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ओपिनियन

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’

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ये किसी से छिपा नहीं है कि संघियों को और ख़ासकर मोदी सरकार तथा बीजेपी के नेताओं को ‘बदज़ुबानी’ का कितना प्रचंड संक्रमण है! 2014 के बाद से तो इस भगवा संक्रमण ने दमघोटू महामारी का रूप ले लिया! इससे भी ज़्यादा ताज़्ज़ुब की बात तो ये रहा कि शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ख़ुद इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी के सबसे गम्भीर मरीज़ हैं। इसीलिए मोदी की ज़ुबान आये दिन लपलपाती रहती है। उनके रोग का लक्षण चुनाव सभाओं में इतना उग्र रूप धारण कर लेता है कि उन्हें पहचानना तक मुश्किल हो जाता है। लेकिन अक्सर चुनाव के बाद मोदी की ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी का ज्वार कुछ अरसे के लिए शान्त भी पड़ने लगता है।

मोदी की एक और विशेषता है! उन्हें विरोधियों के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अपने सहयोगियों के नितान्त मूर्खतापूर्ण बयान की अनदेखी करने में भी महारथ हासिल है। वैसे भी गिरगिट की तरह रंग बदलने में नेताओं की पूरी कूँ पूरी बिरादरी का ही कोई जबाब नहीं होता, लेकिन प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ नरेन्द्र मोदी में जैसा गिरगिटिया कौशल है, वैसे बीते 70 सालों में पहले कभी किसी और प्रधानमंत्री में नहीं नज़र आया। मोदी की ये ऐसी अद्भुत पहचान है। इसका ज़िक्र उस दौर में भी होता रहेगा, जब मोदी कहीं के नहीं होंगे! दरअसल, इतिहास ने हमेशा प्रमुख हस्तियों को उनके ऐसे कामों के लिए याद रखा है, जिसने जनमानस पर अच्छी या ख़राब, लेकिन गहरी छाप छोड़ी हो। इस लिहाज़ से मोदी काल को इतिहास, ‘बदज़ुबानी युग’ के रूप में ही याद रखेगा, क्योंकि नीयतख़ोर नेताओं को ये संसार उनके कुकर्मों के लिए ही याद रखता है।

गुजरात के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने मनमोहन सिंह और अन्य काँग्रेसियों को पाकिस्तान परस्त राष्ट्रद्रोही या देश का दुःखचिन्तक करार दिया। मोदी ने यहाँ तक कहा कि काँग्रेस, गुजरात को जीतने के लिए और अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सीमापार पाकिस्तान के साथ मिलकर साज़िश कर रही है।

इससे पहले मोदी ने मणिशंकर अय्यर के बयान को बड़ी चतुराई से तोड़-मरोड़कर पेश किया। ‘नीच’ आचरण, ‘नीच’ सोच, ‘नीच’ विचार, ‘नीच’ नज़रिया जैसी बातों को मोदी ने ‘नीच’ जाति में बदल दिया। इसीलिए जब मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी जैसे शीर्ष संवैधानिक पदों पर रहे नेताओं के लिए अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर नरेन्द्र मोदी ने माफ़ी नहीं माँगी तो संसद के मौजूदा सत्र का पहिया जाम होने लगा।

संसद में अपनी छीछालेदर करवाने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर शर्मिन्दगी नहीं ज़ाहिर की, बल्कि अपनी पार्टी की ओर से सिर्फ़ ये बयान दिलाना मुनासिब समझा कि बीजेपी, मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी के संसदीय योगदान का आदर करती है। हालाँकि, ये कहना अनावश्यक है कि मनमोहन सिंह के लिए ‘देहाती औरत’, ‘रेनकोट पहनकर नहाने वाला’, ‘मौन-मोहन’ वग़ैरह कैसी-कैसी बातें कह चुके नरेन्द्र मोदी के ज़ुबान की लपलपाहट यहीं ख़त्म नहीं होने वाली! इसीलिए मनमोहन सिंह को पाकिस्तान परस्त बताने के बाद तो काँग्रेस ने मोदी को ललकार दिया कि वो राष्ट्रविरोधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करके ख़ुद राष्ट्रविरोधी आचरण कर रही है। उधर, मोदी का भी कहना रहा है कि काँग्रेसियों ने उन्हें ख़ून का सौदागर, चायवाला, ‘नीच’ वगैरह क्या-क्या नहीं कहा!

