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Vinod Rai CAG Vinod Rai CAG

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संघ के 92 साल के इतिहास में विनोद राय की टक्कर का फ़रेबी और कोई नहीं हुआ!

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि मनगढ़न्त आरोपों, अफ़वाहों और झूठों की बदौलत कुछ लोगों ने ऐसी साज़िश रची जिससे सवा सौ करोड़ लोगों की आँखों में धूल झोंकी जा सके। लेकिन यहीं ये सौभाग्य भी देश के सामने है कि क़तरे-क़तरे पर पैनी नज़र रखने की अभ्यस्त हमारी अदालतों को गुमराह करना आसान नहीं है।

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संघियों का अटूट आभूषण है झूठ और अफ़वाह! इनका मुख्य भोजन है सत्ता और साज़िश! इनका प्रमुख स्वभाव है फ़रेब और मक्कारी! भारत माता की जय, वन्दे मातरम्, हिन्दुत्व, देशभक्ति, राष्ट्रद्रोह, तुष्टिकरण, सहिष्णुता, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, सैनिक, कश्मीरी ब्राह्मण, वंशवाद, राम, असली हिन्दू, मुसलमान, पाकिस्तान वग़ैरह ऐसे जुमले हैं जो संघियों की धमनियों में रक्त संचार करते हैं। संघी अपने कम से कम 137 पारिवारिक संगठनों में बिखरे पड़े हैं, लेकिन सबके चाल-चरित्र और चेहरे में एकरूपता हमेशा रहती है। 92 साल से यही संघियों का चिरस्थायी भाव है! इन्हीं गुणों से सम्पन्न एक बीज विनोद राय के नाम से पल्लवित-पुष्पित हुआ। अपने कुल-ख़ानदान के संस्कारों को किनारे रख इस होनहार ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में जगह पायी।

गोपनीय रही विनोद राय की जड़ें

क़रीब तीन दशकों तक इस ज़हरीले युवक विनोद राय ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े अपने अतीत की पहचान को छिपाये रखा। भारत सरकार में संयुक्त सचिव के ओहदे तक पहुँचते-पहुँचते इसने अपने छवि एक धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील अफ़सर की बना ली। इसीलिए सरकार चला रहे प्रणब मुखर्ज़ी, चिदम्बरम और मनमोहन सिंह जैसे अनुभवी और धुरन्धर नेताओं तथा सरकारी ख़ुफ़िया विभाग को भी शातिर विनोद राय की जड़ों का पता नहीं लग पाया। बिल्कुल उस अजीत डोभाल की तरह, जो आज राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं या उस सत्यपाल सिंह, के जे अल्फांसो, आर के सिंह और जनरल वीके सिंह की तरह जो आज मोदी सरकार में मंत्री हैं!

अपनी फ़र्ज़ी छवि की बदौलत की बदौलत विनोद राय, केन्द्र सरकार में पहले सचिव और फिर सीएजी यानी भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के संवैधानिक पदों को हथियाने में कामयाब रहा। सीएजी बनते ही विनोद राय जान चुका था कि उसे ज़िन्दगी का सर्वोच्च ओहदा मिल चुका है। अब उसे वहाँ से कोई नहीं हटा सकता। इसके बाद ही विनोद राय ने अपने ननिहाल यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अहसानों को उतारने की ठानी! उसने अपने संघी आकाओं के साथ बेहद गुप्त मशविरा करके मनमोहन सिंह सरकार की उन नीतियों की दुर्भावनापूर्ण समीक्षा करने की साज़िश तैयार की जो जल्द ही टेलीकॉम (2जी), कोयला ख़दान और कॉमनवेल्थ गेम्स घोटालों की रिपोर्टों के रूप में संसद में पेश की गयी!

संघ की महा-साज़िश

चूँकि ये रिपोर्टें देश की संवैधानिक संस्था सीएजी की थीं, इसीलिए बीजेपी ने इसी आधार पर काँग्रेस को आकंठ भ्रष्टाचारी क़रार देने की महा-साज़िश तैयार की। संसद का चक्का जाम किया गया। सोशल मीडिया पर झूठ फ़ैलाने वाले विकराल तंत्र को काँग्रेस के चरित्रहनन के काम में झोंक दिया। बूढ़े हो रहे आडवाणी को दरकिनार करके घोर कट्टरवादी नरेन्द्र मोदी को गुजरात से खींचकर दिल्ली लाने की योजना बनी। इसके लिए ‘गुजरात मॉडल’ का एक जिन्न भी पैदा किया गया। उधर, महँगाई और तेल के दाम को लेकर बीजेपी के बाक़ी नेताओं को सड़कों पर उतरकर तरह-तरह की नौटंकियाँ करने का हुक़्म मिला। जहाँ मनमोहन सिंह को मौनी, कमज़ोर और लाचार बताकर पेश किया गया। नेहरू गाँधी परिवार को बदनाम करने के लिए राहुल गाँधी को ‘पप्पू’, सोनिया को पुत्र-मोह से पीड़ित विदेशी और लाचार माँ तथा रॉबर्ट वाड्रा को बेईमान बताया गया।

