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लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक़ बन चुकी मोदी-शाह की बीजेपी से यशवन्त का अलविदा!

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आख़िरकार, यशवन्त सिन्हा ने बीजेपी को अलविदा कह दिया! घटा तो महीनों से छायी हुई थी! नोटबन्दी के बाद से मेघ, जब-तब गरज तो रहे थे, लेकिन बरसे आज! आज मोदी-शाह के अन्ध-भक्तों ने राहत की साँस ली होगी! आज भक्तों से ज़्यादा ख़ुश तो शायद ही कोई और हुआ होगा! बहुतों का मन-मयूरा ख़ुशी से झूम रहा होगा! बहुतेरे संघी तो दिवाली भी मना रहे होंगे! उच्च कोटि के भक्तों ने तो घी के दीपक भी जलाये होंगे! क्योंकि यशवन्त सिन्हा लम्बे अरसे से, ख़ासकर नोटबन्दी के मूर्खतापूर्ण फ़ैसले के बाद से अपनी आलोचनात्मक टिप्पणियों की वजह से मोदी-शाह-भागवत वाली मौजूदा बीजेपी के लिए आँखों की किरकिरी बने हुए थे!

उम्र के 80 बसन्त देख चुके वयोवृद्ध नेता यशवन्त सिन्हा अब भी वैसे ही स्वस्थ हैं, जैसे उनकी पीढ़ी वाले लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा वग़ैरह हैं। मोदी-शाह-भागवत के राज में घर में ही तिरस्कार तो सबका हो रहा था, लेकिन सिन्हा साहब की अन्तर्आत्मा ने उन्हें जितना कचोटा, वैसा अन्य नेताओं के साथ अभी तक नहीं हुआ है। शायद, औरों में बर्दाश्त करने की शक्ति ज़्यादा हो। लेकिन इस ‘अलविदा’ में ‘न दैन्यम्, न पलायनम्’ का भाव है। यानी, न तो दासता स्वीकार करूँगा और ना ही पलायन करूँगा, बल्कि युद्ध करूँगा! वो भी किसी राज-पाट को पाने की ख़ातिर नहीं, बल्कि उस लोकतंत्र की रक्षा की ख़ातिर, जिसकी बुनियाद गाँधी-नेहरू-पटेल-आम्बेडकर जैसे महापुरुषों ने बनायी थी, और जिसे पतित संघी विचारधारा तथा उसके प्रवर्तक तार-तार करने पर आमादा हैं!

बीजेपी को अलविदा कहने के साथ ही यशवन्त सिन्हा ने साफ़ कर दिया कि मोदी-शाह-जेटली-राजनाथ-सुषमा-गडकरी-पीयूष-सीतारामन-प्रभु वग़ैरह की काली छाया में पल रहा भारतीय लोकतंत्र ख़तरे में है! ये कोई साधारण टिप्पणी नहीं है। इसे ‘डेथ वारंट’ भी कह सकते हैं। इसका साफ़ मतलब है कि मौजूदा बीजेपी और इसका मस्तिष्क यानी संघ, भारतीय लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक हैं, विनाशकारी हैं! विपक्ष तो सवा करोड़ भारतवासियों को आगाह करता ही रहा है, लेकिन अफ़ीम के नशे में झूम रहे मन्दबुद्धि हिन्दुओं को सच्चाई समझ में आती होती तो आज देश को ऐसे दिन क्यों देखने पड़ते!

यशवन्त सिन्हा का भगवा को अलविदा कहना वैसा ही है, जैसे हस्तिनापुर के राजदरबार से महामंत्री विदुर का बहिर्गमन! अब सिर्फ़ यही प्रश्न अनुत्तरित है कि बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा और कीर्ति आज़ाद जैसे लोग यशवन्त सिन्हा के नक्श-ए-क़दम को अपनाते हुए कब नज़र आएँगे! सिन्हा साहब के इस्तीफ़े ने लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वयोवृद्ध नेताओं को भी अघोषित तौर पर लताड़ लगायी है। उन्होंने अव्यक्त शब्दों में ये कौतूहल ज़ाहिर किया है कि क्या वो लोग, पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य की तरह भरे दरबार में चल रहे द्रौपदी के चीरहरण यानी लोकतंत्र के पतन को निगाहें नीची करके ही यूँ ही देखते रहेंगे, जैसा कि वो अभी तक करते आये हैं! अब वो नीति और नैतिकता में से किसे तरज़ीह देंगे! क्या वो भी यशवन्त सिन्हा की तरह ये ऐलान करने की हिम्मत दिखाएँगे कि कलियुग में द्वापर वाली धूर्तताएँ अब और बर्दाश्त नहीं की जाएँगी!

