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जनाब झूठली साहब और नोटबन्दी का पंचनामा!

ज़रा समझिए कि जिन 17.42 लाख मगरमच्छों और घड़ियालों को पकड़ने के लिए नोटबन्दी के ज़रिये, जिस नदी या सागर को ही सुखाने का फ़ैसला लिया गया, उसमें 130 करोड़ भारतीय नागरिक या जीव-जन्तु पल रहे थे। ग़लत नीति की वजह से मगरमच्छ तो पानी से निकलकर तटों पर जा छिपे, लेकिन 129.82 करोड़ भारतवासियों का जीना मुहाल हो गया। अरे, इतना बड़ा मूर्ख तो पाग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ भी नहीं था!

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वित्तमंत्री अरूण जेटली को आप चाहें तो झूठली साहब कह सकते हैं। इन्हें अक्सर ही मोदी सरकार के कुकर्मों को धोने की पीड़ा झेलनी पड़ती है। फिर चाहे वो नोटबन्दी हो या खोटी जीएसटी या राफ़ेल घोटाला। बेचारे झूठली नहीं जानते कि ‘बिगरी बात बने नहीं लाख करो किन कोय, रहिमन बिगरै दूध को मथे ना माखन होय!’ झूठली के ताज़ा फ़ेसबुक पोस्ट ज़ाहिर है कि 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे, या तो ये महाशय सो रहे थे या फिर घनघोर नशे में थे! तब नरेन्द्र मोदी ने नोटबन्दी के तीन उद्देश्य बताये थे: कालेधन और भ्रष्टाचार पर हमला, आतंकी फ़ंडिंग और हवाला पर चोट और जाली नोटों का सफ़ाया! लेकिन झूठली आज जिस नोटबन्दी की तारीफ़ के पुल बाँध रहे उसमें इन तीनों ही उद्देश्यों को लेकर उनकी बोलती बन्द है! क्यों भला? आइए ज़रा इसका जायज़ा लें।

1. झूठली लिखते हैं कि नोटबन्दी के बाद बड़ी मात्रा में बैंकों में पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट जमा करवाने वाले 17.42 लाख संदिग्ध खाताधारकों का पता चला। उन पर कार्रवाई हुई।

झूठ: क्या-क्या कार्रवाई हुई? किन-किन लोगों पर? उनके नाम क्यों कौन ज़ाहिर करेगा? अभी तक नामों का ख़ुलासा क्यों नहीं हुआ? इन संदिग्ध खातों में कितने रुपये जमा हुए? सरकार ने कितने मामलों में कितना रुपया ज़ुर्माना वसूला? कितने लोगों को जेल की हवा खिलायी?

सच: इनमें से एक भी सवाल का ऐसा जवाब झूठली के पास नहीं है, जिसे बताकर वो मोदी सरकार की पीठ ठोंक सकें। इसीलिए कोई ब्यौरा नहीं देते। अब ज़रा समझिए कि जिन 17.42 लाख मगरमच्छों और घड़ियालों को पकड़ने के लिए नोटबन्दी के ज़रिये, जिस नदी या सागर को ही सुखाने का फ़ैसला लिया गया, उसमें 130 करोड़ भारतीय नागरिक या जीव-जन्तु पल रहे थे। ग़लत नीति की वजह से मगरमच्छ तो पानी से निकलकर तटों पर जा छिपे, लेकिन 129.82 करोड़ भारतवासियों का जीना मुहाल हो गया। अरे, इतना बड़ा मूर्ख तो पाग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ भी नहीं था!

2. झूठली कहते हैं कि नोटबन्दी से बैंकों में जो रुपया पहुँचा, उससे नये क़र्ज़दारों में क़र्ज़ा बाँटा गया!

झूठ: कितना रुपया, किन लोगों को, किन योजनाओं के तहत क़र्ज़ में बाँटा गया? इसमें से कितने सरकार के चहेते और बैंकों के लुटेरे थे? देश को ये क्यों नहीं पता चल सकता कि नोटबन्दी की आड़ में किन-किन क़र्ज़दारों का भला हुआ?

