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ऐसा चमत्कार तो सिर्फ़ अम्बानी ख़ानदान में ही मुमकिन है!

अजन्मे जियो इंस्टीच्यूट को भारत सरकार ने जिन पाँच अन्य उत्कृष्ट शिक्षण संस्थाओं (इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस) के बराबर ला खड़ा किया है, उन्हें यहाँ तक पहुँचने में कई दशक और एक सदी से भी ज़्यादा वक़्त लगा।

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Mukesh Modi Nita

व्यापारिक घरानों की सत्ता से नज़दीकी का इतिहास भी उतना ही पुराना है, जितनी पुराना ख़ुद सत्ता का अतीत है। दाल में नमक खाने का रिवाज़ भी सदियों से चला आ रहा है। लेकिन मोदी राज में तो डंके की चोट पर, नमक में ही दाल खाने की मिसाल आये दिन क़ायम हो रही है। सत्ता के घमंड में चूर इस सरकार ने चार साल में ही चमत्कारों की झड़ी लगा दी है। मोदी सरकार का ताज़ा चमत्कार इसके चहेते मुकेश अम्बानी का वो जियो इंस्टीच्यूट है, जो अभी तक अपनी माँ के गर्भ में भी नहीं आया!

वेद व्यास रचित महाभारत की कथा में गर्भ से जुड़े एक से बढ़कर एक चमत्कारों वाली कहानियाँ हैं। भारतीय जनमानस का बहुत बड़ा हिस्सा अपनी धार्मिक आस्था की वजह से महाभारत की तमाम गर्भित कथाओं को सत्य मानता है। सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु की कथा तो महा-विलक्षण थी! उसने गर्भ में ही चक्रव्यूह तोड़ने की अद्भुत कला को महज सुनकर सीख लिया था! लेकिन अम्बानी ख़ानदान ने तो भारत के प्राचीन भारत के ‘कल्पना-युग’ की असंख्य पौराणिक कथाओं को भी पीछे छोड़ दिया।

किसी को नहीं मालूम कि जियो इंस्टीच्यूट जिस माँ के गर्भ से पैदा होगा, उस नारी की शादी भी अभी तक हुई है या नहीं! कोई नहीं जानता कि अभी तक जियो इंस्टीच्यूट की माँ का भी जन्म हुआ है या नहीं! लिहाज़ा, ये चमत्कार नहीं तो फिर और क्या है कि मुकेश अम्बानी जानते हैं कि उनका अजन्मा जियो इंस्टीच्यूट, अवतरित होते ही भारत के चोटी के शिक्षण संस्थानों में शुमार हो जाएगा! अब ये समझना मुश्किल नहीं है कि मोदी के मंत्री क्यों उन्हें भगवान का अवतार बताते रहे हैं! मुकेश अम्बानी की कथा ने एक बार फिर साबित किया है कि मोदी राज की कृपा से कोई भी चमत्कार मुमकिन है!

अजन्मे जियो इंस्टीच्यूट को भारत सरकार ने जिन पाँच अन्य उत्कृष्ट शिक्षण संस्थाओं (इंस्टीट्यूट ऑफ एमिनेंस) के बराबर ला खड़ा किया है, उन्हें यहाँ तक पहुँचने में कई दशक और एक सदी से भी ज़्यादा वक़्त लगा। मिसाल के तौर पर, बैंगलुरू का भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) की स्थापना 1909 में मैसूर के महाराजा कृष्णाराजा वाडियार और जमशेदजी टाटा ने किया था। कर्नाटक में ही टीएमए पाई ने 1956 में मणिपाल इंस्टीच्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी की स्थापना की थी। इसके बाद नेहरू युग में ही 1958 में आईआईटी मुम्बई और 1961 में आईआईटी दिल्ली की स्थापना हुई थी। बिट्स पिलानी की स्थापना उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला ने 1964 में की थी।

