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गोवा में एक बार फिर राजनीति का सबसे घिनौना चेहरा सामने है!

बीजेपी को पता है कि जैसे लक्ष्मी की कृपा बदौलत उसने चौथी बार मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया था, वैसे ही लक्ष्मी की कृपा से पर्रिकर सरकार को जीवनदान भी दिया जा सकता है। लक्ष्मी की इसी कृपा ने बीजेपी को नरभक्षी बना दिया है!

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Modi Shah

आमतौर पर राजनीति को सम्भावनाओं का खेल कहा जाता है। कभी जोड़-तोड़ और मौकापरस्ती, राजनीति का सहज-धर्म हुआ करता था। लेकिन मोदी राज में राजनीति का बेहद चेहरा वीभत्स हो चुका है। अब राजनीति जोड़-तोड़ से बहुत आगे निकलकर ख़रीद-फ़रोख़्त के गोरखधन्धे में तब्दील हो चुकी है। क्योंकि अब भारतीय राजनीति में नैतिकता, मूल्य, सिद्धान्त, विचारधारा और लोकलाज़ जैसे बुनियादी तत्व नदारद हो चुके हैं। लोकतंत्र की सेहत के लिए ये बेहद घातक दौर है। मार्च 2017 के बाद से, गोवा इसी दलदल में फँसा हुआ है।

अब गोवा में काँग्रेस के दो और विधायक दयानन्द सोपते और सुभाष शिरोडकर अपनी राजनीतिक निष्ठा का सौदा करके बीजेपी के ख़ेमे में जा पहुँचे हैं। इनसे पहले, विश्वजीत राणे ने भी काँग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने के फ़ौरन बाद इसलिए पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था, ताकि राज्य की 40 में से 13 सीटें जीतने वाली बीजेपी, सरकार बना सके, सत्ता हथिया सके! तब भी, बीजेपी के धन-बल ने काँग्रेस को मिले जनादेश को पटखनी दी थी, और अब भी, विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त का गोरखधन्धा इसलिए आसानी से परवान चढ़ गया, क्योंकि बीजेपी को किसी भी क़ीमत पर गोवा में अपनी सरकार बचानी है।

बीजेपी को पता है कि जैसे लक्ष्मी की कृपा बदौलत उसने चौथी बार मनोहर पर्रिकर को गोवा का मुख्यमंत्री बनाया था, वैसे ही लक्ष्मी की कृपा से पर्रिकर सरकार को जीवनदान भी दिया जा सकता है। लक्ष्मी की इसी कृपा ने बीजेपी को नरभक्षी बना दिया है! उसके मुँह में विधायकों का ख़ून लग चुका है! सिर्फ़ गोवा में ही नहीं बल्कि पूर्वोत्तर के कई राज्यों में भी। इसीलिए, फरवरी से गम्भीर रूप से बीमार चल रहे मनोहर पर्रिकर की जगह न तो पार्टी ने नया मुख्यमंत्री चुना, ना काँग्रेस की माँग के मुताबिक उसकी सरकार बनवायी और ना ही विधानसभा में शक्ति-परीक्षण होने दिया, क्योंकि बीजेपी को अच्छी तरह से पता है कि विधानसभा के शक्ति परीक्षण में उसकी सरकार गिर जाती।

दरअसल, फरवरी 2017 में हुए गोवा के विधानसभा चुनाव में काँग्रेस 40 में से 17 सीटें जीतकर सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। बीजेपी को 13 सीटें मिली थीं। तीन-तीन सीटें क्षेत्रीय दलों, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी और गोवा फ़ारवर्ड को मिली। एक सीट एनसीपी के ख़ाते में गयी और तीन निर्दलीयों ने मैदान मारा। इसके बाद विधायकों के ख़रीद-फ़रोख़्त की मंडी सजी। इसमें काँग्रेस अपना दमख़म दिखाने में विफल रही। उसे एनसीपी के स्वाभाविक समर्थन का यक़ीन था, तो गोवा फ़ॉरवर्ड ने भी समर्थन का भरोसा दिलाया था। लेकिन काँग्रेस ने सौदा पटाने में देर कर दी। वो ज़बरदस्त गुटबाज़ी की वजह से अपने विधायक दल का नेता यानी मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी वक़्त रहते नहीं चुन सकी। इसीलिए राज्यपाल मृदुला सिन्हा के पास जाकर सरकार बनाने का दावा पेश करने में भी देरी हुई।

