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लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक है: न्यायपालिका और कार्यपालिका की मिलीभगत

सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।

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Supreme Court

संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र और निर्भीक होना ज़रूरी है। संविधान की आत्मा का बसेरा न्यायपालिका में ही होता है। न्यायपालिका के बग़ैर संविधान के शब्द निर्जीव बने रहते हैं। क़ानून के मुताबिक़ इंसाफ़ करते हुए अदालतें जहाँ दुस्साहसी कार्यपालिका पर अंकुश लगाती हैं, वहीं विधायिका की सीनाज़ोरी पर भी नकेल कसती हैं। सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। इसीलिए जजों से ये अपेक्षा रहती है कि वो अदालतों की निष्पक्षता और निर्भीकता को क़ायम रखने के प्रति जहाँ न्यायपालिका में रहते हुए उत्साह दिखाते रहें, वहीं अन्य सभी का ये फ़र्ज़ है कि वो बाहर रहकर इस काम को आगे बढ़ाएँ।

जस्टिस राजन गोगोई को सुनना बेहद सुखद रहा। उन्होंने पिछले हफ़्ते रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान में उन मुद्दों पर अपनी बेबाक़ राय देश के सामने रखी, जो आज भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं। उनका नज़रिया लम्बे समय तक हमारे कानों में गूँजता रहेगा। हम जजों के ऐसे कारवाँ के साथ महफ़ूज़ हैं, जो अपने किस्सों के लिए नहीं जाने जाते। जस्टिस गोगोई उन जजों में से हैं जो ख़ुद को अचूक बनाने से ज़्यादा इस बात के लिए सन्तुष्ट रहना चाहते हैं कि उनके फ़ैसले से इंसाफ़ को तरज़ीह मिली। अचूक होना आदर्श स्थिति है। कोई अचूक नहीं हो सकता, फिर भी इस आदर्श को हासिल करने के लिए कोशिशें होती रहनी चाहिए। लोकतंत्र में स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा, तीनों आदर्शों का संगम न्याय में होता है। बराबरी ही स्वस्थ समाज की बुनियाद है। इसीलिए हुक़ूमत से ये अपेक्षा रहती है कि वो हरेक व्यक्ति की ज़िन्दगी में इन आदर्शों की मौजूदगी को सुनिश्चित करे।

हम दो भारत में रहते हैं। दोनों एक-दूसरे से बेहद दूर हैं। एक में देश के सुविधा सम्पन्न लोग हैं तो दूसरे में वंचित। वंचित भारत आज भी उपेक्षित है और बेहद ग़रीबी में जी रहा है। उसके गरिमावान जीवन से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को सम्पन्न भारत हड़प लेता है, तब इंसाफ़ ही वो आदर्श होता है जो दोनों के बीच की खाई को पाटने में मददगार बनता है। कई बार सुप्रीम कोर्ट के जज अपने युगान्तरकारी फ़ैसलों के ज़रिये संविधान के महत्वपूर्ण आदर्शों को स्थापित करते हैं, तो कई बार अन्यायपूर्ण फ़ैसलों के आगे मूकदर्शक भी बने रहते हैं। कभी तो गोपनीयता को मूल अधिकार बताया जाता है, लेकिन यही गोपनीयता उस वक़्त काफ़ूर हो जाती है जब जाँच एजेंसियाँ और सरकार के बीच मिलीभगत चल रही होती है।

