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ओपिनियन

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’

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ये किसी से छिपा नहीं है कि संघियों को और ख़ासकर मोदी सरकार तथा बीजेपी के नेताओं को ‘बदज़ुबानी’ का कितना प्रचंड संक्रमण है! 2014 के बाद से तो इस भगवा संक्रमण ने दमघोटू महामारी का रूप ले लिया! इससे भी ज़्यादा ताज़्ज़ुब की बात तो ये रहा कि शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ख़ुद इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी के सबसे गम्भीर मरीज़ हैं। इसीलिए मोदी की ज़ुबान आये दिन लपलपाती रहती है। उनके रोग का लक्षण चुनाव सभाओं में इतना उग्र रूप धारण कर लेता है कि उन्हें पहचानना तक मुश्किल हो जाता है। लेकिन अक्सर चुनाव के बाद मोदी की ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी का ज्वार कुछ अरसे के लिए शान्त भी पड़ने लगता है।

मोदी की एक और विशेषता है! उन्हें विरोधियों के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अपने सहयोगियों के नितान्त मूर्खतापूर्ण बयान की अनदेखी करने में भी महारथ हासिल है। वैसे भी गिरगिट की तरह रंग बदलने में नेताओं की पूरी कूँ पूरी बिरादरी का ही कोई जबाब नहीं होता, लेकिन प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ नरेन्द्र मोदी में जैसा गिरगिटिया कौशल है, वैसे बीते 70 सालों में पहले कभी किसी और प्रधानमंत्री में नहीं नज़र आया। मोदी की ये ऐसी अद्भुत पहचान है। इसका ज़िक्र उस दौर में भी होता रहेगा, जब मोदी कहीं के नहीं होंगे! दरअसल, इतिहास ने हमेशा प्रमुख हस्तियों को उनके ऐसे कामों के लिए याद रखा है, जिसने जनमानस पर अच्छी या ख़राब, लेकिन गहरी छाप छोड़ी हो। इस लिहाज़ से मोदी काल को इतिहास, ‘बदज़ुबानी युग’ के रूप में ही याद रखेगा, क्योंकि नीयतख़ोर नेताओं को ये संसार उनके कुकर्मों के लिए ही याद रखता है।

गुजरात के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने मनमोहन सिंह और अन्य काँग्रेसियों को पाकिस्तान परस्त राष्ट्रद्रोही या देश का दुःखचिन्तक करार दिया। मोदी ने यहाँ तक कहा कि काँग्रेस, गुजरात को जीतने के लिए और अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सीमापार पाकिस्तान के साथ मिलकर साज़िश कर रही है।

इससे पहले मोदी ने मणिशंकर अय्यर के बयान को बड़ी चतुराई से तोड़-मरोड़कर पेश किया। ‘नीच’ आचरण, ‘नीच’ सोच, ‘नीच’ विचार, ‘नीच’ नज़रिया जैसी बातों को मोदी ने ‘नीच’ जाति में बदल दिया। इसीलिए जब मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी जैसे शीर्ष संवैधानिक पदों पर रहे नेताओं के लिए अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर नरेन्द्र मोदी ने माफ़ी नहीं माँगी तो संसद के मौजूदा सत्र का पहिया जाम होने लगा।

संसद में अपनी छीछालेदर करवाने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर शर्मिन्दगी नहीं ज़ाहिर की, बल्कि अपनी पार्टी की ओर से सिर्फ़ ये बयान दिलाना मुनासिब समझा कि बीजेपी, मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी के संसदीय योगदान का आदर करती है। हालाँकि, ये कहना अनावश्यक है कि मनमोहन सिंह के लिए ‘देहाती औरत’, ‘रेनकोट पहनकर नहाने वाला’, ‘मौन-मोहन’ वग़ैरह कैसी-कैसी बातें कह चुके नरेन्द्र मोदी के ज़ुबान की लपलपाहट यहीं ख़त्म नहीं होने वाली! इसीलिए मनमोहन सिंह को पाकिस्तान परस्त बताने के बाद तो काँग्रेस ने मोदी को ललकार दिया कि वो राष्ट्रविरोधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करके ख़ुद राष्ट्रविरोधी आचरण कर रही है। उधर, मोदी का भी कहना रहा है कि काँग्रेसियों ने उन्हें ख़ून का सौदागर, चायवाला, ‘नीच’ वगैरह क्या-क्या नहीं कहा!

