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अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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Bhim-Rao-Ambedkar

कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

ओपिनियन

विफल होते क़ानूनों की वजह से ख़तरे में लोकतंत्र

बीते चार सालों में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की दो अहम विशेषताओं का पतन हुआ है। पहला, क़ानून के सर्वोपरि होने की धारणा पर हमले हुए हैं। दूसरा, क़ानूनी प्रक्रिया का सियासी मक़सद के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है।

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Kapil Sibal

संवैधानिक लोकतंत्र के दो अनिवार्य अंग हैं। पहला, इंसान नहीं, बल्कि क़ानून सर्वोपरि है। दूसरा, हरेक निर्वाचित प्रतिनिधि की सम्प्रभुता उन संस्थाओं की हैसियत से ऊपर है जो चुनाव से स्थापित नहीं होते। संवैधानिक लोकतंत्र में क़ानून का दर्ज़ा सबसे ऊपर है। यही संविधान की बुनियादी धारणा है। विधायिका किसी क़ानून के ज़रिये इसमें कटौती नहीं कर सकती। यदि विधायिका कभी ऐसा करे भी तो अदालतें ये सुनिश्चित करती हैं कि क़ानून ही सर्वोपरि है। निर्वाचित संस्थाएँ, संविधान के दायरे में ही अपना काम करती हैं और संविधान के मुताबिक़ ही समय-समय पर जनता के प्रति उनकी जबाबदेही तय होती है।

बीते चार सालों में हमारे संवैधानिक लोकतंत्र की दो अहम विशेषताओं का पतन हुआ है। पहला, क़ानून के सर्वोपरि होने की धारणा पर हमले हुए हैं। दूसरा, क़ानूनी प्रक्रिया का सियासी मक़सद के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। स्थापित प्रक्रिया को दरकिनार किया जा रहा है। जनप्रतिनिधि ही एजेंडा की आवाज़ बन रहे हैं और उन मूल्यों को तहस-नहस कर रहे हैं जो लोकतंत्र की बुनियाद हैं। हमारे कुछ जनप्रतिनिधि और एक ख़ास विचारधारा के लोग न सिर्फ़ हिंसा को उकसाते हैं, बल्कि कई बार उसका हिस्सा भी बनते हैं। संवैधानिक अधिकारों का गला घोटा जाता है। अभिव्यक्ति की आज़ादी इसका शिकार बनती है। लोकतांत्रिक संस्थाएँ अपाहिज़ हो रही हैं।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने 131 मुक़दमों को वापस लेने का ऐलान किया। ये मामले हत्या और हत्या का प्रयास जैसे संगीन अपराधों से जुड़े थे। ये प्रसंग इस बात की मिसाल है कि कुछ लोग क़ानून से भी ऊपर हो सकते हैं। बेशक़, किसी मुक़दमें को लेकर यदि सरकारी वकील को तथ्यों के आधार पर ये लगे कि उसे वापस लेना ही उचित होगा तो अदालत की मंज़ूरी से मुकदमा वापस लिया जा सकता है। लेकिन राजनीतिक मक़सद से, एक ही झटके में 131 मुकदमों को वापस ले लेने का फ़ैसले की कल्पना भी लोकतंत्र में नहीं की जा सकती। हत्या या इसकी कोशिश की वजह तो राजनीतिक हो सकती है, लेकिन हत्या का होना राजनीतिक नहीं हो सकता।

सरकार में बैठे लोगों पर संगीन अपराधों के आरोप हों और अभियोजन की आँखों के सामने ही उसे रफ़ा-दफ़ा कर दिया जाए तो हालात को बेहद चिन्ताजनक समझिए। अभियुक्त नामी-गिरामी लोग हैं। सत्ता से उनकी नज़दीकी को नकारा नहीं जा सकता। मौजूदा दौर में जाँच एजेंसियों के दुरुपयोग करके राजनीतिक विरोधियों को भी निशाना बनाया जा रहा है। एक के बाद एक गवाहों का अपने बयान से मुकर जाना भी क़ानून के राज के लिए बेहद चिन्ताजनक है। जाँच एजेंसियों के सरकारी एजेंट बन जाने से सच का दमन हो रहा है। इसीलिए ज़रूरी है कि संगीन अपराधों के मामलों को सत्ता के नशे से दूर ही रखा जाए और दुर्भावनापूर्ण मुकदमें ठोंककर क़ानूनी प्रक्रिया का दमन नहीं हो।

