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बहुमत के फ़ैसले के बावजूद ग़रीब और सम्पन्न लोगों के ‘आधार’ में हुई चूक!

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Kapil Sibal

आधार पर फ़ैसला सुनाते वक़्त सुप्रीम कोर्ट ने ग़रीब और सम्पन्न के बीच जो फ़र्क़ देखा है, वो चिन्ताजनक है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी भी नागरिक को मिलने वाली सुविधाएँ सिर्फ़ इसलिए नहीं रोकी जा सकती कि उसके पास आधार नहीं है या किसी वजह से उसके आधार से उसकी पहचान सुनिश्चित नहीं हो पा रही हो। दरअसल, जब से आधार को क़ानूनी जामा पहनाया गया है, तब से इसे लेकर जो जटिलताएँ सामने आयी हैं, उनसे उबरने में सुप्रीम कोर्ट का बहुमत वाला फ़ैसला भी नाक़ाम रहा है। ये जटिलताएँ आधार के दार्शनिक पक्ष, क़ानूनी पहलू और उसे लागू करने से सम्बन्धित हैं।

दार्शनिकता के लिहाज़ से मेरा विरोध ये है कि सरकार से मिलने वाली सुविधाओं के आगे ग़रीब लाचार ही रहते हैं। उनकी कोई सुनवाई नहीं होती। निजता और विकल्प के लिहाज़ से सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला उन लोगों के बीच फ़र्क़ पैदा करता है जो सरकार से सुविधाएँ लेते हैं और जो नहीं लेते। आधार उन लोगों के लिए अनिवार्य है जो सुविधाएँ लेते हैं। इन्हें आधार से अपनी पहचान सुनिश्चित करवाना ज़रूरी है। क़ानूनन इनके पास कोई और विकल्प नहीं है। ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाली पेंशनधारी विधवाएँ, रियायती खाद पाने वाले किसान और गैस सिलेंडर पर सब्सिडी पाने वाले परिवार। लेकिन निजता और विकल्प का सुख उन लोगों के लिए सुरक्षित है, जो सम्पन्न हैं।

सम्पन्न वर्ग के लिए आधार को जहाँ सरकारी निगरानी का सबब माना गया, वहीं ग़रीबों के लिए इसे अभिश्राप नहीं माना गया। ऐसा इसलिए हुआ कि सरकार का ये दावा है कि आधार के बग़ैर वो सरकारी सुविधाएँ देने का प्रभावी तंत्र नहीं बना सकती। ये तर्क विकसित हुआ कि ग़रीबों औAll Postsर दबे-कुचले लोगों तक रियायती सुविधाएँ पहुँचाने के लिए उनकी निजता और सहमति के अधिकार को छीना जा सकता है। ये तर्क भी भ्रामक है कि आधार के ज़रिये रियायतें पहुँचाने से सरकार ने हज़ारों करोड़ रुपये बचाये हैं। सही लोगों तक रियायतों के नहीं पहुँचने की अन्य ठोस वजहें भी हैं, जिन्हें आधार ख़त्म नहीं कर सकता। मुद्दा ये नहीं है कि आधार नहीं होता तो सरकार की बचत नहीं होगी बल्कि बात सिर्फ़ इतनी है ग़रीब आदमी की पहचान सिर्फ़ एक अंक तक सीमित हो जाती है।

