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200 साल पुरानी हार का बदला लेना चाहता है दलित उत्पीड़न का ताज़ा प्रसंग!

विजय की 200 वीं बरसी पर दलित समाज के क़रीब 3 लाख जय-स्तम्भ पर जुटने वाले थे। लेकिन 29 दिसम्बर से समारोह स्थल और उसके आसपास के गाँवों में संघियों ने भगवा ध्वजों के साथ उन्माद फैलाना शुरू कर दिया। इससे तनाव और हिंसा के हालात पैदा हो गये।

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Photo Credit : dnaindia

क़रीब सौ साल पहले जिस महाराष्ट्र की धरती पर ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना अंकुरित हुई, आज वहाँ हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाने की ख़ूनी जंग छिड़ गयी है! आमतौर पर जिस ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना में मुसलमानों को हिन्दुओं के सबसे बड़े दुश्मन की तरह पेश किया जाता है, वो महाराष्ट्र में नहीं है। अभी तो वहाँ सवर्ण हिन्दुओं और ख़ासकर चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उन्मादियों और उन महार दलितों से ठन गयी है जिन्होंने 200 साल पहले अपने उत्पीड़न का बदला लिया था! पेशवा काल के उस दौर में महार जाति के दलितों को कई अमानवीय नियमों का सामना करना पड़ता था। उन्हें सार्वजनिक जगहों पर गले में हाँडी लटकाकर चलना पड़ता था। ताकि यदि उन्हें थूकना हो तो वो अपने गले में लटकती हाँडी में ही थूकें। इसके अलावा, महार दलितों को सड़क पर चलते वक्त अपने पीछे एक झाडू बाँधकर भी चलना होता था ताकि वो जिस रास्ते से गुजरें वो साफ़ भी होता रहे।

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बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर ने अपनी क़िताब ‘एनहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ में ऐसी निर्मम प्रथाओं का ब्यौरा दिया है। आम्बेडकर ख़ुद भी अछूत महार जाति से ही थे। महार लोग ब्राह्मण पेशवाओं के अत्याचार से परेशान थे। आम्बेडकर की ही ‘राइटिंग एंड स्पीचेज’ के 12वें खंड के मुताबिक़, जब हिन्दुस्तान में अँग्रेज़ अपने सत्ता विस्तार की हसरत के तहत मराठाओं से भिड़ने वाले थे, तब उन्हें महारों की वीरता और उनके प्रति हो रही क्रूरता का पता चला। अँग्रेज़ों ने महारों की दुःखती रग पर हाथ रखा। उन्हें तमाम मानवीय अधिकारों को हासिल करने के लिए ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल होने का न्योता दिया। ब्राह्मण पेशवाओं की क्रूरता को ख़त्म करने के लिए महारों ने अँग्रेज़ों का साथ दिया।

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Bhima Koregaon memorial

फलस्वरूप, 1 जनवरी 1818 को पुणे में भीमा नदी के किनारे कोरेगाँव में पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों का युद्ध अँग्रेज़ों के 500 सैनिकों की टुकड़ी से हुआ। अँग्रेज़ों की उस सेना में ज़्यादातर सैनिक महार थे। युद्ध में महारों की अतुल्य वीरता ने पेशवा के सैनिकों के छक्के छुड़ा दिये और वो मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। इससे मराठा साम्राज्य का पतन हो गया। अँग्रेज़ों की विजय हुई। युद्ध में 22 महार सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। तब अँग्रेज़ों ने महारों के प्रति आभार जताते हुए पुणे के परने गाँव में जय-स्तम्भ बनवा दिया। तभी से उस संग्राम को दलित विरोधी व्यवस्था के सफ़ाये के निर्णायक दौर के रूप में देखा जाता है। इसीलिए 200 साल से हज़ारों की तादाद में दलित समाज उस संग्राम की बरसी पर अपने पुरखों को श्रद्धांजलि देने के लिए जय-स्तम्भ पर जुटता है। और, 1 जनवरी को ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाता है।