सोशल मीडिया के मंचों पर कितने ही मूल अधिकारों की धज़्ज़ियाँ रोज़ाना उड़ती रहती हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉज़ी एक्ट, 2000 (श्रेया सिंघल) की धारा 66 ए को असंवैधानिक ठहराना बिल्कुल सही है, क्योंकि तकनीक के मौजूदा दौर में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहुलतावाद और मतभेद से जुड़े उन संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं माना जा सकता, जो लोकतंत्र की आत्मा हैं। इसके बावजूद रोज़ाना हमारे राजनेताओं के ख़िलाफ़ अशोभनीय टिप्पणियाँ हो रही हैं, लेकिन हुक़ूमतें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। इसीलिए आये दिन सोशल मीडिया पर मनगढ़न्त तस्वीरों, फ़र्ज़ी ख़बरों और अफ़वाहों के ज़रिये साम्प्रदायिक ज़हर फैलाया जाता है। ऐसी घटनाएँ साफ़ बताती हैं कि आदर्श और ज़मीनी सच्चाई में कितना फ़र्क़ है! सत्ता इन्हें देखकर आँखें बन्द कर लेती है और जज भी नज़रें फेर लेने को ही अपना कर्त्तव्य मान लेते हैं।

यही वजह है कि जस्टिस गोगोई जिन दो भारत ही बात करते हैं, उनके बीच की खाई को पाटना बेहद मुश्किल है। इसीलिए अदालतें जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी की बातें करती हैं, वो महत्वहीन हो जाती है। लिहाज़ा, जस्टिस गोगोई का ये कहना बिल्कुल सही है कि भारत को सिर्फ़ शोर करने वाले नहीं बल्कि स्वतंत्र पत्रकारों की ज़रूरत है। जबकि आलम ये है कि जिस चौथे खम्भे यानी मीडिया को संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपने पत्रकारीय मूल्यों का शोर मचाना चाहिए वो आज सरकार से गलबहियाँ कर चुका है। ये दशा वाकई में लोकतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक है।

क़रीब दो सदी पहले एलेक्ज़ेडर हैमिल्टन ने लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक दशाओं की व्याख्या की थी। उसका सन्दर्भ देते हुए जस्टिस गोगोई ने बिल्कुल सही फ़रमाया कि न्यायपालिका का लोकतंत्र की बाक़ी दो में से किसी भी शाखा के साथ गठजोड़ बना लेना सबसे ख़तरनाक है। क्योंकि इससे अलग-अलग क्षेत्राधिकार वाली संविधान की मूल भावना का दमन हो जाता है। संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका को एक-दूसरे के साथ सुर-ताल में चलना होता है, लेकिन यदि कार्यपालिका का न्यायपालिका से गठजोड़ हो जाए तो फिर लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा ख़तरा और कुछ नहीं हो सकता। इसी गठजोड़ के ज़रिये जब अन्याय और अत्याचार को जारी रखा जाता है तब अदालती आदेश को अन्तिम मानने का सिद्धान्त बेहद घातक हो जाता है।

ये निर्विवाद सत्य है कि हमारा राजनीतिक लोकतंत्र करोड़ों लोगों को इंसाफ़ देने में नाकाम रहा है। हमारे देश में ऐसे मुद्दों की भरमार है जिसका समतामूलक समाज की अभिकल्पना से कोई वास्ता नहीं है। धार्मिक ध्रुवीकरण को पैदा करने वाली बहस, किसी ख़ास धर्म के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा और राजनेताओं की उस वक़्त की ख़ामोशी जब उनसे बयान की अपेक्षा हो। ऐसे मुद्दों का विकास से कोई नाता नहीं है। न्यायपालिका ने अतीत में जनहित याचिका को बेज़ुबानों की ज़ुबान बनाया था। इसके लिए हुक़ूमत को कई ऐसे क़दम उठाने के लिए मज़बूर किया गया, जिनसे वो कन्नी काट रही थी। लेकिन अब जनहित याचिका का चरित्र बदल चुका है। अब अक्सर इसका इस्तेमाल उन लोगों की रक्षा करने के लिए हो रहा है तो ख़ुद अन्यायकारी हैं।

