ग़रीब सवर्णों को आरक्षण: अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत | WeForNewsHindi | Latest, News Update, -Top Story
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नरेन्द्र मोदी कैबिनेट का ताज़ा फ़ैसला है कि देश में आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों को भी 10 फ़ीसदी आरक्षण दिया जाएगा। लेकिन अफ़सोस कि सरकार पूरी ताक़त लगाकर भी इस चुनावी शिग़ूफ़े का फ़ायदा नहीं उठा पाएगी! इसकी सबसे बड़ी वजह हमारा संविधान है जो आर्थिक आधार पर नहीं बल्कि ‘सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन’ के आधार पर आरक्षण देने की बात करता है। लिहाज़ा, मोदी सरकार को सबसे पहले संविधान संशोधन करना होगा। इसके लिए सियासी जमात के बीच वैसी ही आम राय बनानी होगी, जैसा कि महिला आरक्षण विधेयक के लिए अपेक्षित रहा है। इससे भी बड़ी बाधा ये है कि सरकार के पास संविधान संशोधन को परवान चढ़ाने के लिए पर्याप्त वक़्त नहीं है। वैसे सरकार की इस मंशा को सुप्रीम कोर्ट में भी चुनौती झेलना पड़ सकता है।

आरक्षण को लेकर होने वाली बहस भी उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना कि आरक्षण ख़ुद है। संविधान के अनुच्छेद 16, 115, 335, 338, 340, 341 और 342 का नाता आरक्षण की पूरी नीति और व्यवस्था से जुड़ा है। इन्हीं के मुताबिक़, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग आरक्षण के हक़दार बनते हैं। एन नागराज, अशोक कुमार ठाकुर और इन्दिरा साहनी केस के फ़ैसलों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने ‘सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन’ के आधार पर आरक्षण की नीति को संवैधानिक माना है। संविधान में जिस ‘पिछड़ेपन’ का ज़िक्र है उसे तय करने के लिए जातियाँ आधार बनीं और हमेशा यही आधार क़ायम रहा।

आरक्षण के लिए न तो कभी आर्थिक आधार को स्वीकृति मिली और ना ही धार्मिक आधार को। इसीलिए तमाम आन्दोलनों के बावजूद सवर्ण हिन्दुओं के अलाला मुसलमानों तथा अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को आरक्षण का हक़दार नहीं माना गया। अलबत्ता, इन्दिरा साहनी केस के फ़ैसले के ज़रिये आरक्षण की अधिकतम सीमा को 50 फ़ीसदी तय किया गया और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रीमी-लेयर को धारणाओं को जोड़ा गया। इसके बावजूद तमिलनाडू और कुछेक उत्तर पूर्वी राज्यों ने आरक्षण की सीमा को 70 से 85 फ़ीसदी तक पहुँचा दिया और न्यायपालिका ने इसे नज़रअन्दाज़ किया।

अब ये किससे छिपा है कि आम चुनाव की दस्तक और अपनी गिरती लोकप्रियता को देखते हुए ही मोदी सरकार ने सवर्णों को पटाने के लिए उन्हें शिक्षा और नौकरी में 10 फ़ीसदी आरक्षण देने का फ़ैसला लिया है। कैबिनेट के फ़ैसले के बाद अब मोदी सरकार ने 8 जनवरी को प्रस्तावित विधेयक को राज्यसभा में पेश करने की रणनीति बनायी है। इसी वजह से संसद के मौजूदा सत्र की मियाद को एक दिन बढ़ाकर 9 जनवरी तक किया गया है। लेकिन आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था बदलने के लिए संविधान में संशोधन करना ज़रूरी होगा। इसे मोदी सरकार अपने मौजूदा कार्यकाल में नहीं कर पाएगी। लेकिन वो इसी बात को लेकर चुनाव में सवर्णों को रिझाने की कोशिश करेगी कि यदि वो फिर से सत्ता में आयी तो वादा निभाएगी। यही उसका तुरुप का पत्ता है। लग गया तो दाँव, वर्ना तुक्का!