भीमा-कोरेगाँव युद्ध की कहानी बहुत दिलचस्प और शिक्षाप्रद है। इसके ज़रिये क़द-काठी में मज़बूत महारों ने सदियों से क़ायम पेशवाओं के मनुवादी अत्याचार को ख़त्म करने के लिए कमर कसी तो अँग्रेज़ों ने साबित कर दिया कि सवर्ण हिन्दुओं का सामाजिक वर्चस्व कितना खोखला है! इसके बावजूद, ब्राह्मण पेशवाओं का आधुनिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, ये कहकर समारोह का विरोध करता रहा कि युद्ध में दलितों ने अँग्रेज़ों का साथ देकर शौर्य नहीं दिखाया बल्कि देश के साथ गद्दारी की। यहाँ ये ग़ौर करना बेहद ज़रूरी है कि उस दौर में भारत जैसी कोई राजनीतिक सत्ता नहीं थी। तब एक राजा के सैनिक दूसरे राजा के सैनिकों से राज्य विस्तार के लिए युद्ध करते थे। तब मातृभूमि की रक्षा जैसा कोई सिद्धान्त नहीं था। राजा सिर्फ़ राजा हुआ करता था। देसी या विदेशी नहीं।

लिहाज़ा, तब गद्दारी की वैसी परिभाषा थी ही नहीं, जैसी आज़ाद भारत में विकसित हुई। अलबत्ता, तब सिर्फ़ और सिर्फ़ शौर्य होता था। इसमें दलितों को मनुवादी ब्राह्मणों से ज़ोरदार शिकस्त मिली। क्योंकि तब तक मानवता के सामने मनुवादी जातिवाद, अन्यायकारी साबित हो चुका था। युद्ध में महार अपना आत्म-सम्मान पाने के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए उतरे थे, जबकि पेशवा के सैनिक अपनी स्वामी-भक्ति दिखाने के लिए लड़ रहे थे। पेशवा की विशाल सेना इसलिए भी हारी, क्योंकि वो कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि यथास्थिति को क़ायम रखने के लिए लड़ रही थी। यही वजह से युद्ध में विजय पाने वाले महारों ने जय-स्तम्भ पर शौर्य दिवस मनाने की परम्परा शुरू की। 1937 में आम्बेडकर भी जय-स्तम्भ पर गये थे।

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इस बार विजय की 200 वीं बरसी पर दलित समाज के क़रीब 3 लाख जय-स्तम्भ पर जुटने वाले थे। लेकिन 29 दिसम्बर से समारोह स्थल और उसके आसपास के गाँवों में संघियों ने भगवा ध्वजों के साथ उन्माद फैलाना शुरू कर दिया। इससे तनाव और हिंसा के हालात पैदा हो गये। संघियों को राज्य सरकार का परोक्ष समर्थन हासिल था। इससे हालात और बिगड़ गये। हिंसा और आगजनी, गाँवों से शहरों और फिर पूरे महाराष्ट्र में फैल गयी। इसके बाद, समाज के हर पक्ष ने अपनी-अपनी सियासी रोटियाँ सेंकना शुरू कर दिया। और, देखते ही देखते भीमा-कोरेगाँव के दलितों की आवाज़ राष्ट्रव्यापी बन गयी। संसद में इसे लेकर ख़ूब शोर-शराबा हुआ।

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भीमा-कोरेगाँव के ताज़ा प्रसंग को भारत में हिन्दुत्ववादियों और मानवतावादियों के बीच वर्ग-संघर्ष की बड़ी शुरुआत के रूप में देखना ज़रूरी है। वैसे तो दलित उत्पीड़न की वारदातें आज़ादी के बाद भी हमेशा होती रही हैं, लेकिन मोदी राज में इसने नया कलेवर हासिल किया है। पहले रोहित वेमुला की हत्या और फिर गुजरात के उना में जिस तरह से मनुवादी संघियों ने दलितों को निशाना बनाया, जिस तरह से आरक्षण को ख़त्म करने की बातें हुई, उससे यदि हालात गृह-युद्ध की ओर बढ़ जाएँ तो ताज़्ज़ुब मत कीजिएगा। दरअसल, 2014 के बाद से चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पताका न सिर्फ़ दिल्ली पर लहराने लगी, बल्कि देखते-देखते, महज पौने चार साल में ही, देश के 19 राज्यों में भगवा-सल्तनत क़ायम हो गयी। इसीलिए ऐसे समय में जब देश पूरी तेज़ी से भगवामय हो रहा हो, तब दलितों को अपनी उस जीत का उत्सव मनाने की रियायत कैसे दी जा सकती है, जिसमें ब्राह्मणों की पेशवाई वाला सत्ता की कहीं बड़ी सेना की हार हुई थी!