क़ानूनी प्रक्रिया का पक्षपातपूर्ण हो जाना भी बेहद चिन्ताजनक है। दिन-दहाड़े होने वाले अपराधों की यदि प्रमाणिक जाँच नहीं होगी या जाँच में प्रभावशाली अभियुक्तों को बचाया जाएगा तो क़ानून के राज की गरिमा कैसे बचेगी? सरेआम बर्बरतापूर्वक हुई दलितों की पिटाई, घुड़सवारी करने की वजह से दलित की हत्या कर देना, धार्मिक जुलूसों के ज़रिये हिंसा फैलाना और इसमें पुलिस के शामिल होने पर क़ानून की क्या औक़ात रह जाएगी! हाल ही में हमने देखा कि पश्चिम बंगाल के आसनसोल में एक केन्द्रीय मंत्री ने दिन-दहाड़े लोगों को चमड़ी उधेड़ लेने की धमकी दी। ये बताता है कि देश में क़ानून के राज की धारणा कितनी तबाह हो चुकी है!

बिहार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अलावा कई स्थानों पर फैली हिंसा को अभी-अभी हमने क़रीब से देखा है। उत्तर प्रदेश में सारे नियम-क़ायदों को ताक़ पर रखकर पुलिस ऐसे मुठभेड़ों को अंज़ाम दे रही है, जिससे पता चलता है कि सरकार पर सत्ता का नशा किस क़दर सवार है और वो क़ानून को कितनी अहमियत दे रही है! ये नज़ारा उस सरज़मीं का है जो अपनी सहिष्णुता और आध्यात्म के लिए जाना जाता है। तानाशाही का उल्लंघन करने के लिए डाँडी मार्च का आयोजन किया गया था। लेकिन अभी तो सरकार ही तानाशाह बनकर रोज़ाना संविधान का उल्लंघन कर रही है।

जब क़ानून ही दमन का ज़रिया बन जाता है तो इसकी प्रतिष्ठा गिरती है। जाँच एजेंसियाँ जब कठोर क़ानूनों का दुरुपयोग करती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे किसी राजा के हाथों में तलवार हो! ऐसे दुरुपयोग से आप किसी की भी प्रतिष्ठा को तार-तार कर सकते हैं। बीते चार वर्षों ने हमने ऐसे दुरुपयोग बहुत व्यापक स्तर पर देखे हैं। क़ानून का उद्देश्य है, इंसाफ़ करना। लेकिन इसे तो नाइंसाफ़ी का हथकंडा बना दिया गया है। क़ानून का दुरुपयोग होने की वजह से तमाम लोकतांत्रिक संस्थाएँ लाचार हो जाती हैं। यही वजह है कि हाल ही में कई न्यायिक आदेशों ने अभियोजन पक्ष को दुर्भावनापूर्ण पाकर उसके आरोपों को ख़ारिज़ कर दिया है।

ज़रा सोचिए कि यदि झूठे और दुर्भावनापूर्ण आरोपों की वजह से एक व्यक्ति को 8-10 साल जेल में काटने पड़ें, इसकी उसकी ज़िन्दगी तबाह हो जाए, तब उसे हुए नुकसान की भरपाई कैसे होगी? हुक़ूमत तो इसका ख़ामियाज़ा भरती नहीं! इसीलिए ज़रूरी है कि हमारा लोकतंत्र अपने नागरिकों को क़ानून के दुरुपयोग से होने वाले ज़ुल्म से बचाए।

एक और पहलू भी चिन्ताजनक है। क़ानून सर्वोपरि है। न्यायपालिका इसकी पहरेदार है। लेकिन दुर्भाग्यवश आज न्यायपालिका की प्रक्रिया और उसकी सुचिता पर सरेआम सवाल उठाये जा रहे हैं। न्यायपालिका को भी सामूहिक रूप से ये सुनिश्चित करना होगा कि कोई उसे शक़ की नज़र से न देखे। यदि ऐसा नहीं होगा तो हमारा लोकतंत्र विफल हो जाएगा। इसीलिए न्यायपालिका ने भी कई बार अपनी गम्भीर चिन्ताएँ ज़ाहिर की हैं। इसके बावजूद, सुधारवादी उपाय होते नहीं दिख रहे। जब सत्तासीन लोग न्यायपालिका की स्वतंत्रता के प्रति संवेदनशील नहीं होंगे, तब ये मानकर चलिए कि हमारा संविधान और उसकी व्यवस्थाएँ ख़तरे में हैं। बक़ौल लार्ड डेनिंग, ‘आप चाहे जितने बड़े हों, क़ानून आपसे भी ऊपर है।’ न्यायपालिका को इसी सिद्धान्त के मुताबिक़, निर्भय और निर्भीक होकर अपना काम करना चाहिए। लेकिन हमारे लोकतंत्र में कुछ लोगों ने ये धारणा पाल ली है कि वो क़ानून से भी ऊपर हैं। ऐसे में क़ानून को ही उनकी ग़लतफ़हमी दूर करनी होगी।

