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200 साल पुरानी हार का बदला लेना चाहता है दलित उत्पीड़न का ताज़ा प्रसंग!

विजय की 200 वीं बरसी पर दलित समाज के क़रीब 3 लाख जय-स्तम्भ पर जुटने वाले थे। लेकिन 29 दिसम्बर से समारोह स्थल और उसके आसपास के गाँवों में संघियों ने भगवा ध्वजों के साथ उन्माद फैलाना शुरू कर दिया। इससे तनाव और हिंसा के हालात पैदा हो गये।

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Photo Credit : dnaindia

क़रीब सौ साल पहले जिस महाराष्ट्र की धरती पर ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना अंकुरित हुई, आज वहाँ हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाने की ख़ूनी जंग छिड़ गयी है! आमतौर पर जिस ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना में मुसलमानों को हिन्दुओं के सबसे बड़े दुश्मन की तरह पेश किया जाता है, वो महाराष्ट्र में नहीं है। अभी तो वहाँ सवर्ण हिन्दुओं और ख़ासकर चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उन्मादियों और उन महार दलितों से ठन गयी है जिन्होंने 200 साल पहले अपने उत्पीड़न का बदला लिया था! पेशवा काल के उस दौर में महार जाति के दलितों को कई अमानवीय नियमों का सामना करना पड़ता था। उन्हें सार्वजनिक जगहों पर गले में हाँडी लटकाकर चलना पड़ता था। ताकि यदि उन्हें थूकना हो तो वो अपने गले में लटकती हाँडी में ही थूकें। इसके अलावा, महार दलितों को सड़क पर चलते वक्त अपने पीछे एक झाडू बाँधकर भी चलना होता था ताकि वो जिस रास्ते से गुजरें वो साफ़ भी होता रहे।

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बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर ने अपनी क़िताब ‘एनहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ में ऐसी निर्मम प्रथाओं का ब्यौरा दिया है। आम्बेडकर ख़ुद भी अछूत महार जाति से ही थे। महार लोग ब्राह्मण पेशवाओं के अत्याचार से परेशान थे। आम्बेडकर की ही ‘राइटिंग एंड स्पीचेज’ के 12वें खंड के मुताबिक़, जब हिन्दुस्तान में अँग्रेज़ अपने सत्ता विस्तार की हसरत के तहत मराठाओं से भिड़ने वाले थे, तब उन्हें महारों की वीरता और उनके प्रति हो रही क्रूरता का पता चला। अँग्रेज़ों ने महारों की दुःखती रग पर हाथ रखा। उन्हें तमाम मानवीय अधिकारों को हासिल करने के लिए ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल होने का न्योता दिया। ब्राह्मण पेशवाओं की क्रूरता को ख़त्म करने के लिए महारों ने अँग्रेज़ों का साथ दिया।

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Bhima Koregaon memorial

फलस्वरूप, 1 जनवरी 1818 को पुणे में भीमा नदी के किनारे कोरेगाँव में पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों का युद्ध अँग्रेज़ों के 500 सैनिकों की टुकड़ी से हुआ। अँग्रेज़ों की उस सेना में ज़्यादातर सैनिक महार थे। युद्ध में महारों की अतुल्य वीरता ने पेशवा के सैनिकों के छक्के छुड़ा दिये और वो मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। इससे मराठा साम्राज्य का पतन हो गया। अँग्रेज़ों की विजय हुई। युद्ध में 22 महार सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। तब अँग्रेज़ों ने महारों के प्रति आभार जताते हुए पुणे के परने गाँव में जय-स्तम्भ बनवा दिया। तभी से उस संग्राम को दलित विरोधी व्यवस्था के सफ़ाये के निर्णायक दौर के रूप में देखा जाता है। इसीलिए 200 साल से हज़ारों की तादाद में दलित समाज उस संग्राम की बरसी पर अपने पुरखों को श्रद्धांजलि देने के लिए जय-स्तम्भ पर जुटता है। और, 1 जनवरी को ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाता है।

