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अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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Bhim-Rao-Ambedkar

कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

ओपिनियन

प्रणब का मिशन नागपुर लोकतंत्र के लिए कितना सही?

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

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Pranab Mukherjee

नागपुर से प्रणब की जो तस्वीरें देखने को मिलीं, उसे एक कांग्रेस नेता के शब्दों में हजम करना मुश्किल था। जो शख्स धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंगे रहे, जिदंगी के कई साल कांग्रेस पार्टी को दिए और फिर संविधान कायम रखने की जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रपति बने, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे संगठन के प्रमुख के साथ मंच साझा कर रहे थे और उनकी आवभगत का आनंद ले रहे थे। यह उन्हें उन मूल्यों व आदर्शो का समर्थन करता दिखाता है, जिनके विरोध में वे हमेशा खड़े रहे और संघर्ष करते रहे।

मुखर्जी के पहली बार हिंदूवादी संगठन के मुख्यालय में जाने के विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वैचारिक सलाहकार ने मध्यम स्तर के एक कांग्रेस नेता से पूछा, “आप उस सरकार का हिस्सा थे, जिसने 1975 में और फिर 1992 में आरएसएस को प्रतिबंधित किया। क्या आपको नहीं लगता कि आपको हमें बताना चाहिए कि उस समय आरएसएस में क्या बुराई थी, जो अब उसका गुण बन गया है?”

प्रणब की बेटी शर्मिष्ठा सहित कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं ने ऐसे संगठन से मिले निमंत्रण को स्वीकार करने पर सवाल उठाए, जो वामपंथी-उदारवादी- धर्मनिरपेक्षता की स्थापना को नापसंद करता आया है। न सिर्फ समर्पित, बल्कि चिंतित नागरिक भी भी देश में नफरत और पूर्वाग्रह वाले माहौल में अपनी व्यथा जाहिर कर रहे हैं और अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित हमले और सामाजकि रूप से सताए दलितों व पिछड़ों के दमन के लिए आरएसएस और उससे संबद्ध संघ परिवार के संगठनों की विचारधारा को दोषी ठहराते रहे हैं।

कई लोगों ने आवाज उठाई है कि यदि इस तरह से नफरत का जहर फैलाने दिया जाता रहा, तो यह भारत के उस बहुपक्षीय, बहुसंख्यक और बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचना व तानेबाने को खत्म कर सकता है, जो देश को इतना अनोखा व अद्वितीय बनाता है।

कथित रूप से हिंदू राष्ट्रवादी समूहों से संबद्ध कमसिन लड़कियों के खिलाफ क्रूर हिंसा के बाद अप्रैल में देशभर में चलाए गए ‘हैशटैगनॉटइन माइनेम’ विरोध अभियान के दौरान ऐसे संदेश छाए रहे कि “आज हम घृणा की राजनीति का सामना कर रहे हैं जो हमारे देश के बड़े हिस्सों में फैल गया है .. मुसलमान अगले दौर के हमलों के डर के साये में रहते हैं, यहां तक कि संविधान में दलितों और आदिवासियों को जो अधिकार मिले हैं, उस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।”

83 वर्षीय मुखर्जी ने बढ़ते ध्रुवीकरण के इस माहौल में पुराने कैबिनेट और पार्टी के कुछ सहयोगियों की अपील को अनदेखा कर दिया। राष्ट्रीय स्तर पर टेलीविजन पर सीधे प्रसारित भाषण में मुखर्जी ने कहा “भारत की आत्मा बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है” और “धर्मनिरपेक्षता व समावेश हमारे लिए विश्वास का विषय है।”

उन्होंने उस आरएसएस रैंक और फाइल की याद दिलाई, जिन्होंने हिंदू सर्वोच्चवादी विचारधारा का प्रचार किया और जिसके संस्थापक ने मुसलमानों और ईसाइयों को ‘आक्रमणकारी’ माना। यह (विभिन्न धर्म) वह चीज है जिससे “हमारी संस्कृति, विश्वास और भाषा की बहुतायत भारत को विशेष बनाती है” और “धर्मशास्त्र, धर्म, क्षेत्र, घृणा और असहिष्णुता के सिद्धांत व पहचान के आधार पर हमारे राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का कोई प्रयास हमारी राष्ट्रीय पहचान को धूमिल करने का ही काम करेगा।”

