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गडकरी की हिम्मत का जबाब नहीं, माना कि 2014 में बन्दर के हाथ में उस्तूरा आ गया!

गडकरी ने नाना पाटेकर के एक मराठी शो में ख़ुलासा किया कि “हमें उम्मीद नहीं थी कि हम सत्ता में आएँगे। इसलिए हमें सलाह दी गयी कि जनता से बड़े-बड़े वादे करो। कुछ नहीं बिगड़ने वाला। लेकिन हम तो सत्ता में आ गये। अब लोग हमारे उन्हीं वादों को हमें याद दिलाते हैं।

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Nitin Gadkari
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बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी को 2019 का नतीज़ा ‘दीवार पर लिखावट’ यानी Writing on the wall के रूप में साफ़ दिखने लगा है। गडकरी अनुभवी नेता हैं। हवा का रुख़ भाँपना जानते हैं। मोदी और अमित शाह की शैली के मुरीद कभी नहीं रहे। इसीलिए बड़ी चतुराई और शालीनता से स्वीकार करते हैं कि ‘2014 में भारत की जनता ने बन्दर के हाथ में उस्तूरा थमा दिया!’ दरअसल, गडकरी को मालूम है कि यदि वो चतुराई से अपना गुनाह क़बूल कर लेंगे तो चुनाव में जनता निजी तौर उन्हें कम दंड देने पर विचार कर सकती है। यदि ऐसा हो सका तो वो भागते भूत की लंगोटी होगी। वैसे सियासी गलियारे में रहने वाले हर व्यक्ति को पता है कि 62 वर्षीय गडकरी ने अपने बाक़ी जीवन के लिए पर्याप्त इंतज़ाम कर रखा है। कई विपक्षी नेताओं से उनके अच्छे सम्बन्ध हैं, जिसकी बदौलत सत्ता परिवर्तन के बाद वो अपनी ख़ाल बचा लेंगे।

पहली बात: मुस्कुराओ और चल दो

गडकरी ने नाना पाटेकर के एक मराठी शो में ख़ुलासा किया कि “हम सभी का दृढ़ विश्वास और प्रखर आत्मविश्वास था कि हम कभी सत्ता में आएँगे ही नहीं। इसलिए हमारे आसपास के लोग कहते थे कि आप तो बोलिए, वादे कीजिए, क्या बिगड़ेगा? आप पर कौन सी जबाबदारी आने वाली है। लेकिन अब तो जबाबदारी आ गयी। अब ख़बरों में आता है कि गडकरी क्या बोले थे, फडणवीस क्या बोले थे, तो अब आगे क्या? तो हम हँसते हुए आगे बढ़ जाते हैं।”

दूसरी बात: गले की फ़ाँस

गडकरी ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार किया था कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ वाला जुमला बीजेपी और मोदी सरकार के गले की फाँस बन गया है! उनका यही रुख़ महँगाई और पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों को लेकर भी रहा है और राम मन्दिर को लेकर भी। उन्हें पता है कि जन भावनाओं को भड़काने और भुनाने वाला कोई भी नारा एक चुनाव के बाद कभी काम नहीं आता। इसीलिए 1996 के बाद संघ-बीजेपी ने राम मन्दिर के मुद्दे को उठाकर ताक पर रखा दिया। यही हश्र अगले चुनावों में समान नागरिक संहिता यानी कॉमन सिविल कोड और अनुच्छेद 370 का भी हुआ। इसी परम्परा के मुताबिक़, 2014 में बीजेपी ने जिस भ्रष्टाचार, काला धन, गुजरात मॉडल और विकास की डुगडुगी बजायी थी, वो सभी मुद्दे 2019 में नदारद रहेंगे। यही वजह है कि 2014 के बाद से कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी कोई मुद्दा नहीं रहा। महबूबा के साथ सरकार बनाने के बावजूद एक भी कश्मीरी पंडित की घर-वापसी नहीं हुई! ‘दो करोड़ रोज़गार के अवसर’ भी कितना बड़ा झाँसा था, ये किससे छिपा है!

तीसरी बात: दिमाग़ ख़राब

गडकरी ही बीजेपी के इकलौते ऐसे मर्द हैं, जिसे नरेन्द्र मोदी से डर नहीं लगता। इसीलिए नोटबन्दी के वक़्त जब मोदी ने गडकरी को चिढ़ाया कि अब तो आपको भी दो लाख रुपये में अपने बेटी की शादी करनी पड़ेगी तो गडकरी ने बहुत सख़्त लहज़े में कहा था, ‘अरे, आपका दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या! दो लाख रुपये में भी कहीं शादी होती है!’ गडकरी के इस तेवर को देखकर मोदी की सिट्टी-पिट्टी ग़ुम हो गयी! क्योंकि इससे पहले वो ऐलान कर चुके थे कि ‘भाईयों-बहनों, मुझे सिर्फ़ 50 दिन का वक़्त दीजिए। इसके बाद आप जिस चौराहे पर चाहे मुझे सूली पर लटका दीजिएगा!’

