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Vinod Rai CAG Vinod Rai CAG

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संघ के 92 साल के इतिहास में विनोद राय की टक्कर का फ़रेबी और कोई नहीं हुआ!

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि मनगढ़न्त आरोपों, अफ़वाहों और झूठों की बदौलत कुछ लोगों ने ऐसी साज़िश रची जिससे सवा सौ करोड़ लोगों की आँखों में धूल झोंकी जा सके। लेकिन यहीं ये सौभाग्य भी देश के सामने है कि क़तरे-क़तरे पर पैनी नज़र रखने की अभ्यस्त हमारी अदालतों को गुमराह करना आसान नहीं है।

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संघियों का अटूट आभूषण है झूठ और अफ़वाह! इनका मुख्य भोजन है सत्ता और साज़िश! इनका प्रमुख स्वभाव है फ़रेब और मक्कारी! भारत माता की जय, वन्दे मातरम्, हिन्दुत्व, देशभक्ति, राष्ट्रद्रोह, तुष्टिकरण, सहिष्णुता, ईमानदारी, कर्तव्यनिष्ठा, सैनिक, कश्मीरी ब्राह्मण, वंशवाद, राम, असली हिन्दू, मुसलमान, पाकिस्तान वग़ैरह ऐसे जुमले हैं जो संघियों की धमनियों में रक्त संचार करते हैं। संघी अपने कम से कम 137 पारिवारिक संगठनों में बिखरे पड़े हैं, लेकिन सबके चाल-चरित्र और चेहरे में एकरूपता हमेशा रहती है। 92 साल से यही संघियों का चिरस्थायी भाव है! इन्हीं गुणों से सम्पन्न एक बीज विनोद राय के नाम से पल्लवित-पुष्पित हुआ। अपने कुल-ख़ानदान के संस्कारों को किनारे रख इस होनहार ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में जगह पायी।

गोपनीय रही विनोद राय की जड़ें

क़रीब तीन दशकों तक इस ज़हरीले युवक विनोद राय ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े अपने अतीत की पहचान को छिपाये रखा। भारत सरकार में संयुक्त सचिव के ओहदे तक पहुँचते-पहुँचते इसने अपने छवि एक धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील अफ़सर की बना ली। इसीलिए सरकार चला रहे प्रणब मुखर्ज़ी, चिदम्बरम और मनमोहन सिंह जैसे अनुभवी और धुरन्धर नेताओं तथा सरकारी ख़ुफ़िया विभाग को भी शातिर विनोद राय की जड़ों का पता नहीं लग पाया। बिल्कुल उस अजीत डोभाल की तरह, जो आज राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं या उस सत्यपाल सिंह, के जे अल्फांसो, आर के सिंह और जनरल वीके सिंह की तरह जो आज मोदी सरकार में मंत्री हैं!

अपनी फ़र्ज़ी छवि की बदौलत की बदौलत विनोद राय, केन्द्र सरकार में पहले सचिव और फिर सीएजी यानी भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के संवैधानिक पदों को हथियाने में कामयाब रहा। सीएजी बनते ही विनोद राय जान चुका था कि उसे ज़िन्दगी का सर्वोच्च ओहदा मिल चुका है। अब उसे वहाँ से कोई नहीं हटा सकता। इसके बाद ही विनोद राय ने अपने ननिहाल यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अहसानों को उतारने की ठानी! उसने अपने संघी आकाओं के साथ बेहद गुप्त मशविरा करके मनमोहन सिंह सरकार की उन नीतियों की दुर्भावनापूर्ण समीक्षा करने की साज़िश तैयार की जो जल्द ही टेलीकॉम (2जी), कोयला ख़दान और कॉमनवेल्थ गेम्स घोटालों की रिपोर्टों के रूप में संसद में पेश की गयी!

संघ की महा-साज़िश

चूँकि ये रिपोर्टें देश की संवैधानिक संस्था सीएजी की थीं, इसीलिए बीजेपी ने इसी आधार पर काँग्रेस को आकंठ भ्रष्टाचारी क़रार देने की महा-साज़िश तैयार की। संसद का चक्का जाम किया गया। सोशल मीडिया पर झूठ फ़ैलाने वाले विकराल तंत्र को काँग्रेस के चरित्रहनन के काम में झोंक दिया। बूढ़े हो रहे आडवाणी को दरकिनार करके घोर कट्टरवादी नरेन्द्र मोदी को गुजरात से खींचकर दिल्ली लाने की योजना बनी। इसके लिए ‘गुजरात मॉडल’ का एक जिन्न भी पैदा किया गया। उधर, महँगाई और तेल के दाम को लेकर बीजेपी के बाक़ी नेताओं को सड़कों पर उतरकर तरह-तरह की नौटंकियाँ करने का हुक़्म मिला। जहाँ मनमोहन सिंह को मौनी, कमज़ोर और लाचार बताकर पेश किया गया। नेहरू गाँधी परिवार को बदनाम करने के लिए राहुल गाँधी को ‘पप्पू’, सोनिया को पुत्र-मोह से पीड़ित विदेशी और लाचार माँ तथा रॉबर्ट वाड्रा को बेईमान बताया गया।