दूसरी ओर, सरकार से जुड़े लोगों को कहना है कि आर्थिक रूप से कमज़ोर सवर्णों को आरक्षण देने के लिए 50 फ़ीसदी वाले मौजूदा कोटे में कोई परिवर्तन नहीं होगा। बल्कि अनारक्षित 50 सीटों में से 10 फ़ीसदी ग़रीब सवर्णों के लिए रखा जाएगा। निश्चित रूप से ये व्याख्या ‘कान को सीधे नहीं, बल्कि हाथ घुमाकर पकड़ने’ वाली है। क्योंकि ऐसा होने पर आरक्षण का दायरा 50 से बढ़कर 60 फ़ीसदी हो जाएगा और इन्दिरा साहनी केस के फ़ैसले को अनुसार, सुप्रीम कोर्ट को उसे असंवैधानिक भी ठहराना ही पड़ेगा। लेकिन ये तभी होगा जब संविधान संशोधित हो जाएगा। उससे पहले ‘कॉज़ ऑफ़ एक्शन’ यानी ‘फ़रियाद की वजह’ वाली क़ानूनी शर्त पूरी नहीं होगी। इस शर्त के बग़ैर सुप्रीम कोर्ट किसी अर्ज़ी पर विचार नहीं करना चाहेगी। क्योंकि ऐसा करना विधायिका के क्षेत्राधिकार में न्यायपालिका का दख़ल होगा।

सरकार के पास बहुमत लोकसभा में है। लेकिन वो प्रस्तावित विधेयक को राज्यसभा में पेश करेगी। तभी इसे चुनाव में भुनाया जा सकता है। क्योंकि राज्यसभा, स्थायी सदन है। इसमें पेश विधेयक कभी मरता नहीं। जबकि लोकसभा के भंग होते ही वहाँ लम्बित विधेयक मर जाते हैं। नयी लोकसभा को उन्हें पुनर्जीवित करना पड़ता है। वैसे तो मोदी सरकार के पास अभी संसद के आख़िरी बजट सत्र का मौक़ा बचा हुआ है, लेकिन आम चुनाव की वजह से ये सत्र बेहद छोटा होगा। इसमें सरकार पर अनिवार्य संवैधानिक कामकाज निपटाने का भारी दबाव होगा। मसलन, बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण, बजट भाषण, धन्यवाद प्रस्ताव और अनुदान माँगों (आंशिक बजट) को पारित करने के बाद मोदी सरकार के पास वक़्त बच ही नहीं सकता कि वो ग़रीब सवर्णों को 10 फ़ीसदी आरक्षण देने वाला या तीन तलाक़ को आपराधिक बर्ताव क़रार देने वाले क़ानून बना सके।

अनुमान है कि बजट सत्र 29 जनवरी से शुरु होगा और इसका पहला भाग 8 फरवरी 2019 तक चलेगा। इसका दूसरा हिस्सा भी 8 मार्च 2019 से आगे शायद ही जाए, क्योंकि तब तक चुनाव कार्यक्रम की घोषणा हो सकती है। 2014 में चुनाव आयोग ने 5 मार्च को चुनाव कार्यक्रम का ऐलान किया था। उसी दिन से आदर्श चुनाव संहिता प्रभावी हो गयी थी। लिहाज़ा, ये माना जा सकता है कि 2019 का बजट सत्र का पहला हिस्सा 5 मार्च के आसपास ही समाप्त हो जाएगा। इसका दूसरा हिस्सा नयी सरकार के हवाले होगा। 2014 में 7 अप्रैल से लेकर 12 मई तक मतदान हुआ था। नरेन्द्र मोदी, 26 मई को प्रधानमंत्री बने थे। हालाँकि, 16वीं लोकसभा का गठन 4 जून को हुआ था। इस तरह से चुनाव आयोग के पास सारी चुनाव प्रक्रिया को पूरा करने और राष्ट्रपति के पास नयी लोकसभा के गठन की अधिसूचना जारी करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा 3 जून तक का वक़्त होगा।

