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ग़रीब सवर्णों को आरक्षण: अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत

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Narendra Modi on MSP
Indian Prime Minister Narendra Modi


नरेन्द्र मोदी कैबिनेट का ताज़ा फ़ैसला है कि देश में आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों को भी 10 फ़ीसदी आरक्षण दिया जाएगा। लेकिन अफ़सोस कि सरकार पूरी ताक़त लगाकर भी इस चुनावी शिग़ूफ़े का फ़ायदा नहीं उठा पाएगी! इसकी सबसे बड़ी वजह हमारा संविधान है जो आर्थिक आधार पर नहीं बल्कि ‘सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन’ के आधार पर आरक्षण देने की बात करता है। लिहाज़ा, मोदी सरकार को सबसे पहले संविधान संशोधन करना होगा। इसके लिए सियासी जमात के बीच वैसी ही आम राय बनानी होगी, जैसा कि महिला आरक्षण विधेयक के लिए अपेक्षित रहा है। इससे भी बड़ी बाधा ये है कि सरकार के पास संविधान संशोधन को परवान चढ़ाने के लिए पर्याप्त वक़्त नहीं है। वैसे सरकार की इस मंशा को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती झेलना पड़ सकता है।

आरक्षण को लेकर होने वाली बहस भी उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना कि आरक्षण ख़ुद है। संविधान के अनुच्छेद 16, 115, 335, 338, 340, 341 और 342 का नाता आरक्षण की पूरी नीति और व्यवस्था से जुड़ा है। इन्हीं के मुताबिक़, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग आरक्षण के हक़दार बनते हैं। एन नागराज, अशोक कुमार ठाकुर और इन्दिरा साहनी केस के फ़ैसलों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन’ के आधार पर आरक्षण की नीति को संवैधानिक माना है। संविधान में जिस ‘पिछड़ेपन’ का ज़िक्र है उसे तय करने के लिए जातियाँ आधार बनीं और हमेशा यही आधार क़ायम रहा।

आरक्षण के लिए न तो कभी आर्थिक आधार को स्वीकृति मिली और ना ही धार्मिक आधार को। इसीलिए तमाम आन्दोलनों के बावजूद सवर्ण हिन्दुओं के अलाला मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को आरक्षण का हक़दार नहीं माना गया। अलबत्ता, इन्दिरा साहनी केस के फ़ैसले के ज़रिये आरक्षण की अधिकतम सीमा को 50 फ़ीसदी तय किया गया और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रीमी-लेयर को धारणाओं को जोड़ा गया। इसके बावजूद तमिलनाडू और कुछेक उत्तर पूर्वी राज्यों ने आरक्षण की सीमा को 70 से 85 फ़ीसदी तक पहुँचा दिया और न्यायपालिका ने इसे नज़रअन्दाज़ किया।

अब ये किससे छिपा है कि आम चुनाव की दस्तक और अपनी गिरती लोकप्रियता को देखते हुए ही मोदी सरकार ने सवर्णों को पटाने के लिए उन्हें शिक्षा और नौकरी में 10 फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला लिया है। कैबिनेट के फ़ैसले के बाद अब मोदी सरकार ने 8 जनवरी को प्रस्तावित विधेयक को राज्यसभा में पेश करने की रणनीति बनायी है। इसी वजह से संसद के मौजूदा सत्र की मियाद को एक दिन बढ़ाकर 9 जनवरी तक किया गया है। लेकिन आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था बदलने के लिए संविधान में संशोधन करना ज़रूरी होगा। इसे मोदी सरकार अपने मौजूदा कार्यकाल में नहीं कर पाएगी। लेकिन वो इसी बात को लेकर चुनाव में सवर्णों को रिझाने की कोशिश करेगी कि यदि वो फिर से सत्ता में आयी तो वादा निभाएगी। यही उसका तुरुप का पत्ता है। लग गया तो दाँव, वर्ना तुक्का!

