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उप्र के उपचुनाव में सपा-बसपा ‘तालमेल’ का लिटमस टेस्ट

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Yogo Adityanath

पूर्वोत्तर के त्रिपुरा व नगालैंड में विधानसभा चुनाव में जीत के बाद अब मोदी लहर की परीक्षा उत्तर प्रदेश में दो प्रमुख लोकसभा क्षेत्रों- गोरखपुर और फूलपुर में 11 मार्च को होने जा रहे उपचुनाव में होगी। वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बीच जो तालमेल हुआ है, उपचुनाव में उसका लिटमस टेस्ट भी होगा।

बसपा प्रमुख मायावती ने इसे ‘गठबंधन’ नहीं बल्कि वोट-शेयर के लिए तालमेल कहा है और समर्थन देने की बात कही है। साथ ही कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे जीतने वाले गैर-भाजपा उम्मीदवारों के लिए काम करें।

वर्ष 1993 में मुलायम सिंह और कांशीराम ने मिलकर रामलहर को रोकने में तो सफलता हासिल कर ली थी लेकिन क्या अब माया व अखिलेश मिलकर मोदी लहर को रोकने में कामयाब होंगे?

हालांकि वर्ष 1993 में राम लहर के दौरान जब मुलायम और कांशीराम ने गठबंधन किया था, तब सियासत का रुख अलग था और दोनों चेहरों की चमक भी अलग थी। तब के दौर में मंडल आयोग ने ओबीसी वोटरों को एकजुट किया था और मुलायम सिंह उप्र में उनका निर्विवाद चेहरा थे। इसीलिए यह जातीय गठजोड़ रामलहर को रोकने में कामयाब हो गया था।

अखिलेश यादव और मायावती के लिए परिस्थतियां अलग हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा का जहां खाता नहीं खुला था, वहीं अखिलेश की पार्टी केवल परिवार की सीटें ही बचाने में कामयाब हो पाई। इसके बाद 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में एकबार फिर मोदीलहर चली और भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। सपा-बसपा को एक बार फिर करारी हार का सामना करना पड़ा।

दोनों परिस्थतियों में अंतर यह भी है कि तब मुलायम-कांशीराम के साथ ओबीसी तबके की उम्मीदें जुड़ी थीं, लेकिन बदलते परिवेश में अखिलेश-मायावती के सामने ओबीसी की उम्मीदें टूटती दिखाई दे रही हैं और दोनों नेता सियासत के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं।

मायावती इस गठबंधन को लेकर हालांकि जल्दबाजी के मूड में नहीं दिखाई दे रही हैं और इस गठबंधन को फिलहाल राज्यसभा चुनाव और लोकसभा उपचुनाव तक ही सीमित रखना चाहती हैं।

उन्होंने कहा, “लोकसभा चुनाव से इस गठबंधन का कोई लेना-देना नहीं है। उपचुनाव में भाजपा को रोकने के लिए सपा ने बसपा और बसपा ने सपा को समर्थन देने का फैसला किया है।”

हालांकि सपा-बसपा के बीच उपचुनाव में गठबंधन की अटकलें काफी लंबे समय से चल रही थीं और रविवार को इसकी घोषणा बसपा की ओर से किया गया। हालांकि इसमें दिलचस्प पहलू यह है कि कांग्रेस इस गठबंधन से बाहर है। लेकिन कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि अंत में कांग्रेस भी इस गठबंधन के साथ जुड़ सकती है।

सपा के सूत्र बताते हैं कि इस गठबंधन के पीछे हालांकि राज्यसभा और विधान परिषद सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर सपा-बसपा की साझी रणनीति भी है। सपा ने बसपा को राज्यसभा चुनाव में समर्थन देने और इसके बदले बसपा ने विधान परिषद चुनाव में बसपा को समर्थन देने का समझौता किया है।

गठबंधन को लेकर सपा के राष्टीय उपाध्यक्ष किरणमय नंदा ने कहा, “सपा और बसपा के एक होने से गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में सांप्रदायिक ताकतें पराजित होंगी। भाजपा दोनों उपचुनाव हारने जा रही है। फूलपुर चुनाव लोकसभा चुनाव 2019 की दशा और दिशा तय करेगा।”

