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गडकरी की हिम्मत का जबाब नहीं, माना कि 2014 में बन्दर के हाथ में उस्तूरा आ गया!

गडकरी ने नाना पाटेकर के एक मराठी शो में ख़ुलासा किया कि “हमें उम्मीद नहीं थी कि हम सत्ता में आएँगे। इसलिए हमें सलाह दी गयी कि जनता से बड़े-बड़े वादे करो। कुछ नहीं बिगड़ने वाला। लेकिन हम तो सत्ता में आ गये। अब लोग हमारे उन्हीं वादों को हमें याद दिलाते हैं।

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Nitin Gadkari
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बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी को 2019 का नतीज़ा ‘दीवार पर लिखावट’ यानी Writing on the wall के रूप में साफ़ दिखने लगा है। गडकरी अनुभवी नेता हैं। हवा का रुख़ भाँपना जानते हैं। मोदी और अमित शाह की शैली के मुरीद कभी नहीं रहे। इसीलिए बड़ी चतुराई और शालीनता से स्वीकार करते हैं कि ‘2014 में भारत की जनता ने बन्दर के हाथ में उस्तूरा थमा दिया!’ दरअसल, गडकरी को मालूम है कि यदि वो चतुराई से अपना गुनाह क़बूल कर लेंगे तो चुनाव में जनता निजी तौर उन्हें कम दंड देने पर विचार कर सकती है। यदि ऐसा हो सका तो वो भागते भूत की लंगोटी होगी। वैसे सियासी गलियारे में रहने वाले हर व्यक्ति को पता है कि 62 वर्षीय गडकरी ने अपने बाक़ी जीवन के लिए पर्याप्त इंतज़ाम कर रखा है। कई विपक्षी नेताओं से उनके अच्छे सम्बन्ध हैं, जिसकी बदौलत सत्ता परिवर्तन के बाद वो अपनी ख़ाल बचा लेंगे।

पहली बात: मुस्कुराओ और चल दो

गडकरी ने नाना पाटेकर के एक मराठी शो में ख़ुलासा किया कि “हम सभी का दृढ़ विश्वास और प्रखर आत्मविश्वास था कि हम कभी सत्ता में आएँगे ही नहीं। इसलिए हमारे आसपास के लोग कहते थे कि आप तो बोलिए, वादे कीजिए, क्या बिगड़ेगा? आप पर कौन सी जबाबदारी आने वाली है। लेकिन अब तो जबाबदारी आ गयी। अब ख़बरों में आता है कि गडकरी क्या बोले थे, फडणवीस क्या बोले थे, तो अब आगे क्या? तो हम हँसते हुए आगे बढ़ जाते हैं।”

दूसरी बात: गले की फ़ाँस

गडकरी ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार किया था कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ वाला जुमला बीजेपी और मोदी सरकार के गले की फाँस बन गया है! उनका यही रुख़ महँगाई और पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों को लेकर भी रहा है और राम मन्दिर को लेकर भी। उन्हें पता है कि जन भावनाओं को भड़काने और भुनाने वाला कोई भी नारा एक चुनाव के बाद कभी काम नहीं आता। इसीलिए 1996 के बाद संघ-बीजेपी ने राम मन्दिर के मुद्दे को उठाकर ताक पर रखा दिया। यही हश्र अगले चुनावों में समान नागरिक संहिता यानी कॉमन सिविल कोड और अनुच्छेद 370 का भी हुआ। इसी परम्परा के मुताबिक़, 2014 में बीजेपी ने जिस भ्रष्टाचार, काला धन, गुजरात मॉडल और विकास की डुगडुगी बजायी थी, वो सभी मुद्दे 2019 में नदारद रहेंगे। यही वजह है कि 2014 के बाद से कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी कोई मुद्दा नहीं रहा। महबूबा के साथ सरकार बनाने के बावजूद एक भी कश्मीरी पंडित की घर-वापसी नहीं हुई! ‘दो करोड़ रोज़गार के अवसर’ भी कितना बड़ा झाँसा था, ये किससे छिपा है!