दूसरी ओर, सरकार से जुड़े लोगों को कहना है कि आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों को आरक्षण देने के लिए 50 फ़ीसदी वाले मौजूदा कोटे में कोई परिवर्तन नहीं होगा। बल्कि अनारक्षित 50 सीटों में से 10 फ़ीसदी ग़रीब सवर्णों के लिए रखा जाएगा। निश्चित रूप से ये व्याख्या ‘कान को सीधे नहीं, बल्कि हाथ घुमाकर पकड़ने’ वाली है। क्योंकि ऐसा होने पर आरक्षण का दायरा 50 से बढ़कर 60 फ़ीसदी हो जाएगा और इन्दिरा साहनी केस के फ़ैसले को अनुसार, सुप्रीम कोर्ट को उसे असंवैधानिक भी ठहराना ही पड़ेगा। लेकिन ये तभी होगा जब संविधान संशोधित हो जाएगा। उससे पहले ‘कॉज़ ऑफ़ एक्शन’ यानी ‘फ़रियाद की वजह’ वाली क़ानूनी शर्त पूरी नहीं होगी। इस शर्त के बग़ैर सुप्रीम कोर्ट किसी अर्ज़ी पर विचार नहीं करना चाहेगी। क्योंकि ऐसा करना विधायिका के क्षेत्राधिकार में न्यायपालिका का दख़ल होगा।

सरकार के पास बहुमत लोकसभा में है। लेकिन वो प्रस्तावित विधेयक को राज्यसभा में पेश करेगी। तभी इसे चुनाव में भुनाया जा सकता है। क्योंकि राज्यसभा, स्थायी सदन है। इसमें पेश विधेयक कभी मरता नहीं। जबकि लोकसभा के भंग होते ही वहाँ लम्बित विधेयक मर जाते हैं। नयी लोकसभा को उन्हें पुनर्जीवित करना पड़ता है। वैसे तो मोदी सरकार के पास अभी संसद के आख़िरी बजट सत्र का मौक़ा बचा हुआ है, लेकिन आम चुनाव की वजह से ये सत्र बेहद छोटा होगा। इसमें सरकार पर अनिवार्य संवैधानिक कामकाज निपटाने का भारी दबाव होगा। मसलन, बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण, बजट भाषण, धन्यवाद प्रस्ताव और अनुदान माँगों (आंशिक बजट) को पारित करने के बाद मोदी सरकार के पास वक़्त बच ही नहीं सकता कि वो ग़रीब सवर्णों को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने वाला या तीन तलाक़ को आपराधिक बर्ताव क़रार देने वाले क़ानून बना सके।

अनुमान है कि बजट सत्र 29 जनवरी से शुरु होगा और इसका पहला भाग 8 फरवरी 2019 तक चलेगा। इसका दूसरा हिस्सा भी 8 मार्च 2019 से आगे शायद ही जाए, क्योंकि तब तक चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो सकती है। 2014 में चुनाव आयोग ने 5 मार्च को चुनाव कार्यक्रम का ऐलान किया था। उसी दिन से आदर्श चुनाव संहिता प्रभावी हो गयी थी। लिहाज़ा, ये माना जा सकता है कि 2019 का बजट सत्र का पहला हिस्सा 5 मार्च के आसपास ही समाप्त हो जाएगा। इसका दूसरा हिस्सा नयी सरकार के हवाले होगा। 2014 में 7 अप्रैल से लेकर 12 मई तक मतदान हुआ था। नरेन्द्र मोदी, 26 मई को प्रधानमंत्री बने थे। हालाँकि, 16वीं लोकसभा का गठन 4 जून को हुआ था। इस तरह से चुनाव आयोग के पास सारी चुनाव प्रक्रिया को पूरा करने और राष्ट्रपति के पास नयी लोकसभा के गठन की अधिसूचना जारी करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा 3 जून तक का वक़्त होगा।