हालांकि उप्र और केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी ने इन खतरों से निपटने की तैयारी कर ली है। गोरखपुर में जहां मुख्यमंत्री योगी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, वहीं फूलपुर उपचुनाव में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने पार्टी की जीत के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उपचुनाव को लेकर हुए इस गठबंधन को सिरे से खारिज किया है। भाजपा के प्रदेश महासचिव विजय बहादुर पाठक ने कहा, “यह एक बेमेल और स्वार्थ में किया गया गठबंधन है। जनता इसको ज्यादा तवज्जो नहीं देगी। भाजपा पॉलिटिक्स ऑफ परफार्मेस की बात करती है, जबकि ये लोग स्वार्थ की बात कर रहे हैं। जनता इनसे जवाब मांग रही है कि आखिर वो भाजपा को वोट क्यों न दें। इसका जवाब इनके पास नहीं है।”

भाजपा को वोट क्यों न दें, इसका सही जवाब हालांकि राजस्थान और मध्य प्रदेश में हाल के उपचुनावों में मतदाता भाजपा को दे चुकी है, अब उत्तर प्रदेश की बारी है।

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बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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sheila dikshit-min

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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ओपिनियन

मोदी राज में लुप्त हुआ संसदीय संवाद

संसद में सार्थक चर्चा नहीं हो रही। प्रक्रिया और परम्परा दम तोड़ चुकी है। नौकरशाही भी दमघोटू हाल में है। लोकतंत्र की लौ फड़फड़ा रही है।

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Parliament of India
Indian Parliament Picture

देश पर विश्वास के संकट छाया है। संसद रूपी लोकतांत्रिक संस्था का तेज़ी से पतन हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होने वाला सार्थक संवाद नदारद है। विपक्ष का गला घोंटकर सियासी लाभ उठाने के क़ानून बनाये जा रहे हैं। विधेयकों को उन संसदीय समितियों की समीक्षा से बचाया जा रहा है, जो प्रस्तावित क़ानून को कारगर बनाने के लिए सभी पक्षों की राय को समायोजन करती हैं। झूठी वाहवाही बटोरने के लिए मंत्रीगण ग़लत आँकड़ों को परोसते हैं, क्योंकि उन्हें विशेषाधिकार हनन की परवाह नहीं है। अभी जो मंत्री संसद में गतिरोध से आहत होने की दलीलें देते हैं, वहीं जब विपक्ष में थे तो उनकी दलील होती थी कि गतिरोध भी संसदीय रणनीति का हिस्सा है। सरकार हमारे विरोध को भले ही ढोंग बताये, हमें श्रेय नहीं दे, लेकिन हम वही कर रहे हैं, जो हमारा दायित्व है। सरकार के ऐसे रवैये की वजह से ही संसद पर जनता का भरोसा न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है।

वो दिन लद गये जब जजों के पास मुक़दमों के लिए इत्मिनान भरा वक़्त होता था। मुक़दमों का अम्बार है। न्यायतंत्र चरमरा चुका है। लेकिन कसूर जजों का नहीं है। न्यायालयों की गरिमा तार-तार हो चुकी है। अदालतों को बाहरी दख़ल से सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन पूर्व प्रधान न्यायाधीश जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर ही ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ के अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगा। लेकिन कोई सच्चाई की तह तक नहीं जाना चाहता। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार उसके चार वरिष्ठतम जजों को अपने अन्तःकरण की आवाज़ का ख़ुलासा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे में है। अदालतों के बाहर घड़ल्ले से ऐसी हरक़तें हो रही हैं, जिससे न्यायिक फ़ैसलों को प्रभावित किया जा सके। न्यायिक फ़ैसलों में समानता वाली परम्परा को अनोखे तर्कों के सहारे ध्वस्त किया जा रहा है।

अदालतें बेहद उदारता से सील-बन्द लिफ़ाफ़ों में मिली सरकारी दलीलें स्वीकार कर रही हैं, ताकि दूसरे पक्ष उसे चुनौती भी नहीं दे सकें। ऐसी बोझिल प्रक्रिया से न्यायिक आदेश का प्रभावित होना लाज़िमी है। घपलों-घोटालों से जुड़े काग़ज़ातों पर कोर्ट ग़ौर तक नहीं कर रही। जज लोया मामले की कार्यवाही, राफ़ेल सौदे में जाँच को नकारना और सीबीआई निदेशक के तबादले से जुड़े प्रसंगों से साफ़ है कि देश को झकझोरने वाले मुद्दों के प्रति न्याय-तंत्र का रवैया भी सवालों के घेरे में है। दुहाई तो क़ानून की दी जाती है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मोर्चे पर सारे वादे पीछे छूट जाते हैं। अलग-अलग बेंच में संवैधानिक पीठ के जजों के फ़ैसले भी बदल जाते हैं। इसीलिए जनता के बढ़ते मोहभंग के प्रति न्यायपालिका को ख़ासतौर पर सचेत रहने की ज़रूरत है।