ये आँकड़े बहुत महत्वपूर्ण हैं। क्योंकि भारत में आज क़रीब 800 विश्वविद्यालय स्तर के शिक्षण संस्थान हैं। इनमें से चेन्नई, मुम्बई, कोलकाता और इलाहाबाद विश्वविद्यालय जैसे उच्च शिक्षा के सरकारी संस्थानों की स्थापना अँग्रेज़ी हुक़ूमत में हुई थी। आज़ादी हासिल करने के बाद भारत को शिक्षित और मज़बूत बनाने के लिए नेहरू सरकार ने ढेरों संस्थान खोले। उनके आह्वान पर उस दौर के सम्पन्न लोगों ने लाखों स्कूल-कॉलेज़ और तरह-तरह के शिक्षण संस्थान खोले। बहुत सारे संस्थानों का समय-समय पर राष्ट्रीयकरण भी हुआ। यानी, उन्हें चलाने की ज़िम्मेदारी कहीं केन्द्र ने तो कहीं राज्य सरकारों ने अपने हाथों में ली।

कालान्तर में देश की बढ़ती आबादी और अधिक से अधिक शिक्षण संस्थानों की माँग को देखते हुए सरकारी नीतियों में ऐसा लचीलापन लाया गया जिसने शिक्षा के व्यावसायीकरण के उस दौर की बुनियाद रखी जो अभी समाज के सामने है। इस दौर में निजी क्षेत्र की पूँजी से उन्नत शिक्षण संस्थान तो ढेरों बनें, लेकिन दूसरी ओर सरकारी शिक्षा तंत्र दिन-ब-दिन गर्त में धँसता चला गया। पूरे देश में इंग्लिश मीडियम पब्लिक स्कूलों का ऐसा जाल फैला, जिसमें कुछ भी पब्लिक नहीं है! पब्लिक स्कूलों के ज़रिये समाज के सम्पन्न लोगों ने अपनी औलादों के लिए अपेक्षाकृत उन्नत और समानान्तर शिक्षा तंत्र विकसित कर लिया। इसी कारवाँ को आगे बढ़ाते हुए हज़ारों धन्ना सेठों ने शिक्षा की दुकानें खोल लीं। इनमें से ही मज़बूत ब्रॉन्ड वाले शिक्षण संस्थान आगे चलकर निजी विश्वविद्यालय का तमग़ा पाने लगे।

रिलायंस फाउंडेशन भी एक ब्रॉन्ड है। इसका जन्म 2010 में धीरूभाई अम्बानी फाउंडेशन के रूप में हुआ। मुकेश और उनकी पत्नी नीता अम्बानी इसकी मुखिया हैं। ये फाउंडेशन धीरूभाई अम्बानी के नाम पर बने दर्जन भर शिक्षण संस्थाओं को चलाता है। इसके सारे शिक्षण संस्थान समाज के सम्पन्न लोगों की औलादों को ध्यान में रखकर चलाये जाते हैं। सांकेतिक तौर पर कमज़ोर तबकों के कुछ विद्यार्थियों को फाउंडेशन की ओर से छात्रवृति या रियायत वग़ैरह ज़रूर मिलती है। लेकिन इसका सारा ताना-बाना पैसे वालों के लिए ही है। बिल्कुल वैसे ही जैसे मुकेश अम्बानी की माँ कोकिला बेन के नाम पर मुम्बई में बने लक्ज़री अस्पताल में इलाज़ करवाने के बारे में कोई ग़रीब सोच भी नहीं सकता!

अजन्मे जियो इंस्टीच्यूट की कहानी भी निराली है! मुकेश अम्बानी ने सबसे पहले इसका प्रस्ताव मनमोहन सिंह सरकार के सामने भी रखा था। लेकिन तब मनमाफ़िक सहुलियत नहीं मिली तो योजना ठंडे बस्ते में चली गयी! 2016 में मोदी सरकार ने अपने चिरपरिचित अन्दाज़ में ‘इंस्टीच्यूट ऑफ़ इमीनेंस’ योजना बनायी। इसके नियम सितम्बर 2017 में बनकर तैयार हुए। हालाँकि, यही योजना मनमोहन सिंह सरकार के वक़्त ‘वर्ल्ड क्लास इंस्टीच्यूट स्कीम’ के नाम से मौजूद थी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के सचिव, विनय शील ओबेराय (1979 बैच) इसके मुख्य कर्ताधर्ता थे। ओबेराय, फरवरी 2017 में रिटायर हुए तो उन्हें मोदी सरकार ने शिक्षा सलाहकार बना दिया। ओबेराय उस आठ सदस्यीय विशेषज्ञ समिति के सदस्य हैं जिसकी अगुवाई पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी हैं। इस समिति के सामने ही अप्रैल 2018 में मुकेश अम्बानी ने जियो इंस्टीच्यूट का ख़ाका पेश किया।

