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जनाब झूठली साहब और नोटबन्दी का पंचनामा!

ज़रा समझिए कि जिन 17.42 लाख मगरमच्छों और घड़ियालों को पकड़ने के लिए नोटबन्दी के ज़रिये, जिस नदी या सागर को ही सुखाने का फ़ैसला लिया गया, उसमें 130 करोड़ भारतीय नागरिक या जीव-जन्तु पल रहे थे। ग़लत नीति की वजह से मगरमच्छ तो पानी से निकलकर तटों पर जा छिपे, लेकिन 129.82 करोड़ भारतवासियों का जीना मुहाल हो गया। अरे, इतना बड़ा मूर्ख तो पाग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ भी नहीं था!

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वित्तमंत्री अरूण जेटली को आप चाहें तो झूठली साहब कह सकते हैं। इन्हें अक्सर ही मोदी सरकार के कुकर्मों को धोने की पीड़ा झेलनी पड़ती है। फिर चाहे वो नोटबन्दी हो या खोटी जीएसटी या राफ़ेल घोटाला। बेचारे झूठली नहीं जानते कि ‘बिगरी बात बने नहीं लाख करो किन कोय, रहिमन बिगरै दूध को मथे ना माखन होय!’ झूठली के ताज़ा फ़ेसबुक पोस्ट ज़ाहिर है कि 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे, या तो ये महाशय सो रहे थे या फिर घनघोर नशे में थे! तब नरेन्द्र मोदी ने नोटबन्दी के तीन उद्देश्य बताये थे: कालेधन और भ्रष्टाचार पर हमला, आतंकी फ़ंडिंग और हवाला पर चोट और जाली नोटों का सफ़ाया! लेकिन झूठली आज जिस नोटबन्दी की तारीफ़ के पुल बाँध रहे उसमें इन तीनों ही उद्देश्यों को लेकर उनकी बोलती बन्द है! क्यों भला? आइए ज़रा इसका जायज़ा लें।

1. झूठली लिखते हैं कि नोटबन्दी के बाद बड़ी मात्रा में बैंकों में पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट जमा करवाने वाले 17.42 लाख संदिग्ध खाताधारकों का पता चला। उन पर कार्रवाई हुई।

झूठ: क्या-क्या कार्रवाई हुई? किन-किन लोगों पर? उनके नाम क्यों कौन ज़ाहिर करेगा? अभी तक नामों का ख़ुलासा क्यों नहीं हुआ? इन संदिग्ध खातों में कितने रुपये जमा हुए? सरकार ने कितने मामलों में कितना रुपया ज़ुर्माना वसूला? कितने लोगों को जेल की हवा खिलायी?

सच: इनमें से एक भी सवाल का ऐसा जवाब झूठली के पास नहीं है, जिसे बताकर वो मोदी सरकार की पीठ ठोंक सकें। इसीलिए कोई ब्यौरा नहीं देते। अब ज़रा समझिए कि जिन 17.42 लाख मगरमच्छों और घड़ियालों को पकड़ने के लिए नोटबन्दी के ज़रिये, जिस नदी या सागर को ही सुखाने का फ़ैसला लिया गया, उसमें 130 करोड़ भारतीय नागरिक या जीव-जन्तु पल रहे थे। ग़लत नीति की वजह से मगरमच्छ तो पानी से निकलकर तटों पर जा छिपे, लेकिन 129.82 करोड़ भारतवासियों का जीना मुहाल हो गया। अरे, इतना बड़ा मूर्ख तो पाग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ भी नहीं था!

2. झूठली कहते हैं कि नोटबन्दी से बैंकों में जो रुपया पहुँचा, उससे नये क़र्ज़दारों में क़र्ज़ा बाँटा गया!

झूठ: कितना रुपया, किन लोगों को, किन योजनाओं के तहत क़र्ज़ में बाँटा गया? इसमें से कितने सरकार के चहेते और बैंकों के लुटेरे थे? देश को ये क्यों नहीं पता चल सकता कि नोटबन्दी की आड़ में किन-किन क़र्ज़दारों का भला हुआ?