गडकरी की बेटी की शादी 5 दिसम्बर 2016 को ख़ूब शान-ओ-शौक़त के साथ नागपुर में सम्पन्न हुई। मोदी भी वहाँ गये थे। लेकिन तब तक उन्होंने नोटबन्दी को पूरा निचोड़ लिया था! संघ और बीजेपी के तमाम आला नेताओं ने तब तक अपने लाखों करोड़ रुपये को ठिकाने लगा लिया था। दूसरी ओर, सवा सौ करोड़ भारतवासी आज भी मोदी के चौराहे पर आने का वैसे ही इन्तज़ार कर रहे हैं जैसे शिव मन्दिर के बाहर बैठा नन्दी बैल अपलक भोले-शंकर के बाहर आने का इन्तज़ार करता है! ख़ैर, नन्दी की तरह भारत की जनता के लिए भी उम्मीद पर दुनिया क़ायम है!

चौथी बात: कहने में क्या!

एक मुहावरा है, ‘मथुरा में रहना है तो राधे-राधे कहना है!’ इसी नीति का पालन करते हुए नरेन्द्र मोदी की तरह नितिन गडकरी ने भी ख़ूब लम्बी-चौड़ी फेंकी है। जैसे कुछ महीने पहले इन्होंने दावा किया था कि मार्च 2019 तक गंगा 70-80% साफ़ हो जाएगी! इस तरह से सत्ता की ख़ातिर गडकरी का भी नज़रिया ऐसा ही है कि ‘कह दो! कहने में क्या जाता है! जब बात ग़लत साबित होगी, तब कुछ और कह देंगे! तब तक तो मौज़ करते रहो! सत्ता के मज़े लेते रहो!’ गडकरी की दूसरी हवाबाज़ी है कि ‘बीते साढ़े चार साल में देश में जितनी सड़कें बनी हैं, उतनी तो 70 साल में भी नहीं बनी!’ सच्चाई ये है कि गडकरी जैसा चमत्कार तो भगवान विश्वकर्मा भी नहीं कर सकते! लेकिन झाँसों, झूठों और अफ़वाहों को फ़ैलाने वाले संघी भक्तों का लाक्षाग्रह का बनना जारी है!

पाँचवी बात: भाषणम् किम् दरिद्रताम्

गडकरी ने अपनी सहुलियत के मुताबिक़, उन सड़कों को भी ‘नयी’ मान लेते हैं, जिनकी सिर्फ़ मरम्मत और ‘कारपेटिंग’ की जाती है। जबकि सच्चाई ये है कि देश में नैशनल हाईवे की कुल लम्बाई 1.3 लाख किलोमीटर है। इसका तीन चौथाई हिस्सा यानी 75% हिस्सा आज भी दो लेन या इससे भी कम चौड़ा है! दरअसल, नैशनल हाईवे की देखरेख और मरम्मत या चौड़ीकरण का काम केन्द्रीय सड़क मंत्रालय की ओर से राज्यों के लोक निर्माण विभाग के ज़रिये करवाया जाता है। जबकि चार लेन या इससे चौड़ी हाईवे का ज़िम्मा नैशनल हाईवे अथारिटी के पास है।

मोदी राज में अभी तक 31,000 किलोमीटर सड़क बनी है। जबकि यूपीए-2 का आँकड़ा 24,425 किलोमीटर था। ये इज़ाफ़ा 26% का है। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस 26% में सारा नया निर्माण चार लेन वाले हाईवे का ही हुआ हो! यूपीए हो या एनडीए, दोनों ने ही नयी सड़कों के खाते में दो लेन वाले हाईवे की मरम्मत और चौड़ीकरण को भी नयी सड़कों के खाते में ही जोड़ा है। अब ज़रा सोचिए कि सरकारी आँकड़ों और 70 साल से ज़्यादा सड़क-निर्माण वाले गडकरी के भाषण के बीच कोई सुर-ताल है क्या? क़तई नहीं। गडकरी ने भी झूठ की कहाड़ी को चूल्हे पर चढ़ा दिया गया है और झाँसों वाली पूरियाँ दना-दन छानी जा रही हैं। इसे कहते हैं, ‘भाषणम् किम् दरिद्रताम्’ यानी भाषण देने में क्या दरिद्रता या कंजूरी दिखाने की क्या ज़रूरत है!

