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200 साल पुरानी हार का बदला लेना चाहता है दलित उत्पीड़न का ताज़ा प्रसंग!

विजय की 200 वीं बरसी पर दलित समाज के क़रीब 3 लाख जय-स्तम्भ पर जुटने वाले थे। लेकिन 29 दिसम्बर से समारोह स्थल और उसके आसपास के गाँवों में संघियों ने भगवा ध्वजों के साथ उन्माद फैलाना शुरू कर दिया। इससे तनाव और हिंसा के हालात पैदा हो गये।

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Photo Credit : dnaindia

क़रीब सौ साल पहले जिस महाराष्ट्र की धरती पर ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना अंकुरित हुई, आज वहाँ हिन्दुओं को हिन्दुओं से लड़ाने की ख़ूनी जंग छिड़ गयी है! आमतौर पर जिस ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना में मुसलमानों को हिन्दुओं के सबसे बड़े दुश्मन की तरह पेश किया जाता है, वो महाराष्ट्र में नहीं है। अभी तो वहाँ सवर्ण हिन्दुओं और ख़ासकर चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उन्मादियों और उन महार दलितों से ठन गयी है जिन्होंने 200 साल पहले अपने उत्पीड़न का बदला लिया था! पेशवा काल के उस दौर में महार जाति के दलितों को कई अमानवीय नियमों का सामना करना पड़ता था। उन्हें सार्वजनिक जगहों पर गले में हाँडी लटकाकर चलना पड़ता था। ताकि यदि उन्हें थूकना हो तो वो अपने गले में लटकती हाँडी में ही थूकें। इसके अलावा, महार दलितों को सड़क पर चलते वक्त अपने पीछे एक झाडू बाँधकर भी चलना होता था ताकि वो जिस रास्ते से गुजरें वो साफ़ भी होता रहे।

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बाबासाहब भीमराव आम्बेडकर ने अपनी क़िताब ‘एनहिलेशन ऑफ़ कास्ट’ में ऐसी निर्मम प्रथाओं का ब्यौरा दिया है। आम्बेडकर ख़ुद भी अछूत महार जाति से ही थे। महार लोग ब्राह्मण पेशवाओं के अत्याचार से परेशान थे। आम्बेडकर की ही ‘राइटिंग एंड स्पीचेज’ के 12वें खंड के मुताबिक़, जब हिन्दुस्तान में अँग्रेज़ अपने सत्ता विस्तार की हसरत के तहत मराठाओं से भिड़ने वाले थे, तब उन्हें महारों की वीरता और उनके प्रति हो रही क्रूरता का पता चला। अँग्रेज़ों ने महारों की दुःखती रग पर हाथ रखा। उन्हें तमाम मानवीय अधिकारों को हासिल करने के लिए ब्रिटिश इंडियन आर्मी में शामिल होने का न्योता दिया। ब्राह्मण पेशवाओं की क्रूरता को ख़त्म करने के लिए महारों ने अँग्रेज़ों का साथ दिया।

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Bhima Koregaon memorial

फलस्वरूप, 1 जनवरी 1818 को पुणे में भीमा नदी के किनारे कोरेगाँव में पेशवा बाजीराव द्वितीय के 28 हज़ार सैनिकों का युद्ध अँग्रेज़ों के 500 सैनिकों की टुकड़ी से हुआ। अँग्रेज़ों की उस सेना में ज़्यादातर सैनिक महार थे। युद्ध में महारों की अतुल्य वीरता ने पेशवा के सैनिकों के छक्के छुड़ा दिये और वो मैदान छोड़कर भाग खड़े हुए। इससे मराठा साम्राज्य का पतन हो गया। अँग्रेज़ों की विजय हुई। युद्ध में 22 महार सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। तब अँग्रेज़ों ने महारों के प्रति आभार जताते हुए पुणे के परने गाँव में जय-स्तम्भ बनवा दिया। तभी से उस संग्राम को दलित विरोधी व्यवस्था के सफ़ाये के निर्णायक दौर के रूप में देखा जाता है। इसीलिए 200 साल से हज़ारों की तादाद में दलित समाज उस संग्राम की बरसी पर अपने पुरखों को श्रद्धांजलि देने के लिए जय-स्तम्भ पर जुटता है। और, 1 जनवरी को ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाता है।