मौजूदा दौर में मनुवादी संघियों ने पहले जिस शिद्दत से मतान्ध हिन्दुओं के दिमाग़ में मुसलमानों को लेकर ज़हर भरा, वैसा ही काम अब दलितों को लेकर किया जा रहा है। यदि हिन्दुत्ववादियों का दलित और मुसलिम-विरोध जल्द ही औंधे मुँह नहीं गिरा तो वो दिन दूर नहीं जब हिन्दुस्तान का मौजूदा राजनीतिक मानचित्र फिर से इतिहास बन जाएगा! देश के टुकड़े हो जाएँगे! मुसलमानों को लेकर मूर्ख हिन्दुओं के दिल-ओ-दिमाग़ में जैसा झूठ बिठाया गया है, यदि ये मान भी लें कि वो सच है तो संघियों के इरादे के मुताबिक़, आगे क्या होना चाहिए? मत भूलिए कि संघियों की परिभाषाओं के मुताबिक़, मुसलमानों में जितने भी ऐब हैं, विकार हैं, ख़राबी हैं और गन्दगियाँ हैं वो क्या वो सभी हिन्दुओं में भी नहीं हैं?

हिन्दू, किन-किन अन्य धर्मावलम्बियों के मुक़ाबले कम भ्रष्ट, कम घूसख़ोर, कम बलात्कारी, कम हत्यारे, कम मक्कार, कम चोर या कम असभ्य हैं? 70 साल से तो हिन्दू ही पूरी प्रमुखता से हिन्दुस्तान को चला रहे हैं! सब कुछ तो हिन्दुओं की ही मुट्ठी में है। सम्पूर्ण सरकारी व्यवस्था में मुसलमान तो नाम मात्र के ही हैं। लेकिन क्या हिन्दू ईमानदारी से ये कह पाएँगे कि वो राष्ट्र को सर्वोपरि रखकर चलते हैं? क्या हिन्दू कोई दुराचार, कदाचार या अनैतिक करतूतें नहीं करते हैं? धर्म की असली शिक्षाओं को क्या हिन्दुओं ने अपने जीवन में उतार रखा है? यदि नहीं, तो क्या औरों में खोट ढूँढने से पहले हिन्दुओं को अपने गिरेबान में नहीं झाँकना चाहिए?

बहरहाल, संघी चिन्तन के मुताबिक़, यदि थोड़ी देर के लिए ये मान भी लें कि मुसलमान ही हमारी सारी समस्याओं की वजह हैं और यदि भारत, मुसलमानों से मुक्त हो जाए तो क्या तब जो भारत बचेगा उसमें चारों ओर अमन, भाईचारा, शान्ति और सद्भाव स्थापित हो जाएगा? क्या मुसलिम-रहित ‘हिन्दू राष्ट्र’ में अपराध, हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, दुराचार, ग़रीबी, ऊँच-नीच, छूआछूत, जातिवाद वग़ैरह ख़त्म हो जाएगा? क्या ‘हिन्दू राष्ट्र’ में भाई-भाई के बीच झगड़े नहीं होंगे? क्या ‘हिन्दू राष्ट्र’ की राजनीति में हिन्दू को हिन्दू से नहीं लड़वाया जाएगा? क्या तब हिन्दू ही एक-दूसरे के क़ातिल नहीं होंगे? बिल्कुल होंगे! अवश्य होंगे। क्योंकि वर्ग-संघर्ष को हमेशा इंसान का ख़ून पीने की ख़्वाहिश रही है। पहले, अगड़ों को पिछड़ों से लड़वाया जाएगा। फिर दलितों को सर्वणों से।

संघियों का सपना मनुस्मृति को ही संविधान बनाने का था। इसमें आरक्षण को ख़त्म करके विकृत हिन्दुत्व वाले छुआछूत, जातिगत शोषण, दमन-उत्पीड़न वाली वर्ण-व्यवस्था वग़ैरह की वापसी की जाएगी। ताकि चितपावन ब्राह्मणों की वही राजशाही लौटायी जा सके जो 1818 के भीमा-कोरेगाँव युद्ध से पहले मौजूद थी! जिस दिन मनुस्मृति की वापसी हो जाएगी, उस दिन संघियों को उनका परम लक्ष्य हासिल हो जाएगा। शायद, तब तक वक़्त का पहिया पूरा घूम चुका होगा!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनका निजी विचार है)

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महबूबा को तलाक़ देने से भी संघियों के दिन नहीं फ़िरने वाले

एनडीए के बिखरने का मौसम दस्तक दे चुका है। चन्द्रबाबू नायडू (टीडीपी) ने बीजेपी का साथ छोड़ा। चन्द्रशेखर राव (टीआरएस) ने छोड़ा। शिव सेना (उद्धव ठाकरे) ने एकला चलो का राग छेड़ रखा है। महबूबा मुफ़्ती (पीडीपी) को तलाक़ मिल चुका है।

