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Vinod Rai CAG Vinod Rai CAG

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संघ के 92 साल के इतिहास में विनोद राय की टक्कर का फ़रेबी और कोई नहीं हुआ!

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि मनगढ़न्त आरोपों, अफ़वाहों और झूठों की बदौलत कुछ लोगों ने ऐसी साज़िश रची जिससे सवा सौ करोड़ लोगों की आँखों में धूल झोंकी जा सके। लेकिन यहीं ये सौभाग्य भी देश के सामने है कि क़तरे-क़तरे पर पैनी नज़र रखने की अभ्यस्त हमारी अदालतों को गुमराह करना आसान नहीं है।

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संघियों का अटूट आभूषण है झूठ और अफ़वाह! इनका मुख्य भोजन है सत्ता और साज़िश! इनका प्रमुख स्वभाव है फ़रेब और मक्कारी! भारत माता की जय, वन्दे मातरम्, हिन्दुत्व, देशभक्ति, राष्ट्रद्रोह, तुष्टिकरण, सहिष्णुता, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, सैनिक, कश्मीरी ब्राह्मण, वंशवाद, राम, असली हिन्दू, मुसलमान, पाकिस्तान वग़ैरह ऐसे जुमले हैं जो संघियों की धमनियों में रक्त संचार करते हैं। संघी अपने कम से कम 137 पारिवारिक संगठनों में बिखरे पड़े हैं, लेकिन सबके चाल-चरित्र और चेहरे में एकरूपता हमेशा रहती है। 92 साल से यही संघियों का चिरस्थायी भाव है! इन्हीं गुणों से सम्पन्न एक बीज विनोद राय के नाम से पल्लवित-पुष्पित हुआ। अपने कुल-ख़ानदान के संस्कारों को किनारे रख इस होनहार ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में जगह पायी।

गोपनीय रही विनोद राय की जड़ें

क़रीब तीन दशकों तक इस ज़हरीले युवक विनोद राय ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े अपने अतीत की पहचान को छिपाये रखा। भारत सरकार में संयुक्त सचिव के ओहदे तक पहुँचते-पहुँचते इसने अपने छवि एक धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील अफ़सर की बना ली। इसीलिए सरकार चला रहे प्रणब मुखर्ज़ी, चिदम्बरम और मनमोहन सिंह जैसे अनुभवी और धुरन्धर नेताओं तथा सरकारी ख़ुफ़िया विभाग को भी शातिर विनोद राय की जड़ों का पता नहीं लग पाया। बिल्कुल उस अजीत डोभाल की तरह, जो आज राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं या उस सत्यपाल सिंह, के जे अल्फांसो, आर के सिंह और जनरल वीके सिंह की तरह जो आज मोदी सरकार में मंत्री हैं!

अपनी फ़र्ज़ी छवि की बदौलत की बदौलत विनोद राय, केन्द्र सरकार में पहले सचिव और फिर सीएजी यानी भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के संवैधानिक पदों को हथियाने में कामयाब रहा। सीएजी बनते ही विनोद राय जान चुका था कि उसे ज़िन्दगी का सर्वोच्च ओहदा मिल चुका है। अब उसे वहाँ से कोई नहीं हटा सकता। इसके बाद ही विनोद राय ने अपने ननिहाल यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अहसानों को उतारने की ठानी! उसने अपने संघी आकाओं के साथ बेहद गुप्त मशविरा करके मनमोहन सिंह सरकार की उन नीतियों की दुर्भावनापूर्ण समीक्षा करने की साज़िश तैयार की जो जल्द ही टेलीकॉम (2जी), कोयला ख़दान और कॉमनवेल्थ गेम्स घोटालों की रिपोर्टों के रूप में संसद में पेश की गयी!

संघ की महा-साज़िश

चूँकि ये रिपोर्टें देश की संवैधानिक संस्था सीएजी की थीं, इसीलिए बीजेपी ने इसी आधार पर काँग्रेस को आकंठ भ्रष्टाचारी क़रार देने की महा-साज़िश तैयार की। संसद का चक्का जाम किया गया। सोशल मीडिया पर झूठ फ़ैलाने वाले विकराल तंत्र को काँग्रेस के चरित्रहनन के काम में झोंक दिया। बूढ़े हो रहे आडवाणी को दरकिनार करके घोर कट्टरवादी नरेन्द्र मोदी को गुजरात से खींचकर दिल्ली लाने की योजना बनी। इसके लिए ‘गुजरात मॉडल’ का एक जिन्न भी पैदा किया गया। उधर, महँगाई और तेल के दाम को लेकर बीजेपी के बाक़ी नेताओं को सड़कों पर उतरकर तरह-तरह की नौटंकियाँ करने का हुक़्म मिला। जहाँ मनमोहन सिंह को मौनी, कमज़ोर और लाचार बताकर पेश किया गया। नेहरू गाँधी परिवार को बदनाम करने के लिए राहुल गाँधी को ‘पप्पू’, सोनिया को पुत्र-मोह से पीड़ित विदेशी और लाचार माँ तथा रॉबर्ट वाड्रा को बेईमान बताया गया।

उधर, मीडिया घरानों को भी भरपूर घुट्टी पिलायी गयी कि उन्हें क्या-क्या तथा कैसे-कैसे करना है? इसी वक़्त, तमाम साधू-सन्त-बाबा टाइप के फ़रेबियों को भी सेट कर दिया गया। अन्ना-केजरीवाल की दुकान भी खुलवायी गयी। बिल्ली के भाग से छींका टूटने वाला निर्भया काँड भी तभी हो गया! इसे भी मनमोहन सरकार की भारी नाकामी की तरह प्रस्तुत किया गया। हिन्दी-पट्टी में सवर्णों, ख़ासकर, ब्राह्मणों और क्षत्रियों को तरह-तरह का झाँसा देकर पटाया गया। कुलमिलाकर, संघ-परिवार ने हर तरह के व्यंजनों से छप्पन-भोग की ऐसी थाली तैयार की, जिससे हिन्दी-पट्टी की जनता को अपनी मुट्ठी में किया जा सके! इस मेगा-मास्टर-प्लान का एक ही उद्देश्य था कि येन-केन-प्रकारेण काँग्रेस से सत्ता छीनी जाए।

