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सुप्रीम कोर्ट को ही बचानी होगी राज्यपाल की गरिमा

यदि सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शिता दिखाते हुए विश्वास मत हासिल करने के लिए 19 मई का वक़्त तय नहीं किया होता तो विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की रोकथाम बेहद मुश्किल होती। विश्वास मत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की शर्त ने भी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने में बेहद अहम भूमिका निभायी।

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यदि राज्यपाल ने नियमों का पालन किया होता तो देश को तमाम नागवार नज़ारों से बचाया जा सकता था। इसमें कोई शक़ नहीं था कि चुनाव बाद बने काँग्रेस-जनता दल सेक्यूलर के पास बहुमत था। बीजेपी के 104 विधायकों की संख्या को तिकड़मबाज़ी के बग़ैर बढ़ाया नहीं जा सकता था। ऐसे हालात में संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल को अपने पद की शपथ के मुताबिक़, लोकतंत्र का संरक्षण करना चाहिए, लेकिन उन्होंने ताल ठोंककर पक्षपातपूर्ण तरीका अपनाया।

आइये अब ये समझें कि राज्यपाल के संवैधानिक लक्ष्मण रेखा लाँघने का नतीज़ा क्या होता है? पहली बात, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने राज्यपाल को अपने ही लम्बे हाथों की तरह इस्तेमाल किया, फिर चाहे वो गोवा हो या मणिपुर और मेघालय या अरूणाचल और उत्तराखंड। राज्यपालों को वही धुन बजानी पड़ी जिसे दिल्ली से कहा गया। इससे राज्यपाल की संस्था ही सन्देह के घेरे में आ गयी। दूसरी और शायद ज़्यादा गम्भीर बात ये है कि ऐसे ‘खेल’ का आम आदमी पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जनता चुनावी राजनीति के स्वभाव को तो ख़ूब समझती है। लेकिन जब वो संवैधानिक संस्थाओं के सतत पतन को देखती है तो उसका इन संस्थाओं और वहाँ बैठे लोगों पर से ऐतबार उठ जाता है। ये बेहद चिन्ताजनक दशा है।

तीसरा पहलू है कि जिस तरह से 17 मई को राज्यपाल ने बीएस येदियुरप्पा को शपथ दिलाने का फ़ैसला लिया और उन्हें विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का वक़्त दिया। राज्यपाल ने 16 मई की देर शाम को निर्णय लिया कि अगले दिन सुबह 9 बजे ही शपथ समारोह होगा। राज्यपाल को पता था कि उनके ग़लत फ़ैसले को काँग्रेस-जेडीएस अदालत में चुनौती ज़रूर देंगे। लिहाज़ा, अदालतों के खुलने से पहले ही शपथ दिलवाने की सोची गयी। लेकिन सौभाग्यवश, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने मामले को तत्काल सुनवाई के लायक माना। इससे काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन को लगा कि जंग को अब भी जीता जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने लम्बी बहस सुनने के बाद तय किया कि वो शपथ ग्रहण के वक़्त में दख़ल नहीं देगा। लेकिन उसे लगा कि विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने के लिए दी गयी 15 दिन की मोहलत पूरी तरह से नाकाफ़ी है। क्योंकि इस मियाद का इस्तेमाल सिर्फ़ विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए होना था। वर्ना, चुनाव आयोग की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक़, काँग्रेस-जेडीएस के विधायकों की संख्या 116 है। एक निर्दलीय के समर्थन के जुड़ने से ये संख्या 117 तक पहुँचती है।

साफ़ है कि येदियुरप्पा को शपथ दिलाने का फ़ैसला राज्यपाल ने उन्हें हासिल संख्या-बल के आधार पर नहीं लिया गया था। तब अदालत को ये देखना चाहिए था कि जब गठबन्धन के पास स्पष्ट बहुमत है तो फिर येदियुरप्पा को प्राथमिकता क्यों दी गयी? लेकिन अदालत के सामने वो ख़त नहीं था जो राज्यपाल की ओर से 15 मई को येदियुरप्पा को शपथ लेने के लिए आमंत्रित करने के लिए भेजा गया था। अदालत में कोई ऐसे सबूत नहीं पेश किया गया, जिससे लगे कि येदियुरप्पा को गठबन्धन के किसी भी विधायक का समर्थन हासिल है। ऐसी दशा में राज्यपाल को येदियुरप्पा को न्योता देने की बजाय एच डी कुमारास्वामी को आमंत्रित करना चाहिए था, क्योंकि काँग्रेस ने 15 मई को ही राज्यपाल को लिखकर दे चुकी थी कि वो जेडीएस को उसका समर्थन है।

15 मई की शाम को ही जेडीएस और काँग्रेस ने अपने दो विधायकों के सिवाय सभी विधायकों के दस्तख़त के साथ राज्यपाल को ख़त लिखा था कि वो कुमारास्वामी के नेतृत्व का समर्थन करते हैं। उस ख़तों की प्रतिलिपि सुप्रीम कोर्ट के सामने थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने ये कहकर येदियुरप्पा की शपथ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया कि उसके सामने राज्यपाल की चिट्ठी नहीं है और याचिका के पक्षकार के रूप में वो सामने मौजूद भी नहीं हैं। लिहाज़ा, राज्यपाल की ग़ैरमौजूदगी में वो शपथ ग्रहण को नहीं रोक सकता। अब ये इतिहास बन चुका है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसा कोई आदेश दे सकता था या नहीं।

लेकिन येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण को नहीं रोकने के सुप्रीम कोर्ट के रुख़ का बहुत गम्भीर और दूरगामी नतीज़े होंगे। राज्यपाल के आदेश के प्रधानमंत्री के उस बयान के आलोक में देखना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि “सरकार तो हमारी ही बनेगी”। ये बयान इस बात का साफ़ ऐलान था कि राज्यपाल को सही या ग़लत किसी भी तरह से प्रधानमंत्री की बात को सही साबित करने का सूत्रधार बनना होगा और कर्नाटक में बीजेपी की ही सरकार बनवानी होगी। आलाक़मान की इस मंशा को पूरा करने के लिए अमित शाह ने पूरी ताक़त झोंक दी, बेल्लारी बन्धुओं को झोंक दिया गया, जिन्होंने काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन के दो विधायकों को बन्धक भी बना लिया। ज़ाहिर है ये सब कुछ बहुमत का निर्माण करने के लिए हो रहा था।

