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ज़रा हटके

‘मुस्लिम लड़कियों की घर व स्कूल की शिक्षा में फर्क नहीं’

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Muslim Girl

करीब एक दशक पहले लतिका गुप्ता ने जब दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन आरंभ किया था तो वह यह जानने को लेकर उत्सुक थीं कि लड़कियों के जीवन पर धर्म और लैंगिक पहचान का परस्पर क्या प्रभाव पड़ता है। इस लगभग अनजान से पहलू की तलाश में वह जिस यात्रा पर निकलीं, उसका समापन एक एक पुस्तक के रूप में हुआ, जो हाल ही में प्रकाशित हुई है।

अंग्रेजी में लिखी गई पुस्तक ‘एजुकेशन, पॉवर्टी एंड जेंडर : स्कूलिंग मुस्लिम गर्ल्स इन इंडिया’ (शिक्षा, निर्धनता, लिंग : भारत में मुस्लिम बालिकाओं की स्कूली शिक्षा) में बच्चियों की शिक्षा पर धर्म और संस्कृति के प्रभावों को प्रमुखता से रेखांकित किया गया है और इसके लिए ‘घर’ और ‘विद्यालय’ के बीच के पारस्परिक प्रभावों की पड़ताल की गई है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के केंद्रीय शिक्षा संस्थान में सहायक प्रोफेसर लतिका गुप्ता उस समय जिस पाठ्यक्रम में अध्यापन कर रही थीं, उसमें लड़कियों को अपने समाजीकरण पर विचार प्रस्तुत करने के मौके दिए जाते थे। उन्होंने पाया कि उनकी एक-दो छात्राओं को छोड़कर बाकी सब एक बात में समान थी कि वे सांस्कृतिक कसौटियों के पालन पर दृढ़ हैं लेकिन व्यक्तिगत विकास के प्रति उदासीन नजर आती हैं।

गुप्ता ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “मैं अक्सर हैरान रहती थी कि मेरी छात्राएं अपने घरों में धार्मिक कार्यक्रमों या घरेलू कामकाज में शामिल होने की वजहों से कक्षाएं छूटने से क्यों नहीं शर्मिदा महसूस करती हैं। ऐसी कौन-सी बात है जिनको लेकर उनमें अपने आपको विकसित करने की समझ पैदा नहीं हो पा रही है और वे पढ़ाई में अपनी ज्यादा-से ज्यादा ऊर्जा नहीं लगा पा रही हैं? यह मेरा व्यक्तिगत एजेंडा बन गया कि उन ताकतों का पता लगाऊं जो लड़कियों की जिंदगी और उनकी अपनी पहचान को आकार देतीं हैं।”

उनकी किताब में एक समुदाय की धार्मिक व सांस्कृतिक रूपरेखा और विद्यालय जीवन के पारस्परिक संबंध को तलाशने का प्रयास किया गया है। यह अध्ययन निम्न सामाजिक-आर्थिक हालात में में पल रहीं मुस्लिम बालिकाओं के शैक्षणिक अनुभव की जटिलता को समझने का साधन भी है। यह उस परिवेश में बारे में भी बताता है, जहां धर्म और लिंग के एक साथ मिलने से विशिष्ट सामाजिक व आर्थिक संदर्भ में एक सामाजिक ताकत का निर्माण होता है।

गुप्ता ने अल्पसंख्यकों के एक विद्यालय में पढ़ने वाली लड़कियों की पहचान का अध्ययन किया। इस विद्यालय का संचालन संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 के तहत उल्लिखित प्रावधानों के तहत होता है, जिनमेंधार्मिक अल्पसंख्यकों को अपने शैक्षणिक संस्थान चलाने की इजाजत दी गई है।

उन्होंने स्कूल में पढ़ने वाली लड़कियों से उनके जीवन व उनकी आकांक्षाओं और उनकी पहचान के विभिन्न आयामों के बारे लिखवाकर उनके जीवन के अनुभवों का संकलन किया। इस प्रकार करीब एक साल तक लगातार उनके अनुभवों और उनके माता-पिता से बातचीत का उन्होंने संकलन करके उन सारे तथ्यों का गहन अध्ययन व विश्लेषण किया।

