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हे मन्दबुद्धि हिन्दुओं, ‘आँखें खोलो’, वो लेनिन की मूर्ति नहीं, भारत को तोड़ रहे हैं!

अब भारत, हिन्दू राष्ट्र बनने से महज चन्द क़दम ही दूर है! रामराज्य का आगमन हो चुका है! भारत, सोने की चिड़िया बन चुका है! सभी राष्ट्रभक्त संघियों से कहा गया है कि वो अपने घर के बाहर घी के दीपक जलाकर [मन्दबुद्धि] हिन्दू एकता का प्रदर्शन करें! क्योंकि त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त करना और बामियान में बुद्ध की प्रतिमा पर बम बरसाने में कोई फ़र्क़ नहीं है

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Lenin Statue

ये किसी से छिपा नहीं है कि संघियों ने एक व्यापक साज़िश के ज़रिये देश के मन्दबुद्धि और मूर्ख हिन्दुओं को सफलतापूर्वक मोदीभक्त बना दिया है। इन्हीं लोगों के ध्रुवीकरण के ज़रिये बीजेपी का विस्तार हो रहा है। क्योंकि सिर्फ़ मूर्खों को ही पता नहीं होता कि उनके क्या करने से क्या होता है! समझते नहीं हैं, इसीलिए तो मूर्ख हैं! लेकिन संघियों को पता है कि वो वोट हैं, जनता है, मतान्ध हिन्दू है। इसीलिए मूर्ख हिन्दुओं की बदौलत पैदा होने वाले जनादेश की व्याख्या भी मूर्खतापूर्ण होती है! फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि ऐसी मूर्खताओं से जनता अपने ही देश को तोड़ रही है और उसे इसका पता भी नहीं चल रहा!

दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया कस्बे में लगी लेनिन की मूर्ति ज़मींदोज़ हो चुकी है। बताते हैं कि महज आधी बोतल शराब ने सारा कारनामा कर दिया। संघियों ने एक बुलडोजर चालक को शराब पिलाकर उसे ‘भारत माता की जय’ का इंज़ेक्शन लगा दिया। फिर हुड़दंग किया और बेचारे ब्लादिमिर लेनिन ज़मीन पर आ गिरे, क्योंकि उनके चहेते चुनाव में पटखनी खाकर सदमे में डूबे थे! अभी बीजेपी की सरकार बनी भी नहीं थी। मुख्यमंत्री का नाम भी तय नहीं हुआ था। माणिक सरकार ही कार्यवाहक मुख्यमंत्री की भूमिका में थे। फिर भी पुलिस-प्रशासन ने घुटने टेक दिये। मानो, सबने मान लिया हो कि अब ऐसा ही होगा, तो होने दो! इस तरह, भगवा संस्कारों ने एक बार फिर साबित किया कि ‘जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो…’ और ‘दंगा-फ़साद, बीजेपी के साथ!’

यहीं ये सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या लेलिन की मूर्ति को ध्वस्त करना, बीजेपी का चुनावी वादा था? क्या मूर्ति ध्वस्त करने से विचार भी ध्वस्त हो जाते हैं? विचार की बड़ी अहमियत है। संघ पर चार बार प्रतिबन्ध लगे। अँग्रेज़ों के राज में लगा था। लेकिन क्या बाँटने और तोड़ने वाली उनकी विचारधारा ख़त्म हुई? मौजूदा दौर के संघियों को भगत सिंह में तो भारत माता का अक्स दिखायी देता है, लेकिन शायद वो नहीं जानते कि भगत सिंह को जब फाँसी के लिए बुलाया गया था तब वो ‘रिवोल्यूशनरी लेनिन’ नामक क़िताब पढ़ रहे थे। और तब उन्होंने बोला था कि “क्या मुझे लेनिन की क़िताब का एक अध्याय भी नहीं ख़त्म करने दोगे? ज़रा एक क्रान्तिकारी की दूसरे क्रान्तिकारी से मुलाक़ात को तो ख़त्म होने दो।”