कल्पना कीजिए कि ऐसे हथकंडों से यदि बीजेपी को बहुमत हासिल हो जाता तो फिर क्या होता? सुप्रीम कोर्ट उस सरकार को वैध मान लेती जिसका जन्म कुकर्मों से हुआ हो और जिसने क़ानून की पोशाक ओढ़ रखी हो। ऐसी सरकार को अदालत में असंवैधानिक साबित करना असम्भव होता। भ्रष्टाचार, ग़ैरक़ानूनी और अनीतिपूर्ण, इन सभी की जीत का जश्न होता और सुप्रीम कोर्ट ऐसी पतित सरकार को भी सत्ता से बाहर नहीं कर पाती। सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण को रोकने से परहेज़ करके बहुमत के निर्माण का रास्ता खुला रखा। हमें काँग्रेस और जनता दल सेक्यूलर को शाबाशी देनी चाहिए कि उन्होंने अपने विधायकों को एकत्रित रखा। यहाँ तक कि जिन दो विधायकों को बन्धन बनाकर रखा गया था, उनकी भी ऐन वक़्त पर रिहा करवाने में सफलता मिल गयी।

यदि सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शिता दिखाते हुए विश्वास मत हासिल करने के लिए 19 मई का वक़्त तय नहीं किया होता तो विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की रोकथाम बेहद मुश्किल होती। विश्वास मत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की शर्त ने भी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने में बेहद अहम भूमिका निभायी।

पूरे प्रसंग के दो सबक हैं। पहला, राज्यपाल की संस्था को सियासी दाँवपेंच से सुरक्षित रखना बेहद ज़रूरी है। दूसरा, सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षित है कि वो ऐसे हालात से निपटने और राज्यपाल की भूमिका के बारे में स्पष्ट फ़ैसला दे। ताकि, भविष्य में किसी और राज्य में जनता को संवैधानिक मूल्यों की धज़्ज़ियों को उड़ते हुए नहीं देखना पड़े। ऐसे दौर में, जब राजनीतिक सुचिता पतनशील हो और संवैधानिक मूल्यों पर संकट गहराया हो, तब अदालतों से अपेक्षित है कि वो सबसे सजग रहें। आज यही सबसे महत्वपूर्ण है।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

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मानो या न मानो, MeToo के नाम पर एमजे अकबर इस्तीफ़ा नहीं देने वाले!

दस महिला पत्रकारों ने उनके हवसी स्वभाव की परतें उधेड़ दी हैं। मुमकिन है कि फ़ेहरिस्त और लम्बी होती चली जाए। इसीलिए चाल-चरित्र-चेहरा तथा भारतीय संस्कारों के सबसे प्रखर संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सियासी धड़े बीजेपी ने प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरीक़े से साफ़ कर दिया है कि एमजे अकबर का बाल बाँका तक नहीं होने वाला।

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#MeToo यानी दुनिया भर की उन महिलाओं की आवाज़ जिन्होंने अपनी ज़िन्दगी में कभी ना कभी यौन-उत्पीड़न का दंश झेला हो और वो भी किसी नामी-गिरामी या जानी-पहचानी हस्ती की हवाले से! जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जो #MeToo से अछूता हो! भारत ही नहीं, सारी दुनिया के लिए यही हक़ीक़त है। वो बात अलग है, तमाम पतित करतूतों की तरह, #MeToo के तहत बेनक़ाब होने वाले लोग, भी ख़ुद को पाक-साफ़ बताने में लगे हैं! ये स्वाभाविक भी है, क्योंकि क्या कभी किसी ‘शरीफ़’ आदमी ने ये क़बूल किया है कि उसके चोले में कैसी हवस भरी हुई है!

#MeToo मुद्दे ने अभी तक देश में जैसे-जैसे रूप दिखाये हैं, उससे किसी ग़ुनहगार को फ़ौज़दारी क़ानूनों के तहत, सलाखों के पीछे पहुँचा पाना तक़रीबन नामुमकिन है। क्योंकि क़ानून को सबूत चाहिए, जो ऐसे मामलों में अक्सर होते नहीं या जो कुछ सबूत होते भी हैं वो भी किसी आरोपी को अदालत में अपराधी साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हो पाते। लेकिन इस #MeToo से हवसी मर्दों की छवि को तकड़ी चोट ज़रूर पहुँचायी जा सकती है। वो बात अलग है कि ऐसे मर्द ख़ुद को धर्मात्मा साबित करने के लिए पीड़ितों को अदालतों में घसीटेंगे और मुक़दमों का अम्बार झेल हमारी न्यायपालिका पर कुछ बोझ और बढ़ जाएगा। अब यदि हम ये मान लें कि सामाजिक व्यवस्थाएँ, क़ानूनों से कम और लोकलाज़ की धारणाओं से ज़्यादा प्रभावित होती हैं। तो #MeToo का तीर एक बार क़मान से निकलने के बाद, न तो बेकार साबित होने वाला है और ही खाली हाथ रहने वाला है! ये अपने सामान्य लक्ष्य को ज़रूर हासिल करेगा!

ये लोकलाज़ ही है जिसके आधार पर केन्द्रीय विदेश राज्यमंत्री एमजे अकबर की ज़िन्दगी के ‘अच्छे दिन’ अब ख़त्म हो लिये। उनके ख़राब दिनों वाली घड़ी बहुत तेज़ी से भाग रही है। दस महिला पत्रकारों ने उनके हवसी स्वभाव की परतें उधेड़ दी हैं। मुमकिन है कि फ़ेहरिस्त और लम्बी होती चली जाए। इसीलिए चाल-चरित्र-चेहरा तथा भारतीय संस्कारों के सबसे प्रखर संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके सियासी धड़े बीजेपी ने प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों तरीक़े से साफ़ कर दिया है कि एमजे अकबर का बाल बाँका तक नहीं होने वाला। उन पर आलाक़मान का आशीर्वाद पहले की तरह ही बरसता रहेगा!

बीजेपी के तमाम बड़े नेताओं और केन्द्रीय मंत्रियों ने तय कर लिया है कि अकबर का इस्तीफ़ा माँगने वालों के आगे ‘56 इंची गंगा पुत्र’ झुकने वाले नहीं हैं! क्योंकि पार्टी को अच्छी तरह पता है कि यदि एक बार झुके तो गये काम से! ‘इस्तीफ़ों के सर्ज़िकल हमले’ वाली नौबत आ जाएगी! कितने नेताओं के इस्तीफ़े होंगे? मुमकिन है कि इस चुनावी मौसम में बहुत सारी नारियाँ उन नेताओं को ब्लैकमेल भी करें कि ‘टिकट नहीं दिया तो #MeToo कर दूँगी!’