सच: मुद्रा लोन के तमाम भ्रामक आँकड़े सरकार ने जारी किये थे। इसकी पोल खुल चुकी है। ये भी किसी से छिपा नहीं है कि बैंकों का एनपीए अब 12 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। नीरव, मेहुल, माल्या, संदेसरा जैसे मोदी के अज़ीज़ दोस्त, सरकारी बैंकों को लूटकर फ़ुर्र हो चुके हैं। ताज़ा स्थिति ये है कि नगदी संकट और घपलों-घोटालों से जूझ रहे 11 बड़े बैंकों पर रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ बाँटने पर रोक लगा रखी है, क्योंकि उनकी भारी पूँजी डूब चुकी है। इनमें से 10 बैंक तो पूरी तरह से सरकारी हैं। इन्हें उबारने के लिए ही वित्त मंत्रालय ने रिज़र्व बैंक से 3.6 लाख करोड़ रुपये की आरक्षित निधि (यानी एक तिहाई से अधिक रिज़र्व ख़ज़ाना) जारी करने को कहा है। इसे लेकर ही तो उर्जित पटेल और अरूण झूठली में ठनी हुई है।

3. डिजिटाइजेशन को लेकर झूठली का कहना है कि आज 130 करोड़ की आबादी में 1.25 करोड़ लोग भीम एप का इस्तेमाल कर रहे हैं।

झूठ: डिजिटल लेनदेन की संख्या का कोई ख़ास मतलब नहीं है। ये अरबों-ख़बरों में पहुँच जाये तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। देखना ये चाहिए कि अर्थव्यवस्था के कुल लेनदेन में डिजिटल की हिस्सेदारी कितनी है?
सच: 100-200, 500-1000 वाले लेनदेन के डिजिटाइज़्ड होने के आधार पर नोटबन्दी को क़ामयाब नहीं बताया जा सकता। नोटबन्दी के दो साल बाद भी एक फ़ीसदी से कम आबादी का भीम एप या रुपै कार्ड जैसी जुगत का इस्तेमाल करना ये बताता है कि 99 प्रतिशत लोग आज भी इससे दूर हैं। अलबत्ता, मोदी की मेहरबानी से पेटीएम जैसी चीनी निवेश से चल रही कम्पनी ज़रूर निहाल हो गयी। भारतीयों के बीच ख़ुदरा लेनदेन का व्यापक ज़रिया आज भी कैश ही बना हुआ है।

रिज़र्व बैंक के मुताबिक, दो साल पहले नोटबन्दी की रात 17.01 लाख करोड़ रुपये प्रचलन में थे। लेकिन अब ये संख्या 18.76 लाख करोड़ रुपये है। यानी आज भी कैश ही किंग है। 2016 में प्रचलित रुपयों की मात्रा में सालाना 17.7 फ़ीसदी की दर से बढ़ोत्तरी हो रही थी, जो अब घटने के बजाय बढ़कर 22.2 फ़ीसदी हो चुकी है। लेकिन झूठली को इसकी चिन्ता नहीं सता रही। यहीं, हमें याद रखना चाहिए कि नेट बैंकिंग और प्लास्टिक मनी यानी क्रेडिट-डेबिट कार्ड वग़ैरह का नोटबन्दी से कोई वास्ता नहीं है। ये सुविधाएँ पहले से मौजूद हैं। पहले भी लोग बड़े पैमाने पर डिजिटल पेमेंट का तरीक़ा अपनाते रहे हैं। नोटबन्दी से इसमें इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन ऐसे इज़ाफ़े के लिए नोटबन्दी कोई अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती। लिहाज़ा, डिजिटल लेनदेन में हुई बढ़ोत्तरी के लिए नोटबन्दी का गुणगान करना जनता को मूर्ख बनाने के सिवाय और कुछ नहीं है!