भीमा-कोरेगाँव युद्ध की कहानी बहुत दिलचस्प और शिक्षाप्रद है। इसके ज़रिये क़द-काठी में मज़बूत महारों ने सदियों से क़ायम पेशवाओं के मनुवादी अत्याचार को ख़त्म करने के लिए कमर कसी तो अँग्रेज़ों ने साबित कर दिया कि सवर्ण हिन्दुओं का सामाजिक वर्चस्व कितना खोखला है! इसके बावजूद, ब्राह्मण पेशवाओं का आधुनिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, ये कहकर समारोह का विरोध करता रहा कि युद्ध में दलितों ने अँग्रेज़ों का साथ देकर शौर्य नहीं दिखाया बल्कि देश के साथ गद्दारी की। यहाँ ये ग़ौर करना बेहद ज़रूरी है कि उस दौर में भारत जैसी कोई राजनीतिक सत्ता नहीं थी। तब एक राजा के सैनिक दूसरे राजा के सैनिकों से राज्य विस्तार के लिए युद्ध करते थे। तब मातृभूमि की रक्षा जैसा कोई सिद्धान्त नहीं था। राजा सिर्फ़ राजा हुआ करता था। देसी या विदेशी नहीं।

लिहाज़ा, तब गद्दारी की वैसी परिभाषा थी ही नहीं, जैसी आज़ाद भारत में विकसित हुई। अलबत्ता, तब सिर्फ़ और सिर्फ़ शौर्य होता था। इसमें दलितों को मनुवादी ब्राह्मणों से ज़ोरदार शिकस्त मिली। क्योंकि तब तक मानवता के सामने मनुवादी जातिवाद, अन्यायकारी साबित हो चुका था। युद्ध में महार अपना आत्म-सम्मान पाने के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए उतरे थे, जबकि पेशवा के सैनिक अपनी स्वामी-भक्ति दिखाने के लिए लड़ रहे थे। पेशवा की विशाल सेना इसलिए भी हारी, क्योंकि वो कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि यथास्थिति को क़ायम रखने के लिए लड़ रही थी। यही वजह से युद्ध में विजय पाने वाले महारों ने जय-स्तम्भ पर शौर्य दिवस मनाने की परम्परा शुरू की। 1937 में आम्बेडकर भी जय-स्तम्भ पर गये थे।

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इस बार विजय की 200 वीं बरसी पर दलित समाज के क़रीब 3 लाख जय-स्तम्भ पर जुटने वाले थे। लेकिन 29 दिसम्बर से समारोह स्थल और उसके आसपास के गाँवों में संघियों ने भगवा ध्वजों के साथ उन्माद फैलाना शुरू कर दिया। इससे तनाव और हिंसा के हालात पैदा हो गये। संघियों को राज्य सरकार का परोक्ष समर्थन हासिल था। इससे हालात और बिगड़ गये। हिंसा और आगजनी, गाँवों से शहरों और फिर पूरे महाराष्ट्र में फैल गयी। इसके बाद, समाज के हर पक्ष ने अपनी-अपनी सियासी रोटियाँ सेंकना शुरू कर दिया। और, देखते ही देखते भीमा-कोरेगाँव के दलितों की आवाज़ राष्ट्रव्यापी बन गयी। संसद में इसे लेकर ख़ूब शोर-शराबा हुआ।

