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अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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Bhim-Rao-Ambedkar

कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

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काले धन को सफेद करने के लिए भावांतर योजना शुरू की गई थी : कमलनाथ

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kamal nath

प्रमुख राज्यों और सहयोगियों को संभालने वाले एक सशक्त कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस महासचिव कमलनाथ ने मध्यप्रदेश की सत्ता के केंद्र भोपाल को बखूबी अपना लिया है। विशुद्ध राजनीति की कला में माहिर राज्य के 18वें मुख्यमंत्री जिन्होंने भारत को कांग्रेस मुक्त करने की भाजपा के विजय रथ को रोक दिया है, उन पर अब एक बड़ी जिम्मेदारी है। जन्मजात रणनीतिक और सामरिक सोच के धनी नेता अब राज्य में हर उस चीज को दुरुस्त करने के काम में जुट गए हैं जो गड़बड़ाई हुई है।

राज्य में खेती और ग्रामीण संकट के साथ ही संभवत: बेरोजगारी वह एकमात्र सबसे बड़ा कारण रही, जिसने कांग्रेस को जीत दिलाई।

इस संकट की गंभीरता के बारे में पूछे जाने पर नाथ ने इसके उन्मूलन के उपायों पर बात करते हुए कहा, “राज्य में रोजगार की स्थिति बहुत बुरी है। जिन संसाधनों का प्रयोग राज्य के विकास को गति देने के लिए किया जा सकता था, उनका व्यर्थ जाना बेहद दुखद है। पद संभालने के पहले दिन ही, मैंने राज्य में 70 प्रतिशत स्थानीय युवाओं को उद्यमों में रोजगार देना अनिवार्य कर दिया ताकि उन्हें औद्योगिक प्रोत्साहन मिले।”

उन्होंने कहा, “समय के साथ हम ऐसी और योजनाएं लेकर आएंगे, जिनसे रोजगार पैदा होंगे और उद्यमों के सशक्तीकरण के लिए काम करेंगे। हमारी सरकार युवाओं के कौशल विकास, रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए उद्यमों के विकास और शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दे रही है। गणतंत्र दिवस के मौके पर हमने एक नई योजना ‘युवा स्वाभिमान योजना’ की घोषणा की। इसके तहत हम साल में पूरे 100 दिन राज्य के युवाओं को काम देंगे। कृषि संकट के मामले में, पिछले कुछ सालों में मंदसौर दो बार किसानों के लिए कृषि संकट के क्षेत्र में भाजपा की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलने का मुख्य केंद्र बना।”

दिल्ली में बैठे हुए भी, हर किसी ने मध्यप्रदेश में कृषि संकट और किस प्रकार मंदसौर इसके खिलाफ विरोध का केंद्र बना, इस बारे में सुना।

कमलनाथ ने भाजपा सरकार की भावांतर योजना शुरू होने और फिर उसे बंद करने के बारे में बात करते हुए कहा, “मध्यप्रदेश भारत के सबसे बड़े कृषि प्रधान राज्यों में से एक है। इसकी करीब 70 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कृषि से जुड़ी है। यह बेहद दुख की बात है कि किसानों की आत्महत्या के मामले में मध्यप्रदेश देश में सबसे ऊपर है। अगर राज्य किसानों के लिए किसी आदर्श स्थिति में होता, जैसा कि पिछली भाजपा सरकार द्वारा कहा जा रहा था, तो स्थिति काफी अलग होती।”

उन्होंने कहा, “किसानों का आक्रोश और उनके प्रति सरकार की बेरुखी मंदसौर की घटना से ही स्पष्ट है। कृषि संकट का एक बड़ा कारण यह है कि किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलता। भावांतर योजना केवल काले धन को सफेद करने के लिए शुरू की गई थी, इस संकट को दूर करने के लिए नहीं। यह पूरी तरह त्रुटिपूर्ण थी और इसलिए इसका विफल होना तय था।”

कमलनाथ ने कहा, “हम ‘भावांतर योजना’ को नए रूप में पेश करने जा रहे हैं और ऐसे उपाय लेकर आ रहे हैं, जिनसे किसानों को उनका हक मिलेगा। अपने वादे पर कायम रहते हुए हमने सरकार में आते ही किसानों के ऋण माफ कर दिए और राज्य के किसानों के कल्याण के लिए ऐसी और भी नीतियां बनाएंगे।”