दरअसल, वाजपेयी सरकार के जाने के बाद बीजेपी दस साल से विपक्ष में थी। इस दौरान मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों की वजह से भारत की आर्थिक विकास-दर लगातार शानदार होती रही। विश्व में भारतीय अर्थव्यवस्था की धाक बढ़ती रही। उस दौर में सियासी तौर पर काँग्रेस अपने आप में भले ही बेहद शक्तिशाली नहीं थी, लेकिन यूपीए के रूप में ग़ैर-भाजपाई दलों का मज़बूत गठबन्धन उसके साथ था! ये मज़बूती इतनी टिकाऊ थी जैसे महाभारत का चक्रव्यूह! इसे भेदने का सारा दारोमदार विनोद राय रूपी शकुनि के हिस्से में डाला गया।

विनोद राय का सर्वश्रेष्ठ फ़रेब

फ़रेबी विनोद राय ने ‘परफ़ॉर्मेंस ऑडिट’ को अपना हथियार बनाया। इसमें सीएजी ने अपने आप ही ख़ुद को सरकार की नीतियों की समीक्षा का अधिकार और दायित्व दे दिया। हालाँकि, परम्परागत तौर पर ये उसके क्षेत्राधिकार में नहीं था। इसीलिए जब मौजूदा सीएजी राजीव महर्षि से कहा गया कि वो नोटबन्दी की नीति की समीक्षा भी उसी ‘परफ़ॉर्मेंस ऑडिट’ के रूप में करें तो उसने साफ़ कह दिया कि सरकारी नीतियों की समीक्षा करना सीएजी का नहीं बल्कि संसद का दायित्व है! हालाँकि, इसी व्याख्या को तोड़-मरोड़कर शातिर विनोद राय ने टेलीकॉम (2जी) और कोयला खदान में गड़बड़ी के इतने बड़े आँकड़े गढ़ दिये, जिसकी कल्पना भी नहीं हो सकती थी।

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The Diary of the Nation’s Conscience Keeper (Not Just An Accountant)

विनोद राय की साज़िश रंग लायी। संघ-परिवार ने काँग्रेस को सफलतापूर्वक इतना बदनाम कर दिया कि 2014 में उससे सत्ता छीन ली। वैसे, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए असंख्य झूठे वादे भी किये गये। लम्बे समय तक देश का जनमानस इनके झूठ पर ही यक़ीन करता रहा और काँग्रेस को राज्यों में भी चुनाव दर चुनाव नुकसान उठाना पड़ा। अब लगे हाथ संघियों के क़ारनामे को भी समझते चलिए। हम जानते हैं कि बिजली-पानी का दाम सरकार तय करती है। स्पेक्ट्रम और कोयला खदान भी बिजली-पानी की तरह प्राकृतिक संसाधन ही हैं। लिहाज़ा, यदि सीएजी ये कहे कि ‘बिजली-पानी की वो नीति ही ग़लत है जिसमें ‘पहले आओ पहले पाओ’ और ‘जिसने पहले पैसा जमा कराया उसने पहले सामान पाया’ की विधि से पूर्व निर्धारित दाम पर बेचा रहा है। इसकी जगह यदि बिजली-पानी की नीलामी होती तो सरकार को रोज़ाना 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा हो सकता था।’

‘ज़ीरो लॉस’ और 2जी

यहाँ यदि बिजली-पानी के दाम की तुलना अमेरिका या कुवैत या जापान के दाम से करके सरकार को हो रहे काल्पनिक नुकसान का अनुमान लगाया जाता, फिर उसे सीएजी की रिपोर्ट में घोटाला बताकर संसद में पेश कर दिया जाता, फिर देश-दुनिया में राग आलापा जाता कि सरकार ने बिजली-पानी के नाम पर देश को बेच डाला, मंत्रियों ने अपने घर भर लिये, यहाँ तक कि सारा काला धन विदेशी बैंकों में ठिकाने लगा दिया तो संसद में हंगामा क्यों लाज़िमी नहीं होता! मंत्री का इस्तीफ़ा क्यों नहीं होता! फिर सीबीआई जाँच होगी, आरोपियों की गिरफ़्तारी होगी, बिना मुक़दमा चले ही सारे आरोपियों को भ्रष्ट और राष्ट्रद्रोही कहा जाएगा, सियासत चमकायी जाएगी और चुनाव दर चुनाव देश को ‘काँग्रेस मुक्त’ बनाया जाएगा। क्योंकि संघियों को पता है देश में काँग्रेस से बड़ी चुनौती उन्हें और और नहीं दे सकता।

इस बीच, उस व्यक्ति का भी चरित्र-हनन किया जाएगा जो समझाना चाहता है कि अरे भाई, बिजली-पानी को नियत दाम पर बेचने की नीति से किसी सरकारी राजस्व का ग़बन नहीं हुआ। यही ‘ज़ीरो लॉस’ है। यही नहीं, ये अनुमान भी बिल्कुल काल्पनिक है कि यदि सरकार बिजली-पानी की नीलामी करती तो देश फिर से सोने की चिड़िया बन जाता! लेकिन जब देश का मीडिया आपकी अंगुलियों पर नाचने के लिए उतावला होगा तो समझदारी की हरेक बात को हवा-हवाई बनने में कितनी देर लगेगी!