इसीलिए सवाल ये भी उठता है कि क्या आज लेनिन की प्रतिमा गिराने वाले जल्द ही भगत सिंह की भी प्रतिमाओं को गिराते नज़र आएँगे? वैसे वक़्त आ गया है कि बीजेपी ये भी बताये कि गाँधी, नेहरू, पटेल, बोस, आम्बेडकर, शास्त्री, इन्दिरा और राजीव की मूर्तियाँ कब तक ध्वस्त कर देने का लक्ष्य रखा गया है? साफ़ दिख रहा है कि डार्विन और न्यूटन के बाद जो नया सूर्य-विज्ञान सिद्धान्त प्रतिपादित हुआ है, उसके मुताबिक़ ‘जब लाल का अस्त होने के बाद केसरिया का उदय होता है तो फ़िज़ा में हिंसा और नफ़रत का बोलबाला होता है!’ दरअसल अब ‪यही है, भारत माता की जय, यही है रामराज्य, यही है सुशासन, यही है भय-मुक्त समाज, यही है विकास, यही है भ्रष्टचार-उन्मूलन!

अब मन्दबुद्धि हिन्दुओं के बीच ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि लेनिन का भारतीय इतिहास से कोई वास्ता नहीं है। ऐसा वही मान सकते हैं, जिन्हें भारत में चले कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास का पता नहीं है। कम्युनिस्टों ने देश की आज़ादी की लड़ाई और उसके बाद आयी लोकतांत्रिक व्यवस्ता में अपनी भूमिका निभायी थी। जबकि इतिहास गवाह है कि संघियों ने अँग्रेज़ों से माफ़ी माँगकर उन्हें उनका वफ़ादार बने रहने का लिखित में वचन दिया था। संघियों ने आज़ादी के आन्दोलन को नुक़सान पहुँचाने और अँग्रेज़ों की मदद के लिए क्रान्तिकारियों के ख़िलाफ़ मुख़बिरी की थी। फिर भी चलिए, मान लिया कि मन्दबुद्धि हिन्दुओं का इतिहास में हाथ तंग होना स्वाभाविक है।

हमें इतनी अक्ल तो होनी ही चाहिए कि हम ये समझ सकें कि यदि लेनिन की मूर्ति को ढहाना ही वक़्त की माँग है तो लोकतंत्र में इसके लिए भी उपयुक्त प्रक्रिया अपनानी चाहिए। आख़िर, आज़ादी के बाद ढेरों अँग्रेज़ों की मूर्तियों को भी हटाया गया था। लेकिन हिंसक तरीक़े से नहीं, बल्कि शालीनता और मर्यादा से। बहुत सारी सड़कों भवनों वगैरह के नाम पहले भी बदले गये हैं। लेकिन क्या इसके लिए तय प्रक्रिया को नहीं अपनाया गया? क्या भारत को अब नियम-क़ायदों और संविधान से चलने की ज़रूरत नहीं है? क्या भीड़-तंत्र ही देश का नया विधान बन चुका है? ज़रा सोचिए कि इसका अंज़ाम क्या-क्या होने वाला है?

अरे, आप एक नहीं हज़ार मूर्तियाँ तोड़िए, लेनिन की ही नहीं, जिसकी जी में आये उसकी तोड़िए। किसने रोका है! रोक भी कौन सकता है! जनादेश है ना आपके पास! एक प्रक्रिया अपनाइए और फिर जो जी में आये कीजिए! ऐसे सड़क पर घूमते-दौड़ते आप कभी किसी बुत को तोड़ देंगे, किसी मस्जिद को ढहा देंगे, किसी को बीफ़ के नाम पर काट डालेंगे और फिर चाहेंगे कि कोई आपको ‘हिन्दू तालिबान’ भी ना कहे! अरे, कल को कोई हिन्दू दबंग हमारे-आपके घर में घुस आएगा और कहेगा कि ‘निकलो यहाँ से, ये घर मेरा है।’ तो आपको लेनिन की मूर्ति का ज़बरन ढहाना याद आएगा! इसी तरह, कल को कोई दबंग हिन्दू, हमारी-आपकी बहन-बेटी को उठाकर ले जाएगा और कहेगा कि वो उसकी हो गयीं! तब क्या ये कहने का साहस जुटा लेंगे कि ‘चलो, कोई बात नहीं। बेटियाँ तो होती ही पराया धन हैं!’ जिस दिन ऐसा होने लगेगा, उस दिन आपको लेनिन की मूर्ति का ज़बरन ढहाना याद आएगा!