अब सवाल ये उठ सकता है कि क्या सरकार को इन सीमाओं या चुनौतियों का अहसास नहीं है? जबाब है, बिल्कुल है। अगला सवाल ये होगा कि ‘तो फिर सरकार अपने चला-चली की बेला में ऐसा रास्ता क्यों चुन रही है, जिससे सवर्णों को रिझाया जा सके?’ इस प्रश्न का उत्तर पूरी तरह से सियासी है। सैद्धान्तिक रूप से संसद को संविधान में संशोधन का अटूट अधिकार है। लेकिन क्या संवैधानिक है और क्या नहीं? ये तय करना सुप्रीम कोर्ट का क्षेत्राधिकार है। दरअसल, एससी-एसटी एक्ट को पहले की तरह फिर से बहाल किये जाने के बाद से सवर्णों में बीजेपी के प्रति गहरी नाराज़गी पैदा हो गयी है। बीजेपी को लगता है कि अब सवर्णों को आरक्षण दिये बग़ैर वो अपने वोट-बैंक को बिखरने से नहीं रोक सकती।

दशकों से संघ परिवार के लोग सवर्णों को रिझाने के लिए आरक्षण की आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने समय-समय पर आरक्षण की समीक्षा की दलीलें भी दी हैं तो ये भी कहा है कि आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था कभी ख़त्म नहीं की जाएगी। या, आरक्षण ‘उनके’ जीते-जी ख़त्म नहीं हो सकता। अब ताज़ा विधानसभा चुनाव के बाद बीजेपी को लेकर सवर्ण हिन्दुओं में ये धारणा फैलने लगी कि मोदी सरकार के जाने का वक़्त आ गया और इसने न तो राम मन्दिर को लेकर अपना वादा निभाया और ना ही आरक्षण को लेकर। सवर्णों के ऐसे आक्रोश को देखते हुए ही बीजेपी के पैरों तले ज़मीन खिसकने लगी है। पार्टी को इसका भरपूर आभास भी हो रहा है। इसीलिए ‘ग़रीब सवर्णों को आरक्षण’ के ज़रिये मोदी सरकार ने तुरुप का पत्ता फेंका है! सरकार ने अब भागते भूत की लंगोटी के रूप में सवर्ण आरक्षण के लॉलीपॉप को आज़माने की जुगत निकाली है। हालाँकि, काश! बीजेपी ये समझ पाती है कि ‘अब पछताए होता का जब चिड़िया चुग गयी खेत’। क्योंकि बक़ौल पूर्व केन्द्रीय मंत्री यशवन्त सिन्हा, ‘सवर्ण आरक्षण, मोदी सरकार का एक और जुमला’ है।

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सेना ने माना, आईएलएंडएफएस बांड में फंसा एजीआईएफ का पैसा

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Indian Army insurance ILFS bonds

नई दिल्ली, 18 मार्च | भारतीय सेना जो पहले यह मानने को तैयार नहीं थी कि उनके कल्याण की निधि का पैसा आईएनएंडएफएस के विषैले बांड में फंस गया है, जबकि आईएनएस इस बात को बार-बार दोहराता रहा, लेकिन अब वह स्वीकार करती है कि भारत की एकमात्र निष्पक्ष न्यूज वायर का विश्लेषण सही है।

सेना के पीआरओ ने आखिरकार सवालों का जबाव देते हुए कहा कि आर्मी ग्रुप इंश्योरेंस फंड (एजीआईएफ) के काफी सख्त निवेश नियम हैं। देश के अत्यंत सम्मानित व प्रख्यात वित्तीय शख्सियतों की सलाह पर निवेश किया जाता है। इससे पहले सेना के पीआरओ लेफ्टिनेंट कर्नल मोहित वैष्णव मसले को उलझाते रहे और जवाब नहीं दिए थे। सेना का हालिया बयान आईएएनएस के तथ्यों के साथ इस प्रकार है :