बहरहाल, झूठ-छल-कपट-फ़रेब से सत्ता को हथियाने में मददगार बने को उनके योगदान के लिए कृतज्ञ संघ परिवार सम्मानित नहीं करें, ये भला कैसे होता! लिहाज़ा, विनोद राय जैसे शातिर को पद्मभूषण से सम्मानित करवाया गया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट को भी सेट करके वहाँ से उस नीति को ख़ारिज़ करवा दिया गया, जिसके मुताबिक़, सरकार बिजली-पानी के दाम को तय करके जनता को मुहैया करवा रही थी। उसके बाद से धूर्तों की जमात देश में गाना गाने लगेगी कि ‘देखो-देखो… सवा सौ करोड़ भारतवासियों, हमने बिजली-पानी की नीलामी की नीति को लागू करके 10 रुपये कमा लिये, क्योंकि हमें भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं है। जबकि पहले निर्धारित दाम पर बेचकर महज़ 5 रुपये इसलिए कमाये जा रहे थे क्योंकि उस नीति में भ्रष्टाचार था!

अब ज़रा सोचिए, जब चारों ओर, चप्पे-चप्पे पर दुष्प्रचार का बोल-बाला हो तो भला कौन समझेगा कि बिजली-पानी की अलग-अलग नीतियों का अपना-अपना नफ़ा-नुक़सान है! जैसे एक नीति कहती है कि बिजली-पानी के मुनासिब दाम पर होने से वो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की पहुँच में रहेगा। लोगों की ज़िन्दगी आसान रहेगी। वो स्वस्थ और ख़ुशहाल रहेंगे तो देश की तरक़्क़ी में ज़्यादा योगदान करेंगे। इससे ज़्यादा रोज़गार मिलेगा। लोगों की आमदनी बढ़ेगी तो वो ख़र्च भी ज़्यादा करेंगे और टैक्स भी ज़्यादा भरेंगे। इससे भी अन्ततः सरकार का राजस्व बढ़ेगा।

2जी ने खोदी बैंकों की क़ब्र

दूसरी ओर, नीलामी वाली नीति के समर्थक कहेंगे कि सबसे पहले तो बिजली-पानी के अधिक पैसे भरो, सरकार को ज़्यादा राजस्व दो, फिर चाहे तुम बिजली-पानी का इस्तेमाल करो या भाड़ में जाओ! इसका नतीज़ा ये होगा कि जनता ऊँचे से ऊँचे ब्याज पर बैंकों से क़र्ज़ा लेकर बिजली-पानी ख़रीदने के लिए मज़बूर होगी, क्योंकि बिजली-पानी के बग़ैर ज़िन्दगी चलेगी नहीं। उधर, बिजली-पानी के लिए क़र्ज़ देने वाले बैंकों की हालत बिगड़ेगी, उनका डूबत खातों की तादाद बढ़ जाएगी। और, देखते ही देखते बिजली-पानी की नीलामी वाली नीति बैंकों के सामने आसमान छूते एनपीए की सुर्ख़ियाँ बटोरते हुए काल की तरह खड़ा हो जाएगा!

फिर जनता को मिलेगी नोटबन्दी! क्योंकि कोई नीम-हक़ीम उनके कान में मंत्र फूँक देगा कि बैंकों का एनपीए मिटाने के लिए जनता का सारा पैसा बैंकों में खींच लो! इस क़वायद पर भी वास्तव में भारी रक़म ख़र्च होगी। इसका चूना भी जनता को ही लगेगा। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था को जो चपत लगेगी वो वास्तविक या असली होगी। जबकि 2जी घोटाले के झूठ में लिखी गयी 1.76 लाख करोड़ रुपये की रकम काल्पनिक थी। मज़े की बात ये भी होगी कि नोटबन्दी की नीति की समीक्षा के लिए कोई सीएजी रिपोर्ट नहीं बनायी जाएगी, क्योंकि नये ज़माने में शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं के मुखिया के बदलने से उसका अपना विधान भी तो बदल जाता है। इसीलिए कभी तो काल्पनिक नुक़सान का हिसाब भी लगा लिया जाता है, और कभी वास्तविक नुक़सान से भी मुँह फ़ेर लिया जाता है!

लेकिन वक़्त का पहिया तो लगातार घूमता रहता है। इसीलिए आख़िरकार वो दिन भी आता जब सारे झूठ, सारे ढकोसले, सारे दावे अदालत में फ़र्ज़ी साबित होते हैं। फिर नये तरह का एक और झूठ गढ़ा जाता है कि अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया इसका ये मतलब नहीं कि बिजली-पानी को तय दाम पर बेचने की नीति में भ्रष्टाचार नहीं था। किसी को बेईमान नहीं होने का सर्टिफ़िकेट कोर्ट कैसे दे सकता है? सर्टिफ़िकेट देना तो संघियों का जन्मजात विशेषाधिकार है। पुरानी नीति में भ्रष्टाचार हुआ है क्योंकि नीलामी की नीति पर चलने वालों ने दिखा दिया है कि बिजली-पानी से ज़्यादा कमाई हो सकती है!

स्वामी का मोदी पर हमला

इनका मानना है कि ‘हम ईमानदार हैं, क्योंकि हम कह रहे हैं। और, वो बेईमान है क्योंकि हमने उसे बेईमान कह दिया है! बस, बात ख़त्म!’ इसीलिए आये दिन अरूण जेटली को मूर्ख साबित करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने 2जी फ़ैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ही धज़्ज़ियाँ उड़ा दीं। स्वामी का कहना है कि ‘प्रधानमंत्री और उनकी सरकार भ्रष्टाचार के मामलों को गम्भीरता से नहीं ले रही है!’ इससे पहले यशवन्त सिन्हा भी देश की आँखें खोल चुके हैं कि ‘नोटबन्दी, एक निहायत ही बेवक़ूफ़ी भरा और अदूरदर्शी फ़ैसला था। इससे काले धन की रोकथाम तो छोड़िए, कुछ भी हासिल नहीं होने वाला, सिवाय जनता की दुश्वारियों के!’