राजनीतिक दलों में #MeToo पीड़िताओं की भरमार है। लेकिन संघर्ष को मुकाम पर पहुँचाना बहुत मुश्किल होता है। याद है ना कि नारायण दत्त तिवारी का बेटा और बीवी बनने के लिए रोहित और उज्ज्वला शर्मा को कितने पापड़ बेलने पड़े थे। वो तो ग़नीमत थी कि वैज्ञानिकों ने डीएनए तकनीक विकसित कर दी, वर्ना ईश्वर भी न्याय नहीं दिला पाते! जब डीएनए नहीं था, तब क्या किसी को कभी न्याय मिला? बेचारी कुन्ती को भी कर्ण को त्यागना पड़ा था!

मानव इतिहास का विशाल अलिखित हिस्सा #MeToo से सराबोर है! असंख्य कहानियाँ हैं! हर युग में नारियाँ शोषित होती रही हैं! नारी-देह है ही ऐसी कि पुरुषों को विचलित कर दे। बेचारी स्त्रियाँ, न तो अपने अबोध बचपन में सुरक्षित हैं और ना ही नक़ाब, हिजाब, बुर्का, घूँघट और पर्दे में! आप कहाँ से शुरू करेंगे! कहाँ पहुँचेंगे! ये तो अथाह आकाशगंगा है! सदियों से प्रवाहमान है!

यही वजह है कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने साफ़ कर दिया कि “देखना पड़ेगा कि यह [एमजे अकबर के ख़िलाफ़ लगे आरोप] सच हैं या ग़लत! हमें उस शख्स के पोस्ट की सत्यता जाँचनी होगी, जिसने आरोप लगाये हैं। मेरा नाम इस्तेमाल करते हुए भी, आप कुछ भी लिख सकते हैं!” अमित शाह का ये बयान जुमला नहीं है। वोट बटोरने या जनता को ग़ुमराह करने के लिए दिये जाने भाषणों की तरह सच्चाई से कोसों दूर भी नहीं है। आख़िर, बीजेपी का मुखिया ये कैसे मान लेगा कि उसके ख़ानदान में कोई ‘गन्दा व्यक्ति’ हो भी सकता है!

अकबर पर तो हवसी होने का इल्ज़ाम है, वो भी अभी पुलिस-थाने तक नहीं पहुँचा है। सिर्फ़ हवा में ही तैर रहा है। हवा में तैरती बातों को लेकर भी कहीं इस्तीफ़े होते हैं! ग़नीमत है कि अमित शाह ने अभी ब्रह्मास्त्र नहीं चलाया कि ‘#MeToo के तहत हो रहे ख़ुलासे भी वैसे ही झूठे हैं, जैसे कि राफ़ेल घोटाला!’ क्योंकि वो कह रहे हैं, बीजेपी कह रही है, निर्मला कह रही हैं, जेटली कह रहे हैं, पीयूष कह रहे हैं, पात्रा तो भौंकता ही है और रविशंकर तो चीख़ते ही हैं।

एमजे अकबर का परोक्ष बचाव करने के लिए बीजेपी की तमाम महिलाएँ आगे आयीं। हालाँकि, अकबर की बॉस और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने पहले दिन से ही ख़ामोशी ओढ़ रखी है। लेकिन फ़ायर ब्रॉन्ड साध्वी रहीं, केन्द्रीय पेयजल और स्वच्छता मंत्री उमा भारती की दलील है कि “अकबर से जुड़ा मामला तब का है जब वो केन्द्र सरकार में मंत्री नहीं थे। यह मामला पूरी तरह महिला और अकबर के बीच है।” अनुभवी उमा के ऐसे बयान के सामने कौन हथियार नहीं डाल देगा! अलबत्ता, बीजेपी में ऐसे लोगों की भरमार है, जो राहुल गाँधी से चार पीढ़ियों का हिसाब माँगते हैं! मानों राहुल गाँधी ने ही नेहरू, इन्दिरा और राजीव को प्रधानमंत्री तथा सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाया हो!

दरअसल, संघ और बीजेपी ऐसे संगठन हैं जिन पर तथ्यों और तर्कों की कभी कोई बन्दिश नहीं रहती! तभी तो परम विदुषी और केन्द्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति इरानी ने अकबर प्रसंग को लेकर रहस्योद्घाटन किया कि “मेरा मानना है कि इस मामले में सम्बन्धित व्यक्ति [एमजे अकबर] को ही बयान जारी करना चाहिए। क्योंकि मैं व्यक्तिगत तौर पर वहाँ [जहाँ-जहाँ अकबर पुराण की लीलाएँ हुई] मौजूद नहीं थी।” अब ज़रा सोचिए कि इससे समझदारी भरा बयान क्या कुछ और हो सकता है! हर्ग़िज़ नहीं। लेकिन यही समझदारी स्मृति के उन बयानों में कभी नहीं दिखायी देती जब वो राहुल गाँधी या नेहरू-गाँधी परिवार पर हमले करती हैं। वो जिन-जिन प्रसंगों का ब्यौरा देती हैं, क्या वहाँ कभी मौजूद थीं?

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री के आसन पर सुशोभित, रीता बहुगुणा जोशी भी #MeToo विषयक विद्वान बनकर उभरी हैं। बेचारी बहुत पढ़ी-लिखी हैं। कभी इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ाती भी थीं। रीता के समझ में ही नहीं आ रहा कि इस्तीफ़ा किस बात पर! तभी तो कहती हैं, “सवाल इस्तीफ़े का नहीं है। सवाल ये है कि अगर मैं किसी पर आरोप लगाऊँ तो वो सिद्ध हो।” अब इनसे कौन पूछे कि क्या आरोप लगाते ही सिद्ध हो जाते हैं? या फिर आरोपों की तह तक पहुँचने और उसकी सच्चाई जानने की भी तय प्रक्रिया को अपनाना पड़ता है। क्या जाँच की इस प्रक्रिया के पूरा हुए बग़ैर कभी आरोप सही या ग़लत साबित होता है!

