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हे मन्दबुद्धि हिन्दुओं, ‘आँखें खोलो’, वो लेनिन की मूर्ति नहीं, भारत को तोड़ रहे हैं!

अब भारत, हिन्दू राष्ट्र बनने से महज चन्द क़दम ही दूर है! रामराज्य का आगमन हो चुका है! भारत, सोने की चिड़िया बन चुका है! सभी राष्ट्रभक्त संघियों से कहा गया है कि वो अपने घर के बाहर घी के दीपक जलाकर [मन्दबुद्धि] हिन्दू एकता का प्रदर्शन करें! क्योंकि त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त करना और बामियान में बुद्ध की प्रतिमा पर बम बरसाने में कोई फ़र्क़ नहीं है

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Lenin Statue

ये किसी से छिपा नहीं है कि संघियों ने एक व्यापक साज़िश के ज़रिये देश के मन्दबुद्धि और मूर्ख हिन्दुओं को सफलतापूर्वक मोदीभक्त बना दिया है। इन्हीं लोगों के ध्रुवीकरण के ज़रिये बीजेपी का विस्तार हो रहा है। क्योंकि सिर्फ़ मूर्खों को ही पता नहीं होता कि उनके क्या करने से क्या होता है! समझते नहीं हैं, इसीलिए तो मूर्ख हैं! लेकिन संघियों को पता है कि वो वोट हैं, जनता है, मतान्ध हिन्दू है। इसीलिए मूर्ख हिन्दुओं की बदौलत पैदा होने वाले जनादेश की व्याख्या भी मूर्खतापूर्ण होती है! फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि ऐसी मूर्खताओं से जनता अपने ही देश को तोड़ रही है और उसे इसका पता भी नहीं चल रहा!

दक्षिण त्रिपुरा के बेलोनिया कस्बे में लगी लेनिन की मूर्ति ज़मींदोज़ हो चुकी है। बताते हैं कि महज आधी बोतल शराब ने सारा कारनामा कर दिया। संघियों ने एक बुलडोजर चालक को शराब पिलाकर उसे ‘भारत माता की जय’ का इंज़ेक्शन लगा दिया। फिर हुड़दंग किया और बेचारे ब्लादिमिर लेनिन ज़मीन पर आ गिरे, क्योंकि उनके चहेते चुनाव में पटखनी खाकर सदमे में डूबे थे! अभी बीजेपी की सरकार बनी भी नहीं थी। मुख्यमंत्री का नाम भी तय नहीं हुआ था। माणिक सरकार ही कार्यवाहक मुख्यमंत्री की भूमिका में थे। फिर भी पुलिस-प्रशासन ने घुटने टेक दिये। मानो, सबने मान लिया हो कि अब ऐसा ही होगा, तो होने दो! इस तरह, भगवा संस्कारों ने एक बार फिर साबित किया कि ‘जहाँ मैं जाती हूँ वहीं चले आते हो…’ और ‘दंगा-फ़साद, बीजेपी के साथ!’

यहीं ये सवाल उठना लाज़िमी है कि क्या लेलिन की मूर्ति को ध्वस्त करना, बीजेपी का चुनावी वादा था? क्या मूर्ति ध्वस्त करने से विचार भी ध्वस्त हो जाते हैं? विचार की बड़ी अहमियत है। संघ पर चार बार प्रतिबन्ध लगे। अँग्रेज़ों के राज में लगा था। लेकिन क्या बाँटने और तोड़ने वाली उनकी विचारधारा ख़त्म हुई? मौजूदा दौर के संघियों को भगत सिंह में तो भारत माता का अक्स दिखायी देता है, लेकिन शायद वो नहीं जानते कि भगत सिंह को जब फाँसी के लिए बुलाया गया था तब वो ‘रिवोल्यूशनरी लेनिन’ नामक क़िताब पढ़ रहे थे। और तब उन्होंने बोला था कि “क्या मुझे लेनिन की क़िताब का एक अध्याय भी नहीं ख़त्म करने दोगे? ज़रा एक क्रान्तिकारी की दूसरे क्रान्तिकारी से मुलाक़ात को तो ख़त्म होने दो।”

