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सुप्रीम कोर्ट को ही बचानी होगी राज्यपाल की गरिमा

यदि सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शिता दिखाते हुए विश्वास मत हासिल करने के लिए 19 मई का वक़्त तय नहीं किया होता तो विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की रोकथाम बेहद मुश्किल होती। विश्वास मत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की शर्त ने भी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने में बेहद अहम भूमिका निभायी।

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यदि राज्यपाल ने नियमों का पालन किया होता तो देश को तमाम नागवार नज़ारों से बचाया जा सकता था। इसमें कोई शक़ नहीं था कि चुनाव बाद बने काँग्रेस-जनता दल सेक्यूलर के पास बहुमत था। बीजेपी के 104 विधायकों की संख्या को तिकड़मबाज़ी के बग़ैर बढ़ाया नहीं जा सकता था। ऐसे हालात में संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल को अपने पद की शपथ के मुताबिक़, लोकतंत्र का संरक्षण करना चाहिए, लेकिन उन्होंने ताल ठोंककर पक्षपातपूर्ण तरीका अपनाया।

आइये अब ये समझें कि राज्यपाल के संवैधानिक लक्ष्मण रेखा लाँघने का नतीज़ा क्या होता है? पहली बात, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने राज्यपाल को अपने ही लम्बे हाथों की तरह इस्तेमाल किया, फिर चाहे वो गोवा हो या मणिपुर और मेघालय या अरूणाचल और उत्तराखंड। राज्यपालों को वही धुन बजानी पड़ी जिसे दिल्ली से कहा गया। इससे राज्यपाल की संस्था ही सन्देह के घेरे में आ गयी। दूसरी और शायद ज़्यादा गम्भीर बात ये है कि ऐसे ‘खेल’ का आम आदमी पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जनता चुनावी राजनीति के स्वभाव को तो ख़ूब समझती है। लेकिन जब वो संवैधानिक संस्थाओं के सतत पतन को देखती है तो उसका इन संस्थाओं और वहाँ बैठे लोगों पर से ऐतबार उठ जाता है। ये बेहद चिन्ताजनक दशा है।

तीसरा पहलू है कि जिस तरह से 17 मई को राज्यपाल ने बीएस येदियुरप्पा को शपथ दिलाने का फ़ैसला लिया और उन्हें विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का वक़्त दिया। राज्यपाल ने 16 मई की देर शाम को निर्णय लिया कि अगले दिन सुबह 9 बजे ही शपथ समारोह होगा। राज्यपाल को पता था कि उनके ग़लत फ़ैसले को काँग्रेस-जेडीएस अदालत में चुनौती ज़रूर देंगे। लिहाज़ा, अदालतों के खुलने से पहले ही शपथ दिलवाने की सोची गयी। लेकिन सौभाग्यवश, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने मामले को तत्काल सुनवाई के लायक माना। इससे काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन को लगा कि जंग को अब भी जीता जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने लम्बी बहस सुनने के बाद तय किया कि वो शपथ ग्रहण के वक़्त में दख़ल नहीं देगा। लेकिन उसे लगा कि विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने के लिए दी गयी 15 दिन की मोहलत पूरी तरह से नाकाफ़ी है। क्योंकि इस मियाद का इस्तेमाल सिर्फ़ विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए होना था। वर्ना, चुनाव आयोग की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक़, काँग्रेस-जेडीएस के विधायकों की संख्या 116 है। एक निर्दलीय के समर्थन के जुड़ने से ये संख्या 117 तक पहुँचती है।

साफ़ है कि येदियुरप्पा को शपथ दिलाने का फ़ैसला राज्यपाल ने उन्हें हासिल संख्या-बल के आधार पर नहीं लिया गया था। तब अदालत को ये देखना चाहिए था कि जब गठबन्धन के पास स्पष्ट बहुमत है तो फिर येदियुरप्पा को प्राथमिकता क्यों दी गयी? लेकिन अदालत के सामने वो ख़त नहीं था जो राज्यपाल की ओर से 15 मई को येदियुरप्पा को शपथ लेने के लिए आमंत्रित करने के लिए भेजा गया था। अदालत में कोई ऐसे सबूत नहीं पेश किया गया, जिससे लगे कि येदियुरप्पा को गठबन्धन के किसी भी विधायक का समर्थन हासिल है। ऐसी दशा में राज्यपाल को येदियुरप्पा को न्योता देने की बजाय एच डी कुमारास्वामी को आमंत्रित करना चाहिए था, क्योंकि काँग्रेस ने 15 मई को ही राज्यपाल को लिखकर दे चुकी थी कि वो जेडीएस को उसका समर्थन है।