बहरहाल, अब सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लफ़्फ़ाज़ को ये कौन बताए कि सीबीआई अपने आकाओं को ख़ुश रखने के लिए फ़र्ज़ी आरोप तो लगा सकती है लेकिन अदालत में इसे सही साबित करने के लिए फ़र्ज़ी सबूतों को वो आख़िर लाती तो लाती कहाँ से! अदालतों और सरकारी वकीलों की भी लाचारी है कि वो मोदी सरकार को ख़ुश करने के लिए मक्खी को तो देखकर भले ही निगल लें, लेकिन हाथी को भला कैसे निगलते! इसीलिए सारे के सारे आरोपी बाइज़्ज़त बरी हो गये। यहाँ तक सात साल तक आरोपों और सबूतों की चीड़-फाड़ करने वाले जज ओ पी सैनी को आख़िरकार ऐसी-ऐसी टिप्पणियाँ अपने फ़ैसले में लिखनी पड़ी जैसा देश के न्यायिक इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था।

उधर, विनोद राय जैसे धूर्ताधिराज ने ये साबित कर दिया कि वो एक अव्वल दर्जे का फ़र्ज़ी एकाउंटेंट और फ़रेबी ऑडिटर है। इसीलिए अब काँग्रेस का फ़र्ज़ बनता है कि वो ताल ठोंककर विनोद राय को बीजेपी का एजेंट बताये और उसके ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई की माँग करे। हालाँकि, ये भी सच है कि मोदी राज में धूर्त विनोद राय को किसी तरह का कष्ट नहीं होगा! वो बुराई के बेल की तरह नित बढ़ता ही रहेगा! मज़े की बात ये भी रही कि 2जी मामले के अगले ही दिन महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चाव्हाण को भी बॉम्बे हाईकोर्ट से क्लीन-चिट मिल गयी। वहाँ भी आदर्श घोटाले के सिलसिले में चाव्हाण के ख़िलाफ़ सीबीआई कोई सबूत नहीं पेश कर सकी। बीजेपी ने इस मामले को लेकर भी ख़ूब हाय-तौबा मचायी थी और काँग्रेस का जमकर चरित्रहनन किया था।

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि मनगढ़न्त आरोपों, अफ़वाहों और झूठों की बदौलत कुछ लोगों ने ऐसी साज़िश रची जिससे सवा सौ करोड़ लोगों की आँखों में धूल झोंकी जा सके। लेकिन यहीं ये सौभाग्य भी देश के सामने है कि क़तरे-क़तरे पर पैनी नज़र रखने की अभ्यस्त हमारी अदालतों को गुमराह करना आसान नहीं है। फ़िलहाल, झूठ-फ़रेब और अज्ञानता के अथाह अन्धकार वाले मोदी युग से गुज़र रहे भारतवर्ष के लिए यही उम्मीद की आख़िरी किरण है! यही किरण आश्वस्त भी कर रही है कि यदि 2019 में मौजूदा दुर्योग का ख़त्म होना तय है। क्योंकि भारतीय समाज में देर तो क़दम-क़दम पर है, लेकिन अन्धा-युग अनन्तकाल तक कभी नहीं रहा!

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘एक देश एक चुनाव’ यानी जनता को उल्लू बनाने के लिए नयी बोतल में पुरानी शराब

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MODI-SHAH

आज देश की बड़ी चुनौतियों में से प्रमुख है कि ये कैसे तय हो कि ‘जनता को उल्लू बनाने वाले नेता’ या ‘उल्लू बनने वाले लोगों’ में से कौन बड़ा बेवकूफ़ है? ये सवाल खड़ा होता है बीजेपी के उस ताज़ा शिगूफ़े से, जिसे ‘एक देश एक चुनाव’ के ढोल के रूप में पीटा जा रहा है। हालाँकि, इस लिहाज़ से बयानबाज़ी के सिवाय कुछ नहीं हो रहा। कुछ होगा भी नहीं। कुछ होना भी नहीं है। 2019 में तो हर्ग़िज़ नहीं! क्योंकि ‘एक देश एक चुनाव’ की कल्पना को हवा देने वालों का असली मक़सद बदलाव लाना नहीं बल्कि इसकी आड़ में सियासी रोटियाँ सेंकना है। इसीलिए सारे प्रसंग को ‘जनता को उल्लू बनाने’ की कवायद भी कह सकते हैं।

हम देख चुके हैं कि बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में जितनी बातें की थी, उनमें से ज़्यादातर का ताल्लुक ‘जनता को उल्लू बनाने’ से ही रहा है। याद है ना कि इन्होंने कश्मीरी पंडितों की घर वापसी के लिए कितना ढोल पीटा था! लेकिन हुआ क्या? एक भी कश्मीरी पंडित की आज तक घर वापसी नहीं हुई। मोदी राज से पहले भी बेचारे कश्मीरी पंडित अपने ही देश में ‘शरणार्थी’ थे और आज भी हैं! यही आलम अच्छे दिन, कालाधन वापसी, हर खाते में 15-15 लाख, सालाना दो करोड़ रोज़गार के अवसर, किसानों की आमदनी दोगुनी करने, महँगाई, पेट्रोल-डीज़ल-रसोई गैस के दाम, रुपये की गिरती क़ीमत, गंगा की सफ़ाई, बेटी बचाओ जैसे असंख्य जुमलों का भी रहा है।

लोकसभा के चुनाव महज नौ महीने दूर हैं। 2014 में जैसी हवा बीजेपी के पक्ष में बनी थी, उससे कहीं अधिक तीखी हवा अब बीजेपी के ख़िलाफ़ बह रही है। जनता मोदी राज की निपट जुमलेबाज़ी से तंग आ चुकी है। नोटबन्दी और जीएसटी जैसी नीतियों ने हरेक व्यक्ति को तकलीफ़ें दी हैं। इन्हें लेकर जितने सब्जबाग़ सजाये गये थे, वो सभी खोखले साबित हुए हैं। उल्टा साम्प्रदायिकता, गाय-गोबर-बीफ़-लिंचिंग और हिन्दू-मुसलमान के रूप में  नफ़रत का जैसा माहौल बीजेपी ने देश को दिया है, उससे आम जनता बेहद ख़फ़ा है। इसी से जनता का ध्यान भटकाने के लिए ‘एक देश एक चुनाव’ का पासा फेंका गया है।