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में एक क़ानूनी ख़ामी भी है। बहुमत के फ़ैसले ने ये नहीं माना कि आधार क़ानून को वित्त विधेयक यानी मनी बिल के रूप में पारित करवाना अनुचित था। आधार क़ानून के लिए ज़रूरी संसाधन मुहैया करवाने के लिए वित्त विधेयक ज़रूरी था, लेकिन आधार की अवधारणा, उसका स्वरूप और डाटा प्रबन्धन से जुड़े प्रावधानों को मनी बिल का दर्जा नहीं दिया जा सकता। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने आधार क़ानून की जिन तीन धाराओं को ग़ैर-क़ानूनी ठहराया, उसका ताल्लुक वित्तीय संसाधनों से नहीं था। मसलन, धारा 57, जो सरकार या किसी निजी कम्पनी को ये अधिकार देती थी कि वो किसी व्यक्ति की पहचान के लिए आधार का इस्तेमाल करे; धारा 47, जो कहती है कि आधार के दुरुपयोग को अपराध तभी माना जाएगा जबकि इसकी शिकायत यूआईडीएआई करे; और धारा 33(2), जो राष्ट्रहित के नाम पर किसी की पहचान और निजी जानकारी को ज़ाहिर करने की छूट देता था।

संविधान का अनुच्छेद 110 कहता है कि वित्त विधेयक सिर्फ़ वही हो सकता है जिसमें किसी टैक्स या ऐसे ख़र्च अथवा इसके हिसाब का प्रावधान हो जिसे जनता पर लागू किया जाना है। वित्त विधेयक को सिर्फ़ लोकसभा की मंज़ूरी की ज़रूरत होती है। जबकि अन्य हरेक विधेयक का संसद के दोनों सदनों से पारित होना ज़रूरी है। यदि सुप्रीम कोर्ट ने आधार क़ानून की धाराओं को रद्द करने के बजाय पूरे क़ानून को ही रद्द किया होता तो सरकार को इसे एक सामान्य विधेयक के रूप में फिर से पारित करवाना पड़ता। उस दशा में राज्यसभा भी विधेयक पर चर्चा करके उसके उन कमज़ोर पहलुओं को पुख़्ता बनाने में योगदान देती, जिसे अदालत तय नहीं कर सकती। यदि ऐसा हुआ होता तो राज्य सभा को दरकिनार करके संविधान की भावना से खिलवाड़ भी नहीं करना पड़ता। संविधान पीठ से ये अपेक्षित था कि वो संवैधानिक संरक्षण के प्रति संवेदनशीलता दिखाती। इसके बग़ैर कोई क़ानून प्रभावी नहीं बन सकता। इससे ऐसी नज़ीर बनती कि आने वाली पीढ़ी भी कभी अहंकारी बनकर लोकतंत्र से खिलवाड़ नहीं करती।

यदि संसद ने सही क़ानून बनाया होता तो उसे लागू करने में इतनी दिक्कतें नहीं होती। ज़रा सोचिए कि जब तक आधार का मसला सुप्रीम कोर्ट में बहस और फ़ैसले के स्तर तक पहुँचा तब तक सरकार और निजी क्षेत्र की कम्पनियाँ उन करोड़ों लोगों का आँकड़ा भी हासिल कर चुकी थीं, जिन्हें किसी सुविधा या सब्सिडी की ज़रूरत नहीं थी। पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बग़ैर करोड़ों लोगों की बॉयोमैट्रिक पहचान निजी कम्पनियों के पास पहुँच गयीं। यहाँ तक कि एनईईटी और सीबीएससी की परीक्षाओं के लिए भी आधार को ज़रूरी बना दिया गया।