इसीलिए सवाल ये भी उठता है कि क्या आज लेनिन की प्रतिमा गिराने वाले जल्द ही भगत सिंह की भी प्रतिमाओं को गिराते नज़र आएँगे? वैसे वक़्त आ गया है कि बीजेपी ये भी बताये कि गाँधी, नेहरू, पटेल, बोस, आम्बेडकर, शास्त्री, इन्दिरा और राजीव की मूर्तियाँ कब तक ध्वस्त कर देने का लक्ष्य रखा गया है? साफ़ दिख रहा है कि डार्विन और न्यूटन के बाद जो नया सूर्य-विज्ञान सिद्धान्त प्रतिपादित हुआ है, उसके मुताबिक़ ‘जब लाल का अस्त होने के बाद केसरिया का उदय होता है तो फ़िज़ा में हिंसा और नफ़रत का बोलबाला होता है!’ दरअसल अब ‪यही है, भारत माता की जय, यही है रामराज्य, यही है सुशासन, यही है भय-मुक्त समाज, यही है विकास, यही है भ्रष्टचार-उन्मूलन!

अब मन्दबुद्धि हिन्दुओं के बीच ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि लेनिन का भारतीय इतिहास से कोई वास्ता नहीं है। ऐसा वही मान सकते हैं, जिन्हें भारत में चले कम्युनिस्ट आन्दोलन के इतिहास का पता नहीं है। कम्युनिस्टों ने देश की आज़ादी की लड़ाई और उसके बाद आयी लोकतांत्रिक व्यवस्ता में अपनी भूमिका निभायी थी। जबकि इतिहास गवाह है कि संघियों ने अँग्रेज़ों से माफ़ी माँगकर उन्हें उनका वफ़ादार बने रहने का लिखित में वचन दिया था। संघियों ने आज़ादी के आन्दोलन को नुक़सान पहुँचाने और अँग्रेज़ों की मदद के लिए क्रान्तिकारियों के ख़िलाफ़ मुख़बिरी की थी। फिर भी चलिए, मान लिया कि मन्दबुद्धि हिन्दुओं का इतिहास में हाथ तंग होना स्वाभाविक है।

हमें इतनी अक्ल तो होनी ही चाहिए कि हम ये समझ सकें कि यदि लेनिन की मूर्ति को ढहाना ही वक़्त की माँग है तो लोकतंत्र में इसके लिए भी उपयुक्त प्रक्रिया अपनानी चाहिए। आख़िर, आज़ादी के बाद ढेरों अँग्रेज़ों की मूर्तियों को भी हटाया गया था। लेकिन हिंसक तरीक़े से नहीं, बल्कि शालीनता और मर्यादा से। बहुत सारी सड़कों भवनों वगैरह के नाम पहले भी बदले गये हैं। लेकिन क्या इसके लिए तय प्रक्रिया को नहीं अपनाया गया? क्या भारत को अब नियम-क़ायदों और संविधान से चलने की ज़रूरत नहीं है? क्या भीड़-तंत्र ही देश का नया विधान बन चुका है? ज़रा सोचिए कि इसका अंज़ाम क्या-क्या होने वाला है?

अरे, आप एक नहीं हज़ार मूर्तियाँ तोड़िए, लेनिन की ही नहीं, जिसकी जी में आये उसकी तोड़िए। किसने रोका है! रोक भी कौन सकता है! जनादेश है ना आपके पास! एक प्रक्रिया अपनाइए और फिर जो जी में आये कीजिए! ऐसे सड़क पर घूमते-दौड़ते आप कभी किसी बुत को तोड़ देंगे, किसी मस्जिद को ढहा देंगे, किसी को बीफ़ के नाम पर काट डालेंगे और फिर चाहेंगे कि कोई आपको ‘हिन्दू तालिबान’ भी ना कहे! अरे, कल को कोई हिन्दू दबंग हमारे-आपके घर में घुस आएगा और कहेगा कि ‘निकलो यहाँ से, ये घर मेरा है।’ तो आपको लेनिन की मूर्ति का ज़बरन ढहाना याद आएगा! इसी तरह, कल को कोई दबंग हिन्दू, हमारी-आपकी बहन-बेटी को उठाकर ले जाएगा और कहेगा कि वो उसकी हो गयीं! तब क्या ये कहने का साहस जुटा लेंगे कि ‘चलो, कोई बात नहीं। बेटियाँ तो होती ही पराया धन हैं!’ जिस दिन ऐसा होने लगेगा, उस दिन आपको लेनिन की मूर्ति का ज़बरन ढहाना याद आएगा!