एजीआईएफ का वर्षो से रिटर्न निर्धारित जोखिम लाभ सांचे में काफी बेहतर रहा। आईएएनएस ने इसपर कभी संदेह नहीं किया।

एजीआईएफ को 200 से कोई एनपीए नहीं रहा। इन्फ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज (आईएनएंडएफएस) ट्रिपल ‘ए’ रेटेड कंपनी थी और जब एजीआईएफ का निवेश हुआ उस समय उसे केंद्र व राज्य सरकारों दोनों की मदद मिली थी। कंपनी अगस्त 2018 में अचानक चूक के कारण ट्रिपल ‘ए’ से नीचे आ गई।

आईएएलएंडएफएस के 91,000 करोड़ के कर्ज में बैंकों का 63 फीसदी, म्यूचुअल फंड का तीन फीसदी से ज्यादा और बीमा कंपनियों, ईपीएफ वे पेंशन निधि का पांच फीसदी से ज्यादा फंस गया है।

बैंक/एएमसी/पेंशन निधि के मुकाबले एजीआईएफ की रकम अत्यल्प (0.5 फीसदी से कम) है। (सारा कुछ सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है और आईएएनएस का कहना है कि विषैले आईएलएंडएफएस बांड में एजीआईएफ की 210 करोड़ रुपये की रकम फंस गई है।)

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राफ़ेल सौदे में सीएजी ने उड़ाई पारदर्शिता की धज़्ज़ियाँ

राफ़ेल रिपोर्ट में सीएजी ने अपनी प्रतिष्ठा गँवाई, इसने जितने सवालों के जबाब दिये उसके ज़्यादा तो प्रश्न खड़े किये

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Rafale deal scam

राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए भारत और फ़्राँस के बीच हुए सौदे को अन्तर-सरकारी क़रार (आईजीए) कहा गया। आईजीए के इस नामकरण को समझना बहुत मुश्किल है। ख़ासकर, उस घटनाक्रम को देखते हुए जो 10 अप्रैल 2015 से पहले का रहा है। इस दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फ़्राँसिसी कम्पनी डसॉल्ट से 36 विमान ख़रीदने के फ़ैसले का ऐलान किया था।

यूपीए सरकार ने ग्लोबल टेंडर के ज़रिये दो विमानों के चुना था। पहला, डसॉल्ट कम्पनी का राफ़ेल और दूसरा, चार यूरोपीय देशों में बनने वाला यूरोफ़ाईटर टाइफून। टेंडर में राफ़ेल का दाम कम था। तब यूपीए ने 126 राफ़ेल विमानों की ख़रीदारी के लिए सौदेबाज़ी शुरू की।

ये क़रार दो सरकारों के बीच होने वाला जी-टू-जी समझौता नहीं था। क्योंकि ग्लोबल टेंडर को इस ढाँचे में नहीं रखा जा सकता। यही वजह है कि यूपीए सरकार ने जब रूस या अमेरिका से रक्षा उपकरणों की ख़रीदारी की तभी जी-टू-जी क़रार किये गये। यूपीए ने डसॉल्ट से जिस सौदे की बातचीत की थी, उसके तहत 18 विमानों का निर्माण सीधे डसॉल्ट को करना था और बाक़ी 108 का निर्माण हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) को करना था और डलॉल्ट को इसकी तकनीक मुहैया करवानी थी।

मार्च 2015 में डसॉल्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि एचएएल के साथ हो रहा समझौता 95 फ़ीसदी पूरा हो चुका है और बाक़ी भी जल्द ही पूरा हो जाएगा। लेकिन प्रधानमंत्री ने उस समझौते को ख़त्म कर दिया और उसकी जगह डसॉल्ट से सीधे 36 विमान ख़रीदने का सौदा किया। इस समझौते से एचएएल को बाहर कर दिया गया। साफ़ है कि अब भी राफ़ेल विमानों की आपूर्ति का ज़िम्मा डसॉल्ट पर ही है, फ़्राँसिसी सरकार पर नहीं। इसके बावजूद, नये सौदे को ‘सरकार से सरकार के बीच’ (जी-टू-जी) नहीं, बल्कि ‘अन्तर-सरकारी क़रार’ (आईजीए) कहा जा रहा है।