रीता बहुगुणा की ही तरह, मध्य प्रदेश बीजेपी महिला मोर्चा अध्यक्ष लता एलकर भी, ग़ज़ब का नमूना निकलीं। सार्वजनिक जीवन के लम्बे अनुभवों का वास्ता देते हुए उन्होंने ख़ुलासा किया कि “पत्रकार बहनों को मैं कोई ऐसी innocent (मासूम, भोली-भाली) महिला नहीं कहती कि जिसका कोई भी misuse (बेज़ा इस्तेमाल) कर ले।”

इसका मतलब ये हुआ कि #MeToo के तहत ख़ुलासे करने वाली सभी महिला पत्रकार बहुत सयानी या शातिर हैं और अभी पूर्वजन्म के किसी बैर का बदला लेने के लिए एमजे अकबर जैसे धर्मात्मा व्यक्ति पर लाँछन लगा रही हैं! ग़नीमत हैं कि उन्होंने इसके पीछे काँग्रेस की साज़िश होने का ख़ुलासा नहीं किया और ना ही महिला पत्रकारों को बिका हुआ बताया। लेकिन इसका मतलब ये भी नहीं है कि आने वाले दिनों में आपको ऐसे बयान सुनाई नहीं देंगे।

बीजेपी में अभी सैकड़ों प्रतिष्ठित महिलाएँ और हैं जिनकी बयान आना बाक़ी है। ये बयान जब आएँगे, तब आएँगे। लेकिन जैसे अन्धों के गाँव में भी एक काना ज़रूर होता है, वैसे ही बीजेपी में भी कभी-कभार समझदारी भरी बातें भी सुनायी देती हैं! तभी तो #MeToo को लेकर केन्द्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गाँधी ने कहा, “मैं उन सब [उत्पीड़ित महिलाओं] पर विश्वास करती हूँ! मैं प्रत्येक शिकायतकर्ता के दर्द और सदमे को समझती हूँ!” पूरे प्रसंग में भगवा ख़ेमे से निकला, यही इकलौता समझदारी भरा बयान है। ये उस महिला के मुँह से निकला है, जो इत्तेफ़ाकन, नेहरू-गाँधी ख़ानदान की ही एक वारिस है!

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गडकरी की हिम्मत का जबाब नहीं, माना कि 2014 में बन्दर के हाथ में उस्तूरा आ गया!

गडकरी ने नाना पाटेकर के एक मराठी शो में ख़ुलासा किया कि “हमें उम्मीद नहीं थी कि हम सत्ता में आएँगे। इसलिए हमें सलाह दी गयी कि जनता से बड़े-बड़े वादे करो। कुछ नहीं बिगड़ने वाला। लेकिन हम तो सत्ता में आ गये। अब लोग हमारे उन्हीं वादों को हमें याद दिलाते हैं।

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बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष नितिन गडकरी को 2019 का नतीज़ा ‘दीवार पर लिखावट’ यानी Writing on the wall के रूप में साफ़ दिखने लगा है। गडकरी अनुभवी नेता हैं। हवा का रुख़ भाँपना जानते हैं। मोदी और अमित शाह की शैली के मुरीद कभी नहीं रहे। इसीलिए बड़ी चतुराई और शालीनता से स्वीकार करते हैं कि ‘2014 में भारत की जनता ने बन्दर के हाथ में उस्तूरा थमा दिया!’ दरअसल, गडकरी को मालूम है कि यदि वो चतुराई से अपना गुनाह क़बूल कर लेंगे तो चुनाव में जनता निजी तौर उन्हें कम दंड देने पर विचार कर सकती है। यदि ऐसा हो सका तो वो भागते भूत की लंगोटी होगी। वैसे सियासी गलियारे में रहने वाले हर व्यक्ति को पता है कि 62 वर्षीय गडकरी ने अपने बाक़ी जीवन के लिए पर्याप्त इंतज़ाम कर रखा है। कई विपक्षी नेताओं से उनके अच्छे सम्बन्ध हैं, जिसकी बदौलत सत्ता परिवर्तन के बाद वो अपनी ख़ाल बचा लेंगे।

पहली बात: मुस्कुराओ और चल दो

गडकरी ने नाना पाटेकर के एक मराठी शो में ख़ुलासा किया कि “हम सभी का दृढ़ विश्वास और प्रखर आत्मविश्वास था कि हम कभी सत्ता में आएँगे ही नहीं। इसलिए हमारे आसपास के लोग कहते थे कि आप तो बोलिए, वादे कीजिए, क्या बिगड़ेगा? आप पर कौन सी जबाबदारी आने वाली है। लेकिन अब तो जबाबदारी आ गयी। अब ख़बरों में आता है कि गडकरी क्या बोले थे, फडणवीस क्या बोले थे, तो अब आगे क्या? तो हम हँसते हुए आगे बढ़ जाते हैं।”

दूसरी बात: गले की फ़ाँस

गडकरी ही वो व्यक्ति हैं जिन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से ये स्वीकार किया था कि ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ वाला जुमला बीजेपी और मोदी सरकार के गले की फाँस बन गया है! उनका यही रुख़ महँगाई और पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों को लेकर भी रहा है और राम मन्दिर को लेकर भी। उन्हें पता है कि जन भावनाओं को भड़काने और भुनाने वाला कोई भी नारा एक चुनाव के बाद कभी काम नहीं आता। इसीलिए 1996 के बाद संघ-बीजेपी ने राम मन्दिर के मुद्दे को उठाकर ताक पर रखा दिया। यही हश्र अगले चुनावों में समान नागरिक संहिता यानी कॉमन सिविल कोड और अनुच्छेद 370 का भी हुआ। इसी परम्परा के मुताबिक़, 2014 में बीजेपी ने जिस भ्रष्टाचार, काला धन, गुजरात मॉडल और विकास की डुगडुगी बजायी थी, वो सभी मुद्दे 2019 में नदारद रहेंगे। यही वजह है कि 2014 के बाद से कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी कोई मुद्दा नहीं रहा। महबूबा के साथ सरकार बनाने के बावजूद एक भी कश्मीरी पंडित की घर-वापसी नहीं हुई! ‘दो करोड़ रोज़गार के अवसर’ भी कितना बड़ा झाँसा था, ये किससे छिपा है!