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

उनकी सोच की एक झलक उनके भाषण में दिखाई पड़ती है, जिसमें उन्होंने इस बात पर दुख जाहिर किया कि ‘क्रोध की अभिव्यक्ति’ राष्ट्रीय संरचना को पूरी तरह से नष्ट कर रही है। उन्होंने कहा, “बातचीत न केवल प्रतिस्पर्धी हितों को संतुलित करने के लिए, बल्कि उन्हें सुलझाने के लिए भी जरूरी है .. सिर्फ संवाद के माध्यम से हम बिना हमारे राजनीति के भीतर अस्वास्थ्यकर संघर्ष के जटिल समस्याओं को हल करने की समझ विकसित कर सकते हैं।

संवाद और समायोजन लोकतांत्रिक कार्यकलापों के आधारशिला हैं और उनकी अनुपस्थिति अक्सर लोकतंत्र की मौत की घंटी बजती है।

अपनी किताब ‘हाउ डेमोक्रेसीज डाई’ में हार्वर्ड के प्रोफेसरों स्टीवन लेविट्स्की और डेनियल जिबलाट ने आज अमेरिकी लोकतंत्र में मौजूद ‘चरम कट्टरपंथी विभाजन’ के बारे में बात की है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में सामाजिक धारणाओं व मान्यताओं के टूटने को दर्शाता है, यह न सिर्फ डेमोक्रेट और रिपब्लिकन नेताओं के बीच बढ़ते नीतिगत मतभेद में नजर आ रहा है, बल्कि नस्ली और धार्मिक मतभेदों का भी बढ़ना नजर आ रहा है और लोकतंत्र की सुरक्षा रेलिंग को भी नुकसान पहुंच रहा है।

भारत आज भी दोराहे पर खड़ा है, जो शायद 71 साल के इतिहास में अभूतपूर्व है। जैसे ही कोई राष्ट्रीय प्रवचन दिनभर में चर्चा का विषय बन जाता है, सोशल मीडिया पर अक्सर दो चरम विभाजनकारी और नफरत फैलाने वाली विचारधाराओं के बीच ठन जाती है। इससे लोकतंत्र के हिमायती आम नागरिकों, खासकर युवा, जो परिवर्तन और प्रगति के लिए उत्सुक हैं, उन्हें निराशा हाथ लगती है।

देश में हाल के चुनावों में बुरी स्थिति देखने को मिली है। न सिर्फ शपथ ग्रहण करने वाले राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच, बल्कि विचारधाराओं के बीच भी विरोध देखने को मिला है जो मूल रूप से उनके राष्ट्रीय दृष्टिकोण में भी एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत है।

और शायद यही कारण है कि मुखर्जी ने महसूस किया कि उन्हें राष्ट्रीय भाषण में विचारों में गहराती खाई को पाटने के लिए आगे आना होगा और संवाद के लिए आग्रह करना होगा।

द इकोनॉमिस्ट ने अपने हालिया स्तंभों में से एक में प्यू ग्लोबल सर्वेक्षण का जिक्र करते हुए कहा, “यह शायद अप्रियकर हो सकता है, भारत की राजनीतिक व्यवस्था को शायद बड़ी उपलब्धियों के साथ श्रेय दिया जा सके।” सर्वेक्षण में पाया गया कि किसी अन्य लोकतांत्रिक देशों के नागरिकों के मुकाबले भारतीय लोग लोकतंत्र को लेकर कम उत्साहित हैं और मजबूत नेता चाहने या सैन्य शासन की ओर ज्यादा आकर्षित हैं।