लेनिन की मूर्ति को तोड़ना तो बस आग़ाज़ है…! अब जल्द ही योगी आदित्यनाथ अपनी हिन्दू युवा वाहिनी, बजरंग दल और संघ के उत्पाती तथा राष्ट्रभक्त स्वयंसेवकों से कहेंगे कि फूलपुर और गोरखपुर लोकसभा सीट के उपचुनाव में यदि बीजेपी को जीत प्राप्त होगी तो उत्तर प्रदेश को भी ग़ैर-भगवा बुतों यानी मूर्तियों से विहीन किया जाएगा! आख़िर लेलिन की मूर्ति से शुरू हुआ सिलसिला आगे भी तो बढ़ना है…! अब मूर्ति तोड़ो योजना से नया भारत बनाया जाएगा! जिन युवाओं को पकौड़ा रोज़गार योजना के बावजूद काम नहीं मिल पाया, उनका कल्याण अब मूर्ति तोड़ो योजना के ज़रिये किया जाएगा…! मोदी राज के इसी कार्यक्रम से गाय-गोबर योजना से ख़ाली हुए देशभक्तों का भी कल्याण किया जाएगा!

मूर्ति तोड़ो योजना को उत्तर प्रदेश में कामयाब बनाने के बाद इसे कर्नाटक और फिर केरल में तथा उसके बाद पूरे भारतवर्ष में लागू किया जाएगा! इस योजना की सफलता से ‘अच्छे दिन’ को राष्ट्रव्यापी बनाया जाएगा! इससे नीरव-मेहुल, माल्या-ललित जैसे लोगों की वापसी होगी, बैंकों का एनपीए ख़त्म हो जाएगा, सबके खाते में 15-15 लाख रुपये डाले जाएँगे और विदेश से कालाधन अपने-आप आने लगेगा! महँगाई उस स्तर पर पहुँच जाएगी जहाँ वाजपेयी सरकार के वक़्त थी, पेट्रोल-डीज़ल और रसोई गैस का भाव भी अटल-युग के स्तर पर पहुँच जाएगा, पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को भारत को सौंप दिया जाएगा, अनुच्छेद 270 का वजूद ख़त्म हो जाएगा, कश्मीरी पंडितों की घर वापसी हो जाएगी, समान नागरिक संहिता पूरे देश में लागू होगी, अयोध्या में भव्य और दिव्य राम मन्दिर बन जाएगा!

मुमकिन है कि थोड़े वक़्त बाद नरेन्द्र मोदी ये बोलते नज़र आयें कि “भाईयों-बहनों, श्री श्री रविशंकर ने साफ़ कर दिया है कि भारत में अब संविधान की कोई ज़रूरत नहीं रही, क्योंकि यदि सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला मस्जिद के पक्ष में आया तो देश में सीरिया जैसे हालात हो जाएँगे! बाक़ी, मेरा क्या है… मैं तो झोला उठाऊँगा और नीरव-मेहुल के पास चला जाऊँगा!” अरे, सीरिया और पाकिस्तान तो अगला स्तर है। फ़िलहाल, अफ़ग़ानिस्तान और हिन्दुस्तान में कोई फ़र्क़ नहीं बचा! चार साल में ही भारत को अफ़ग़ानिस्तान बनाने का चमत्कार करने वाले हिन्दू तालिबानियों का संगठन बधाई का पात्र है!