लेनिन की मूर्ति को तोड़ना तो बस आग़ाज़ है…! अब जल्द ही योगी आदित्यनाथ अपनी हिन्दू युवा वाहिनी, बजरंग दल और संघ के उत्पाती तथा राष्ट्रभक्त स्वयंसेवकों से कहेंगे कि फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव में यदि बीजेपी को जीत प्राप्त होगी तो उत्तर प्रदेश को भी ग़ैर-भगवा बुतों यानी मूर्तियों से विहीन किया जाएगा! आख़िर लेलिन की मूर्ति से शुरू हुआ सिलसिला आगे भी तो बढ़ना है…! अब मूर्ति तोड़ो योजना से नया भारत बनाया जाएगा! जिन युवाओं को पकौड़ा रोज़गार योजना के बावजूद काम नहीं मिल पाया, उनका कल्याण अब मूर्ति तोड़ो योजना के ज़रिये किया जाएगा…! मोदी राज के इसी कार्यक्रम से गाय-गोबर योजना से ख़ाली हुए देशभक्तों का भी कल्याण किया जाएगा!

मूर्ति तोड़ो योजना को उत्तर प्रदेश में कामयाब बनाने के बाद इसे कर्नाटक और फिर केरल में तथा उसके बाद पूरे भारतवर्ष में लागू किया जाएगा! इस योजना की सफलता से ‘अच्छे दिन’ को राष्ट्रव्यापी बनाया जाएगा! इससे नीरव-मेहुल, माल्या-ललित जैसे लोगों की वापसी होगी, बैंकों का एनपीए ख़त्म हो जाएगा, सबके खाते में 15-15 लाख रुपये डाले जाएँगे और विदेश से कालाधन अपने-आप आने लगेगा! महँगाई उस स्तर पर पहुँच जाएगी जहाँ वाजपेयी सरकार के वक़्त थी, पेट्रोल-डीज़ल और रसोई गैस का भाव भी अटल-युग के स्तर पर पहुँच जाएगा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत को सौंप दिया जाएगा, अनुच्छेद 270 का वजूद ख़त्म हो जाएगा, कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो जाएगी, समान नागरिक संहिता पूरे देश में लागू होगी, अयोध्या में भव्य और दिव्य राम मन्दिर बन जाएगा!

मुमकिन है कि थोड़े वक़्त बाद नरेन्द्र मोदी ये बोलते नज़र आयें कि “भाईयों-बहनों, श्री श्री रविशंकर ने साफ़ कर दिया है कि भारत में अब संविधान की कोई ज़रूरत नहीं रही, क्योंकि यदि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला मस्जिद के पक्ष में आया तो देश में सीरिया जैसे हालात हो जाएँगे! बाक़ी, मेरा क्या है… मैं तो झोला उठाऊँगा और नीरव-मेहुल के पास चला जाऊँगा!” अरे, सीरिया और पाकिस्तान तो अगला स्तर है। फ़िलहाल, अफ़ग़ानिस्तान और हिन्दुस्तान में कोई फ़र्क़ नहीं बचा! चार साल में ही भारत को अफ़ग़ानिस्तान बनाने का चमत्कार करने वाले हिन्दू तालिबानियों का संगठन बधाई का पात्र है!

अब भारत, हिन्दू राष्ट्र बनने से महज चन्द क़दम ही दूर है! रामराज्य का आगमन हो चुका है! भारत, सोने की चिड़िया बन चुका है! सभी राष्ट्रभक्त संघियों से कहा गया है कि वो अपने घर के बाहर घी के दीपक जलाकर [मन्दबुद्धि] हिन्दू एकता का प्रदर्शन करें! क्योंकि त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त करना और बामियान में बुद्ध की प्रतिमा पर बम बरसाने में कोई फ़र्क़ नहीं है! दोनों राजनीतिक प्रक्रिया का नतीज़ा है! जल्द ही ताजमहल भी ढहाया जाएगा और संसद भवन भी! तमाम अन्य स्मारक भी जिनका ताल्लुक़ मुसलमानों और अँग्रेज़ों से रहा हो!

