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गोवा में एक बार फिर राजनीति का सबसे घिनौना चेहरा सामने है!

बीजेपी को पता है कि जैसे लक्ष्मी की कृपा बदौलत उसने चौथी बार मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया था, वैसे ही लक्ष्मी की कृपा से पर्रिकर सरकार को जीवनदान भी दिया जा सकता है। लक्ष्मी की इसी कृपा ने बीजेपी को नरभक्षी बना दिया है!

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Modi Shah

आमतौर पर राजनीति को सम्भावनाओं का खेल कहा जाता है। कभी जोड़-तोड़ और मौकापरस्ती, राजनीति का सहज-धर्म हुआ करता था। लेकिन मोदी राज में राजनीति का बेहद चेहरा वीभत्स हो चुका है। अब राजनीति जोड़-तोड़ से बहुत आगे निकलकर ख़रीद-फ़रोख़्त के गोरखधन्धे में तब्दील हो चुकी है। क्योंकि अब भारतीय राजनीति में नैतिकता, मूल्य, सिद्धान्त, विचारधारा और लोकलाज़ जैसे बुनियादी तत्व नदारद हो चुके हैं। लोकतंत्र की सेहत के लिए ये बेहद घातक दौर है। मार्च 2017 के बाद से, गोवा इसी दलदल में फँसा हुआ है।

अब गोवा में काँग्रेस के दो और विधायक दयानन्द सोपते और सुभाष शिरोडकर अपनी राजनीतिक निष्ठा का सौदा करके बीजेपी के ख़ेमे में जा पहुँचे हैं। इनसे पहले, विश्वजीत राणे ने भी काँग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने के फ़ौरन बाद इसलिए पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था, ताकि राज्य की 40 में से 13 सीटें जीतने वाली बीजेपी, सरकार बना सके, सत्ता हथिया सके! तब भी, बीजेपी के धन-बल ने काँग्रेस को मिले जनादेश को पटखनी दी थी, और अब भी, विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का गोरखधन्धा इसलिए आसानी से परवान चढ़ गया, क्योंकि बीजेपी को किसी भी क़ीमत पर गोवा में अपनी सरकार बचानी है।

बीजेपी को पता है कि जैसे लक्ष्मी की कृपा बदौलत उसने चौथी बार मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया था, वैसे ही लक्ष्मी की कृपा से पर्रिकर सरकार को जीवनदान भी दिया जा सकता है। लक्ष्मी की इसी कृपा ने बीजेपी को नरभक्षी बना दिया है! उसके मुँह में विधायकों का ख़ून लग चुका है! सिर्फ़ गोवा में ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी। इसीलिए, फरवरी से गम्भीर रूप से बीमार चल रहे मनोहर पर्रिकर की जगह न तो पार्टी ने नया मुख्यमंत्री चुना, ना काँग्रेस की माँग के मुताबिक उसकी सरकार बनवायी और ना ही विधानसभा में शक्ति-परीक्षण होने दिया, क्योंकि बीजेपी को अच्छी तरह से पता है कि विधानसभा के शक्ति परीक्षण में उसकी सरकार गिर जाती।

दरअसल, फरवरी 2017 में हुए गोवा के विधानसभा चुनाव में काँग्रेस 40 में से 17 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। बीजेपी को 13 सीटें मिली थीं। तीन-तीन सीटें क्षेत्रीय दलों, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और गोवा फ़ारवर्ड को मिली। एक सीट एनसीपी के ख़ाते में गयी और तीन निर्दलीयों ने मैदान मारा। इसके बाद विधायकों के ख़रीद-फ़रोख़्त की मंडी सजी। इसमें काँग्रेस अपना दमख़म दिखाने में विफल रही। उसे एनसीपी के स्वाभाविक समर्थन का यक़ीन था, तो गोवा फ़ॉरवर्ड ने भी समर्थन का भरोसा दिलाया था। लेकिन काँग्रेस ने सौदा पटाने में देर कर दी। वो ज़बरदस्त गुटबाज़ी की वजह से अपने विधायक दल का नेता यानी मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी वक़्त रहते नहीं चुन सकी। इसीलिए राज्यपाल मृदुला सिन्हा के पास जाकर सरकार बनाने का दावा पेश करने में भी देरी हुई।