4. वित्तमंत्री बता रहे हैं कि नोटबन्दी के बाद प्रत्यक्ष कर यानी डायरेक्ट टैक्स के संग्रह में इज़ाफ़ा हुआ है। ये 6.6 और 9% से बढ़कर 14 और 16% दर्ज़ हुआ है। इसी तरह टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या 25 से 55% फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है। इस साल 86.35 लाख लोगों ने पहली बार रिटर्न भरा।

झूठ: टैक्स संग्रह में इज़ाफ़ा, नोटबन्दी से पहले भी हरेक साल होता रहा है। सरकार ये क्यों नहीं बता रही कि कुल डायरेक्ट टैक्स में आयकर का हिस्सा कितना है? आयकर के मद में कितने फ़ीसदी तेज़ी नोटबन्दी की वजह से आयी है? क्या ऐसा इज़ाफ़ा टैक्स की दर यानी रेट ऑफ़ टैक्स में बदलाव लाकर नहीं हासिल किया जा सकता था, तो फिर नोटबन्दी की ज़रूरत क्यों पड़ी? झूठलीजी, जनता को ये क्यों नहीं बताते कि मोदी राज में आयकर की दर में कितना इज़ाफ़ा किया गया? महँगाई से स्टैंडर्ड डिडक्शन को क्यों अछूता रखा गया? इससे आयकर के दायरे में आने वाले लोगों की संख्या क्या अपने आप नहीं बढ़ती चली जाएगी?

सच: आयकर और डायरेक्ट टैक्स का संग्रह बढ़ाने के लिए नोटबन्दी की कोई ज़रूरत नहीं होती। लोग यदि टैक्स की चोरी कर रहे हैं तो उन्हें पकड़ना इनकम टैक्स विभाग का काम है। सेल कम्पनियों की गड़बड़ी को पकड़ना, कम्पनी कार्य मंत्रालय का काम है। सभी संस्थाओं के पास अपने दायित्व निभाने के लिए पर्याप्त अधिकार हैं। इन्हें नोटबन्दी नामक हथियार की कोई ज़रूरत नहीं थी। जहाँ तक ज़्यादा रिटर्न दाख़िल करने का सवाल है तो वित्तमंत्री ने क्या देश को ये भी बताया है कि रिटर्न भरने वाले नये लोगों से कितना अतिरिक्त आयकर प्राप्त हुआ है? नहीं बताया! क्योंकि रिटर्न भरने वाले ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जितनी आमदनी नोटबन्दी के बाद कम हुई है और इनसे मिलने वाले कुल टैक्स की रक़म घटी है।

5. झूठली बाबा ने नोटबन्दी के दो साल बाद भी देश को ये नहीं बताया कि क्या अब तक बैंकों में जमा हुए नोटों की गिनती हो गयी?

झूठ: मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर उम्मीद जतायी थी कि नोटबन्दी से क़रीब तीन से चार लाख करोड़ रुपये बैंकों में नहीं लौटेंगे, क्योंकि ये रक़म या तो काला धन है या आतंकियों और नक्सलियों के पास है या फिर इसमें जाली नोट शामिल हैं। उधर, देश भर में बन्द हुए नोटों का 99.3% बैंकों में आ गया। बाक़ी का ब्यौरा कहाँ है? अभी तक गिनती पूरी क्यों नहीं हुई? कब पूरे आँकड़े देश के सामने होंगे?

सच: काला धन का वारा-न्यारा करने वालों में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का नाम बहुत ऊपर है। उनके सहकारी बैंक ने एक झटके में 750 करोड़ रुपये से ऊपर की रक़म को काले से गोरा बना दिया। लेकिन दो साल बाद भी किसी का बाल तक बाँका नहीं हुआ! अरे झूठलीजी, आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि नोटबन्दी ही विश्व का सबसे बड़ा घोटाला है! वर्ना, यदि मक़सद पुराने नोटों को बैंकों में लाने का ही होता तो फिर इसके लिए भी नोटबन्दी की कोई ज़रूरत नहीं थी। पुराने नोटों को अमान्य किये बग़ैर, नये नोट का अकाल पैदा किये बग़ैर, एटीएम को फ़िट बनाये बग़ैर, बैंकों में पर्याप्त नये नोटों का इन्तज़ाम किये बग़ैर भी इस उद्देश्य को हासिल किया जा सकता था। घर में पड़े नोटों को बैंकों में खींचकर लाने के लिए नोटबन्दी से बड़ा मूर्खतापूर्ण और दुर्भावनापूर्ण कोई और तरीक़ा नहीं हो सकता!