उधर, मीडिया घरानों को भी भरपूर घुट्टी पिलायी गयी कि उन्हें क्या-क्या तथा कैसे-कैसे करना है? इसी वक़्त, तमाम साधू-सन्त-बाबा टाइप के फ़रेबियों को भी सेट कर दिया गया। अन्ना-केजरीवाल की दुकान भी खुलवायी गयी। बिल्ली के भाग से छींका टूटने वाला निर्भया काँड भी तभी हो गया! इसे भी मनमोहन सरकार की भारी नाकामी की तरह प्रस्तुत किया गया। हिन्दी-पट्टी में सवर्णों, ख़ासकर, ब्राह्मणों और क्षत्रियों को तरह-तरह का झाँसा देकर पटाया गया। कुलमिलाकर, संघ-परिवार ने हर तरह के व्यंजनों से छप्पन-भोग की ऐसी थाली तैयार की, जिससे हिन्दी-पट्टी की जनता को अपनी मुट्ठी में किया जा सके! इस मेगा-मास्टर-प्लान का एक ही उद्देश्य था कि येन-केन-प्रकारेण काँग्रेस से सत्ता छीनी जाए।

दरअसल, वाजपेयी सरकार के जाने के बाद बीजेपी दस साल से विपक्ष में थी। इस दौरान मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों की वजह से भारत की आर्थिक विकास-दर लगातार शानदार होती रही। विश्व में भारतीय अर्थव्यवस्था की धाक बढ़ती रही। उस दौर में सियासी तौर पर काँग्रेस अपने आप में भले ही बेहद शक्तिशाली नहीं थी, लेकिन यूपीए के रूप में ग़ैर-भाजपाई दलों का मज़बूत गठबन्धन उसके साथ था! ये मज़बूती इतनी टिकाऊ थी जैसे महाभारत का चक्रव्यूह! इसे भेदने का सारा दारोमदार विनोद राय रूपी शकुनि के हिस्से में डाला गया।

विनोद राय का सर्वश्रेष्ठ फ़रेब

फ़रेबी विनोद राय ने ‘परफ़ॉर्मेंस ऑडिट’ को अपना हथियार बनाया। इसमें सीएजी ने अपने आप ही ख़ुद को सरकार की नीतियों की समीक्षा का अधिकार और दायित्व दे दिया। हालाँकि, परम्परागत तौर पर ये उसके क्षेत्राधिकार में नहीं था। इसीलिए जब मौजूदा सीएजी राजीव महर्षि से कहा गया कि वो नोटबन्दी की नीति की समीक्षा भी उसी ‘परफ़ॉर्मेंस ऑडिट’ के रूप में करें तो उसने साफ़ कह दिया कि सरकारी नीतियों की समीक्षा करना सीएजी का नहीं बल्कि संसद का दायित्व है! हालाँकि, इसी व्याख्या को तोड़-मरोड़कर शातिर विनोद राय ने टेलीकॉम (2जी) और कोयला खदान में गड़बड़ी के इतने बड़े आँकड़े गढ़ दिये, जिसकी कल्पना भी नहीं हो सकती थी।

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The Diary of the Nation’s Conscience Keeper (Not Just An Accountant)

विनोद राय की साज़िश रंग लायी। संघ-परिवार ने काँग्रेस को सफलतापूर्वक इतना बदनाम कर दिया कि 2014 में उससे सत्ता छीन ली। वैसे, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए असंख्य झूठे वादे भी किये गये। लम्बे समय तक देश का जनमानस इनके झूठ पर ही यक़ीन करता रहा और काँग्रेस को राज्यों में भी चुनाव दर चुनाव नुकसान उठाना पड़ा। अब लगे हाथ संघियों के क़ारनामे को भी समझते चलिए। हम जानते हैं कि बिजली-पानी का दाम सरकार तय करती है। स्पेक्ट्रम और कोयला खदान भी बिजली-पानी की तरह प्राकृतिक संसाधन ही हैं। लिहाज़ा, यदि सीएजी ये कहे कि ‘बिजली-पानी की वो नीति ही ग़लत है जिसमें ‘पहले आओ पहले पाओ’ और ‘जिसने पहले पैसा जमा कराया उसने पहले सामान पाया’ की विधि से पूर्व निर्धारित दाम पर बेचा रहा है। इसकी जगह यदि बिजली-पानी की नीलामी होती तो सरकार को रोज़ाना 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा हो सकता था।’