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भीमा-कोरेगाँव के ताज़ा प्रसंग को भारत में हिन्दुत्ववादियों और मानवतावादियों के बीच वर्ग-संघर्ष की बड़ी शुरुआत के रूप में देखना ज़रूरी है। वैसे तो दलित उत्पीड़न की वारदातें आज़ादी के बाद भी हमेशा होती रही हैं, लेकिन मोदी राज में इसने नया कलेवर हासिल किया है। पहले रोहित वेमुला की हत्या और फिर गुजरात के उना में जिस तरह से मनुवादी संघियों ने दलितों को निशाना बनाया, जिस तरह से आरक्षण को ख़त्म करने की बातें हुई, उससे यदि हालात गृह-युद्ध की ओर बढ़ जाएँ तो ताज़्ज़ुब मत कीजिएगा। दरअसल, 2014 के बाद से चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पताका न सिर्फ़ दिल्ली पर लहराने लगी, बल्कि देखते-देखते, महज पौने चार साल में ही, देश के 19 राज्यों में भगवा-सल्तनत क़ायम हो गयी। इसीलिए ऐसे समय में जब देश पूरी तेज़ी से भगवामय हो रहा हो, तब दलितों को अपनी उस जीत का उत्सव मनाने की रियायत कैसे दी जा सकती है, जिसमें ब्राह्मणों की पेशवाई वाला सत्ता की कहीं बड़ी सेना की हार हुई थी!

मौजूदा दौर में मनुवादी संघियों ने पहले जिस शिद्दत से मतान्ध हिन्दुओं के दिमाग़ में मुसलमानों को लेकर ज़हर भरा, वैसा ही काम अब दलितों को लेकर किया जा रहा है। यदि हिन्दुत्ववादियों का दलित और मुसलिम-विरोध जल्द ही औंधे मुँह नहीं गिरा तो वो दिन दूर नहीं जब हिन्दुस्तान का मौजूदा राजनीतिक मानचित्र फिर से इतिहास बन जाएगा! देश के टुकड़े हो जाएँगे! मुसलमानों को लेकर मूर्ख हिन्दुओं के दिल-ओ-दिमाग़ में जैसा झूठ बिठाया गया है, यदि ये मान भी लें कि वो सच है तो संघियों के इरादे के मुताबिक़, आगे क्या होना चाहिए? मत भूलिए कि संघियों की परिभाषाओं के मुताबिक़, मुसलमानों में जितने भी ऐब हैं, विकार हैं, ख़राबी हैं और गन्दगियाँ हैं वो क्या वो सभी हिन्दुओं में भी नहीं हैं?

हिन्दू, किन-किन अन्य धर्मावलम्बियों के मुक़ाबले कम भ्रष्ट, कम घूसख़ोर, कम बलात्कारी, कम हत्यारे, कम मक्कार, कम चोर या कम असभ्य हैं? 70 साल से तो हिन्दू ही पूरी प्रमुखता से हिन्दुस्तान को चला रहे हैं! सब कुछ तो हिन्दुओं की ही मुट्ठी में है। सम्पूर्ण सरकारी व्यवस्था में मुसलमान तो नाम मात्र के ही हैं। लेकिन क्या हिन्दू ईमानदारी से ये कह पाएँगे कि वो राष्ट्र को सर्वोपरि रखकर चलते हैं? क्या हिन्दू कोई दुराचार, कदाचार या अनैतिक करतूतें नहीं करते हैं? धर्म की असली शिक्षाओं को क्या हिन्दुओं ने अपने जीवन में उतार रखा है? यदि नहीं, तो क्या औरों में खोट ढूँढने से पहले हिन्दुओं को अपने गिरेबान में नहीं झाँकना चाहिए?

बहरहाल, संघी चिन्तन के मुताबिक़, यदि थोड़ी देर के लिए ये मान भी लें कि मुसलमान ही हमारी सारी समस्याओं की वजह हैं और यदि भारत, मुसलमानों से मुक्त हो जाए तो क्या तब जो भारत बचेगा उसमें चारों ओर अमन, भाईचारा, शान्ति और सद्भाव स्थापित हो जाएगा? क्या मुसलिम-रहित ‘हिन्दू राष्ट्र’ में अपराध, हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, दुराचार, ग़रीबी, ऊँच-नीच, छूआछूत, जातिवाद वग़ैरह ख़त्म हो जाएगा? क्या ‘हिन्दू राष्ट्र’ में भाई-भाई के बीच झगड़े नहीं होंगे? क्या ‘हिन्दू राष्ट्र’ की राजनीति में हिन्दू को हिन्दू से नहीं लड़वाया जाएगा? क्या तब हिन्दू ही एक-दूसरे के क़ातिल नहीं होंगे? बिल्कुल होंगे! अवश्य होंगे। क्योंकि वर्ग-संघर्ष को हमेशा इंसान का ख़ून पीने की ख़्वाहिश रही है। पहले, अगड़ों को पिछड़ों से लड़वाया जाएगा। फिर दलितों को सर्वणों से।