गुप्ता ने पाया कि विद्यालय की ओर से अपनी छात्राओं में वैसी क्षमता व योग्यता नहीं पैदा की जाती है जिससे वे अपने जीवन में आर्थिक व बौद्धिक संभावनाओं का उपयोग अपने के लिए कर पाएं। घर की जिंदगी और बाहर के जीवन में इनकी लैंगिक पहचान को लेकर किसी तरह का दखल स्कूल का नहीं होता।

गुप्ता की किताब दरियागंज के एक स्कूल में किए गए अध्ययन पर आधारित है। हालांकि निजता को बनाए रखने के मकसद से पूरी किताब में स्कूल का जिक्र महज मुस्लिम गर्ल्स स्कूल (एसएसजी) के रूप में हुआ है।

अध्ययन में मुस्लिम समुदाय की लड़कियों के लिए स्कूल और घर के बीच के मूल्यों और व्यवहारों में एक निरंतरता पाई गई। दरियागंज की मुस्लिम लड़कियों के लिए कोई वैकल्पिक आचरण का रूप उपलब्ध नहीं है। लड़कियां जो घर में सीखती हैं, वही स्कूल में सीखती हैं। टीचर और मां, दोनों से उन्हें समान शिक्षा मिलती है जबकि टीचर शिक्षित होती हैं और उन्हें पेशागत तालीम भी मिली होती है।

गुप्ता ने कहा कि एमजीएस की लड़कियों के जीवन में स्कूल की भूमिका लैंगिक सामाजीकरण के सुव्यवस्थित लक्षणों और महिला जीवन के पूर्व निर्धारित व स्पष्ट मकसदों के मध्य आती है। दोनों तरफ के दबाव के कारण लड़कियों को ज्ञान के विविध क्षेत्रों की जानकारी हासिल करने व उनमें शामिल होने की इजाजत देने के लिए स्कूल के पास बहुत कम संभावना बच जाती है। साथ ही अध्ययन में पाया गया कि अधिकांश मुस्लिम छात्राएं हिंदुओं के बारे में अच्छा और सहिष्णु नजरिया रखती हैं।

गुप्ता ने कहा कि अध्ययन में उन्होंने पाया कि लड़कियों का यह मानना है कि पत्नी के लिए जरूरी है कि वह सास-ससुर, पति व बच्चों की सेवा करे। वे पति से अपनी जरूरतों की पूर्ति के लिए सहज आर्थिक योगदान की अपेक्षा रखती हैं। किसी भी लड़की को यह नहीं लगता कि एक महिला के लिए अच्छी पत्नी होने के लिए परिवार को अपने दम पर आर्थिक सहयोग देना आवश्यक है।

ज़रा हटके

पहाड़ों में लटके इस मंदिर को देख चौक जाएंगे आप…

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temple

पहाड़ियों पर बसे मंदिर आपने देखे होंगे, लेकिन क्या कभी पहाड़ों पर लटके मंदिर के बारे में आपने सुना है। जी हां, विश्व के अद्भुत अजूबों में एक लटका हुआ मंदिर भी है। चीन के शांझी में हेंग माउंटेन पर एक ऐसा मंदिर है जो अजीबो-गरीब तरीके से पहाड़ों पर लटका है। इस मंदिर को हैंगिंग मॉनैस्ट्री के नाम से भी जाना जाता है।