हमारी न्यायपालिका को अपने विशिष्ट स्थान से जुड़े एक और पहलू पर भी ज़रूर ध्यान देना चाहिए। सरकारी कामकाज़ की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। सत्ता के गलियारों में, किन मंशाओं से प्रेरित होकर फ़ैसले लिये जाते हैं, इसे सूचना के अधिकार क़ानून, 2005 के बावजूद नहीं जाना जा सकता। राजनीतिक लाभ लेने के लिए अक्सर क़ानून तक बदल दिये जाते हैं। अदालत की कार्यवाही भले ही उसी और पारदर्शी है। लेकिन ये वरदान है तो अभिश्राप भी। वरदान इसलिए क्योंकि अदालत में हुई गतिविधियों का पता उन लोगों को भी चल जाता है, जो फ़ैसले को अपना अमोघ अस्त्र बनाना चाहते हैं। इससे न्याय करने की प्रक्रिया शुद्ध बनी रही है। लेकिन अभिश्राप ये है कि संवैधानिक धारणाओं के मुताबिक़, जब जज अपने फ़ैसले की गुणवत्ता को सर्वोपरि रखने में नाकाम रहते हैं, तब वो करोड़ों लोगों की चौकस नज़रों के सामने होते हैं। इसीलिए बात तब बहुत ख़ौफ़नाक हो जाती है जब ये धारणा बनने लगे कि सुप्रीम कोर्ट से भी इंसाफ़ नहीं मिला। इस पहलू को लेकर पूरी न्यायिक बिरादरी को बेहद संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

जॉर्ज ओरवेल की 1984 का सन्दर्भ देते जस्टिस गोगोई ने सही कहा कि ‘स्वतंत्रता का मतलब है कि ये कहा जा सके कि दो और दो चार होते हैं’। लेकिन कई बार हमें डर लगता है कि दो और दो चार नहीं होते। ये चिन्ताजनक है।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

The writer, a senior Congress leader, is a former Union minister

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अनुभव आगे, युवा पीछे : कांग्रेस की 2019 की रणनीति?

“2019 का चुनाव मोदी बनाम राहुल होने जा रहा है। इसमें कोई दोराय नहीं है। सचिन पायलट और सिंधिया की पैठ महज अपने-अपने राज्यों में है, इसलिए इनकी तुलना राहुल से करना ठीक नहीं होगा।”

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Kamal Nath Sciendia

नई दिल्ली, 17 दिसंबर | राजस्थान और मध्य प्रदेश में सत्ता की चाबी अशोक गहलोत और कमलनाथ के हाथों में थमा दी गई है, दोनों ही पार्टी के अनुभवी और वरिष्ठ नेता हैं। गांधी परिवार के विश्वासपात्र हैं, लेकिन एक सवाल जो अभी भी दिमाग में कौंध रहा है कि युवाओं को तरजीह देने वाले राहुल गांधी ने इन पदों के लिए दौड़ में शामिल युवा चेहरों- सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को मौका क्यों नहीं दिया?

राहुल अपनी सक्रिय राजनीति के शुरुआती दिनों से ही युवाओं को ज्यादा मौके दिए जाने की पैरवी करते रहे हैं। क्या ऐसा किसी सोची-समझी रणनीति के तहत किया गया या वाकई ‘युवा जोश’ पर ‘अनुभव’ भारी पड़ गया? ऐसी क्या वजह रही कि राहुल कांग्रेस पार्टी के पुराने र्ढे को तोड़कर नया उदाहरण पेश नहीं कर पाए?

राजस्थान के गांवों और दूरदराज के क्षेत्रों का सफर कर चुकीं राजनीतिक विश्लेषक निकिता चावला ने आईएएनएस से कहा, “इसे 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की रणनीति कह सकते हैं। कांग्रेस अपनी लय धीरे-धीरे फिर से हासिल कर रही है। अगले साल लोकसभा चुनाव जीतने के लिए उन्हें अनुभव की सख्त जरूरत पड़ेगी। अशोक गहलोत और कमलनाथ बहुत ही परिपक्व नेता हैं, अपने-अपने राज्यों में इनकी एक छाप है, जो लोकसभा चुनाव में बहुत मदद करेगी। इसलिए कांग्रेस फिलहाल हर चीज को 2019 के नजरिए से देख रही है।”