संघियों का सपना मनुस्मृति को ही संविधान बनाने का था। इसमें आरक्षण को ख़त्म करके विकृत हिन्दुत्व वाले छुआछूत, जातिगत शोषण, दमन-उत्पीड़न वाली वर्ण-व्यवस्था वग़ैरह की वापसी की जाएगी। ताकि चितपावन ब्राह्मणों की वही राजशाही लौटायी जा सके जो 1818 के भीमा-कोरेगाँव युद्ध से पहले मौजूद थी! जिस दिन मनुस्मृति की वापसी हो जाएगी, उस दिन संघियों को उनका परम लक्ष्य हासिल हो जाएगा। शायद, तब तक वक़्त का पहिया पूरा घूम चुका होगा!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनका निजी विचार है)

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हिंदी ब्लॉग्स को हर महीने 3 करोड़ पेज व्यू : मॉमस्प्रेसो

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नई दिल्ली, 14 सितम्बर | भारत के महिलाओं के लिए सबसे बड़े यूजर-जनरेटेड कंटेंट प्लेटफार्म मॉमस्प्रेसो ने हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर अपने 6,500 से ज्यादा ब्लॉगर्स के डेटा का विश्लेषण कर नई रिपोर्ट प्रस्तुत की है। विश्लेषण कहता है कि हिन्दी ब्लॉग्स ने हर महीने 3 करोड़ से ज्यादा पेज व्यू हासिल की है। इसमें से 95 प्रतिशत की खपत पाठकों ने मोबाइल पर की है।

प्लेटफार्म ने बताया कि हिंदी पेज व्यू अंग्रेजी से ज्यादा हो गए हैं और इस समय कुल पेज व्यू का 50 प्रतिशत हो गया है।

मॉमस्प्रेसो की ओर से जारी बयान में कहा गया कि प्लेटफार्म पर हिंदी में लेखन की सूची मुख्य रूप से उन शहरों की माताओं ने तैयार की है, जिनकी तुलनात्मक रूप से भागीदारी कम रही है। इनमें पटना, आगरा, लखनऊ, शिमला, भुवनेश्वर और इंदौर शामिल है। 75 प्रतिशत हिन्दी ब्लॉग्स को मॉमस्प्रेसो मोबाइल ऐप के जरिये लिखा गया है, जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। 60 प्रतिशत ब्लॉगर्स अभी भी ब्लॉग लिखने के लिए डेस्कटॉप उपयोग करते हैं। मोबाइल ऐप पर बने हिन्दी ब्लॉग्स में से 93 प्रतिशत एंड्रायड फोन पर बने हैं। प्लेटफार्म पर इस समय 1,595 हिन्दी ब्लॉगर्स हैं, जिन्होंने अब तक 14,746 ब्लॉग्स बनाए हैं। हर महीने करीब 1,800 ब्लॉग्स जोड़े जा रहे हैं।

मॉमस्प्रेसो ने बताया कि हिन्दी की अधिकतम रीडरशिप लखनऊ, जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़, आगरा और पटना से है। यह भी बताया गया कि 95 प्रतिशत यूजर्स ने लेखन का इस्तेमाल मोबाइल पर किया। जिस कंटेंट ने अधिकतम रीडरशिप (65 प्रतिशत) हासिल की, वह ‘मां की जिंदगी’ या ‘मॉम्स लाइफ’ सेक्शन था। रिलेशनशिप्स से लेकर पैरेंटिंग और सामाजिक उत्तरदायित्व तक का लेखन इस पर उपलब्ध है। अन्य लोकप्रिय सेक्शन में प्रेग्नेंसी, बेबी, हेल्थ और रैसिपी भी शामिल हैं।