तीसरी बात: दिमाग़ ख़राब

गडकरी ही बीजेपी के इकलौते ऐसे मर्द हैं, जिसे नरेन्द्र मोदी से डर नहीं लगता। इसीलिए नोटबन्दी के वक़्त जब मोदी ने गडकरी को चिढ़ाया कि अब तो आपको भी दो लाख रुपये में अपने बेटी की शादी करनी पड़ेगी तो गडकरी ने बहुत सख़्त लहज़े में कहा था, ‘अरे, आपका दिमाग़ ख़राब हो गया है क्या! दो लाख रुपये में भी कहीं शादी होती है!’ गडकरी के इस तेवर को देखकर मोदी की सिट्टी-पिट्टी ग़ुम हो गयी! क्योंकि इससे पहले वो ऐलान कर चुके थे कि ‘भाईयों-बहनों, मुझे सिर्फ़ 50 दिन का वक़्त दीजिए। इसके बाद आप जिस चौराहे पर चाहे मुझे सूली पर लटका दीजिएगा!’

गडकरी की बेटी की शादी 5 दिसम्बर 2016 को ख़ूब शान-ओ-शौक़त के साथ नागपुर में सम्पन्न हुई। मोदी भी वहाँ गये थे। लेकिन तब तक उन्होंने नोटबन्दी को पूरा निचोड़ लिया था! संघ और बीजेपी के तमाम आला नेताओं ने तब तक अपने लाखों करोड़ रुपये को ठिकाने लगा लिया था। दूसरी ओर, सवा सौ करोड़ भारतवासी आज भी मोदी के चौराहे पर आने का वैसे ही इन्तज़ार कर रहे हैं जैसे शिव मन्दिर के बाहर बैठा नन्दी बैल अपलक भोले-शंकर के बाहर आने का इन्तज़ार करता है! ख़ैर, नन्दी की तरह भारत की जनता के लिए भी उम्मीद पर दुनिया क़ायम है!

चौथी बात: कहने में क्या!

एक मुहावरा है, ‘मथुरा में रहना है तो राधे-राधे कहना है!’ इसी नीति का पालन करते हुए नरेन्द्र मोदी की तरह नितिन गडकरी ने भी ख़ूब लम्बी-चौड़ी फेंकी है। जैसे कुछ महीने पहले इन्होंने दावा किया था कि मार्च 2019 तक गंगा 70-80% साफ़ हो जाएगी! इस तरह से सत्ता की ख़ातिर गडकरी का भी नज़रिया ऐसा ही है कि ‘कह दो! कहने में क्या जाता है! जब बात ग़लत साबित होगी, तब कुछ और कह देंगे! तब तक तो मौज़ करते रहो! सत्ता के मज़े लेते रहो!’ गडकरी की दूसरी हवाबाज़ी है कि ‘बीते साढ़े चार साल में देश में जितनी सड़कें बनी हैं, उतनी तो 70 साल में भी नहीं बनी!’ सच्चाई ये है कि गडकरी जैसा चमत्कार तो भगवान विश्वकर्मा भी नहीं कर सकते! लेकिन झाँसों, झूठों और अफ़वाहों को फ़ैलाने वाले संघी भक्तों का लाक्षाग्रह का बनना जारी है!

पाँचवी बात: भाषणम् किम् दरिद्रताम्

गडकरी ने अपनी सहुलियत के मुताबिक़, उन सड़कों को भी ‘नयी’ मान लेते हैं, जिनकी सिर्फ़ मरम्मत और ‘कारपेटिंग’ की जाती है। जबकि सच्चाई ये है कि देश में नैशनल हाईवे की कुल लम्बाई 1.3 लाख किलोमीटर है। इसका तीन चौथाई हिस्सा यानी 75% हिस्सा आज भी दो लेन या इससे भी कम चौड़ा है! दरअसल, नैशनल हाईवे की देखरेख और मरम्मत या चौड़ीकरण का काम केन्द्रीय सड़क मंत्रालय की ओर से राज्यों के लोक निर्माण विभाग के ज़रिये करवाया जाता है। जबकि चार लेन या इससे चौड़ी हाईवे का ज़िम्मा नैशनल हाईवे अथारिटी के पास है।

मोदी राज में अभी तक 31,000 किलोमीटर सड़क बनी है। जबकि यूपीए-2 का आँकड़ा 24,425 किलोमीटर था। ये इज़ाफ़ा 26% का है। लेकिन ऐसा नहीं है कि इस 26% में सारा नया निर्माण चार लेन वाले हाईवे का ही हुआ हो! यूपीए हो या एनडीए, दोनों ने ही नयी सड़कों के खाते में दो लेन वाले हाईवे की मरम्मत और चौड़ीकरण को भी नयी सड़कों के खाते में ही जोड़ा है। अब ज़रा सोचिए कि सरकारी आँकड़ों और 70 साल से ज़्यादा सड़क-निर्माण वाले गडकरी के भाषण के बीच कोई सुर-ताल है क्या? क़तई नहीं। गडकरी ने भी झूठ की कहाड़ी को चूल्हे पर चढ़ा दिया गया है और झाँसों वाली पूरियाँ दना-दन छानी जा रही हैं। इसे कहते हैं, ‘भाषणम् किम् दरिद्रताम्’ यानी भाषण देने में क्या दरिद्रता या कंजूरी दिखाने की क्या ज़रूरत है!

छठी बात: मेले का गुब्बारा

मोदी नीति का भी सूक्ति वाक्य यही है कि ‘भाषणम् किम् दरिद्रताम्’। जबकि मोदी के बाक़ी चेलों का काम है, ‘गुरुजी को चमत्कारी बताते रहो! जब तक जनता इस भ्रम में रहेगी, तब तक दुकान चलती रहेगी। यही वजह है कि मोदी सरकार कभी उन वादों की बात नहीं करती जो उसने 2014 में किये गये थे। बल्कि अब हरेक भारी-भरकम बदलाव के लिए ‘2022 का सपना’ बेचा जाता है। हर वक़्त ब्रॉन्डिंग और मार्केटिंग में गोते लगाने वालों को अच्छी तरह पता है कि यदि जनता 2022 के झाँसों में नहीं आयी तो 2019 में बीजेपी के लिए सौ सीटों का आँकड़ा भी पहाड़ बन जाएगा!

