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लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक है: न्यायपालिका और कार्यपालिका की मिलीभगत

सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता।

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Supreme Court

संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र और निर्भीक होना ज़रूरी है। संविधान की आत्मा का बसेरा न्यायपालिका में ही होता है। न्यायपालिका के बग़ैर संविधान के शब्द निर्जीव बने रहते हैं। क़ानून के मुताबिक़ इंसाफ़ करते हुए अदालतें जहाँ दुस्साहसी कार्यपालिका पर अंकुश लगाती हैं, वहीं विधायिका की सीनाज़ोरी पर भी नकेल कसती हैं। सतर्क और सक्रिय न्यायपालिका की बदौलत ही नागरिकों के बुनियादी और संवैधानिक अधिकारों की हिफ़ाज़त हो पाती है। ऐसी सतर्कता के बग़ैर लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता। इसीलिए जजों से ये अपेक्षा रहती है कि वो अदालतों की निष्पक्षता और निर्भीकता को क़ायम रखने के प्रति जहाँ न्यायपालिका में रहते हुए उत्साह दिखाते रहें, वहीं अन्य सभी का ये फ़र्ज़ है कि वो बाहर रहकर इस काम को आगे बढ़ाएँ।

जस्टिस राजन गोगोई को सुनना बेहद सुखद रहा। उन्होंने पिछले हफ़्ते रामनाथ गोयनका स्मृति व्याख्यान में उन मुद्दों पर अपनी बेबाक़ राय देश के सामने रखी, जो आज भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़े हैं। उनका नज़रिया लम्बे समय तक हमारे कानों में गूँजता रहेगा। हम जजों के ऐसे कारवाँ के साथ महफ़ूज़ हैं, जो अपने किस्सों के लिए नहीं जाने जाते। जस्टिस गोगोई उन जजों में से हैं जो ख़ुद को अचूक बनाने से ज़्यादा इस बात के लिए सन्तुष्ट रहना चाहते हैं कि उनके फ़ैसले से इंसाफ़ को तरज़ीह मिली। अचूक होना आदर्श स्थिति है। कोई अचूक नहीं हो सकता, फिर भी इस आदर्श को हासिल करने के लिए कोशिशें होती रहनी चाहिए। लोकतंत्र में स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा, तीनों आदर्शों का संगम न्याय में होता है। बराबरी ही स्वस्थ समाज की बुनियाद है। इसीलिए हुक़ूमत से ये अपेक्षा रहती है कि वो हरेक व्यक्ति की ज़िन्दगी में इन आदर्शों की मौजूदगी को सुनिश्चित करे।

हम दो भारत में रहते हैं। दोनों एक-दूसरे से बेहद दूर हैं। एक में देश के सुविधा सम्पन्न लोग हैं तो दूसरे में वंचित। वंचित भारत आज भी उपेक्षित है और बेहद ग़रीबी में जी रहा है। उसके गरिमावान जीवन से जुड़ी बुनियादी सुविधाओं को सम्पन्न भारत हड़प लेता है, तब इंसाफ़ ही वो आदर्श होता है जो दोनों के बीच की खाई को पाटने में मददगार बनता है। कई बार सुप्रीम कोर्ट के जज अपने युगान्तरकारी फ़ैसलों के ज़रिये संविधान के महत्वपूर्ण आदर्शों को स्थापित करते हैं, तो कई बार अन्यायपूर्ण फ़ैसलों के आगे मूकदर्शक भी बने रहते हैं। कभी तो गोपनीयता को मूल अधिकार बताया जाता है, लेकिन यही गोपनीयता उस वक़्त काफ़ूर हो जाती है जब जाँच एजेंसियाँ और सरकार के बीच मिलीभगत चल रही होती है।

सोशल मीडिया के मंचों पर कितने ही मूल अधिकारों की धज़्ज़ियाँ रोज़ाना उड़ती रहती हैं। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट का इन्फ़ॉर्मेशन टेक्नोलॉज़ी एक्ट, 2000 (श्रेया सिंघल) की धारा 66 ए को असंवैधानिक ठहराना बिल्कुल सही है, क्योंकि तकनीक के मौजूदा दौर में भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहुलतावाद और मतभेद से जुड़े उन संवैधानिक अधिकारों से ऊपर नहीं माना जा सकता, जो लोकतंत्र की आत्मा हैं। इसके बावजूद रोज़ाना हमारे राजनेताओं के ख़िलाफ़ अशोभनीय टिप्पणियाँ हो रही हैं, लेकिन हुक़ूमतें हाथ पर हाथ धरे बैठी हैं। इसीलिए आये दिन सोशल मीडिया पर मनगढ़न्त तस्वीरों, फ़र्ज़ी ख़बरों और अफ़वाहों के ज़रिये साम्प्रदायिक ज़हर फैलाया जाता है। ऐसी घटनाएँ साफ़ बताती हैं कि आदर्श और ज़मीनी सच्चाई में कितना फ़र्क़ है! सत्ता इन्हें देखकर आँखें बन्द कर लेती है और जज भी नज़रें फेर लेने को ही अपना कर्त्तव्य मान लेते हैं।