उधर, बीजेपी ने इस मौके का भरपूर फ़ायदा उठाया। उसने विधायकों की बोली लगाने की ज़िम्मा नितिन गडकरी को सौंपा, जिन्होंने दनादन एनसीपी, निर्दलीयों और गोवा फ़ॉरवर्ड के विधायक और ‘फ़िक्सर’ विजय सरदेसाई से सौदा पटा लिया। इतना ही नहीं, काँग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री रहे प्रताप सिंह राणे के बेटे और काँग्रेस के टिकट पर निर्वाचित विश्वजीत राणे की पारिवारिक निष्ठा का भी सौदा कर लिया। राणे ने तो शक्ति परीक्षण से पहले ही काँग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया। सौदेबाज़ी कितनी जानदार रही होगी, इसका जायज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उस वक़्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी फ़्राँस में राफ़ेल सौदा करने गये थे और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर गोवा में सब्ज़ी ख़रीद रहे थे, इसकी तस्वीर विजय सरदेसाई ने ही सोशल मीडिया पर डाली थी!

ख़ैर, पर्रिकर और गडकरी की थैलियों ने भरपूर रंग दिखाया। फ़्लोर टेस्ट में पर्रिकर सरकार को 24 वोट मिले। जबकि काँग्रेस 16 सीटों पर आ गयी। इसी वक़्त विश्वजीत राणे की सीट खाली हो गयी तथा बीजेपी ख़ेमे की संख्या 23 हो गयी और सदन की संख्या 39 हो गयी। पर्रिकर सरकार में गोवा फ़ॉरवर्ड के तीनों विधायक समेत आठ विधायक मंत्री बने। तब पर्दे के पीछे से विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त वाली मंडी का सारा इन्तज़ाम संवैधानिक अम्पायर और राज्यपाल मृदुला सिन्हा के हवाले था। उन्होंने अपनी पार्टी के इशारे पर कम सीटें जीतने वाली बीजेपी की सरकार बनवा दी। सबसे बड़े दल काँग्रेस को मौक़ा देने की परम्पराओं की धज़्ज़ियाँ उड़ा दी गयीं। लेकिन इसी दिन के लिए ही तो रीढ़-विहीन और लोकलाज़-रहित मृदुला सिन्हा को राज्यपाल बनाया था!

वक़्त का पहिया घूमा। ईश्वर ने बेईमानी से सत्ता हथियाने वाले पर्रिकर को उनके कर्मों का फल देने की ठानी। मुख्यमंत्री बनने के साल भर के भीतर ही, यानी फरवरी 2018 आते-आते, 62 वर्षीय पर्रिकर को पैंक्रियाज यानी पित्ताशय के कैंसर ने जकड़ लिया। इसी वक़्त, पर्रिकर के तीन और मंत्रियों की सेहत धोखा देने लगी। आलम ये हुआ कि जुलाई 2018 में विधानसभा के मॉनसून सत्र के वक़्त बिजली मंत्री पांडुरंग मडकैकर, शहरी विकास मंत्री फ़्रॉन्सिस डिसूज़ा और परिवहन मंत्री रामकृष्ण उर्फ़ सुदिन धवालिकर, सदन में मौजूद रहने की दशा में नहीं थे। पांडुरंग, ब्रेन-स्ट्रोक से जूझ रहे हैं तो डिसूज़ा भी कैंसर पीड़ित हैं। पर्रिकर की तरह इनकी सेहत भी तेज़ी से जबाब दे रही है। इसीलिए, सितम्बर में बीजेपी में नया मुख्यमंत्री ढूँढ़ने को लेकर ख़ासी सरगर्मी रही। लेकिन कोई उपयुक्त चेहरा नहीं मिला।