सच: मुद्रा लोन के तमाम भ्रामक आँकड़े सरकार ने जारी किये थे। इसकी पोल खुल चुकी है। ये भी किसी से छिपा नहीं है कि बैंकों का एनपीए अब 12 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। नीरव, मेहुल, माल्या, संदेसरा जैसे मोदी के अज़ीज़ दोस्त, सरकारी बैंकों को लूटकर फ़ुर्र हो चुके हैं। ताज़ा स्थिति ये है कि नगदी संकट और घपलों-घोटालों से जूझ रहे 11 बड़े बैंकों पर रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ बाँटने पर रोक लगा रखी है, क्योंकि उनकी भारी पूँजी डूब चुकी है। इनमें से 10 बैंक तो पूरी तरह से सरकारी हैं। इन्हें उबारने के लिए ही वित्त मंत्रालय ने रिज़र्व बैंक से 3.6 लाख करोड़ रुपये की आरक्षित निधि (यानी एक तिहाई से अधिक रिज़र्व ख़ज़ाना) जारी करने को कहा है। इसे लेकर ही तो उर्जित पटेल और अरूण झूठली में ठनी हुई है।

3. डिजिटाइजेशन को लेकर झूठली का कहना है कि आज 130 करोड़ की आबादी में 1.25 करोड़ लोग भीम एप का इस्तेमाल कर रहे हैं।

झूठ: डिजिटल लेनदेन की संख्या का कोई ख़ास मतलब नहीं है। ये अरबों-ख़बरों में पहुँच जाये तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। देखना ये चाहिए कि अर्थव्यवस्था के कुल लेनदेन में डिजिटल की हिस्सेदारी कितनी है?
सच: 100-200, 500-1000 वाले लेनदेन के डिजिटाइज़्ड होने के आधार पर नोटबन्दी को क़ामयाब नहीं बताया जा सकता। नोटबन्दी के दो साल बाद भी एक फ़ीसदी से कम आबादी का भीम एप या रुपै कार्ड जैसी जुगत का इस्तेमाल करना ये बताता है कि 99 प्रतिशत लोग आज भी इससे दूर हैं। अलबत्ता, मोदी की मेहरबानी से पेटीएम जैसी चीनी निवेश से चल रही कम्पनी ज़रूर निहाल हो गयी। भारतीयों के बीच ख़ुदरा लेनदेन का व्यापक ज़रिया आज भी कैश ही बना हुआ है।

रिज़र्व बैंक के मुताबिक, दो साल पहले नोटबन्दी की रात 17.01 लाख करोड़ रुपये प्रचलन में थे। लेकिन अब ये संख्या 18.76 लाख करोड़ रुपये है। यानी आज भी कैश ही किंग है। 2016 में प्रचलित रुपयों की मात्रा में सालाना 17.7 फ़ीसदी की दर से बढ़ोत्तरी हो रही थी, जो अब घटने के बजाय बढ़कर 22.2 फ़ीसदी हो चुकी है। लेकिन झूठली को इसकी चिन्ता नहीं सता रही। यहीं, हमें याद रखना चाहिए कि नेट बैंकिंग और प्लास्टिक मनी यानी क्रेडिट-डेबिट कार्ड वग़ैरह का नोटबन्दी से कोई वास्ता नहीं है। ये सुविधाएँ पहले से मौजूद हैं। पहले भी लोग बड़े पैमाने पर डिजिटल पेमेंट का तरीक़ा अपनाते रहे हैं। नोटबन्दी से इसमें इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन ऐसे इज़ाफ़े के लिए नोटबन्दी कोई अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती। लिहाज़ा, डिजिटल लेनदेन में हुई बढ़ोत्तरी के लिए नोटबन्दी का गुणगान करना जनता को मूर्ख बनाने के सिवाय और कुछ नहीं है!

4. वित्तमंत्री बता रहे हैं कि नोटबन्दी के बाद प्रत्यक्ष कर यानी डायरेक्ट टैक्स के संग्रह में इज़ाफ़ा हुआ है। ये 6.6 और 9% से बढ़कर 14 और 16% दर्ज़ हुआ है। इसी तरह टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या 25 से 55% फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है। इस साल 86.35 लाख लोगों ने पहली बार रिटर्न भरा।

झूठ: टैक्स संग्रह में इज़ाफ़ा, नोटबन्दी से पहले भी हरेक साल होता रहा है। सरकार ये क्यों नहीं बता रही कि कुल डायरेक्ट टैक्स में आयकर का हिस्सा कितना है? आयकर के मद में कितने फ़ीसदी तेज़ी नोटबन्दी की वजह से आयी है? क्या ऐसा इज़ाफ़ा टैक्स की दर यानी रेट ऑफ़ टैक्स में बदलाव लाकर नहीं हासिल किया जा सकता था, तो फिर नोटबन्दी की ज़रूरत क्यों पड़ी? झूठलीजी, जनता को ये क्यों नहीं बताते कि मोदी राज में आयकर की दर में कितना इज़ाफ़ा किया गया? महँगाई से स्टैंडर्ड डिडक्शन को क्यों अछूता रखा गया? इससे आयकर के दायरे में आने वाले लोगों की संख्या क्या अपने आप नहीं बढ़ती चली जाएगी?

