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जनाब झूठली साहब और नोटबन्दी का पंचनामा!

ज़रा समझिए कि जिन 17.42 लाख मगरमच्छों और घड़ियालों को पकड़ने के लिए नोटबन्दी के ज़रिये, जिस नदी या सागर को ही सुखाने का फ़ैसला लिया गया, उसमें 130 करोड़ भारतीय नागरिक या जीव-जन्तु पल रहे थे। ग़लत नीति की वजह से मगरमच्छ तो पानी से निकलकर तटों पर जा छिपे, लेकिन 129.82 करोड़ भारतवासियों का जीना मुहाल हो गया। अरे, इतना बड़ा मूर्ख तो पाग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ भी नहीं था!

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वित्तमंत्री अरूण जेटली को आप चाहें तो झूठली साहब कह सकते हैं। इन्हें अक्सर ही मोदी सरकार के कुकर्मों को धोने की पीड़ा झेलनी पड़ती है। फिर चाहे वो नोटबन्दी हो या खोटी जीएसटी या राफ़ेल घोटाला। बेचारे झूठली नहीं जानते कि बिगरी बात बने नहीं लाख करो किन कोय, रहिमन बिगरै दूध को मथे ना माखन होय!’ झूठली के ताज़ा फ़ेसबुक पोस्ट ज़ाहिर है कि 8 नवम्बर 2016 को रात 8 बजे, या तो ये महाशय सो रहे थे या फिर घनघोर नशे में थे! तब नरेन्द्र मोदी ने नोटबन्दी के तीन उद्देश्य बताये थे: कालेधन और भ्रष्टाचार पर हमला, आतंकी फ़ंडिंग और हवाला पर चोट और जाली नोटों का सफ़ाया! लेकिन झूठली आज जिस नोटबन्दी की तारीफ़ के पुल बाँध रहे उसमें इन तीनों ही उद्देश्यों को लेकर उनकी बोलती बन्द है! क्यों भला? आइए ज़रा इसका जायज़ा लें।

1. झूठली लिखते हैं कि नोटबन्दी के बाद बड़ी मात्रा में बैंकों में पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट जमा करवाने वाले 17.42 लाख संदिग्ध खाताधारकों का पता चला। उन पर कार्रवाई हुई।

झूठ: क्या-क्या कार्रवाई हुई? किन-किन लोगों पर? उनके नाम क्यों कौन ज़ाहिर करेगा? अभी तक नामों का ख़ुलासा क्यों नहीं हुआ? इन संदिग्ध खातों में कितने रुपये जमा हुए? सरकार ने कितने मामलों में कितना रुपया ज़ुर्माना वसूला? कितने लोगों को जेल की हवा खिलायी?

सच: इनमें से एक भी सवाल का ऐसा जवाब झूठली के पास नहीं है, जिसे बताकर वो मोदी सरकार की पीठ ठोंक सकें। इसीलिए कोई ब्यौरा नहीं देते। अब ज़रा समझिए कि जिन 17.42 लाख मगरमच्छों और घड़ियालों को पकड़ने के लिए नोटबन्दी के ज़रिये, जिस नदी या सागर को ही सुखाने का फ़ैसला लिया गया, उसमें 130 करोड़ भारतीय नागरिक या जीव-जन्तु पल रहे थे। ग़लत नीति की वजह से मगरमच्छ तो पानी से निकलकर तटों पर जा छिपे, लेकिन 129.82 करोड़ भारतवासियों का जीना मुहाल हो गया। अरे, इतना बड़ा मूर्ख तो पाग़ल बादशाह मोहम्मद बिन तुग़लक़ भी नहीं था!

2. झूठली कहते हैं कि नोटबन्दी से बैंकों में जो रुपया पहुँचा, उससे नये क़र्ज़दारों में क़र्ज़ा बाँटा गया!

झूठ: कितना रुपया, किन लोगों को, किन योजनाओं के तहत क़र्ज़ में बाँटा गया? इसमें से कितने सरकार के चहेते और बैंकों के लुटेरे थे? देश को ये क्यों नहीं पता चल सकता कि नोटबन्दी की आड़ में किन-किन क़र्ज़दारों का भला हुआ?