कुलमिलाकर, नोटबन्दी को आँकड़ों के मकड़जाल में उलझाकर इसे लाभदायक और क्रान्तिकारी बताने वाले झूठली का मक़सद एक बार फिर से लोगों की आँखों में धूल झोंककर उन्हें उल्लू बनाने का ही है। वर्ना, सच्चाई तो ये है कि रिश्वतख़ोरी, भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे हरेक मोर्चे पर नोटबन्दी पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था, रोज़गार और काम-धन्धों को ऐसा झटका लगा कि वो दो साल बाद भी उबर नहीं पाये हैं। नोटबन्दी ने ग़रीबों, मज़दूरों और किसानों को इतना ज़बरदस्त नुक़सान पहुँचाया है, जैसा उन्हें, शायद बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भी नहीं पहुँचता है! नोटबन्दी हर लिहाज़ से मूर्ख शासकों की मानव-निर्मित आपदा साबित हुई!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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सेना ने माना, आईएलएंडएफएस बांड में फंसा एजीआईएफ का पैसा

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Indian Army insurance ILFS bonds

नई दिल्ली, 18 मार्च | भारतीय सेना जो पहले यह मानने को तैयार नहीं थी कि उनके कल्याण की निधि का पैसा आईएनएंडएफएस के विषैले बांड में फंस गया है, जबकि आईएनएस इस बात को बार-बार दोहराता रहा, लेकिन अब वह स्वीकार करती है कि भारत की एकमात्र निष्पक्ष न्यूज वायर का विश्लेषण सही है।

सेना के पीआरओ ने आखिरकार सवालों का जबाव देते हुए कहा कि आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड (एजीआईएफ) के काफी सख्त निवेश नियम हैं। देश के अत्यंत सम्मानित व प्रख्यात वित्तीय शख्सियतों की सलाह पर निवेश किया जाता है। इससे पहले सेना के पीआरओ लेफ्टिनेंट कर्नल मोहित वैष्णव मसले को उलझाते रहे और जवाब नहीं दिए थे। सेना का हालिया बयान आईएएनएस के तथ्यों के साथ इस प्रकार है :

एजीआईएफ का वर्षो से रिटर्न निर्धारित जोखिम लाभ सांचे में काफी बेहतर रहा। आईएएनएस ने इसपर कभी संदेह नहीं किया।

एजीआईएफ को 200 से कोई एनपीए नहीं रहा। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएनएंडएफएस) ट्रिपल ‘ए’ रेटेड कंपनी थी और जब एजीआईएफ का निवेश हुआ उस समय उसे केंद्र व राज्य सरकारों दोनों की मदद मिली थी। कंपनी अगस्त 2018 में अचानक चूक के कारण ट्रिपल ‘ए’ से नीचे आ गई।

आईएएलएंडएफएस के 91,000 करोड़ के कर्ज में बैंकों का 63 फीसदी, म्यूचुअल फंड का तीन फीसदी से ज्यादा और बीमा कंपनियों, ईपीएफ वे पेंशन निधि का पांच फीसदी से ज्यादा फंस गया है।

बैंक/एएमसी/पेंशन निधि के मुकाबले एजीआईएफ की रकम अत्यल्प (0.5 फीसदी से कम) है। (सारा कुछ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और आईएएनएस का कहना है कि विषैले आईएलएंडएफएस बांड में एजीआईएफ की 210 करोड़ रुपये की रकम फंस गई है।)

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राफ़ेल सौदे में सीएजी ने उड़ाई पारदर्शिता की धज़्ज़ियाँ

राफ़ेल रिपोर्ट में सीएजी ने अपनी प्रतिष्ठा गँवाई, इसने जितने सवालों के जबाब दिये उसके ज़्यादा तो प्रश्न खड़े किये

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Rafale deal scam

राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए भारत और फ़्राँस के बीच हुए सौदे को अन्तर-सरकारी क़रार (आईजीए) कहा गया। आईजीए के इस नामकरण को समझना बहुत मुश्किल है। ख़ासकर, उस घटनाक्रम को देखते हुए जो 10 अप्रैल 2015 से पहले का रहा है। इस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ़्राँसिसी कम्पनी डसॉल्ट से 36 विमान ख़रीदने के फ़ैसले का ऐलान किया था।