‘ज़ीरो लॉस’ और 2जी

यहाँ यदि बिजली-पानी के दाम की तुलना अमेरिका या कुवैत या जापान के दाम से करके सरकार को हो रहे काल्पनिक नुकसान का अनुमान लगाया जाता, फिर उसे सीएजी की रिपोर्ट में घोटाला बताकर संसद में पेश कर दिया जाता, फिर देश-दुनिया में राग आलापा जाता कि सरकार ने बिजली-पानी के नाम पर देश को बेच डाला, मंत्रियों ने अपने घर भर लिये, यहाँ तक कि सारा काला धन विदेशी बैंकों में ठिकाने लगा दिया तो संसद में हंगामा क्यों लाज़िमी नहीं होता! मंत्री का इस्तीफ़ा क्यों नहीं होता! फिर सीबीआई जाँच होगी, आरोपियों की गिरफ़्तारी होगी, बिना मुक़दमा चले ही सारे आरोपियों को भ्रष्ट और राष्ट्रद्रोही कहा जाएगा, सियासत चमकायी जाएगी और चुनाव दर चुनाव देश को ‘काँग्रेस मुक्त’ बनाया जाएगा। क्योंकि संघियों को पता है देश में काँग्रेस से बड़ी चुनौती उन्हें और और नहीं दे सकता।

इस बीच, उस व्यक्ति का भी चरित्र-हनन किया जाएगा जो समझाना चाहता है कि अरे भाई, बिजली-पानी को नियत दाम पर बेचने की नीति से किसी सरकारी राजस्व का ग़बन नहीं हुआ। यही ‘ज़ीरो लॉस’ है। यही नहीं, ये अनुमान भी बिल्कुल काल्पनिक है कि यदि सरकार बिजली-पानी की नीलामी करती तो देश फिर से सोने की चिड़िया बन जाता! लेकिन जब देश का मीडिया आपकी अंगुलियों पर नाचने के लिए उतावला होगा तो समझदारी की हरेक बात को हवा-हवाई बनने में कितनी देर लगेगी!

बहरहाल, झूठ-छल-कपट-फ़रेब से सत्ता को हथियाने में मददगार बने को उनके योगदान के लिए कृतज्ञ संघ परिवार सम्मानित नहीं करें, ये भला कैसे होता! लिहाज़ा, विनोद राय जैसे शातिर को पद्मभूषण से सम्मानित करवाया गया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट को भी सेट करके वहाँ से उस नीति को ख़ारिज़ करवा दिया गया, जिसके मुताबिक़, सरकार बिजली-पानी के दाम को तय करके जनता को मुहैया करवा रही थी। उसके बाद से धूर्तों की जमात देश में गाना गाने लगेगी कि ‘देखो-देखो… सवा सौ करोड़ भारतवासियों, हमने बिजली-पानी की नीलामी की नीति को लागू करके 10 रुपये कमा लिये, क्योंकि हमें भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं है। जबकि पहले निर्धारित दाम पर बेचकर महज़ 5 रुपये इसलिए कमाये जा रहे थे क्योंकि उस नीति में भ्रष्टाचार था!

अब ज़रा सोचिए, जब चारों ओर, चप्पे-चप्पे पर दुष्प्रचार का बोल-बाला हो तो भला कौन समझेगा कि बिजली-पानी की अलग-अलग नीतियों का अपना-अपना नफ़ा-नुक़सान है! जैसे एक नीति कहती है कि बिजली-पानी के मुनासिब दाम पर होने से वो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की पहुँच में रहेगा। लोगों की ज़िन्दगी आसान रहेगी। वो स्वस्थ और ख़ुशहाल रहेंगे तो देश की तरक़्क़ी में ज़्यादा योगदान करेंगे। इससे ज़्यादा रोज़गार मिलेगा। लोगों की आमदनी बढ़ेगी तो वो ख़र्च भी ज़्यादा करेंगे और टैक्स भी ज़्यादा भरेंगे। इससे भी अन्ततः सरकार का राजस्व बढ़ेगा।

2जी ने खोदी बैंकों की क़ब्र

दूसरी ओर, नीलामी वाली नीति के समर्थक कहेंगे कि सबसे पहले तो बिजली-पानी के अधिक पैसे भरो, सरकार को ज़्यादा राजस्व दो, फिर चाहे तुम बिजली-पानी का इस्तेमाल करो या भाड़ में जाओ! इसका नतीज़ा ये होगा कि जनता ऊँचे से ऊँचे ब्याज पर बैंकों से क़र्ज़ा लेकर बिजली-पानी ख़रीदने के लिए मज़बूर होगी, क्योंकि बिजली-पानी के बग़ैर ज़िन्दगी चलेगी नहीं। उधर, बिजली-पानी के लिए क़र्ज़ देने वाले बैंकों की हालत बिगड़ेगी, उनका डूबत खातों की तादाद बढ़ जाएगी। और, देखते ही देखते बिजली-पानी की नीलामी वाली नीति बैंकों के सामने आसमान छूते एनपीए की सुर्ख़ियाँ बटोरते हुए काल की तरह खड़ा हो जाएगा!