तीसरी बात: दिमाग़ ख़राब

गडकरी ही बीजेपी के इकलौते ऐसे मर्द हैं, जिसे नरेन्द्र मोदी से डर नहीं लगता। इसीलिए नोटबन्दी के वक़्त जब मोदी ने गडकरी को चिढ़ाया कि अब तो आपको भी दो लाख रुपये में अपने बेटी की शादी करनी पड़ेगी तो गडकरी ने बहुत सख़्त लहज़े में कहा था, ‘अरे, आपका दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या! दो लाख रुपये में भी कहीं शादी होती है!’ गडकरी के इस तेवर को देखकर मोदी की सिट्टी-पिट्टी ग़ुम हो गयी! क्योंकि इससे पहले वो ऐलान कर चुके थे कि ‘भाईयों-बहनों, मुझे सिर्फ़ 50 दिन का वक़्त दीजिए। इसके बाद आप जिस चौराहे पर चाहे मुझे सूली पर लटका दीजिएगा!’

गडकरी की बेटी की शादी 5 दिसम्बर 2016 को ख़ूब शान-ओ-शौक़त के साथ नागपुर में सम्पन्न हुई। मोदी भी वहाँ गये थे। लेकिन तब तक उन्होंने नोटबन्दी को पूरा निचोड़ लिया था! संघ और बीजेपी के तमाम आला नेताओं ने तब तक अपने लाखों करोड़ रुपये को ठिकाने लगा लिया था। दूसरी ओर, सवा सौ करोड़ भारतवासी आज भी मोदी के चौराहे पर आने का वैसे ही इन्तज़ार कर रहे हैं जैसे शिव मन्दिर के बाहर बैठा नन्दी बैल अपलक भोले-शंकर के बाहर आने का इन्तज़ार करता है! ख़ैर, नन्दी की तरह भारत की जनता के लिए भी उम्मीद पर दुनिया क़ायम है!

चौथी बात: कहने में क्या!

एक मुहावरा है, ‘मथुरा में रहना है तो राधे-राधे कहना है!’ इसी नीति का पालन करते हुए नरेन्द्र मोदी की तरह नितिन गडकरी ने भी ख़ूब लम्बी-चौड़ी फेंकी है। जैसे कुछ महीने पहले इन्होंने दावा किया था कि मार्च 2019 तक गंगा 70-80% साफ़ हो जाएगी! इस तरह से सत्ता की ख़ातिर गडकरी का भी नज़रिया ऐसा ही है कि ‘कह दो! कहने में क्या जाता है! जब बात ग़लत साबित होगी, तब कुछ और कह देंगे! तब तक तो मौज़ करते रहो! सत्ता के मज़े लेते रहो!’ गडकरी की दूसरी हवाबाज़ी है कि ‘बीते साढ़े चार साल में देश में जितनी सड़कें बनी हैं, उतनी तो 70 साल में भी नहीं बनी!’ सच्चाई ये है कि गडकरी जैसा चमत्कार तो भगवान विश्वकर्मा भी नहीं कर सकते! लेकिन झाँसों, झूठों और अफ़वाहों को फ़ैलाने वाले संघी भक्तों का लाक्षाग्रह का बनना जारी है!

पाँचवी बात: भाषणम् किम् दरिद्रताम्

गडकरी ने अपनी सहुलियत के मुताबिक़, उन सड़कों को भी ‘नयी’ मान लेते हैं, जिनकी सिर्फ़ मरम्मत और ‘कारपेटिंग’ की जाती है। जबकि सच्चाई ये है कि देश में नैशनल हाईवे की कुल लम्बाई 1.3 लाख किलोमीटर है। इसका तीन चौथाई हिस्सा यानी 75% हिस्सा आज भी दो लेन या इससे भी कम चौड़ा है! दरअसल, नैशनल हाईवे की देखरेख और मरम्मत या चौड़ीकरण का काम केन्द्रीय सड़क मंत्रालय की ओर से राज्यों के लोक निर्माण विभाग के ज़रिये करवाया जाता है। जबकि चार लेन या इससे चौड़ी हाईवे का ज़िम्मा नैशनल हाईवे अथारिटी के पास है।