संसद में हासिल पूर्ण बहुमत का सही इस्तेमाल जटिल जनसमस्याओं को लोकतांत्रिक ढंग से निपटाने के लिए होना चाहिए। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सबको साथ लेकर चलने की भावना से काम किया जाए। सरकार को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का ज़रिया बनना चाहिए, लेकिन वो मतभेद के स्वरों को दबाने में जुटी हुई है। इन सन्दर्भों में देखें तो हमारी संस्थाओं पर भारी संकट गहराया हुआ है, कुछेक तो बन्धक बन चुकी हैं। कई संस्थाएँ तो सिर्फ़ आपने आकाओं की जी-हुज़ूरी कर रही हैं। सीबीआई, ईडी, एनआईए और सीबीडीटी यानी केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़ा ताज़ा घटनाक्रम इन्हीं बातों का साबित करता है। ये संस्थाएँ आज क़ानून को सर्वोपरि बनाये रखने के लिए काम नहीं कर रहीं, बल्कि वो अक्सर इसे तबाह करती नज़र आती हैं। इसीलिए संस्थाओं में कलह बढ़ रहा है। वो शर्मसार हो रही हैं। जो पतन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे निकाल बाहर किया जा रहा है। जिनका काम क़ानून को सर्वोपरि बनाना है, वो बौने साबित हो रहे हैं। यदि जाँच एजेंसियाँ दाग़दार होंगी तो अदालती फ़ैसले भी वैसे ही होंगे। पक्षपात और दुर्भावनापूर्ण जाँच से अन्याय और आक्रोश पैदा होता है। तब जनता सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर होती है।

नौकरशाही का दम घुट रहा है। निष्कलंक निष्ठा वाले अफ़सरों का सताया जा रहा है। क्योंकि उनके पुराने बॉस मौजूदा सत्ता की आँखों में खटक रहे हैं। इसने कार्यपालिका में उदासी भरी थकान भर दी है। चहेते अफ़सर अपने आकाओं के इशारों पर नाच रहे हैं। बाक़ी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। प्रशासन इसी का नतीज़ा भुगत रहा है, योजनाओं में देरी हो रही है और आर्थिक विकास सुस्त पड़ा हुआ है। विकास दर में शिथिलता की वजह से स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे उन दो बुनियादी क्षेत्रों के लिए संसाधन नहीं जुटा पा रही, जो सामाजिक बदलाव के सबसे अहम तत्व हैं। हमने देखा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अफ़सरों का गुस्सा कैसे मासूम लोगों पर फूट रहा है! ऐसे वातावरण की वजह से अफ़सरों का सारा ज़ोर सत्ता के प्रति वफ़ादार रहने का बन जाता है, जबकि उनसे भय और पक्षपात से मुक्त रहकर काम करना चाहिए।

संचार क्रान्ति ने नये तरह के दमन को बढ़ाया है। झूठ और अफ़वाह के ज़रिये लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरा जा रहा है। ख़ासकर, इलेक्ट्रानिक मीडिया और काफ़ी हद्द तक प्रिंट मीडिया भी उन उद्योगों की मुट्ठी में है, जो अर्थव्यवस्था में भारी दबदबा रखते हैं। बड़े-बड़े मीडिया मालिक, सरकार की मदद से अपने कॉरपोरेट को चमकाने के लिए पत्रकारीय उसूलों से समझौता कर रहे हैं। मीडिया के ऐसे समझौते से लोकतंत्र का पतन निश्चित है।

चौतरफ़ा संकट वाले मौजूदा माहौल में उम्मीद की किरण सिर्फ़ यही है कि 2019 में भारत की जनता इसे पहचाने और इससे लोहा ले। सिर्फ़ जनता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। वो चुनौतियों से कैसे निपटेगी, ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन यदि वो नहीं चेती तो लोकतंत्र की फड़फड़ाती लौ को असहिष्णुता की तेज़ हवाएँ बुझा देंगी।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