अब बीजेपी को साफ़ दिख रहा था कि उसकी सरकार अल्पमत में आ चुकी है। इसीलिए काँग्रेस की माँग के मुताबिक़, राज्यपाल मृदुला सिन्हा न तो शक्ति-परीक्षण के लिए राज़ी हुईं और ना ही राष्ट्रपति शासन के लिए। वैसे, मृदुला सिन्हा कोई इकलौती राज्यपाल नहीं हैं, जिन्हें बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का ही हुक़्म बजाना पड़ता है। आलम ये है कि यदि उन्होंने अपने दिमाग़ का इस्तेमाल कर लिया तो उन्हें भी मार्गदर्शक मंडल में ठेल दिया जाएगा! मृदुला ऐसी कोई अकेली राज्यपाल नहीं हैं। हरेक का यही हाल है। पूरे कुएँ में ही भाँग घुली पड़ी है!

यहाँ, बहस हो सकती है कि क्या काँग्रेस के ज़माने में ऐसा नहीं होता था? क्या तब राज्यपाल, केन्द्र सरकार के एजेंट नहीं हुआ करते थे? बेशक़, हुआ करते थे। लेकिन संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ाने और सत्ता के अहंकार में नंगा-नाच करने की ऐसी प्रवृत्ति तब नहीं थी। पर्दे के पीछे सब होता था, लेकिन मोदी राज जैसा ख़ुल्लमख़ुल्ला और ‘डंके की चोट पर’ वाली माहौल काँग्रेसियों की फ़ितरत में नहीं था। इसीलिए तब जो लोग काँग्रेस को पतित, भ्रष्ट और बेईमान होने का सर्टिफ़िकेट देते हुए अपने चाल-चरित्र-चेहरे की दुहाई देते फ़िरते थे, क्या वो भी सत्ता की ख़ातिर इतने पतित हो जाएँगे कि बेचारी ‘भारत से मुक्त हो चुकी काँग्रेस’ को भी शर्म आ जाए!

बहरहाल, अब काँग्रेस के दो और विधायकों के ‘बिक जाने’ के बाद भी गोवा विधानसभा में चार सीटें खाली हैं। काँग्रेस की तीन और बीजेपी की एक। अब सदन में बीजेपी के 12 विधायक हैं, तो काँग्रेस की संख्या 14 पर जा पहुँची है। बीजेपी को 10 विधायकों का समर्थन हासिल है। लेकिन मुख्यमंत्री समेत चार मंत्रियों का वोट अधरझूल में है। चार में से तीन बीजेपी के हैं तो सुदिन धवालिकर, महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी के नेता हैं। इस तरह, आशंका है कि कहीं शक्ति परीक्षण के वक़्त सत्ता पक्ष का दायरा 18 पर ही ना अटक जाए!

ऐसे में यदि काँग्रेस के दो विधायक नहीं बिकते तो 38 लोगों के सदन में 20 की आँकड़ा हासिल करना मुश्किल हो जाता। लिहाज़ा, बीजेपी के शूरमाओं ने साम-दाम-भेद-दंड का नुस्ख़ा अपनाकर विधानसभा की प्रभावी संख्या को ही घटा दिया और काँग्रेस के दो विधायक ख़रीद लिये! भगवा ख़ेमा अभी एकाध और शिकार की फ़िराक़ में है! ताकि आँकड़े आरामदायक बन सकें और बीजेपी ताल ठोंककर कह सके कि काँग्रेस से अपना घर तो सम्भलता नहीं, गोवा क्या सम्भालेंगे! विपक्ष में बैठी पार्टी के पास वैसे भी अपने विधायकों को लालच से बचाने के लिए बहुत कम विकल्प होते हैं। राजनीति का यही सबसे घिनौना चेहरा है! गोवा में ऐसा पहले भी होता रहा है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