लोकतंत्र ने एक विशाल और लगभग असंभव रूप से विविधता वाले देश को एकजुट रखने में मदद की है। इसने सेना को सत्ता से बाहर रखा है और इसने नागरिक स्वतंत्रता को बरकरार रखा है। भारत अपनी लचीली व्यवस्था के कारण ही कई पड़ोसियों के लिए ईष्र्या का विषय बना हुआ है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

मप्र : विधानसभा चुनाव में निर्णायक होंगे फर्जी मतदाता

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Fake Voter ID

भोपाल, 4 जून | मध्य प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसे लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग के यहां शिकायत दर्ज कराई है। कांग्रेस ने 60 लाख फर्जी मतदाता होने का दावा किया है।

फर्जी मतदाताओं का सबसे पहला और बड़ा खुलासा तो इसी साल के फरवरी माह में शिवपुरी के कोलारस और अशोकनगर के मुंगावली में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान हुआ था। आगामी चुनाव में राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता सजग व सर्तक रहे तो चुनाव के नतीजों में बड़े बदलाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

पिछले माह की नौ मई को आईएएनएस ने सिर्फ शिवपुरी जिले में 60 हजार फर्जी मतदाताओं का खुलासा किया था। इनमें से 21,000 मतदाता ऐसे थे, जिनकी वषरें पहले मौत हो चुकी थी।

इस सूची में 28,067 मतदाता ऐसे हैं, जो दूसरी जगह चले गए, फिर भी सूची में उनके नाम हैं। जिले में अपने स्थान पर अनुपस्थित पाए गए मतदाताओं की संख्या 5,633, और एक से ज्यादा स्थानों पर 5,031 मतदाताओं के नाम पाए गए थे।

गौरतलब है कि फरवरी माह में कोलारस विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी यह बात सामने आई थी कि 5,537 मृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद थे। शिकायत के बाद शिवपुरी के तत्कालीन जिलाधिकारी तरुण राठी को इस मामले में चुनाव आयोग ने लापरवाही का दोषी पाया था।

आयोग ने जांच में पाया था कि जिलाधिकारी तरुण राठी ने सूची में गड़बड़ी पर सही मॉनिटरिंग नहीं की। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह को पत्र भी लिखा था। बाद में राठी का तबादला कर दिया गया।

ऐसे में सवाल उठा कि जब शिवपुरी जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में 60,000 फर्जी मतदाता अर्थात औसतन एक विधानसभा में 12,000 फर्जी मतदाता हो सकते हैं, तो प्रदेश के 230 विधानसभा क्षेत्रों का क्या हाल होगा। इसी आधार पर कांग्रेस ने विधानसभा की 100 सीटों पर मतदाताओं की स्थिति का पता लगाया, जिसमें औसत तौर पर एक बात सामने आई कि राज्य में 6000,000 फर्जी मतदाता हैं। एक मतदाता की 10 से 20 मतदान केंद्रों की सूची में नाम और तस्वीरें हैं।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा अन्य नेताओं ने चुनाव आयोग को शिकायत की, जिस पर जांच भी शुरू हो गई है। आयोग ने एक जांच दल भोपाल भी भेजे हैं।

राज्य की मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह का कहना है, “जो हुआ है वह नहीं होना चाहिए। इसमें सुधार के लिए हमारी ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जिला स्तर पर ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश हो रही है, जिसके जरिए एक ही तस्वीर कई स्थानों पर पाए जाने पर उन्हें हटाया जाए। हमारी सबसे मजबूत कड़ी ब्लॉक स्तर का अधिकारी होता है, वह अच्छा काम करेगा, कलेक्टर उस पर निगरानी अच्छे से रखेंगे तो तस्वीरों का दोहराव नहीं होगा।”

राज्य सरकार के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, “मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसमें सुधार होना चाहिए, मगर एक सवाल यह भी उठता है कि मतदाता सूची ब्रेक कैसे हुई। ऐसा कौन सा सॉफ्टवेयर आ गया, यह भी जांच का विषय है। इतना तय है कि इससे सरकार या उससे जुड़े लोगों का कोई लेना-देना नहीं है।”