मुकेश अम्बानी ने समिति को बताया कि उन्होंने कैसे ‘शिक्षा और रिसर्च’ के क्षेत्र में बीते पाँच वर्षों में 6000 करोड़ रुपये का निवेश किया है और उन्हीं अनुभवों के आधार पर वो 10 साल में न सिर्फ़ जियो इंस्टीच्यूट को खड़ा कर देंगे, बल्कि उसे 500 विश्व-स्तरीय शिक्षण संस्थानों में से एक भी बना देंगे! मुकेश अम्बानी के प्रस्ताव का ओबेराय ने ज़ोरदार पैरवी की। इसलिए भी, क्योंकि मार्च 2018 से वो मुकेश अम्बानी के कारिन्दे बन चुके हैं। उधर, मुकेश की हस्ती को देखते हुए बाक़ी ‘विशेषज्ञ’ भी उनके क़दमों में लोटने लगे। बस, फिर क्या था! आनन-फ़ानन में जियो इंस्टीच्यूट की तक़दीर तय हो गयी और उसे अपने जन्म से पहले ही ‘इंस्टीच्यूट ऑफ़ इमीनेंस’ का दर्जा ऐसे दे दिया गया, मानो ‘अन्धा बाँटे रेवड़ी, पुनि-पुनि ख़ुद को देय!’ अब मुकेश अम्बानी चाहते हैं कि अजन्मे जियो इंस्टीच्यूट के लिए मोदी सरकार, मुम्बई से 65 किलोमीटर दूर नवी मुम्बई के कर्जत इलाके में 800 एकड़ हरी-भरी (ग्रीनफील्ड) ज़मीन उपलब्ध करवाये।

ये मुकेश भाई की महिमा और उनकी नरेन्द्र मोदी से नज़दीकी का ही क़माल है कि जिस ग्रीनफील्ड श्रेणी में जियो इंस्टीच्यूट को विशिष्ट सम्मान दिया गया, उसे पाने के लिए 11 अन्य धन्ना सेठों ने भी अपनी दावेदारी की थी। वेदान्ता, भारती एयरटेल और क्रेआ फाउंडेशन जैसे कम्पनियों के प्रस्ताव मोदी सरकार के ‘विशेषज्ञों’ को रास नहीं आये। जबकि रिलांयस समूह का प्रस्ताव उन्हें ‘युगान्तरकारी प्रभाव’ पैदा करने वाला नज़र आया!

नौकरशाहों का कोई तोड़ नहीं होता! ये जिसे चाहें राजा बना दें और जिसे चाहें ख़ाक़ में मिला दें! सरकार में बैठे नेताओं और उनके चहेतों के लिए नौकरशाह आसमान से तारा भी तोड़कर ला सकते हैं! नियम-क़ानून बदलना तो इनके बायें हाथ का खेल है। इनका काटा पानी भी नहीं माँग पाता तो पल भर में दम तोड़ देता है। इसीलिए जब जियो इंस्टीच्यूट का ढोल फटा तो पलक झपकते ही मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और उनके मंत्रालय के आला अफ़सरों को मुकेश अम्बानी के बचाव में आगे आते देर नहीं लगी। बक़ौल पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवन्त सिन्हा, ‘जियो इंस्टीच्यूट अभी बना तक नहीं है। इसका कोई वज़ूद भी नहीं है। लेकिन इसे ‘विशिष्ट’ का तमग़ा मिल गया। मुकेश अम्बानी होने का यही महत्व है।’