वह कहती हैं, “मैं राजस्थान घूमी हूं, वहां की राजनीति से वाकिफ हूं तो कह सकती हूं कि सचिन पायलट ने बीते कई वर्षो में ग्रासरूट पर बहुत काम किया है। पायलट की लोकप्रियता में भी काफी तेजी से इजाफा हो रहा है। अशोक गहलोत ने एक बार कहीं कहा था कि यह शायद उनका ‘आखिरी मौका’ हो सकता है तो उनका यह बयान शायद काम कर गया। गहलोत और कमलनाथ, सोनिया गांधी के कंटेम्परेरी नेता भी हैं, इस बात को ध्यान में रखना चाहिए। 2019 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए पार्टी को अनुभव चाहिए, जो कमलनाथ और गहलोत के पास है। सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाकर पार्टी अंदरखाने खुद को कमजोर नहीं करना चाहेगी।”

राहुल की युवाओं को तरजीह देने के सवाल पर कांग्रेस पार्टी की प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी पार्टी कहती हैं, “कांग्रेस एक लोकतांत्रिक पार्टी है। यहां हर फैसला गहन विचार-विमर्श के बाद ही होता है। पार्टी में वही फैसले होते हैं, जिस पर सभी की एकराय होती है। गहलोत और कमलनाथ पर एकराय बनी।”

राजस्थान की राजनीति पर नजर रखने वाले पत्रकार शिवओम गोयल कहते हैं, “2019 का चुनाव मोदी बनाम राहुल होने जा रहा है। इसमें कोई दोराय नहीं है। सचिन पायलट और सिंधिया की पैठ महज अपने-अपने राज्यों में है, इसलिए इनकी तुलना राहुल से करना ठीक नहीं होगा।”

राजस्थान की राजनीति में सचिन पायलट की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और ठीक ऐसा ही मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर है। क्या इससे भी कुछ लोग सकपकाए हुए हैं? इसका जवाब देते हुए राजनीतिक विश्लेषक संदीप शास्त्री कहते हैं, “इसका एक मायना यह भी है कि सचिन पायलट के पास मौके बहुत हैं, वह अभी सिर्फ 41 साल के हैं। उनके पास अथाह समय बचा है, लेकिन 67 साल के गहलोत और 72 साल के कमलनाथ को शायद आगे इस तरह का मौका नहीं मिल पाए। इसलिए उनके अनुभव और उम्र को देखते हुए उन्हें मौका दिया गया है।”

हालांकि, निकिता एक सुझाव देते हुए कहती हैं, “मेरा मानना है कि राजस्थान में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए था और गहलोत को चाणक्य की भूमिका में रखना चाहिए था, इससे लोकसभा चुनाव में पार्टी को ज्यादा फायदा पहुंचता।”

–आईएएनएस

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2018 In Retrospect : पूरे साल छाया रहा कृषि-संकट का मसला

पूरे साल कई ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, जिनमें सड़कों पर फसल और दूध फेंककर किसानों का गुस्सा दिखा गया है। किसानों ने उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने को लेकर अपनी नाराजगी दिखाई है।

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Farmers Protest

नई दिल्ली, 18 दिसंबर | देश के किसानों के बुनियादी सवाल वर्ष 2018 में प्रमुख राजनीतिक मुद्दे बनकर उभरे, जो आगे अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भी छाए रह सकते हैं।

खासतौर से किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम नहीं मिलने और अनाजों की सरकारी खरीद की प्रक्रिया दुरुस्त नहीं होने को विपक्ष आगामी आम चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ अहम मसला बनाना चाहेगा।

हाल ही में हुए विधानसभा चुनावों में हिंदीभाषी तीन प्रमुख प्रदेशों में भाजपा का सत्ता से बेदखल हो जाना इस बात की तस्दीक करता है कि ग्रामीण इलाकों में लोग सरकार की नीतियों और काम से खुश नहीं थे।