ये डाटा टेलिकॉम कम्पनियों और बैंकों के पास भी इक्कठा हो गया। अब सारा डाटा बिखरा पड़ा है। सहमति के बग़ैर इसका सही या ग़लत इस्तेमाल हो सकता है। जितना नुकसान हो चुका है, उसकी भरपायी के लिए कोई इन्तज़ाम नहीं है। अब सरकार भी ये सुनिश्चित नहीं कर सकती है कि अवैध हाथों में गया डाटा नष्ट किया जा चुका है। निजी कम्पनियों में गया आम आदमी के डाटा का भविष्य में भी दुरुपयोग हो सकता है। डाटा संरक्षण क़ानून भी हमें तसल्ली नहीं दे सकते, क्योंकि भौतिक सम्पदा की चोरी को तो बरामद किया जा सकता है, लेकिन अदृश्य सम्पत्ति को सुरक्षित नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा कि किसी भी व्यक्ति को हासिल सुविधाएँ महज आधार के नाम पर नहीं रोकी जा सकती। यही तब भी होना चाहिए जब आधार की पहचान का मिलान नहीं हो पाये। ऐसी दशा में लाभार्थियों को अन्य दस्तावेज़ों के ज़रिये अपनी पहचान सुनिश्चित करवाने की छूट आधार क़ानून में दी गयी है। लेकिन क़ानून इस बात पर ख़ामोश है कि यदि किसी व्यक्ति की बॉयोमेट्रिक डाटा ख़राब हो गया हो और कोई व्यक्ति किसी दुर्भावना या अन्य वजहों से उसे उसके हक़ से वंचित करे तो फिर ऐसी दशा में क्या रास्ता होगा? हम जानते हैं कि ग़रीब और कमज़ोर तबके के लोग इतने सक्षम नहीं होते कि वो अपने अधिकारों के लिए लड़ सकें। दुर्भाग्यवश, क़ानून और अदालत, दोनों ही ऐसे व्यावहारिक पहलू का समाधान नहीं कर सके।

कुलमिलाकर, सुप्रीम कोर्ट ने अपने बहुमत के फ़ैसले के ज़रिये किसी व्यक्ति की पहचान को महज नम्बर तक सीमित रखने से रोक लिया। जनता तक अच्छाईयों को पहुँचाने के लिए लोकतंत्र का अच्छा होना भी ज़रूरी है।

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जल्द ही फेसबुक मित्रों के साथ देख सकेंगे वीडियो

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प्रतीकात्मक तस्वीर

सोशल मीडिया कंपनी फेसबुक अपने उपयोगकर्ताओं को नया अनुभव देने के लिए मैसेंजर पर एक नए फीचर ‘वाच वीडियोज टुगेदर’ का परीक्षण कर रहा है, जिससे एक ही वीडियो को एक चैट ग्रुप पर अलग-अलग डिवाइसेज पर एक साथ देखा जा सकेगा। ‘टैकक्रंच’ की शुक्रवार को प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, फेसबुक के एक प्रवक्ता ने कहा कि यह एक आंतरिक परीक्षण है।

इसके अनुसार, इस फीचर के साथ ही यह आपको मैसेंजर पर जुड़े अपने दोस्तों के साथ वीडियो देखने और उसी समय उस वीडियो के बारे में बात करने की अनुमति देगा। इस दौरान वीडियो देख रहे सभी लोगों का नियंत्रण उस पर होगा और वे यह भी देख सकेंगे कि उस समय और कौन-कौन वीडियो देख रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, यह फीचर सबसे पहले मैनेजमेंट एप्लीकेशन ‘टाइमबाउंड’ के संस्थापक अनन्य अरोरा और जेन मैनशुन वोंग नाम के एक इंजीनियर ने मैसेंजर के कोज-बेस में खोजा था।

यह फीचर वीडियो के अपने अनुभव साझा करने की अनुमति देने के साथ-साथ ‘वाच वीडियो टुगेदर’ फीचर कंपनी को नए वाणिज्यिक अवसर प्रदान करेगा।

–आईएएनएस

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ट्विटर से ‘सोशल जेट लैग’ का खतरा

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File Photo

लोगों के सोशल मीडिया के उपयोग से काफी अधिक ‘सोशल जेट लैग’ होती है और उनकी जैविक घड़ी बिगड़ जाती है। लोग सोशल मीडिया पर अपने दैनिक कार्यक्रमों और स्कूल के कार्यक्रमों का वर्णन करते हैं।

यह खुलासा ट्विटर पर लोगों की गतिविधियों का अध्ययन करने के बाद हुआ। ‘सोशल जेट लैग’ एक ऐसी बीमारी है जो हमारे शरीर की आंतरिक गतिविधियों और हमारे दैनिक कार्यक्रमों के अंतर से संबंधित है। यह पहले से ही स्वास्थ्य समस्या से जुड़ा है।