छठी बात: मेले का गुब्बारा

मोदी नीति का भी सूक्ति वाक्य यही है कि ‘भाषणम् किम् दरिद्रताम्’। जबकि मोदी के बाक़ी चेलों का काम है, ‘गुरुजी को चमत्कारी बताते रहो! जब तक जनता इस भ्रम में रहेगी, तब तक दुकान चलती रहेगी। यही वजह है कि मोदी सरकार कभी उन वादों की बात नहीं करती जो उसने 2014 में किये गये थे। बल्कि अब हरेक भारी-भरकम बदलाव के लिए ‘2022 का सपना’ बेचा जाता है। हर वक़्त ब्रॉन्डिंग और मार्केटिंग में गोते लगाने वालों को अच्छी तरह पता है कि यदि जनता 2022 के झाँसों में नहीं आयी तो 2019 में बीजेपी के लिए सौ सीटों का आँकड़ा भी पहाड़ बन जाएगा!

वजह साफ़ है कि मेले से लाये गये गुब्बारों की तरह गाय-गोबर का खेल वीरगति को प्राप्त हो चुका है! विकास ने किसानों, मज़दूरों और युवाओं को निहाल कर रखा है! ‘अच्छे दिन’ मोदी के सिर्फ़ उन दोस्तों के लिए ही आ पाये, जो बैंकों को लूटकर फ़ुर्र हो लिये! अभी आलम ये है कि जो कहते हैं कि उन्हें 15–15 लाख रुपये नहीं मिले, वो देशद्रोही हैं, पाकिस्तानी हैं! इसीलिए फ़िलहाल, बीजेपी का सारी उम्मीदें क्षेत्रवाद, हिन्दू-मुसलमान और ‘ईवीएम महोदय’ के भरोसे ही रह गयी है! 2019 के लिए अभी तो सिर्फ़ इतनी रणनीति है कि दौड़ते रहो, मेहनत करते हुए दिखते रहो, ‘मन की बातें’ करते रहो। जन की बातों की परवाह मत करो।

सातवीं बात: बिल्ली का भाग्य

मोदी से कोई नहीं पूछ सकता कि उनके लम्बे-चौड़े वादों का नतीज़ा क्या रहा! मीडिया का सत्यानाश हो चुका है। उसके पास जनसरोकारों के लिए वक़्त नहीं है। विपक्ष को मीडिया में सही कवरेज़ नहीं मिलती। बीजेपी में सभी मोदी-शाह के आगे हाथ जोड़े खड़े हैं। मोदी-शाह का मानना है कि यदि दो दिन भी टीवी और विज्ञापनों में नज़र नहीं आये तो जनता भूल जाएगी। इसीलिए वो अपनी नाकामियों का ठीकरा भी काँग्रेस और राहुल गाँधी के पुरखों के सिर फोड़ते रहते हैं। लिहाज़ा, रणनीति ये है कि अबकी बार जनता को इतना तगड़ा झाँसा दो कि वो मुंगेरी लाल के हसीन सपनों में ही उलझ जाए, नींद में चलते हुए पोलिंग बूथ तक पहुँचे और ईवीएम को प्रणाम करके कमल का बटन दबाकर मोदी के प्रति अपनी पुष्पांजलि समर्पित कर दे! लेकिन इतिहास गवाह है कि न तो ‘काठ की हांडी कभी बार-बार चूल्हे पर चढ़ी है’ और ना ही ‘बिल्ली के भाग्य से झींका ही बार-बार टूटता है।’

आठवीं बात: करेले पर नीम

जनता का हाल तो अब ऐसा है जैसे ‘भूखे भजन ना होय गोपाला, ले लो अपनी कंठी-माला!’ नोटबन्दी से मिली तबाही का दर्द अब भी बना हुआ है। तब के बेरोज़गार हुए करोड़ों लोगों का हाल अब तक बिगड़ा हुआ ही है! जीएसटी ने अर्थव्यव्स्था के लिए ‘एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा’ वाला हाल कर दिया है! कमर-तोड़ महँगाई अब सिर-फोड़ महँगाई बन चुकी है। रुपये का गिरना, रोज़ाना इतिहास रच रहा है तो पेट्रोल-डीज़ल, सीएनजी-एलपीजी ने ऐलान कर दिया है कि वो किसी के हाथ नहीं आने वाले! इसके अलावा राफ़ेल सौदे ने साफ़ कर दिया है कि जो लोग भ्रष्टाचार मिटाने आये थे, वो ख़ुद ही दुनिया के सबसे बड़े घोटाले में आकंठ डूबे हुए हैं!