उधर, मीडिया घरानों को भी भरपूर घुट्टी पिलायी गयी कि उन्हें क्या-क्या तथा कैसे-कैसे करना है? इसी वक़्त, तमाम साधू-सन्त-बाबा टाइप के फ़रेबियों को भी सेट कर दिया गया। अन्ना-केजरीवाल की दुकान भी खुलवायी गयी। बिल्ली के भाग से छींका टूटने वाला निर्भया काँड भी तभी हो गया! इसे भी मनमोहन सरकार की भारी नाकामी की तरह प्रस्तुत किया गया। हिन्दी-पट्टी में सवर्णों, ख़ासकर, ब्राह्मणों और क्षत्रियों को तरह-तरह का झाँसा देकर पटाया गया। कुलमिलाकर, संघ-परिवार ने हर तरह के व्यंजनों से छप्पन-भोग की ऐसी थाली तैयार की, जिससे हिन्दी-पट्टी की जनता को अपनी मुट्ठी में किया जा सके! इस मेगा-मास्टर-प्लान का एक ही उद्देश्य था कि येन-केन-प्रकारेण काँग्रेस से सत्ता छीनी जाए।

दरअसल, वाजपेयी सरकार के जाने के बाद बीजेपी दस साल से विपक्ष में थी। इस दौरान मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों की वजह से भारत की आर्थिक विकास-दर लगातार शानदार होती रही। विश्व में भारतीय अर्थव्यवस्था की धाक बढ़ती रही। उस दौर में सियासी तौर पर काँग्रेस अपने आप में भले ही बेहद शक्तिशाली नहीं थी, लेकिन यूपीए के रूप में ग़ैर-भाजपाई दलों का मज़बूत गठबन्धन उसके साथ था! ये मज़बूती इतनी टिकाऊ थी जैसे महाभारत का चक्रव्यूह! इसे भेदने का सारा दारोमदार विनोद राय रूपी शकुनि के हिस्से में डाला गया।

विनोद राय का सर्वश्रेष्ठ फ़रेब

फ़रेबी विनोद राय ने ‘परफ़ॉर्मेंस ऑडिट’ को अपना हथियार बनाया। इसमें सीएजी ने अपने आप ही ख़ुद को सरकार की नीतियों की समीक्षा का अधिकार और दायित्व दे दिया। हालाँकि, परम्परागत तौर पर ये उसके क्षेत्राधिकार में नहीं था। इसीलिए जब मौजूदा सीएजी राजीव महर्षि से कहा गया कि वो नोटबन्दी की नीति की समीक्षा भी उसी ‘परफ़ॉर्मेंस ऑडिट’ के रूप में करें तो उसने साफ़ कह दिया कि सरकारी नीतियों की समीक्षा करना सीएजी का नहीं बल्कि संसद का दायित्व है! हालाँकि, इसी व्याख्या को तोड़-मरोड़कर शातिर विनोद राय ने टेलीकॉम (2जी) और कोयला खदान में गड़बड़ी के इतने बड़े आँकड़े गढ़ दिये, जिसकी कल्पना भी नहीं हो सकती थी।

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The Diary of the Nation’s Conscience Keeper (Not Just An Accountant)