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बीजेपी ने जिस तीन तलाक़ (तलाक़-ए-बिद्दत या फ़ौरी तलाक़) को लेकर मुसलिम महिलाओं का दिल जीतने की रणनीति बनायी, उसी का बेज़ा इस्तेमाल करते हुए अचानक मुसलिम महिला, महबूबा को तलाक़ दे दिया। तीन साल का बेमेल रिश्ता बिल्कुल उसी तरह से तोड़ दिया गया जिसे भगवा ख़ानदान ‘ज़ुल्म और ज़्यादती’ की दुहाई दिया करता था! बहरहाल, महबूबा सरकार को गिराकर बीजेपी ने अपनी गिरती साख और घटती लोकप्रियता पर रोक लगाने का आख़िरी दाँव भी चल दिया। हालाँकि, संघ-बीजेपी के इस पैंतरे के बावजूद मोदी सरकार का हाल ‘बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनाएगी’ जैसा ही बना रहेगा!

इसकी सबसे बड़ी वजह ये है कि भगवा ख़ानदान ने अब खुले तौर पर ये क़बूल कर लिया है कि मोदी सरकार की कश्मीर नीति चारों खाने चित हो गयी है! लगे हाथ, संघ-बीजेपी ने ये भी मान लिया है कि सीमापार से आ रहे आतंकवाद से सख़्ती से निपटने का उसका नज़रिया खोखला साबित हो चुका है! नियंत्रण रेखा पर युद्ध-विराम के उल्लंघन और आतंकवादियों की पाकिस्तान से होने वाली घुसपैठ में जैसी तेज़ी मोदी-राज में दिखायी दी, वैसी पहले कभी नहीं रही। महबूबा सरकार गिराकर संघ-बीजेपी ने साबित किया कि सर्ज़िकल हमले का गुणगान करने की उसकी नीति निहायत भोथरी थी।

चार साल में 373 जवानों का शहीद होना और 239 नागरिकों का मारा जाना भी चीख़-चीख़कर मोदी-राज की नाकामी की दास्ताँ ही सुना रहा है। जम्मू-कश्मीर में सेना के बड़े ठिकानों ख़ासकर पठानकोट, उरी और नगरोटा जैसी वारदातों ने दिखा दिया कि रक्षा और गृह मंत्रालय तथा ख़ुफ़िया विभाग की क़मान अपने हाथों में रखने वाले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की रणनीतियों से राज्य के हालात दिन-ब-दिन बद से बदतर ही होते रहे। कश्मीर का अमन-चैन ही नहीं, वहाँ के लोगों के रोटी-रोज़गार की तबाही और युवाओं का बड़े पैमाने पर पत्थरबाज़ बनने के सिलसिले से जितनी मिट्टीपलीद मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की हुई, उससे कहीं ज़्यादा संघ-बीजेपी की पोल खुलती रही!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लाहौर जाना और ‘एक के बदले दस सिर लाने’ जैसे वीर रस से ओत-प्रोत भाषणों की कलई भी अब खुल चुकी है। महबूबा के साथ गलबहियाँ करने से पहले संघ-बीजेपी जिस तरह से जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने की बातें किया करता था, जैसे कश्मीरी पंडितों को बीजेपी के सत्तासीन होते ही घर-वापसी के सब्ज़बाग़ दिखाये गये थे, सैनिक ताक़त की बदौलत जैसे पाक अधिकृत कश्मीर को छीनने की बातें की जाती थीं, उसे कौन भूल सकता है। लेकिन ऐसी सभी बातों की हक़ीक़त अब सबके सामने है। जम्मू-कश्मीर में केन्द्र सरकार की ओर से दिनेश्वर शर्मा को वार्ताकर नियुक्त करके जैसी लीपापोती की गयी, उसकी गम्भीरता भी अब देश के सामने है।

मोदी-राज के दौरान जम्मू-कश्मीर के सन्दर्भ में पर्दे के सामने या उसके पीछे, जो कुछ भी हुआ, उसने राज्य और देश को भारी नुकसान पहुँचा है। 2015 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी में सत्ता की मलाई खाने की जो ललक पैदा हुई, उससे भी उसकी मुसलिम विरोधी छवि में कोई गिरावट नहीं आयी। बीजेपी के प्रति कश्मीर घाटी में हमेशा से नफ़रत का माहौल रहा है। क्योंकि कश्मीरीयत और साम्प्रदायिकता कभी साथ-साथ नहीं चल सकते। उधर, चौतरफ़ा नाक़ामी के बावजूद महबूबा के हिस्से में इतनी क़ामयाबी तो आयी ही कि वो अपने समर्थकों को बता सकें कि उन्होंने संघ-बीजेपी को 370 से दूर रहने के लिए मजबूर बनाये रखा।