अब भारत, हिन्दू राष्ट्र बनने से महज चन्द क़दम ही दूर है! रामराज्य का आगमन हो चुका है! भारत, सोने की चिड़िया बन चुका है! सभी राष्ट्रभक्त संघियों से कहा गया है कि वो अपने घर के बाहर घी के दीपक जलाकर [मन्दबुद्धि] हिन्दू एकता का प्रदर्शन करें! क्योंकि त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति को ध्वस्त करना और बामियान में बुद्ध की प्रतिमा पर बम बरसाने में कोई फ़र्क़ नहीं है! दोनों राजनीतिक प्रक्रिया का नतीज़ा है! जल्द ही ताजमहल भी ढहाया जाएगा और संसद भवन भी! तमाम अन्य स्मारक भी जिनका ताल्लुक़ मुसलमानों और अँग्रेज़ों से रहा हो!

अब देश में वैचारिक असहमति की अपनी कोई जगह नहीं रहेगी! कोई इस असहमति का सम्मान करने की दुहाई भी नहीं देगा! क़तई नहीं! हर्ग़िज़ नहीं! अब हमें स्वस्थ लोकतंत्र नहीं चाहिए! अनेकता में एकता नहीं चाहिए! परस्पर सम्मान और आपसी भाईचारे में अब हमारा कोई यक़ीन नहीं है! अब हम सिर्फ़ अराजकता के उपासक बनकर रहेंगे! यक़ीनन, 2019 तक हम पाकिस्तान से भी अपना फ़र्क़ मिटा डालेंगे! निश्चित रूप से तब तक ‘नये भारत’ का ख़्वाब साकार हो जाएगा! इसलिए ‘हे, मन्दबुद्धि हिन्दुओं, अब भी वक़्त है ‘आँखें खोलो’, वो लेनिन की मूर्ति नहीं, भारत को तोड़ रहे हैं!’

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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नोटबंदी ने राजनीतिक, आर्थिक उलझनें पैदा की : अरविंद सुबह्मण्यम

“इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

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Arvind Subramanian

नई दिल्ली, 9 दिसम्बर | देश के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुबह्मण्यम ने नोटबंदी और जीडीपी के आंकड़ों में संबंध स्थापित करते हुए कहा है कि नोटबंदी के कारण पैदा हुई उलझन के दोहरे पक्ष रहे हैं। क्या जीडीपी के आंकड़ों पर दिखे इसके प्रभाव ने एक लचीली अर्थव्यवस्था को प्रतिबिंबित किया है, और क्या वृद्धि दर के आंकड़ों ने आधिकारिक डेटा संग्रह प्रक्रिया पर सवाल खड़ा किए हैं।

सुबह्मण्यम इस समय हार्वर्ड केरेडी स्कूल में पढ़ा रहे हैं। वह यहां पेंगुइन द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘ऑफ काउंसिल : द चैलेंजेस ऑफ द मोदी-जेटली इकॉनॉमी’ के विमोचन समारोह में हिस्सा लेने आए थे।

उन्होंने आईएएनएस के साथ एक बातचीत में पुस्तक के एक अध्याय ‘द टू पजल्स ऑफ डीमोनेटाइजेशन-पॉलिटिकल एंड इकॉनॉमिक’ का जिक्र किया।

उन्होंने अपनी पुस्तक में मौजूद दूसरे पजल का भी जिक्र किया, और यह पजल है भारत में पलायन और आर्थिक वृद्धि जैसी समकारी ताकतों के बावजूद क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था में विचलन। उन्होंने कहा कि राज्यों की एक गतिशीलता प्रतिस्पर्धी संघवाद के तर्क के खिलाफ होती है।

उन्होंने कहा, “अपनी नई पुस्तक के जरिए मैं इस पजल (उलझन), नोटबंदी के बाद नकदी में 86 प्रतिशत कमी की बड़ी उलझन, बावजूद इसके अर्थव्यवस्था पर काफी कम असर की तरफ ध्यान खींचने की कोशिश की है।”

सुबह्मण्यम ने कहा, “ये उलझनें खासतौर से इस सच्चाई से पैदा होती हैं कि यह कदम राजनीतिक रूप से क्यों सफल हुआ, और जीडीपी पर इसका इतना कम असर हुआ..क्या यह ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हम जीडीपी को ठीक से माप नहीं रहे हैं, अनौपचारिक क्षेत्र को नहीं माप रहे हैं, या यह अर्थव्यवस्था में मौजूद लचीलेपन को रेखांकित कर रहा है?”