मोदी राज में अभी तक 31,000 किलोमीटर सड़क बनी है। जबकि यूपीए-2 का आँकड़ा 24,425 किलोमीटर था। ये इज़ाफ़ा 26% का है। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस 26% में सारा नया निर्माण चार लेन वाले हाईवे का ही हुआ हो! यूपीए हो या एनडीए, दोनों ने ही नयी सड़कों के खाते में दो लेन वाले हाईवे की मरम्मत और चौड़ीकरण को भी नयी सड़कों के खाते में ही जोड़ा है। अब ज़रा सोचिए कि सरकारी आँकड़ों और 70 साल से ज़्यादा सड़क-निर्माण वाले गडकरी के भाषण के बीच कोई सुर-ताल है क्या? क़तई नहीं। गडकरी ने भी झूठ की कहाड़ी को चूल्हे पर चढ़ा दिया गया है और झाँसों वाली पूरियाँ दना-दन छानी जा रही हैं। इसे कहते हैं, ‘भाषणम् किम् दरिद्रताम्’ यानी भाषण देने में क्या दरिद्रता या कंजूरी दिखाने की क्या ज़रूरत है!

छठी बात: मेले का गुब्बारा

मोदी नीति का भी सूक्ति वाक्य यही है कि ‘भाषणम् किम् दरिद्रताम्’। जबकि मोदी के बाक़ी चेलों का काम है, ‘गुरुजी को चमत्कारी बताते रहो! जब तक जनता इस भ्रम में रहेगी, तब तक दुकान चलती रहेगी। यही वजह है कि मोदी सरकार कभी उन वादों की बात नहीं करती जो उसने 2014 में किये गये थे। बल्कि अब हरेक भारी-भरकम बदलाव के लिए ‘2022 का सपना’ बेचा जाता है। हर वक़्त ब्रॉन्डिंग और मार्केटिंग में गोते लगाने वालों को अच्छी तरह पता है कि यदि जनता 2022 के झाँसों में नहीं आयी तो 2019 में बीजेपी के लिए सौ सीटों का आँकड़ा भी पहाड़ बन जाएगा!

वजह साफ़ है कि मेले से लाये गये गुब्बारों की तरह गाय-गोबर का खेल वीरगति को प्राप्त हो चुका है! विकास ने किसानों, मज़दूरों और युवाओं को निहाल कर रखा है! ‘अच्छे दिन’ मोदी के सिर्फ़ उन दोस्तों के लिए ही आ पाये, जो बैंकों को लूटकर फ़ुर्र हो लिये! अभी आलम ये है कि जो कहते हैं कि उन्हें 15–15 लाख रुपये नहीं मिले, वो देशद्रोही हैं, पाकिस्तानी हैं! इसीलिए फ़िलहाल, बीजेपी का सारी उम्मीदें क्षेत्रवाद, हिन्दू-मुसलमान और ‘ईवीएम महोदय’ के भरोसे ही रह गयी है! 2019 के लिए अभी तो सिर्फ़ इतनी रणनीति है कि दौड़ते रहो, मेहनत करते हुए दिखते रहो, ‘मन की बातें’ करते रहो। जन की बातों की परवाह मत करो।