भीमा-कोरेगाँव युद्ध की कहानी बहुत दिलचस्प और शिक्षाप्रद है। इसके ज़रिये क़द-काठी में मज़बूत महारों ने सदियों से क़ायम पेशवाओं के मनुवादी अत्याचार को ख़त्म करने के लिए कमर कसी तो अँग्रेज़ों ने साबित कर दिया कि सवर्ण हिन्दुओं का सामाजिक वर्चस्व कितना खोखला है! इसके बावजूद, ब्राह्मण पेशवाओं का आधुनिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, ये कहकर समारोह का विरोध करता रहा कि युद्ध में दलितों ने अँग्रेज़ों का साथ देकर शौर्य नहीं दिखाया बल्कि देश के साथ गद्दारी की। यहाँ ये ग़ौर करना बेहद ज़रूरी है कि उस दौर में भारत जैसी कोई राजनीतिक सत्ता नहीं थी। तब एक राजा के सैनिक दूसरे राजा के सैनिकों से राज्य विस्तार के लिए युद्ध करते थे। तब मातृभूमि की रक्षा जैसा कोई सिद्धान्त नहीं था। राजा सिर्फ़ राजा हुआ करता था। देसी या विदेशी नहीं।

लिहाज़ा, तब गद्दारी की वैसी परिभाषा थी ही नहीं, जैसी आज़ाद भारत में विकसित हुई। अलबत्ता, तब सिर्फ़ और सिर्फ़ शौर्य होता था। इसमें दलितों को मनुवादी ब्राह्मणों से ज़ोरदार शिकस्त मिली। क्योंकि तब तक मानवता के सामने मनुवादी जातिवाद, अन्यायकारी साबित हो चुका था। युद्ध में महार अपना आत्म-सम्मान पाने के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए उतरे थे, जबकि पेशवा के सैनिक अपनी स्वामी-भक्ति दिखाने के लिए लड़ रहे थे। पेशवा की विशाल सेना इसलिए भी हारी, क्योंकि वो कुछ पाने के लिए नहीं बल्कि यथास्थिति को क़ायम रखने के लिए लड़ रही थी। यही वजह से युद्ध में विजय पाने वाले महारों ने जय-स्तम्भ पर शौर्य दिवस मनाने की परम्परा शुरू की। 1937 में आम्बेडकर भी जय-स्तम्भ पर गये थे।

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इस बार विजय की 200 वीं बरसी पर दलित समाज के क़रीब 3 लाख जय-स्तम्भ पर जुटने वाले थे। लेकिन 29 दिसम्बर से समारोह स्थल और उसके आसपास के गाँवों में संघियों ने भगवा ध्वजों के साथ उन्माद फैलाना शुरू कर दिया। इससे तनाव और हिंसा के हालात पैदा हो गये। संघियों को राज्य सरकार का परोक्ष समर्थन हासिल था। इससे हालात और बिगड़ गये। हिंसा और आगजनी, गाँवों से शहरों और फिर पूरे महाराष्ट्र में फैल गयी। इसके बाद, समाज के हर पक्ष ने अपनी-अपनी सियासी रोटियाँ सेंकना शुरू कर दिया। और, देखते ही देखते भीमा-कोरेगाँव के दलितों की आवाज़ राष्ट्रव्यापी बन गयी। संसद में इसे लेकर ख़ूब शोर-शराबा हुआ।