सुबह्मण्यम ने अपनी किताब में लिखा है, “नोटबंदी के पहली छह तिमाहियों में औसत वृद्धि दर आठ प्रतिशत थी और इसके बाद सात तिमाहियों में औसत वृद्धि दर 6.8 प्रतिशत।”

उन्होंने कहा, “इसका प्रमुख कारण भारत की राजनीति और अर्थव्यवस्था की एक व्यापक समझ में छिपा हुआ है, इस बारे में कि लोग वोट कैसे करते हैं।”

उन्होंने केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जीडीपी के बैक सीरीज डेटा को जारी करने के दौरान नीति आयोग की उपस्थिति को लेकर जारी विवाद का जिक्र किया। जीडीपी के इस आंकड़े में आधार वर्ष बदल दिया गया, और पूर्व की संप्रग सरकार के दौरान देश की आर्थिक विकास दर को कम कर दिया गया।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि जीडीपी की गणना एक बहुत ही तकनीकी काम है और तकनीकी विशेषज्ञों को ही यह काम करना चाहिए। जिस संस्थान के पास तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हैं, उसे इसमें शामिल नहीं होना चाहिए।”

सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जब मानक बहुत ऊंचे होंगे और वृद्धि दर फिर भी समान रहेगी तो अर्थशास्त्री स्वाभाविक रूप से सवाल उठाएंगे। यह आंकड़े की विश्वसनीयता को लेकर उतना नहीं है, जितना कि आंकड़े पैदा करने की प्रक्रिया को लेकर और उन संस्थानों को लेकर जिन्होंने इस काम को किया है।”

क्या नोटबंदी पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में वह शामिल थे? सुब्रह्मण्यम ने कहा, “जैसा कि मैंने किताब में कहा है, यह कोई निजी संस्मरण नहीं है..यह गॉसिप लिखने वाले स्तंभकारों का काम है।”

सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच हाल के गतिरोध के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि आरबीआई के स्वायत्तता की हर हाल में रक्षा की जानी चाहिए, क्योंकि संस्थानों के मजबूत रहने से देश को लाभ होगा।

उन्होंने कहा, “मैंने इस बात की खुद वकालत की है कि आरबीआई को एक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए, लेकिन इसके अधिशेष कोष को खर्च के लिए नियमित वित्तपोषण और घाटा वित्तपोषण में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। यह आरबीआई पर छापा मारना जैसा होगा।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

समाज में बदलाव के लिए अपने घर में झांकने की जरूरत : निकिता आनंद

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

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नई दिल्ली, 7 दिसंबर | साल 2003 की मिस इंडिया टाइटल विजेता व अभिनेत्री निकिता आनंद का मानना है कि समाज में कोई भी सुधार लाने के लिए हमें सबसे पहले अपने घर में झांककर देखना चाहिए और घर से सुधार व बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए।

निकिता हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में ‘इंटरनेशनल वीमेन पॉलिटेक्निक’ द्वारा आयोजित ‘मिराकी 2018’ कार्यक्रम का हिस्सा बनीं, जहां उन्होंेने आईएएनएस से बात की।

निकिता से जब पूछा गया कि मॉडलिंग में उनका कैसे आना हुआ तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “मैं आर्मी बैकग्राउंड से हूं मेरे पिता डॉक्टर हैं। 10वीं के बाद या 12 वीं के आसपास मेरी मॉडलिंग शुरू हो गई थी और मैंने काफी लोकल पेजेन्ट्स भी जीते हैं और साथ ही साथ प्रोफेशनल रैंप वॉक भी शुरू कर दिया था और मैं एनआईएफटी की स्टूडेंट थीं तो फैशन डिजाइनिंग भी हो रही थी और फैशन रैंप वॉक भी हो रहा था। मुझे मिस इंडिया के लिए पार्टिसिपेट करने का ख्याल आया और थोड़ा सोचने के बाद हिस्सा ले लिया और फिर मैंने मिस इंडिया का टाइटल जीत लिया।”

