजेंट करना या फिर लाइव शो करना ज्यादा पसंद है। आजकल मैं गायन का भी प्रशिक्षण ले रही हूं आगे जाकर मैं गायन में भी परफार्मेस दूंगी। अगर मैं टीवी की बात करूं तो मैंने लाइफस्टाइल के अलावा स्पोर्ट्स शो भी बहुत किया है, क्रिकेट पर भी बहुत शो किया है। मुझे टीवी बहुत पसंद आता है, क्योंकि निजी जिंदगी में मैं बहुत आर्गनाइज हूं और यही चीज टीवी में भी है।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

सहित्य साधना सृजन की चीज : वीणा ठाकुर

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

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veena thakur maithili sahitya
Picture Cridit : Swatva Samachar

दरभंगा, 6 दिसंबर | सर्वोच्च साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी से मिथिला क्षेत्र की समृद्ध मैथिली भाषा ही बिहार को अमूमन हर साल पुरस्कार दिलाती रही है। इस बार इस पुरस्कार के लिए दरभंगा की रहने वाली कथाकार प्रो.वीणा ठाकुर को चुना गया है। वीणा का चयन उनके कथा-संग्रह ‘परिणीता’ के लिए किया गया है।

वीणा का कहना है कि साहित्य साधना की चीज है। किसी भी कृति का समय खुद मूल्यांकन करता है, इस कारण साहित्यकारों को हड़बड़ी में नहीं, बल्कि किसी भी रचना के लिए धैर्य रखने की जरूरत है।

बचपन से ही लिखने-पढ़ने की शौक रखने वाली वीणा अपने संस्मरणों को याद करते हुए बताती हैं, “जब मैं पांचवीं कक्षा में थी, तभी तुलसीदास की रामचरित मानस पढ़ ली थी। यही नहीं, छठे वर्ग की पढ़ाई के दौरान ही घर से पैसे चुराकर विमल मित्र के बांग्ला उपन्यास का हिंदी अनुवाद ‘खरीदी कौड़ियों का मोल’ खरीदकर लाई थी और उसे मैंने पढ़ा था। पैसे चुराने को लेकर मुझे घर में डांट भी पड़ी थी।”

मधुबनी जिले के भवानीपुर की बेटी और दरभंगा के पंचोभ गांव की बहू वीणा ने अकादमी पुरस्कार की घोषणा के बाद आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि यह सम्मान मैथिली भाषा का है। इस पुरस्कार के बाद उनकी जिम्मेवारी और बढ़ गई है।

उन्होंने कहा कहा, “वैसे तो साहित्यकारों के लिए कई पुरस्कार हैं, लेकिन साहित्य अकादमी पुरस्कार साहित्यकारों के लिए सर्वोच्च पुरस्कार है। मुझ पर ईश्वर की असीम अनुकंपा है कि इस पुरस्कार के लिए मेरा नाम चयनित हुआ।”

कथा-संग्रह ‘परिणीता’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस कथा संग्रह में वैसे तो कई कहानियां हैं, मगर कथा ‘निरूत्तरित प्रश्न’ आज की जीवनशैली के काफी नजदीक है। उन्होंने कहा कि इसमें बुढ़ापे की अवस्था में पहुंचने और पुत्रों के रवैये को बताया गया है।

उपन्यास ‘भारती’, कथा-संग्रह ‘आलाप’, समीक्षा ‘मैथिली रामकाव्यक परंपरा’, ‘विद्यापतिक उत्स’, ‘इतिहास दर्पण’, ‘वाणिनी’, ‘मैथिली गीत साहित्यक विकास आ परंपरा’ तथा अनुवाद की पुस्तक ‘हाट-बाजार’ और ‘भारतीय कविता संचयन : हिंदी’ की रचनाकार वीणा का कहना है कि आज के युवा साहित्यकार किसी भी काम में हड़बड़ी में रहते हैं और तुरंत सभी कुछ पा लेना चाहते हैं।