15 मई की शाम को ही जेडीएस और काँग्रेस ने अपने दो विधायकों के सिवाय सभी विधायकों के दस्तख़त के साथ राज्यपाल को ख़त लिखा था कि वो कुमारास्वामी के नेतृत्व का समर्थन करते हैं। उस ख़तों की प्रतिलिपि सुप्रीम कोर्ट के सामने थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने ये कहकर येदियुरप्पा की शपथ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया कि उसके सामने राज्यपाल की चिट्ठी नहीं है और याचिका के पक्षकार के रूप में वो सामने मौजूद भी नहीं हैं। लिहाज़ा, राज्यपाल की ग़ैरमौजूदगी में वो शपथ ग्रहण को नहीं रोक सकता। अब ये इतिहास बन चुका है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसा कोई आदेश दे सकता था या नहीं।

लेकिन येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण को नहीं रोकने के सुप्रीम कोर्ट के रुख़ का बहुत गम्भीर और दूरगामी नतीज़े होंगे। राज्यपाल के आदेश के प्रधानमंत्री के उस बयान के आलोक में देखना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि “सरकार तो हमारी ही बनेगी”। ये बयान इस बात का साफ़ ऐलान था कि राज्यपाल को सही या ग़लत किसी भी तरह से प्रधानमंत्री की बात को सही साबित करने का सूत्रधार बनना होगा और कर्नाटक में बीजेपी की ही सरकार बनवानी होगी। आलाक़मान की इस मंशा को पूरा करने के लिए अमित शाह ने पूरी ताक़त झोंक दी, बेल्लारी बन्धुओं को झोंक दिया गया, जिन्होंने काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन के दो विधायकों को बन्धक भी बना लिया। ज़ाहिर है ये सब कुछ बहुमत का निर्माण करने के लिए हो रहा था।

कल्पना कीजिए कि ऐसे हथकंडों से यदि बीजेपी को बहुमत हासिल हो जाता तो फिर क्या होता? सुप्रीम कोर्ट उस सरकार को वैध मान लेती जिसका जन्म कुकर्मों से हुआ हो और जिसने क़ानून की पोशाक ओढ़ रखी हो। ऐसी सरकार को अदालत में असंवैधानिक साबित करना असम्भव होता। भ्रष्टाचार, ग़ैरक़ानूनी और अनीतिपूर्ण, इन सभी की जीत का जश्न होता और सुप्रीम कोर्ट ऐसी पतित सरकार को भी सत्ता से बाहर नहीं कर पाती। सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण को रोकने से परहेज़ करके बहुमत के निर्माण का रास्ता खुला रखा। हमें काँग्रेस और जनता दल सेक्यूलर को शाबाशी देनी चाहिए कि उन्होंने अपने विधायकों को एकत्रित रखा। यहाँ तक कि जिन दो विधायकों को बन्धन बनाकर रखा गया था, उनकी भी ऐन वक़्त पर रिहा करवाने में सफलता मिल गयी।

यदि सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शिता दिखाते हुए विश्वास मत हासिल करने के लिए 19 मई का वक़्त तय नहीं किया होता तो विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की रोकथाम बेहद मुश्किल होती। विश्वास मत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की शर्त ने भी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने में बेहद अहम भूमिका निभायी।

पूरे प्रसंग के दो सबक हैं। पहला, राज्यपाल की संस्था को सियासी दाँवपेंच से सुरक्षित रखना बेहद ज़रूरी है। दूसरा, सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षित है कि वो ऐसे हालात से निपटने और राज्यपाल की भूमिका के बारे में स्पष्ट फ़ैसला दे। ताकि, भविष्य में किसी और राज्य में जनता को संवैधानिक मूल्यों की धज़्ज़ियों को उड़ते हुए नहीं देखना पड़े। ऐसे दौर में, जब राजनीतिक सुचिता पतनशील हो और संवैधानिक मूल्यों पर संकट गहराया हो, तब अदालतों से अपेक्षित है कि वो सबसे सजग रहें। आज यही सबसे महत्वपूर्ण है।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