तीन साल की सत्ता के बाद बीजेपी ने पहली बार ये क़बूल किया कि कश्मीर में हालात बहुत ख़राब हो चुके हैं। झूठ फैलाने की अपनी आदत के मुताबिक़, संघियों की ओर से अपनी नाक़ामी का ठीकरा महबूबा के सिर फोड़ने की रणनीति में कुछ भी अटपटा नहीं है। अब तो नये झूठ गढ़े जाएँगे कि ‘मोदी की नोटबन्दी की बदौलत आतंकवाद की क़मर टूट चुकी थी, लेकिन ऐसा होता देख महबूबा ने ही आतंकवादियों के पास रुपये भेजने शुरू कर दिये थे!’ संघी ये झूठ भी फैलाएँगे कि ‘महबूबा नहीं चाहती थीं कि सेना खुलकर आतंकवादियों की सफ़ाया करे, इसीलिए उनकी सरकारी गिरा दी गयी।’ 370 को लेकर भी नये झूठ सामने आएँगे।

कश्मीर और कश्मीरियत को समझने वाले हर शख़्स जानता है कि पीडीपी और बीजेपी का गठबन्धन शुरू से ही नापाक था। ये रिश्ता पहले दिन से ही ‘कुत्ते-बिल्ली की शादी’ की तरह बेमेल था। मुफ़्ती मोहम्मद सईद और संघ-बीजेपी ने 2015 में जिस लाचारी की वजह से इसे बनाया था, वो मुफ़्ती साहब के निधन के बाद से ही ज़िन्दा लाश बन चुकी थी। सियासी मजबूरियों की वजह से महबूबा इसे ढो रही थीं। उधर, येन-केन-प्रकारेण सत्ता हासिल करने की भूखी बीजेपी के लिए इससे सुनहरा मौक़ा शायद ही कभी आ पाता! क्योंकि संघ की ख़्वाहिश महज सत्ता नहीं, बल्कि इसके ज़रिये हिन्दू-राष्ट्र तक पहुँचना है।

महबूबा की सरकार को चलाते रहने से संघ-बीजेपी का हाल ‘माया मिली ना राम’ वाला हो चुका था। भगवा ख़ानदान को अब 2019 की चिन्ता सता रही है। उसे साफ़ दिख रहा है कि मोदी राज के ‘अच्छे दिन’, ‘विकास’, ‘तेज़ी से कड़े फ़ैसले लेने वाले’ जैसी हरेक बात या वादा सिर्फ़ जुमला ही साबित हुआ है। इसीलिए यदि चुनाव तक हिन्दुओं को डराकर उनका वोट बटोरने की नीति परवान नहीं चढ़ी तो मोदी सरकार को गिरने से कोई नहीं बचा सकता। भगवा ख़ानदान के पास अब अपनी इसी भूल को दोहराने के सिवाय कोई विकल्प नहीं बचा है। 2014 में भगवा-झूठ का खाद-पानी पाकर जो मोदी लहर लहलहाने लगी थी, वही अब साथ छोड़ती परछाई में बदलती जा रही है। मोदी नाम की ब्रॉन्डिंग और सरकार की झूठी उपलब्धियों का बख़ान अब जनता को और नहीं बरगला पा रहा।

बीजेपी को कश्मीर जीतने के लिए अभी कई चुनाव लड़ने होंगे। इसीलिए कश्मीर के चक्कर में वो देश की सत्ता के हाथ से निकल जाने के आसार को देखकर ख़ौफ़ज़दा है। अब राष्ट्रपति शासन लगाकर बीजेपी भले ही परोक्ष रूप से राज्य की सत्ता को पूरी तरह से अपनी मुट्ठी में कर ले, लेकिन कश्मीरियों का भरोसा वो कभी नहीं जीत पाएगी। अवाम के जज़्बातों से खिलवाड़ करने वाले बड़े-बड़े शूरमाओं की सरकारों के हाथ जल जाते हैं। तो नरेन्द्र मोदी किस खेत की मूली हैं! अभी तो महबूबा सरकार गिराकर संघ-बीजेपी ने भी अपने हाथ वैसे ही जलाये हैं, जैसे इस सरकार को बनाते वक़्त महबूबा ने अपने हाथ जलाये थे।