झूठ फैलाया जा रहा है कि लोकसभा के साथ कम से कम 11 राज्यों के चुनाव तो संविधान में संशोधन किये बग़ैर ही करवाये जा सकते हैं। यदि ऐसा हो सकता है कि सरकार वैसे ही ताल ठोंककर ऐसा करने का ऐलान क्यों नहीं करती, जैसे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने ऐलान कर दिया कि उन बाँग्लादेशी घुसपैठियों को कोई दिक्कत नहीं होगी, जो हिन्दू हैं। इसे ‘हिन्दू अन्दर मुसलमान बाहर’ कह सकते हैं। ये बात भी कभी लागू नहीं होगी। क्योंकि मोदी सरकार जिन-जिन कामों को नहीं करना चाहती है, उसके लिए विपक्ष पर ठीकरा फोड़ती है।

सत्ता में आप हैं। ‘एक देश एक चुनाव’ को लागू करने से आपको कोई नहीं रोक रहा। कोई रोक भी नहीं सकता। लिहाज़ा, करके दिखाइए। अपनी नाकामी का दारोमदार विपक्ष पर थोपने का कोई तुक़ नहीं हो सकता। सलाह-मशविरे की नौटंकी आप सिर्फ़ इसलिए करना चाहते हैं क्योंकि आपको सिर्फ़ जनता को उल्लू बनाना है कि आप देश में सुधार लाना चाहते हैं और विपक्ष ऐसा नहीं चाहता। आपको देशहित की परवाह है, जबकि विपक्ष देशहित के ख़िलाफ़ है। क्या नोटबन्दी से पहले, सर्ज़िकल हमले से पहले, पठानकोट में आईएसआई को बुलाने से पहले, बैंक लुटवाने से पहले, राफेल सौदे से पहले आपने विपक्ष से मशविरा किया था? नहीं ना! इन मोर्चों पर आप जो करना चाहते थे, वो आपने किया। वो बात अलग है कि आपको करने का शऊर नहीं था। इसीलिए आपकी नीयतख़ोरी की कलई खुलती चली गयी!

‘एक देश एक चुनाव’ को लेकर विधि आयोग से मुलाक़ात का कोई तुक़ नहीं है। विधि आयोग को इस लिहाज़ से कुछ नहीं करना है। चुनाव करवाने का काम चुनाव आयोग का है। वो जन-प्रतिनिधित्व क़ानून और संविधान से बँधा है। संविधान ने संसद और विधानसभाओं की मियाद पाँच साल तय कर रखी है। आप इस प्रावधान को बदल दीजिए। बस, हो गया काम। समस्या ख़त्म। फिर करवाइए ‘एक देश एक चुनाव’! हिम्मत है तो सारा ज़ोर संविधान संशोधन पर लगाइए। विपक्ष यदि रोड़ा अटकाएगा तो ख़ुद बेनक़ाब होगा। जनता है ना, उससे निपटने के लिए।

अरे यदि आपकी मंशा सही होती तो अब तक ‘एक देश एक चुनाव’ का रास्ता साफ़ हो चुका होता। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को शायद ही याद हो कि बीजेपी ने 2014 के चुनाव घोषणापत्र में ‘एक देश एक चुनाव’ के सिद्धान्त को अपनाने का वादा किया था। उसके बाद मोदी राज में ही, 2015 में, संसद की स्थायी समिति की 79वीं रिपोर्ट में ‘एक देश एक चुनाव’ के सिद्धान्त की पुरज़ोर सिफ़ारिश की। अब तो अब जबाब दीजिए कि 51 महीने बीतने के बावजूद ‘एक देश एक चुनाव’ का वादा लागू क्यों नहीं हुआ? सरकार बताये कि उसने सवा चार साल तक अपने घोषणापत्र और संसदीय रिपोर्ट को लेकर किया क्या?

सवा चार साल में भी बस, बयानबाज़ी होती रही। मोदी-शाह ख़ुद भी जहाँ-तहाँ बस बोलते ही रहे। 5 सितम्बर 2016 को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भी बोलवाया। लेकिन ज़मीन पर हुआ कुछ भी नहीं। एक इंच भी बात आगे नहीं बढ़ी। संसद से पहले 1983 में निर्वाचन आयोग की सालाना रिपोर्ट में भी ‘एक देश एक चुनाव’ की पैरवी की गयी थी। मोदी-शाह कह सकते हैं कि ‘एक देश एक चुनाव’ को पहले की सरकारों को ही लागू कर देना चाहिए था। ये बात सही है। लेकिन यदि सारे काम पिछली सरकारें ही कर पातीं तो नयी सरकारें क्या करतीं! उन्होंने नहीं किया तो जनता ने उनका हिसाब किया। आप नहीं करेंगे तो क्या जनता आपको बख़्श देगी!

अभी आपके इशारे पर, भक्त मीडिया ये फैला रहा है कि आप ‘एक देश एक चुनाव’ को सर्वसम्मति से लागू करना चाहते हैं। इसके लिए सर्वदलीय बैठक बुलाना चाहते हैं। लगे हाथ ये भी बता दीजिए कि क्या बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में ये शर्त रखी थी कि वो ‘एक देश एक चुनाव’ का वादा तभी निभाएगी जब सभी राजनीतिक दल सर्वसम्मति पैदा करके उससे इसे लागू करने की फ़रियाद करेंगे? अरे, आप किसे उल्लू बनाना चाहते हैं! सर्वदलीय बैठक के लिए आपको विधि आयोग की किसी सिफ़ारिश की ज़रूरत नहीं है। ये सरकार का काम है। लेकिन सरकार का इरादा तो जनता को ग़ुमराह करने का है, इसीलिए बीजेपी के प्रतिनिधिमंडल ने विधि आयोग से मुलाक़ात का स्वाँग बिल्कुल ऐसे रचा, जैसे ‘नयी बोतल में पुरानी शराब!’ जनता को उल्लू बनाने के लिए चुनाव तक आये दिन इसी शराब को परोसा जाएगा!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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अरे, ये ‘तेल-पानी का मिलन’ नहीं, मोदी राज का मर्सिया है!