नये सौदे की आड़

प्रधानमंत्री की घोषणा का अंज़ाम ये हुआ कि पुराने समझौते से जुड़ी वो सारे शर्ते ख़त्म हो गयीं जिनका ताल्लुक राफ़ेल के दाम से था और जिसे इसे रक्षा ख़रीद प्रक्रिया यानी डिफ़ेंस प्रोक्योरमेंट प्रोसिज़र्स (डीपीपी) के तहत तय किया गया था। दूसरे शब्दों में, अब पुराना क़रार ख़त्म हो गया और उसकी जगह 36 विमानों की पूरी तरह से नयी डील (सौदे) ने ले ली। 2015 में फ़्राँस की धरती पर किये गये प्रधानमंत्री के ऐलान से भारत सरकार पशोपेश में फँस गयी, क्योंकि ये प्रधानमंत्री का एकतरफ़ा फ़ैसला था। अब आगे की बातचीत का दारोमदार सीधे-सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) पर आ गया।

नये सौदे की शर्तों पर बातचीत करने का जो रास्ता प्रधानमंत्री कार्यालय ने चुना वो रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) और रक्षा ख़रीद परिषद (डिफ़ेंस एक्वीज़ीशन काउन्सिल – डीएसी) के दायरे से बाहर था। क्योंकि रक्षा ख़रीद के लिए सौदेबाज़ी करने का काम डीपीपी को करना होता है। ये उसी का क्षेत्राधिकार है। इसीलिए राफ़ेल की फ़ाइल में रक्षा मंत्रालय के अफ़सरों की टिप्पणी ने प्रधानमंत्री कार्यालय पर सीधा-सीधा आक्षेप किया। दस्तावेज़ों से साबित हो गया कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने सौदेबाज़ी में रक्षा मंत्रालय की रसूख़ को गिरा दिया। दिलचस्प ये भी रहा कि नये सौदे में दो नयी बातें हुईं। पहला, एक ऑफ़सेट पार्टनर का जुड़ना और दूसरा, हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के हाथों से 108 विमानों के निर्माण की शर्ते का ख़त्म होना।

नया क़रार ‘अन्तर-सरकारी’ (आईजीए) नहीं है। क्योंकि डसॉल्ट एक निजी कम्पनी है। ये फ़्रेंच सरकार की भी कम्पनी नहीं है। इसीलिए फ़्रेंच सरकार ने 36 विमानों की सप्लाई की गारंटी लेने वाली शर्त से अपना पल्ला झाड़ लिया। फिर सप्लायर होने के नाते डसॉल्ट को गोपनीयता और कमीशन की शर्तों से छुटकारा दिलाने के लिए ज़ुर्माने और भ्रष्टाचार से जुड़े प्रावधानों को हटाया गया। ये काम प्रधानमंत्री कार्यालय की शह के बग़ैर कैसे मुमकिन हुआ? इसकी क्या वजह रही और ऐसा किससे कहने से हुआ? इन सवालों का कोई जबाब नहीं मिला।

रक्षा ख़रीद परिषद (डीएसी) को दरकिनार करने के लिए ऐसी शर्तें तैयार की गयीं जिससे प्रधानमंत्री और फ़्रेंच सरकार के लिए मुश्किलें पैदा नहीं हों। गारंटी की जगह उस ‘लेटर ऑफ़ कम्फर्ट’ (सहुलियत पत्र) ने ले ली जिसका कोई क़ानूनी प्रभाव नहीं होता। यहाँ तक कि फ़्रेंच सरकार ने डसॉस्ट को भुगतान करने के लिए अपने ‘स्क्रू खाते’ की सुविधा भी नहीं दी। शायद इसीलिए, क्योंकि फ़्रेंच सरकार इस सौदे की किसी भी ज़िम्मेदारी लेने से बचना चाहती थी। स्क्रू खाते के ज़रिये फ़्रेंच सरकार को ये सुनिश्चित करना होता कि डसॉल्ट ने अपनी शर्तों को निभाया, तभी उसे भुगतान हुआ।