फिर से कांग्रेस के केंद्र की सत्ता में आने के सवाल पर कमलनाथ ने कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि हम बहुमत के साथ सत्ता में आएंगे। पिछले चुनाव में भाजपा की जीत और कुछ नहीं, बस एक संयोग था। हालांकि आप लोगों को लंबे समय तक मूर्ख नहीं बना सकते। नोटबंदी और जीएसटी जैसी चीजें पूरी तरह विफल हुई हैं और लोग अब बदलाव चाहते हैं।”

उन्होंने कहा, “लोगों में भाजपा विरोधी भावना है और हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों में यह साफ दिखाई दे रहा है। अगर हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की बात करें तो यह कम होने लगी है। हमारे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ जहां नीचे गिर रहा है, राहुल गांधी का ऊपर बढ़ रहा है।”

भाजपा और कांग्रेस का वोट शेयर काफी ज्यादा था और अंत में केवल मामूली अंतर से ही कांग्रेस को जीत हासिल हुई। कांग्रेस के पक्ष में बाजी जाने में किस चीज की भूमिका रही?

इस सवाल पर दून स्कूल और कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल से शिक्षित कमलनाथ ने कहा, “वक्त है बदलाव का। राज्य के लोग विकास की धीमी गति से थक चुके थे और बदलाव चाहते थे। हमारी रैलियों में भी सरकार विरोधी भावना साफ नजर आई।”

उन्होंने कहा, “अब राज्य के लोग दोनों सरकारों के बीच के अंतर को साफ महसूस कर रहे हैं। एक प्रदर्शन कर रही है और दूसरी ने कभी नहीं किया। मुझे पूरा भरोसा है कि लोग कांग्रेस को समर्थन देंगे जिसकी राज्य के विकास और सम्पन्नता के लिए काम करने की मजबूत इच्छाशक्ति है।”

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मोदी की किसान आय योजना सही उपाय नहीं : चिदंबरम

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chidambaram

नई दिल्ली, 9 फरवरी | पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने अंतरिम बजट में सरकार द्वारा किसानों के लिए की गई सीधी आय सहयोग योजना (डायरेक्ट इनकम सपोर्ट स्कीम) को विलाप बताया।

उन्होंने कहा कि यह सही उपाय के बदले एक विलाप है क्योंकि इसका लाभ सिर्फ भूस्वामी को ही मिलेगा और गरीबों का एक बड़ा वर्ग वंचित रह जाएगा।

उधर, राहुल गांधी ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी के सत्ता में आने पर देशभर के किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा। उनकी इस घोषणा की आलोचनाओं को खारिज करते हुए चिदंबरम ने कहा कि कृषि क्षेत्र के लिए इसकी जरूरत है।

कांग्रेस द्वारा गरीबों के लिए किए गए न्यूनतम आय गारंटी के वादे का बचाव करते हुए पूर्व वित्तमंत्री ने कहा कि यह लागू होने योग्य योजना है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में इस योजना की रूपरेखा की व्याख्या की जाएगी कि यह किस प्रकार लागू होगी।

चिदंबरम ने अपनी किताब ‘अनडॉटेड-सेविंग द आइडिया ऑफ इंडिया’ के विमोचन के मौके पर आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा, “यह (सरकार की किसान राहत योजना) एक विलाप है। यह कहना सही युक्ति नहीं कि मैं आपके हर परिवार को 6,000 रुपये देता हूं। ये 6,000 रुपये किनको मिलेंगे? भूस्वामियों को यह रकम मिलेगी। भू-स्वामी खुद कृषक हो सकते हैं। लेकिन अनेक मामलों में भूस्वामी नदारद रहते हैं क्योंकि वे राज्य की राजधानी में बैठे होते हैं।”

उन्होंने कहा, “काश्तकार किसानों को पैसे नहीं मिलते हैं। खेतिहर मजदूरों को पैसे नहीं मिलते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले खेती नहीं करने वाले सुनार, बढ़ई, लुहार, दुकानदार और दर्जी को पैसे नहीं मिलते हैं।”

कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर सरकार गरीबों की मदद की बात कर रही है तो फिर वह अधिकांश गरीबों को छोड़कर सिर्फ भू-स्वामियों को क्यों इस योजना का लाभ दे रही है। हालांकि उनमें गरीब भूस्वामी हो सकते हैं, लेकिन उनमें अनुपस्थित रहने वाले भू-स्वामी (ऐसे लोग हैं जो गांव में रहते ही नहीं हैं और अपनी जमीन खेती के लिए किराए पर किसी काश्तकार को देते हैं।) भी शामिल हैं।

उन्होंने कहा, “इसलिए इससे गरीबों को फायदा नहीं होता है।”

मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम समेत अन्य लोगों द्वारा कृषि कर्जमाफी की आलोचना किए जाने पर चिदंबरम ने कहा कि कर्ज के बोझ तले दबे लोगों की मदद करना सरकार का कर्तव्य है।

कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम ने कृषि कर्जमाफी को नैतिक संकट बताया है।

चिदंबरम ने कहा, “कर्जमाफी को अनैतिक बताने पर मुझे हंसी आती है। तो फिर आप उद्योपतियों के लिए बैंकों को राहत (हेयरकट) देने के लिए क्यों कहते हैं। इसलिए नैतिकता के तर्क को इससे अलग रखें और सरल अर्थशास्त्र और कृषि से जुड़े लोगों की समस्या पर गौर करें।”

उन्होंने कहा, “कर्जदार किसान 90,000 से लेकर एक लाख रुपये का कर्ज कैसे चुका सकता है, क्योंकि वह आईसीयू में है। आपको सबसे पहले उनकी जिंदगी बचानी है। उनको तंदुरुस्त करना है। कर्जमाफी का यही मकसद है। अगर लोग सूखा या बाढ़ या अन्य कारणों से कर्ज में दबे हुए हैं तो सरकार कैसे कह सकती है कि मैं आपको कर्ज से राहत नहीं दूंगा।”

हालांकि वह इस बात से सहमत हैं कि यह पूर्ण समाधान नहीं है। कांग्रेस ने कहा, “इसके बाद आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्पादकता और उत्पादन में बढ़ोतरी हो और किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम मिले। अगर आप ऐसा करने में विफल होंगे तो 10 साल बाद आपको वैसी ही समस्या से जुझना पड़ेगा।”

रोजगार सृजन से जुड़े सवालों पर चिदंबरम ने कहा, “कांग्रेस को मालूम है कि रोजगार का सृजन कैसे होता है। हमें मालूम है कि नौकरियां देनेवाले क्षेत्र कौन-कौन से हैं। हमारे घोषणा पत्र में यह बताया जाएगा कि नौकरियां देने वाले क्षेत्रों के माध्यम से नौकरियां कैसे पैदा की जा सकती हैं।”

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मप्र में गायों की दशा ने गौशाला निर्माण की प्रेरणा दी : कमलनाथ

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Kamal Nath

देश के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री रह चुके कमलनाथ एक समय संकट में फंसी विश्व व्यापार वार्ता में भारत का चेहरा थे।

वह कृषि सब्सिडी पर एक समन्वित पश्चिमी गतिरोध के आगे कभी नहीं झुके और एक तरह से विश्व व्यापार संगठन को ठेंगा दिखाते हुए उन्होंने भारतीय किसानों के हितों की पैरवी की।

संप्रग-2 और इसके पहले की कांग्रेस सरकारों में भी कई महत्वपूर्ण पद संभाल चुके और लोकसभा के लिए नौ निर्वाचित हो चुके कमलनाथ हाल ही में मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का चेहरा थे।

इस 72 वर्षीय राजनेता ने अपने जोरदार चुनावी अभियान के जरिए शिवराज सिंह चौहान के शासन (13 साल) को समाप्त कर दिया। कमलनाथ ने आईएएनएस के साथ एक बेबाक बातचीत में मध्य भारत के प्रमुख राज्य के बारे में अपनी योजनाएं गिनाई।

भाजपा के 15 वर्षो के शासन के बाद, निश्चित रूप से ऐसी कई सारी चीजें होंगी, जिसे उनकी अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार राज्य में दुरुस्त करना चाहती है। आईएएनएस ने उनसे पूछा कि उनके एजेंडे में ऐसी कौन-सी पांच चीजें शीर्ष पर हैं?

नाथ ने कहा, “यह कहना गलत नहीं होगा कि 15 वर्षो के खराब शासन के कारण मध्यप्रदेश बुरी हालत में है। ऐसी बहुत-सी चीजें हैं, जिन्हें दुरुस्त करने की जरूरत है। हमारी पहली प्राथमिकता राज्य में किसानों की बेहतरी और कृषि क्षेत्र का विकास होगी। किसान भाजपा शासित राज्य में सबसे ज्यादा पीड़ित थे। उन्हें बमुश्किल ही कभी उनके काम का इनाम मिला।”

उन्होंने कहा, “कृषि क्षेत्र को मजबूत करने और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था में तेजी लाने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। पूर्ववर्ती सरकार ने कई सारे वादे किए थे। हालांकि इस बाबत बहुत कम काम किया गया। दूसरा काम राज्य की वित्तीय सेहत सुधारने का होगा। भाजपा सरकार के अंधाधुंध खर्च के कारण राज्य की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है।”