यूपीए सरकार ने ग्लोबल टेंडर के ज़रिये दो विमानों के चुना था। पहला, डसॉल्ट कम्पनी का राफ़ेल और दूसरा, चार यूरोपीय देशों में बनने वाला यूरोफ़ाईटर टाइफून। टेंडर में राफ़ेल का दाम कम था। तब यूपीए ने 126 राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए सौदेबाज़ी शुरू की।

ये क़रार दो सरकारों के बीच होने वाला जी-टू-जी समझौता नहीं था। क्योंकि ग्लोबल टेंडर को इस ढाँचे में नहीं रखा जा सकता। यही वजह है कि यूपीए सरकार ने जब रूस या अमेरिका से रक्षा उपकरणों की ख़रीदारी की तभी जी-टू-जी क़रार किये गये। यूपीए ने डसॉल्ट से जिस सौदे की बातचीत की थी, उसके तहत 18 विमानों का निर्माण सीधे डसॉल्ट को करना था और बाक़ी 108 का निर्माण हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को करना था और डलॉल्ट को इसकी तकनीक मुहैया करवानी थी।

मार्च 2015 में डसॉल्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि एचएएल के साथ हो रहा समझौता 95 फ़ीसदी पूरा हो चुका है और बाक़ी भी जल्द ही पूरा हो जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने उस समझौते को ख़त्म कर दिया और उसकी जगह डसॉल्ट से सीधे 36 विमान ख़रीदने का सौदा किया। इस समझौते से एचएएल को बाहर कर दिया गया। साफ़ है कि अब भी राफ़ेल विमानों की आपूर्ति का ज़िम्मा डसॉल्ट पर ही है, फ़्राँसिसी सरकार पर नहीं। इसके बावजूद, नये सौदे को ‘सरकार से सरकार के बीच’ (जी-टू-जी) नहीं, बल्कि ‘अन्तर-सरकारी क़रार’ (आईजीए) कहा जा रहा है।

नये सौदे की आड़

प्रधानमंत्री की घोषणा का अंज़ाम ये हुआ कि पुराने समझौते से जुड़ी वो सारे शर्ते ख़त्म हो गयीं जिनका ताल्लुक राफ़ेल के दाम से था और जिसे इसे रक्षा ख़रीद प्रक्रिया यानी डिफ़ेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिज़र्स (डीपीपी) के तहत तय किया गया था। दूसरे शब्दों में, अब पुराना क़रार ख़त्म हो गया और उसकी जगह 36 विमानों की पूरी तरह से नयी डील (सौदे) ने ले ली। 2015 में फ़्राँस की धरती पर किये गये प्रधानमंत्री के ऐलान से भारत सरकार पशोपेश में फँस गयी, क्योंकि ये प्रधानमंत्री का एकतरफ़ा फ़ैसला था। अब आगे की बातचीत का दारोमदार सीधे-सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) पर आ गया।

नये सौदे की शर्तों पर बातचीत करने का जो रास्ता प्रधानमंत्री कार्यालय ने चुना वो रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) और रक्षा ख़रीद परिषद (डिफ़ेंस एक्वीज़ीशन काउन्सिल – डीएसी) के दायरे से बाहर था। क्योंकि रक्षा ख़रीद के लिए सौदेबाज़ी करने का काम डीपीपी को करना होता है। ये उसी का क्षेत्राधिकार है। इसीलिए राफ़ेल की फ़ाइल में रक्षा मंत्रालय के अफ़सरों की टिप्पणी ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधा-सीधा आक्षेप किया। दस्तावेज़ों से साबित हो गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने सौदेबाज़ी में रक्षा मंत्रालय की रसूख़ को गिरा दिया। दिलचस्प ये भी रहा कि नये सौदे में दो नयी बातें हुईं। पहला, एक ऑफ़सेट पार्टनर का जुड़ना और दूसरा, हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हाथों से 108 विमानों के निर्माण की शर्ते का ख़त्म होना।