सातवीं बात: बिल्ली का भाग्य

मोदी से कोई नहीं पूछ सकता कि उनके लम्बे-चौड़े वादों का नतीज़ा क्या रहा! मीडिया का सत्यानाश हो चुका है। उसके पास जनसरोकारों के लिए वक़्त नहीं है। विपक्ष को मीडिया में सही कवरेज़ नहीं मिलती। बीजेपी में सभी मोदी-शाह के आगे हाथ जोड़े खड़े हैं। मोदी-शाह का मानना है कि यदि दो दिन भी टीवी और विज्ञापनों में नज़र नहीं आये तो जनता भूल जाएगी। इसीलिए वो अपनी नाकामियों का ठीकरा भी काँग्रेस और राहुल गाँधी के पुरखों के सिर फोड़ते रहते हैं। लिहाज़ा, रणनीति ये है कि अबकी बार जनता को इतना तगड़ा झाँसा दो कि वो मुंगेरी लाल के हसीन सपनों में ही उलझ जाए, नींद में चलते हुए पोलिंग बूथ तक पहुँचे और ईवीएम को प्रणाम करके कमल का बटन दबाकर मोदी के प्रति अपनी पुष्पांजलि समर्पित कर दे! लेकिन इतिहास गवाह है कि न तो ‘काठ की हांडी कभी बार-बार चूल्हे पर चढ़ी है’ और ना ही ‘बिल्ली के भाग्य से झींका ही बार-बार टूटता है।’

आठवीं बात: करेले पर नीम

जनता का हाल तो अब ऐसा है जैसे ‘भूखे भजन ना होय गोपाला, ले लो अपनी कंठी-माला!’ नोटबन्दी से मिली तबाही का दर्द अब भी बना हुआ है। तब के बेरोज़गार हुए करोड़ों लोगों का हाल अब तक बिगड़ा हुआ ही है! जीएसटी ने अर्थव्यव्स्था के लिए ‘एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा’ वाला हाल कर दिया है! कमर-तोड़ महँगाई अब सिर-फोड़ महँगाई बन चुकी है। रुपये का गिरना, रोज़ाना इतिहास रच रहा है तो पेट्रोल-डीज़ल, सीएनजी-एलपीजी ने ऐलान कर दिया है कि वो किसी के हाथ नहीं आने वाले! इसके अलावा राफ़ेल सौदे ने साफ़ कर दिया है कि जो लोग भ्रष्टाचार मिटाने आये थे, वो ख़ुद ही दुनिया के सबसे बड़े घोटाले में आकंठ डूबे हुए हैं!

नौवीं बात: स्वामी नीति

मोदी सरकार के बेहद मायूसी भरे प्रदर्शन को देखकर ही बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा था कि ‘सरकार के किसी भी मंत्री को इकोनॉमिक्स की समझ नहीं है!’ स्वामी प्रोफ़ेसर रह चुके हैं। ख़ुद को चोटी का अर्थशास्त्री मानते हैं! अरूण जेटली से बड़ा ‘बेवक़ूफ़’ उनकी नज़र में शायद ही कोई और हो! इसीलिए वो कई बार जेटली को धिक्कार भी चुके हैं। लेकिन मोदी को पता है कि जेटली भले ही आर्थिक मोर्चे पर फ़िस्सडी साबित हुए हों लेकिन स्वामी से बड़ी ‘अनगाइडेड मिसाइल’ कभी बनी ही नहीं! स्वामी को कैबिनेट में जगह मिली नहीं क्योंकि यदि ऐसा हुआ होता तो वो मोदी को ही नष्ट करने की साज़िश करने लगते! राजनीति के जानकारों का मानना है कि स्वामी और जेटली, दोनों में ही ‘आस्तीन के साँप’ के लक्षण हैं। इस तथ्य को संघ और मोदी, दोनों ही अच्छी तरह जानते हैं। मोदी को मालूम है कि ‘स्वामी के मुक़ाबले जेटली को साधना आसान है। स्वामी पर भरोसा जताया तो वो मुझे ही मिटा देगा! जैसे मैंने आडवाणी को मिटा दिया!’