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कहा जाता है कि 1500 साल पुराने मंदिर को यहां इसलिए बनाया गया था कि मंदिर बाढ़ से प्रभावित ना हो और बारिश और तूफान से बचा रहे। मंदिर के सबसे पास दटोंग शहर है, जो उत्तर-पश्चिम में 64.23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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युन्गंग ग्रोत्टेस के साथ-साथ हैंगिंग मंदिर भी दटोंग शहर की एतिहासिक जगहों में से एक है। यह मंदिर केवल अपने स्थान ही नही बल्कि तीन चीनी पारंपरिक धर्म बुद्ध, ताओ और कंफुशिवाद के मिलाप के लिए भी जाना जाता है। मंदिर की संरचना को ओक क्रॉसबीम्स में फिट किया गया है।

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मंदिर की मुख्य सहायक संरचना आधार स्तम्भ के भीतर छुपी हुई है। यह मठ छोटे कैनियन बेसिन में बना हुआ है और इमारत के शरीर प्रमुख शिखर सम्मेलन के तहत चट्टान के बीच से लटका हुआ है। मंदिर के निर्माण कार्य की शुरुवात उत्तरी वेई साम्राज्य के अंत में लिओं रैन नाम के इंसान द्वारा की गई।

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चाइनीज आर्किटेक्चर का अध्ययन करने वाले लोगों के लिए ये एक प्रमुख जगह है। मंदिर के करीब 40 अलग-अलग हॉल हैं और वे एक दूसरे से कनेक्टेड हैं। मंदिर में कई प्राचीन स्टैच्यू भी रखे गए हैं। चीन के डैटोंग क्षेत्र में यह मंदिर टूरिस्टों के आकर्षण का केंद्र है।

यहां पहुंचने का रास्ता लकड़ी और लोहे की सीढ़ियों से बना है। मंदिर को देखने के लिए एशिया के कई देशों के अलावा यूरोप से भी पर्यटक पहुंचते हैं।यहां पहुंचने का रास्ता लकड़ी और लोहे की सीढ़ियों से बना है।

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ओपिनियन

सहित्य साधना सृजन की चीज : वीणा ठाकुर

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

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veena thakur maithili sahitya
Picture Cridit : Swatva Samachar

दरभंगा, 6 दिसंबर | सर्वोच्च साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी से मिथिला क्षेत्र की समृद्ध मैथिली भाषा ही बिहार को अमूमन हर साल पुरस्कार दिलाती रही है। इस बार इस पुरस्कार के लिए दरभंगा की रहने वाली कथाकार प्रो.वीणा ठाकुर को चुना गया है। वीणा का चयन उनके कथा-संग्रह ‘परिणीता’ के लिए किया गया है।

वीणा का कहना है कि साहित्य साधना की चीज है। किसी भी कृति का समय खुद मूल्यांकन करता है, इस कारण साहित्यकारों को हड़बड़ी में नहीं, बल्कि किसी भी रचना के लिए धैर्य रखने की जरूरत है।

बचपन से ही लिखने-पढ़ने की शौक रखने वाली वीणा अपने संस्मरणों को याद करते हुए बताती हैं, “जब मैं पांचवीं कक्षा में थी, तभी तुलसीदास की रामचरित मानस पढ़ ली थी। यही नहीं, छठे वर्ग की पढ़ाई के दौरान ही घर से पैसे चुराकर विमल मित्र के बांग्ला उपन्यास का हिंदी अनुवाद ‘खरीदी कौड़ियों का मोल’ खरीदकर लाई थी और उसे मैंने पढ़ा था। पैसे चुराने को लेकर मुझे घर में डांट भी पड़ी थी।”

मधुबनी जिले के भवानीपुर की बेटी और दरभंगा के पंचोभ गांव की बहू वीणा ने अकादमी पुरस्कार की घोषणा के बाद आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि यह सम्मान मैथिली भाषा का है। इस पुरस्कार के बाद उनकी जिम्मेवारी और बढ़ गई है।

उन्होंने कहा कहा, “वैसे तो साहित्यकारों के लिए कई पुरस्कार हैं, लेकिन साहित्य अकादमी पुरस्कार साहित्यकारों के लिए सर्वोच्च पुरस्कार है। मुझ पर ईश्वर की असीम अनुकंपा है कि इस पुरस्कार के लिए मेरा नाम चयनित हुआ।”