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भीमा-कोरेगाँव के ताज़ा प्रसंग को भारत में हिन्दुत्ववादियों और मानवतावादियों के बीच वर्ग-संघर्ष की बड़ी शुरुआत के रूप में देखना ज़रूरी है। वैसे तो दलित उत्पीड़न की वारदातें आज़ादी के बाद भी हमेशा होती रही हैं, लेकिन मोदी राज में इसने नया कलेवर हासिल किया है। पहले रोहित वेमुला की हत्या और फिर गुजरात के उना में जिस तरह से मनुवादी संघियों ने दलितों को निशाना बनाया, जिस तरह से आरक्षण को ख़त्म करने की बातें हुई, उससे यदि हालात गृह-युद्ध की ओर बढ़ जाएँ तो ताज़्ज़ुब मत कीजिएगा। दरअसल, 2014 के बाद से चितपावन ब्राह्मणों के संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पताका न सिर्फ़ दिल्ली पर लहराने लगी, बल्कि देखते-देखते, महज पौने चार साल में ही, देश के 19 राज्यों में भगवा-सल्तनत क़ायम हो गयी। इसीलिए ऐसे समय में जब देश पूरी तेज़ी से भगवामय हो रहा हो, तब दलितों को अपनी उस जीत का उत्सव मनाने की रियायत कैसे दी जा सकती है, जिसमें ब्राह्मणों की पेशवाई वाला सत्ता की कहीं बड़ी सेना की हार हुई थी!

मौजूदा दौर में मनुवादी संघियों ने पहले जिस शिद्दत से मतान्ध हिन्दुओं के दिमाग़ में मुसलमानों को लेकर ज़हर भरा, वैसा ही काम अब दलितों को लेकर किया जा रहा है। यदि हिन्दुत्ववादियों का दलित और मुसलिम-विरोध जल्द ही औंधे मुँह नहीं गिरा तो वो दिन दूर नहीं जब हिन्दुस्तान का मौजूदा राजनीतिक मानचित्र फिर से इतिहास बन जाएगा! देश के टुकड़े हो जाएँगे! मुसलमानों को लेकर मूर्ख हिन्दुओं के दिल-ओ-दिमाग़ में जैसा झूठ बिठाया गया है, यदि ये मान भी लें कि वो सच है तो संघियों के इरादे के मुताबिक़, आगे क्या होना चाहिए? मत भूलिए कि संघियों की परिभाषाओं के मुताबिक़, मुसलमानों में जितने भी ऐब हैं, विकार हैं, ख़राबी हैं और गन्दगियाँ हैं वो क्या वो सभी हिन्दुओं में भी नहीं हैं?

हिन्दू, किन-किन अन्य धर्मावलम्बियों के मुक़ाबले कम भ्रष्ट, कम घूसख़ोर, कम बलात्कारी, कम हत्यारे, कम मक्कार, कम चोर या कम असभ्य हैं? 70 साल से तो हिन्दू ही पूरी प्रमुखता से हिन्दुस्तान को चला रहे हैं! सब कुछ तो हिन्दुओं की ही मुट्ठी में है। सम्पूर्ण सरकारी व्यवस्था में मुसलमान तो नाम मात्र के ही हैं। लेकिन क्या हिन्दू ईमानदारी से ये कह पाएँगे कि वो राष्ट्र को सर्वोपरि रखकर चलते हैं? क्या हिन्दू कोई दुराचार, कदाचार या अनैतिक करतूतें नहीं करते हैं? धर्म की असली शिक्षाओं को क्या हिन्दुओं ने अपने जीवन में उतार रखा है? यदि नहीं, तो क्या औरों में खोट ढूँढने से पहले हिन्दुओं को अपने गिरेबान में नहीं झाँकना चाहिए?