कह तो मोदी भी सही रहे हैं। भारतीय राजनीति ने तमाम स्तरहीन बयान देखे हैं, कोई भी पार्टी इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी से अछूती नहीं है। लेकिन अनाप-शनाप बोलने वालों की जितनी तादाद बीजेपी में है और वो जितनी ज़हरीली बातें करते हैं, उसे देश की कोई भी अन्य पार्टी टक्कर नहीं दे सकती! लेकिन ‘मैं अच्छा और तुम ख़राब’ करते-करते अब तो मोदी सरकार के मंत्रियों ने उस संविधान की ही धज़्ज़ियाँ उड़ाना शुरू कर दिया, जिसकी शपथ लेकर वो मंत्री बने हैं। केन्द्रीय कौशल विकास राज्‍यमंत्री अनन्त कुमार हेगड़े ने तो यहाँ तक कह दिया कि बीजेपी संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को ही उखाड़ फेंकेगी।

दरअसल, अगला चुनाव कर्नाटक विधानसभा का है। हेगड़े, कर्नाटक से ही आते हैं। वहाँ बीजेपी को हिन्दुओं के उन्मादी ध्रुवीकरण से बहुत बड़ा आसरा है। इसीलिए हेगड़े ने उन लोगों के तन-बदन में आग लगाने की सोची, जो संघियों के हिन्दुत्व को हमेशा से सिरे से ख़ारिज़ करते रहे हैं। तभी तो हेगड़े ने कहा कि “अगर आप कहते हैं कि मैं एक मुस्लिम, ईसाई, लिंगायत, ब्राह्मण या हिन्दू हूँ तो ऐसे में हम अपने धर्म और जाति से जुड़े होने पर गर्व महसूस करते हैं। लेकिन ये सेक्युलर कौन लोग हैं? इनका कोई माई-बाप नहीं होता। जो लोग ख़ुद को सेक्युलर कहते हैं, वो नहीं जानते कि उनका ख़ून क्या है? हाँ, संविधान ये अधिकार देता है कि हम ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहें, लेकिन संविधान में कई बार संशोधन हो चुके हैं। हम भी उसमें संशोधन करेंगे। हम सत्ता में इसीलिए आये हैं।”

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’ वैसे तो संघियों का सेक्युलरों से बैर उतना ही पुराना है, जितना पुराना ख़ुद संघ है। लेकिन संविधान की शपथ लेकर मंत्री बनने वाले किसी भी धूर्त को संविधान का अनादर करके पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। ऐसे मंत्री को मूर्ख नहीं तो फिर और क्या कहेंगे जिसे इतना भी पता नहीं कि बीजेपी को चाहे जितना बड़ा बहुमत मिल जाए, वो तो क्या, कोई भी दूसरी पार्टी संविधान के मूल ढाँचे को चाहकर भी नहीं बदल सकती।

संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट कई बार स्थापित कर चुका है कि ‘धर्मनिरपेक्षता’, भारतीय संविधान की बुनियादी अवधारणा है और कोई भी संशोधन, संविधान की मूल भावना को नहीं बदल सकता। इसीलिए जब संसद में विपक्ष ने हेगड़े को अपने बयान के लिए माफ़ी माँगने या फिर उन्हें मंत्री पद से हटाने की माँग गरमायी तो ‘संविधान बदलने के लिए सत्ता में आयी बीजेपी’ का ख़म ठोंकने वाले अनन्त हेगड़े को थूककर चाटना पड़ा। उन्होंने कथित सफ़ाई भी दी कि “मैं सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ कि मोदी जी और हमारी सरकार देश के संविधान और बाबा साहेब के आदर्शों को लेकर प्रतिबद्ध है।”

हेगड़े के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर कोहराम मचना ही था। मचा भी। क्योंकि भारतवर्ष में आज भी बहुसंख्यक लोग सेक्युलर हैं। उन्हें सेक्युलर होने पर गर्व है। ये वो लोग नहीं हैं जो किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता हों। अब यदि मोदी सरकार का कोई मंत्री इन सेक्युलरों की वल्दियत पर सवाल उठाकर उन्हें हरामी बताना चाहेगा तो इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