सच: मुद्रा लोन के तमाम भ्रामक आँकड़े सरकार ने जारी किये थे। इसकी पोल खुल चुकी है। ये भी किसी से छिपा नहीं है कि बैंकों का एनपीए अब 12 लाख करोड़ रुपये हो चुका है। नीरव, मेहुल, माल्या, संदेसरा जैसे मोदी के अज़ीज़ दोस्त, सरकारी बैंकों को लूटकर फ़ुर्र हो चुके हैं। ताज़ा स्थिति ये है कि नगदी संकट और घपलों-घोटालों से जूझ रहे 11 बड़े बैंकों पर रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ बाँटने पर रोक लगा रखी है, क्योंकि उनकी भारी पूँजी डूब चुकी है। इनमें से 10 बैंक तो पूरी तरह से सरकारी हैं। इन्हें उबारने के लिए ही वित्त मंत्रालय ने रिज़र्व बैंक से 3.6 लाख करोड़ रुपये की आरक्षित निधि (यानी एक तिहाई से अधिक रिज़र्व ख़ज़ाना) जारी करने को कहा है। इसे लेकर ही तो उर्जित पटेल और अरूण झूठली में ठनी हुई है।

3. डिजिटाइजेशन को लेकर झूठली का कहना है कि आज 130 करोड़ की आबादी में 1.25 करोड़ लोग भीम एप का इस्तेमाल कर रहे हैं।

झूठ: डिजिटल लेनदेन की संख्या का कोई ख़ास मतलब नहीं है। ये अरबों-ख़बरों में पहुँच जाये तो भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। देखना ये चाहिए कि अर्थव्यवस्था के कुल लेनदेन में डिजिटल की हिस्सेदारी कितनी है?

सच: 100-200, 500-1000 वाले लेनदेन के डिजिटाइज़्ड होने के आधार पर नोटबन्दी को क़ामयाब नहीं बताया जा सकता। नोटबन्दी के दो साल बाद भी एक फ़ीसदी से कम आबादी का भीम एप या रुपै कार्ड जैसी जुगत का इस्तेमाल करना ये बताता है कि 99 प्रतिशत लोग आज भी इससे दूर हैं। अलबत्ता, मोदी की मेहरबानी से पेटीएम जैसी चीनी निवेश से चल रही कम्पनी ज़रूर निहाल हो गयी। भारतीयों के बीच ख़ुदरा लेनदेन का व्यापक ज़रिया आज भी कैश ही बना हुआ है।

रिज़र्व बैंक के मुताबिक, दो साल पहले नोटबन्दी की रात 17.01 लाख करोड़ रुपये प्रचलन में थे। लेकिन अब ये संख्या 18.76 लाख करोड़ रुपये है। यानी आज भी कैश ही किंग है। 2016 में प्रचलित रुपयों की मात्रा में सालाना 17.7 फ़ीसदी की दर से बढ़ोत्तरी हो रही थी, जो अब घटने के बजाय बढ़कर 22.2 फ़ीसदी हो चुकी है। लेकिन झूठली को इसकी चिन्ता नहीं सता रही। यहीं, हमें याद रखना चाहिए कि नेट बैंकिंग और प्लास्टिक मनी यानी क्रेडिट-डेबिट कार्ड वग़ैरह का नोटबन्दी से कोई वास्ता नहीं है। ये सुविधाएँ पहले से मौजूद हैं। पहले भी लोग बड़े पैमाने पर डिजिटल पेमेंट का तरीक़ा अपनाते रहे हैं। नोटबन्दी से इसमें इज़ाफ़ा हुआ है, लेकिन ऐसे इज़ाफ़े के लिए नोटबन्दी कोई अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती। लिहाज़ा, डिजिटल लेनदेन में हुई बढ़ोत्तरी के लिए नोटबन्दी का गुणगान करना जनता को मूर्ख बनाने के सिवाय और कुछ नहीं है!