बहरहाल, एनडीए के बिखरने का मौसम दस्तक दे चुका है। चन्द्रबाबू नायडू (टीडीपी) ने बीजेपी का साथ छोड़ा। चन्द्रशेखर राव (टीआरएस) ने छोड़ा। शिव सेना (उद्धव ठाकरे) ने एकला चलो का राग छेड़ रखा है। महबूबा मुफ़्ती (पीडीपी) को तलाक़ मिल चुका है। सुदेश महतो (ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन यानी आजसू) विदाई की ओर बढ़ रहे हैं। नीतीश कुमार (जेडीयू) तो जन्मजात पलटू राम हैं ही। उपेन्द्र कुशवाहा (आरएलएसपी) वाज़िब मुद्दे उठाकर मोल-तोल कर रहे हैं। रामविलास पासवान (एलजेपी) दलितों को लेकर मुखर दिखने की कोशिश कर रहे हैं। बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता आये दिन अपनी पार्टी और मोदी-शाह के ख़िलाफ़ बयान दे रहते हैं।

सारा माहौल भक्तों को साफ़ सन्देश दे रहा है कि ‘इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या, आगे-आगे देखिये होता है क्या!’

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मप्र में नौकरशाहों को ईमानदारी की मिलती है सजा!

रस्तोगी ने विभाग की जब जिम्मेदारी संभाली तो ई-टेंडरिंग में संभावित गड़बड़ियों पर पड़ताल की। उन्हें जब इस बात पर पूरी तरह भरोसा हो गया कि गड़बड़ियां चल रही हैं तो कई अफसरों सहित मुख्यमंत्री कार्यालय तक को अवगत कराया। कई टेंडर निरस्त करने की बात कही, मगर उनकी बात सुनी जाती उससे पहले ही सरकार सकते में आ गई और रस्तोगी पर ही तलवार चला दी गई।

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Shivraj Singh Chauhan

भोपाल, 17 जून | कोई भी नौकरशाह जब शासकीय सेवा में प्रवेश करता है तो उसे संविधान के मुताबिक हर वर्ग, जाति-धर्म के लोगों के लिए समान रूप से काम करने और अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार रहने की सौगंध दिलाई जाती है, लेकिन मध्य प्रदेश ऐसा राज्य बन गया है जहां अपनी सौगंध को पूरा करने की कोशिश करने वाले अफसरों को इनाम नहीं बल्कि सजा जरूर मिल रही है।

नया उदाहरण भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी मनीष रस्तोगी हैं जिन्होंने ई-टेंडरिंग के घपले को उजागर क्या किया उन्हें जबरन छुट्टी पर भेजे जाने के साथ संबंधित विभाग से ही हटा दिया गया।

राज्य सरकार ने ईमानदारी का दावा करते हुए तमाम निर्माण विभाग के कार्यो के लिए ई-टेंडर सेवा की शुरुआत की थी। इस दावे की पोल भी खुल गई। पोल खोलने वाले विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग के प्रमुख सचिव मनीष रस्तोगी हैं जिन्होंने ई-टेंडरिंग में गड़बड़ी को उजागर किया तो पहले उन्हें जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया।

इतना ही नहीं, उनके छुट्टी पर जाते ही विज्ञान व प्रौद्योगिकी विभाग की जिम्मेदारी दूसरे अफसर को सौंप दी गई।

सूत्र बताते हैं कि रस्तोगी ने विभाग की जब जिम्मेदारी संभाली तो ई-टेंडरिंग में संभावित गड़बड़ियों पर पड़ताल की। उन्हें जब इस बात पर पूरी तरह भरोसा हो गया कि गड़बड़ियां चल रही हैं तो कई अफसरों सहित मुख्यमंत्री कार्यालय तक को अवगत कराया। कई टेंडर निरस्त करने की बात कही, मगर उनकी बात सुनी जाती उससे पहले ही सरकार सकते में आ गई और रस्तोगी पर ही तलवार चला दी गई।

बताते चलें कि मुरैना में भारतीय पुलिस सेवा के अफसर नरेंद्र कुमार को माफियाओं ने ट्रैक्टर से कुचलकर सिर्फ इसलिए मार दिया था क्योकि उन्होंने रेत माफियाओं के खिलाफ मुहिम छेड़ी थी। इसी तरह मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर से रेत खनन के खिलाफ कार्रवाई करने वाले एक अफसर और एक महिला खनिज अधिकारी को हटाया गया।