चुनाव

मप्र में शिवराज के दांव पर कांग्रेस ने फेंका जाल

कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।

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Shivraj-Ajay

भोपाल, 10 नवंबर | मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘किसानपुत्र’, ‘महिला हितैषी’ और ‘युवाओं के हमदर्द’ होने के दांव पर कांग्रेस ने ‘वचनपत्र’ के जरिए ऐसा जाल फेंका है, जो शिवराज की बीते डेढ़ दशक में बनी छवि पर चादर डालता दिख रहा है।

शिवराज की अगुवाई में भाजपा तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। पिछले दो चुनावों में शिवराज की जीत में किसानों और महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। लाडली लक्ष्मी योजना और किसानों के लिए बनी योजनाओं ने शिवराज के सिर जीत का सेहरा बांधा था। शिवराज और भाजपा इस बार भी जीतने की रणनीति में व्यस्त है, मगर इसी बीच शनिवार को कांग्रेस ने ऐसा ‘वचनपत्र’ जारी किया, जिसमें सरकार बनने पर किसानों, युवाओं और महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के वादे किए गए हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक साजी थॉमस कहते हैं कि शिवराज बीते डेढ़ दशक में राज्य में खुद को किसानपुत्र, महिलाओं का भाई, लड़कियों का मामा और युवाओं के आदर्श के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में उन्हीं वर्गो के जीवन को बदलने का वादा किया है, जो शिवराज के निशाने पर और उनका सबसे बड़ा वोट बैंक रहा है। कांग्रेस के वादे पर यह वर्ग कितना भरोसा करता है, यह तो समय ही बताएगा।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा, “कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।”

वहीं कांग्रेस के वचनपत्र पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस वचन तो देती है, मगर उसे पूरा कभी नहीं करती। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने का वचन दिया था, मगर गरीबी नहीं हटी। राजीव गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, मगर गरीबी की जगह गरीब ही हटा दिए।

सच तो यह है कि भाजपा किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हें फसल का उचित दाम दिलाने के वादे करती रही, मगर सरकार की ये कोशिशें जमीनी स्तर पर रंग नहीं ला पाईं। बीते दो साल में किसानों के कई आंदोलनों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

वहीं उद्योगों की स्थापना के बावजूद पर्याप्त संख्या में युवाओं को रोजगार नहीं मिला, साथ ही महिला असुरक्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने वचनपत्र तैयार किया है, और सभी वर्गो से वादे किए हैं कि उनके कल्याण की योजनाएं तो बनेंगी ही, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात में बदलाव आाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस का वचनपत्र तो आ गया है, अब भाजपा का घोषणापत्र आने वाला है। अब देखना होगा कि भाजपा की क्या रणनीति होती है और वह कांग्रेस के वादों का किस तरह जवाब देती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तो मीडिया के सामने कह दिया है कि भाजपा संकल्पपत्र बनाती है, जो महज ‘जुमलापत्र’ बनकर रह जाता है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

व्यंग्य – जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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Politicians Cartoon

अभी-अभी केन्द्रीय कैबिनेट की एक आपात और बेहद ख़ुफ़िया बैठक हुई है! इसमें पहली बार संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के शीर्ष पदाधिकारी भी शामिल हुए! महामहिम चौकीदार महोदय ने सर्वोच्च स्तर की इस रणनीतिक मंत्रणा में अपने मंत्रियों को पीछे बैठाया और हिन्दू हित के संरक्षक महापुरुषों को अगली पंक्ति में बैठाया गया! बैठक में कई क्रान्तिकारी फ़ैसले लिये गये, लेकिन ये भी तय हुआ कि इनका औपचारिक ऐलान नहीं होगा! लिहाज़ा, सोशल मीडिया पर प्रकाशित इस पोस्ट को आप बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ मान सकते हैं!