‘ट्विटर सोशल जेट लैग’ की तीव्रता मौसम और भौतिक आधार पर तय होती है। इसका संबंध हमारे आने-जाने के औसम कार्यक्रमों से है। शिकागो विश्वविद्यालय के मिशेल रस्ट ने कहा, “जब हम देखते हैं कि कैसे सोशल जेट लैग साल भर बदलता है तो हमें पता चलता है कि अब तक जिन कार्यक्रमों की अधिकता होती है वह हमारा सामाजिक कैलेंडर बन जाता है।”

उन्होंने कहा, “इसके अनुसार, आधुनिक समाज के मानवों में एक जैविक लय होती है जो कहीं ना कहीं साल भर में सूरज की रोशनी के अनुसार बदलती रहती है। शोधकर्ताओं ने इससे पहले ‘सोशल जेट लैग’ को साप्ताहिक दिनों और सप्ताहांत में जागने और सोने के समय और विशेष गतिविधियों के अनुसार मांपा था। जर्नल ‘करंट बायोलॉजी’ में प्रकाशित एक नए अध्ययन के अनुसार, टीम ने 2012-13 के दौरान अमेरिका के 1,500 से ज्यादा जिलों के सामान्य ट्विटर आंकड़ों का अध्ययन किया।

–आईएएनएस

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भारतीय मूल के थॉमस कुरियन गूगल क्लाउड के सीईओ बनेंगे

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Thomas Kurian-
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भारतीय मूल के थॉमस कुरियन अगले साल गूगल क्लाउड का नेतृत्व करेंगे। कुरियन ओरेकल के प्रोडक्ट डेवलपमेंट एंड डेवलपमेंट के अध्यक्ष रह चुके हैं।

प्रौद्योगिकी कंपनी ने इसकी घोषणा की। गूगल क्लाउड की मौजूदा मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डायन ग्रीन जनवरी तक इस पद पर रहेंगी। वह इसके बाद भी कुरियन के साथ काम करते हुए कंपनी से जुड़े रहेंगी। वे गूगल की मुख्य कंपनी अल्फाबेट के बोर्ड में निदेशक पद पर रहेंगी।

मूल रूप सें बेंगलुरू निवासी कुरियन ओरेकल में 22 सालों से काम कर रहे थे, उन्होंने कंपनी के कार्यकारी चेयरमैन और मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी लैरी एलिसन से कंपनी के भविष्य की कार्यप्रणाली के मुद्दे पर मतभेद के बाद कंपनी छोड़ दी थी।

ग्रीन ने शुक्रवार को एक बयान में कहा, “एक प्रतिष्ठित प्रौद्योगिकीविद् और प्रशासक कुरियन गूगल क्लाउड से 26 नवंबर को जुड़ेंगे और गूगल क्लाउड की प्रशासनिक जिम्मेदारी 2019 की शुरुआत में संभालेंगे।” गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) सुंदर पिचाई के अनुसार, ग्रीन के नेतृत्व में क्लाउड ने काफी अच्छा व्यापार किया है इससे गूगल द्वारा इंफ्रास्ट्रक्चर, डाटा सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर दशकों से किए निवेश से काफी फायदा हुआ है।

उन्होंने कहा, “थॉमस का स्वागत करने के लिए हम वास्तव में उत्साहित हैं, जिनकी दूरदर्शिता, कस्टमर फोकस से हमारे बढ़ते व्यापार को काफी फायदा मिलेगा।”कुरियन ने कहा कि वे इस महत्वपूर्ण समय में गूगल क्लाउड से जुड़ने के लिए उत्साहित हैं। कुरियन ने सितंबर में ओरेकल से इस्तीफा दिया था।

–आईएएनएस

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