अब देश में वैचारिक असहमति की अपनी कोई जगह नहीं रहेगी! कोई इस असहमति का सम्मान करने की दुहाई भी नहीं देगा! क़तई नहीं! हर्ग़िज़ नहीं! अब हमें स्वस्थ लोकतंत्र नहीं चाहिए! अनेकता में एकता नहीं चाहिए! परस्पर सम्मान और आपसी भाईचारे में अब हमारा कोई यक़ीन नहीं है! अब हम सिर्फ़ अराजकता के उपासक बनकर रहेंगे! यक़ीनन, 2019 तक हम पाकिस्तान से भी अपना फ़र्क़ मिटा डालेंगे! निश्चित रूप से तब तक ‘नये भारत’ का ख़्वाब साकार हो जाएगा! इसलिए ‘हे, मन्दबुद्धि हिन्दुओं, अब भी वक़्त है ‘आँखें खोलो’, वो लेनिन की मूर्ति नहीं, भारत को तोड़ रहे हैं!’

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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हिंदी ब्लॉग्स को हर महीने 3 करोड़ पेज व्यू : मॉमस्प्रेसो

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Hindi Blog

नई दिल्ली, 14 सितम्बर | भारत के महिलाओं के लिए सबसे बड़े यूजर-जनरेटेड कंटेंट प्लेटफार्म मॉमस्प्रेसो ने हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर अपने 6,500 से ज्यादा ब्लॉगर्स के डेटा का विश्लेषण कर नई रिपोर्ट प्रस्तुत की है। विश्लेषण कहता है कि हिन्दी ब्लॉग्स ने हर महीने 3 करोड़ से ज्यादा पेज व्यू हासिल की है। इसमें से 95 प्रतिशत की खपत पाठकों ने मोबाइल पर की है।

प्लेटफार्म ने बताया कि हिंदी पेज व्यू अंग्रेजी से ज्यादा हो गए हैं और इस समय कुल पेज व्यू का 50 प्रतिशत हो गया है।

मॉमस्प्रेसो की ओर से जारी बयान में कहा गया कि प्लेटफार्म पर हिंदी में लेखन की सूची मुख्य रूप से उन शहरों की माताओं ने तैयार की है, जिनकी तुलनात्मक रूप से भागीदारी कम रही है। इनमें पटना, आगरा, लखनऊ, शिमला, भुवनेश्वर और इंदौर शामिल है। 75 प्रतिशत हिन्दी ब्लॉग्स को मॉमस्प्रेसो मोबाइल ऐप के जरिये लिखा गया है, जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। 60 प्रतिशत ब्लॉगर्स अभी भी ब्लॉग लिखने के लिए डेस्कटॉप उपयोग करते हैं। मोबाइल ऐप पर बने हिन्दी ब्लॉग्स में से 93 प्रतिशत एंड्रायड फोन पर बने हैं। प्लेटफार्म पर इस समय 1,595 हिन्दी ब्लॉगर्स हैं, जिन्होंने अब तक 14,746 ब्लॉग्स बनाए हैं। हर महीने करीब 1,800 ब्लॉग्स जोड़े जा रहे हैं।

मॉमस्प्रेसो ने बताया कि हिन्दी की अधिकतम रीडरशिप लखनऊ, जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़, आगरा और पटना से है। यह भी बताया गया कि 95 प्रतिशत यूजर्स ने लेखन का इस्तेमाल मोबाइल पर किया। जिस कंटेंट ने अधिकतम रीडरशिप (65 प्रतिशत) हासिल की, वह ‘मां की जिंदगी’ या ‘मॉम्स लाइफ’ सेक्शन था। रिलेशनशिप्स से लेकर पैरेंटिंग और सामाजिक उत्तरदायित्व तक का लेखन इस पर उपलब्ध है। अन्य लोकप्रिय सेक्शन में प्रेग्नेंसी, बेबी, हेल्थ और रैसिपी भी शामिल हैं।

हिंदी पोस्ट्स को अंग्रेजी की तुलना में 4.2 गुना ज्यादा एंगेजमेंट मिला। इसमें लाइक्स, शेयर और कमेंट्स शामिल हैं। हिन्दी में हाइपर एंगेजमेंट की एक बड़ी वजह हिन्दी कंटेंट की क्वालिटी है। पहली बार महिलाओं को कई मुद्दों पर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए सुरक्षित स्थान मिला है। कई महिलाएं जो लैंगिंक भेदभाव, सामाजिक मुद्दों और अन्य वजहों से खुलकर बोल नहीं पाती थी, वह भी इस पर अपने आपको अभिव्यक्त कर रही है।