नया क़रार ‘अन्तर-सरकारी’ (आईजीए) नहीं है। क्योंकि डसॉल्ट एक निजी कम्पनी है। ये फ़्रेंच सरकार की भी कम्पनी नहीं है। इसीलिए फ़्रेंच सरकार ने 36 विमानों की सप्लाई की गारंटी लेने वाली शर्त से अपना पल्ला झाड़ लिया। फिर सप्लायर होने के नाते डसॉल्ट को गोपनीयता और कमीशन की शर्तों से छुटकारा दिलाने के लिए ज़ुर्माने और भ्रष्टाचार से जुड़े प्रावधानों को हटाया गया। ये काम प्रधानमंत्री कार्यालय की शह के बग़ैर कैसे मुमकिन हुआ? इसकी क्या वजह रही और ऐसा किससे कहने से हुआ? इन सवालों का कोई जबाब नहीं मिला।

रक्षा ख़रीद परिषद (डीएसी) को दरकिनार करने के लिए ऐसी शर्तें तैयार की गयीं जिससे प्रधानमंत्री और फ़्रेंच सरकार के लिए मुश्किलें पैदा नहीं हों। गारंटी की जगह उस ‘लेटर ऑफ़ कम्फर्ट’ (सहुलियत पत्र) ने ले ली जिसका कोई क़ानूनी प्रभाव नहीं होता। यहाँ तक कि फ़्रेंच सरकार ने डसॉस्ट को भुगतान करने के लिए अपने ‘स्क्रू खाते’ की सुविधा भी नहीं दी। शायद इसीलिए, क्योंकि फ़्रेंच सरकार इस सौदे की किसी भी ज़िम्मेदारी लेने से बचना चाहती थी। स्क्रू खाते के ज़रिये फ़्रेंच सरकार को ये सुनिश्चित करना होता कि डसॉल्ट ने अपनी शर्तों को निभाया, तभी उसे भुगतान हुआ।

ख़ामियों भरी रिपोर्ट

सीएजी ने कई तरह से देश को गच्चा दिया। पहला, इसकी रिपोर्ट 36 विमानों के दाम तक सीमित रही। इसका कहना है कि यूपीए के दौर वाले क़रार के मुक़ाबले नया सौदा 2.86% सस्ता है। लेकिन इस नतीज़े पर पहुँचने से पहले सीएजी ने सभी तथ्यों का ख़ुलासा नहीं किया। कहना मुश्किल है कि सीएजी ऐसा कैसे कर सकता है! दूसरा, सीएजी ने ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने किस आधार पर 36 विमानों की सीधी ख़रीदारी का साहसिक फ़ैसला लिया। तीसरा, सीएजी रिपोर्ट ने 2013 से लागू रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) को दरकिनार किये जाने के प्रति अपने नज़रें पूरी तरह से फेर लीं।

चौथा, सीएजी रिपोर्ट में इस तथ्य के प्रति भी उदासीनता दिखायी गयी है कि भारत की सौदेबाज़ी टीम ने एक ऐतराज़ ज़ाहिर किया है और उसे ठुकराने या ख़ारिज़ करने के लिए क्या दलीलें हैं। पाँचवाँ, सीएजी रिपोर्ट ने ये भी साफ़ नहीं किया कि नये क़रार के मसौदे से भ्रष्टाचार-विरोधी प्रावधान ग़ायब क्यों हैं। छठा, सीएजी रिपोर्ट ये तो बताती है कि गारंटी नहीं मिलने का कोई वित्तीय नुकसान नहीं होगा, लेकिन रिपोर्ट ये साफ़ नहीं करती कि गारंटी का प्रावधान क्यों नहीं है।

सबसे आश्चर्यजनक तो ये रहा कि सीएजी ने राफ़ेल के चयन के लिए यूपीए की आलोचना की, लेकिन उसी विमान को जब प्रधानमंत्री ने चुनने का फ़ैसला किया तो सीएजी की बोलती बन्द थी। इतना ही नहीं, राफ़ेल विमानों की संख्या को 126 से घटाकर 36 करने को लेकर भी जो उद्देश्य बताया गया वो ये कि भारतीय वायुसेना में विमानों की भारी कमी है जिसे यथाशीघ्र पूरा करना ज़रूरी था। लेकिन जब यूपीए के सौदे की तुलना मोदी सरकार के क़रार से की गयी तो पता चला कि नये सौदे में सिर्फ़ एक महीने की बचत होगी।