बहरहाल, संघी चिन्तन के मुताबिक़, यदि थोड़ी देर के लिए ये मान भी लें कि मुसलमान ही हमारी सारी समस्याओं की वजह हैं और यदि भारत, मुसलमानों से मुक्त हो जाए तो क्या तब जो भारत बचेगा उसमें चारों ओर अमन, भाईचारा, शान्ति और सद्भाव स्थापित हो जाएगा? क्या मुसलिम-रहित ‘हिन्दू राष्ट्र’ में अपराध, हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, दुराचार, ग़रीबी, ऊँच-नीच, छूआछूत, जातिवाद वग़ैरह ख़त्म हो जाएगा? क्या ‘हिन्दू राष्ट्र’ में भाई-भाई के बीच झगड़े नहीं होंगे? क्या ‘हिन्दू राष्ट्र’ की राजनीति में हिन्दू को हिन्दू से नहीं लड़वाया जाएगा? क्या तब हिन्दू ही एक-दूसरे के क़ातिल नहीं होंगे? बिल्कुल होंगे! अवश्य होंगे। क्योंकि वर्ग-संघर्ष को हमेशा इंसान का ख़ून पीने की ख़्वाहिश रही है। पहले, अगड़ों को पिछड़ों से लड़वाया जाएगा। फिर दलितों को सर्वणों से।

संघियों का सपना मनुस्मृति को ही संविधान बनाने का था। इसमें आरक्षण को ख़त्म करके विकृत हिन्दुत्व वाले छुआछूत, जातिगत शोषण, दमन-उत्पीड़न वाली वर्ण-व्यवस्था वग़ैरह की वापसी की जाएगी। ताकि चितपावन ब्राह्मणों की वही राजशाही लौटायी जा सके जो 1818 के भीमा-कोरेगाँव युद्ध से पहले मौजूद थी! जिस दिन मनुस्मृति की वापसी हो जाएगी, उस दिन संघियों को उनका परम लक्ष्य हासिल हो जाएगा। शायद, तब तक वक़्त का पहिया पूरा घूम चुका होगा!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनका निजी विचार है)

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कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

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कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

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Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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लोकतांत्रिक देश में पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड!

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इसमें कोई शक नहीं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, जिस पर गर्व भी है। सच्चाई भी है कि सरकार केंद्र या राज्य कहीं भी हो, पार्टियों के अंदर का लोकतंत्र दूर-दूर तक गायब है। विडंबना, कुटिलता या एकाधिकारवादी प्रवृत्ति, कुछ भी कहें, भारत में शुरू से ही राजनीतिक पार्टियां व्यक्ति के आसरे या प्रभाव से ही प्रभावित रही हैं।

फिलहाल ‘आप’ में भी इसी बात को लेकर घमासान मचा है, तो नया क्या है? रिवाज सरीखे तमाम पार्टियां ‘आम’ आदमी से ‘खास’ बन जाती हैं। गर्व कीजिए कि सरकारें तो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई होती हैं! ऐसे में ‘आप’ पर ही तोहमत क्यों?

दरअसल, राजनीति शह-मात का खेल है। नकेल जिसके हाथ है, पार्टी उसके नाम है। पुराने दौर से अब तक कमोवेश यही सिलसिला जारी है। ऐसी विविधता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, यानी भारत में ही दिखती है। खुश होइए कि लोकतंत्र जिंदाबाद है।

अहम यह कि पार्टियों के भीतर लोकतंत्र रहा ही कब? गांधीजी ने कांग्रेस के लिए देशभर में सदस्य बनाए। जिले तक को तवज्जो दी। सम्मेलनों में अध्यक्ष चुनने की शुरुआत हुई। लेकिन तब भी गांधीजी की पसंद खास होती थी। वर्ष 1937 को देखिए, पहला चर्चित चुनाव हुआ, तब सरदार पटेल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे, लेकिन उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से केंद्रीकृत रहा। कुछ लोकतंत्र बचा रहा, जिसे बाद में इंदिराजी ने खत्म कर दिया। अब अमूमन सारी पार्टियां यही व्यवहार कर रही हैं। एक-एक सीट आलाकमान से तय होती है।