अब सवाल ये उठ सकता है कि क्या सरकार को इन सीमाओं या चुनौतियों का अहसास नहीं है? जबाब है, बिल्कुल है। अगला सवाल ये होगा कि ‘तो फिर सरकार अपने चला-चली की बेला में ऐसा रास्ता क्यों चुन रही है, जिससे सवर्णों को रिझाया जा सके?’ इस प्रश्न का उत्तर पूरी तरह से सियासी है। सैद्धान्तिक रूप से संसद को संविधान में संशोधन का अटूट अधिकार है। लेकिन क्या संवैधानिक है और क्या नहीं? ये तय करना सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्राधिकार है। दरअसल, एससी-एसटी एक्ट को पहले की तरह फिर से बहाल किये जाने के बाद से सवर्णों में बीजेपी के प्रति गहरी नाराज़गी पैदा हो गयी है। बीजेपी को लगता है कि अब सवर्णों को आरक्षण दिये बग़ैर वो अपने वोट-बैंक को बिखरने से नहीं रोक सकती।

दशकों से संघ परिवार के लोग सवर्णों को रिझाने के लिए आरक्षण की आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने समय-समय पर आरक्षण की समीक्षा की दलीलें भी दी हैं तो ये भी कहा है कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था कभी ख़त्म नहीं की जाएगी। या, आरक्षण ‘उनके’ जीते-जी ख़त्म नहीं हो सकता। अब ताज़ा विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी को लेकर सवर्ण हिन्दुओं में ये धारणा फैलने लगी कि मोदी सरकार के जाने का वक़्त आ गया और इसने न तो राम मन्दिर को लेकर अपना वादा निभाया और ना ही आरक्षण को लेकर। सवर्णों के ऐसे आक्रोश को देखते हुए ही बीजेपी के पैरों तले ज़मीन खिसकने लगी है। पार्टी को इसका भरपूर आभास भी हो रहा है। इसीलिए ‘ग़रीब सवर्णों को आरक्षण’ के ज़रिये मोदी सरकार ने तुरुप का पत्ता फेंका है! सरकार ने अब भागते भूत की लंगोटी के रूप में सवर्ण आरक्षण के लॉलीपॉप को आज़माने की जुगत निकाली है। हालाँकि, काश! बीजेपी ये समझ पाती है कि ‘अब पछताए होता का जब चिड़िया चुग गयी खेत’। क्योंकि बक़ौल पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवन्त सिन्हा, ‘सवर्ण आरक्षण, मोदी सरकार का एक और जुमला’ है।

ओपिनियन

बसपा-सपा गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं : शीला दीक्षित

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sheila dikshit-min

वरिष्ठ कांग्रेस नेता और दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का कहना है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) गठबंधन से स्थायित्व के संकेत नहीं मिल रहे हैं, लेकिन आगामी लोकसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस के परिणाम चौंकाने वाले होंगे।

शीला दीक्षित ने आईएएनएस को दिए साक्षात्कार में कहा, “उनको एक साथ आने दीजिए। वे मिलते और जुदा होते रहे हैं और फिर साथ आ रहे हैं। मेरा अभिप्राय यह है कि उनमें स्थिरता नहीं है और वे स्थायित्व के संकेत नहीं दे रहे हैं। अब आगे देखते हैं।”

तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रह चुकीं दीक्षित (80) सपा और बसपा गठबंधन को लेकर पूछे गए एक सवाल का जवाब दे रही थीं। सपा और बसपा ने कांग्रेस को महागठबंधन से अलग रखते हुए प्रदेश में 80 सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए एक गठबंधन किया है। दीक्षित को 10 जनवरी को दिल्ली कांग्रेस की कमान सौंपी गई।

उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होने से पहले शीला दीक्षित को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था। दीक्षित ने कहा कि उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीद क्षीण पड़ गई है।

दीक्षित की टिप्पणी से इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस नेता चुनाव अभियान के दौरान सपा और बसपा को निशाना बनाएंगे, जबकि उनका सीधा मुकाबला सत्ताधारी पार्टी भाजपा से होगा।

कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश के सभी 80 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है, लेकिन पार्टी ने भाजपा को शिकस्त देने वाले सेक्यूलर दलों के लिए दरवाजा खुला रखा है।