फिर जनता को मिलेगी नोटबन्दी! क्योंकि कोई नीम-हक़ीम उनके कान में मंत्र फूँक देगा कि बैंकों का एनपीए मिटाने के लिए जनता का सारा पैसा बैंकों में खींच लो! इस क़वायद पर भी वास्तव में भारी रक़म ख़र्च होगी। इसका चूना भी जनता को ही लगेगा। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था को जो चपत लगेगी वो वास्तविक या असली होगी। जबकि 2जी घोटाले के झूठ में लिखी गयी 1.76 लाख करोड़ रुपये की रकम काल्पनिक थी। मज़े की बात ये भी होगी कि नोटबन्दी की नीति की समीक्षा के लिए कोई सीएजी रिपोर्ट नहीं बनायी जाएगी, क्योंकि नये ज़माने में शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं के मुखिया के बदलने से उसका अपना विधान भी तो बदल जाता है। इसीलिए कभी तो काल्पनिक नुक़सान का हिसाब भी लगा लिया जाता है, और कभी वास्तविक नुक़सान से भी मुँह फ़ेर लिया जाता है!

लेकिन वक़्त का पहिया तो लगातार घूमता रहता है। इसीलिए आख़िरकार वो दिन भी आता जब सारे झूठ, सारे ढकोसले, सारे दावे अदालत में फ़र्ज़ी साबित होते हैं। फिर नये तरह का एक और झूठ गढ़ा जाता है कि अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया इसका ये मतलब नहीं कि बिजली-पानी को तय दाम पर बेचने की नीति में भ्रष्टाचार नहीं था। किसी को बेईमान नहीं होने का सर्टिफ़िकेट कोर्ट कैसे दे सकता है? सर्टिफ़िकेट देना तो संघियों का जन्मजात विशेषाधिकार है। पुरानी नीति में भ्रष्टाचार हुआ है क्योंकि नीलामी की नीति पर चलने वालों ने दिखा दिया है कि बिजली-पानी से ज़्यादा कमाई हो सकती है!

स्वामी का मोदी पर हमला

इनका मानना है कि ‘हम ईमानदार हैं, क्योंकि हम कह रहे हैं। और, वो बेईमान है क्योंकि हमने उसे बेईमान कह दिया है! बस, बात ख़त्म!’ इसीलिए आये दिन अरूण जेटली को मूर्ख साबित करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने 2जी फ़ैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ही धज़्ज़ियाँ उड़ा दीं। स्वामी का कहना है कि ‘प्रधानमंत्री और उनकी सरकार भ्रष्टाचार के मामलों को गम्भीरता से नहीं ले रही है!’ इससे पहले यशवन्त सिन्हा भी देश की आँखें खोल चुके हैं कि ‘नोटबन्दी, एक निहायत ही बेवक़ूफ़ी भरा और अदूरदर्शी फ़ैसला था। इससे काले धन की रोकथाम तो छोड़िए, कुछ भी हासिल नहीं होने वाला, सिवाय जनता की दुश्वारियों के!’

बहरहाल, अब सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लफ़्फ़ाज़ को ये कौन बताए कि सीबीआई अपने आकाओं को ख़ुश रखने के लिए फ़र्ज़ी आरोप तो लगा सकती है लेकिन अदालत में इसे सही साबित करने के लिए फ़र्ज़ी सबूतों को वो आख़िर लाती तो लाती कहाँ से! अदालतों और सरकारी वकीलों की भी लाचारी है कि वो मोदी सरकार को ख़ुश करने के लिए मक्खी को तो देखकर भले ही निगल लें, लेकिन हाथी को भला कैसे निगलते! इसीलिए सारे के सारे आरोपी बाइज़्ज़त बरी हो गये। यहाँ तक सात साल तक आरोपों और सबूतों की चीड़-फाड़ करने वाले जज ओ पी सैनी को आख़िरकार ऐसी-ऐसी टिप्पणियाँ अपने फ़ैसले में लिखनी पड़ी जैसा देश के न्यायिक इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था।

उधर, विनोद राय जैसे धूर्ताधिराज ने ये साबित कर दिया कि वो एक अव्वल दर्जे का फ़र्ज़ी एकाउंटेंट और फ़रेबी ऑडिटर है। इसीलिए अब काँग्रेस का फ़र्ज़ बनता है कि वो ताल ठोंककर विनोद राय को बीजेपी का एजेंट बताये और उसके ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई की माँग करे। हालाँकि, ये भी सच है कि मोदी राज में धूर्त विनोद राय को किसी तरह का कष्ट नहीं होगा! वो बुराई के बेल की तरह नित बढ़ता ही रहेगा! मज़े की बात ये भी रही कि 2जी मामले के अगले ही दिन महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चाव्हाण को भी बॉम्बे हाईकोर्ट से क्लीन-चिट मिल गयी। वहाँ भी आदर्श घोटाले के सिलसिले में चाव्हाण के ख़िलाफ़ सीबीआई कोई सबूत नहीं पेश कर सकी। बीजेपी ने इस मामले को लेकर भी ख़ूब हाय-तौबा मचायी थी और काँग्रेस का जमकर चरित्रहनन किया था।

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि मनगढ़न्त आरोपों, अफ़वाहों और झूठों की बदौलत कुछ लोगों ने ऐसी साज़िश रची जिससे सवा सौ करोड़ लोगों की आँखों में धूल झोंकी जा सके। लेकिन यहीं ये सौभाग्य भी देश के सामने है कि क़तरे-क़तरे पर पैनी नज़र रखने की अभ्यस्त हमारी अदालतों को गुमराह करना आसान नहीं है। फ़िलहाल, झूठ-फ़रेब और अज्ञानता के अथाह अन्धकार वाले मोदी युग से गुज़र रहे भारतवर्ष के लिए यही उम्मीद की आख़िरी किरण है! यही किरण आश्वस्त भी कर रही है कि यदि 2019 में मौजूदा दुर्योग का ख़त्म होना तय है। क्योंकि भारतीय समाज में देर तो क़दम-क़दम पर है, लेकिन अन्धा-युग अनन्तकाल तक कभी नहीं रहा!