उधर, बीजेपी ने इस मौके का भरपूर फ़ायदा उठाया। उसने विधायकों की बोली लगाने की ज़िम्मा नितिन गडकरी को सौंपा, जिन्होंने दनादन एनसीपी, निर्दलीयों और गोवा फ़ॉरवर्ड के विधायक और ‘फ़िक्सर’ विजय सरदेसाई से सौदा पटा लिया। इतना ही नहीं, काँग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह राणे के बेटे और काँग्रेस के टिकट पर निर्वाचित विश्वजीत राणे की पारिवारिक निष्ठा का भी सौदा कर लिया। राणे ने तो शक्ति परीक्षण से पहले ही काँग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया। सौदेबाज़ी कितनी जानदार रही होगी, इसका जायज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस वक़्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ़्राँस में राफ़ेल सौदा करने गये थे और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर गोवा में सब्ज़ी ख़रीद रहे थे, इसकी तस्वीर विजय सरदेसाई ने ही सोशल मीडिया पर डाली थी!

ख़ैर, पर्रिकर और गडकरी की थैलियों ने भरपूर रंग दिखाया। फ़्लोर टेस्ट में पर्रिकर सरकार को 24 वोट मिले। जबकि काँग्रेस 16 सीटों पर आ गयी। इसी वक़्त विश्वजीत राणे की सीट खाली हो गयी तथा बीजेपी ख़ेमे की संख्या 23 हो गयी और सदन की संख्या 39 हो गयी। पर्रिकर सरकार में गोवा फ़ॉरवर्ड के तीनों विधायक समेत आठ विधायक मंत्री बने। तब पर्दे के पीछे से विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त वाली मंडी का सारा इन्तज़ाम संवैधानिक अम्पायर और राज्यपाल मृदुला सिन्हा के हवाले था। उन्होंने अपनी पार्टी के इशारे पर कम सीटें जीतने वाली बीजेपी की सरकार बनवा दी। सबसे बड़े दल काँग्रेस को मौक़ा देने की परम्पराओं की धज़्ज़ियाँ उड़ा दी गयीं। लेकिन इसी दिन के लिए ही तो रीढ़-विहीन और लोकलाज़-रहित मृदुला सिन्हा को राज्यपाल बनाया था!

वक़्त का पहिया घूमा। ईश्वर ने बेईमानी से सत्ता हथियाने वाले पर्रिकर को उनके कर्मों का फल देने की ठानी। मुख्यमंत्री बनने के साल भर के भीतर ही, यानी फरवरी 2018 आते-आते, 62 वर्षीय पर्रिकर को पैंक्रियाज यानी पित्ताशय के कैंसर ने जकड़ लिया। इसी वक़्त, पर्रिकर के तीन और मंत्रियों की सेहत धोखा देने लगी। आलम ये हुआ कि जुलाई 2018 में विधानसभा के मॉनसून सत्र के वक़्त बिजली मंत्री पांडुरंग मडकैकर, शहरी विकास मंत्री फ़्रॉन्सिस डिसूज़ा और परिवहन मंत्री रामकृष्ण उर्फ़ सुदिन धवालिकर, सदन में मौजूद रहने की दशा में नहीं थे। पांडुरंग, ब्रेन-स्ट्रोक से जूझ रहे हैं तो डिसूज़ा भी कैंसर पीड़ित हैं। पर्रिकर की तरह इनकी सेहत भी तेज़ी से जबाब दे रही है। इसीलिए, सितम्बर में बीजेपी में नया मुख्यमंत्री ढूँढ़ने को लेकर ख़ासी सरगर्मी रही। लेकिन कोई उपयुक्त चेहरा नहीं मिला।