उत्तर प्रदेश में पार्टी नेता उम्मीदवारों को बता सकते हैं कि कांग्रेस ही नरेंद्र मोदी सरकार को सत्ता से बाहर कर सकती है और भाजपा को शिकस्त दे सकती है।

कांग्रेस इस बात पर बल देंगे कि इस चुनाव के नतीजों से प्रदेश का मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि देश का प्रधानमंत्री चुना जाएगा।

लोकसभा चुनाव 2014 में कांग्रेस उत्तर प्रदेश में सिर्फ दो ही सीटें बचा पाई थीं, जबकि उससे पहले 2009 में पार्टी ने 21 सीटों पर जीत हासिल की थी, जब केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) दूसरी बार केंद्र की सत्ता को बरकार रख पाई थी।

दीक्षित ने कहा कि उनसे कहा जाएगा तो वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए चुनाव प्रचार करेंगी, लेकिन वह दिल्ली पर अपना अधिक ध्यान केंद्रित करेंगी क्योंकि उनको यहां काफी काम करना है।

उन्होंने पार्टी के अध्यक्ष राहुल गांधी को कांग्रेस द्वारा प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने का अनुमोदन किया।

उन्होंने कहा, “पार्टी को इस पर फैसला लेने दीजिए। हम चाहते हैं और खासतौर से मैं चाहती हूंं और हमारे बीच अधिकांश लोग चाहते हैं। लेकिन इस पर पूरी पार्टी द्वारा फैसला लिया जाएगा।”

गैर-भाजपा दलों में प्रधानमंत्री का पद विवादास्पद मसला है। राहुल गांधी ने खुद भी कहा कि इसका फैसला चुनाव के बाद लिया जाएगा और पहला काम नरेंद्र मोदी सरकार को पराजित करना है।

संपूर्ण भारत में महागठबंधन की संभावना पर पूछे जाने पर दीक्षित ने कहा कि लोग इस दिशा में प्रयासरत हैं, लेकिन इस पर अभी पूरी सहमति नहीं बन पाई है।

विपक्षी दलों ने इस बात के संकेत दिए हैं कि लोकसभा चुनाव से पहले देशभर में गठबंधन की संभावना कम है, लेकिन भाजपा को शिकस्त देने के लिए राज्य विशेष में गठबंधन होगा।

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ओपिनियन

मोदी राज में लुप्त हुआ संसदीय संवाद

संसद में सार्थक चर्चा नहीं हो रही। प्रक्रिया और परम्परा दम तोड़ चुकी है। नौकरशाही भी दमघोटू हाल में है। लोकतंत्र की लौ फड़फड़ा रही है।

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Parliament of India
Indian Parliament Picture

देश पर विश्वास के संकट छाया है। संसद रूपी लोकतांत्रिक संस्था का तेज़ी से पतन हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होने वाला सार्थक संवाद नदारद है। विपक्ष का गला घोंटकर सियासी लाभ उठाने के क़ानून बनाये जा रहे हैं। विधेयकों को उन संसदीय समितियों की समीक्षा से बचाया जा रहा है, जो प्रस्तावित क़ानून को कारगर बनाने के लिए सभी पक्षों की राय को समायोजन करती हैं। झूठी वाहवाही बटोरने के लिए मंत्रीगण ग़लत आँकड़ों को परोसते हैं, क्योंकि उन्हें विशेषाधिकार हनन की परवाह नहीं है। अभी जो मंत्री संसद में गतिरोध से आहत होने की दलीलें देते हैं, वहीं जब विपक्ष में थे तो उनकी दलील होती थी कि गतिरोध भी संसदीय रणनीति का हिस्सा है। सरकार हमारे विरोध को भले ही ढोंग बताये, हमें श्रेय नहीं दे, लेकिन हम वही कर रहे हैं, जो हमारा दायित्व है। सरकार के ऐसे रवैये की वजह से ही संसद पर जनता का भरोसा न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है।