ख़ामियों भरी रिपोर्ट

सीएजी ने कई तरह से देश को गच्चा दिया। पहला, इसकी रिपोर्ट 36 विमानों के दाम तक सीमित रही। इसका कहना है कि यूपीए के दौर वाले क़रार के मुक़ाबले नया सौदा 2.86% सस्ता है। लेकिन इस नतीज़े पर पहुँचने से पहले सीएजी ने सभी तथ्यों का ख़ुलासा नहीं किया। कहना मुश्किल है कि सीएजी ऐसा कैसे कर सकता है! दूसरा, सीएजी ने ये नहीं बताया कि प्रधानमंत्री ने किस आधार पर 36 विमानों की सीधी ख़रीदारी का साहसिक फ़ैसला लिया। तीसरा, सीएजी रिपोर्ट ने 2013 से लागू रक्षा ख़रीद प्रक्रिया (डीपीपी) को दरकिनार किये जाने के प्रति अपने नज़रें पूरी तरह से फेर लीं।

चौथा, सीएजी रिपोर्ट में इस तथ्य के प्रति भी उदासीनता दिखायी गयी है कि भारत की सौदेबाज़ी टीम ने एक ऐतराज़ ज़ाहिर किया है और उसे ठुकराने या ख़ारिज़ करने के लिए क्या दलीलें हैं। पाँचवाँ, सीएजी रिपोर्ट ने ये भी साफ़ नहीं किया कि नये क़रार के मसौदे से भ्रष्टाचार-विरोधी प्रावधान ग़ायब क्यों हैं। छठा, सीएजी रिपोर्ट ये तो बताती है कि गारंटी नहीं मिलने का कोई वित्तीय नुकसान नहीं होगा, लेकिन रिपोर्ट ये साफ़ नहीं करती कि गारंटी का प्रावधान क्यों नहीं है।

सबसे आश्चर्यजनक तो ये रहा कि सीएजी ने राफ़ेल के चयन के लिए यूपीए की आलोचना की, लेकिन उसी विमान को जब प्रधानमंत्री ने चुनने का फ़ैसला किया तो सीएजी की बोलती बन्द थी। इतना ही नहीं, राफ़ेल विमानों की संख्या को 126 से घटाकर 36 करने को लेकर भी जो उद्देश्य बताया गया वो ये कि भारतीय वायुसेना में विमानों की भारी कमी है जिसे यथाशीघ्र पूरा करना ज़रूरी था। लेकिन जब यूपीए के सौदे की तुलना मोदी सरकार के क़रार से की गयी तो पता चला कि नये सौदे में सिर्फ़ एक महीने की बचत होगी।

साफ़ है कि मौके की नज़ाक़त को देखते सीएजी अपनी अपेक्षाओं पर ख़रा नहीं उतरा। उसने अपने दायरे से बाहर जाकर सरकार की सुरक्षा करने का रास्ता चुना। अब तो सीएजी की प्रतिष्ठा को भी सुरक्षित करना होगा।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: TheHindu)

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सरकार और मीडिया ही बने लोकतंत्र के लिए ख़तरनाक

लोकतांत्रिक संस्थाओं के पतन का सबसे बड़ा सबूत है, ग़लत जानकारियों को ही विश्वसनीय बनाकर पेश करना

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Modi on TV

ज़माना बदल गया। हमारा राष्ट्रीय संवाद अब पक्ष-विपक्ष का नहीं रहा, बल्कि दोस्तों और दुश्मनों का हो चुका है। चर्चा और बहस की गुंज़ाइश नहीं रही। आज जो सरकार या उसके बैठे लोगों के विरोध में हो, उसे देशद्रोही कहा जाता है। ऐसा माहौल बना दिया गया है कि पाकिस्तान से सम्बन्धित सरकार के हरेक क़दम का समर्थन करना ज़रूरी है। यदि विपक्ष ऐसे सवाल पूछता है, जिन्हें पूछा ही जाना चाहिए तो उस पर राष्ट्रविरोधी होने का आरोप मढ़ दिया जाता है। फ़ेसबुक औऱ ट्वीटर जैसे सोशल मीडिया के माध्यमों पर भी यदि कोई सरकार की आलोचना करता है तो उसके ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा ठोंक दिया जाता है।