वैसे नेताओं की ‘बदज़ुबानी’ भी एक क्रमागत प्रक्रिया से ही विकसित होती है। याद है ना कि केन्द्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ‘मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते तो उन्हें टिकट क्यों दें!’ लेकिन इससे एक क़दम आगे बढ़कर मध्य प्रदेश के सहकारिता राज्यमंत्री विश्वास सारंग ने बोल दिया कि ‘भाजपा को वोट न देने वाला पाकिस्तानी है!’ अब ज़रा सोचिए कि सार्वजनिक जीवन में क़मीनेपन की क्या सीमा होनी चाहिए? क्या 2014 में बीजेपी को वोट नहीं देने वाले 69 फ़ीसदी लोग पाकिस्तानी हैं? फिर राष्ट्रीयता का सर्टिफ़िकेट जारी करने का अधिकार आख़िरकार संघियों को मिल कहाँ से गया?

सबसे बड़ा और विचारनीय प्रश्न यही है। भारत को बचाना है तो ऐसी मानसिकता को उखाड़ फेंकना होगा, जिसमें सेक्युलर लोगों को हरामी और बीजेपी को वोट नहीं देने वालों को पाकिस्तानी कहने वालों की ज़ुबान बन्द की जा सके! वर्ना, ‘बदज़ुबानी’ का सिलसिला थमने वाला नहीं है और यही प्रवृत्ति हमें व्यापक हिंसा और अराजकता की ओर ढकेले बिना नहीं मानेगी!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनका निजी विचार है)

ओपिनियन

प्रणब का मिशन नागपुर लोकतंत्र के लिए कितना सही?

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

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Pranab Mukherjee

नागपुर से प्रणब की जो तस्वीरें देखने को मिलीं, उसे एक कांग्रेस नेता के शब्दों में हजम करना मुश्किल था। जो शख्स धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंगे रहे, जिदंगी के कई साल कांग्रेस पार्टी को दिए और फिर संविधान कायम रखने की जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रपति बने, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे संगठन के प्रमुख के साथ मंच साझा कर रहे थे और उनकी आवभगत का आनंद ले रहे थे। यह उन्हें उन मूल्यों व आदर्शो का समर्थन करता दिखाता है, जिनके विरोध में वे हमेशा खड़े रहे और संघर्ष करते रहे।

मुखर्जी के पहली बार हिंदूवादी संगठन के मुख्यालय में जाने के विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वैचारिक सलाहकार ने मध्यम स्तर के एक कांग्रेस नेता से पूछा, “आप उस सरकार का हिस्सा थे, जिसने 1975 में और फिर 1992 में आरएसएस को प्रतिबंधित किया। क्या आपको नहीं लगता कि आपको हमें बताना चाहिए कि उस समय आरएसएस में क्या बुराई थी, जो अब उसका गुण बन गया है?”

प्रणब की बेटी शर्मिष्ठा सहित कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं ने ऐसे संगठन से मिले निमंत्रण को स्वीकार करने पर सवाल उठाए, जो वामपंथी-उदारवादी- धर्मनिरपेक्षता की स्थापना को नापसंद करता आया है। न सिर्फ समर्पित, बल्कि चिंतित नागरिक भी भी देश में नफरत और पूर्वाग्रह वाले माहौल में अपनी व्यथा जाहिर कर रहे हैं और अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित हमले और सामाजकि रूप से सताए दलितों व पिछड़ों के दमन के लिए आरएसएस और उससे संबद्ध संघ परिवार के संगठनों की विचारधारा को दोषी ठहराते रहे हैं।

कई लोगों ने आवाज उठाई है कि यदि इस तरह से नफरत का जहर फैलाने दिया जाता रहा, तो यह भारत के उस बहुपक्षीय, बहुसंख्यक और बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचना व तानेबाने को खत्म कर सकता है, जो देश को इतना अनोखा व अद्वितीय बनाता है।

कथित रूप से हिंदू राष्ट्रवादी समूहों से संबद्ध कमसिन लड़कियों के खिलाफ क्रूर हिंसा के बाद अप्रैल में देशभर में चलाए गए ‘हैशटैगनॉटइन माइनेम’ विरोध अभियान के दौरान ऐसे संदेश छाए रहे कि “आज हम घृणा की राजनीति का सामना कर रहे हैं जो हमारे देश के बड़े हिस्सों में फैल गया है .. मुसलमान अगले दौर के हमलों के डर के साये में रहते हैं, यहां तक कि संविधान में दलितों और आदिवासियों को जो अधिकार मिले हैं, उस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।”