जनता के लिए शाजापुर में जिलाधिकारी रहते हुए आईएएस राजीव शर्मा ने काम किया तो उन्हें सचिवालय भेज दिया गया। प्रदेश में इसी तरह के कई मामले हैं जिनमें अफसर ने गड़बड़ी पकड़ी, जनता के लिए काम किया तो उसे इनाम नहीं, सजा मिली।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने ई-टेंडरिंग घोटाले के दोषियों को सामने लाने की मांग करते हुए कहा कि घोटाले के राज एक मोबाइल नंबर में छुपे हुए हैं।

नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि इस पूरे घोटाले के तार शीर्ष स्तर पर सरकार को संचालित करने वालों से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि अगर मुख्यमंत्री चौहान वाकई में इस घोटाले को उजागर कर दोषियों को दंडित करना चाहते हैं तो वे मोबाइल नंबर 9582112323 की जांच करवाएं। इस नंबर की कॉल डिटेल की ईमानदारी से जांच हुई तो कई बड़े खुलासे होंगे।

वहीं सरकार के जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा ई-टेंडरिंग में किसी भी तरह की गड़बड़ी की बात को नकारते हैं और कहते हैं कि “जो टेंडर हुआ ही नहीं, जिसमें एक पैसे का काम नहीं हुआ, एक पैसे का भुगतान नहीं हुआ, उसमें भ्रष्टाचार कैसे हो गया।”

वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता का अक्षय हुंका का कहना है कि राज्य में कुछ लोगों को ताकतवर बनाने का काम किया जा रहा है, जो भी व्यक्ति उनके ताकतवर बनने में बाधक बनता है, उसे हटा दिया जाता है। मनीष रस्तोगी के मामले में भी यही हुआ है, उन्होंने ई-टेंडरिंग की गड़बड़ी को पकड़ा और आशंका तो यहां तक है कि बीते समय में हुए 400 से 500 टेंडरों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है और रस्तोगी उन गड़बड़ियों तक पहुंच गए होंगे, लिहाजा सरकार को अपनी पोल खुलते दिखी तो उन्हें हटा दिया गया।

संभवता मध्य प्रदेश देश के उन विरले राज्यों में होगा, जहां घोटालेबाजों को संरक्षण देने वालों को नहीं, बल्कि घोटालेबाजी को उजागर करने वालों को सजा मिल रही है। सरकार के इस रवैए में बदलाव नहीं आया तो आगामी चुनाव में सरकार के खाते में क्या आएगा, इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता।

–आईएएनएस

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मोदी का रणनीतिक दृष्टिकोण : आकांक्षा और वास्तविकता में अंतर

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Narendra Modi

विश्व के हालात 2018 के मध्य में थोड़े असंमज से भरे दिख रहे हैं। जहां एक तरफ अमेरिका और चीन में ट्रेड-टैरिफ को लेकर टकराव की स्थिति है और अमेरिकी नेतृत्व वाली पश्चिमी दुनिया कनाडा में हालिया संपन्न जी-7 शिखर सम्मेलन के असमान व अप्रत्याशित परिणामों को लेकर काफी उथल-पुथल में है तो वहीं, सिंगापुर में 12 जून को डोनाल्ड ट्रंप और उत्तर कोरियाई नेता किम जोंग-उन के बीच ‘ऐतिहासिक’ बैठक से पूर्वी एशिया के सामरिक ढांचे के पूरी तरह से अप्रत्याशित पुनर्गठन की संभावना है।

इस पृष्ठभूमि के उलट भारत जिस तरह से प्रमुख शक्तियों से खुद को जोड़ रहा है और जो इसकी रणनीति है, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा एक जून को सिंगापुर में आयोजित शांगरी-ला वार्ता के दौरान बताया गया। लंदन स्थित थिंकटैंक द्वारा 2001 में शुरू किया गया यह वार्षिक अंतर-सरकारी सम्मेलन एशिया-प्रशांत राजनीतिक नेतृत्व और क्षेत्रीय सैन्य, राजनयिक, अकादमिक, विश्लेषक समुदाय को एक साथ लाता है।

मोदी का संबोधन व्यापक बहु-संस्कृतियों व भाषाओं वाले देशों के मूल्यों के प्रति भारतीय प्रतिबद्धता के ठोस धरातल के समर्थन के साथ था।

यह नेहरू के राजनीति में शुरुआती वर्षों की याद दिलाता है, जब अपेक्षाकृत कमजोर भारत ने मौजूदा शीत युद्ध से दूर रहने की मांग की और खुद को ‘गुटनिरपेक्ष’ राष्ट्र के रूप में पहचाने जाने का फैसला किया था। हकीकत यह थी कि 1970 के दशक में अमेरिका-चीन के मेल-मिलाप के बाद भारत यूएसएसआर के करीब गया और रूस के साथ इसका बहुत ही मजबूत सैन्य आपूर्तिकर्ता वाला संबंध स्थापित हुआ।