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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श्रीलंका में चीन की उपस्थिति भारत के लिए चिंताजनक!

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं।

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70th Independence Day celebrations in Colombo,

मेरी पत्नी और मैं हाल ही में अपने कुछ मित्रों के साथ छुट्टियों के लिए श्रीलंका गए थे। हम दोनों के लिए लगभग 15 वर्षों बाद यह पहली श्रीलंका यात्रा थी, जबकि उससे पहले यह सुंदर द्वीपीय देश हिंसक गृहयुद्ध में जकड़ा था, जिसने अनगिनत जानें लीं और देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया था।

यह वह दौर था जब महिंदा राजपक्षे ने श्रीलंका के राष्ट्रपति के रूप में सत्ता संभाली और तमिल टाइगर्स के सफाए को अपना सबसे प्रमुख उद्देश्य बनाया। 30 महीनों की असहनीय हिंसा के बाद लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) के नेता वेलु पिल्लई प्रभाकरन और उसके समर्थकों की मौत के साथ ही 2009 में 26 सालों का गृहयुद्ध समाप्त हो गया।

यह तर्क दिया जाता है कि उस समय बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था और तमिलों के साथ खुले तौर पर भेदभाव किया गया था। यह सच है। लेकिन सच यह भी है कि यह द्वीपीय देश अंत में अशांति, अनिश्चितता और आतंकवाद के दशकों के बाद पहली बार शांति की ओर लौट आया। जिस श्रीलंका का मैं पहले आदी हो गया था, वह अब उससे बिलकुल विपरीत है। उस समय बंदूक लिए सुरक्षा कर्मी हर तरफ घूमते रहते थे। अब यहां शांति है।

भारत के लिए भी गृहयुद्ध और लिट्टे का अंत अच्छी खबर थी। इससे पहले ही लिट्टे को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया था, लेकिन तमिलनाडु में प्रभाकरन के साथ कुछ संगठनों का गठबंधन नई दिल्ली के लिए चुनौती बन गया था। दुर्भाग्य से गृहयुद्ध के अंत के साथ इतिहास ने खुद को एक बार फिर दोहराया और भारत ने अपनी स्थिति खराब कर ली और आज हम एक बार फिर चीन की कूटनीति के बीच श्रीलंका को खोने के कगार पर हैं।

श्रीलंका में चीनी उपस्थिति कोई छिपी हुई बात नहीं है। आप उन्हें हर जगह पाएंगे। चीनी ड्रेजिंग (समुद्री पानी को साफ करने वाले) जहाजों को खुले तौर पर काम करते हुए देखा जा सकता है। हंबनटोटा बंदरगाह पर काम शुरू हो गया है। शॉपिंग मॉल से लेकर पब तक हर जगह चीनी श्रमिक नजर आएंगे। कई चीनी श्रीलंका की भाषा सिंहली बोलना सीख रहे हैं। होटल, सड़कों, बुनियादी ढांचों, थिएटरों और सुख-सुविधाओं से लैस क्रिकेट स्टेडियम केवल कागजों पर लिखी परियोजना भर नहीं हैं, बल्कि लोग उन्हें देख सकते हैं। आंखों देखी चीजों के महत्व को कभी भी कम करके आंका नहीं जाना चाहिए और जिस गति से चीन यहां परियोजनाओं को अंजाम दे रहा है, वह इस बात की बानगी है कि श्रीलंका में रियल एस्टेट परिवर्तन तेजी से हो रहा है।

2005-17 के बीच 12 वर्षों की अवधि में बीजिंग ने श्रीलंका की परियोजनाओं में 15 अरब डॉलर का निवेश किया है। वहीं, चीन के एक राजदूत भारत को एक स्पष्ट संदेश दे चुके हैं, जो श्रीलंका में चीनी उपस्थिति को अपने प्रभाव क्षेत्र में घुसपैठ के रूप में देखता है। राजदूत ने भारत को स्पष्ट जवाब देते हुए कहा था, “कोई नकारात्मक ताकत श्रीलंका और चीन के बीच सहयोग को कमजोर नहीं कर सकती है।”

भारत के लिए यह परेशान करने वाला है। भारतीय विदेश नीति समय की कसौटी पर खरा उतरे संबंधों पर काफी भरोसा करती है, लेकिन श्रीलंकाई लोगों में उम्मीदों की अधीरता रही है, जिन पर भारत ध्यान देने और प्रतिक्रिया करने में विफल रहा और चीन सफल रहा है।