कह तो मोदी भी सही रहे हैं। भारतीय राजनीति ने तमाम स्तरहीन बयान देखे हैं, कोई भी पार्टी इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी से अछूती नहीं है। लेकिन अनाप-शनाप बोलने वालों की जितनी तादाद बीजेपी में है और वो जितनी ज़हरीली बातें करते हैं, उसे देश की कोई भी अन्य पार्टी टक्कर नहीं दे सकती! लेकिन ‘मैं अच्छा और तुम ख़राब’ करते-करते अब तो मोदी सरकार के मंत्रियों ने उस संविधान की ही धज़्ज़ियाँ उड़ाना शुरू कर दिया, जिसकी शपथ लेकर वो मंत्री बने हैं। केन्द्रीय कौशल विकास राज्‍यमंत्री अनन्त कुमार हेगड़े ने तो यहाँ तक कह दिया कि बीजेपी संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को ही उखाड़ फेंकेगी।

दरअसल, अगला चुनाव कर्नाटक विधानसभा का है। हेगड़े, कर्नाटक से ही आते हैं। वहाँ बीजेपी को हिन्दुओं के उन्मादी ध्रुवीकरण से बहुत बड़ा आसरा है। इसीलिए हेगड़े ने उन लोगों के तन-बदन में आग लगाने की सोची, जो संघियों के हिन्दुत्व को हमेशा से सिरे से ख़ारिज़ करते रहे हैं। तभी तो हेगड़े ने कहा कि “अगर आप कहते हैं कि मैं एक मुस्लिम, ईसाई, लिंगायत, ब्राह्मण या हिन्दू हूँ तो ऐसे में हम अपने धर्म और जाति से जुड़े होने पर गर्व महसूस करते हैं। लेकिन ये सेक्युलर कौन लोग हैं? इनका कोई माई-बाप नहीं होता। जो लोग ख़ुद को सेक्युलर कहते हैं, वो नहीं जानते कि उनका ख़ून क्या है? हाँ, संविधान ये अधिकार देता है कि हम ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहें, लेकिन संविधान में कई बार संशोधन हो चुके हैं। हम भी उसमें संशोधन करेंगे। हम सत्ता में इसीलिए आये हैं।”

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’ वैसे तो संघियों का सेक्युलरों से बैर उतना ही पुराना है, जितना पुराना ख़ुद संघ है। लेकिन संविधान की शपथ लेकर मंत्री बनने वाले किसी भी धूर्त को संविधान का अनादर करके पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। ऐसे मंत्री को मूर्ख नहीं तो फिर और क्या कहेंगे जिसे इतना भी पता नहीं कि बीजेपी को चाहे जितना बड़ा बहुमत मिल जाए, वो तो क्या, कोई भी दूसरी पार्टी संविधान के मूल ढाँचे को चाहकर भी नहीं बदल सकती।

संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट कई बार स्थापित कर चुका है कि ‘धर्मनिरपेक्षता’, भारतीय संविधान की बुनियादी अवधारणा है और कोई भी संशोधन, संविधान की मूल भावना को नहीं बदल सकता। इसीलिए जब संसद में विपक्ष ने हेगड़े को अपने बयान के लिए माफ़ी माँगने या फिर उन्हें मंत्री पद से हटाने की माँग गरमायी तो ‘संविधान बदलने के लिए सत्ता में आयी बीजेपी’ का ख़म ठोंकने वाले अनन्त हेगड़े को थूककर चाटना पड़ा। उन्होंने कथित सफ़ाई भी दी कि “मैं सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ कि मोदी जी और हमारी सरकार देश के संविधान और बाबा साहेब के आदर्शों को लेकर प्रतिबद्ध है।”

हेगड़े के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर कोहराम मचना ही था। मचा भी। क्योंकि भारतवर्ष में आज भी बहुसंख्यक लोग सेक्युलर हैं। उन्हें सेक्युलर होने पर गर्व है। ये वो लोग नहीं हैं जो किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता हों। अब यदि मोदी सरकार का कोई मंत्री इन सेक्युलरों की वल्दियत पर सवाल उठाकर उन्हें हरामी बताना चाहेगा तो इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