अब बीजेपी को साफ़ दिख रहा था कि उसकी सरकार अल्पमत में आ चुकी है। इसीलिए काँग्रेस की माँग के मुताबिक़, राज्यपाल मृदुला सिन्हा न तो शक्ति-परीक्षण के लिए राज़ी हुईं और ना ही राष्ट्रपति शासन के लिए। वैसे, मृदुला सिन्हा कोई इकलौती राज्यपाल नहीं हैं, जिन्हें बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का ही हुक़्म बजाना पड़ता है। आलम ये है कि यदि उन्होंने अपने दिमाग़ का इस्तेमाल कर लिया तो उन्हें भी मार्गदर्शक मंडल में ठेल दिया जाएगा! मृदुला ऐसी कोई अकेली राज्यपाल नहीं हैं। हरेक का यही हाल है। पूरे कुएँ में ही भाँग घुली पड़ी है!

यहाँ, बहस हो सकती है कि क्या काँग्रेस के ज़माने में ऐसा नहीं होता था? क्या तब राज्यपाल, केन्द्र सरकार के एजेंट नहीं हुआ करते थे? बेशक़, हुआ करते थे। लेकिन संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ाने और सत्ता के अहंकार में नंगा-नाच करने की ऐसी प्रवृत्ति तब नहीं थी। पर्दे के पीछे सब होता था, लेकिन मोदी राज जैसा ख़ुल्लमख़ुल्ला और ‘डंके की चोट पर’ वाली माहौल काँग्रेसियों की फ़ितरत में नहीं था। इसीलिए तब जो लोग काँग्रेस को पतित, भ्रष्ट और बेईमान होने का सर्टिफ़िकेट देते हुए अपने चाल-चरित्र-चेहरे की दुहाई देते फ़िरते थे, क्या वो भी सत्ता की ख़ातिर इतने पतित हो जाएँगे कि बेचारी ‘भारत से मुक्त हो चुकी काँग्रेस’ को भी शर्म आ जाए!

बहरहाल, अब काँग्रेस के दो और विधायकों के ‘बिक जाने’ के बाद भी गोवा विधानसभा में चार सीटें खाली हैं। काँग्रेस की तीन और बीजेपी की एक। अब सदन में बीजेपी के 12 विधायक हैं, तो काँग्रेस की संख्या 14 पर जा पहुँची है। बीजेपी को 10 विधायकों का समर्थन हासिल है। लेकिन मुख्यमंत्री समेत चार मंत्रियों का वोट अधरझूल में है। चार में से तीन बीजेपी के हैं तो सुदिन धवालिकर, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के नेता हैं। इस तरह, आशंका है कि कहीं शक्ति परीक्षण के वक़्त सत्ता पक्ष का दायरा 18 पर ही ना अटक जाए!

ऐसे में यदि काँग्रेस के दो विधायक नहीं बिकते तो 38 लोगों के सदन में 20 की आँकड़ा हासिल करना मुश्किल हो जाता। लिहाज़ा, बीजेपी के शूरमाओं ने साम-दाम-भेद-दंड का नुस्ख़ा अपनाकर विधानसभा की प्रभावी संख्या को ही घटा दिया और काँग्रेस के दो विधायक ख़रीद लिये! भगवा ख़ेमा अभी एकाध और शिकार की फ़िराक़ में है! ताकि आँकड़े आरामदायक बन सकें और बीजेपी ताल ठोंककर कह सके कि काँग्रेस से अपना घर तो सम्भलता नहीं, गोवा क्या सम्भालेंगे! विपक्ष में बैठी पार्टी के पास वैसे भी अपने विधायकों को लालच से बचाने के लिए बहुत कम विकल्प होते हैं। राजनीति का यही सबसे घिनौना चेहरा है! गोवा में ऐसा पहले भी होता रहा है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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बिहार : समस्तीपुर में डेयरी संयंत्र, भोजपुर में पशु आहार कारखाना लगेंगे