वजह साफ़ है कि मेले से लाये गये गुब्बारों की तरह गाय-गोबर का खेल वीरगति को प्राप्त हो चुका है! विकास ने किसानों, मज़दूरों और युवाओं को निहाल कर रखा है! ‘अच्छे दिन’ मोदी के सिर्फ़ उन दोस्तों के लिए ही आ पाये, जो बैंकों को लूटकर फ़ुर्र हो लिये! अभी आलम ये है कि जो कहते हैं कि उन्हें 15–15 लाख रुपये नहीं मिले, वो देशद्रोही हैं, पाकिस्तानी हैं! इसीलिए फ़िलहाल, बीजेपी का सारी उम्मीदें क्षेत्रवाद, हिन्दू-मुसलमान और ‘ईवीएम महोदय’ के भरोसे ही रह गयी है! 2019 के लिए अभी तो सिर्फ़ इतनी रणनीति है कि दौड़ते रहो, मेहनत करते हुए दिखते रहो, ‘मन की बातें’ करते रहो। जन की बातों की परवाह मत करो।

सातवीं बात: बिल्ली का भाग्य

मोदी से कोई नहीं पूछ सकता कि उनके लम्बे-चौड़े वादों का नतीज़ा क्या रहा! मीडिया का सत्यानाश हो चुका है। उसके पास जनसरोकारों के लिए वक़्त नहीं है। विपक्ष को मीडिया में सही कवरेज़ नहीं मिलती। बीजेपी में सभी मोदी-शाह के आगे हाथ जोड़े खड़े हैं। मोदी-शाह का मानना है कि यदि दो दिन भी टीवी और विज्ञापनों में नज़र नहीं आये तो जनता भूल जाएगी। इसीलिए वो अपनी नाकामियों का ठीकरा भी काँग्रेस और राहुल गाँधी के पुरखों के सिर फोड़ते रहते हैं। लिहाज़ा, रणनीति ये है कि अबकी बार जनता को इतना तगड़ा झाँसा दो कि वो मुंगेरी लाल के हसीन सपनों में ही उलझ जाए, नींद में चलते हुए पोलिंग बूथ तक पहुँचे और ईवीएम को प्रणाम करके कमल का बटन दबाकर मोदी के प्रति अपनी पुष्पांजलि समर्पित कर दे! लेकिन इतिहास गवाह है कि न तो ‘काठ की हांडी कभी बार-बार चूल्हे पर चढ़ी है’ और ना ही ‘बिल्ली के भाग्य से झींका ही बार-बार टूटता है।’

आठवीं बात: करेले पर नीम

जनता का हाल तो अब ऐसा है जैसे ‘भूखे भजन ना होय गोपाला, ले लो अपनी कंठी-माला!’ नोटबन्दी से मिली तबाही का दर्द अब भी बना हुआ है। तब के बेरोज़गार हुए करोड़ों लोगों का हाल अब तक बिगड़ा हुआ ही है! जीएसटी ने अर्थव्यव्स्था के लिए ‘एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा’ वाला हाल कर दिया है! कमर-तोड़ महँगाई अब सिर-फोड़ महँगाई बन चुकी है। रुपये का गिरना, रोज़ाना इतिहास रच रहा है तो पेट्रोल-डीज़ल, सीएनजी-एलपीजी ने ऐलान कर दिया है कि वो किसी के हाथ नहीं आने वाले! इसके अलावा राफ़ेल सौदे ने साफ़ कर दिया है कि जो लोग भ्रष्टाचार मिटाने आये थे, वो ख़ुद ही दुनिया के सबसे बड़े घोटाले में आकंठ डूबे हुए हैं!

नौवीं बात: स्वामी नीति

मोदी सरकार के बेहद मायूसी भरे प्रदर्शन को देखकर ही बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा था कि ‘सरकार के किसी भी मंत्री को इकोनॉमिक्स की समझ नहीं है!’ स्वामी प्रोफ़ेसर रह चुके हैं। ख़ुद को चोटी का अर्थशास्त्री मानते हैं! अरूण जेटली से बड़ा ‘बेवक़ूफ़’ उनकी नज़र में शायद ही कोई और हो! इसीलिए वो कई बार जेटली को धिक्कार भी चुके हैं। लेकिन मोदी को पता है कि जेटली भले ही आर्थिक मोर्चे पर फ़िस्सडी साबित हुए हों लेकिन स्वामी से बड़ी ‘अनगाइडेड मिसाइल’ कभी बनी ही नहीं! स्वामी को कैबिनेट में जगह मिली नहीं क्योंकि यदि ऐसा हुआ होता तो वो मोदी को ही नष्ट करने की साज़िश करने लगते! राजनीति के जानकारों का मानना है कि स्वामी और जेटली, दोनों में ही ‘आस्तीन के साँप’ के लक्षण हैं। इस तथ्य को संघ और मोदी, दोनों ही अच्छी तरह जानते हैं। मोदी को मालूम है कि ‘स्वामी के मुक़ाबले जेटली को साधना आसान है। स्वामी पर भरोसा जताया तो वो मुझे ही मिटा देगा! जैसे मैंने आडवाणी को मिटा दिया!’

आख़िरी बात: जवान से तगड़े बुड्ढे

मोदी की तरह गडकरी का सीना 56 इंच का नहीं है। इसके बावजूद बीजेपी में उनके टक्कर का और कोई मर्द नज़र नहीं आता! बेचारे गडकरी में, कभीकभार ही सही, लेकिन कुछ तो सच बोलने की हिम्मत है। गडकरी ने स्वीकार किया कि ‘बीजेपी ने बड़ी-बड़ी बातें कीं। झूठ बेचा, क्योंकि हमें यक़ीन नहीं था कि झूठ भी बिक सकता है!’ बीजेपी में इतना बोलने की हिम्मत गडकरी के सिवाय और किसी में नहीं है! बाक़ी नेताओं को मालूम है कि कसाई को ज़ुबान काट लेने में वक़्त नहीं लगेगा! पार्टी के अन्य मर्दों की बात करें तो अरूण शौरी और यशवन्त सिन्हा के प्रति श्रद्धा जाग जाती है। इन्होंने हस्तिनापुर के राज दरबार में हो रहे द्रौपदी के चीरहरण के ख़िलाफ़ कम कम अपनी आवाज़ तो बुलन्द की। ये दोनों ही दुर्योधन और दुस्शासन से डरे नहीं! पार्टी ही छोड़ दी। आवाज़ उठाने की कोशिश तो कीर्ति आज़ाद ने भी की थी, लेकिन वो अभिमन्यु की तरह बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।