साफ़ है कि मौके की नज़ाक़त को देखते सीएजी अपनी अपेक्षाओं पर ख़रा नहीं उतरा। उसने अपने दायरे से बाहर जाकर सरकार की सुरक्षा करने का रास्ता चुना। अब तो सीएजी की प्रतिष्ठा को भी सुरक्षित करना होगा।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: TheHindu)

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सरकार और मीडिया ही बने लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक

लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का सबसे बड़ा सबूत है, ग़लत जानकारियों को ही विश्वसनीय बनाकर पेश करना

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Modi on TV

ज़माना बदल गया। हमारा राष्ट्रीय संवाद अब पक्ष-विपक्ष का नहीं रहा, बल्कि दोस्तों और दुश्मनों का हो चुका है। चर्चा और बहस की गुंज़ाइश नहीं रही। आज जो सरकार या उसके बैठे लोगों के विरोध में हो, उसे देशद्रोही कहा जाता है। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि पाकिस्तान से सम्बन्धित सरकार के हरेक क़दम का समर्थन करना ज़रूरी है। यदि विपक्ष ऐसे सवाल पूछता है, जिन्हें पूछा ही जाना चाहिए तो उस पर राष्ट्रविरोधी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। फ़ेसबुक औऱ ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों पर भी यदि कोई सरकार की आलोचना करता है तो उसके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा ठोंक दिया जाता है।

लोकसभा के चुनाव सामने पाकर जन-संवाद को इतना हानिकारक बना दिया गया है कि बात बर्दाश्त से बाहर हो गयी है। प्रधानमंत्री कुछ भी बोलें लेकिन उनके गुणगान के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चीयरलीडर्स या भाँडों की भूमिका थाम ली है। जब ‘द हिन्दू’ अख़बार ने बोफ़ोर्स ख़ुलासा किया था, तब विपक्ष ने राजीव गाँधी से सवाल पूछे थे। लेकिन जब उसी ‘द हिन्दू’ ने राफ़ेल सौदे का भाँडाफोड़ किया तो सरकार ने ‘द हिन्दू’ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। विपक्ष के सवालों को ऐसे पेश किया गया जिनसे सुरक्षा बल कमज़ोर पड़ जाएँगे।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर आतंकी हमला हुआ था, तब मुठभेड़ के दौरान ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुम्बई पहुँचकर केन्द्र सरकार को नकारा होने और राष्ट्रीय सुरक्षा में नाकाम रहने का तमग़ा दे दिया। लेकिन जब पुलवामा हमला हुआ तो सरकार ने उन्हीं लोगों पर सवाल दाग़ने शुरू कर दिये जो उससे सवाल पूछ रहे थे। लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की यादाश्त बहुत कमज़ोर है। मोदी उस वक़्त देश की सरकार के समर्थन में नहीं खड़े जब मुम्बई में आतंकी तबाही मचा रहे थे। शायद, उन्हें उस वक़्त अपनी कथनी और करनी में राष्ट्रभक्ति की छटा दिखायी दे रही थी।

ऐसी वारदातों के सामने मीडिया का दोहरा चरित्र बेनक़ाब हो गया है, क्योंकि अब उसके पास प्रधानमंत्री के दोमुँही बातों को उजागर करने का वक़्त नहीं है। ये मिसाल है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ अब कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी हैं। 2014 से पहले पहले प्रेस और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (यूपीए) की क़दम-क़दम पर चीड़फाड़ की। आज वही लोग इस सरकार के लिए भाँड या चीयरलीडर्स बन गये हैं। हालाँकि, ये बात मीडिया का सभी वर्गों पर लागू नहीं होती है। आज विपक्षी नेताओं के तक़रीबन सारे बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। आज सरकार के हर क़दम को राष्ट्रभक्ति बताकर उसका स्तुतिगान किया जाता है। प्रधानमंत्री और इस सरकार के हरेक मंत्री के बयान को अक्षरशः सत्य बनाकर पेश किया जाता है। उन आँकड़ों को लेकर कोई सवाल नहीं पूछे जाते जिन्हें राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे (एनएसएसओ) जारी करता है। कोई सरकार से ये नहीं पूछ रहा कि वो किस आधार पर बालाकोट में 300-400 आतंकियों के सफ़ाये का दावा कर रही है। पत्रकारों और टीवी के एंकरों में प्रधानमंत्री को उनकी हैसियत से बड़े से बड़ा करके दिखाने की होड़ मची हुई है।