हमें उम्मीद का दामन नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि मौजूदा दौर से भी हमारा लोकतंत्र परिपक्व ही होगा। इतिहास में यही दर्ज होगा। एक नागरिक के तौर पर जब तक हम अपने लोकतंत्र को विफल नहीं कर देंगे, तब तक लोकतंत्र भी हमें विफल नहीं होने देगा। क़ानून को उन्हें बौना बनाना होगा जो हमारे लोकतंत्र की बुनियाद पर हमले कर रहे हैं।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस। लेखक, वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

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ओपिनियन

उप्र के उपचुनाव में सपा-बसपा ‘तालमेल’ का लिटमस टेस्ट

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Yogo Adityanath

पूर्वोत्तर के त्रिपुरा व नगालैंड में विधानसभा चुनाव में जीत के बाद अब मोदी लहर की परीक्षा उत्तर प्रदेश में दो प्रमुख लोकसभा क्षेत्रों- गोरखपुर और फूलपुर में 11 मार्च को होने जा रहे उपचुनाव में होगी। वर्ष 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बीच जो तालमेल हुआ है, उपचुनाव में उसका लिटमस टेस्ट भी होगा।

बसपा प्रमुख मायावती ने इसे ‘गठबंधन’ नहीं बल्कि वोट-शेयर के लिए तालमेल कहा है और समर्थन देने की बात कही है। साथ ही कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे जीतने वाले गैर-भाजपा उम्मीदवारों के लिए काम करें।

वर्ष 1993 में मुलायम सिंह और कांशीराम ने मिलकर रामलहर को रोकने में तो सफलता हासिल कर ली थी लेकिन क्या अब माया व अखिलेश मिलकर मोदी लहर को रोकने में कामयाब होंगे?

हालांकि वर्ष 1993 में राम लहर के दौरान जब मुलायम और कांशीराम ने गठबंधन किया था, तब सियासत का रुख अलग था और दोनों चेहरों की चमक भी अलग थी। तब के दौर में मंडल आयोग ने ओबीसी वोटरों को एकजुट किया था और मुलायम सिंह उप्र में उनका निर्विवाद चेहरा थे। इसीलिए यह जातीय गठजोड़ रामलहर को रोकने में कामयाब हो गया था।

अखिलेश यादव और मायावती के लिए परिस्थतियां अलग हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा का जहां खाता नहीं खुला था, वहीं अखिलेश की पार्टी केवल परिवार की सीटें ही बचाने में कामयाब हो पाई। इसके बाद 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में एकबार फिर मोदीलहर चली और भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला। सपा-बसपा को एक बार फिर करारी हार का सामना करना पड़ा।

दोनों परिस्थतियों में अंतर यह भी है कि तब मुलायम-कांशीराम के साथ ओबीसी तबके की उम्मीदें जुड़ी थीं, लेकिन बदलते परिवेश में अखिलेश-मायावती के सामने ओबीसी की उम्मीदें टूटती दिखाई दे रही हैं और दोनों नेता सियासत के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं।

मायावती इस गठबंधन को लेकर हालांकि जल्दबाजी के मूड में नहीं दिखाई दे रही हैं और इस गठबंधन को फिलहाल राज्यसभा चुनाव और लोकसभा उपचुनाव तक ही सीमित रखना चाहती हैं।

उन्होंने कहा, “लोकसभा चुनाव से इस गठबंधन का कोई लेना-देना नहीं है। उपचुनाव में भाजपा को रोकने के लिए सपा ने बसपा और बसपा ने सपा को समर्थन देने का फैसला किया है।”

हालांकि सपा-बसपा के बीच उपचुनाव में गठबंधन की अटकलें काफी लंबे समय से चल रही थीं और रविवार को इसकी घोषणा बसपा की ओर से किया गया। हालांकि इसमें दिलचस्प पहलू यह है कि कांग्रेस इस गठबंधन से बाहर है। लेकिन कांग्रेस के सूत्र बताते हैं कि अंत में कांग्रेस भी इस गठबंधन के साथ जुड़ सकती है।

सपा के सूत्र बताते हैं कि इस गठबंधन के पीछे हालांकि राज्यसभा और विधान परिषद सीटों पर होने वाले चुनाव को लेकर सपा-बसपा की साझी रणनीति भी है। सपा ने बसपा को राज्यसभा चुनाव में समर्थन देने और इसके बदले बसपा ने विधान परिषद चुनाव में बसपा को समर्थन देने का समझौता किया है।