शौरी-सिन्हा की देखा-देखी शत्रुघ्न की बाँहों को भी जब-तब फड़फड़ाते देखा गया। हालाँकि, इनकी हस्ती नाख़ून कटवाकर शहीद का तमग़ा लेने वालों जैसी ही रही! शौरी-सिन्हा से पहले 10 अगस्त 2014 को संघ प्रमुख मोहन भागवत ने, बीजेपी के अहंकारियों को भुवनेश्वर में ये कहकर चेताया था कि “कुछ लोग बोल रहे हैं कि पार्टी को सफलता मिली। कुछ लोग बोल रहे हैं कि किसी व्यक्ति को जीत मिली। लेकिन व्यक्ति या पार्टी या संगठन की वजह से ये परिवर्तन नहीं हुआ। आम आदमी ने परिवर्तन चाहा। व्यक्ति और पार्टी तो पहले भी थे तो पहले परिवर्तन क्यों नहीं हुआ? जनता परिवर्तन चाहती थी। इसीलिए जनता ख़ुश नहीं रही तो अगले चुनाव में ये सरकार भी बदल जाएगी।”

आज जनता की नाराज़गी किसी से छिपी नहीं है। भागवत भी ‘दीवार की लिखावट’ को साफ़ देख रहे हैं कि मोदी-शाह का ज़हर ही उनके पतन की वजह बनेगा, इसीलिए 18 सितम्बर 2018 को दिल्ली के विज्ञान भवन में वो ‘मुक्त’ नहीं बल्कि ‘युक्त’ भारत बनाने के लिए प्रवचन देते हैं। अब भागवत का हाल ऐसा है कि ‘बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनाएगी!’ 2019 में मोदी राज की काली रात का ख़त्म होना तय है। जनता हर बार झूठ को हज़म नहीं कर सकती!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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Viral सच

ज़हर उगलने वाले 13 सेकेंड के इस वीडियो को क्या आपने देखा!

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जैसे शरीर के तपने का मतलब बुख़ार होता है, वैसे ही जब फेंकू ख़ानदान Fake News/Views/Video पर उतर आये तो समझ लीजिए कि अपने पतन की आहट सुनकर वो बदहवासी में झूठ तथा अफ़वाह की उल्टियाँ कर रहा है! क्योंकि झूठ किसी को हज़म नहीं होता, भक्तों का पाचन-तंत्र भी इसे हज़म नहीं कर पाता है! लिहाज़ा, भक्तों को भी उल्टी-दस्त यानी डीहाइड्रेशन की तकलीफ़ होना स्वाभाविक है! इसीलिए जैसे ही संघ परिवार के चहेते संगठनों के सर्वेक्षणों ने बताना शुरू किया कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में बीजेपी बुरी तरह से हारने जा रही है, वैसे ही एक ओर तो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के भाषणों की दिशा पूरी ताक़त से काँग्रेस और राहुल गाँधी के चरित्रहनन की ओर घूम जाती है, वहीं दूसरी ओर, संघियों का अफ़वाह प्रसार तंत्र भी सक्रिय हो जाता है, ताकि समाज में वोट बैंक की सियासत को कोसते हुए ‘हिन्दू-मुसलमान’ करके हिन्दुओं को हिन्दू के नाम पर लामबन्द किया जा सके!

मोदी-शाह के दहकते हुए भाषण तो आपको बन्धक/दलाल न्यूज़ चैनल सारा दिन सुनाते ही रहते हैं! पहले भाषण का लाइव और फिर स्टोरी तथा डिबेट/बहस के रूप में! हालाँकि, इनकी गुणवत्ता को दर्शक/श्रोता/पाठक भी जल्द ही पहचान लेते हैं। इनके सही या ग़लत होने को लेकर अपनी राय भी बनाते हैं। लेकिन इसी के साथ ग़ुमनाम संघियों की ओर से WhatsApp University के ज़रिये हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर, उन्हें मुसलमानों के ख़िलाफ़ भड़काने का शरारती खेल चालू हो जाता है! ऐसा ही एक घिनौना खेल मेरे हाथ लग गया। मेरे किसी परिचित ने मुझे 13 सेकेंड का एक वीडियो और उसके साथ निम्न टिप्पणी भी भेजी।

“कैसे सौप दे कोंग्रेस को

ये वतन हिन्दुस्तान का,

हमने देखा है तुम्हारी रेली मैं झंडा पकिस्तान का!!

ये विडिओ जरुर देखे”

इस संदेश के वर्तनी दोष की अनदेखी करके आप वीडियो देखने लगेंगे। फिर अपना सिर धुन लेंगे। आपके नथुने फूलने लगेंगे। आपके होंठ अपशब्दों को बुदबुदाने लगेंगे। फिर आप फ़ौरन काँग्रेस को कोसने लगेंगे। उन्हें देश-विरोधी, ग़द्दार और पाकिस्तान परस्त मानने लगेंगे। काँग्रेस के प्रति आपके मन में नफ़रत पैदा होगी। लेकिन अब ज़रा इस वीडियो को बार-बार देखिए। स्लो मोशन यानी धीमी रफ़्तार में भी देखिए, जैसे क्रिकेट मैच में थर्ड अम्पायर देखते हैं! क्योंकि यदि आप ऐसा नहीं करेंगे तो फ़ौरन इस वीडियो को अपने तमाम परिचितों और ख़ासकर उन लोगों को फ़ारवर्ड नहीं करेंगे जो या तो भक्त नहीं हैं या फिर काँग्रेसी हैं!

आप दोनों में से किसी भी विकल्प को चुने, तो भी उन अनाम और ग़ुमनाम ताक़तों का मक़सद पूरा हो जाता है, जिनके झूठ और दुष्प्रचार के लिए ऐसे वीडियो वायरल करवाये जाते हैं। इस काम के लिए संघ-बीजेपी ने देश भर में कम से कम 20 हज़ार लोगों को बाक़ायदा वेतन वाली नौकरी पर लगा रखा है! सोशल मीडिया की भाषा में इन बेहूदा कार्यकर्ताओं/स्वयंसेवकों को ट्रोल या भक्त कहा जाता है। इन्हें बाक़ायदा गुरिल्ला युद्ध-शैली के क्रान्तिकारियों या विषकन्याओं की तरह प्रशिक्षित किया जाता है।

संघी गुरुकुल या शाखाओं में प्रशिक्षित और संस्कारित ऐसे निपट ‘मूर्ख देशभक्तों’ यानी ट्रोल्स की बदौलत ही 2014 में बीजेपी सत्ता में आयी और अब भगवा ख़ेमे को लगता है कि यही देवदूत और ईवीएम में हेराफ़ेरी ही उसे संकट से उबार पाएगी! लेकिन बकरे की माँ कब तक ख़ैर मना पायी है! राक्षसी वृत्ति जब अति कर देती है, तो उसका पतन होता ही है। यही हाल मोदी सरकार का 2019 में होने वाला है। तभी तो इस वीडियो के बारे में आपको ये नहीं बताया जाता कि ये कहाँ का नज़ारा है? कब का नज़ारा है? क्या आयोजन था? कौन आयोजक था? यदि वीडियो आपत्तिजनक है तो पुलिस-प्रशासन, सरकार-क़ानून ने क्या कोई कार्रवाई की या नहीं? आपको कोई ये भी क्यों नहीं बताया कि जब मामला इतना गम्भीर है, तो इस वीडियो को भक्त चैनलों पर क्यों नहीं दिखाया गया? वहाँ इसे लेकर तलवारें क्यों नहीं भाँजी गयीं?