टीएलसी के शो ‘ओ माई गोल्ड’ की मेजबानी कर चुकीं निकिता को वास्तविक जीवन में गोल्ड के बजाय प्लेटिनम ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। शो के बारे में उन्होंने कहा, “इस शो के लएि हमने पूरे देशभर में ट्रैवल किया जो दिलचस्प था। इसमें हमने गोल्ड के बारे में बात की थी, क्योंकि भारत में पारंपरिक आभूषण के तौर पर ज्यादातर पीले सोने का इस्तेमाल होता है। शो करके मुझे मुझे दक्षिण भारतीय और बंगाली ज्यूलरी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला, लेकिन मुझे निजी तौर पर गोल्ड के बजाय प्लेटिनम और डायमंड ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। मैं इनेक आभूषण ज्यादातर पहनती हूं।”

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

उन्होंेने कहा, “महिलाओं के साथ उत्पीड़न की बहुत सारी घटनाएं होती हैं। भारत में हर रोज हर क्षण कहीं न कहीं नाइंसाफी होती है। ऐसे लाखों केस होते होंगे जो कि रिपोर्ट नहीं होते हैं। किसी भी क्षेत्र में किसी भी किस्म के इंसान में बदलाव लाने का काम हमेशा शिक्षा से ही होता है। अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं यह मायने रखता है। लोगों की मानसिकता होती है कि पहले बाहर देखो, वहां क्या खराब हो रहा है। लेकिन अपने घर में नहीं झांककर देखते कि उनके घर में क्या हो रहा है।”

निकिता ने कहा कि बच्चा स्कूल से ज्यादा वक्त घर में बिताता है, तो घर में अच्छे संस्कार व माहौल देने की कोशिश करनी चाहिए, तभी वह अच्छा नागरिक बन सकेगा। समाज में सुधार और बदलाव लाने की कोशिश घर से की जानी चाहिए। इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाने और समाज में बदलाव लाने के मानसिकता में बदलाव लाना बेहद जरूरी है।

उनका मानना है कि ‘हैशटैगमीटू’ मूवमेंट को आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे और महिलाओं को भी आगे आकर अपनी दास्तां बयां करने का प्रोत्साहन मिले।

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इस मूवमेंट को आगे बढ़ाना चाहिए, आवाज तो हर किसी की है तो क्यों एक हिस्से को बोलने दिया जाए और एक हिस्से को दबाया जाए वो नहीं होना चाहिए। जब हम समानता की और सशक्तिकरण की बात करते हैं तो इसका मतलब यही है न कि सबको समान अधिकार मिले। अगर किसी और के आगे आने से और उसकी कहानी आगे आने से किसी और को प्रोत्साहन मिलता है तो ये एक अच्छी बात है। किसी भी महिला के लिए अपने हुए दर्दनाक वाकये को याद करना मुश्किल होता है। उसकी भावना को समझने की कोशिश करनी चाहिए।”

मॉडलिंग में आने की ख्वाहिश रखने वाली लड़कियों के लिए दिए संदेश में उन्होंने कहा, “सबसे पहले आपको तय करना चाहिए कि आपको कहां जाना है, क्योंकि यह आसान लाइन नहीं है, आपके पास जरूरी क्राइटेरिया होनी चाहिए जैसे रैंप वॉक के लिए एक परफेक्ट बॉडी स्ट्रक्चर और हाइट होनी चाहिए। अगर, आपको प्रिंट मॉडलिंग के लिए जाना है तो फिर आपके पास वैसा चेहरा-मोहरा, भाव-भंगिमा होनी चाहिए, जिसे कैमरा अच्छे से कैप्चर कर सकें। आप किसी भी फील्ड को बस इसलिए नहीं चुने कि वो आपको आकर्षित कर रहा है, बल्कि अच्छे से आकलन कर लें कि आप उसके लायक है या नहीं।”