उन्होंने कहा, “हमें इसे दुरुस्त करने की जरूरत है। हम राज्य में युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। बीते दशक के दौरान संसाधनों को बर्बाद किया गया है, उसे दुरुस्त करने की जरूरत है। जैसा कि हमने वादा किया है, हम महिलाओं के लिए भी राज्य में सुरक्षित और स्वस्थ्य माहौल बनाएंगे। इनसब के अलावा, आपूर्ति प्रणाली को भी मजबूत करने की जरूरत है, ताकि लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके।”

उन्होंने सत्ता संभालते ही कृषि ऋण माफ करने के अपने वादे को पूरा किया, जिसे कईयों ने खराब आर्थिक निर्णय कहा। लेकिन क्या उनकी सोच ने किसान समुदाय की बुरी दशा को प्रतिपादित किया है, जिसके कारण उन्हें यह विकल्प चुनना पड़ा?

उन्होंने कहा, “जब से मैं मुख्यमंत्री की भूमिका में हूं, यहां तक कि इसके पहले भी मुझसे बार-बार यह प्रश्न पूछा गया है। मध्यप्रदेश के किसानों की दशा देखते हुए, हमें उनकी बेहतरी के लिए कोई कदम उठाना था और कर्जमाफी एक तर्कसंगत समाधान था। हम एक कृषि प्रधान देश हैं, इसके बावजूद यहां कई किसान कर्ज में पैदा होते हैं और कर्ज में ही मर जाते हैं। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है।”

उन्होंने कहा, “हम राज्य के किसानों की मदद करके उनपर कोई अहसान नहीं कर रहे हैं। वे हमारे प्रमुख अन्नदाता हैं और उनके ऋण माफ करना उनकी दशा सुधारने और राज्य में विकास का सूत्रपात करने की दिशा में एक प्रयास है। मैं इसे राज्य की भलाई में किए गए दीर्घकालिक निवेश के तौर पर देखता हूं। इसके अलावा मुझे विश्वास है कि जो इसे खराब अर्थशास्त्र कह रहे हैं, वे कृषि व अर्थव्यवस्था के बारे में बहुत कम जानते हैं। हम सभी इस तथ्य से वाकिफ हैं कि बैंक उद्योगों और व्यापारिक घरानों के ऋण माफ करते हैं, कई मामलों में ऋण 50 प्रतिशत तक माफ किया जाता है। अगर व्यापारिक समुदाय के लिए ऋण माफ करना एक अच्छा अर्थशास्त्र है, तो यह कैसे गलत हो गया जब हम इसे आर्थिक रूप से गरीब किसानों के लिए करते हैं?”

कमलानाथ कई केंद्रीय कैबिनेट में लंबे समय तक शीर्ष मंत्री रहे हैं। उनकी नई जिम्मेदारी बिल्कुल अलग है। ऐसे में राज्य की राजनीति में वह कैसे सामंजस्य बिठाते हैं?

उन्होंने कहा, “राज्य की राजनीति केंद्रीय राजनीति से बहुत अलग होती है। कैबिनेट मंत्री और एक मुख्यमंत्री होने में बड़ा अंतर है। राज्य की राजनीति का दायरा बहुत बड़ा होता है और एक मुख्यमंत्री के तौर, चीजें आपके आस-पास सिमटी रहती हैं।”

कमलनाथ ने कहा, “इसके अलावा, चुनौतियां और जिम्मेदारियां बहुत बड़ी होती हैं। केंद्रीय मंत्री के तौर पर मैंने जो बदलाव किए थे, उसके सकारात्मक नतीजे भी आए थे और मैंने राज्यस्तर पर भी इसे फिर से दोहराने का विचार किया है। हालांकि दोनों के बीच जो एक सामान्य बात है, वह जनसेवा है। जो भी राजनीति में मौजूद है, वह जनता और देश की सेवा करने को उत्सुक रहता है और मैं भी यही कर रहा हूं। पिछले चार दशकों के दौरान मैंने जो भी जिम्मेदारी निभाई, उसका मूल उद्देश्य हमेशा जनता की सेवा ही रहा है। मेरा एक मात्र मकसद जनसेवा है।”

निश्चित ही मध्यप्रदेश जैसे पिछड़े राज्य के लिए अपेक्षाकृत यह चुनौती कठिन होगी, क्योंकि आकार के मामले में देश के एक सबसे बड़े राज्य की अपनी अलग समस्याएं हैं? कमलनाथ ने तपाक से जवाब दिया, “किसान आत्महत्या, बेरोजगारी के लिहाज से मध्य प्रदेश में कई सारी चुनौतियां हैं। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस में राज्य का स्तर काफी नीचे है।”