बहरहाल, मैं इन सवालों में नहीं उलझा। क्योंकि मुझे इन सभी का सही जबाब मालूम है। इसीलिए मैंने अपने उस परिचित को पाकिस्तान के झंडे की तस्वीर के साथ सन्देश भेजा कि “संघियों के झूठ ने हिन्दुओं से उनकी प्रगतिशीलता और बुद्धि-विवेक को छीनकर उन्हें मूर्खों में तब्दील कर दिया है। जैसे हर पीली चीज़ सोना नहीं होती वैसे ही हर हरा झंडा और चाँद-तारा पाकिस्तानी नहीं होता! अब ज़रा पाकिस्तान के झंडे को ग़ौर से देखिए। इसमें बायीं तरफ़ सफ़ेद पट्टी भी है। जबकि आपको गुमराह करने वाले झंडे में ये नहीं है! अब आप चाहें तो अपने पाप का प्रायश्चित करते हुए मेरे इस जबाब को वापस उस महामूर्ख को भेज सकते हैं, जिसने आपको ये वीडियो भ्रष्ट टिप्पणी के साथ भेजा है।”

पता नहीं मेरे उस परिचित ने ऐसी किया या नहीं, लेकिन यदि इतना ज़रा दिमाग़ अन्य लोग भी लगाने लगें तो इस वीडियो को फ़ैलाने वालों का मक़सद पूरा नहीं हो सकता। सोशल मीडिया के ज़रिये ज़हर उगलगर हिन्दुओं को उल्लू बनाकर अपना सियासी उल्लू सीधा करने वालों के मंसूबे पूरे नहीं होते! तब टेलिकॉम मंत्री रविशंकर प्रसाद को सोशल मीडिया में जबाबजेही की बातें करते हुए सड़क पर डंडा पटकने का मौक़ा कैसे मिलता? फ़ेसबुक, ट्वीटर और व्हाट्सअप को धमकाने की नौटंकी करके सुर्ख़ियाँ कैसे बटोरी जाती? सूचना-प्रसारण मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर को भी मीडिया संस्थानों के कार्यक्रमों में फ़ेक न्यूज़ पर चिन्ता जताने का मौका कैसे मिलता? दरअसल, संघियों की रणनीति ही यही है कि ‘स्वयंसेवकों से उपद्रव करवाओ और नेताओं से बोलो कि प्रवचन देकर जनता को ग़ुमराह करते रहे!’

हम देख चुके हैं कि दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को लेकर कैसे झूठ फ़ैलाया गया कि वहाँ देश तोड़ने वाले अर्बन नक्सल तैयार होते हैं। ‘हमें चाहिए आज़ादी’ वाले नारे को जेएनयू में कैसे राष्ट्रविरोधी बनाया गया? इसे सबने क़रीब से देखा। जिन को क़सूरवार बताया गया, उन्हें अदालत में दोषी नहीं साबित किया गया, बल्कि इनकी सुनवाई करने जा रही अदालतों को बलवा-स्थल में बदलने का ज़िम्मा उन्हीं लोगों ने अपने हाथों में ले लिया जो संविधान की शपथ लेकर संवैधानिक पदों पर बैठे हैं। दूसरी ओर, जेएनयू में कबाड़ बन चुके टैंक को खड़ा करके छात्रों में देश भक्ति भरने का ढोंग किया गया।

फ़ेक न्यूज़ की समस्या का समाधान बहुत मुश्किल नहीं है। डिज़ीटल या साइबर जगत में डाटा की वही भूमिका है जो हमारे शरीर में ख़ून की है। इसीलिए डाटा का स्रोत ग़ुमनाम नहीं रह सकता। कम्प्यूटर की भाषा में जिसे आईपी नम्बर या इंटरनेट प्रोटोकॉल करते हैं, उससे किसी भी साइबर सामग्री के निर्माता तक पहुँचा जा सकता है, क्योंकि किसी भी डिज़ीटल उपकरण का अनोखा आईपी नम्बर होता है। ये नम्बर फ़र्ज़ी नहीं हो सकता। भले ही हैकर्स इस नम्बर के साथ कोई भी फ़र्ज़ीवाड़ा कर लें, लेकिन फ़र्ज़ी नम्बर भी डिज़ीटल की परिभाषा में फ़र्ज़ी नहीं हो सकता।

आईपी नम्बर की तह में जाकर ही आईटी विशेषज्ञ उन लोगों तक पहुँचते हैं, जहाँ वो पहुँचना चाहते हैं। कौन नहीं जानता कि हमारे देश की पुलिस जब अपराधी तक पहुँचना चाहती है तो कुछेक अपवादों को छोड़कर ज़रूर पहुँचती है। इसीलिए ये सवाल उठना लाज़िमी है कि यदि मोदी के ख़िलाफ़ अपशब्द लिखने वालों को पकड़ा जा सकता है तो राहुल के ख़िलाफ़ झूठ फ़ैलाने वालों को क्यों नहीं पकड़ा जाता? इसकी वजह ये है कि हरेक सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के पास अपने हरेक उपभोक्ता का ब्यौरा होता है। इसी ब्यौरा को यदि हरेक सन्देश के साथ चिपकाने की शर्त अनिवार्य कर दी जाए तो फ़ेक न्यूज़ गढ़ने और उसे फ़ैलाने वालों के गिरेबान तक पहुँचा जा सकता है।

सोशल मीडिया कम्पनियों को सिर्फ़ किसी सन्देश को भेजने वाले की पहचान ज़ाहिर करने का टूल सार्वजनिक करना है। आगे का काम क़ानून और उसकी एजेंसियों का है। लेकिन गोपनीयता या इंस्क्रिप्शन के नाम पर अपराधियों को छिपाकर रखा जाता है। अब ज़रा सोचिए कि साइबर अपराधियों को छिपाकर रखने से कौन फ़ायदे में है!

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