निकिता ने ‘लाइफ में कभी-कभी’ और ‘फोर टू का वन’ जैसी फिल्मों में भी काम किया है। लेकिन अब वह फिल्में नहीं कर रही हैं। फिल्मों से दूरी बनाने के बारे में उन्होंने कहा, “मैंने फिल्मों में काम किया है, लेकिन मुझे टेलीविजन प्रेजेंट करना या फिर लाइव शो करना ज्यादा पसंद है। आजकल मैं गायन का भी प्रशिक्षण ले रही हूं आगे जाकर मैं गायन में भी परफार्मेस दूंगी। अगर मैं टीवी की बात करूं तो मैंने लाइफस्टाइल के अलावा स्पोर्ट्स शो भी बहुत किया है, क्रिकेट पर भी बहुत शो किया है। मुझे टीवी बहुत पसंद आता है, क्योंकि निजी जिंदगी में मैं बहुत आर्गनाइज हूं और यही चीज टीवी में भी है।”

–आईएएनएस

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सुबोध के बलिदान ने बुलन्दशहर को एक और मुज़फ़्फ़रनगर बनने से बचा लिया!

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Inspector Subodh Kumar

अब ये साफ़ हो चुका है कि संघ की औलादों यानी हिन्दू युवा वाहिनी, बजरंगदल, वीएचपी, एबीवीपी और बीजेपी की असली मंशा बुलन्दशहर में मुज़फ़्फ़रनगर को दोहराने की थी! दरअसल, इस भगवा ख़ानदान के तन-बदन में उस वक़्त आग लग गयी जब इसने देखा कि आलमी तबलीगी इज्तिमा (विश्व धार्मिक समागम) के बहाने लाखों मुसलमान बुलन्दशहर में इक्कठा हुए हैं। इज्तिमा का वक़्त 1 से 3 दिसम्बर का था और साज़िश ये रची गयी कि आख़िरी दिन जब मुसलमान अपने घरों को लौट रहे होंगे तब उनसे भिड़न्त कर ली जाए। वो भी इतनी ज़बरदस्त कि मुज़फ़्फ़रनगर के सूरमा  संगीत सोम और संजीव बालियान जैसे दंगा-पुरुष भी चुल्लू भर पानी ढूँढ़ना शुरू कर दें!

पुलिस की एफआईआर में नामजद अभियुक्तों के आकाओं ने बुलन्दशहर ज़िले में मुस्लिमों के धार्मिक आयोजन के बहाने दंगा करवाने का पुख़्ता इन्तज़ाम किया था। लेकिन इज्तिमा में जुटी भीड़ इतनी भारी थी कि दंगाई गिरोह वहाँ घुसकर उपद्रव करने के लिए तैयार नहीं हुआ। लेकिन दंगाई गिरोह मौके को भी हाथ से निकलने नहीं देना चाहते थे। राजस्थान और तेलंगाना में बीजेपी के पक्ष में हवा पलटने और 2019 की ज़रूरतों को देखते हुए अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर दंगाई को कोई ना कोई कारनामा तो करना ही था।

bulandshahr violence

यहीं से दंगाइयों का ‘प्लान बी’ क्रियान्वित हुआ। गाय या सुअर काटकर दंगा कराना बहुत आसान होता है। भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ के मुताबिक़, गाय और सुअर को उम्दा दंगा सामग्री के रूप में उस दौर में देखा गया था, जब देश आज़ाद हुआ था। 70 साल में भी दंगा का ये तत्व बिल्कुल नहीं बदला। गाय ने ही अख़लाक के रूप में अपनी ताक़त की पहचान उस वक़्त भी करवाई थी जब मोदी सरकार सत्तासीन हुई थी। बुलन्दशहर में भी हिन्दुओं ने गाय काटी और उसके टुकड़ों को खेत में लगे गन्नों पर लटका दिया। ताकि उन्हें दूर से भी देखा जा सके। लेकिन मूर्खों से एक ग़लती हो गयी कि गाय को काटा कहीं और, लेकिन उसकी नुमाइश कहीं और की गयी।