मॉमस्प्रेसो के सह-संस्थापक और सीईओ विशाल गुप्ता ने कहा, “हमारा विजन यह है कि अगले तीन वर्षो में हमारे प्लेटफॉर्म पर सभी माताओं में से 70 फीसदी को लेकर आना है और क्षेत्रीय भाषा लेखन इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण है। हमें गर्व है कि मॉमस्प्रेसो एक ऐसा मंच प्रदान कर रहा है जहां भारत भर की माताएं बिना डर के अपने विचार व्यक्त कर रही हैं। इन विषयों पर बहस और चर्चाओं को प्रोत्साहित करती हैं। पिछले 12 महीनों में हमारे ट्रैफिक चार गुना बढ़ा है और हिंदी की भूमिका इस विकास में महत्वपूर्ण रही है। इस समय हमारे पास चार अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में लेखन है और वर्ष के अंत से पहले हमारी योजना 3 और जोड़ने की है।

हिंदी भाषा लेखन का उपयोग करने वाले ब्रांड्स की संख्या 2017 के 6 फीसदी से बढ़कर 2018 में 27 फीसदी हो गई है। इसमें पैम्पर्स, डेटॉल, बेबी डव, नेस्ले, जॉनसन एंड जॉन्सन, एचपी, ट्रॉपिकाना एसेंशियल्स और क्वैकर जैसे ब्रांड शामिल हैं।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

जानिये क्यों गिर रहा है रुपया

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Rupee Fall

नई दिल्ली, 13 सितम्बर | केंद्र सरकार ने रुपये की गिरावट को थामने की हरसंभव कोशिश करने का भरोसा दिलाया है। इसका असर पिछले सत्र में तत्काल देखने को मिला कि डॉलर के मुकाबले रुपये में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। हालांकि रुपये में और रिकवरी की अभी दरकार है।

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर तक लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को 72.69 पर बंद हुआ था।

रुपये की गिरावट से अभिप्राय डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आना है। सरल भाषा में कहें तो इस साल जनवरी में जहां एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे वहां अब 72 रुपये देने होते हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।

शेष दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए प्राय: डॉलर की जरूरत होती है ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर देशी मुद्रा कमजोर होती है।

एंजेल ब्रोकिंग के करेंसी एनालिस्ट अनुज गुप्ता ने रुपये में आई हालिया गिरावट पर कहा, “भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। वहीं, विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश में कटौती करने से देश से डॉलर का आउट फ्लो यानी बहिगार्मी प्रवाह बढ़ गया है। इससे डॉलर की आपूर्ति घट गई है।”

उन्होंने बताया कि आयात ज्यादा होने और निर्यात कम होने से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है, जोकि रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खाते का घाटा तकरीबन 18 अरब डॉलर हो गया है। जुलाई में भारत का आयात बिल 43.79 अरब डॉलर और निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा।

वहीं, विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार घटता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह को 1.19 अरब डॉलर घटकर 400.10 अरब डॉलर रह गया।

गुप्ता बताते हैं, “राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से भी रुपये में कमजोरी आई है। आर्थिक विकास के आंकड़े कमजोर रहने की आशंकाओं का भी असर है कि देशी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है। जबकि विश्व व्यापार जंग के तनाव में दुनिया की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती के संकेत मिल रहे हैं जिससे डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती आने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल कर ले जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक हितों के टकराव के कारण अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुई व्यापारिक जंग से वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

मोदी सरकार को बिना विचारे नयी नीतियाँ लागू करने की बीमारी है!