वैसे नेताओं की ‘बदज़ुबानी’ भी एक क्रमागत प्रक्रिया से ही विकसित होती है। याद है ना कि केन्द्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ‘मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते तो उन्हें टिकट क्यों दें!’ लेकिन इससे एक क़दम आगे बढ़कर मध्य प्रदेश के सहकारिता राज्यमंत्री विश्वास सारंग ने बोल दिया कि ‘भाजपा को वोट न देने वाला पाकिस्तानी है!’ अब ज़रा सोचिए कि सार्वजनिक जीवन में क़मीनेपन की क्या सीमा होनी चाहिए? क्या 2014 में बीजेपी को वोट नहीं देने वाले 69 फ़ीसदी लोग पाकिस्तानी हैं? फिर राष्ट्रीयता का सर्टिफ़िकेट जारी करने का अधिकार आख़िरकार संघियों को मिल कहाँ से गया?

सबसे बड़ा और विचारनीय प्रश्न यही है। भारत को बचाना है तो ऐसी मानसिकता को उखाड़ फेंकना होगा, जिसमें सेक्युलर लोगों को हरामी और बीजेपी को वोट नहीं देने वालों को पाकिस्तानी कहने वालों की ज़ुबान बन्द की जा सके! वर्ना, ‘बदज़ुबानी’ का सिलसिला थमने वाला नहीं है और यही प्रवृत्ति हमें व्यापक हिंसा और अराजकता की ओर ढकेले बिना नहीं मानेगी!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनका निजी विचार है)

ओपिनियन

संशय भरे आधुनिक युग में हिंदू आदर्श धर्म : थरूर

वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।

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न्यूयॉर्क, 21 सितंबर | कांग्रेस सांसद व लेखक शशि थरूर के अनुसार, हिंदू एक अनोखा धर्म है और यह संशय के मौजूदा दौर के लिए अनुकूल है। थरूर ने धर्म के राजनीतिकरण की बखिया भी उधेड़ी।

न्यूयॉर्क में जयपुर साहित्य महोत्सव के एक संस्करण में के बातचीत सत्र के दौरान गुरुवार को थरूर ने कहा, “हिंदूधर्म इस तथ्य पर निर्भर करता है कि कई सारी बातें ऐसी हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते हैं।”

मौजूदा दौर में इसके अनुकूल होने को लेकर उन्होंने कहा, “पहली बात यह अनोखा तथ्य है कि अनिश्चितता व संशय के युग में आपके पास एक विलक्षण प्रकार का धर्म है जिसमें संशय का विशेष लाभ है।”

सृजन के संबंध में उन्होंने कहा, “ऋग्वेद वस्तुत: बताता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति कहां से हुई, किसने आकाश और धरती सबको बनाया, शायद स्वर्ग में वह जानता हो या नहीं भी जानता हो।”

उन्होंने कहा, “वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।”

उन्होंने कहा, “उससे भी बढ़कर आपके पास असाधारण दर्शनग्रहण है और चूंकि कोई नहीं जानता कि भगवान किस तरह दिखते हैं इसलिए हिंदूधर्म में हर कोई भगवान की कल्पना करने को लेकर स्वतंत्र है।”

कांग्रस सांसद और ‘व्हाइ आई एम हिंदू’ के लेखक ने उन लोगों का मसला उठाया जो स्त्री-द्वेष और भेदभाव आधारित धर्म की निंदा करते हैं।

मनु की आचार संहिता के बारे में उन्होंने कहा, “इस बात के बहुत कम साक्ष्य हैं। क्या उसका पालन किया गया और इसके अनेक सूत्र विद्यमान हैं।”

उन्होंने उपहास करते हुए कहा, “इन सूत्रों में मुझे नहीं लगता कि हर हिंदू कामसूत्र की भी सलाह मानते हैं।”

थरूर ने कहा, “प्रत्येक स्त्री विरोधी या जातीयता कथन (हिंदू धर्मग्रंथ में) के लिए मैं आपको समान रूप से पवित्र ग्रंथ दे सकता हूं, जिसमें जातीयता के विरुद्ध उपदेश दिया गया है।”