आख़िरी बात: जवान से तगड़े बुड्ढे

मोदी की तरह गडकरी का सीना 56 इंच का नहीं है। इसके बावजूद बीजेपी में उनके टक्कर का और कोई मर्द नज़र नहीं आता! बेचारे गडकरी में, कभीकभार ही सही, लेकिन कुछ तो सच बोलने की हिम्मत है। गडकरी ने स्वीकार किया कि ‘बीजेपी ने बड़ी-बड़ी बातें कीं। झूठ बेचा, क्योंकि हमें यक़ीन नहीं था कि झूठ भी बिक सकता है!’ बीजेपी में इतना बोलने की हिम्मत गडकरी के सिवाय और किसी में नहीं है! बाक़ी नेताओं को मालूम है कि कसाई को ज़ुबान काट लेने में वक़्त नहीं लगेगा! पार्टी के अन्य मर्दों की बात करें तो अरूण शौरी और यशवन्त सिन्हा के प्रति श्रद्धा जाग जाती है। इन्होंने हस्तिनापुर के राज दरबार में हो रहे द्रौपदी के चीरहरण के ख़िलाफ़ कम कम अपनी आवाज़ तो बुलन्द की। ये दोनों ही दुर्योधन और दुस्शासन से डरे नहीं! पार्टी ही छोड़ दी। आवाज़ उठाने की कोशिश तो कीर्ति आज़ाद ने भी की थी, लेकिन वो अभिमन्यु की तरह बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

शौरी-सिन्हा की देखा-देखी शत्रुघ्न की बाँहों को भी जब-तब फड़फड़ाते देखा गया। हालाँकि, इनकी हस्ती नाख़ून कटवाकर शहीद का तमग़ा लेने वालों जैसी ही रही! शौरी-सिन्हा से पहले 10 अगस्त 2014 को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने, बीजेपी के अहंकारियों को भुवनेश्वर में ये कहकर चेताया था कि “कुछ लोग बोल रहे हैं कि पार्टी को सफलता मिली। कुछ लोग बोल रहे हैं कि किसी व्यक्ति को जीत मिली। लेकिन व्यक्ति या पार्टी या संगठन की वजह से ये परिवर्तन नहीं हुआ। आम आदमी ने परिवर्तन चाहा। व्यक्ति और पार्टी तो पहले भी थे तो पहले परिवर्तन क्यों नहीं हुआ? जनता परिवर्तन चाहती थी। इसीलिए जनता ख़ुश नहीं रही तो अगले चुनाव में ये सरकार भी बदल जाएगी।”

आज जनता की नाराज़गी किसी से छिपी नहीं है। भागवत भी ‘दीवार की लिखावट’ को साफ़ देख रहे हैं कि मोदी-शाह का ज़हर ही उनके पतन की वजह बनेगा, इसीलिए 18 सितम्बर 2018 को दिल्ली के विज्ञान भवन में वो ‘मुक्त’ नहीं बल्कि ‘युक्त’ भारत बनाने के लिए प्रवचन देते हैं। अब भागवत का हाल ऐसा है कि ‘बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनाएगी!’ 2019 में मोदी राज की काली रात का ख़त्म होना तय है। जनता हर बार झूठ को हज़म नहीं कर सकती!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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दिग्गज मिसाइल निर्माता कंपनी ईडी के घेरे में

कई सूत्रों ने पुष्टि की है कि एमबीडीए के भारत प्रमुख लोइस पीडीवाचे को सोमवार को ईडी की दिल्ली शाखा में पेश होने को कहा गया है। सूत्रों ने दावा किया कि भारतीय बलों के साथ कंपनी के जुड़ाव पर सवालों के अलावा उससे तलवार के एनजीओ में भुगतान पर भी सवाल किए जाएंगे।

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नई दिल्ली, 17 फरवरी | राफेल लड़ाकू विमान विवाद के चरम पर पहुंचने के बाद मिसाइल बनाने वाली यूरोप की दिग्गज कंपनी एमबीडीए भारतीय जांच एजेंसियों के घेरे में आ गई है। एमबीडीए राफेल लड़ाकू विमान के लिए प्रमुख मिसाइल आपूर्तिकर्ता है और कंपनी 30 हजार करोड़ रुपये के ऑफसेट कार्यक्रम में शामिल है। ऑफसेट कार्यक्रम 36 युद्धक विमानों से जुड़ा है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने कॉरपोरेट लॉबिस्ट दीपक तलवार से कंपनी के रिश्ते के संबंध में एमबीडीए के कंट्री हेड को जांच में शामिल होने के लिए समन जारी किया है।