हिंदी पोस्ट्स को अंग्रेजी की तुलना में 4.2 गुना ज्यादा एंगेजमेंट मिला। इसमें लाइक्स, शेयर और कमेंट्स शामिल हैं। हिन्दी में हाइपर एंगेजमेंट की एक बड़ी वजह हिन्दी कंटेंट की क्वालिटी है। पहली बार महिलाओं को कई मुद्दों पर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए सुरक्षित स्थान मिला है। कई महिलाएं जो लैंगिंक भेदभाव, सामाजिक मुद्दों और अन्य वजहों से खुलकर बोल नहीं पाती थी, वह भी इस पर अपने आपको अभिव्यक्त कर रही है।

मॉमस्प्रेसो के सह-संस्थापक और सीईओ विशाल गुप्ता ने कहा, “हमारा विजन यह है कि अगले तीन वर्षो में हमारे प्लेटफॉर्म पर सभी माताओं में से 70 फीसदी को लेकर आना है और क्षेत्रीय भाषा लेखन इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण है। हमें गर्व है कि मॉमस्प्रेसो एक ऐसा मंच प्रदान कर रहा है जहां भारत भर की माताएं बिना डर के अपने विचार व्यक्त कर रही हैं। इन विषयों पर बहस और चर्चाओं को प्रोत्साहित करती हैं। पिछले 12 महीनों में हमारे ट्रैफिक चार गुना बढ़ा है और हिंदी की भूमिका इस विकास में महत्वपूर्ण रही है। इस समय हमारे पास चार अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में लेखन है और वर्ष के अंत से पहले हमारी योजना 3 और जोड़ने की है।

हिंदी भाषा लेखन का उपयोग करने वाले ब्रांड्स की संख्या 2017 के 6 फीसदी से बढ़कर 2018 में 27 फीसदी हो गई है। इसमें पैम्पर्स, डेटॉल, बेबी डव, नेस्ले, जॉनसन एंड जॉन्सन, एचपी, ट्रॉपिकाना एसेंशियल्स और क्वैकर जैसे ब्रांड शामिल हैं।

–आईएएनएस

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जानिये क्यों गिर रहा है रुपया

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नई दिल्ली, 13 सितम्बर | केंद्र सरकार ने रुपये की गिरावट को थामने की हरसंभव कोशिश करने का भरोसा दिलाया है। इसका असर पिछले सत्र में तत्काल देखने को मिला कि डॉलर के मुकाबले रुपये में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। हालांकि रुपये में और रिकवरी की अभी दरकार है।

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर तक लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को 72.69 पर बंद हुआ था।

रुपये की गिरावट से अभिप्राय डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आना है। सरल भाषा में कहें तो इस साल जनवरी में जहां एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे वहां अब 72 रुपये देने होते हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।

शेष दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए प्राय: डॉलर की जरूरत होती है ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर देशी मुद्रा कमजोर होती है।

एंजेल ब्रोकिंग के करेंसी एनालिस्ट अनुज गुप्ता ने रुपये में आई हालिया गिरावट पर कहा, “भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। वहीं, विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश में कटौती करने से देश से डॉलर का आउट फ्लो यानी बहिगार्मी प्रवाह बढ़ गया है। इससे डॉलर की आपूर्ति घट गई है।”

उन्होंने बताया कि आयात ज्यादा होने और निर्यात कम होने से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है, जोकि रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खाते का घाटा तकरीबन 18 अरब डॉलर हो गया है। जुलाई में भारत का आयात बिल 43.79 अरब डॉलर और निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा।

वहीं, विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार घटता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह को 1.19 अरब डॉलर घटकर 400.10 अरब डॉलर रह गया।

गुप्ता बताते हैं, “राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से भी रुपये में कमजोरी आई है। आर्थिक विकास के आंकड़े कमजोर रहने की आशंकाओं का भी असर है कि देशी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है। जबकि विश्व व्यापार जंग के तनाव में दुनिया की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती के संकेत मिल रहे हैं जिससे डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती आने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल कर ले जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक हितों के टकराव के कारण अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुई व्यापारिक जंग से वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।

–आईएएनएस

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मोदी सरकार को बिना विचारे नयी नीतियाँ लागू करने की बीमारी है!