–आईएएनएस

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ओपिनियन

जानिये क्यों गिर रहा है रुपया

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नई दिल्ली, 13 सितम्बर | केंद्र सरकार ने रुपये की गिरावट को थामने की हरसंभव कोशिश करने का भरोसा दिलाया है। इसका असर पिछले सत्र में तत्काल देखने को मिला कि डॉलर के मुकाबले रुपये में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। हालांकि रुपये में और रिकवरी की अभी दरकार है।

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर तक लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को 72.69 पर बंद हुआ था।

रुपये की गिरावट से अभिप्राय डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आना है। सरल भाषा में कहें तो इस साल जनवरी में जहां एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे वहां अब 72 रुपये देने होते हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।

शेष दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए प्राय: डॉलर की जरूरत होती है ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर देशी मुद्रा कमजोर होती है।

एंजेल ब्रोकिंग के करेंसी एनालिस्ट अनुज गुप्ता ने रुपये में आई हालिया गिरावट पर कहा, “भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। वहीं, विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश में कटौती करने से देश से डॉलर का आउट फ्लो यानी बहिगार्मी प्रवाह बढ़ गया है। इससे डॉलर की आपूर्ति घट गई है।”

उन्होंने बताया कि आयात ज्यादा होने और निर्यात कम होने से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है, जोकि रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खाते का घाटा तकरीबन 18 अरब डॉलर हो गया है। जुलाई में भारत का आयात बिल 43.79 अरब डॉलर और निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा।

वहीं, विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार घटता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह को 1.19 अरब डॉलर घटकर 400.10 अरब डॉलर रह गया।

गुप्ता बताते हैं, “राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से भी रुपये में कमजोरी आई है। आर्थिक विकास के आंकड़े कमजोर रहने की आशंकाओं का भी असर है कि देशी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है। जबकि विश्व व्यापार जंग के तनाव में दुनिया की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती के संकेत मिल रहे हैं जिससे डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती आने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल कर ले जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक हितों के टकराव के कारण अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुई व्यापारिक जंग से वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।

–आईएएनएस

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OPINION: झूठ के नशेड़ी, जन्मपत्री और ईवीएम

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‘बीजेपी 50 साल तक सत्ता में रहेगी!’ अमित शाह ने ये शिगूफ़ा छोड़ते ही नरेन्द्र मोदी के कान में फुसफुसाया कि ‘साहब, आपकी हिदायत के मुताबिक मैंने 50 साल का जुमला फेंक तो दिया, लेकिन बेहद दुःख के साथ आपको बता रहा हूँ कि 2019 में आपका पतन तय है। लोकसभा चुनाव आप हारने वाले हो!’

ये सुनकर मोदी ऐसे मुस्कुराने लगे जैसे वो अमित भाई से कहना चाहते हों कि ‘बचपना छोड़ो! अच्छा बताओ, तुम्हें कैसे लगा रहा है कि 2019 में हमलोग हारने वाले हैं?’

रुआँसा होकर अमित शाह ने बताया कि ‘मुझे दुनिया के दर्जनों जाने-माने ज्योतिषियों ने आपकी जन्मपत्री देखकर बताया है!’

इतना सुनते ही मोदी ठहाका लगा बैठे तो अमित शाह ने हैरानी से पूछा कि ‘इसमें हँसने की क्या बात है?’

मोदी बोले, ‘अरे अमित भाई, भक्तों को मूर्ख बनाते-बनाते, उनमें झूठ पर झूठ फैलाते-फैलाते अब तुम भी मूर्ख हो चुके हो!’

फिर मोदी ने बताया कि अरे, जिसका…

  • जन्मदिन झूठा
  • चाय बेचने की कहानी झूठी
  • अविवाहित होने का दावा झूठा
  • सारी डिग्रियाँ झूठी
  • कालाधन लाने का दावा झूठा
  • गंगा सफ़ाई का वादा झूठा
  • गोरक्षा का नारा झूठा
  • राम मन्दिर बनाने का वादा झूठा
  • पाकिस्तान को उसकी भाषा में जवाब देने की बात झूठी
  • सालाना दो करोड़ रोज़गार का वादा झूठा
  • महिलाओं को सुरक्षा देने की बात झूठी
  • महँगाई कम करने की बातें झूठीं
  • अच्छे_दिन का नारा झूठा
  • हरेक चुनावी नारा झूठा…