इससे पहले भी भारत देख चुका है कि मोदी सरकार ने कैसे हरेक स्तर की मनमानी करते हुए फ़्राँस के राफ़ैल लड़ाकू विमानों के निर्माण का धन्धा उस अनिल अम्बानी को थमा दिया जिन्हें इस क्षेत्र का कोई अनुभव नहीं है। अनिल अम्बानी को ख़ुश करके उनसे मिले अहसानों का क़र्ज़ उतारने के लिए नरेन्द्र मोदी सरकार ने सरकारी क्षेत्र की विमान निर्माता कम्पनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स की दावेदारी को भी कूड़ेदान के हवाले कर दिया था। बीते चार सालों में मोदी सरकार ने अम्बानी ख़ानदान की सेवा में और भी ढेरों चमत्कार किये हैं! धन्ना सेठों दोस्ती निभाने के मामले में मोदी सरकार का रिकॉर्ड इतना शानदार रहा है, जैसा भारत के इतिहास में पहले कभी दिखायी नहीं दिया।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

चुनाव

मप्र में शिवराज के दांव पर कांग्रेस ने फेंका जाल

कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।

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Shivraj-Ajay

भोपाल, 10 नवंबर | मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘किसानपुत्र’, ‘महिला हितैषी’ और ‘युवाओं के हमदर्द’ होने के दांव पर कांग्रेस ने ‘वचनपत्र’ के जरिए ऐसा जाल फेंका है, जो शिवराज की बीते डेढ़ दशक में बनी छवि पर चादर डालता दिख रहा है।

शिवराज की अगुवाई में भाजपा तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। पिछले दो चुनावों में शिवराज की जीत में किसानों और महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। लाडली लक्ष्मी योजना और किसानों के लिए बनी योजनाओं ने शिवराज के सिर जीत का सेहरा बांधा था। शिवराज और भाजपा इस बार भी जीतने की रणनीति में व्यस्त है, मगर इसी बीच शनिवार को कांग्रेस ने ऐसा ‘वचनपत्र’ जारी किया, जिसमें सरकार बनने पर किसानों, युवाओं और महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के वादे किए गए हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक साजी थॉमस कहते हैं कि शिवराज बीते डेढ़ दशक में राज्य में खुद को किसानपुत्र, महिलाओं का भाई, लड़कियों का मामा और युवाओं के आदर्श के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में उन्हीं वर्गो के जीवन को बदलने का वादा किया है, जो शिवराज के निशाने पर और उनका सबसे बड़ा वोट बैंक रहा है। कांग्रेस के वादे पर यह वर्ग कितना भरोसा करता है, यह तो समय ही बताएगा।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा, “कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।”

वहीं कांग्रेस के वचनपत्र पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस वचन तो देती है, मगर उसे पूरा कभी नहीं करती। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने का वचन दिया था, मगर गरीबी नहीं हटी। राजीव गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, मगर गरीबी की जगह गरीब ही हटा दिए।

सच तो यह है कि भाजपा किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हें फसल का उचित दाम दिलाने के वादे करती रही, मगर सरकार की ये कोशिशें जमीनी स्तर पर रंग नहीं ला पाईं। बीते दो साल में किसानों के कई आंदोलनों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

वहीं उद्योगों की स्थापना के बावजूद पर्याप्त संख्या में युवाओं को रोजगार नहीं मिला, साथ ही महिला असुरक्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने वचनपत्र तैयार किया है, और सभी वर्गो से वादे किए हैं कि उनके कल्याण की योजनाएं तो बनेंगी ही, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात में बदलाव आाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस का वचनपत्र तो आ गया है, अब भाजपा का घोषणापत्र आने वाला है। अब देखना होगा कि भाजपा की क्या रणनीति होती है और वह कांग्रेस के वादों का किस तरह जवाब देती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तो मीडिया के सामने कह दिया है कि भाजपा संकल्पपत्र बनाती है, जो महज ‘जुमलापत्र’ बनकर रह जाता है।

–आईएएनएस

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व्यंग्य – जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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Politicians Cartoon

अभी-अभी केन्द्रीय कैबिनेट की एक आपात और बेहद ख़ुफ़िया बैठक हुई है! इसमें पहली बार संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के शीर्ष पदाधिकारी भी शामिल हुए! महामहिम चौकीदार महोदय ने सर्वोच्च स्तर की इस रणनीतिक मंत्रणा में अपने मंत्रियों को पीछे बैठाया और हिन्दू हित के संरक्षक महापुरुषों को अगली पंक्ति में बैठाया गया! बैठक में कई क्रान्तिकारी फ़ैसले लिये गये, लेकिन ये भी तय हुआ कि इनका औपचारिक ऐलान नहीं होगा! लिहाज़ा, सोशल मीडिया पर प्रकाशित इस पोस्ट को आप बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ मान सकते हैं!