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काग़ज़ों पर कोई नीति भले ही शानदार लगे, लेकिन उसे सफलतापूर्वक लागू करना ही सबसे अहम है। युगान्कारकारी नीतियों का ऐलान करने से पहले ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लेना बेहद ज़रूरी है। एनडीए की विफलता की सबसे बड़ी वजह ही ये है कि वो नयी नीतियों को लागू करने से पहले उसके प्रभावों का आंकलन नहीं पाती है। नोटबन्दी, इसका सबसे जीता-जागता उदाहरण है। मोदी सरकार को इसका अन्दाज़ा ही नहीं था कि नोटबन्दी, देश के लिए विनाशकारी साबित होगा। इसी वजह से जीएसटी को घटिया ढंग से लागू किया गया और उससे भी फ़ायदे की जगह नुक़सान ही हाथ लगा।

दिवालिया और कंगाली क़ानून यानी इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी को मई 2016 में संसद ने पारित किया। मोदी सरकार ने इसे बहुत बड़े आर्थिक सुधार की तरह पेश किया और ख़ूब अपनी पीठ थपथपाई। इसका मक़सद बैंकों की बैलेंस शीट को साफ़-सुथरा करना, कॉरपोरेट को उनके पापों की सज़ा दिलाना, बैंकिंग प्रणाली में हेराफेरी करने वालों को दंडित करना और सबसे बढ़कर बैंकों के डूबे क़र्ज़ यानी एनपीए के लिए ज़िम्मेदार कम्पनियों पर कार्रवाई करना था।

12 फरवरी 2018 को रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ पुनर्निर्धारण यानी ‘लोन रिस्ट्रकचरिंग’ से जुड़ी आधा दर्जन योजनाओं को ख़त्म कर दिया। इसकी जगह नयी नीति सामने आयी जिसमें कॉरपोरेट्स को 180 दिनों के भीतर अपने बकाया क़र्ज़ों को चुकाने या फिर दिवालिया क़ानून यानी आईबीसी का सामना करने का बेहद सख़्त प्रावधान था। ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लिये गये बनी इस नीति का नतीज़ा ये निकला कि सुप्रीम कोर्ट ने रिज़र्व बैंक के 12 फरवरी वाले फ़रमान पर रोक लगा ही। लिहाज़ा, दिवालिया क़ानून को लागू करने की क़वायद बैंकों को रोक देनी पड़ी।

तब तक आईबीसी के मामलों के निपटारे के लिए दिवालियेपन से निपटने वाली तीन पेशेवर कम्पनियों के ज़रिये 1300 कर्मचारियों की भर्ती हो चुकी थी। नैशनल कम्पनी लॉ ट्राइबुनल (एनसीएलटी) की शाखाओं में कॉरपोरेट्स के ख़िलाफ़ 525 मामले भी दर्ज़ हो गये। 108 मामलों में कम्पनियाँ स्वेच्छा से दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए आगे आ गयीं। इनमें स्टील, निर्माण और खदान से जुड़ी ऐसी कम्पनियाँ हैं, जिन पर बैंकों के 1,28,810 करोड़ रुपये बकाया है। इतनी बड़ी तादाद के बावजूद, 2014 से अभी महज कुछ ही मामलों में आईबीसी के तहत कार्रवाई आगे बढ़ी।

आईबीसी के तहत अगस्त और दिसम्बर 2017 के दौरान जिन 10 शुरुआती मामलों का निपटारा हुआ उसमें भी बैंकों को उनके कुल बकाये का सिर्फ़ 33.53 फ़ीसदी रक़म ही मिल पायी। 13 जून 2017 को रिज़र्व बैंक ने 12 बड़े बकायेदारों की पहचान दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए की। एक साल बीतने के बावजूद, इन 12 कम्पनियों में से भूषण स्टील और इलेक्ट्रो स्टील के अलावा अन्य किसी का निपटारा नहीं हुआ।