4. वित्तमंत्री बता रहे हैं कि नोटबन्दी के बाद प्रत्यक्ष कर यानी डायरेक्ट टैक्स के संग्रह में इज़ाफ़ा हुआ है। ये 6.6 और 9% से बढ़कर 14 और 16% दर्ज़ हुआ है। इसी तरह टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या 25 से 55% फ़ीसदी का इज़ाफ़ा हुआ है। इस साल 86.35 लाख लोगों ने पहली बार रिटर्न भरा।

झूठ: टैक्स संग्रह में इज़ाफ़ा, नोटबन्दी से पहले भी हरेक साल होता रहा है। सरकार ये क्यों नहीं बता रही कि कुल डायरेक्ट टैक्स में आयकर का हिस्सा कितना है? आयकर के मद में कितने फ़ीसदी तेज़ी नोटबन्दी की वजह से आयी है? क्या ऐसा इज़ाफ़ा टैक्स की दर यानी रेट ऑफ़ टैक्स में बदलाव लाकर नहीं हासिल किया जा सकता था, तो फिर नोटबन्दी की ज़रूरत क्यों पड़ी? झूठलीजी, जनता को ये क्यों नहीं बताते कि मोदी राज में आयकर की दर में कितना इज़ाफ़ा किया गया? महँगाई से स्टैंडर्ड डिडक्शन को क्यों अछूता रखा गया? इससे आयकर के दायरे में आने वाले लोगों की संख्या क्या अपने आप नहीं बढ़ती चली जाएगी?

सच: आयकर और डायरेक्ट टैक्स का संग्रह बढ़ाने के लिए नोटबन्दी की कोई ज़रूरत नहीं होती। लोग यदि टैक्स की चोरी कर रहे हैं तो उन्हें पकड़ना इनकम टैक्स विभाग का काम है। सेल कम्पनियों की गड़बड़ी को पकड़ना, कम्पनी कार्य मंत्रालय का काम है। सभी संस्थाओं के पास अपने दायित्व निभाने के लिए पर्याप्त अधिकार हैं। इन्हें नोटबन्दी नामक हथियार की कोई ज़रूरत नहीं थी। जहाँ तक ज़्यादा रिटर्न दाख़िल करने का सवाल है तो वित्तमंत्री ने क्या देश को ये भी बताया है कि रिटर्न भरने वाले नये लोगों से कितना अतिरिक्त आयकर प्राप्त हुआ है? नहीं बताया! क्योंकि रिटर्न भरने वाले ज़्यादातर लोग ऐसे हैं जितनी आमदनी नोटबन्दी के बाद कम हुई है और इनसे मिलने वाले कुल टैक्स की रक़म घटी है।

5. झूठली बाबा ने नोटबन्दी के दो साल बाद भी देश को ये नहीं बताया कि क्या अब तक बैंकों में जमा हुए नोटों की गिनती हो गयी?

झूठ: मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर उम्मीद जतायी थी कि नोटबन्दी से क़रीब तीन से चार लाख करोड़ रुपये बैंकों में नहीं लौटेंगे, क्योंकि ये रक़म या तो काला धन है या आतंकियों और नक्सलियों के पास है या फिर इसमें जाली नोट शामिल हैं। उधर, देश भर में बन्द हुए नोटों का 99.3% बैंकों में आ गया। बाक़ी का ब्यौरा कहाँ है? अभी तक गिनती पूरी क्यों नहीं हुई? कब पूरे आँकड़े देश के सामने होंगे?

सच: काला धन का वारा-न्यारा करने वालों में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का नाम बहुत ऊपर है। उनके सहकारी बैंक ने एक झटके में 750 करोड़ रुपये से ऊपर की रक़म को काले से गोरा बना दिया। लेकिन दो साल बाद भी किसी का बाल तक बाँका नहीं हुआ! अरे झूठलीजी, आप भी अच्छी तरह जानते हैं कि नोटबन्दी ही विश्व का सबसे बड़ा घोटाला है! वर्ना, यदि मक़सद पुराने नोटों को बैंकों में लाने का ही होता तो फिर इसके लिए भी नोटबन्दी की कोई ज़रूरत नहीं थी। पुराने नोटों को अमान्य किये बग़ैर, नये नोट का अकाल पैदा किये बग़ैर, एटीएम को फ़िट बनाये बग़ैर, बैंकों में पर्याप्त नये नोटों का इन्तज़ाम किये बग़ैर भी इस उद्देश्य को हासिल किया जा सकता था। घर में पड़े नोटों को बैंकों में खींचकर लाने के लिए नोटबन्दी से बड़ा मूर्खतापूर्ण और दुर्भावनापूर्ण कोई और तरीक़ा नहीं हो सकता!