सरकार ने तय किया है कि अब देश में ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ चलाया जाएगा! चुनाव आचार संहिता को देखते हुए अभी इस आन्दोलन का ऐलान नहीं किया जाएगा, लेकिन भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी। और, ऐसा होते ही जहाँ मुसलमानों का क़त्लेआम शुरू हो जाएगा, वहीं हिन्दुओं के ध्रुवीकरण इतना ज़ोर पकड़ लेगा, जैसे जंगल की बेक़ाबू आग!

भगवा ख़ानदान का यक़ीन है कि यदि उसकी ये रणनीति परवान चढ़ गयी तो न सिर्फ़ आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ऐतिहासिक कामयाबी मिलेगी, बल्कि 2019 के आम चुनाव में भी पार्टी कम से कम 350 सीटें जीतने में सफल होगी! कैबिनेट की विशेष बैठक में ये भी तय हुआ कि भगवा ख़ानदान के जुड़े लोग बड़े पैमाने पर शहरों, जगहों और भवनों के नाम बदलने की माँग करने वाले बयान देने पर ज़ोर दें। ताकि मीडिया में उन्हें भरपूर सुर्ख़ियाँ मिलती रहें। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि जनता का ध्यान राफ़ेल और नोटबन्दी जैसे विश्वस्तरीय घोटालों से हट जाएगा और वो मूर्खों की तरह से इस झाँसे में फँस जाएगी कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है! मोदी अजेय है!

  1. मुसलमान मंत्री बदले नाम

भगवा ख़ानदान के आग्रह पर ढोंगी सरकार ने तय किया है कि देश भर में बीजेपी की सरकारों में जो भी इक्का-दुक्का मुसलमान मंत्री हैं, उनके नाम फ़ौरन बदले जाएँ! वर्ना, इन मुसलमानों को मंत्री पद गँवाना होगा!

  1. ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवान ख़ानदान ने तय किया है कि अब अंडे को ‘पक्षीफल’ कहा जाएगा! इस फल से न सिर्फ़ मन्दिरों में भगवान का भोग लगाया जा सकेगा, बल्कि व्रत-उपवास में इसे फलाहार के रूप में इस्तेमाल करना होगा!

  1. वीर सावरकर पक्षीपालक योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना की आत्मा को मेक इन इंडिया की आत्मा से जोड़ा जाएगा। भगवा ख़ानदान को यक़ीन है कि आत्माओं के मिलन वाली इस क्रान्तिकारी नीति से पक्षीफलों की माँग में ज़बरदस्त उछाल आएगा और पक्षीपालकों के रूप में कम से कम 10 करोड़ युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर खुलेंगे। इसे वीर सावरकर पक्षीपालक योजना कहा जाएगा। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा की सुविधा भी आरक्षण की तरह इस अद्भुत योजना के तहत में पहले दस साल तक मुफ़्त मिलेगी और भविष्य में भी इसे आरक्षण की ही तरह दस-दस वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

  1. दीनदयाल पकौड़ा योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना में उन लोगों को वरीयता मिलेगी जो अपने ‘भक्त होने का आधार कार्ड’ दिखा सकें और जो ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ के लाभार्थी नहीं हो! ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री पकौड़ा रोज़गार योजना का भी नया नामकरण कर दिया गया है! उसे अब ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ कहा जाएगा!