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह चौहान ने पिछले दिनों चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि भोपाल जिले के नरेला विधानसभा क्षेत्र में कई मकान ऐसे हैं, जिनका आकार 1550 से 2000 वर्ग फुट है और वहां 100 से 150 तक मतदाता होना बताया गया है।

राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता का मसला काफी अहम रहने वाला है, क्योंकि 230 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 50 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जीत हार का अंतर अधिकतम 5,000 रहता है। इस स्थिति में अगर फर्जी मतदाताओं के नाम काट दिए गए और उनके स्थान पर कोई वोट नहीं डाल पाया तो नतीजे चुनावी तस्वीर बदलने वाले साबित हो सकते हैं।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

राहुल गांधी कर सकते हैं मप्र में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा : कमलनाथ

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kamal nath

नई दिल्ली, 7 मई | मध्यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष कमलनाथ का कहना कि पार्टी में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करने की परंपरा नहीं है। मगर, जरूरत पड़ी तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर सकते हैं।

कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ‘ठगी’ से नाराज हैं और कांग्रेस ने इस साल के आखिर में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए कमर कस ली है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “बेशक, समय कम है मगर मुझे पक्का विश्वास है कि मैं गांव स्तर पर पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने में सक्षम साबित होऊंगा। यह मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संगठन-शक्ति व पैसे की ताकत के साथ है।”

कांग्रेस के 71 वर्षीय वरिष्ठ नेता और छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव के मद्देनजर पार्टी की प्रदेश इकाई में बदलाव संबंधी फैसला बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वह अब बीती बातों पर नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि इस संबंध में फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को 26 अप्रैल को मध्यप्रदेश कांग्रेस की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है और पार्टी के सभी नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं।

कमलनाथ की बातों से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव में खुद उतरने को लेकर उन्होंने अपना विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा, “मैं 40 साल से चुनाव लड़ता आ रहा हूं। बतौर सांसद मेरा सेवाकाल सबसे लंबा रहा है।”

जब पूछा गया कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

मध्यप्रदेश में कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं किए जाने और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त कर संतुलन कायम किए जाने के संबंध में पूछे गए सवालों पर कमलनाथ ने कहा, “मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां कोई एक शख्स चुनाव नहीं जीत सकता। आपको कई चेहरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी ने ऐसा फैसला लिया है।”

जब पूछा गया कि क्या वह चाहेंगे कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करे तो उन्होंने कहा कि हर राज्य के लिए अगल रणनीति होती है।

कमलनाथ ने कहा, “कभी-कभी यह जरूरी होता है, जबकि कभी इसकी जरूरत नहीं होती। क्या भाजपा ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था? क्या उन्होंने उत्तराखंड में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया? उनका कभी कोई मुख्यमंत्री उम्मीदवार (चुनाव से पूर्व) नहीं था। इसलिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

कमलनाथ ने इससे पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पार्टी को हर राज्य में बताना चाहिए कि वहां उसका नेता कौन है। इसका जिक्र करने पर उन्होंने कहा, “अगर जरूरत महसूस होगी तो कांग्रेस अध्यक्ष किसी के नाम की घोषणा करेंगे।”

कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के तौर पर उनकी प्राथमिकता पार्टी को गांव स्तर पर मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “चुनाव बहुत मायने में स्थानीय बन गया है और हमें यह समझना होगा।”

कांग्रेस को मध्यप्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। कमलनाथ का आरोप है कि भाजपा पूर्व में किए अपने वादों को पूरा करने में विफल रही है।

पार्टी के प्रदेश प्रमुख के तौर पर अपनी नियुक्ति के संबंध मे कमलनाथ ने कहा, “मेरे सभी से अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए मेरे लिए पार्टी में एकता लाना कोई चुनौती नहीं है। मैं भाग्यशाली हूं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टी में पहले से ही एकता है।” उन्होंने पार्टी में सिंधिया के साथ किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया।

कमलनाथ ने कहा कि उनका मुकाबला अभी वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज से है।

–आईएएनएस

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