सच: आयकर और डायरेक्ट टैक्स का संग्रह बढ़ाने के लिए नोटबन्दी की कोई ज़रूरत नहीं होती। लोग यदि टैक्स की चोरी कर रहे हैं तो उन्हें पकड़ना इनकम टैक्स विभाग का काम है। सेल कम्पनियों की गड़बड़ी को पकड़ना, कम्पनी कार्य मंत्रालय का काम है। सभी संस्थाओं के पास अपने दायित्व निभाने के लिए पर्याप्त अधिकार हैं। इन्हें नोटबन्दी नामक हथियार की कोई ज़रूरत नहीं थी। जहाँ तक ज़्यादा रिटर्न दाख़िल करने का सवाल है तो वित्तमंत्री ने क्या देश को ये भी बताया है कि रिटर्न भरने वाले नये लोगों से कितना अतिरिक्त आयकर प्राप्त हुआ है? नहीं बताया! क्योंकि रिटर्न भरने वाले ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जितनी आमदनी नोटबन्दी के बाद कम हुई है और इनसे मिलने वाले कुल टैक्स की रक़म घटी है।

5. झूठली बाबा ने नोटबन्दी के दो साल बाद भी देश को ये नहीं बताया कि क्या अब तक बैंकों में जमा हुए नोटों की गिनती हो गयी?

झूठ: मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर उम्मीद जतायी थी कि नोटबन्दी से क़रीब तीन से चार लाख करोड़ रुपये बैंकों में नहीं लौटेंगे, क्योंकि ये रक़म या तो काला धन है या आतंकियों और नक्सलियों के पास है या फिर इसमें जाली नोट शामिल हैं। उधर, देश भर में बन्द हुए नोटों का 99.3% बैंकों में आ गया। बाक़ी का ब्यौरा कहाँ है? अभी तक गिनती पूरी क्यों नहीं हुई? कब पूरे आँकड़े देश के सामने होंगे?

सच: काला धन का वारा-न्यारा करने वालों में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का नाम बहुत ऊपर है। उनके सहकारी बैंक ने एक झटके में 750 करोड़ रुपये से ऊपर की रक़म को काले से गोरा बना दिया। लेकिन दो साल बाद भी किसी का बाल तक बाँका नहीं हुआ! अरे झूठलीजी, आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि नोटबन्दी ही विश्व का सबसे बड़ा घोटाला है! वर्ना, यदि मक़सद पुराने नोटों को बैंकों में लाने का ही होता तो फिर इसके लिए भी नोटबन्दी की कोई ज़रूरत नहीं थी। पुराने नोटों को अमान्य किये बग़ैर, नये नोट का अकाल पैदा किये बग़ैर, एटीएम को फ़िट बनाये बग़ैर, बैंकों में पर्याप्त नये नोटों का इन्तज़ाम किये बग़ैर भी इस उद्देश्य को हासिल किया जा सकता था। घर में पड़े नोटों को बैंकों में खींचकर लाने के लिए नोटबन्दी से बड़ा मूर्खतापूर्ण और दुर्भावनापूर्ण कोई और तरीक़ा नहीं हो सकता!

कुलमिलाकर, नोटबन्दी को आँकड़ों के मकड़जाल में उलझाकर इसे लाभदायक और क्रान्तिकारी बताने वाले झूठली का मक़सद एक बार फिर से लोगों की आँखों में धूल झोंककर उन्हें उल्लू बनाने का ही है। वर्ना, सच्चाई तो ये है कि रिश्वतख़ोरी, भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे हरेक मोर्चे पर नोटबन्दी पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था, रोज़गार और काम-धन्धों को ऐसा झटका लगा कि वो दो साल बाद भी उबर नहीं पाये हैं। नोटबन्दी ने ग़रीबों, मज़दूरों और किसानों को इतना ज़बरदस्त नुक़सान पहुँचाया है, जैसा उन्हें, शायद बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भी नहीं पहुँचता है! नोटबन्दी हर लिहाज़ से मूर्ख शासकों की मानव-निर्मित आपदा साबित हुई!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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बिहार : समस्तीपुर में डेयरी संयंत्र, भोजपुर में पशु आहार कारखाना लगेंगे