(साभार:इंडियन एक्सप्रेस)

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ओपिनियन

अयोध्या: कोर्ट की अवमानना वाले बयान नहीं, बल्कि फ़ैसले का इन्तज़ार होना चाहिए

ताज़्ज़ुब की बात है कि क़ानून मंत्री और केन्द्र तथा बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों में बैठे गणमान्य लोग, सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान देते रहे हैं, जिनसे साफ़ तौर पर कोर्ट के इन आदेश की अनदेखी होती है। ये सीधे-सीधे अदालत की अवमानना है।

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Ayodhya Verdict Supreme Court

अयोध्या विवाद से जुड़े ज़मीन के मालिकाना हक़ वाले मुकदमें में आगे की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट इसी महीने अपनी खंडपीठ (बेंच) गठित करने वाला है। फिर बेंच, सुनवाई का कार्यक्रम तय करेगी। लेकिन इसी वक़्त सोची-समझी साज़िश के तहत ऐसे बयानों की झड़ी लग गयी है, जिसने माहौल को प्रदूषित कर दिया है। कुछेक बयान तो ऐसे हैं जो साफ़ तौर पर सुप्रीम कोर्ट की अवमानना हैं। जबकि बाक़ी का मकसद ऐसे माहौल को गरमाना है कि मन्दिर का निर्माण फ़ौरन शुरू होना चाहिए।

28 नवम्बर 2018 तो संघ के वरिष्ठ नेता इन्द्रेश कुमार ने धमकी दी कि ‘दो-तीन’ जजों की वजह से देश अपाहिज़ नहीं बन सकता या अदालत हमारी आस्था का दमन करके राम मन्दिर के निर्माण में देर कर रही है। इससे ऐसा लगा कि संघ को अब मन्दिर निर्माण में ज़रा सी भी देरी बर्दाश्त नहीं है। इसके लिए उसे सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की कोई परवाह नहीं है।

इन्द्रेश ने आगे कहा कि ‘भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) ने मामले की सुनवाई को जनवरी तक खिसकाकर इंसाफ़ में ‘देरी करने, इसे नकारने और इसका अनादर करने’ का काम किया है। इससे जनता की भावनाओं को चोट पहुँच रही है। इसीलिए यदि तीनों जज फ़ैसला नहीं सुनाना चाहते तो फिर उन्हें सोचना चाहिए कि वो जज बने रहेंगे या इस्तीफ़ा देंगे।’ इन्द्रेश कुमार के बयान से ऐसा लग रहा है कि अदालती फ़ैसला सुनाने का मतलब ये है कि संघ चाहता है कि फ़ैसला उसकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ ही होना चाहिए।

अयोध्या का विवादित परिसर क़िले में बदल दिया गया। क्योंकि वहाँ शिवसेना, शक्ति प्रदर्शन करके बीजेपी पर हमला करना चाहती थी कि उसने मन्दिर निर्माण को लेकर अपना वादा नहीं निभाया। दिसम्बर में संघ और वीएचपी की ओर से दिल्ली के राम लीला मैदान में एक महारैली की गयी। दावा था कि रैली में 8 लाख लोग जुटेंगे। लेकिन संख्या कुछेक हज़ार को भी पार नहीं कर सकी। इस रैली का दो मकसद था। पहला, सुप्रीम कोर्ट को धमकी भरा सन्देश देना और दूसरा, लोकसभा चुनाव 2019 से ऐन पहले धार्मिक ध्रुवीकरण के माहौल को गरमाना। इसके अलावा ये धमकियाँ भी दी गयीं कि सरकार, अदालत के आगे लाचार नहीं दिख सकती। उसे मामले में दख़ल देना चाहिए और अध्यादेश लाकर न्याय करना चाहिए।

26 नवम्बर 2018 को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का बयान था कि सत्तारूढ़ दल का मानना है कि अयोध्या में राम मन्दिर ज़रूर बनना चाहिए क्योंकि वो भगवान राम की जन्मस्थली है। उन्होंने आगे कहा कि ‘मुझे लगता है कि फ़ैसला हमारे पक्ष में होगा।’ इससे पहले 19 दिसम्बर को अमित शाह ने एक उत्तेजक बयान दिया कि ‘फ़ैसला जल्दी आना चाहिए… इसका लोगों के बहुत महत्व है… इससे देश भर के लोगों की भावनाएँ जुड़ी हुई हैं।’

मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी 24 दिसम्बर को उनकी बात में ही सुर से सुर मिलाया। उन्होंने कहा कि ‘हमारी इच्छा है कि मामले की रोज़ाना सुनवाई होनी चाहिए ताकि जल्दी फ़ैसला आ सके।’ इसी दिन रविशंकर प्रसाद ने कहा कि ‘क़ानून मंत्री के नाते नहीं, बल्कि एक नागरिक के नाते मेरी सुप्रीम कोर्ट से अपील है कि मामले की सुनवाई, फ़ास्ट-ट्रैक की तरह होनी चाहिए।’ इसी तरह, बीजेपी के महासचिव राम माधव ने कहा कि यदि मामले की सुनवाई फ़ास्ट-ट्रैक में नहीं हो सकती तो अन्य विकल्पों को आज़माना चाहिए।

ऐसे तमाम बयानों का मकसद जन भावनाओं को उकसाने के अलावा कोर्ट को ये धमकी देना भी है कि यदि मामले की फ़ौरन सुनवाई नहीं हुई तो अन्य विकल्प आज़माये जाएँगे। इससे ये साबित होता है कि क़ानूनी प्रक्रिया में दख़ल देने की कोशिश की जा रही है। इसी प्रसंग में जब अदालत को ये सुझाव दिया गया कि सुनवाई 2019 के चुनाव के बाद होनी चाहिए तो बीजेपी ने आरोप लगाया था कि वकील, कोर्ट को प्रभावित करने की कोशिश कर रहे हैं। अब बीते महीनों में जिस तरह से बयानों की झड़ी लगी है, क्या उसका मकसद अदालत को प्रभावित करना नहीं है? ज़ाहिर है, दो-मुँही बातों की अति हो गयी है।

अब जिस बेहूदा ढंग से अदालत पर दबाव बनाया जा रहा है, वो किसी भी लिहाज़ से अदालत की अवमानना से कम नहीं है। ऐसे बयान देने वालों को पता होना चाहिए कि इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 20 अगस्त 2002 को जो फ़ैसला सुनाया था, उसमें 17 फरवरी 2003 में संशोधन करके ये जोड़ा गया कि अदालत की कार्यवाही को लेकर मीडिया अपना नज़रिया नहीं ज़ाहिर कर सकती। इसमें किसी भी व्यक्ति, दल और उसके वकील की निजी राय भी शामिल होगी। इतना ही नहीं, 30 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने भी आदेश दिया कि मुकदमें के निपटारे तक हाईकोर्ट का अन्तरिम आदेश लागू रहेगा।

ताज़्ज़ुब की बात है कि क़ानून मंत्री और केन्द्र तथा बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों में बैठे गणमान्य लोग, सार्वजनिक तौर पर ऐसे बयान देते रहे हैं, जिनसे साफ़ तौर पर कोर्ट के इन आदेश की अनदेखी होती है। ये सीधे-सीधे अदालत की अवमानना है।

सुप्रीम कोर्ट को भी अच्छी तरह से पता है कि उसका फ़ैसला जो भी हो, लेकिन उसका भारत के भविष्य पर बहुत गम्भीर असर पड़ेगा। इसीलिए जन भावनाओं को भड़काकर ऐसा माहौल नहीं बनाया जाना चाहिए जिससे हमारे लोकतंत्र की बुनियाद पर ही ख़तरा मँडराने लगे। अदालत में ये कहना कि मामला विवादित ‘ज़मीन के मालिकाना हक़’ का है। लेकिन अदालत से बाहर इसे आस्था के ऐसे स्वरूप में पेश करना जिससे लगे कि यदि अमुक फ़ैसला नहीं हुआ तो कोर्ट का सारी क़वायद ही फ़िज़ूल है।

मन्दिर को लेकर आने वाले उत्तेजक बयानों से साफ़ है कि ये लोग, न्याय की गरिमा और क़ानून के राज के प्रति कैसा आदर भाव रखते हैं? ये राजनीति को क़ानून से ऊपर समझने की मानसिकता है। ये ऐसे ही नेता हैं।

The writer is a former Union minister and senior Congress leader. (DISCLAIMER : Views expressed above are the author’s own.)

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