कई योजनाओं के नाम बदलकर उनकी उपलब्धियों के बारे में सरकार जो आँकड़े पेश करती है, कोई उसकी सच्चाई को जाँचने वाला नहीं है। जो लोग सच्चाई को सामने रखते हैं उनके साथ दक्षिण-पन्थी भक्तों की टोली ग़ाली-गलौज़ करती है। विपक्ष के नेताओं को फ़र्ज़ी बयान को जोड़कर उन्हें वायरल करवाया जाता है, ताकि उनका चरित्र-हनन किया जा सके। लेकिन दूसरी ओर, फ़ेसबुक और ट्वीटर के अफ़सरों को बुलाकर सरकार तलाड़ती है कि वो उसके क़रीबियों के चुनिन्दा पोस्ट को क्यों हटा रही है। सरकार को उन फ़ेक-पोस्ट की परवाह नहीं है, जिनमें विपक्षियों को निशाना बनाया जाता है। भ्रष्ट जानकारियों को आज विश्वसनीय सूचनाएँ बनाकर पेश किया जाता है। हर तरफ़ से ये झूठ फ़ैलाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने भारत की दिशा ही बदल दी है।

अख़बारों में प्रधानमंत्री के विज्ञापन भरे पड़े हैं। इन पर जनता का पैसा बहाया जा रहा है, लेकिन कोई सवाल उठाने वाला नहीं है। मुट्ठीभर सम्पादकों ने सरकार को आड़े हाथों लेने का साहस दिखाया है। वो बधाई के पात्र हैं। लेकिन लोकतंत्र के चौथे खम्भे का ज़्यादातर हिस्सा सरकार की जाग़ीर बन चुका है। मीडिया की साख़ इतनी गिर चुकी है कि समाज के बहुत बड़े तबक़े ने टेलीविज़न देखना बन्द कर दिया है, क्योंकि अब वो इसे ख़बरें देने वाले माध्यम के रूप में नहीं पाते हैं। हर शाम को कुछ चैनलों पर कुछ ख़ास लोगों की साउंड बाइट सर्कस करते नज़र आती है। इनके ज़रिये समाज में ज़हर परोसा जाता है। ये लोकतंत्र का अराजक चेहरा है, जो सिर्फ़ झूठ और दुष्प्रचार के भरोसे क़ायम है।

यदि सरकार और चौथा खम्भा यानी मीडिया, एक ही चट्टा-बट्टा बन चुके हैं तो लोकतंत्र भारी ख़तरे में है। इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि वो लोग आगे आयें जो अपनी बातों को प्रभावी तरह से रखना जानते हैं। यदि ऐसे लोग मुखर नहीं होंगे तो झूठ और अफ़वाह को कौन चुनौती देगा। सच को कौन सामने लाएगा। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को संविधान से जो ज़िम्मेदारियाँ मिली हैं, उसे लेकर उन्हें सरकार के प्रति नहीं बल्कि देश के प्रति जबाबदेह होना चाहिए। उन्हें सरकार की रखैल बनने के बजाय अपने विवेक के काम लेना चाहिए। चाहे केन्द्रीय हो या प्रादेशिक, जाँच एजेंसियों को चाहिए कि वो डर और पक्षपात के बग़ैर क़सूरवार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें। लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जाँच एजेंसियाँ चुन-चुनकर उन लोगों को निशाना बना रही हैं, जो सरकार के विरोधी हैं, जबकि उन लोगों को नज़रअन्दाज़ किया जाता है जो या तो सरकार के क़रीबी हैं और फिर उसका हिस्सा हैं। न्यायपालिका को भी ये समझना होगा कि यदि वो बेक़सूर लोगों के हक़ में नहीं खड़ी होती तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जा सकता।

ख़ुशहाली और अच्छे दिन के लिए शान्ति, सद्भाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा ज़रूरी है। ऐसा लगता है कि आज हम ऐसे अन्यायपूर्ण भारत में रह रहे हैं, जहाँ कमज़ोर तबकों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सपने हैं। मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर चारों ओर नाउम्मीदी नज़र आती है।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: द टेलिग्राफ)

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