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dairy products

मोतिहारी, 19 जनवरी | बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने यहां शनिवार को कहा कि अगले वित्तीय वर्ष 2019-20 में बिहार राज्य दुग्ध सहकारी संघ लिमिटेड (कम्फेड) द्वारा समस्तीपुर में पांच लाख लीटर प्रतिदिन क्षमता के डेयरी संयंत्र और भोजपुर के बिहिया में 300 मीट्रिक टन प्रतिदिन उत्पादन क्षमता के पशु आहार कारखाने लगाए जाएंगे। पूर्वी चंपारण जिले के मठबनवारी में 11 महीने के रिकार्ड समय में बन कर तैयार मदर डेयरी के प्रति दिन एक लाख लीटर क्षमता के दूध प्रसंस्करण संयंत्र का शनिवार को उद्घाटन करने के बाद बिहार के उपमुख्यमंत्री ने कहा कि इस संयंत्र द्वारा मार्च से 1250 गांवों के 50 हजार किसानों से प्रतिदिन 2 लाख लीटर दूध का संग्रह किया जा सकेगा।

उन्होंने कहा कि अब सुधा व मदर डेयरी, दोनों मिलकर किसानों से दूध खरीदेगी।

मोदी ने कहा, “वर्तमान वित्तीय वर्ष में सुपौल में एक लाख लीटर क्षमता का डेयरी संयंत्र, समस्तीपुर व हाजीपुर में 30-30 मीट्रिक टन के दूध पाउडर संयंत्र, पटना व नालंदा में 20-20 हजार किलो दैनिक क्षमता के आइसक्रीम प्लांट स्थापित किए जाने के साथ ही पटना में पूर्व से स्थापित 100 मीट्रिक टन क्षमता के पशु आहार फैक्ट्री को 150 मीट्रिक टन में विस्तारित और 150 मीट्रिक टन की नई इकाई स्थापित की गई है।”

डेयरी स्थापित करने वाले किसानों को सरकार द्वारा 50 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को 66 प्रतिशत अनुदान दिए जाने का दावा करते हुए उन्होंने कहा कि किसानों की आमदनी केवल धान, गेहूं की खेती करने से दोगुनी नहीं होगी, बल्कि इसके लिए समग्र रूप से वानिकी, डेयरी, मछली और मुर्गी पालन को अपनाना होगा।

उन्होंने कहा कि फिलहाल बिहार में प्रतिदिन 18 लाख किलो दूध का संग्रह व 14 लाख लीटर की मार्केटिंग सुधा डेयरी द्वारा की जा रही है।

इस मौके पर केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह, बिहार सरकार में मंत्री प्रमोद कुमार, राणा रणधीर सिंह समेत कई अधिकारी और नेता मौजूद थे।

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मुकेश अंबानी ने ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ अभियान का आह्वान किया

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mukesh ambani

गांधीनगर, 18 जनवरी | औपनिवेशीकरण के खिलाफ महात्मा गांधी के अभियान को याद करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक मुकेश अंबानी ने शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ‘डेटा औपनिवेशीकरण’ के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने की गुजारिश की और कहा कि भारतीय डेटा भारतीयों के ‘स्वामित्व और नियंत्रण’ में होने चाहिए। उन्होंने यहां वाइब्रेंट गुजरात ग्लोबल समिट 2019 में कहा, “हम अपने राष्ट्रपिता को उनकी 150वीं जयंती के वर्ष में श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। गांधी जी ने राजनीतिक औपनिवेशीकरण के खिलाफ आन्दोलन चलाया था.. आज हम सब मिलकर डेटा औपनिवेशीकरण के खिलाफ नया अभियान शुरू कर रहे हैं।” इस समिट का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था।

अंबानी ने कहा कि डेटा नई दुनिया में ‘नया तेल और धन’ है। उन्होंने कहा कि भारत के डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण भारतीय लोगों के हाथ में ही होना चाहिए और कॉर्पोरेट्स द्वारा नहीं किया जाना चाहिए, खासतौर से वैश्विक कॉर्पोरेशंस द्वारा नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “माननीय प्रधानमंत्री, मैं आश्वस्त हूं कि आप अपने डिजिटल इंडिया मिशन के प्रमुख लक्ष्यों में इसे भी शामिल करेंगे।”

उन्होंने कहा, “भारत को इस डेटा संचालित क्रांति में सफल होने के लिए, हमें भारतीय डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण वापस भारत भेजना होगा.. दूसरे शब्दों में भारतीय संपत्ति वापस लौटानी होगी। भारतीय डेटा को भरतीयों द्वारा नियंत्रित किया जाना चाहिए, न कि वैश्विक कॉर्पोरेट्स द्वारा। डेटा का नियंत्रण हमें अपने हाथों में लेने के लिए अभियान चलाने की आवश्यकता है।”

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अक्टूबर में कहा था कि सभी डिजिटल भुगतान कंपनियों जैसे गूगल प्ले, वाट्सएप और अन्य को अपने भारतीय कारोबार का डेटा स्थानीय तौर पर स्टोर करना चाहिए।

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ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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