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kapil-sibal

काग़ज़ों पर कोई नीति भले ही शानदार लगे, लेकिन उसे सफलतापूर्वक लागू करना ही सबसे अहम है। युगान्कारकारी नीतियों का ऐलान करने से पहले ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लेना बेहद ज़रूरी है। एनडीए की विफलता की सबसे बड़ी वजह ही ये है कि वो नयी नीतियों को लागू करने से पहले उसके प्रभावों का आंकलन नहीं पाती है। नोटबन्दी, इसका सबसे जीता-जागता उदाहरण है। मोदी सरकार को इसका अन्दाज़ा ही नहीं था कि नोटबन्दी, देश के लिए विनाशकारी साबित होगा। इसी वजह से जीएसटी को घटिया ढंग से लागू किया गया और उससे भी फ़ायदे की जगह नुक़सान ही हाथ लगा।

दिवालिया और कंगाली क़ानून यानी इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी को मई 2016 में संसद ने पारित किया। मोदी सरकार ने इसे बहुत बड़े आर्थिक सुधार की तरह पेश किया और ख़ूब अपनी पीठ थपथपाई। इसका मक़सद बैंकों की बैलेंस शीट को साफ़-सुथरा करना, कॉरपोरेट को उनके पापों की सज़ा दिलाना, बैंकिंग प्रणाली में हेराफेरी करने वालों को दंडित करना और सबसे बढ़कर बैंकों के डूबे क़र्ज़ यानी एनपीए के लिए ज़िम्मेदार कम्पनियों पर कार्रवाई करना था।

12 फरवरी 2018 को रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ पुनर्निर्धारण यानी ‘लोन रिस्ट्रकचरिंग’ से जुड़ी आधा दर्जन योजनाओं को ख़त्म कर दिया। इसकी जगह नयी नीति सामने आयी जिसमें कॉरपोरेट्स को 180 दिनों के भीतर अपने बकाया क़र्ज़ों को चुकाने या फिर दिवालिया क़ानून यानी आईबीसी का सामना करने का बेहद सख़्त प्रावधान था। ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लिये गये बनी इस नीति का नतीज़ा ये निकला कि सुप्रीम कोर्ट ने रिज़र्व बैंक के 12 फरवरी वाले फ़रमान पर रोक लगा ही। लिहाज़ा, दिवालिया क़ानून को लागू करने की क़वायद बैंकों को रोक देनी पड़ी।

तब तक आईबीसी के मामलों के निपटारे के लिए दिवालियेपन से निपटने वाली तीन पेशेवर कम्पनियों के ज़रिये 1300 कर्मचारियों की भर्ती हो चुकी थी। नैशनल कम्पनी लॉ ट्राइबुनल (एनसीएलटी) की शाखाओं में कॉरपोरेट्स के ख़िलाफ़ 525 मामले भी दर्ज़ हो गये। 108 मामलों में कम्पनियाँ स्वेच्छा से दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए आगे आ गयीं। इनमें स्टील, निर्माण और खदान से जुड़ी ऐसी कम्पनियाँ हैं, जिन पर बैंकों के 1,28,810 करोड़ रुपये बकाया है। इतनी बड़ी तादाद के बावजूद, 2014 से अभी महज कुछ ही मामलों में आईबीसी के तहत कार्रवाई आगे बढ़ी।

आईबीसी के तहत अगस्त और दिसम्बर 2017 के दौरान जिन 10 शुरुआती मामलों का निपटारा हुआ उसमें भी बैंकों को उनके कुल बकाये का सिर्फ़ 33.53 फ़ीसदी रक़म ही मिल पायी। 13 जून 2017 को रिज़र्व बैंक ने 12 बड़े बकायेदारों की पहचान दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए की। एक साल बीतने के बावजूद, इन 12 कम्पनियों में से भूषण स्टील और इलेक्ट्रो स्टील के अलावा अन्य किसी का निपटारा नहीं हुआ।

12 बड़े क़र्ज़दारों का 3,12,947 करोड़ रुपये का दावा मंज़ूर हुआ था। लगता नहीं है कि आईबीसी की नीति के मुताबिक़, इतनी रक़म कभी वसूल हो पाएगी। ऐसे मामलों में 180 दिनों की निर्धारित अवधि के ख़त्म होने के बाद बाक़ी वक़्त मुक़दमेबाज़ी में खर्च हो रहा है। ऐसे मामलों से सिर्फ़ वकीलों और दिवालियापन की कार्रवाई से जुड़े पेशेवर लोगों को फ़ायदा हो रहा है।