बीते एक साल में देश की राजधानी में ही किसानों की पांच बड़ी रैलियां हुईं, जबकि केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने प्रमुख फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) निर्धारण में नए फॉर्मूले का उपयोग किया। साथ ही, सरकार ने किसानों को खुश करने के लिए कई योजनाएं लाई हैं।

मध्यप्रदेश के मंदसौर में पिछले साल पुलिस की गोली से छह किसानों की मौत हो जाने के बाद देशभर में मसला गरमा गया था और किसानों का विरोध-प्रदर्शन तेज हो गया था। किसानों का मसला इस साल एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मसला बना रहा।

विभिन्न राजनीतिक दल आज भले ही अलग-अगल मुद्दों को लेकर अपनी आवाज बुलंद करें, मगर किसानों के मसले को लेकर उनमें एका है। इसकी एक मिसाल दिल्ली में 30 नवंबर की किसान रैली में देखने को मिली जब किसानों उनकी फसलों का बेहतर दाम दिलाने और उनका कर्ज माफ मरने के मसले पर राजनीतिक दलों ने अपनी एकजुटता दिखाई थी।

उसी रैली में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, “पूरे देश में अब जो आवाज गूंज रही है वह किसानों की है जो गंभीर विपदा व संकट में हैं।”

स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव ने कहा, “लोकसभा चुनाव 2019 में ग्रामीण क्षेत्र के संकट से संबंधित मसले छाए रहेंगे।” किसानों के 200 से अधिक संगठनों को अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी) के बैनर तले लाने का श्रेय योगेंद्र यादव को ही जाता है।

यादव ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “देश में हमेशा कृषि संकट रहा है। लेकिन यह कभी चुनावों में प्रमुख मुद्दा नहीं बना। विधानसभा चुनावों में भाजपा की हार और किसानों बनी नई एकता से यह सुनिश्चित हुआ है कि कृषि क्षेत्र का संकट लोकसभा चुनाव-2019 में केंद्रीय मसला बनेगा।”

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भाजपा का शासन स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा किसान विरोधी रहा है, क्योंकि पिछले साढ़े चार साल के शासन काल में किसानों के साथ असहानुभूति का रवैया रहा है।

पूरे साल कई ऐसे वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए हैं, जिनमें सड़कों पर फसल और दूध फेंककर किसानों का गुस्सा दिखा गया है। किसानों ने उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलने को लेकर अपनी नाराजगी दिखाई है।

किसानों का विरोध-प्रदर्शनों के बीच सरकार ने कुछ फसलों के एमएसपी में बढ़ोतरी की। हालांकि किसानों ने इस बढ़ोतरी को अपनी मांगों व अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं पाया।

जिन सब्जियों के दाम प्रमुख शहरों में 20-30 रुपये प्रति किलों हैं, किसानों को वहीं सब्जियां औने-पौने भाव बेचना पड़ता है।

किसानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि कृषि मंत्रालय सुधार तंत्र विकसित करने में अप्रभावी प्रतीत होता है, जबकि सरकार ने खरीद की तीन योजनाएं लाईं।

गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी ने जून में यह स्वीकार किया था कि उत्पादन आधिक्य के कारण कृषि संकट है और उन्होंने इस समस्या के समाधान के लिए कदम उठाने की मांग की थी।

स्वाभिमान शेतकरी संगठन के नेता और लोकसभा सदस्य राजू शेट्टी ने कहा कि फिर भी भाजपा सरकार मांग और आपूर्ति का विश्लेषण कर सुधार के कदम उठाने में विफल रही।

किसानों के मसले को लेकर ही राजू शेट्टी ने पिछले साल भाजपा की अगुवाई वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार से इस्तीफा दे दिया था।

कृषि विज्ञानी अशोक गुलाटी ने कहा कि वर्तमान भाजपा सरकार में समझ और दूरर्शिता का अभाव है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जरूरी बाजार सुधार नहीं किया, बल्कि सिर्फ नारे दिए और घोषणाएं कीं।

हैरानी की बात यह है कि मंदसौर की घटना के समय केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह किसानों के मसले को तवज्जो न देकर बाबा रामदेव के साथ बिहार में दो दिवसीय योग सत्र में हिस्सा लेने पहुंचे थे।

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क्या कांग्रेस मप्र की जनता की आवाज सुनेगी?

राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं

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farmer strike in madhya pradesh

मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में जनता ने किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं दिया है, मगर कांग्रेस को बहुमत के करीब लाकर खड़ा कर दिया है। कांग्रेस सरकार बनाने जा रही है, बस सवाल एक ही उठ रहा है कि क्या कांग्रेस आलाकमान जनता की आवाज सुनेगी या राजनीतिक गणित के चलते अपना फैसला सुनाएगी।

राज्य के विधानसभा चुनाव के 11 दिसंबर की देर रात तक नतीजे आ गए, उसके बाद बुधवार को कांग्रेस विधायकों की भोपाल में बैठक बुलाई गई। इस बैठक में केंद्रीय पर्यवेक्षक के तौर पर ए.के. एंटनी आए, उन्होंने विधायकों की बैठक की, एक लाइन का प्रस्ताव पारित किया गया, जिसके जरिए मुख्यमंत्री चुनने का अधिकार पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को दिया गया। उसके बाद गुरुवार को प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने कई दौर की बात की।

कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि राहुल गांधी ने पर्यवेक्षक बनाकर भेजे गए एंटोनी की रिपोर्ट, शक्ति एप के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं से ली गई राय और नेताओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों से आए नतीजों के साथ आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रखकर कमलनाथ व सिंधिया की मौजूदगी में सभी प्रमुख नेताओं से चर्चा की। राहुल गांधी के साथ हुई बैठक में कमलनाथ, सिंधिया, एंटनी, प्रदेश प्रभारी दीपक बावरिया मौजूद रहे।

इतना ही नहीं, मप्र में मुख्यमंत्री को लेकर चल रही खींचतान के बीच सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी भी राहुल गांधी के आवास पर पहुंचीं। कहा जा रहा है कि मप्र के मुख्यमंत्री के मसले पर राहुल गांधी से सोनिया और प्रियंका ने भी चर्चा की।

वरिष्ठ पत्रकार रवींद्र व्यास का कहना है कि राज्य की जनता ने भाजपा को सत्ता से उतारकर कांग्रेस को सरकार बनाने का मौका दिया है। कांग्रेस क्या वास्तव में जनता की मंशा और भाव को समझ पा रही है? इस पर थोड़े सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि दिल्ली में मुख्यमंत्री के नाम को लेकर कई घंटों तक माथापच्ची चली।

व्यास ने आगे कहा कि पार्टी हाईकमान कोई ऐसा फैसला भी नहीं करना चाहती, जिससे प्रदेश के मतदाताओं में नकारात्मक संदेश जाए। कांग्रेस को अंदेशा है कि अगर नकारात्मक संदेश चला गया, कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ गया तो लोकसभा चुनाव में संभावनाओं को बनाए रखना आसान नहीं होगा।

विधानसभा चुनाव में सफलता मिलने से कार्यकर्ताओं का उत्साह उफान पर है। राज्य के विभिन्न हिस्सों से सैकड़ों की तादाद में कार्यकर्ता राजधानी पहुंच चुके हैं। प्रदेश कार्यालय के बाहर सुबह से ही कार्यकर्ताओं का जमावड़ा है, कमलनाथ और सिंधिया के कटआउट, पोस्टर हाथ में थामे कार्यकर्ता जिंदाबाद के नारे लगाने में लगे हैं।

By : संदीप पौराणिक

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