सरकार ने तय किया है कि अब देश में ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ चलाया जाएगा! चुनाव आचार संहिता को देखते हुए अभी इस आन्दोलन का ऐलान नहीं किया जाएगा, लेकिन भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी। और, ऐसा होते ही जहाँ मुसलमानों का क़त्लेआम शुरू हो जाएगा, वहीं हिन्दुओं के ध्रुवीकरण इतना ज़ोर पकड़ लेगा, जैसे जंगल की बेक़ाबू आग!

भगवा ख़ानदान का यक़ीन है कि यदि उसकी ये रणनीति परवान चढ़ गयी तो न सिर्फ़ आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ऐतिहासिक कामयाबी मिलेगी, बल्कि 2019 के आम चुनाव में भी पार्टी कम से कम 350 सीटें जीतने में सफल होगी! कैबिनेट की विशेष बैठक में ये भी तय हुआ कि भगवा ख़ानदान के जुड़े लोग बड़े पैमाने पर शहरों, जगहों और भवनों के नाम बदलने की माँग करने वाले बयान देने पर ज़ोर दें। ताकि मीडिया में उन्हें भरपूर सुर्ख़ियाँ मिलती रहें। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि जनता का ध्यान राफ़ेल और नोटबन्दी जैसे विश्वस्तरीय घोटालों से हट जाएगा और वो मूर्खों की तरह से इस झाँसे में फँस जाएगी कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है! मोदी अजेय है!

  1. मुसलमान मंत्री बदले नाम

भगवा ख़ानदान के आग्रह पर ढोंगी सरकार ने तय किया है कि देश भर में बीजेपी की सरकारों में जो भी इक्का-दुक्का मुसलमान मंत्री हैं, उनके नाम फ़ौरन बदले जाएँ! वर्ना, इन मुसलमानों को मंत्री पद गँवाना होगा!

  1. ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवान ख़ानदान ने तय किया है कि अब अंडे को ‘पक्षीफल’ कहा जाएगा! इस फल से न सिर्फ़ मन्दिरों में भगवान का भोग लगाया जा सकेगा, बल्कि व्रत-उपवास में इसे फलाहार के रूप में इस्तेमाल करना होगा!

  1. वीर सावरकर पक्षीपालक योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना की आत्मा को मेक इन इंडिया की आत्मा से जोड़ा जाएगा। भगवा ख़ानदान को यक़ीन है कि आत्माओं के मिलन वाली इस क्रान्तिकारी नीति से पक्षीफलों की माँग में ज़बरदस्त उछाल आएगा और पक्षीपालकों के रूप में कम से कम 10 करोड़ युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर खुलेंगे। इसे वीर सावरकर पक्षीपालक योजना कहा जाएगा। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा की सुविधा भी आरक्षण की तरह इस अद्भुत योजना के तहत में पहले दस साल तक मुफ़्त मिलेगी और भविष्य में भी इसे आरक्षण की ही तरह दस-दस वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

  1. दीनदयाल पकौड़ा योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना में उन लोगों को वरीयता मिलेगी जो अपने ‘भक्त होने का आधार कार्ड’ दिखा सकें और जो ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ के लाभार्थी नहीं हो! ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री पकौड़ा रोज़गार योजना का भी नया नामकरण कर दिया गया है! उसे अब ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ कहा जाएगा!