83 वर्षीय मुखर्जी ने बढ़ते ध्रुवीकरण के इस माहौल में पुराने कैबिनेट और पार्टी के कुछ सहयोगियों की अपील को अनदेखा कर दिया। राष्ट्रीय स्तर पर टेलीविजन पर सीधे प्रसारित भाषण में मुखर्जी ने कहा “भारत की आत्मा बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है” और “धर्मनिरपेक्षता व समावेश हमारे लिए विश्वास का विषय है।”

उन्होंने उस आरएसएस रैंक और फाइल की याद दिलाई, जिन्होंने हिंदू सर्वोच्चवादी विचारधारा का प्रचार किया और जिसके संस्थापक ने मुसलमानों और ईसाइयों को ‘आक्रमणकारी’ माना। यह (विभिन्न धर्म) वह चीज है जिससे “हमारी संस्कृति, विश्वास और भाषा की बहुतायत भारत को विशेष बनाती है” और “धर्मशास्त्र, धर्म, क्षेत्र, घृणा और असहिष्णुता के सिद्धांत व पहचान के आधार पर हमारे राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का कोई प्रयास हमारी राष्ट्रीय पहचान को धूमिल करने का ही काम करेगा।”

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

उनकी सोच की एक झलक उनके भाषण में दिखाई पड़ती है, जिसमें उन्होंने इस बात पर दुख जाहिर किया कि ‘क्रोध की अभिव्यक्ति’ राष्ट्रीय संरचना को पूरी तरह से नष्ट कर रही है। उन्होंने कहा, “बातचीत न केवल प्रतिस्पर्धी हितों को संतुलित करने के लिए, बल्कि उन्हें सुलझाने के लिए भी जरूरी है .. सिर्फ संवाद के माध्यम से हम बिना हमारे राजनीति के भीतर अस्वास्थ्यकर संघर्ष के जटिल समस्याओं को हल करने की समझ विकसित कर सकते हैं।

संवाद और समायोजन लोकतांत्रिक कार्यकलापों के आधारशिला हैं और उनकी अनुपस्थिति अक्सर लोकतंत्र की मौत की घंटी बजती है।

अपनी किताब ‘हाउ डेमोक्रेसीज डाई’ में हार्वर्ड के प्रोफेसरों स्टीवन लेविट्स्की और डेनियल जिबलाट ने आज अमेरिकी लोकतंत्र में मौजूद ‘चरम कट्टरपंथी विभाजन’ के बारे में बात की है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में सामाजिक धारणाओं व मान्यताओं के टूटने को दर्शाता है, यह न सिर्फ डेमोक्रेट और रिपब्लिकन नेताओं के बीच बढ़ते नीतिगत मतभेद में नजर आ रहा है, बल्कि नस्ली और धार्मिक मतभेदों का भी बढ़ना नजर आ रहा है और लोकतंत्र की सुरक्षा रेलिंग को भी नुकसान पहुंच रहा है।

भारत आज भी दोराहे पर खड़ा है, जो शायद 71 साल के इतिहास में अभूतपूर्व है। जैसे ही कोई राष्ट्रीय प्रवचन दिनभर में चर्चा का विषय बन जाता है, सोशल मीडिया पर अक्सर दो चरम विभाजनकारी और नफरत फैलाने वाली विचारधाराओं के बीच ठन जाती है। इससे लोकतंत्र के हिमायती आम नागरिकों, खासकर युवा, जो परिवर्तन और प्रगति के लिए उत्सुक हैं, उन्हें निराशा हाथ लगती है।

देश में हाल के चुनावों में बुरी स्थिति देखने को मिली है। न सिर्फ शपथ ग्रहण करने वाले राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच, बल्कि विचारधाराओं के बीच भी विरोध देखने को मिला है जो मूल रूप से उनके राष्ट्रीय दृष्टिकोण में भी एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत है।

और शायद यही कारण है कि मुखर्जी ने महसूस किया कि उन्हें राष्ट्रीय भाषण में विचारों में गहराती खाई को पाटने के लिए आगे आना होगा और संवाद के लिए आग्रह करना होगा।