पिता यशवन्त सिन्हा ने अपने बेटे और लोकतंत्र की हत्यारिन मोदी सरकार में मंत्री बने बैठे जयन्त सिन्हा के सामने भी भारी धर्म-संकट पैदा कर दिया है! बेचारे जयन्त को अब ये तय करना होगा कि वो कब तक अपने तुच्छ स्वार्थों की ख़ातिर दुर्योधनों की चाकरी करना जारी रखना चाहेंगे, वो भी राष्ट्रहित और लोकतंत्र की क़ीमत पर! जयन्त को राजनीति में जो भी जगह मिली है, वो उसी पिता की विरासत की बदौलत है जो आज संन्यास के नैतिक बल से आलोकित है! पिता ने उस महल का परित्याग कर दिया, जिसे वो चार दशकों तक अपने ख़ून-पसीने से वैभवशाली बनाते रहे। वो इस ऐलान के साथ कि अब वो किसी भी सियासी तालाब में डुबकी नहीं लगाएँगे, बल्कि सीधे सामाजिक क्षेत्र में काम करके लोकतंत्र को बचाने के लिए काम करेंगे।

दलगत राजनीति से संन्यास लेने का सीधा-सीधा मतलब है कि अब वो मोदी-शाह के चंगुल से भारतीय लोकतंत्र को मुक्त करवाने के लिए अपना जीवन ख़पाना चाहेंगे। चुनावी राजनीति से तो उन्होंने 2014 में विदा ले लिया था। लेकिन इसके बावजूद भक्तों ने उन पर लाँछन लगाया कि वो दरकिनार किये जाने से आहत होकर विपक्ष की कठपुतली बन गये हैं! सिन्हा ने साबित कर दिया कि अन्तर्आत्मा की हत्या करके वो सियासी नहीं बने रह सकते! इसमें कोई शक़ नहीं हो सकता कि बीजेपी में अपने योगदान की वजह से यशवन्त सिन्हा को ‘शानदार-विदाई’ का हक़दार होना चाहिए था, लेकिन उनके नसीब में तो ‘शर्मनाक-विदाई’ लिखी थी। आख़िर, नसीब का लेखा कभी कोई बदल पाया है! फिर भी उनकी ऐसी गति को देख, यदि नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की निग़ाहों में ज़रा भी शर्म-ओ-हया हो तो उन्हें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।

विदाई से पहले मोदी-शाह की शह पर भगवा अन्ध भक्तों ने अपने ही परिवार के बुज़ुर्ग पर ऐसे-ऐसे लाँछन लगाये कि उनका ज़िक्र करना भी अफ़सोसनाक है। सिन्हा ने उस दौर में राजनीति और सत्ता से जुड़ी शीर्षस्थ ऊँचाईयों को हासिल किया जब मोदी-शाह की टके भर की भी औक़ात नहीं थी! दौर बदला तो अगली पीढ़ी के पतित नेताओं ने सिन्हा साहब के प्रति वैसा ही सलूक किया, जैसे कुछ लोग अपने माता-पिता का तिरस्कार करते हुए उन्हें वृद्धाश्रम के सहारे छोड़ देते हैं! सिन्हा साहब, जैसे लोगों की अहमियत के बारे में महर्षि वेद व्यास ने महाभारत (5-35-58) में लिखा है:

न सा सभा यत्र न सन्ति वृद्धा, वृद्धा न ते ये न वदन्ति धर्मम्।

धर्म स नो यत्र न सत्यमस्ति, सत्यं न तद् यद् छलमभ्युपैति॥

अर्थात्, “वह सभा नहीं हो सकती जहाँ वृद्ध या विवेकशील व्यक्ति मौजूद न हों। उन्हें वृद्ध नहीं माना जा सकता जो न्याय की बात नहीं करें। वह न्याय नहीं है जो सत्य पर आधारित नहीं हो। और, वो सत्य नहीं है जिसकी उत्पत्ति छल से हुई हो।”

किसी सभा के सदस्यों की विशेषता को बताने वाले इस सूक्ति वाक्य को भारतीय संसद के मुख्य भवन के गेट नम्बर-2 के पास मौजूद लिफ़्ट नम्बर-1 के गुम्बद पर भी उकेरा गया है। लेकिन मोदी-शाह वाली बीजेपी में इन बातों को जानने-समझने और अपनाने वाला चाल-चरित्र और चेहरा तो कभी दिखा ही नहीं। याद है ना कि जून 2013 में नरेन्द्र मोदी को चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनाने के बाद आडवाणी ने भी बीजेपी के हरेक पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। बीजेपी, किस तरह से लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक़ बनती गयी, इसका ज़िक्र आडवाणी के इस्तीफ़े में था। बहरहाल, ग़नीमत है कि आस्तीन के साँपों ने जैसी गति आडवाणी की की, वैसे दिन यशवन्त सिन्हा को नहीं देखने पड़े! फ़िलहाल, सिन्हा साहब ने जो आग़ाज़ किया है, वो 2019 में अंज़ाम पर पहुँचकर ही शान्त होगा। धीरे-धीरे कई नेताओं को बीजेपी से विदा लेने के लिए आगे आना पड़ेगा! वैसे भी सिन्हा साहब ने अपने एक ताज़ा लेख में भविष्यवाणी की है कि बीजेपी के आधे से ज़्यादा सांसद 2019 में संसद नहीं पहुँच पाएँगे!

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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unemployment in India

नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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