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं। इसे एक खतरे को गले लगाने के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन जब उनके मन-मस्तिष्क में एक समृद्ध भविष्य की इच्छा उभरती है तो वे इस मौके को काफी आकर्षक पाते हैं।

वहीं, दूसरी ओर भारत सभी ओर से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। पाकिस्तान से दुश्मनी है। मालदीव अस्थिर है। नेपाल की स्थिति लगभग असमजंस से भरी है और श्रीलंका एक स्पष्ट लुभावने मायाजाल में फंसा है। भारत वास्तव में इस समय अब तक की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौती का सामना कर रहा है।

अगर भारत को एक साथ मिलकर काम करना है तो इसके लिए केवल कल्पना की नहीं, बल्कि गति और दक्षता की जरूरत है, ताकि श्रीलंका के भविष्य को लेकर किए गए वादे पूरे हो सकें।

दिग्गज शतंरज खिलाड़ी बॉबी फिशर ने एक बार कहा था, “अगर आप खेल खेल रहे हैं तो आप जीतने के लिए खेलें, लेकिन अगर आप खेल हार गए तो वह इसलिए क्योंकि आपने अपनी आंखों को प्यादों से हटा लिया था, इसलिए आप हारने के ही लायक थे।”

By : अमित दासगुप्ता

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ज़रा हटके

‘हास्य चिकित्सक’ की उदास कश्मीरियों के चेहरों पर मुस्कान लाने की कोशिश

टकराव के माहौल में पले बढ़े आज के युवा रोज हिंसा-प्रतिहिंसा देख रहे हैं, वहां कश्मीर के 67 वर्षीय कॉमेडी किग का कहना है कि कश्मीरियों के बुझे चेहरों पर मुस्कान व हंसी लाने का एकमात्र जरिया हास्य-विनोद है।

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Hazaar Dastaan

कश्मीर में हिंसा शुरू होने बाद जिन गलियों में आज नारों व गोलियों की गूंज सुनाई देती है, कभी वहां हंसी के हसगुल्ले छुटते थे। और, इसकी वजह थे कश्मीर के चार्ली चैपलिन नाम से मशहूर नजीर जोश जिनके दूरदर्शन पर आते ही कश्मीरी घरों में हंसी की फुलझड़ियां छूटती थीं। चेहरे के हाव-भाव में घबराहट, गली के जोकर जैसे और चाल-ढाल में चैपलिन जैसे जोश घाटी को गुदगुदाते थे।

टकराव के माहौल में पले बढ़े आज के युवा रोज हिंसा-प्रतिहिंसा देख रहे हैं, वहां कश्मीर के 67 वर्षीय कॉमेडी किग का कहना है कि कश्मीरियों के बुझे चेहरों पर मुस्कान व हंसी लाने का एकमात्र जरिया हास्य-विनोद है।

कवि, लेखक, निर्देशक और अभिनेता जोश यहां हर घर में ‘जूम जर्मन’, ‘अहेड रजा’ और कई अन्य नामों से चर्चित हैं जो कई टीवी धारावाहिकों में उनके किरदारों के नाम रहे हैं।

वह नियमित रूप से स्थानीय दूरदर्शन पर हास्य धारावाहिक लेकर आते थे जिसे कश्मीरी बहुत पसंद करते थे। लेकिन, 1990 में जब अलगाववादी हिंसा कश्मीर में भड़क उठी तो उनका कार्यक्रम बंद हो गया। हालांकि, उन्हें सीधे-सीधे कोई धमकी नहीं मिली लेकिन घाटी में हिंसा में हास्य विनोद व व्यंग्य के लिए जगह नहीं बची और उनके पास प्रायोजक नहीं रहे।

जोश का मानना है कि कश्मीरी अवाम कई सामाजिक व मनोवैज्ञानिक समस्याओं के दौर से गुजर रहे हैं जिसका इलाज सिर्फ दवाइयों से नहीं हो सकता है।

जोश ने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “यहां लोग तनावमुक्त होना चाहते हैं और हास्य-विनोद और व्यंग्य इसके लिए बेहतर जरिया है।”

उन्होंने एक घटना के बारे में बताया जिसमें एक परिवार ने अपनी अवसादग्रस्त मां को तनाव मुक्त करने के लिए उनको धन्यवाद दिया था।

उन्होंने बताया, “महिला के बेटे ने मुझे बताया कि कॉमेडी धारावाहिक ‘हजार दास्तान’ की एक कड़ी को देखकर उनकी मां के चेहरे पर काफी समय के बाद मुस्कान आई।”

उन्होंने कहा, “लड़के ने बताया कि महीनों अवसादग्रस्त रहने के बाद उसकी मां के हंसने के बारे में जब मनोचिकित्सक को मालूम हुआ तो उन्होंने कॉमेडी धारावाहिक की और कड़ियां दिखाने की सलाह दी। इससे वह पूरी तरह ठीक हो गईं।”