कुलमिलाकर, नोटबन्दी को आँकड़ों के मकड़जाल में उलझाकर इसे लाभदायक और क्रान्तिकारी बताने वाले झूठली का मक़सद एक बार फिर से लोगों की आँखों में धूल झोंककर उन्हें उल्लू बनाने का ही है। वर्ना, सच्चाई तो ये है कि रिश्वतख़ोरी, भ्रष्टाचार, कालाधन, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसे हरेक मोर्चे पर नोटबन्दी पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था, रोज़गार और काम-धन्धों को ऐसा झटका लगा कि वो दो साल बाद भी उबर नहीं पाये हैं। नोटबन्दी ने ग़रीबों, मज़दूरों और किसानों को इतना ज़बरदस्त नुक़सान पहुँचाया है, जैसा उन्हें, शायद बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से भी नहीं पहुँचता है! नोटबन्दी हर लिहाज़ से मूर्ख शासकों की मानव-निर्मित आपदा साबित हुई!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

चुनाव

मप्र में शिवराज के दांव पर कांग्रेस ने फेंका जाल

कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।

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Shivraj-Ajay

भोपाल, 10 नवंबर | मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘किसानपुत्र’, ‘महिला हितैषी’ और ‘युवाओं के हमदर्द’ होने के दांव पर कांग्रेस ने ‘वचनपत्र’ के जरिए ऐसा जाल फेंका है, जो शिवराज की बीते डेढ़ दशक में बनी छवि पर चादर डालता दिख रहा है।

शिवराज की अगुवाई में भाजपा तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। पिछले दो चुनावों में शिवराज की जीत में किसानों और महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। लाडली लक्ष्मी योजना और किसानों के लिए बनी योजनाओं ने शिवराज के सिर जीत का सेहरा बांधा था। शिवराज और भाजपा इस बार भी जीतने की रणनीति में व्यस्त है, मगर इसी बीच शनिवार को कांग्रेस ने ऐसा ‘वचनपत्र’ जारी किया, जिसमें सरकार बनने पर किसानों, युवाओं और महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के वादे किए गए हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक साजी थॉमस कहते हैं कि शिवराज बीते डेढ़ दशक में राज्य में खुद को किसानपुत्र, महिलाओं का भाई, लड़कियों का मामा और युवाओं के आदर्श के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में उन्हीं वर्गो के जीवन को बदलने का वादा किया है, जो शिवराज के निशाने पर और उनका सबसे बड़ा वोट बैंक रहा है। कांग्रेस के वादे पर यह वर्ग कितना भरोसा करता है, यह तो समय ही बताएगा।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा, “कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।”

वहीं कांग्रेस के वचनपत्र पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस वचन तो देती है, मगर उसे पूरा कभी नहीं करती। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने का वचन दिया था, मगर गरीबी नहीं हटी। राजीव गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, मगर गरीबी की जगह गरीब ही हटा दिए।

सच तो यह है कि भाजपा किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हें फसल का उचित दाम दिलाने के वादे करती रही, मगर सरकार की ये कोशिशें जमीनी स्तर पर रंग नहीं ला पाईं। बीते दो साल में किसानों के कई आंदोलनों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

वहीं उद्योगों की स्थापना के बावजूद पर्याप्त संख्या में युवाओं को रोजगार नहीं मिला, साथ ही महिला असुरक्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने वचनपत्र तैयार किया है, और सभी वर्गो से वादे किए हैं कि उनके कल्याण की योजनाएं तो बनेंगी ही, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात में बदलाव आाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस का वचनपत्र तो आ गया है, अब भाजपा का घोषणापत्र आने वाला है। अब देखना होगा कि भाजपा की क्या रणनीति होती है और वह कांग्रेस के वादों का किस तरह जवाब देती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तो मीडिया के सामने कह दिया है कि भाजपा संकल्पपत्र बनाती है, जो महज ‘जुमलापत्र’ बनकर रह जाता है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