सरकार के एक अधिकारी के मुताबिक, तलवार की एमबीडीए में हिस्सेदारी है। उसे पिछले महीने दुबई से प्रत्यर्पित कर लाया गया था। ऐसा माना जाता है कि उसने संप्रग शासन के दौरान एयरबस के साथ कई सौदों में मुख्य भूमिका निभाई थी।

कई सूत्रों ने पुष्टि की है कि एमबीडीए के भारत प्रमुख लोइस पीडीवाचे को सोमवार को ईडी की दिल्ली शाखा में पेश होने को कहा गया है। सूत्रों ने दावा किया कि भारतीय बलों के साथ कंपनी के जुड़ाव पर सवालों के अलावा उससे तलवार के एनजीओ में भुगतान पर भी सवाल किए जाएंगे।

सूत्रों के मुताबिक, तलवार के एनजीओ एडवांटेज इंडिया को 11 जून, 2012 से 17 अप्रैल, 2015 के बीच एमबीडीए और एयरबस से 88 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। बाद में पूरी राशि फर्जी खरीद के जरिए निकाल ली गई थी।

रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि ऐसा बहुत ही कम होता है कि एक यूरोपीय रक्षा कंपनी के कंट्री हेड को जांच में शामिल होने के लिए समन दिया गया हो।

सरकार के एक सूत्र ने दावा किया कि लोइस करीब एक दशक से भारत में कंपनी के संचालन का जिम्मा संभाल रहे हैं। मिराज अपग्रेड प्रोग्राम और राफेल पर भारत में लोइस के कार्यकाल के दौरान ही हस्ताक्षर किए गए थे और उसके पास गुप्त जानकारियां होंगी।

एक अधिकारी ने कहा, “अगर जरूरत पड़ी तो जांच एजेंसी समूह निर्यात निदेशक जीन लुक लामोथे को भी समन जारी कर सकती है। सबसे पहले लोइस से कंपनी द्वारा तलवार के एनजीओ को किए गए भुगतान के बारे में बताने के लिए कहा जाएगा।”

लोइस तक पहुंचने का प्रयास व्यर्थ हो चुका है। एमबीडीए के एक प्रवक्ता ने कहा, “एनबीडीए अधिकारियों के सवालों में पूरा सहयोग करेगी और जारी जांच पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी। हम भारतीय बाजार के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।”

कंपनी ने दावा किया कि वह अपनी कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) पहल के हिस्से के रूप में भारत में कई सामाजिक विकास कार्यक्रमों में शामिल है। इसमें ही एडवांटेज इंडिया को किया गया भुगतान भी शामिल हो सकता है।

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विदेशी कंपनियां उठा रही हैं गलाकाट घरेलू रक्षा स्पर्धा का फायदा – तहकीकात

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नई दिल्ली, 17 फरवरी | कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले साल 31 अगस्त को राफेल विमान सौदे में ‘वैश्विक भ्रष्टाचार’ के बारे में ट्वीट किया था। इससे महज एक सप्ताह पहले जर्मनी के हैम्बर्ग में तुर्की मूल के पूर्व जर्मन राजनेता और वर्तमान में एयरबस इंडस्ट्री के बिक्री निदेशक (लड़ाकू विमान अभियान) महमत तुर्केर से उनकी मुलाकात हुई थी। भारत हथियार डीलरों के समूह के जरिए काम करने वाली दुनिया की विमान विनिर्माता कंपनियों के लिए जंग का मैदान बन गया है। ये डीलर सौदे करने के लिए हर तरकीब का इस्तेमाल करते हैं। इनमें से कुछ में सरकार भी शामिल होती है। रक्षा प्रतिष्ठान का यह कहना है कि भारत में बड़ा खेल खेला जा रहा है।