जोश को लगता है कि जहां कर्फ्यू, बंद और गलियों में हिंसा कोई असाधारण घटना नहीं बल्कि आम बात हो वहां लोगों का मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए उनके जीवने में थोड़े हास्य-विनोद की जरूरत होती है।

लेकिन, घाटी में हिंसा बढ़ जाने के बाद नजीर जोश के सामाजिक और राजीतिक व्यंग्य पर आधारित टीवी धारावाहिकों के लिए कोई जगह नहीं बची।

जोश मध्य कश्मीर के बडगाम जिला स्थित अपने घर के बाहर बादलों को टकटकी निगाहों से निहारते हुए जोश ने बताया कि सामाजिक व्यंग्य पर आधारित उनका अंतिम धारावाहिक जूम जर्मन 1989 में बना था लेकिन कश्मीर में हिंसा के हालात पैदा होने के बाद यह 25 कड़ियां से ज्यादा नहीं चल पाया।

जाड़े के सूर्य की क्षीण किरणें घने बादलों के बीच राह बनाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन बादल उन्हें धरती तक पहुंचने के उनके मार्ग में बाधक बनकर खड़े हैं।

इसे देखते हुए उन्होंने कहा, “ऐसे ही वर्तमान हालात हैं। आप जहां भी जाएंगे आपको अवसाद के घने व काले बादल मिलेंगे। विभिन्न अस्पतालों में आने वाले सत्तर फीसदी मरीज अवसाद व तनाव से ग्रस्त हैं। कश्मीर में मनोरंजन का कोई जरिया नहीं है। सिनेमा हाल बंद हो चुके हैं। यहां अन्य राज्यों की तरह कोई स्थानीय फिल्म उद्योग नही है।”

जोश ने बताया, “कश्मीर में सिर्फ एक टीवी स्टेशन है और वहां भी मनोरंजन के कार्यक्रम शुरू करने के लिए कुछ नहीं हो रहा है जिससे लोगों को अपनी जिंदगी के तनाव को भुलाकर हंसने का बहाना मिले।”

उन्होंने उन दिनों को याद किया जब कश्मीरी उत्सुकता से साप्ताहिक टीवी नाटक का इंततार करते रहते थे।

जोश ने बताया, “मैं कुछ स्थानीय परिवारों को जानता हूं जहां महिलाओं ने अपने जेवरात बेचकर टीवी खरीदा था ताकि वे मेरी धारावाहिक हजार दास्तान देख पाएं। इस धारवाहिक की 52 कड़ियां 1985 से लेकर 1987 के बीच स्थानीय दूरदर्शन चैनल पर चली थीं।”

यह धारावाहिक प्रदेश की सत्ता पर काबिज लोगों के ऊपर राजनीतिक व्यंग्य पर आधारित था, जिसमें लोगों की समस्याओं के प्रति उनकी बेरुखी व लापरवाही का चित्रण किया गया था।

उन्होंने बताया, “कुछ स्थानीय नेता धारावाहिक की लोकप्रियता को लेकर क्षुब्ध थे। उन्होंने दिल्ली जाकर केंद्रीय नेतृत्व से शिकायत की कि इस धारावाहिक को लेकर उनकी स्थिति असहज बन गई है।”

जोश ने अपने बीते दिनों को याद करते हुए बताया, “शिकायत होने के बाद हर कड़ी को पहले पूर्वावलोकन के लिए दिल्ली भेजा जाता था, उसके साथ कश्मीरी अनुवादक भी होते थे। समीक्षा समिति ने राजनीतिक व सामाजिक व्यंग्य को सही ठहराया और उसे प्रोत्साहन देने की बात कही।”

जोश के पेशेवर जीवन की शुरुआत स्थानीय रंगकर्म से हुई। उन्होंने बताया, “आरंभ में हम गांव और जिला स्तर पर नाटक खेलते थे। मैंने 1968 में श्रीनगर के टैगोर हॉल में एक नाटक खेला था जहां प्रदेश संस्कृति अकादमी की ओर से नाट्य महोत्सव का आयोजन किया गया था।”

उन्होंने 1973 में टेलीविजन के लिए ‘हाऐर केकर’ नाटक लिखा। इसकी सफलता से वह उत्साहित हुए और कश्मीर में 1989 में मनोरंजन व हास्य कार्यक्रमों पर रोक लगाने तक लगातार हास्य धारवाहिक लिखते रहे।

हालांकि, वह हालात के आगे पूरी तरह से हतोत्साहित नहीं हुए हैं। वह कहते हैं कि प्रदेश और केंद्र सरकार की ओर से उनके कार्य को समर्थन मिले तो कश्मीर में अब भी हास्य व्यंग्य के कार्यक्रम दोबारा शुरू किए जा सकते हैं।

जोश ने कहा, “हमें कम से कम निर्माण लागत की जरूरत है ताकि अतीत की गरिमा फिर से हासिल हो। मुझे आशा है कि निकट भविष्य में बेहतर समझ बनेगी और मैं फिर कश्मीरियों को टीवी धारावाहिकों के जरिये हंसाकर उनको रोज-रोज के तनाव से मुक्त कर सकूंगा।”