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बिहार : समस्तीपुर में डेयरी संयंत्र, भोजपुर में पशु आहार कारखाना लगेंगे

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मोतिहारी, 19 जनवरी | बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यहां शनिवार को कहा कि अगले वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड (कम्फेड) द्वारा समस्तीपुर में पांच लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता के डेयरी संयंत्र और भोजपुर के बिहिया में 300 मीट्रिक टन प्रतिदिन उत्पादन क्षमता के पशु आहार कारखाने लगाए जाएंगे। पूर्वी चंपारण जिले के मठबनवारी में 11 महीने के रिकार्ड समय में बन कर तैयार मदर डेयरी के प्रति दिन एक लाख लीटर क्षमता के दूध प्रसंस्करण संयंत्र का शनिवार को उद्घाटन करने के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री ने कहा कि इस संयंत्र द्वारा मार्च से 1250 गांवों के 50 हजार किसानों से प्रतिदिन 2 लाख लीटर दूध का संग्रह किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि अब सुधा व मदर डेयरी, दोनों मिलकर किसानों से दूध खरीदेगी।

मोदी ने कहा, “वर्तमान वित्तीय वर्ष में सुपौल में एक लाख लीटर क्षमता का डेयरी संयंत्र, समस्तीपुर व हाजीपुर में 30-30 मीट्रिक टन के दूध पाउडर संयंत्र, पटना व नालंदा में 20-20 हजार किलो दैनिक क्षमता के आइसक्रीम प्लांट स्थापित किए जाने के साथ ही पटना में पूर्व से स्थापित 100 मीट्रिक टन क्षमता के पशु आहार फैक्ट्री को 150 मीट्रिक टन में विस्तारित और 150 मीट्रिक टन की नई इकाई स्थापित की गई है।”

डेयरी स्थापित करने वाले किसानों को सरकार द्वारा 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 66 प्रतिशत अनुदान दिए जाने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी केवल धान, गेहूं की खेती करने से दोगुनी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए समग्र रूप से वानिकी, डेयरी, मछली और मुर्गी पालन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि फिलहाल बिहार में प्रतिदिन 18 लाख किलो दूध का संग्रह व 14 लाख लीटर की मार्केटिंग सुधा डेयरी द्वारा की जा रही है।

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, बिहार सरकार में मंत्री प्रमोद कुमार, राणा रणधीर सिंह समेत कई अधिकारी और नेता मौजूद थे।

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मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

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mukesh ambani

गांधीनगर, 18 जनवरी | औपनिवेशीकरण के खिलाफ महात्मा गांधी के अभियान को याद करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने की गुजारिश की और कहा कि भारतीय डेटा भारतीयों के ‘स्वामित्व और नियंत्रण’ में होने चाहिए। उन्होंने यहां वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2019 में कहा, “हम अपने राष्ट्रपिता को उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधी जी ने राजनीतिक औपनिवेशीकरण के खिलाफ आन्दोलन चलाया था.. आज हम सब मिलकर डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ नया अभियान शुरू कर रहे हैं।” इस समिट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

अंबानी ने कहा कि डेटा नई दुनिया में ‘नया तेल और धन’ है। उन्होंने कहा कि भारत के डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और कॉर्पोरेट्स द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, खासतौर से वैश्विक कॉर्पोरेशंस द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री, मैं आश्वस्त हूं कि आप अपने डिजिटल इंडिया मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में इसे भी शामिल करेंगे।”

उन्होंने कहा, “भारत को इस डेटा संचालित क्रांति में सफल होने के लिए, हमें भारतीय डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण वापस भारत भेजना होगा.. दूसरे शब्दों में भारतीय संपत्ति वापस लौटानी होगी। भारतीय डेटा को भरतीयों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि वैश्विक कॉर्पोरेट्स द्वारा। डेटा का नियंत्रण हमें अपने हाथों में लेने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है।”

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर में कहा था कि सभी डिजिटल भुगतान कंपनियों जैसे गूगल प्ले, वाट्सएप और अन्य को अपने भारतीय कारोबार का डेटा स्थानीय तौर पर स्टोर करना चाहिए।

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बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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