गठबंधन को लेकर सपा के राष्टीय उपाध्यक्ष किरणमय नंदा ने कहा, “सपा और बसपा के एक होने से गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव में सांप्रदायिक ताकतें पराजित होंगी। भाजपा दोनों उपचुनाव हारने जा रही है। फूलपुर चुनाव लोकसभा चुनाव 2019 की दशा और दिशा तय करेगा।”

हालांकि उप्र और केंद्र की सत्ता पर काबिज भारतीय जनता पार्टी ने इन खतरों से निपटने की तैयारी कर ली है। गोरखपुर में जहां मुख्यमंत्री योगी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है, वहीं फूलपुर उपचुनाव में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने पार्टी की जीत के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उपचुनाव को लेकर हुए इस गठबंधन को सिरे से खारिज किया है। भाजपा के प्रदेश महासचिव विजय बहादुर पाठक ने कहा, “यह एक बेमेल और स्वार्थ में किया गया गठबंधन है। जनता इसको ज्यादा तवज्जो नहीं देगी। भाजपा पॉलिटिक्स ऑफ परफार्मेस की बात करती है, जबकि ये लोग स्वार्थ की बात कर रहे हैं। जनता इनसे जवाब मांग रही है कि आखिर वो भाजपा को वोट क्यों न दें। इसका जवाब इनके पास नहीं है।”

भाजपा को वोट क्यों न दें, इसका सही जवाब हालांकि राजस्थान और मध्य प्रदेश में हाल के उपचुनावों में मतदाता भाजपा को दे चुकी है, अब उत्तर प्रदेश की बारी है।

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ओपिनियन

बैंकों को लग चुकी 36 हजार करोड़ रुपये की चपत

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देश के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को कई हजार करोड़ों का चूना लगाने वालों में हीरा कारोबारी नीरव मोदी, शराब कारोबारी विजय माल्या, मेहुल चौकसी और विक्रम कोठारी जैसे बड़े कारोबारी ही शामिल नहीं है बल्कि आईआईएम बेंगलुरू के एक अध्ययन के मुताबिक 2012 से 2016 बैंकों में जमा जनता की गाढ़ी कमाई के 22,743 करोड़ रुपये धोखेबाज उड़ा ले गए हैं।

इसमें हाल के घोटाले की राशि को शामिल कर लिया जाए तो यहां आंकड़ा 36 हजार करोड़ से ऊपर पहुंच जाता है।

केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने संसद में भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा था कि पिछले साल 21 दिसंबर तक बैंकों के साथ धोखाधड़ी के 25,600 मामले सामने आए, जिनमें बैंकों को करीब 179 अरब रुपये की चपत लगाई गई।

आंकड़ों के मुताबिक, 2017 वित्तीय वर्ष के पहले नौ महीनों में बैंकों के साथ एक लाख या इससे ज्यादा राशि की धोखाधड़ी के करीब 455 मामले आईसीआईसीआई बैंक में, 429 मामले भारतीय स्टेट बैंक में, 244 मामले स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक में और 237 मामले एचडीएफसी बैंक में सामने आए।

वहीं, अप्रैल से दिसंबर 2016 के दौरान बैंकों से धोखाधड़ी करने के 3500 से ज्यादा मामले सामने आए थे।

बैंकों के साथ धोखाधड़ी में बैंक कर्मी भी शामिल पाए गए हैं। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने 2011 में खुलासा किया था कि बैंक ऑफ महाराष्ट्र, ओरियंटल बैंक ऑफ कामर्स और आईडीबीआई जैसे बैंकों के कर्मियों ने करीब 10 हजार फर्जी खाते खोले और 15 हजार करोड़ रुपये के ऋण जारी किए।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2014 में भी बैंकों के साथ धोखाधड़ी के मामले सामने आए थे जब मुंबई पुलिस ने 700 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में नौ प्राथमिकी दर्ज की थी, इसी वर्ष इलोक्ट्रोथर्म इंडिया कंपनी सेंट्रल बैंक को 436 करोड़ रुपये का भुगतान करने में नाकाम रही थी। इसके अलावा कोलकाता के उद्यमी बिपिन वोहरा ने कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के सहारे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया से 140 करोड़ रुपये हासिल किए थे।