उनका मानना है साहित्य हड़बड़ी नहीं, धैर्य की चीज है, जिसमें आपकी कृति या रचना को पाठक अवलोकन और मूल्यांकन करते हैं।

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में प्रो. मोहन ठाकुर के घर 19 मार्च, 1954 को जन्म लेने वाली और दरभंगा के पंचोभ गोव में पशु चिकित्सा पदाधिकारी डॉ़ दिलीप झा की पत्नी वीणा ठाकुर बिरला फाउंडेशन के प्रतिष्ठित सम्मान के लिए गठित मैथिली भाषा समिति की संयोजिका हैं।

ललित नारायण विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर मैथिली विभाग की पूर्व अध्यक्ष वीणा की प्रारंभिक शिक्षा सहरसा में हुई और उच्च शिक्षा भागलपुर विश्वविद्यालय में हुई।

मैथिली भाषा के विषय में पूछे जाने पर प्रोफेसर वीणा कहती हैं, “मैंने तो मैथिली भाषा मां की गोद में सीखी। मैं इस भाषा की कृतज्ञ हूं। मेरे लिए यह भाषा नहीं, मेरा साहित्य सफर है। यही कारण है कि मेरी कहानियों में परंपरा, साहित्य, संस्कृति के साथ आधुनिकता से मैथिली के जुड़ने की भी कहानी रहती है।”


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ओपिनियन

आज के भारतीय सिनेमा में कंटेंट महत्वपूर्ण : मेघना गुलजार

“अब लोग कंटेंट के भूखे हैं..चीजें बदल गई हैं। पहले लोग अक्सर बड़े पर्दे पर बस अपने पसंदीदा सितारों को देखने के लिए थिएटर जाते थे, उन्हें कहानी से कोई मतलब नहीं होता था और अब वही लोग हैं जो कहानी के बारे में जानना चाहते हैं। वे फिल्म की समीक्षा पढ़ते हैं और उसके बाद किसी एक फिल्म को देखने के लिए थिएटर पर जाते हैं।”

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Filmmaker, Meghna Gulzar

फिल्मकार मेघना गुलजार का कहना है कि वह दिन चले गए जब फिल्में स्टार वैल्यू पर हिट हुआ करती थीं। अब भारतीय सिनेमा के दर्शक स्टार के साथ-साथ स्टोरी भी चाहते हैं। उनके मुताबिक, अच्छा कंटेंट आज के समय में फिल्मों की सफलता में एक बड़ी भूमिका निभा रहा है।

टाइम्स लिटफेस्ट दिल्ली 2018 में रविवार को ‘हिंदी सिनेमा के बदलते चलन’ सत्र में मेघना ने कहा, “भारतीय सिनेमा में पहले हीरो और हिरोइनों को ज्यादा तवज्जो दी जाती थी लेकिन अब चीजें पहले जैसी नहीं हैं। अब लोग अभिनेताओं के अलावा कंटेंट को भी महत्व दे रहे हैं..कंटेंट भारतीय सिनेमा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।”

पैनल का हिस्सा रहे गीतकार प्रसून जोशी ने भी इसपर सहमति जताई और कहा कि इस मामले में विकास हुआ है।

उन्होंने कहा, “अब लोग कंटेंट के भूखे हैं..चीजें बदल गई हैं। पहले लोग अक्सर बड़े पर्दे पर बस अपने पसंदीदा सितारों को देखने के लिए थिएटर जाते थे, उन्हें कहानी से कोई मतलब नहीं होता था और अब वही लोग हैं जो कहानी के बारे में जानना चाहते हैं। वे फिल्म की समीक्षा पढ़ते हैं और उसके बाद किसी एक फिल्म को देखने के लिए थिएटर पर जाते हैं।”

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने कहा कि भारत में ‘जानकार (इन्फॉर्म्ड) सिनेमा’ का उदय हुआ है।

–आईएएनएस

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