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MODI-SHAH

बेशक़, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को विपक्षी एकजुटता ने बेचैन कर दिया है। इससे तिलमिलाए मोदी ने अपने चिर-परिचित अन्दाज़ में ताबड़तोड़ और लम्बी-चौड़ी फेंकने का रास्ता थाम लिया। उनकी ताज़ा पेशकश है कि विपक्ष का निर्माणाधीन गठबन्धन, जो ‘तेल-पानी का बेमेल संगम है, जिसके बाद न तेल काम का रहता है और ना पानी!’ शायद, मोदी भूल चुके हैं कि वो ख़ुद भी तेल-पानी के बेमेल संगम वाली उस नाँव पर सवार हैं, जिसे एनडीए यानी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन कहते हैं।

दरअसल, संघ-बीजेपी और मोदी-शाह इस ख़ुशफ़हमी में हैं कि एनडीए के दल एक-दूसरे के साथ इसलिए गलबहियाँ डाले हुए हैं क्योंकि वो प्राकृतिक गठबन्धन है। जबकि ज़मीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। उद्धव की शिवसेना, महबूबा की पीडीपी और चन्द्रबाबू की टीडीपी का अफ़साना सबके सामने है! ये नये किस्से हैं। पुराने तज़ुर्बों की बातें तो बहुत लम्बी-चौड़ी हैं। अटल बिहारी वाजपेयी आज इस हालत में नहीं हैं कि वो अपने सियासी वंशजों को गठबन्धन पर मुँह निपोड़ने से आगाह कर सकें। दरअसल, मोदी-शाह को ये समझना होगा कि गठबन्धन कभी प्राकृतिक नहीं होता।

मजबूरी और आपसी निर्भरता हरेक गठबन्धन की बुनियादी शर्त है। फिर भी कुछ गठबन्धन स्वाभाविक होते हैं तो कुछ सत्तालोलुप और मौक़ापरस्त। अच्छा हो या बुरा, हरेक गठबन्धन सियासी ही होता है। वाम मोर्चा और शिवसेना-अकाली-बीजेपी के गठबन्धन को स्वाभाविक माना जा सकता है। जबकि नीतीश, पासवान और महबूबा जैसों की नज़दीकी विशुद्ध रूप से सत्तालोलुप और मौक़ापरस्त गठबन्धन की श्रेणी में आएगी। इसीलिए मौक़ापरस्तों को बार-बार दावा करना पड़ता है कि वो बीजेपी के साम्प्रदायिक एजेंडे के ख़िलाफ़ हैं। इनके पास कभी इस सवाल का जबाब नहीं होता कि यदि वो संघियों की साम्प्रदायिकता ख़िलाफ़ हैं तो उस पर नकेल कसने के लिए करते क्या हैं?

गठबन्धन की एक और किस्म उन दलों से जुड़ी है जिनका अपने मुख्य विरोधी के रूप में काँग्रेस या बीजेपी से मुक़ाबला होता है। पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी ने टिकाऊ गठबन्धन की मिसाल क़ायम की, तो उन्हें सत्ता से बेदख़ल भी गठबन्धन ने ही किया। ऐसे दोनों गठबन्धनों यानी एनडीए और यूपीए के जन्म के दरम्यान वाजपेयी के कई सहयोगी पाला बदल चुके थे। गठबन्धनों में आना-जाना भले ही सामान्य हो, लेकिन बीजेपी से छिटकने वाले दलों की संख्या काँग्रेस के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा रही है। एक दौर था जब करूणानिधि, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, मायावती, फ़ारूख़ अब्दुल्ला, ओम प्रकाश चौटाला और चन्द्रबाबू नायडू ने बीजेपी की मदद से सत्ता-सुख भोगा। बीजेपी से गलबहियाँ का इनका तज़ुर्बा ऐसा रहा कि अगली बार इन्होंने भगवा गोदी से तौबा कर ली। जयललिता और नवीन पटनायक ने भले ही समय-समय पर एनडीए की मदद की, लेकिन दोनों ने बीजेपी से ख़ासी दूरी भी बनाये रखी।

Opposition leaders

In Pics: Opposition unity on display for 2019 as HD Kumaraswamy sworn in as Karnataka Chief Minister

इसीलिए जिन्हें विपक्षी दलों का निर्माणाधीन महागठबन्धन, ‘तेल और पानी के मेल’ जैसा दिख रहा है, उन्हें ज़रा अपने गठबन्धन के गिरेबान में भी झाँक लेना चाहिए। अरे, गठबन्धन का अर्थ ही है बेमेल को मेल बनाने का कौशल! दूसरों पर ‘तेल और पानी के मेल’ का कीचड़ फेंकने वाले नरेन्द्र मोदी को क्या याद है कि बेमेल जोड़-तोड़ की सबसे बड़ी मिसाल तो वो ख़ुद हैं! पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर उन्होंने ऐसा बेमेल गठजोड़ बनाया कि वो न तो वर के काम आया और ना वधू के! उस गठबन्धन की गाँठ भी इतनी वाहियात निकली कि वर-वधू में से कोई भी उससे पिंड छुड़ाने नहीं गया। दोनों अभी तक गाँठ को दुम में लटकाये ढो रहे हैं!

धार्मिक अनुष्ठान के तहत वैदिक मंत्रोचार के बीच स्थापित वो गठबन्धन तकनीकी रूप से आज भी जीवित है। लेकिन जनाब नरेन्द्र मोदी और उनके प्रथम भक्त अमित शाह ने तो कभी उस गठबन्धन को तेल-पानी का संगम नहीं कहा। कभी उस नारी के हक़, गरिमा और स्वाभिमान की परवाह नहीं की जिसे बाक़ायदा, विधि-विधान से और गाजे-बाजे के साथ ब्याह कर लाया गया था। इसीलिए इन्हें जितनी परवाह तीन तलाक़ और हलाला से पीड़ित महिलाओं के अधिकारों की होती है, उतनी मुज़फ़्फ़रपुर, देवरिया, हरदोई, पटना जैसी जगहों पर रहने वाली बेसहारा महिलाओं के लिए क्यों नहीं होती?