वो दिन लद गये जब जजों के पास मुक़दमों के लिए इत्मिनान भरा वक़्त होता था। मुक़दमों का अम्बार है। न्यायतंत्र चरमरा चुका है। लेकिन कसूर जजों का नहीं है। न्यायालयों की गरिमा तार-तार हो चुकी है। अदालतों को बाहरी दख़ल से सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन पूर्व प्रधान न्यायाधीश जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर ही ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ के अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगा। लेकिन कोई सच्चाई की तह तक नहीं जाना चाहता। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार उसके चार वरिष्ठतम जजों को अपने अन्तःकरण की आवाज़ का ख़ुलासा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे में है। अदालतों के बाहर घड़ल्ले से ऐसी हरक़तें हो रही हैं, जिससे न्यायिक फ़ैसलों को प्रभावित किया जा सके। न्यायिक फ़ैसलों में समानता वाली परम्परा को अनोखे तर्कों के सहारे ध्वस्त किया जा रहा है।

अदालतें बेहद उदारता से सील-बन्द लिफ़ाफ़ों में मिली सरकारी दलीलें स्वीकार कर रही हैं, ताकि दूसरे पक्ष उसे चुनौती भी नहीं दे सकें। ऐसी बोझिल प्रक्रिया से न्यायिक आदेश का प्रभावित होना लाज़िमी है। घपलों-घोटालों से जुड़े काग़ज़ातों पर कोर्ट ग़ौर तक नहीं कर रही। जज लोया मामले की कार्यवाही, राफ़ेल सौदे में जाँच को नकारना और सीबीआई निदेशक के तबादले से जुड़े प्रसंगों से साफ़ है कि देश को झकझोरने वाले मुद्दों के प्रति न्याय-तंत्र का रवैया भी सवालों के घेरे में है। दुहाई तो क़ानून की दी जाती है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मोर्चे पर सारे वादे पीछे छूट जाते हैं। अलग-अलग बेंच में संवैधानिक पीठ के जजों के फ़ैसले भी बदल जाते हैं। इसीलिए जनता के बढ़ते मोहभंग के प्रति न्यायपालिका को ख़ासतौर पर सचेत रहने की ज़रूरत है।

संसद में हासिल पूर्ण बहुमत का सही इस्तेमाल जटिल जनसमस्याओं को लोकतांत्रिक ढंग से निपटाने के लिए होना चाहिए। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सबको साथ लेकर चलने की भावना से काम किया जाए। सरकार को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का ज़रिया बनना चाहिए, लेकिन वो मतभेद के स्वरों को दबाने में जुटी हुई है। इन सन्दर्भों में देखें तो हमारी संस्थाओं पर भारी संकट गहराया हुआ है, कुछेक तो बन्धक बन चुकी हैं। कई संस्थाएँ तो सिर्फ़ आपने आकाओं की जी-हुज़ूरी कर रही हैं। सीबीआई, ईडी, एनआईए और सीबीडीटी यानी केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़ा ताज़ा घटनाक्रम इन्हीं बातों का साबित करता है। ये संस्थाएँ आज क़ानून को सर्वोपरि बनाये रखने के लिए काम नहीं कर रहीं, बल्कि वो अक्सर इसे तबाह करती नज़र आती हैं। इसीलिए संस्थाओं में कलह बढ़ रहा है। वो शर्मसार हो रही हैं। जो पतन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे निकाल बाहर किया जा रहा है। जिनका काम क़ानून को सर्वोपरि बनाना है, वो बौने साबित हो रहे हैं। यदि जाँच एजेंसियाँ दाग़दार होंगी तो अदालती फ़ैसले भी वैसे ही होंगे। पक्षपात और दुर्भावनापूर्ण जाँच से अन्याय और आक्रोश पैदा होता है। तब जनता सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर होती है।