प्रदेश, जिला, नगर, यहां तक कि वार्ड की अहमियत नकारा है। सुप्रीमो पद्धति जन्मी और पार्टियां एक तरह से प्राइवेट लिमिटेड बनती चली गईं। राजनैतिक अनुभव या समाजसेवा से इतर फिल्मी स्टारों ने भी बहती गंगा में गोते लगाए। दर्जनों स्टार देखते-देखते बड़े नेता बन गए, वहीं कई मुख्यमंत्री तक हुए। भला रिटायर्ड या इस्तीफा दिए नौकरशाह या सैन्य अधिकारी क्यों पीछे रहते? भारत की राजनीति सरकारी पदों की अहमियत को भुनाने का मौका जो देती है।

अभी तो आम आदमी पार्टी की बात है, धारा का रुख देख भ्रष्टाचार विरोधी गोते लगाए गए। समाज-सेवक से लेकर नौकरशाह, कवि से लेकर पत्रकार, सभी ने बहती बयार को समझा और एक आंदोलन उपजाया। भारतीय इतिहास में जितनी तेजी से इस पार्टी ने झंडा गाड़ा, यकीनन जात-पात, अगड़े-पिछड़े और फिल्मी लोकप्रियता के नाम की राजनीति भी पीछे हो गई।

आम आदमी की पार्टी कहां से चली और धीरे-धीरे कहां पहुंच गई, सबको दिख रहा है। जब बारी लोकतंत्र में आहूति देने की आई, तो उच्च सदन के खास यजमान एकाएक अवतरित हुए! कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र में मतदाता केवल एक वोट बनकर रह गया है, जिसकी अहमियत चंद सेकेंड में बटन दबाने से ज्यादा कुछ नहीं। बाद में उसकी क्या पूछ परख है, खुली किताब है।

दूसरी पार्टियां ‘आप’ के घमासान पर विलाप करें या प्रलाप, लेकिन जब बात उनकी होती है तो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं अघाते। पार्टी कुछ नहीं होती, होते हैं उनको चलाने वाले ही बलशाली और महारथी।

अब मोदी-शाह के कमल की बहार हो, राहुल की कांग्रेस का हाथ हो, केजरीवाल के आप की झाड़ू, अखिलेश-मुलायम की साइकिल, मायावती का हाथी, ममता के दो फूल, लालू का लालटेन, उद्धव का तीर कमान, राज ठाकरे का रेल इंजन, अभिनेत्री जयललिता के बाद पनीर सेल्वम-पलनीस्वामी की दो पत्तियां, करुणानिधि का उगता सूरज, शरद पवार की घड़ी, बीजू जनता दल का शंख, कभी जॉर्ज फर्नांडीज तो अब नीतीश के जद (यू) का तीर, अभिनेता एनटी रामाराव के बाद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी की साइिकल। हाल-फिलहाल रजनीकांत की दहाड़। इनके अलावा देश में न जाने कितने क्षत्रप और उनकी पार्टियां हैं, सच्चाई सबको पता है।

दलों का दलदल हो या हमाम, बस नजर का पर्दा ही है, जिसमें सब कुछ दिखकर भी कुछ नहीं दिखता। यही भारतीय लोकतंत्र है। अब इसे खूबी कहें या दाग, पार्टी तो चलाते हैं केवल सरताज। ऐसे में आम आदमी की क्या हैसियत? जो अंदर है, वह बाहर दिखता जरूर है। अब इस पर चीत्कार करें या आर्तनाद, कोई फर्क नहीं पड़ता।

कहने को कुछ भी कह लें, लेकिन हकीकत यही है कि कम से कम भारतीय राजनीति की यही सुंदरता है, उसका कलेवर हाड़-मांस का तो नहीं, कांच का भी नहीं, लेकिन फिर भी इतना कुछ पारदर्शी है कि सब कुछ दिखता है। इसे मत-मतांतर का फेर, सपनों की सौदागीरी, शब्दों की बाजीगरी कुछ भी कह लें।

लेकिन जानते, देखते और समझते हुए भी दलदल में हर बार हमारा वोट गोता खाकर रह जाता है और हम कहते हैं कि ‘अबकी बार हमारी सरकार।’ इतना कहना ही क्या कम है? तो आइए, एक बार फिर से कहें ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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