बीजेपी की नैतिकता में यदि ज़रा भी दम होता तो इन दुष्कर्मों और बर्बरता की वारदातों के बाद वहाँ की सरकारें एक पल भी सत्ता में नहीं रह पातीं। ऐसे मामलों में प्रधानमंत्री को ‘तेल और पानी का बेमेल संगम’ कहीं नज़र नहीं आता। इसी तरह, बंगाल में दुर्गा पूजा में ख़लल पड़ने पर अमित शाह, सचिवालय की ईंट से ईंट बजा देने की धमकी तो देते हैं, लेकिन बेसहारा नारियों के ठिकानों पर साक्षात दुर्गाओं के साथ हो रहे ज़ुल्म को लेकर ना तो उनका ख़ून खौलता है और न ही उन्हें कहीं कोई ईंट दिखायी देती है।

भगवा ख़ानदान से जुड़ा एक भी नेता, कार्यकर्ता या ट्रोल ऐसा नहीं है, जिसे इस बात की चिन्ता खाये जा रही हो कि मोदी सरकार ने अभी तक अपना एक भी वादा निभाकर नहीं दिखाया! किसी मोदी भक्त को परवाह नहीं है कि चुनाव में विकास और अच्छे दिन की छटा को जनता को कैसे दिखाया जाएगा? हिन्दू-मुसलमान में उलझे भक्तों को अब एनआरसी के रूप में नया शिगूफ़ा मिल गया है। गाय-गोबर-बीफ़-लिंचिंग, लव-जिहाद, एंटी रोमियो, दलित उत्पीड़न जैसे कारतूसों को फ़ुस्स होता देख भगवा ख़ेमे में बेहद मायूसी है। इसीलिए विपक्षी एकजुटता का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।

विपक्षी एकता के अलावा बीजेपी के हरेक नेता को एनआरसी यानी नैशनल रज़िस्टर ऑफ़ सिटीजन्स की चिन्ता भी बहुत सता रही है। भगवा ख़ानदान को लगता है कि एनआरसी के रूप में उसे अलाद्दीन का चिराग़ या हर मर्ज़ की दवा मिल गयी है! दरअसल, कल तक जो भारत को काँग्रेस मुक्त करने का दावा कर रहे थे, उसे मरा हुआ बता रहे हैं, उन्हें अब ‘मरी हुई काँग्रेस और ज़िन्दा मुसलमानों’ का ख़ौफ़ जीने नहीं दे रहा। मोदी बेचैन हैं कि वो जिस काँग्रेस को मृतप्राय बताते नहीं अघाते थे, जनता उसे पुनर्जीवित कर रही है। तमाम विपक्षी दिग्गज काँग्रेस के साथ लामबन्द होकर उस फिर से सत्ता में लाना चाहते हैं, जिसे बड़ी मुश्किल से, असंख्य से झूठ फैलाकर मोदी की बीजेपी और एनडीए ने सत्ता से बाहर किया था।

अपने जुमलेबाज़ और अहंकारी स्वभाव की वजह से मोदी ये समझने में असमर्थ हैं कि देश को उनसे मुक्ति दिलाने के लिए शेर और बकरी भी एक घाट पर पानी पीने के लिए तैयार हो गये हैं। सियासत, इसीलिए अनन्त सम्भावनाओं की विधा है! इसीलिए, कल तक विकास की बाँसुरी बजा रहे अमित शाह अब बौराये हुए हैं कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगले बग़ैर हिन्दुओं को झाँसा कैसे देंगे? उनकी इसी दुविधा को देखते हुए संघ ने बाँग्लादेशी घुसपैठियों के लिए ‘हिन्दू अन्दर, मुस्लिम बाहर’ की नीति बनायी है। जो भी इस नीति में साम्प्रदायिकता, हिन्दू तुष्टिकरण या हिन्दू राष्ट्र जैसी बातों की बू सूँघने की ज़ुर्रत करेगा, उसे देशद्रोही माना जाएगा और फ़ौरन लिंचिंग की सज़ा मिलेगी!

2019 में बीजेपी ने 350 सीटें जीतने वाला मुँगेरी लाल का अद्भुत सपना देखा है। इस सपने का झाँसा देने के लिए फेंकने की आदत से लाचार होने अनिवार्य है। इसीलिए नरेन्द्र मोदी को रोज़ाना कुछ न कुछ फेंके बग़ैर चैन नहीं मिलता। वो देश में हों या विदेश में, फेंकने का योगाभ्यास जारी रहता है। फेंकना अब उनके लिए शौक़ नहीं बल्कि नशा बन चुका है। एकजुट विपक्ष उन्हें नशामुक्त कर देगा, इसीलिए वो अपने विरोधियों के लिए हमेशा उटपटांग शब्द ही ढूँढ़ते रहते हैं। अभी राज्यसभा में इसी नशे की वजह से उन्होंने ‘बीके’ में ‘बिके’ बना दिया। इससे प्रधानमंत्री की गरिमा को ऐसी चोट पहुँची जैसा 70 साल में कभी नहीं हुआ। इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री के शब्द सदन की कार्यवाही से बाहर किये गये।

modi-narendra-gujarat

नरेन्द्र मोदी अपनी छीछालेदर से कभी शर्मिन्दा नहीं होते। शायद, कम शिक्षित होने की वजह से ऐसा होता हो। मुमकिन है कि कामदार और चौकीदार जैसे जुमलों के अति-इस्तेमाल की वजह से उनका मन-मस्तिष्क वैसे ही ढीठ हो गया हो जैसे कई किस्म के एंटीबायटिक असरहीन बन जाते हैं। मोदी की तरह अमित शाह को भी ‘लपलपाती जीभ’ वाले असाध्य रोग ने जकड़ रखा है। इस रोग के लक्षणों ने 2013 में ही उस वक़्त महामारी का रूप ले लिया था जब गुजरात मॉडल, अच्छे दिन, महँगाई की मार, पेट्रोल और डॉलर के भाव, काला धन वापस लाने, सबको 15–15 लाख रुपये देने जैसे जुमलों ने धमाका किया था। तब भारत की भोली-भाली जनता समझ नहीं पायी कि उन्हें उल्लू बनाया गया है।