नौकरशाही का दम घुट रहा है। निष्कलंक निष्ठा वाले अफ़सरों का सताया जा रहा है। क्योंकि उनके पुराने बॉस मौजूदा सत्ता की आँखों में खटक रहे हैं। इसने कार्यपालिका में उदासी भरी थकान भर दी है। चहेते अफ़सर अपने आकाओं के इशारों पर नाच रहे हैं। बाक़ी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। प्रशासन इसी का नतीज़ा भुगत रहा है, योजनाओं में देरी हो रही है और आर्थिक विकास सुस्त पड़ा हुआ है। विकास दर में शिथिलता की वजह से स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे उन दो बुनियादी क्षेत्रों के लिए संसाधन नहीं जुटा पा रही, जो सामाजिक बदलाव के सबसे अहम तत्व हैं। हमने देखा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अफ़सरों का गुस्सा कैसे मासूम लोगों पर फूट रहा है! ऐसे वातावरण की वजह से अफ़सरों का सारा ज़ोर सत्ता के प्रति वफ़ादार रहने का बन जाता है, जबकि उनसे भय और पक्षपात से मुक्त रहकर काम करना चाहिए।

संचार क्रान्ति ने नये तरह के दमन को बढ़ाया है। झूठ और अफ़वाह के ज़रिये लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरा जा रहा है। ख़ासकर, इलेक्ट्रानिक मीडिया और काफ़ी हद्द तक प्रिंट मीडिया भी उन उद्योगों की मुट्ठी में है, जो अर्थव्यवस्था में भारी दबदबा रखते हैं। बड़े-बड़े मीडिया मालिक, सरकार की मदद से अपने कॉरपोरेट को चमकाने के लिए पत्रकारीय उसूलों से समझौता कर रहे हैं। मीडिया के ऐसे समझौते से लोकतंत्र का पतन निश्चित है।

चौतरफ़ा संकट वाले मौजूदा माहौल में उम्मीद की किरण सिर्फ़ यही है कि 2019 में भारत की जनता इसे पहचाने और इससे लोहा ले। सिर्फ़ जनता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। वो चुनौतियों से कैसे निपटेगी, ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन यदि वो नहीं चेती तो लोकतंत्र की फड़फड़ाती लौ को असहिष्णुता की तेज़ हवाएँ बुझा देंगी।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

(साभार:इंडियन एक्सप्रेस)

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तसलीमा नसरीन ने ‘बेशरम’ के हिंदी संस्करण का विमोचन किया

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taslima nasreen

नई दिल्ली, 12 जनवरी | बांग्लादेशी लेखिका और महिला अधिकार कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन ने शनिवार को यहां नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में विवादास्पद ‘लज्जा’ उपन्यास की उत्तर कथा ‘बेशरम’ का विमोचन किया। उपन्यास ‘बेशरम’ का लोकार्पण राजकमल प्रकाशन के स्टाल जलसाघर में हुआ। इस मौके पर लेखिका अल्पना मिश्रा, हिमांशु बाजपेयी एवं राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी मौजूद थे।

इस उपन्यास का बांग्ला भाषा से हिंदी में अनुवाद उत्पल बैनर्जी द्वारा किया गया है।

उपन्यास ‘लज्जा’ में हिन्दुओं को बांग्लादेश से कैसे सांप्रदायिक दंगों के कारण देश छोड़ना पड़ा, इसकी कहानी थी। वहीं ‘बेशरम’ उपन्यास के पात्र सुरंजन और माया, जो बांग्लादेश छोड़ने के बाद हिंदुस्तान आए और उन लोगों ने कैसे पराये देश में अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष किया, उनकी कहानी है।

नसरीन ने कहा, “यह कोई राजनीतिक कहानी नहीं बल्कि एक सामाजिक कहानी है, जो उनकी जिंदगी, परिवार और संबंधों के बारे में है। मैं खुद को इस उपन्यास में देखती हूं क्योंकि किताब को लिखते वक्त मैं कोलकाता में रह रही थी।”

निर्वासन के बारे में अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए तसलीमा ने माना कि जो लोग उस समय बांग्लादेश छोड़ कर भारत आए थे अगर वे चाहें तो वापस अपने देश जा सकते हैं लेकिन उनके पास वह मौका नहीं है।

उन्होंने कहा, ” ‘लज्जा’ लिखने के बाद मुझे बांग्लादेशी सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। यहां आने वाले लोगों की तुलना में मेरी पीड़ा में अंतर है।”

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