आईआईएन बेंगलुरू के अध्ययन के मुताबिक, 2015 में जैन इंफ्राप्रोजेक्ट के कर्मचारियों ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को करीब 200 करोड़ रुपये का चूना लगाया था। हैरत की बात यह है कि इसी वर्ष विभिन्न बैंक के कर्मचारी नकली हांगकांग कॉरपोरेशन बनाकर धोखाधड़ी में लिप्त पाए गए थे। इन लोगों ने मिलकर बैंक को करीब 600 करोड़ रुपये का चूना लगाया था।

अध्ययन में कहा गया, “2016 में सिंडिकेट बैंक धोखाधड़ी का मामले सबसे बड़े मामलों में से एक हैं, जिसमें चार लोगों ने मिलकर करीब 380 खाते खोले और फर्जी चेक, एलआईसी पॉलिसी और लेटर ऑफ अंडरस्टेंडिंग (एलओयू) के माध्यम से बैंक को करीब 10 अरब रुपये का घाटा पहुंचाया।”

फर्जी लेटर ऑफ अंडरस्टेंडिंग (एलओयू) के बारे में बताते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर और विख्यात अर्थशास्त्री डॉ. विजय कौल ने आईएएनएस को बताया, “एलओयू किसी भी कारोबारी की कंपनी और उसके क्रेडिट स्कोर को देख कर बैंक की ओर से जारी किए जाते हैं और नीरव मोदी समेत सभी बड़े कारोबारियों को बैंक के अधिकारियों ने ही जारी किए। मगर, कारोबारियों ने बैंक के अधिकारियों को पैसा खिलाकर एलओयू हासिल किए जिसके परिणाम हमारे सामने हैं।”

उन्होंने कहा, “बैंकिंग प्रणाली हमेशा विश्वास पर चलती है लेकिन यहां कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए जालसाजी करके बैंकों को चूना लगाया।”

बैंकों के साथ धोखाधड़ी मामले में सबसे अहम खुलासा तब हुआ जब 2017 में शराब कारोबारी और किंगफिशर विमानन कंपनी के मालिक विजय माल्या ने आईडीबीआई और दूसरे बैंकों को करीब 9,500 करोड़ रुपये का चूना लगाया और देश से भाग निकले। इसी वर्ष भारत की दूसरी कंपनी विनसम डायमंड सुर्खियों में आई। इस कंपनी पर करीब सात हजार करोड़ रुपये की देनदारी का मामला है। सीबीआई ने समूह के खिलाफ छह एफआईआर दर्ज की।

इसके अलावा डक्कन क्रॉनिकल ने बैंकों को करीब 11.61 अरब करोड़ रुपये का नुकसान पहुंचाया। वहीं 2017 में कोलकाता के बिजनेस टाइकून निलेश पारिख को कम से कम 20 बैंकों को 22.23 अरब रुपये का नुकसान पहुंचाने के लिए गिरफ्तार किया गया था।

वर्ष 2018 में हीरा कारोबारी नीरव मोदी ने पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) को करीब 11,450 करोड़ रुपया का चूना लगाया। मोदी ने पीएनबी के अलावा 17 अन्य बैंकों से करीब तीन हजार करोड़ रुपये का ऋण ले रखा था। बता दें कि मोदी को पीएनबी ने करीब 150 एलओयू जारी किए थे।

यह पूछने पर कि हीरा, शराब और जेम्स कारोबारियों द्वारा बैंकों के साथ धोखाधड़ी कर विदेश भाग जाने से देश की जनता पर बैंकों के प्रति कैसा प्रभाव पड़ेगा, उन्होंने कहा कि लोगों को पता है कि उनका पैसा सरकारी बैंकों में है और उसके पीछे सरकार का समर्थन है जिससे उन्हें डरने की जरूरत नहीं है। इनके भागने से उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

उन्होंने कहा, “हां, लेकिन यह बैंकों के निजीकरण की मांग कर रहे लोगों के लिए जरूर एक बहुत बड़ा धक्का है क्योंकि अगर यहां भी अमेरिका जैसे विकसित देश की तरह बैंकों का निजीकरण हो जाएगा तो जैसा हाल (आर्थिक संकट)वहां 2007 में हुआ था ठीक वैसा ही भारत में देखने को मिलता।”

निवेश को इच्छुक विदेशी कारोबारी के मन नें इन घोटालों के कारण भारत की छवि के बारे में अर्थशास्त्री विजय कौल ने कहा, “निवेशक के मन में भारत की छवि को लेकर इन घोटालों का ज्यादा असर नहीं पड़ेगा क्योंकि उन्हें यहां के हालात की जानकारी है और उन्हें पता है कि कहां निवेश करना बेहतर रहेगा।”

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