दिसंबर 1991 में हालांकि सोवियत संघ के पतन के बाद वैश्विक रणनीतिक ढांचे में काफी बदलाव आया और वर्ष 1992 में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव के नेतृत्व में भारत ने अपने आर्थिक उदारीकरण और अमेरिका के साथ अपने रंजिशजदा संबंधों को बेहतर बनाने की शुरुआत की, जिसे नरसिम्हा के उत्तराधिकारियों अटल बिहारी वाजपेयी, मनमोहन सिंह ने जारी रखा और यही विरासत अब मोदी को मिली है।

पिछले कुछ सालों में एक धारणा रही कि भारत घमंडी चीन द्वारा भड़काए तनाव के कारण अमेरिका के करीब आ गया था (यहां उस घटना को याद करना उचित लगता है कि भारत ने अक्टूबर 1962 में अमेरिका से मदद मागी थी और मई 1998 में समर्थन मांगा था) और भारत-रूस द्विपक्षीय संबंध भी प्रभावित हो गए थे।

मोदी ने अपने संबोधन में संकेत दिया कि भारत सभी प्रमुख शक्तियों जैसे अमेरिका, चीन, रूस और जापान के साथ एक मजबूत जुड़ाव चाहता है और आसियान गुट भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति के लिए महत्वपूर्ण है।

भारत-प्रशांत विस्तारित समुद्री क्षेत्र में नई दिल्ली की अपनी प्रासंगिकता है। अमेरिका द्वारा इसका समर्थन किया गया है, जिसने हवाई में अपने प्रशांत कमान का नाम बदलकर भारत-प्रशांत कमान रख दिया था।

जापान के साथ द्विपक्षीय संबंध को महान उद्देश्य वाली साझेदारी के रूप में वर्णित किया गया है, जो भारत की एक्ट ईस्ट नीति की आधारशिला है।

वहीं, दिल्ली-मॉस्को संबंधों पर बात की जाए तो मोदी ने एक बार कहा था, “यह हमारी रणनीतिक कुशलता का एक प्रमाण है कि रूस के साथ भारत की रणनीतिक साझेदारी विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त हो गई है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ (मई के अंत में) सोची में एक अनौपचारिक बैठक मौजूदा समय की चुनौतियों से निपटने के लिए एक मजबूत बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को विकसित करने की दिशा में दोनों देशों की आकांक्षा पर आधारित थी।”

चीन के साथ डोकलाम गतिरोध, बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) पर असहमति और आतंकवाद पर पाकिस्तान को समर्थन जैसे तनावों के बावजूद मोदी ने बहुत ही कारगर तरीका निकालते हुए कहा था, “चीन के साथ भारत के संबंधों में जितनी परतें हैं, उतनी और किसी देश के साथ संबंधों में नहीं हैं।”

वहीं, रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-ध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था के लिए भारत की प्राथमिकता ईमानदार और वांछनीय है, लेकिन इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि परमाणु हथियार की स्थिति के बावजूद दिल्ली एक असंगत शक्ति बना हुआ है। दो कठोर संकेतक इस विसंगति को दर्शाते हैं।

सबसे पहले मानव सुरक्षा के संबंध में बात करें, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का सर्वोच्च राजनीतिक उद्देश्य होता है। यहां भारत खुले में शौच मुक्त (ओडीएफ) के विश्वसनीय सूचकांक तक पहुंचने और अपने बच्चों को उपयुक्त शिक्षा प्रदान करने में असमर्थ है, जिनकी संख्या करोड़ों में है। जहां दिल्ली स्वयत्तता की बात करती है और मोदी मेक इन इंडिया का नारा लगाते हैं, वहीं स्थिति यह है कि भारत अभी भी आयात पर निर्भर है, जिसमें अधिकांश हिस्सा इसकी सैन्य आपूर्ति का है।

स्वदेशी रक्षा निर्माण पारिस्थितिकी तंत्र की वास्तव में कल्पना की गई है और यह असलियत से कोसों दूर है। चार बार रक्षा मंत्रियों का बदलाव शासन और राजनीतिक ²ढ़ संकल्प का एक कमजोर संकेत पेश करता है। अगर मोदी के दृष्टिकोण को वास्तव में सिद्ध किया जाना है तो भारत की लंगड़ाती आकांक्षाओं को प्रभावी ढंग से दुरुस्त किए जाने की आवश्यकता है।

–आईएएनएस

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