लोकसभा के चुनाव सामने पाकर जन-संवाद को इतना हानिकारक बना दिया गया है कि बात बर्दाश्त से बाहर हो गयी है। प्रधानमंत्री कुछ भी बोलें लेकिन उनके गुणगान के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चीयरलीडर्स या भाँडों की भूमिका थाम ली है। जब ‘द हिन्दू’ अख़बार ने बोफ़ोर्स ख़ुलासा किया था, तब विपक्ष ने राजीव गाँधी से सवाल पूछे थे। लेकिन जब उसी ‘द हिन्दू’ ने राफ़ेल सौदे का भाँडाफोड़ किया तो सरकार ने ‘द हिन्दू’ को ही कठघरे में खड़ा कर दिया। विपक्ष के सवालों को ऐसे पेश किया गया जिनसे सुरक्षा बल कमज़ोर पड़ जाएँगे।

मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब 26 नवम्बर 2008 को मुम्बई पर आतंकी हमला हुआ था, तब मुठभेड़ के दौरान ही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुम्बई पहुँचकर केन्द्र सरकार को नकारा होने और राष्ट्रीय सुरक्षा में नाकाम रहने का तमग़ा दे दिया। लेकिन जब पुलवामा हमला हुआ तो सरकार ने उन्हीं लोगों पर सवाल दाग़ने शुरू कर दिये जो उससे सवाल पूछ रहे थे। लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी की यादाश्त बहुत कमज़ोर है। मोदी उस वक़्त देश की सरकार के समर्थन में नहीं खड़े जब मुम्बई में आतंकी तबाही मचा रहे थे। शायद, उन्हें उस वक़्त अपनी कथनी और करनी में राष्ट्रभक्ति की छटा दिखायी दे रही थी।

ऐसी वारदातों के सामने मीडिया का दोहरा चरित्र बेनक़ाब हो गया है, क्योंकि अब उसके पास प्रधानमंत्री के दोमुँही बातों को उजागर करने का वक़्त नहीं है। ये मिसाल है कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाएँ अब कहाँ से कहाँ पहुँच चुकी हैं। 2014 से पहले पहले प्रेस और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन (यूपीए) की क़दम-क़दम पर चीड़फाड़ की। आज वही लोग इस सरकार के लिए भाँड या चीयरलीडर्स बन गये हैं। हालाँकि, ये बात मीडिया का सभी वर्गों पर लागू नहीं होती है। आज विपक्षी नेताओं के तक़रीबन सारे बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। आज सरकार के हर क़दम को राष्ट्रभक्ति बताकर उसका स्तुतिगान किया जाता है। प्रधानमंत्री और इस सरकार के हरेक मंत्री के बयान को अक्षरशः सत्य बनाकर पेश किया जाता है। उन आँकड़ों को लेकर कोई सवाल नहीं पूछे जाते जिन्हें राष्ट्रीय सैम्पल सर्वे (एनएसएसओ) जारी करता है। कोई सरकार से ये नहीं पूछ रहा कि वो किस आधार पर बालाकोट में 300-400 आतंकियों के सफ़ाये का दावा कर रही है। पत्रकारों और टीवी के एंकरों में प्रधानमंत्री को उनकी हैसियत से बड़े से बड़ा करके दिखाने की होड़ मची हुई है।