बिजली क्षेत्र में 34 बीमार कम्पनियों पर 1.5 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। बैंकों की चिन्ता है कि दिवालियेपन की कार्रवाई के ख़त्म होते-होते इन कम्पनियों की सम्पत्ति का दाम और घट जाएगा। रिज़र्व बैंक ने बैंकों को सख़्त हिदायत दी है कि यदि उसके 12 फरवरी वाले फ़रमान को सख़्ती से लागू नहीं किया गया तो उन्हें गम्भीर नतीज़े भुगतने होंगे। यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को हिदायत दी है कि वो रिज़र्व बैंक से बात करके आईबीसी के प्रावधानों पर राहत देने का पता लगाये, वर्ना आशंका है कि दिवालियेपन की कार्रवाई में बैंकों का 85 फ़ीसदी बकाया डूब जाएगा।

आईबीसी से जुड़ी पूरी तस्वीर का स्याह पहलू ये है कि कॉरपोरेट सेक्टर में कुछ ही कम्पनियाँ ऐसी हैं जो दिवालियेपन की कार्रवाई के बाद ज़ब्त होने वाली कम्पनी को ख़रीदने के लिए उसकी क़ीमत के मुक़ाबले 15 से लेकर 35 फ़ीसदी रक़म ही जुटा सकती हैं। स्टील सेक्टर की दोनों बड़ी कम्पनियों की नीलामी के वक़्त सिर्फ़ दो घरेलू कम्पनियाँ ही बोली लगा पायी थीं। विदेशी कम्पनियों ने तो जैसी बोलियाँ लगायीं, उससे लगा कि वो बीमार कम्पनियों को कौड़ियों के मोल, बिल्कुल वैसे ही ख़रीदना चाहती हैं, जैसा वाजपेयी सरकार के ज़माने में विनिवेश के बहाने कुछ चहेती कम्पनियों को औने-पौने दाम में सरकारी कम्पनियों को बेचा गया था।

स्टील सेक्टर में बीमार कम्पनियों को ख़रीदने के लिए आगे आने वाली घरेलू कम्पनियों को तक़रीबन एकाधिकार नज़र आया है। बिजली क्षेत्र में भी दो मुख्य खिलाड़ी हैं। इसमें से एक को अयोग्य ठहराये जाने के बाद दूसरे के लिए कोई प्रतिस्पर्धी बचा ही नहीं। इस तरह से एक कॉरपोरेट को निहाल किया जा रहा है। स्टील और बिजली ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ बैंकों की भारी रक़म डूब रही है। आईबीसी की बदौलत स्टील सेक्टर में जहाँ 35 फ़ीसदी क़र्ज़ की वसूली हो पा रही है, वहीं बिजली क्षेत्र में तो ये कुल बकाया का महज 15 फ़ीसदी है। सारा माज़रा ही अपने आप में घोटाला है, क्योंकि बीमार कम्पनियों के ख़रीदार भी बैंकों से क़र्ज़ लेकर ही सम्पत्तियाँ ख़रीदेंगी!

आप चाहें तो सरकार की सूझबूझ पर तरस खा रहे हैं, क्योंकि शायद, उसने ऐसी परिस्थितियों का अन्दाज़ा ही नहीं लगाया हो। तभी तो एक ओर रिज़र्व बैंक का 12 फरवरी वाला सर्कुलर क़ायम रहता है और दूसरी ओर 19 जुलाई को बिजली मंत्रालय की ओर से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से कहा जाता है कि वो ‘समाधान’ योजना के तहत बीमार कम्पनियों के क़र्ज़ों का पुनर्निर्धारण कर दे। ये योजना ठंडे बस्ते में चली गयी। ऐसी ही एक अन्य योजना ग्रामीण विद्युतीकरण निगम पर बकाया 17,000 करोड़ रुपये के लिए भी प्रस्तावित हुई। लेकिन वो भी बेकार साबित हुई।

रिज़र्व बैंक भी समय-समय पर ऐसे दिशा-निर्देश जारी कर रहा है, जो बताते हैं कि नीतियों का ऐलान करते वक़्त उसके अंज़ाम के बारे में नहीं सोचा जाता। ऊर्जा से जुड़ी संसदीय समिति ने मार्च 2018 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “यदि रिज़र्व बैंक ज़मीनी सच्चाई को नज़रअन्दाज़ करके दिशानिर्देश जारी करता रहेगा तो इसका मतलब ये है कि बैंक, वित्तीय संस्थाएँ और अन्य निवेशकों की रक़म की वसूली की उम्मीद घटाई में पड़ जाएगी।” संसदीय समिति की ऐसी प्रतिक्रिया से साफ़ है कि सरकार की न सिर्फ़ नीतियाँ ग़लत हैं, बल्कि उन्हें लागू करने का सलीका भी सही नहीं है।