व्यंग्य – जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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अभी-अभी केन्द्रीय कैबिनेट की एक आपात और बेहद ख़ुफ़िया बैठक हुई है! इसमें पहली बार संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के शीर्ष पदाधिकारी भी शामिल हुए! महामहिम चौकीदार महोदय ने सर्वोच्च स्तर की इस रणनीतिक मंत्रणा में अपने मंत्रियों को पीछे बैठाया और हिन्दू हित के संरक्षक महापुरुषों को अगली पंक्ति में बैठाया गया! बैठक में कई क्रान्तिकारी फ़ैसले लिये गये, लेकिन ये भी तय हुआ कि इनका औपचारिक ऐलान नहीं होगा! लिहाज़ा, सोशल मीडिया पर प्रकाशित इस पोस्ट को आप बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ मान सकते हैं!

सरकार ने तय किया है कि अब देश में ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ चलाया जाएगा! चुनाव आचार संहिता को देखते हुए अभी इस आन्दोलन का ऐलान नहीं किया जाएगा, लेकिन भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी। और, ऐसा होते ही जहाँ मुसलमानों का क़त्लेआम शुरू हो जाएगा, वहीं हिन्दुओं के ध्रुवीकरण इतना ज़ोर पकड़ लेगा, जैसे जंगल की बेक़ाबू आग!

भगवा ख़ानदान का यक़ीन है कि यदि उसकी ये रणनीति परवान चढ़ गयी तो न सिर्फ़ आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ऐतिहासिक कामयाबी मिलेगी, बल्कि 2019 के आम चुनाव में भी पार्टी कम से कम 350 सीटें जीतने में सफल होगी! कैबिनेट की विशेष बैठक में ये भी तय हुआ कि भगवा ख़ानदान के जुड़े लोग बड़े पैमाने पर शहरों, जगहों और भवनों के नाम बदलने की माँग करने वाले बयान देने पर ज़ोर दें। ताकि मीडिया में उन्हें भरपूर सुर्ख़ियाँ मिलती रहें। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि जनता का ध्यान राफ़ेल और नोटबन्दी जैसे विश्वस्तरीय घोटालों से हट जाएगा और वो मूर्खों की तरह से इस झाँसे में फँस जाएगी कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है! मोदी अजेय है!

  1. मुसलमान मंत्री बदले नाम

भगवा ख़ानदान के आग्रह पर ढोंगी सरकार ने तय किया है कि देश भर में बीजेपी की सरकारों में जो भी इक्का-दुक्का मुसलमान मंत्री हैं, उनके नाम फ़ौरन बदले जाएँ! वर्ना, इन मुसलमानों को मंत्री पद गँवाना होगा!

  1. ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवान ख़ानदान ने तय किया है कि अब अंडे को ‘पक्षीफल’ कहा जाएगा! इस फल से न सिर्फ़ मन्दिरों में भगवान का भोग लगाया जा सकेगा, बल्कि व्रत-उपवास में इसे फलाहार के रूप में इस्तेमाल करना होगा!

  1. वीर सावरकर पक्षीपालक योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना की आत्मा को मेक इन इंडिया की आत्मा से जोड़ा जाएगा। भगवा ख़ानदान को यक़ीन है कि आत्माओं के मिलन वाली इस क्रान्तिकारी नीति से पक्षीफलों की माँग में ज़बरदस्त उछाल आएगा और पक्षीपालकों के रूप में कम से कम 10 करोड़ युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर खुलेंगे। इसे वीर सावरकर पक्षीपालक योजना कहा जाएगा। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा की सुविधा भी आरक्षण की तरह इस अद्भुत योजना के तहत में पहले दस साल तक मुफ़्त मिलेगी और भविष्य में भी इसे आरक्षण की ही तरह दस-दस वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

  1. दीनदयाल पकौड़ा योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना में उन लोगों को वरीयता मिलेगी जो अपने ‘भक्त होने का आधार कार्ड’ दिखा सकें और जो ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ के लाभार्थी नहीं हो! ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री पकौड़ा रोज़गार योजना का भी नया नामकरण कर दिया गया है! उसे अब ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ कहा जाएगा!