इससे पहले क़रीब 500 दंगाई युवाओं के लिए लाठी-डंडे और पत्थर वग़ैरह जुटाया गया। प्रशासन को इसकी पूरी भनक थी। बेसिक शिक्षा अधिकारी ने ज़िले के स्कूलों को 11 बजे के आसपास फ़ोन किया कि जल्द से जल्द बच्चों की छुट्टी कर दी जाए तथा दूर से आने वाले अध्यापकों को भी निकल लेने के लिए कह दिया जाए। शायद, दिवंगत इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह को भी इसकी भनक लग चुकी थी। इसीलिए वो नहीं चाहते थे कि जमातियों के लौटने वाले मुख्य मार्ग पर कोई जाम लगे। जबकि दंगाईयों का इरादा गोकशी के नाम पर इज्तिमा से लौटने वाले मुसलमानों से ज़ोरदार भिड़न्त करने का था। दंगाईयों का नेतृत्व बजरंग दल, वीएचपी और एबीवीपी के छुटभैये नेताओं के हवाले था। एक स्थानीय चैनल को भी आग में घी डालने का ज़िम्मा मिला।

bulandshahar_violence

लेकिन इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के घटनास्थल पर पहुँच जाने से दंगाईयों की सारी प्लानिंग धरी की धरी रह गयी। सुबोध ने जमातियों के लौटने के रास्ते पर लगा जाम खुलवाने के लिए पुलिस बल का प्रयोग किया। इसीलिए दंगाईयों को मुसलमानों से भिड़ने के नाम पर इकट्ठा किये गये लाठी-डंडों, पत्थर, बल्लम वग़ैहर का इस्तेमाल सुबोध के पुलिस दस्ते के ख़िलाफ़ करना पड़ा। ये दंगा नहीं कर पाने का आक्रोश था, जो फूटा पुलिस दल और ख़ासकर इंस्पेक्टर सुबोध सिंह पर। पुलिस के निशाना बनने की वजह से दंगाईयों के मंसूबों पर पानी फिर गया। लक्ष्य था बुलन्दशहर से शुरू करके पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हिंसा की आग में झोंक देना, लेकिन इंस्पेक्टर सुबोध के बलिदान की वजह से ये सम्भव नहीं हो पाया।

दंगे के लिए इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह के इलाके को भी इसलिए चुना गया क्योंकि वही अख़लाक़ हत्याकांड के जाँच अधिकारी थे और उनके तौर-तरीक़े कट्टरपन्थी संघियों को रास नहीं आ रहे थे। ये वही सुबोध थे, जिन्होंने अख़लाक़ की हत्या के बाद संगीत सोम को प्रभावित इलाके में नहीं जाने दिया था। इसी वजह से सुबोध का तबादला करवाया गया था। यही वो सबसे अहम वजह है जिसके आधार पर शहीद सुबोध सिंह की पत्नी और बहन उनकी हत्या को सुनियोजित और पुलिस की साज़िश बताया है। सारे घटनाक्रम से साफ़ है कि सुबोध ने अपने फ़र्ज़ और इंसानियत की ख़ातिर अपनी जान की क़ुर्बानी देकर न जाने कितने लोगों की जानें बचा लीं! इसके बावजूद, लगता नहीं कि योगी-मोदी सरकार के रहते सुबोध को कभी इन्साफ़ मिल पाएगा!

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मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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फूलवालों की सैर : सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक

Bindeshwar Pathak
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‘होप’ दिलाएगा मैन्युअल सफाई की समस्या से छुटकारा : बिंदेश्वर पाठक

Shivraj Ajay
चुनाव4 weeks ago

मप्र में शिवराज के दांव पर कांग्रेस ने फेंका जाल

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ओपिनियन2 weeks ago

महिलाओं का आत्मनिर्भर बनना बेहद जरूरी : सारा पायलट

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किशमिश को पानी में भिगोकर खाने से होते हैं ये फायदे…

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लाइफस्टाइल3 weeks ago

ये उपाय सर्वाइकल को कर देगा छूमंतर

Tigress Avni
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भारत का सबसे भारी संचार उपग्रह कक्षा में स्थापित

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रजनीकांत की फिल्म ‘2.0’ का पहला गाना ‘तू ही रे’ रिलीज

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