12 बड़े क़र्ज़दारों का 3,12,947 करोड़ रुपये का दावा मंज़ूर हुआ था। लगता नहीं है कि आईबीसी की नीति के मुताबिक़, इतनी रक़म कभी वसूल हो पाएगी। ऐसे मामलों में 180 दिनों की निर्धारित अवधि के ख़त्म होने के बाद बाक़ी वक़्त मुक़दमेबाज़ी में खर्च हो रहा है। ऐसे मामलों से सिर्फ़ वकीलों और दिवालियापन की कार्रवाई से जुड़े पेशेवर लोगों को फ़ायदा हो रहा है।

बिजली क्षेत्र में 34 बीमार कम्पनियों पर 1.5 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। बैंकों की चिन्ता है कि दिवालियेपन की कार्रवाई के ख़त्म होते-होते इन कम्पनियों की सम्पत्ति का दाम और घट जाएगा। रिज़र्व बैंक ने बैंकों को सख़्त हिदायत दी है कि यदि उसके 12 फरवरी वाले फ़रमान को सख़्ती से लागू नहीं किया गया तो उन्हें गम्भीर नतीज़े भुगतने होंगे। यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को हिदायत दी है कि वो रिज़र्व बैंक से बात करके आईबीसी के प्रावधानों पर राहत देने का पता लगाये, वर्ना आशंका है कि दिवालियेपन की कार्रवाई में बैंकों का 85 फ़ीसदी बकाया डूब जाएगा।

आईबीसी से जुड़ी पूरी तस्वीर का स्याह पहलू ये है कि कॉरपोरेट सेक्टर में कुछ ही कम्पनियाँ ऐसी हैं जो दिवालियेपन की कार्रवाई के बाद ज़ब्त होने वाली कम्पनी को ख़रीदने के लिए उसकी क़ीमत के मुक़ाबले 15 से लेकर 35 फ़ीसदी रक़म ही जुटा सकती हैं। स्टील सेक्टर की दोनों बड़ी कम्पनियों की नीलामी के वक़्त सिर्फ़ दो घरेलू कम्पनियाँ ही बोली लगा पायी थीं। विदेशी कम्पनियों ने तो जैसी बोलियाँ लगायीं, उससे लगा कि वो बीमार कम्पनियों को कौड़ियों के मोल, बिल्कुल वैसे ही ख़रीदना चाहती हैं, जैसा वाजपेयी सरकार के ज़माने में विनिवेश के बहाने कुछ चहेती कम्पनियों को औने-पौने दाम में सरकारी कम्पनियों को बेचा गया था।

स्टील सेक्टर में बीमार कम्पनियों को ख़रीदने के लिए आगे आने वाली घरेलू कम्पनियों को तक़रीबन एकाधिकार नज़र आया है। बिजली क्षेत्र में भी दो मुख्य खिलाड़ी हैं। इसमें से एक को अयोग्य ठहराये जाने के बाद दूसरे के लिए कोई प्रतिस्पर्धी बचा ही नहीं। इस तरह से एक कॉरपोरेट को निहाल किया जा रहा है। स्टील और बिजली ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ बैंकों की भारी रक़म डूब रही है। आईबीसी की बदौलत स्टील सेक्टर में जहाँ 35 फ़ीसदी क़र्ज़ की वसूली हो पा रही है, वहीं बिजली क्षेत्र में तो ये कुल बकाया का महज 15 फ़ीसदी है। सारा माज़रा ही अपने आप में घोटाला है, क्योंकि बीमार कम्पनियों के ख़रीदार भी बैंकों से क़र्ज़ लेकर ही सम्पत्तियाँ ख़रीदेंगी!