उसके बारे में तुमने ये कैसे मान लिया कि पूरे ब्रह्मांड में कोई ऐसा माई का लाल हो सकता है जो मेरी सही जन्मपत्री बना ले! अरे अमित भाई, मुझे एक सिद्ध ज्योतिषी ने बताया था कि जब तक मैं जनता को झूठे सपने बेचता रहूँगा, जुमलेबाज़ी करता रहूँगा, लम्बी-चौड़ी फेंकता रहूँगा, अपनी ब्रॉन्डिंग पर सारी ताक़त झोंकता रहूँगा, तब तक मेरी सत्ता बनी रहेगी, क्योंकि मैंने भारत के लोगों को झूठ का नशेड़ी बना दिया है! जनता को जब तक अपने झूठ से मूर्ख बनाते रहोगे, तब तक तुम्हारी सत्ता पर कोई संकट नहीं है। इसके अलावा, याद है ना कि हमारे पास ईवीएम है! ये वैसा ही है जैसे फ़िल्म ‘दीवार’ का वो डॉयलॉग कि ‘मेरे पास माँ है!’

Modi Degree

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का निजी और राजनीतिक जीवन भी तरह-तरह के झूठ से ओतप्रोत है। पत्रकार राजीव शुक्ला को सालों पहले दिये गये एक इंटरव्यू के वीडियो में मोदी कहते हैं कि ‘मैं पढ़ा-लिखा नहीं हूँ। मैंने तो दसवीं पास करने के बाद ही घर से भाग गया था।’ तब मोदी ने नहीं बताया कि उन्होंने घर से भागने से पहले चाय भी बेची थी। बाद में प्रधानमंत्री बनने के बाद दुनिया को बताया गया कि मोदी न सिर्फ़ स्नातक हैं वो भी दिल्ली विश्वविद्यालय से, बल्कि उन्होंने गुजरात यूनिवर्सिटी से ‘Entire Political Science’ में एमए भी कर रखा है। इन डिग्रियों के फ़र्ज़ी होने का विवाद गहराया तो अरूण जेटली जैसे शूरमाओं को प्रेस में सफ़ाई देने के लिए आगे आना पड़ा।

इसके बाद, गुजरात के नेता शक्ति सिंह गोहिल ने डंके की चोट पर ख़ुलासा किया था कि नरेन्द्र मोदी के 12 वीं पढ़ाई के लिए एमएन कॉलेज़ में दाख़िला लिया था। तब कॉलेज़ के रज़िस्टर में मोदी की जन्मतिथि 29 अगस्त 1949 लिखी हुई है। जबकि राजनेता के रूप में मोदी का जन्मतिथि 17 सितम्बर 1950 के रूप में पेश किया जाता है।

Modi Degree

गोहिल ने सबूत के रूप में कॉलेज़ के रज़िस्टर की कॉपी भी दिखायी। उन्होंने बताया कि 29 अगस्त 1949 का ही ब्यौरा ही गुजरात विश्वविद्यालय में भी है। तो फिर राजनेता से जुड़े रिकॉर्ड में ये 17 सितम्बर 1950 कैसे हो गया? मोदी की उम्र 13 महीना कैसे सिकुड़ गयी! ये यक्ष प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।

Modi Degree Controversy

पूरे प्रसंग में मज़े की बात ये भी रही कि मोदी को एमए की डिग्री देने वाले गुजरात विश्वविद्यालय के रिकॉर्ड में ये जानकारी नहीं है कि मोदी ने स्नातक यानी ग्रेज़ुएशन कब, कहाँ से और किन-किन विषयों में किया था? गोहिल का कहना है कि विश्वविद्यालय से दर्जनों बार सूचना के अधिकार के तहत मोदी का ब्यौरा माँगा गया, लेकिन हमेशा विश्वविद्यालय ने गोपनीयता के आधार पर जानकारी देने से मना कर दिया। इसीलिए गोहिल ने मोदी पर हमला किया कि वो अपने ऐसे दस सहपाठियों का नाम ही बता दें, जिन्होंने उनके साथ स्नातक किया हो।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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