कथा-संग्रह ‘परिणीता’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस कथा संग्रह में वैसे तो कई कहानियां हैं, मगर कथा ‘निरूत्तरित प्रश्न’ आज की जीवनशैली के काफी नजदीक है। उन्होंने कहा कि इसमें बुढ़ापे की अवस्था में पहुंचने और पुत्रों के रवैये को बताया गया है।

उपन्यास ‘भारती’, कथा-संग्रह ‘आलाप’, समीक्षा ‘मैथिली रामकाव्यक परंपरा’, ‘विद्यापतिक उत्स’, ‘इतिहास दर्पण’, ‘वाणिनी’, ‘मैथिली गीत साहित्यक विकास आ परंपरा’ तथा अनुवाद की पुस्तक ‘हाट-बाजार’ और ‘भारतीय कविता संचयन : हिंदी’ की रचनाकार वीणा का कहना है कि आज के युवा साहित्यकार किसी भी काम में हड़बड़ी में रहते हैं और तुरंत सभी कुछ पा लेना चाहते हैं।

उनका मानना है साहित्य हड़बड़ी नहीं, धैर्य की चीज है, जिसमें आपकी कृति या रचना को पाठक अवलोकन और मूल्यांकन करते हैं।

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में प्रो. मोहन ठाकुर के घर 19 मार्च, 1954 को जन्म लेने वाली और दरभंगा के पंचोभ गोव में पशु चिकित्सा पदाधिकारी डॉ़ दिलीप झा की पत्नी वीणा ठाकुर बिरला फाउंडेशन के प्रतिष्ठित सम्मान के लिए गठित मैथिली भाषा समिति की संयोजिका हैं।

ललित नारायण विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर मैथिली विभाग की पूर्व अध्यक्ष वीणा की प्रारंभिक शिक्षा सहरसा में हुई और उच्च शिक्षा भागलपुर विश्वविद्यालय में हुई।

मैथिली भाषा के विषय में पूछे जाने पर प्रोफेसर वीणा कहती हैं, “मैंने तो मैथिली भाषा मां की गोद में सीखी। मैं इस भाषा की कृतज्ञ हूं। मेरे लिए यह भाषा नहीं, मेरा साहित्य सफर है। यही कारण है कि मेरी कहानियों में परंपरा, साहित्य, संस्कृति के साथ आधुनिकता से मैथिली के जुड़ने की भी कहानी रहती है।”


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ज़रा हटके

भोपाल गैस त्रासदी के शिकार लोगों को बच्चों ने मोमबत्ती जलाकर दी श्रद्धांजलि

यहां पहुचे बच्चों में बड़ी संख्या में वे थे, जो जन्मजात विकलांग हैं।

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Bhopal gas tragedy

भोपाल, 1 दिसंबर | मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 34 साल पहले हुई गैस त्रासदी का दंश भोगने को अब भी लोग मजबूर हैं। कई बच्चे जन्म से ही विकलांग हैं। इन बच्चों ने शनिवार को अपने बुजुर्गो के साथ मोमबत्ती जलाकर दुनिया छोड़ गए लोगों को श्रद्धांजलि दी।

राजधानी के नीलम पार्क में चिंगारी पुनर्वास केंद्र के विकलांग बच्चों ने मोमबत्ती जलाकर अपनी श्रद्धांजलि दी। यहां पहुचे बच्चों में बड़ी संख्या में वे थे, जो जन्मजात विकलांग हैं। संस्था की प्रबंध न्यासी चंपा बाई और रशीदा बी ने बताया, “इन विकलांग बच्चों ने मोमबत्ती जलाकर दुनिया को संदेश दिया है कि भोपाल जैसी त्रासदी कहीं और न हो।”

इसी तरह भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन ने रविवार को शाहजहांनी पार्क में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया है। श्रद्धांजलि सभा दोपहर 12 बजे से तीन बजे तक चलेगी।

–आईएएनएस

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