कई योजनाओं के नाम बदलकर उनकी उपलब्धियों के बारे में सरकार जो आँकड़े पेश करती है, कोई उसकी सच्चाई को जाँचने वाला नहीं है। जो लोग सच्चाई को सामने रखते हैं उनके साथ दक्षिण-पन्थी भक्तों की टोली ग़ाली-गलौज़ करती है। विपक्ष के नेताओं को फ़र्ज़ी बयान को जोड़कर उन्हें वायरल करवाया जाता है, ताकि उनका चरित्र-हनन किया जा सके। लेकिन दूसरी ओर, फ़ेसबुक और ट्वीटर के अफ़सरों को बुलाकर सरकार तलाड़ती है कि वो उसके क़रीबियों के चुनिन्दा पोस्ट को क्यों हटा रही है। सरकार को उन फ़ेक-पोस्ट की परवाह नहीं है, जिनमें विपक्षियों को निशाना बनाया जाता है। भ्रष्ट जानकारियों को आज विश्वसनीय सूचनाएँ बनाकर पेश किया जाता है। हर तरफ़ से ये झूठ फ़ैलाया जा रहा है कि मोदी सरकार ने भारत की दिशा ही बदल दी है।

अख़बारों में प्रधानमंत्री के विज्ञापन भरे पड़े हैं। इन पर जनता का पैसा बहाया जा रहा है, लेकिन कोई सवाल उठाने वाला नहीं है। मुट्ठीभर सम्पादकों ने सरकार को आड़े हाथों लेने का साहस दिखाया है। वो बधाई के पात्र हैं। लेकिन लोकतंत्र के चौथे खम्भे का ज़्यादातर हिस्सा सरकार की जाग़ीर बन चुका है। मीडिया की साख़ इतनी गिर चुकी है कि समाज के बहुत बड़े तबक़े ने टेलीविज़न देखना बन्द कर दिया है, क्योंकि अब वो इसे ख़बरें देने वाले माध्यम के रूप में नहीं पाते हैं। हर शाम को कुछ चैनलों पर कुछ ख़ास लोगों की साउंड बाइट सर्कस करते नज़र आती है। इनके ज़रिये समाज में ज़हर परोसा जाता है। ये लोकतंत्र का अराजक चेहरा है, जो सिर्फ़ झूठ और दुष्प्रचार के भरोसे क़ायम है।

यदि सरकार और चौथा खम्भा यानी मीडिया, एक ही चट्टा-बट्टा बन चुके हैं तो लोकतंत्र भारी ख़तरे में है। इसीलिए बहुत महत्वपूर्ण है कि वो लोग आगे आयें जो अपनी बातों को प्रभावी तरह से रखना जानते हैं। यदि ऐसे लोग मुखर नहीं होंगे तो झूठ और अफ़वाह को कौन चुनौती देगा। सच को कौन सामने लाएगा। हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं को संविधान से जो ज़िम्मेदारियाँ मिली हैं, उसे लेकर उन्हें सरकार के प्रति नहीं बल्कि देश के प्रति जबाबदेह होना चाहिए। उन्हें सरकार की रखैल बनने के बजाय अपने विवेक के काम लेना चाहिए। चाहे केन्द्रीय हो या प्रादेशिक, जाँच एजेंसियों को चाहिए कि वो डर और पक्षपात के बग़ैर क़सूरवार लोगों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करें। लेकिन ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि जाँच एजेंसियाँ चुन-चुनकर उन लोगों को निशाना बना रही हैं, जो सरकार के विरोधी हैं, जबकि उन लोगों को नज़रअन्दाज़ किया जाता है जो या तो सरकार के क़रीबी हैं और फिर उसका हिस्सा हैं। न्यायपालिका को भी ये समझना होगा कि यदि वो बेक़सूर लोगों के हक़ में नहीं खड़ी होती तो उसे निष्पक्ष नहीं माना जा सकता।

ख़ुशहाली और अच्छे दिन के लिए शान्ति, सद्भाव और लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा ज़रूरी है। ऐसा लगता है कि आज हम ऐसे अन्यायपूर्ण भारत में रह रहे हैं, जहाँ कमज़ोर तबकों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ सपने हैं। मुट्ठी भर लोगों को छोड़कर चारों ओर नाउम्मीदी नज़र आती है।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)
(साभार: द टेलिग्राफ)

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