यही वजह है कि जस्टिस गोगोई जिन दो भारत ही बात करते हैं, उनके बीच की खाई को पाटना बेहद मुश्किल है। इसीलिए अदालतें जिस अभिव्यक्ति की आज़ादी की बातें करती हैं, वो महत्वहीन हो जाती है। लिहाज़ा, जस्टिस गोगोई का ये कहना बिल्कुल सही है कि भारत को सिर्फ़ शोर करने वाले नहीं बल्कि स्वतंत्र पत्रकारों की ज़रूरत है। जबकि आलम ये है कि जिस चौथे खम्भे यानी मीडिया को संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपने पत्रकारीय मूल्यों का शोर मचाना चाहिए वो आज सरकार से गलबहियाँ कर चुका है। ये दशा वाकई में लोकतंत्र के लिए बहुत ख़तरनाक है।

क़रीब दो सदी पहले एलेक्ज़ेडर हैमिल्टन ने लोकतंत्र के लिए सबसे ख़तरनाक दशाओं की व्याख्या की थी। उसका सन्दर्भ देते हुए जस्टिस गोगोई ने बिल्कुल सही फ़रमाया कि न्यायपालिका का लोकतंत्र की बाक़ी दो में से किसी भी शाखा के साथ गठजोड़ बना लेना सबसे ख़तरनाक है। क्योंकि इससे अलग-अलग क्षेत्राधिकार वाली संविधान की मूल भावना का दमन हो जाता है। संसदीय लोकतंत्र में कार्यपालिका और विधायिका को एक-दूसरे के साथ सुर-ताल में चलना होता है, लेकिन यदि कार्यपालिका का न्यायपालिका से गठजोड़ हो जाए तो फिर लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा ख़तरा और कुछ नहीं हो सकता। इसी गठजोड़ के ज़रिये जब अन्याय और अत्याचार को जारी रखा जाता है तब अदालती आदेश को अन्तिम मानने का सिद्धान्त बेहद घातक हो जाता है।

ये निर्विवाद सत्य है कि हमारा राजनीतिक लोकतंत्र करोड़ों लोगों को इंसाफ़ देने में नाकाम रहा है। हमारे देश में ऐसे मुद्दों की भरमार है जिसका समतामूलक समाज की अभिकल्पना से कोई वास्ता नहीं है। धार्मिक ध्रुवीकरण को पैदा करने वाली बहस, किसी ख़ास धर्म के लोगों के ख़िलाफ़ हिंसा और राजनेताओं की उस वक़्त की ख़ामोशी जब उनसे बयान की अपेक्षा हो। ऐसे मुद्दों का विकास से कोई नाता नहीं है। न्यायपालिका ने अतीत में जनहित याचिका को बेज़ुबानों की ज़ुबान बनाया था। इसके लिए हुक़ूमत को कई ऐसे क़दम उठाने के लिए मज़बूर किया गया, जिनसे वो कन्नी काट रही थी। लेकिन अब जनहित याचिका का चरित्र बदल चुका है। अब अक्सर इसका इस्तेमाल उन लोगों की रक्षा करने के लिए हो रहा है तो ख़ुद अन्यायकारी हैं।

हमारी न्यायपालिका को अपने विशिष्ट स्थान से जुड़े एक और पहलू पर भी ज़रूर ध्यान देना चाहिए। सरकारी कामकाज़ की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। सत्ता के गलियारों में, किन मंशाओं से प्रेरित होकर फ़ैसले लिये जाते हैं, इसे सूचना के अधिकार क़ानून, 2005 के बावजूद नहीं जाना जा सकता। राजनीतिक लाभ लेने के लिए अक्सर क़ानून तक बदल दिये जाते हैं। अदालत की कार्यवाही भले ही उसी और पारदर्शी है। लेकिन ये वरदान है तो अभिश्राप भी। वरदान इसलिए क्योंकि अदालत में हुई गतिविधियों का पता उन लोगों को भी चल जाता है, जो फ़ैसले को अपना अमोघ अस्त्र बनाना चाहते हैं। इससे न्याय करने की प्रक्रिया शुद्ध बनी रही है। लेकिन अभिश्राप ये है कि संवैधानिक धारणाओं के मुताबिक़, जब जज अपने फ़ैसले की गुणवत्ता को सर्वोपरि रखने में नाकाम रहते हैं, तब वो करोड़ों लोगों की चौकस नज़रों के सामने होते हैं। इसीलिए बात तब बहुत ख़ौफ़नाक हो जाती है जब ये धारणा बनने लगे कि सुप्रीम कोर्ट से भी इंसाफ़ नहीं मिला। इस पहलू को लेकर पूरी न्यायिक बिरादरी को बेहद संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

जॉर्ज ओरवेल की 1984 का सन्दर्भ देते जस्टिस गोगोई ने सही कहा कि ‘स्वतंत्रता का मतलब है कि ये कहा जा सके कि दो और दो चार होते हैं’। लेकिन कई बार हमें डर लगता है कि दो और दो चार नहीं होते। ये चिन्ताजनक है।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

The writer, a senior Congress leader, is a former Union minister

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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unemployment in India

नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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