द इकोनॉमिस्ट ने अपने हालिया स्तंभों में से एक में प्यू ग्लोबल सर्वेक्षण का जिक्र करते हुए कहा, “यह शायद अप्रियकर हो सकता है, भारत की राजनीतिक व्यवस्था को शायद बड़ी उपलब्धियों के साथ श्रेय दिया जा सके।” सर्वेक्षण में पाया गया कि किसी अन्य लोकतांत्रिक देशों के नागरिकों के मुकाबले भारतीय लोग लोकतंत्र को लेकर कम उत्साहित हैं और मजबूत नेता चाहने या सैन्य शासन की ओर ज्यादा आकर्षित हैं।

लोकतंत्र ने एक विशाल और लगभग असंभव रूप से विविधता वाले देश को एकजुट रखने में मदद की है। इसने सेना को सत्ता से बाहर रखा है और इसने नागरिक स्वतंत्रता को बरकरार रखा है। भारत अपनी लचीली व्यवस्था के कारण ही कई पड़ोसियों के लिए ईष्र्या का विषय बना हुआ है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

मप्र : विधानसभा चुनाव में निर्णायक होंगे फर्जी मतदाता

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भोपाल, 4 जून | मध्य प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसे लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग के यहां शिकायत दर्ज कराई है। कांग्रेस ने 60 लाख फर्जी मतदाता होने का दावा किया है।

फर्जी मतदाताओं का सबसे पहला और बड़ा खुलासा तो इसी साल के फरवरी माह में शिवपुरी के कोलारस और अशोकनगर के मुंगावली में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान हुआ था। आगामी चुनाव में राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता सजग व सर्तक रहे तो चुनाव के नतीजों में बड़े बदलाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

पिछले माह की नौ मई को आईएएनएस ने सिर्फ शिवपुरी जिले में 60 हजार फर्जी मतदाताओं का खुलासा किया था। इनमें से 21,000 मतदाता ऐसे थे, जिनकी वषरें पहले मौत हो चुकी थी।

इस सूची में 28,067 मतदाता ऐसे हैं, जो दूसरी जगह चले गए, फिर भी सूची में उनके नाम हैं। जिले में अपने स्थान पर अनुपस्थित पाए गए मतदाताओं की संख्या 5,633, और एक से ज्यादा स्थानों पर 5,031 मतदाताओं के नाम पाए गए थे।

गौरतलब है कि फरवरी माह में कोलारस विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी यह बात सामने आई थी कि 5,537 मृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद थे। शिकायत के बाद शिवपुरी के तत्कालीन जिलाधिकारी तरुण राठी को इस मामले में चुनाव आयोग ने लापरवाही का दोषी पाया था।

आयोग ने जांच में पाया था कि जिलाधिकारी तरुण राठी ने सूची में गड़बड़ी पर सही मॉनिटरिंग नहीं की। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह को पत्र भी लिखा था। बाद में राठी का तबादला कर दिया गया।

ऐसे में सवाल उठा कि जब शिवपुरी जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में 60,000 फर्जी मतदाता अर्थात औसतन एक विधानसभा में 12,000 फर्जी मतदाता हो सकते हैं, तो प्रदेश के 230 विधानसभा क्षेत्रों का क्या हाल होगा। इसी आधार पर कांग्रेस ने विधानसभा की 100 सीटों पर मतदाताओं की स्थिति का पता लगाया, जिसमें औसत तौर पर एक बात सामने आई कि राज्य में 6000,000 फर्जी मतदाता हैं। एक मतदाता की 10 से 20 मतदान केंद्रों की सूची में नाम और तस्वीरें हैं।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा अन्य नेताओं ने चुनाव आयोग को शिकायत की, जिस पर जांच भी शुरू हो गई है। आयोग ने एक जांच दल भोपाल भी भेजे हैं।

राज्य की मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह का कहना है, “जो हुआ है वह नहीं होना चाहिए। इसमें सुधार के लिए हमारी ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जिला स्तर पर ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश हो रही है, जिसके जरिए एक ही तस्वीर कई स्थानों पर पाए जाने पर उन्हें हटाया जाए। हमारी सबसे मजबूत कड़ी ब्लॉक स्तर का अधिकारी होता है, वह अच्छा काम करेगा, कलेक्टर उस पर निगरानी अच्छे से रखेंगे तो तस्वीरों का दोहराव नहीं होगा।”