मज़े की बात ये है कि 2014 के बाद तीन साल तक जनता के उल्लू बनने का संक्रमण राज्य दर राज्य फैलता गया। संघी मदमस्त थे कि जनता में इस बात की होड़ लग चुकी है कि अन्य राज्यों की तरह हम भी कम से कम एक बार तो बीजेपी के झूठे वादों और इरादों को चखकर ज़रूर देखेंगे। लेकिन जिस तरह से तमाम विपक्षी नेताओं ने बीजेपी को एक बार आज़माने के बाद उसे अगली बार के लिए भरोसेमन्द नहीं पाया, उसी तरह से तमाम उपचुनावों में जनता भी उस बीजेपी से अपना दामन छुड़ाने लगी, जिसे थोड़े वक़्त पहले उसने चुना था।

इसीलिए, विपक्षी एकता को ‘तेल-पानी का मिलन’ बताने वाले गाँठ बाँध लें कि उनका नज़रिया ‘दिल बहलाने को ग़ालिब ख़्याल अच्छा है’ के सिवाय और कुछ नहीं है! यही मोदी राज का मर्सिया है! फ़िलहाल, बीजेपी की झूठ फैलाने वाली महामारी का प्रकोप देश को अभी और नौ महीने तक सताता रहेगा। तब तक जनता को ‘तेल-पानी के बेमेल मिलन’, ‘हिन्दू अन्दर, मुस्लिम बाहर’ जैसी असंख्य बातें वैसे ही बतायी जाएँगी जैसे ‘अच्छे दिन’ का खेल हुआ था!

मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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70 साल में पहली बार किसी प्रधानमंत्री के शब्द संसद की कार्रवाई से हटाये गये

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भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि प्रधानमंत्री के शब्दों को आपत्तिजनक, अमर्यादित और अवांछित मानते हुए उसे सदन कार्यवाही से हटा दिया गया है! गुरुवार, 9 अगस्त को राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव हुआ। इसमें विजयी हुए एनडीए के उम्मीदवार हरिवंश नारायण सिंह को बधाई देने के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जो भाषण दिया, उसके एक अंश को सदन की कार्यवाही से हटा दिया गया है। प्रधानमंत्री के शब्दों पर राष्ट्रीय जनता दल के सदस्य मनोज झा ने सख़्त ऐतराज़ जताया था। उन आपत्तियों को सही पाने के बाद सभापति वेंकैया नायडू ने मोदी के शब्दों को राज्यसभा की कार्यवाही से बाहर कर दिया।

मोदी ने कहा था कि “ये ऐसा चुनाव था, जिसमें दोनों तरफ ‘हरि’ थे, लेकिन एक के नाम के आगे बी.के. था – ‘बी.के. हरि’, कोई न बिके। इधर भी हरि थे, लेकिन नाम के आगे कोई बी.के., वी.के. नहीं था। मैं श्री बी.के. हरिप्रसाद जी को भी…।” इसी बयान से वेंकैया नायडू ने ‘कोई न बिके’ वाले शब्दों को राज्यसभा की कार्यवाही से निकाल दिया है। क्योंकि मनोज झा का कहना था कि ‘बिके, बिका, बिकना’ जैसे शब्द का इस्तेमाल ग़लत मंशा से किया गया है। इसीलिए उसे दुर्भावनापूर्ण और आपत्तिजनक मानते हुए सदन की कार्यवाही से बाहर किया जाए।

सभापति वेंकैया नायडू ने इस पर ग़ौर फ़रमाने का वादा किया। इसके बाद राज्यसभा सचिवालय की ओर से जानकारी दी गयी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, मनोज झा और केन्द्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास अठावले के भी आपत्तिजनक शब्दों को सदन की कार्यवाही से बाहर कर दिया गया है। इसी प्रसंग में रामदास अठावले से तुकबन्दी भरी कविता सुनाते हुए कहा था कि “लेकिन हरिप्रसाद को काँग्रेस ने दे दिया है धोखा”। इस वाक्य से ‘धोखा’ शब्द को कार्यवाही से हटा दिया। राम दास अठावले के बेतुके और आपत्तिजनक शब्दों को पहले भी कई बार संसद की कार्यवाही से हटाया गया है। लेकिन किसी प्रधानमंत्री के शब्द को ग़लत पाये जाने का ये अपनी तरह का पहला मामला है।

दरअसल, नरेन्द्र मोदी अक्सर ही अपनी लपलपाती ज़ुबान की वजह से विपक्ष के निशाने पर रहते हैं। उन्हें अपने राजनीतिक विरोधियों के लिए अमर्यादित और अनुपयुक्त शब्दों के इस्तेमाल से कभी गुरेज नहीं होता। विरोधियों से चुटकी लेने की आड़ में मोदी शब्दों की लक्ष्मण रेखा को अक्सर तोड़ते नज़र आते हैं। उन्हें इसमें बहुत मज़ा आता है। वो इसे अपनी बहादुरी समझते हैं। तभी तो उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘रेनकोट पहनकर नहाने वाला’ और ‘देशद्रोही’ कहने में अपार आनन्द की अनुभूति होती है। मोदी ने राहुल, सोनिया, ममता, लालू, नीतीश, मायावती, मुलायम जैसे अपने हरेक राजनीतिक विरोधी के लिए अक्सर ही निम्नस्तरीय शब्दों का इस्तेमाल किया है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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