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ओपिनियन

अंतिम सांस तक कांग्रेसी, मगर बेटे का साथ दूंगा : सत्यव्रत चतुर्वेदी

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे।

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Satyavrat Chaturvedi

छतरपुर, 9 नवंबर | कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता और पूर्व राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन बंटी चतुर्वेदी ने बगावत कर समाजवादी पार्टी का दामन थामकर छतरपुर जिले के राजनगर विधानसभा क्षेत्र से नामांकनपत्र भरा है। चतुर्वेदी का कहना है कि वे अंतिम सांस तक कांग्रेसी हैं, मगर एक पिता के तौर पर बेटे का हर संभव साथ देंगे, क्योंकि छुपकर राजनीति करना उनकी आदत में नहीं है।

नितिन बंटी चतुर्वेदी राजनगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के दावेदार थे, मगर कांग्रेस ने अंतिम समय में उसका टिकट काट दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के कहने पर नितिन ने सपा का दामन थामकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

सत्यव्रत चतुर्वेदी ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, “नितिन बालिग है, उसे अपने फैसले करने का हक है, पिछले दो चुनाव से वह कांग्रेस से टिकट मांग रहा था, पार्टी ने हर बार अगले चुनाव का भरोसा दिलाया, मगर इस बार फिर वही हुआ। पार्टी ने टिकट नहीं दिया, इन स्थितियों में बंटी ने सपा से चुनाव लड़ने का फैसला लिया, यह उसका व्यक्तिगत फैसला है। मैं तो अंतिम सांस तक कांग्रेसी रहूंगा। हां, पिता के नाते बंटी का साथ दूंगा। छुपकर कहने और राजनीति करना आदत में नहीं है, जो करना है वह कहकर करता हूं, छुपाता नहीं हूं।”

चतुर्वेदी से जब पूछा गया कि बेटा सपा से चुनाव लड़ रहा है, पार्टी आप पर कार्रवाई कर सकती है, तो उनका जवाब था, “मैं कांग्रेस में जन्मा हूं, कांग्रेसी रक्त मेरी नसों में प्रवाहित होता है, दिल में कांग्रेस है, पार्टी को फैसले लेने का अधिकार है, मगर मेरे दिल से कोई कांग्रेस को नहीं निकाल सकता। अंतिम सांस भी कांग्रेस के लिए होगी।”

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे। बाबूराम चतुर्वेदी राज्य सरकार में मंत्री रहे और विद्यावती कई बार सांसद का चुनाव जीतीं। बुंदेलखंड में उनकी हैसियत दूसरी इंदिरा गांधी के तौर पर रही है।

चतुर्वेदी के समकालीन नेताओं में शामिल दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुभाष यादव आदि ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार में एक और एक से ज्यादा सदस्यों को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है, मगर चतुर्वेदी के बेटे को पार्टी ने टिकट देना उचित नहीं समझा। इसी के चलते उनके बेटे बंटी ने बगावत कर दी।

अन्य नेताओं के परिजनों को टिकट दिए जाने के सवाल पर चतुर्वेदी का कहना है, “इस सवाल का जवाब तो मैं नहीं दे सकता, यह जवाब तो पार्टी के बड़े नेता और टिकटों का वितरण करने वाले ही दे सकते हैं, जहां तक बात मेरी है, मन में तो मेरे भी सवाल आता है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों।”

कांग्रेस में टिकट वितरण की कवायद छह माह पहले ही शुरू करने का ऐलान कर दिया गया था, जगह जगह पर्यवेक्षक भेजे गए, सर्वे का दौर चला, नेताओं की टीमों ने डेरा डाला और वादा किया गया कि न तो पैराशूट वाले नेता चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे और न ही बीते चुनावों में भारी मतों से हारे उम्मीदवारों को मौका दिया जाएगा। मगर उम्मीदवारों की सूचियां इन सारे दावे और वादे की पोल खोलने के लिए काफी है।

चतुर्वेदी भी इस बात से हैरान हैं कि जो व्यक्ति पिछला चुनाव 38 और 40 हजार से हारा, उसे उम्मीदवार बना दिया गया। आखिर किसने और कैसा सर्वे किया, यह वे समझ नहीं पा रहे हैं। अब तो चुनाव के बाद ही पार्टी को इन हालात की समीक्षा करनी चाहिए, आखिर किसने किस तरह का खेल ख्ेाला।

–आईएएनएस

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