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ओपिनियन

अंतिम सांस तक कांग्रेसी, मगर बेटे का साथ दूंगा : सत्यव्रत चतुर्वेदी

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे।

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Satyavrat Chaturvedi

छतरपुर, 9 नवंबर | कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता और पूर्व राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन बंटी चतुर्वेदी ने बगावत कर समाजवादी पार्टी का दामन थामकर छतरपुर जिले के राजनगर विधानसभा क्षेत्र से नामांकनपत्र भरा है। चतुर्वेदी का कहना है कि वे अंतिम सांस तक कांग्रेसी हैं, मगर एक पिता के तौर पर बेटे का हर संभव साथ देंगे, क्योंकि छुपकर राजनीति करना उनकी आदत में नहीं है।

नितिन बंटी चतुर्वेदी राजनगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के दावेदार थे, मगर कांग्रेस ने अंतिम समय में उसका टिकट काट दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के कहने पर नितिन ने सपा का दामन थामकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

सत्यव्रत चतुर्वेदी ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, “नितिन बालिग है, उसे अपने फैसले करने का हक है, पिछले दो चुनाव से वह कांग्रेस से टिकट मांग रहा था, पार्टी ने हर बार अगले चुनाव का भरोसा दिलाया, मगर इस बार फिर वही हुआ। पार्टी ने टिकट नहीं दिया, इन स्थितियों में बंटी ने सपा से चुनाव लड़ने का फैसला लिया, यह उसका व्यक्तिगत फैसला है। मैं तो अंतिम सांस तक कांग्रेसी रहूंगा। हां, पिता के नाते बंटी का साथ दूंगा। छुपकर कहने और राजनीति करना आदत में नहीं है, जो करना है वह कहकर करता हूं, छुपाता नहीं हूं।”

चतुर्वेदी से जब पूछा गया कि बेटा सपा से चुनाव लड़ रहा है, पार्टी आप पर कार्रवाई कर सकती है, तो उनका जवाब था, “मैं कांग्रेस में जन्मा हूं, कांग्रेसी रक्त मेरी नसों में प्रवाहित होता है, दिल में कांग्रेस है, पार्टी को फैसले लेने का अधिकार है, मगर मेरे दिल से कोई कांग्रेस को नहीं निकाल सकता। अंतिम सांस भी कांग्रेस के लिए होगी।”

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे। बाबूराम चतुर्वेदी राज्य सरकार में मंत्री रहे और विद्यावती कई बार सांसद का चुनाव जीतीं। बुंदेलखंड में उनकी हैसियत दूसरी इंदिरा गांधी के तौर पर रही है।

चतुर्वेदी के समकालीन नेताओं में शामिल दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुभाष यादव आदि ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार में एक और एक से ज्यादा सदस्यों को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है, मगर चतुर्वेदी के बेटे को पार्टी ने टिकट देना उचित नहीं समझा। इसी के चलते उनके बेटे बंटी ने बगावत कर दी।

अन्य नेताओं के परिजनों को टिकट दिए जाने के सवाल पर चतुर्वेदी का कहना है, “इस सवाल का जवाब तो मैं नहीं दे सकता, यह जवाब तो पार्टी के बड़े नेता और टिकटों का वितरण करने वाले ही दे सकते हैं, जहां तक बात मेरी है, मन में तो मेरे भी सवाल आता है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों।”

कांग्रेस में टिकट वितरण की कवायद छह माह पहले ही शुरू करने का ऐलान कर दिया गया था, जगह जगह पर्यवेक्षक भेजे गए, सर्वे का दौर चला, नेताओं की टीमों ने डेरा डाला और वादा किया गया कि न तो पैराशूट वाले नेता चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे और न ही बीते चुनावों में भारी मतों से हारे उम्मीदवारों को मौका दिया जाएगा। मगर उम्मीदवारों की सूचियां इन सारे दावे और वादे की पोल खोलने के लिए काफी है।

चतुर्वेदी भी इस बात से हैरान हैं कि जो व्यक्ति पिछला चुनाव 38 और 40 हजार से हारा, उसे उम्मीदवार बना दिया गया। आखिर किसने और कैसा सर्वे किया, यह वे समझ नहीं पा रहे हैं। अब तो चुनाव के बाद ही पार्टी को इन हालात की समीक्षा करनी चाहिए, आखिर किसने किस तरह का खेल ख्ेाला।

–आईएएनएस

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kapil sibal
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