संसदीय समिति की ये भी राय है कि “180 दिनों की मियाद में लक्ष्य को हासिल करना तक़रीबन असम्भव है।” उसने सचेत किया कि जिस दिन एनपीए के जुड़े सारे मामले राष्ट्रीय कम्पनी लॉ ट्राइबुनल में पहुँच जाएँगे, उस दिन वहाँ जाम लग जाएगा। समिति ने आगे कहा कि बिजली क्षेत्र अभी बदलाव के दौर में है। ऐसे में यदि रिज़र्व बैंक सिर्फ़ वित्तीय नज़रिये से देखेगा तो कई अन्य चुनौतियाँ भी खड़ी होंगी, जो वित्तीय परिधि से बाहर होगी। इसीलिए ये समझना ज़रूरी है कि बिजली क्षेत्र की बीमार कम्पनियाँ “राष्ट्रीय सम्पत्ति” हैं और “आख़िरकार इन्हें बचाना बहुत ज़रूरी है।”

नीति में ही घोटाला है। दो या तीन कॉरपोरेट कम्पनियों के बीच में महँगी सम्पत्तियों की बन्दरबाँट, सरकार से जुड़े पूँजीपति दोस्तों को निहाल करने का तरीका है। नीतियों को समुचित समीक्षा के बग़ैर लागू कर देना, उस आरोप के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा घटिया है जिसमें निर्णय लेने की ढिलाई के बावजूद 2004 से 2014 के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर 8.2 फ़ीसदी दर्ज होती है।

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पाकिस्‍तान से मैच के दौरान पंड्या की पीठ पर आई गम्‍भीर चोट

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व्यापार9 hours ago

आरटीआई का खुलासा- मोदी कार्यकाल में तीन गुना बढ़ा एनपीए!

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नए आईफोन्स हैं पैसा वसूल : टिम कुक

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अन्य10 hours ago

बांधवगढ़ ले जाए जाएंगे उत्पाती हाथी

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ज़रा हटके3 weeks ago

जहां दुनिया का महामूर्ख पैदा हुआ

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ब्लॉग4 weeks ago

‘एक देश एक चुनाव’ यानी जनता को उल्लू बनाने के लिए नयी बोतल में पुरानी शराब

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लाइफस्टाइल4 weeks ago

इस राखी बहनें दें भाई को उपहार!

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ब्लॉग3 weeks ago

सत्ता के लालची न होते तो नोटबन्दी के फ़ेल होने पर मोदी पिछले साल ही इस्तीफ़ा दे देते!

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ब्लॉग2 weeks ago

समलैंगिकों को अब चाहिए शादी का हक

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चुनाव2 weeks ago

कर्नाटक निकाय चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनी कांग्रेस

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ब्लॉग2 weeks ago

जब सिंहासन डोलने लगता है तब विपक्ष, ‘ख़ून का प्यासा’ ही दिखता है!

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लाइफस्टाइल3 weeks ago

जायफल के ये फायदे जो कर देंगे आपको हैरान…

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ब्लॉग2 weeks ago

सवर्णों का ‘भारत बन्द’ तो बहाना है, मकसद तो उन्हें उल्लू बनाना है!

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राष्ट्रीय4 weeks ago

केरल में थमी बारिश, राहत कार्यों में तेजी

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शहर10 hours ago

उप्र : चिकित्सक पिटता रहा, एसपी-डीएम ने नहीं उठाया फोन!

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राजनीति18 hours ago

कांग्रेस कार्यकर्ताओं पर लाठीचार्ज को राहुल ने बताया बीजेपी की तानाशाही

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राष्ट्रीय19 hours ago

दिव्यांगों के कार्यक्रम में बाबुल सुप्रियो ने दी ‘टांग तोड़ डालने’ की धमकी

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राजनीति6 days ago

दीनदयाल की मूर्ति के लिए हटाई गई नेहरू की प्रतिमा

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