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ओपिनियन

अंतिम सांस तक कांग्रेसी, मगर बेटे का साथ दूंगा : सत्यव्रत चतुर्वेदी

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे।

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Satyavrat Chaturvedi

छतरपुर, 9 नवंबर | कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता और पूर्व राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन बंटी चतुर्वेदी ने बगावत कर समाजवादी पार्टी का दामन थामकर छतरपुर जिले के राजनगर विधानसभा क्षेत्र से नामांकनपत्र भरा है। चतुर्वेदी का कहना है कि वे अंतिम सांस तक कांग्रेसी हैं, मगर एक पिता के तौर पर बेटे का हर संभव साथ देंगे, क्योंकि छुपकर राजनीति करना उनकी आदत में नहीं है।

नितिन बंटी चतुर्वेदी राजनगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के दावेदार थे, मगर कांग्रेस ने अंतिम समय में उसका टिकट काट दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के कहने पर नितिन ने सपा का दामन थामकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

सत्यव्रत चतुर्वेदी ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, “नितिन बालिग है, उसे अपने फैसले करने का हक है, पिछले दो चुनाव से वह कांग्रेस से टिकट मांग रहा था, पार्टी ने हर बार अगले चुनाव का भरोसा दिलाया, मगर इस बार फिर वही हुआ। पार्टी ने टिकट नहीं दिया, इन स्थितियों में बंटी ने सपा से चुनाव लड़ने का फैसला लिया, यह उसका व्यक्तिगत फैसला है। मैं तो अंतिम सांस तक कांग्रेसी रहूंगा। हां, पिता के नाते बंटी का साथ दूंगा। छुपकर कहने और राजनीति करना आदत में नहीं है, जो करना है वह कहकर करता हूं, छुपाता नहीं हूं।”

चतुर्वेदी से जब पूछा गया कि बेटा सपा से चुनाव लड़ रहा है, पार्टी आप पर कार्रवाई कर सकती है, तो उनका जवाब था, “मैं कांग्रेस में जन्मा हूं, कांग्रेसी रक्त मेरी नसों में प्रवाहित होता है, दिल में कांग्रेस है, पार्टी को फैसले लेने का अधिकार है, मगर मेरे दिल से कोई कांग्रेस को नहीं निकाल सकता। अंतिम सांस भी कांग्रेस के लिए होगी।”

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे। बाबूराम चतुर्वेदी राज्य सरकार में मंत्री रहे और विद्यावती कई बार सांसद का चुनाव जीतीं। बुंदेलखंड में उनकी हैसियत दूसरी इंदिरा गांधी के तौर पर रही है।

चतुर्वेदी के समकालीन नेताओं में शामिल दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुभाष यादव आदि ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार में एक और एक से ज्यादा सदस्यों को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है, मगर चतुर्वेदी के बेटे को पार्टी ने टिकट देना उचित नहीं समझा। इसी के चलते उनके बेटे बंटी ने बगावत कर दी।

अन्य नेताओं के परिजनों को टिकट दिए जाने के सवाल पर चतुर्वेदी का कहना है, “इस सवाल का जवाब तो मैं नहीं दे सकता, यह जवाब तो पार्टी के बड़े नेता और टिकटों का वितरण करने वाले ही दे सकते हैं, जहां तक बात मेरी है, मन में तो मेरे भी सवाल आता है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों।”

कांग्रेस में टिकट वितरण की कवायद छह माह पहले ही शुरू करने का ऐलान कर दिया गया था, जगह जगह पर्यवेक्षक भेजे गए, सर्वे का दौर चला, नेताओं की टीमों ने डेरा डाला और वादा किया गया कि न तो पैराशूट वाले नेता चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे और न ही बीते चुनावों में भारी मतों से हारे उम्मीदवारों को मौका दिया जाएगा। मगर उम्मीदवारों की सूचियां इन सारे दावे और वादे की पोल खोलने के लिए काफी है।

चतुर्वेदी भी इस बात से हैरान हैं कि जो व्यक्ति पिछला चुनाव 38 और 40 हजार से हारा, उसे उम्मीदवार बना दिया गया। आखिर किसने और कैसा सर्वे किया, यह वे समझ नहीं पा रहे हैं। अब तो चुनाव के बाद ही पार्टी को इन हालात की समीक्षा करनी चाहिए, आखिर किसने किस तरह का खेल ख्ेाला।

–आईएएनएस

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