विवादित हथियार डीलर संजय भंडारी के डिफेंस कॉलोनी स्थित आवास में 2016 में छापा पड़ा था और कथित तौर पर मीडियम मल्टी रोल कांबैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) सौदे से जुड़े दस्तावेज उसके पास से बरामद किए गए। दिल्ली पुलिस ने ऑफीशियस सीक्रेट एक्ट के तहत उसके खिलाफ मामला दर्ज किया था। उसके खिलाफ इंटरपोल का भी अलर्ट था। केंद्रीय गृहमंत्रालय के पास उसके खिलाफ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल के दौरान 126 राफेल जेट की खरीद के सौदे से जुड़े कागजात की चोरी करने की रिपोर्ट मौजूद है।

भंडारी हालांकि सही मायने में अवांछित व्यक्ति नहीं है। तुर्केर की भंडारी से कई मुलाकातें हो चुकी हैं। भंडारी 2016 में हुई छापेमारी के बाद देश छोड़कर भाग गया। उनके पास नरेंद्र मोदी विरोधी गठबंधन तक पहुंच बनाने का विशेषाधिकार है क्योंकि वे फ्रांस में बने लड़ाकू हथियार से पूरी तरह लैस जेट विमानों की खरीद को लेकर सरकार पर निशाना साधने के लिए कांग्रेस के लिए जानकारी मुहैया करवाते हैं। भारत के बड़े विमान सौदे में भंडारी एकमात्र विवादित हथियार डीलर नहीं है जिस पर उंगली उठी है।

सुधीर चौधरी भारत के सबसे बड़े हाथियार एजेंट और लॉबिस्ट के रूप में शीर्ष स्तर है। वह केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच के घेरे में है और उम्मीद के अनुरूप वह देश से पलायन कर गया है। ग्रिमी पनामा पेपर्स मामले में उसका नाम सबसे बड़े खातधारकों में शुमार है।

भंडारी और चौधरी दोनों सरकार द्वारा प्रतिरक्षा के क्षेत्र में शुरू किए गए ऑफसेट कार्यक्रम के लाभार्थी रहे हैं। भंडारी को रिकॉर्ड 918 अरब डॉलर का अनुबंध मिला था। वह प्रियंका वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा का कारोबारी सहयोगी था। चौधरी से संबद्ध बेंगलुरू की कंपनी अल्फा डिजाइन को संप्रग के शासनकाल में 1,000 करोड़ रुपये का ऑफसेट कांट्रैक्ट दिया गया था। रक्षा सौदे में कुछ और गहरे राजनीतिक लिंक जुड़े हुए हैं, क्योंकि ऐसे सौदों में काफी पैसों की बात होती है।

पंजाब के पूर्व कांग्रेस विधायक अरविंद खन्ना का पुत्र और हथियार एजेंट विपिन खन्ना संप्रग सरकार के दौरान एंब्रेयर के साथ तीन विमानों की खरीद के सौदे के ऑफसेट कांट्रैक्ट में भारी रिश्वत लेने वालों में शामिल है। अरविंद खन्ना खुद अब हथियार एजेंट हैं।

चंडीगढ़ स्थित राजनेता संतोष बगरोडिया के भाई की सॉफ्टवेयर कंपनी आईडीएस इन्फोटेक ने 2007 में अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे में बड़ी रिश्वत ली थी। बगरोडिया के भाई सतीश की कंपनी को 1,400 करोड़ रुपये का ऑफसेट कांट्रैक्ट मिला था।

इस बड़े खेल में दुनियाभर में रक्षा सौदों के एजेंट, उनके संचालनकर्ता-हथियार विनिर्माता और विमान डीलरों ने सावधानीपूर्वक उन राजनेताओं की पहचान की है जिनके बारे में उनको लगता है कि वे उनके साझेदार बन सकते हैं।