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dairy products

मोतिहारी, 19 जनवरी | बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यहां शनिवार को कहा कि अगले वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड (कम्फेड) द्वारा समस्तीपुर में पांच लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता के डेयरी संयंत्र और भोजपुर के बिहिया में 300 मीट्रिक टन प्रतिदिन उत्पादन क्षमता के पशु आहार कारखाने लगाए जाएंगे। पूर्वी चंपारण जिले के मठबनवारी में 11 महीने के रिकार्ड समय में बन कर तैयार मदर डेयरी के प्रति दिन एक लाख लीटर क्षमता के दूध प्रसंस्करण संयंत्र का शनिवार को उद्घाटन करने के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री ने कहा कि इस संयंत्र द्वारा मार्च से 1250 गांवों के 50 हजार किसानों से प्रतिदिन 2 लाख लीटर दूध का संग्रह किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि अब सुधा व मदर डेयरी, दोनों मिलकर किसानों से दूध खरीदेगी।

मोदी ने कहा, “वर्तमान वित्तीय वर्ष में सुपौल में एक लाख लीटर क्षमता का डेयरी संयंत्र, समस्तीपुर व हाजीपुर में 30-30 मीट्रिक टन के दूध पाउडर संयंत्र, पटना व नालंदा में 20-20 हजार किलो दैनिक क्षमता के आइसक्रीम प्लांट स्थापित किए जाने के साथ ही पटना में पूर्व से स्थापित 100 मीट्रिक टन क्षमता के पशु आहार फैक्ट्री को 150 मीट्रिक टन में विस्तारित और 150 मीट्रिक टन की नई इकाई स्थापित की गई है।”

डेयरी स्थापित करने वाले किसानों को सरकार द्वारा 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 66 प्रतिशत अनुदान दिए जाने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी केवल धान, गेहूं की खेती करने से दोगुनी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए समग्र रूप से वानिकी, डेयरी, मछली और मुर्गी पालन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि फिलहाल बिहार में प्रतिदिन 18 लाख किलो दूध का संग्रह व 14 लाख लीटर की मार्केटिंग सुधा डेयरी द्वारा की जा रही है।

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, बिहार सरकार में मंत्री प्रमोद कुमार, राणा रणधीर सिंह समेत कई अधिकारी और नेता मौजूद थे।

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मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

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mukesh ambani

गांधीनगर, 18 जनवरी | औपनिवेशीकरण के खिलाफ महात्मा गांधी के अभियान को याद करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने की गुजारिश की और कहा कि भारतीय डेटा भारतीयों के ‘स्वामित्व और नियंत्रण’ में होने चाहिए। उन्होंने यहां वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2019 में कहा, “हम अपने राष्ट्रपिता को उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधी जी ने राजनीतिक औपनिवेशीकरण के खिलाफ आन्दोलन चलाया था.. आज हम सब मिलकर डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ नया अभियान शुरू कर रहे हैं।” इस समिट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

अंबानी ने कहा कि डेटा नई दुनिया में ‘नया तेल और धन’ है। उन्होंने कहा कि भारत के डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और कॉर्पोरेट्स द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, खासतौर से वैश्विक कॉर्पोरेशंस द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री, मैं आश्वस्त हूं कि आप अपने डिजिटल इंडिया मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में इसे भी शामिल करेंगे।”

उन्होंने कहा, “भारत को इस डेटा संचालित क्रांति में सफल होने के लिए, हमें भारतीय डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण वापस भारत भेजना होगा.. दूसरे शब्दों में भारतीय संपत्ति वापस लौटानी होगी। भारतीय डेटा को भरतीयों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि वैश्विक कॉर्पोरेट्स द्वारा। डेटा का नियंत्रण हमें अपने हाथों में लेने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है।”

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर में कहा था कि सभी डिजिटल भुगतान कंपनियों जैसे गूगल प्ले, वाट्सएप और अन्य को अपने भारतीय कारोबार का डेटा स्थानीय तौर पर स्टोर करना चाहिए।

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ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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