राज्य सरकार के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, “मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसमें सुधार होना चाहिए, मगर एक सवाल यह भी उठता है कि मतदाता सूची ब्रेक कैसे हुई। ऐसा कौन सा सॉफ्टवेयर आ गया, यह भी जांच का विषय है। इतना तय है कि इससे सरकार या उससे जुड़े लोगों का कोई लेना-देना नहीं है।”

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह चौहान ने पिछले दिनों चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि भोपाल जिले के नरेला विधानसभा क्षेत्र में कई मकान ऐसे हैं, जिनका आकार 1550 से 2000 वर्ग फुट है और वहां 100 से 150 तक मतदाता होना बताया गया है।

राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता का मसला काफी अहम रहने वाला है, क्योंकि 230 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 50 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जीत हार का अंतर अधिकतम 5,000 रहता है। इस स्थिति में अगर फर्जी मतदाताओं के नाम काट दिए गए और उनके स्थान पर कोई वोट नहीं डाल पाया तो नतीजे चुनावी तस्वीर बदलने वाले साबित हो सकते हैं।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

राहुल गांधी कर सकते हैं मप्र में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा : कमलनाथ

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नई दिल्ली, 7 मई | मध्यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष कमलनाथ का कहना कि पार्टी में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करने की परंपरा नहीं है। मगर, जरूरत पड़ी तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर सकते हैं।

कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ‘ठगी’ से नाराज हैं और कांग्रेस ने इस साल के आखिर में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए कमर कस ली है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “बेशक, समय कम है मगर मुझे पक्का विश्वास है कि मैं गांव स्तर पर पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने में सक्षम साबित होऊंगा। यह मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संगठन-शक्ति व पैसे की ताकत के साथ है।”

कांग्रेस के 71 वर्षीय वरिष्ठ नेता और छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव के मद्देनजर पार्टी की प्रदेश इकाई में बदलाव संबंधी फैसला बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वह अब बीती बातों पर नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि इस संबंध में फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को 26 अप्रैल को मध्यप्रदेश कांग्रेस की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है और पार्टी के सभी नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं।

कमलनाथ की बातों से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव में खुद उतरने को लेकर उन्होंने अपना विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा, “मैं 40 साल से चुनाव लड़ता आ रहा हूं। बतौर सांसद मेरा सेवाकाल सबसे लंबा रहा है।”

जब पूछा गया कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

मध्यप्रदेश में कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं किए जाने और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त कर संतुलन कायम किए जाने के संबंध में पूछे गए सवालों पर कमलनाथ ने कहा, “मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां कोई एक शख्स चुनाव नहीं जीत सकता। आपको कई चेहरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी ने ऐसा फैसला लिया है।”

जब पूछा गया कि क्या वह चाहेंगे कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करे तो उन्होंने कहा कि हर राज्य के लिए अगल रणनीति होती है।

कमलनाथ ने कहा, “कभी-कभी यह जरूरी होता है, जबकि कभी इसकी जरूरत नहीं होती। क्या भाजपा ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था? क्या उन्होंने उत्तराखंड में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया? उनका कभी कोई मुख्यमंत्री उम्मीदवार (चुनाव से पूर्व) नहीं था। इसलिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

कमलनाथ ने इससे पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पार्टी को हर राज्य में बताना चाहिए कि वहां उसका नेता कौन है। इसका जिक्र करने पर उन्होंने कहा, “अगर जरूरत महसूस होगी तो कांग्रेस अध्यक्ष किसी के नाम की घोषणा करेंगे।”

कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के तौर पर उनकी प्राथमिकता पार्टी को गांव स्तर पर मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “चुनाव बहुत मायने में स्थानीय बन गया है और हमें यह समझना होगा।”

कांग्रेस को मध्यप्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। कमलनाथ का आरोप है कि भाजपा पूर्व में किए अपने वादों को पूरा करने में विफल रही है।

पार्टी के प्रदेश प्रमुख के तौर पर अपनी नियुक्ति के संबंध मे कमलनाथ ने कहा, “मेरे सभी से अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए मेरे लिए पार्टी में एकता लाना कोई चुनौती नहीं है। मैं भाग्यशाली हूं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टी में पहले से ही एकता है।” उन्होंने पार्टी में सिंधिया के साथ किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया।

कमलनाथ ने कहा कि उनका मुकाबला अभी वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज से है।

–आईएएनएस

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