विशेषाधिकार प्राप्त यूरोपीय संघ की खुफिया जानकारी में खुलासा हुआ है कि अमेरिका और चीन का मानना है कि अपने नेतृत्व में कांग्रेस को चुनावी लाभ दिलाने के लिए उग्र बने हुए राहुल गांधी उनकी भारत योजना के लिए महत्वपूर्ण हैं।

मोदी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय पाने का सपना पालने वाले अरुण शौरी शायद नोटबंदी, जीडीपी के आंकड़े राफेल सौदे समेत अन्य मुद्दों को उठाकर सरकार के पीछे पड़े हुए हैं। लेकिन कहानी कहीं बड़ी हो सकती है क्योंकि उनके साले रक्षा मामलों के लेखक हैं और वह लगातार 36 राफेल विमान की खरीद के विरोध में तर्क देते रहे हैं। उनके एक भतीजे टाटा कंपनी के लिए काम करते हैं और 2012 से टाटा डिफेंस की अगुवाई कर रहे हैं। रतन टाटा लॉकहीड मार्टिन के भारतीय साझेदार हैं। अमेरिकियों ने कहा है कि अगर भारत पेंटागन के विदेशी सैन्य बिक्री कार्यक्रम के तहत लॉकहीड मार्टिन के एफ-16 जेट विमान खरीदेगा तो वे सीएटीएसए प्रतिबंध हटा लेंगे।

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ओपिनियन

पाकिस्तान को पानी रोकने पर विशेषज्ञों की राय बंटी

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नई दिल्ली, 16 फरवरी | सीआरपीएफ की टुकड़ी पर गुरुवार को पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद कड़ी कार्रवाई करने की मांग को देखते हुए विशेषज्ञ पश्चिम और पूरब की तरफ बहने वाली सिंधु और ब्यास नदियों का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने पर विचार कर रहे हैं। वहीं, कुछ इसकी संभाव्यता पर शक जता रहे हैं।

जल संसाधन मंत्रालय के सेवानिवृत्त शीर्ष अधिकारी एम. एस. मेनन का कहना है कि पाकिस्तान को दिए जानेवाले पानी को रोका जा सकता है। उन्होंने सिंधु जल समझौते पर लंबे समय से काम किया है।

उन्होंने कहा, “हमने अधिक पानी उपभोग करने की क्षमता विकसित कर ली है। स्टोरेज डैम में निवेश बढ़ाकर हम ऐसा कर सकते हैं। झेलम, चेनाब और सिंधु नदी का बहुत सारा पानी देश में ही इस्तेमाल किया जा सकता है।”

भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुआ सिंधु जल समझौता पूरब की तरफ बहने वाली नदियों – ब्यास, रावी और सतलुज के लिए हुआ है और भारत को 3.3 करोड़ एकड़ फीट (एमएएफ) पानी मिला है, जबकि पाकिस्तान को 80 एमएएफ पानी दिया गया है।

विवादास्पद यह है कि संधि के तहत पाकिस्तान को भारत से अधिक पानी मिलता है, जिससे यहां सिंचाई में भी इस पानी का सीमित उपयोग हो पाता है। केवल बिजली उत्पादन में इसका अबाधित उपयोग होता है। साथ ही भारत पर परियोजनाओं के निर्माण के लिए भी सटीक नियम बनाए गए हैं।

एक दूसरे सेवानिवृत्त अधिकारी, जो मंत्रालय में करीब दो दशकों तक सिंधु आयुक्त रह चुके हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान को पानी रोकना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि यह अंतराष्ट्रीय संधि है, जिसका भारत को पालन करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा, “मैं नहीं समझता कि इस प्रकार का कुछ करना संभव है। पानी प्राकृतिक रूप से बहता है। आप उसे रोक नहीं सकते।”

पूर्व अधिकारी ने कहा कि अतीत में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है, लेकिन लोग ऐसी मांग भावनाओं में बहकर करते रहते हैं।

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