वह मानते हैं कि स्थानीय युवाओं में काफी प्रतिभा है। उन्होंने कहा, “नई पीढ़ी के इन लड़के व लड़कियों को अभिनय व निर्देशन में कठिन प्रशिक्षण की जरूरत है ताकि यहां रंगकर्म और टीवी धारावाहिक का लोप न हो।”

(यह साप्ताहिक फीचर श्रंखला आईएएनएस और फ्रैंक इस्लाम फाउंडेशन की सकारात्मक पत्रकारिता परियोजना का हिस्सा है।)

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‘रेप रोको आंदोलन’ मील का पत्थर साबित होगा : स्वाति मालीवाल

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Swati Maliwal

सत्याग्रह के तहत ‘रेप रोको आंदोलन’ के जरिए जनांदोलन खड़ा कर रहीं दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल मानती हैं कि बच्चियों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर समाज असंवेदनशील हो गया है। छेड़छाड़ और दुष्कर्म जैसे संगीन अपराधों पर चुप्पी साधने की संस्कृति अब खत्म करनी होगी। उम्मीद है कि यह आंदोलन महिला सुरक्षा के नाम पर मील का पत्थर साबित होगा।

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आम आदमी पार्टी से ताल्लुक रखने वाली स्वाति दो टूक कहती हैं, “हम बदलाव चाहते हैं। हर बार की तरह महिला हिंसा पर मौन धारण करने की आदत और सिस्टम में बदलाव हमारा मिशन है।”

उन्होंने आईएएनएस के साथ बातचीत में कहा, “अब बहुत हो गया, जुर्म करने वालों में कानून का कोई भय नहीं है। हमारी सीधी-सपाट मांग है कि नाबालिगों के साथ दुष्कर्म करने वालों को छह महीने के भीतर मौत की सजा मिले। छेड़छाड़ सहित अन्य मामलों में तेजी से सुनवाई हो, ताकि पीड़िता को समय पर न्याय मिल सके।

स्वाति ने कहा, “हम इस आंदोलन के तहत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लोगों के हस्ताक्षर युक्त एक लाख पत्र सौंपने जा रहे हैं, जिनमें महिला उत्पीड़न से निपटने के उपायों पर जोर होगा। आठ मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर शांतिपूर्ण मार्च के साथ बड़ा ऐलान भी हो सकता है।”

लोगों में पनप रही अपराध की प्रवृत्ति पर चिंता प्रकट करते हुए उन्होंने कहा, “हाल ही में आपने एक वीडियो देखा होगा, जिसमें एक शख्स डीटीसी की बस में डीयू की एक छात्रा के सामने खुलेआम हस्तमैथुन कर रहा है। उसे इस बात का भी डर नहीं है कि बस में 30 से 40 लोग बैठे हैं, छात्रा वीडियो बना रही है। वह बेधड़क बेशर्मी दिखा रहा है। हमारा समाज किस ओर जा रहा है? जब तक सरकार और समाज महिलाओं और बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध के खिलाफ खड़े नहीं होंगे, कुछ नहीं बदलेगा।”

डीसीडब्ल्यू प्रमुख ने कहा, “जब छात्रा ने बस में सवार उस शख्स की अश्लील हरकत की अन्य यात्रियों से शिकायत की, तब एक भी शख्स कुछ नहीं बोला, न मदद को आगे आया। हम वही लोग हैं, जो घर में बैठकर महिला सुरक्षा की लंबी-लंबी बातें किया करते हैं।”

महिला सुरक्षा के नाम पर स्वाति एक महीने के सत्याग्रह पर हैं। 31 जनवरी को शुरू इस सत्याग्रह के तहत स्वाति कार्यालय में ही रहकर सभी कामकाज कर रही हैं। उन्होंने कहा, “आज सत्याग्रह का 16वां दिन है। मैं 16 दिन से अपने घर नहीं गई हूं। मैं और मेरी टीम कार्यालय में ही रहकर दिन-रात काम कर रहे हैं। हमारी मांग यह भी है कि महिला अपराधों से संबंधित आईपीसी और पोस्को अधिनियम में आवश्यक संशोधन किया जाए। यौन उत्पीड़न के लिए अतिरिक्त फास्ट्रैक अदालतों की स्थापना की जाए। दिल्ली पुलिस में तत्काल 14,000 पदों पर नियुक्तियां की जाएं।”

इन आंदोलनों की जरूरतों पर स्पष्टीकरण देते हुए स्वाति ने कहा, “आप देख रही हैं, हालात क्या हैं.. लोग मूक दर्शक बने रहते हैं। किसी में कोई डर नहीं है। हमारी मांग है कि कम से कम छोटी बच्चियों को तो तुरंत न्याय दीजिए। हम ढाई साल से जूझ रहे हैं, इन अपराधों को बर्दाश्त कर रहे हैं। लोगों में यह डर बैठाना जरूरी है कि आप किसी महिला या बच्ची की अस्मिता से खिलवाड़ कर बच नहीं सकते।”

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