आप चाहें तो सरकार की सूझबूझ पर तरस खा रहे हैं, क्योंकि शायद, उसने ऐसी परिस्थितियों का अन्दाज़ा ही नहीं लगाया हो। तभी तो एक ओर रिज़र्व बैंक का 12 फरवरी वाला सर्कुलर क़ायम रहता है और दूसरी ओर 19 जुलाई को बिजली मंत्रालय की ओर से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से कहा जाता है कि वो ‘समाधान’ योजना के तहत बीमार कम्पनियों के क़र्ज़ों का पुनर्निर्धारण कर दे। ये योजना ठंडे बस्ते में चली गयी। ऐसी ही एक अन्य योजना ग्रामीण विद्युतीकरण निगम पर बकाया 17,000 करोड़ रुपये के लिए भी प्रस्तावित हुई। लेकिन वो भी बेकार साबित हुई।

रिज़र्व बैंक भी समय-समय पर ऐसे दिशा-निर्देश जारी कर रहा है, जो बताते हैं कि नीतियों का ऐलान करते वक़्त उसके अंज़ाम के बारे में नहीं सोचा जाता। ऊर्जा से जुड़ी संसदीय समिति ने मार्च 2018 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “यदि रिज़र्व बैंक ज़मीनी सच्चाई को नज़रअन्दाज़ करके दिशानिर्देश जारी करता रहेगा तो इसका मतलब ये है कि बैंक, वित्तीय संस्थाएँ और अन्य निवेशकों की रक़म की वसूली की उम्मीद घटाई में पड़ जाएगी।” संसदीय समिति की ऐसी प्रतिक्रिया से साफ़ है कि सरकार की न सिर्फ़ नीतियाँ ग़लत हैं, बल्कि उन्हें लागू करने का सलीका भी सही नहीं है।

संसदीय समिति की ये भी राय है कि “180 दिनों की मियाद में लक्ष्य को हासिल करना तक़रीबन असम्भव है।” उसने सचेत किया कि जिस दिन एनपीए के जुड़े सारे मामले राष्ट्रीय कम्पनी लॉ ट्राइबुनल में पहुँच जाएँगे, उस दिन वहाँ जाम लग जाएगा। समिति ने आगे कहा कि बिजली क्षेत्र अभी बदलाव के दौर में है। ऐसे में यदि रिज़र्व बैंक सिर्फ़ वित्तीय नज़रिये से देखेगा तो कई अन्य चुनौतियाँ भी खड़ी होंगी, जो वित्तीय परिधि से बाहर होगी। इसीलिए ये समझना ज़रूरी है कि बिजली क्षेत्र की बीमार कम्पनियाँ “राष्ट्रीय सम्पत्ति” हैं और “आख़िरकार इन्हें बचाना बहुत ज़रूरी है।”

नीति में ही घोटाला है। दो या तीन कॉरपोरेट कम्पनियों के बीच में महँगी सम्पत्तियों की बन्दरबाँट, सरकार से जुड़े पूँजीपति दोस्तों को निहाल करने का तरीका है। नीतियों को समुचित समीक्षा के बग़ैर लागू कर देना, उस आरोप के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा घटिया है जिसमें निर्णय लेने की ढिलाई के बावजूद 2004 से 2014 के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर 8.2 फ़ीसदी दर्ज होती है।

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NSUI का आरोप- डूसू अध्यक्ष अंकिव ने फर्जी दस्तावेज से लिया दाखिला

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शेयर बाजारों में गिरावट, सेंसेक्स 295 अंक नीचे

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राफेल की दलाली से बीजेपी के चेहरे पर लाली: संजय सिंह

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आईडीबीआई फेडरल लाइफ इंश्योरेंस के ब्रैंड एम्बेसेडर बने सचिन

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एशिया कप : हांगकांग ने टॉस जीत चुनी गेंदबाजी

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केन्या : बॉक्स और प्लास्टिक बैग में मिले 12 नवजातों के शव

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जहां दुनिया का महामूर्ख पैदा हुआ

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इस राखी बहनें दें भाई को उपहार!

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चुनाव2 weeks ago

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केरल में थमी बारिश, राहत कार्यों में तेजी

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समलैंगिकों को अब चाहिए शादी का हक

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