उन्होंने कहा, “राज्य के पिछड़ेपन के पीछे कुछ बड़े कारण हैं। भारत के दूसरे सबसे बड़े राज्य के रूप में, हमारा क्षेत्रफल बहुत बड़ा है और संभावनाएं असीमित हैं। हालांकि पूर्ववर्ती सरकार ने अवसरों का इस्तेमाल करने के बारे में कभी नहीं सोचा और वे संसाधनों का दोहन करने में व्यस्त रहे। राज्य को ‘बीमारू राज्य’ की श्रेणी से बाहर निकालने के उनके सभी दावे झूठ का पुलिंदा के अलाव कुछ नहीं थे।”

उन्होंने कहा, “पिछले 15 वर्षो में, राज्य की आर्थिक दशा सुधारने से शायद ही कुछ किया गया। विकास का हमारा मॉडल विकेंद्रीकरण का है। हम सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करा रहे हैं, जिससे राज्य का समग्र विकास होगा। हम जिलास्तर पर शासन खड़ा करना चाहते हैं और जमनी स्तर पर विकास सुनिश्चित करना चाहते हैं। सभी सुविधाएं जमीनी स्तर पर मुहैया होंगी, ताकि लोगों को अपना काम कराने के लिए बड़े शहरों में न आना पड़े। राज्य में ऐसे विभाग, परिषद, बोर्ड और विश्वविद्यालय हैं, जहां बदलाव की जरूरत है। हम इन क्षेत्रों की भी पहचान कर रहे हैं।”

कईयों का मानना है कि नाथ एक चालाक राजनेता की तरह प्रतिस्पर्धा में गौ राजनीति कर रहे हैं। गौशालाओं के निर्माण का काम कैसा चल रहा है? सभी जानते हैं कि यह कांग्रेस की एक चुनाव पूर्व योजना थी, लेकिन क्या यह प्रतिगामी नहीं है?

उन्होंने कहा, “‘प्रतिगामी’ शब्द मुझे परेशान करता है, क्योंकि मुझे यह समझ में नहीं आता कि मवेशियों के लिए छत का निर्माण प्रतिगामी कैसे हो सकता है। प्रारंभ में गौशाला का निर्माण हमारे घोषणा-पत्र का हिस्सा नहीं था, लेकिन बाद में इसे शामिल किया गया। एक रैली में मैंने देखा कि कैसे गायों के साथ बुरा बर्ताव किया जा रहा है। यह परेशान करने वाला दृश्य था और इसलिए मैंने अपने घोषणा-पत्र के जारी होने के तीन महीने पहले इसकी घोषणा की।”

कमलनाथ ने कहा, “यह कोई चुनाव पूर्व की योजना नहीं थी, क्योंकि एक पार्टी के नाते हम मवेशी राजनीति में विश्वास नहीं करते हैं। एक देश में जहां गायों को इतना ज्यादा सम्मान दिया जाता है, मैं उनकी रक्षा करने में विश्वास करता हूं और सभी पंचायतों में गौशाला का निर्माण करना महत्वपूर्ण है।”

मुख्यमंत्री ने कहा, “यह न तो कोई चुनाव-पूर्व की योजना थी और न कोई प्रतिस्पर्धी योजना ही है। अब, चार महीनों में हम मध्यप्रदेश के विभिन्न गांवों में एक हजार गौशालाओं का निर्माण करने जा रहे हैं, जहां अनाथ गायों की देखभाल की जाएगी। इसमें छत, चापाकल, बायोगैस संयंत्र आदि सुविधाएं होंगी।”

कमलनाथ ने कहा, “गौशालाओं का मॉडल इस तरह से डिजाइन किया गया है कि समाज, किसान और आम आदमी गौशाला को चलाने में बड़ी भूमिका निभाएंगे। इससे जनभागीदारी बढ़ेगी और यह मॉडल अधिक विश्वसनीय बनेगा। शहरी विकास विभाग इस परियोजना का नोडल विभाग होगा।”

उन्होंने कहा, “इस परियोजना से ग्रामीण इलाकों में रोजगार सृजन होगा। इससे विभिन्न तरीके से लोगों की भागीदारी के अवसर पैदा होंगे। लोग सरकार द्वारा आवंटित जमीन पर गौशाला बनाकर, गौशाला निर्माण की देखभाल कर, और गौ अभियान व गौ सदन की जिम्मेदारी अपने हाथों में लेकर इसमें अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं।”

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