नौवीं बात: स्वामी नीति

मोदी सरकार के बेहद मायूसी भरे प्रदर्शन को देखकर ही बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा था कि ‘सरकार के किसी भी मंत्री को इकोनॉमिक्स की समझ नहीं है!’ स्वामी प्रोफ़ेसर रह चुके हैं। ख़ुद को चोटी का अर्थशास्त्री मानते हैं! अरूण जेटली से बड़ा ‘बेवक़ूफ़’ उनकी नज़र में शायद ही कोई और हो! इसीलिए वो कई बार जेटली को धिक्कार भी चुके हैं। लेकिन मोदी को पता है कि जेटली भले ही आर्थिक मोर्चे पर फ़िस्सडी साबित हुए हों लेकिन स्वामी से बड़ी ‘अनगाइडेड मिसाइल’ कभी बनी ही नहीं! स्वामी को कैबिनेट में जगह मिली नहीं क्योंकि यदि ऐसा हुआ होता तो वो मोदी को ही नष्ट करने की साज़िश करने लगते! राजनीति के जानकारों का मानना है कि स्वामी और जेटली, दोनों में ही ‘आस्तीन के साँप’ के लक्षण हैं। इस तथ्य को संघ और मोदी, दोनों ही अच्छी तरह जानते हैं। मोदी को मालूम है कि ‘स्वामी के मुक़ाबले जेटली को साधना आसान है। स्वामी पर भरोसा जताया तो वो मुझे ही मिटा देगा! जैसे मैंने आडवाणी को मिटा दिया!’

आख़िरी बात: जवान से तगड़े बुड्ढे

मोदी की तरह गडकरी का सीना 56 इंच का नहीं है। इसके बावजूद बीजेपी में उनके टक्कर का और कोई मर्द नज़र नहीं आता! बेचारे गडकरी में, कभीकभार ही सही, लेकिन कुछ तो सच बोलने की हिम्मत है। गडकरी ने स्वीकार किया कि ‘बीजेपी ने बड़ी-बड़ी बातें कीं। झूठ बेचा, क्योंकि हमें यक़ीन नहीं था कि झूठ भी बिक सकता है!’ बीजेपी में इतना बोलने की हिम्मत गडकरी के सिवाय और किसी में नहीं है! बाक़ी नेताओं को मालूम है कि कसाई को ज़ुबान काट लेने में वक़्त नहीं लगेगा! पार्टी के अन्य मर्दों की बात करें तो अरूण शौरी और यशवन्त सिन्हा के प्रति श्रद्धा जाग जाती है। इन्होंने हस्तिनापुर के राज दरबार में हो रहे द्रौपदी के चीरहरण के ख़िलाफ़ कम कम अपनी आवाज़ तो बुलन्द की। ये दोनों ही दुर्योधन और दुस्शासन से डरे नहीं! पार्टी ही छोड़ दी। आवाज़ उठाने की कोशिश तो कीर्ति आज़ाद ने भी की थी, लेकिन वो अभिमन्यु की तरह बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

शौरी-सिन्हा की देखा-देखी शत्रुघ्न की बाँहों को भी जब-तब फड़फड़ाते देखा गया। हालाँकि, इनकी हस्ती नाख़ून कटवाकर शहीद का तमग़ा लेने वालों जैसी ही रही! शौरी-सिन्हा से पहले 10 अगस्त 2014 को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने, बीजेपी के अहंकारियों को भुवनेश्वर में ये कहकर चेताया था कि “कुछ लोग बोल रहे हैं कि पार्टी को सफलता मिली। कुछ लोग बोल रहे हैं कि किसी व्यक्ति को जीत मिली। लेकिन व्यक्ति या पार्टी या संगठन की वजह से ये परिवर्तन नहीं हुआ। आम आदमी ने परिवर्तन चाहा। व्यक्ति और पार्टी तो पहले भी थे तो पहले परिवर्तन क्यों नहीं हुआ? जनता परिवर्तन चाहती थी। इसीलिए जनता ख़ुश नहीं रही तो अगले चुनाव में ये सरकार भी बदल जाएगी।”

आज जनता की नाराज़गी किसी से छिपी नहीं है। भागवत भी ‘दीवार की लिखावट’ को साफ़ देख रहे हैं कि मोदी-शाह का ज़हर ही उनके पतन की वजह बनेगा, इसीलिए 18 सितम्बर 2018 को दिल्ली के विज्ञान भवन में वो ‘मुक्त’ नहीं बल्कि ‘युक्त’ भारत बनाने के लिए प्रवचन देते हैं। अब भागवत का हाल ऐसा है कि ‘बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनाएगी!’ 2019 में मोदी राज की काली रात का ख़त्म होना तय है। जनता हर बार झूठ को हज़म नहीं कर सकती!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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