विनोद राय की साज़िश रंग लायी। संघ-परिवार ने काँग्रेस को सफलतापूर्वक इतना बदनाम कर दिया कि 2014 में उससे सत्ता छीन ली। वैसे, इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए असंख्य झूठे वादे भी किये गये। लम्बे समय तक देश का जनमानस इनके झूठ पर ही यक़ीन करता रहा और काँग्रेस को राज्यों में भी चुनाव दर चुनाव नुकसान उठाना पड़ा। अब लगे हाथ संघियों के क़ारनामे को भी समझते चलिए। हम जानते हैं कि बिजली-पानी का दाम सरकार तय करती है। स्पेक्ट्रम और कोयला खदान भी बिजली-पानी की तरह प्राकृतिक संसाधन ही हैं। लिहाज़ा, यदि सीएजी ये कहे कि ‘बिजली-पानी की वो नीति ही ग़लत है जिसमें ‘पहले आओ पहले पाओ’ और ‘जिसने पहले पैसा जमा कराया उसने पहले सामान पाया’ की विधि से पूर्व निर्धारित दाम पर बेचा रहा है। इसकी जगह यदि बिजली-पानी की नीलामी होती तो सरकार को रोज़ाना 5 लाख करोड़ रुपये का फ़ायदा हो सकता था।’

‘ज़ीरो लॉस’ और 2जी

यहाँ यदि बिजली-पानी के दाम की तुलना अमेरिका या कुवैत या जापान के दाम से करके सरकार को हो रहे काल्पनिक नुकसान का अनुमान लगाया जाता, फिर उसे सीएजी की रिपोर्ट में घोटाला बताकर संसद में पेश कर दिया जाता, फिर देश-दुनिया में राग आलापा जाता कि सरकार ने बिजली-पानी के नाम पर देश को बेच डाला, मंत्रियों ने अपने घर भर लिये, यहाँ तक कि सारा काला धन विदेशी बैंकों में ठिकाने लगा दिया तो संसद में हंगामा क्यों लाज़िमी नहीं होता! मंत्री का इस्तीफ़ा क्यों नहीं होता! फिर सीबीआई जाँच होगी, आरोपियों की गिरफ़्तारी होगी, बिना मुक़दमा चले ही सारे आरोपियों को भ्रष्ट और राष्ट्रद्रोही कहा जाएगा, सियासत चमकायी जाएगी और चुनाव दर चुनाव देश को ‘काँग्रेस मुक्त’ बनाया जाएगा। क्योंकि संघियों को पता है देश में काँग्रेस से बड़ी चुनौती उन्हें और और नहीं दे सकता।

इस बीच, उस व्यक्ति का भी चरित्र-हनन किया जाएगा जो समझाना चाहता है कि अरे भाई, बिजली-पानी को नियत दाम पर बेचने की नीति से किसी सरकारी राजस्व का ग़बन नहीं हुआ। यही ‘ज़ीरो लॉस’ है। यही नहीं, ये अनुमान भी बिल्कुल काल्पनिक है कि यदि सरकार बिजली-पानी की नीलामी करती तो देश फिर से सोने की चिड़िया बन जाता! लेकिन जब देश का मीडिया आपकी अंगुलियों पर नाचने के लिए उतावला होगा तो समझदारी की हरेक बात को हवा-हवाई बनने में कितनी देर लगेगी!

बहरहाल, झूठ-छल-कपट-फ़रेब से सत्ता को हथियाने में मददगार बने को उनके योगदान के लिए कृतज्ञ संघ परिवार सम्मानित नहीं करें, ये भला कैसे होता! लिहाज़ा, विनोद राय जैसे शातिर को पद्मभूषण से सम्मानित करवाया गया। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट को भी सेट करके वहाँ से उस नीति को ख़ारिज़ करवा दिया गया, जिसके मुताबिक़, सरकार बिजली-पानी के दाम को तय करके जनता को मुहैया करवा रही थी। उसके बाद से धूर्तों की जमात देश में गाना गाने लगेगी कि ‘देखो-देखो… सवा सौ करोड़ भारतवासियों, हमने बिजली-पानी की नीलामी की नीति को लागू करके 10 रुपये कमा लिये, क्योंकि हमें भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं है। जबकि पहले निर्धारित दाम पर बेचकर महज़ 5 रुपये इसलिए कमाये जा रहे थे क्योंकि उस नीति में भ्रष्टाचार था!

अब ज़रा सोचिए, जब चारों ओर, चप्पे-चप्पे पर दुष्प्रचार का बोल-बाला हो तो भला कौन समझेगा कि बिजली-पानी की अलग-अलग नीतियों का अपना-अपना नफ़ा-नुक़सान है! जैसे एक नीति कहती है कि बिजली-पानी के मुनासिब दाम पर होने से वो ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की पहुँच में रहेगा। लोगों की ज़िन्दगी आसान रहेगी। वो स्वस्थ और ख़ुशहाल रहेंगे तो देश की तरक़्क़ी में ज़्यादा योगदान करेंगे। इससे ज़्यादा रोज़गार मिलेगा। लोगों की आमदनी बढ़ेगी तो वो ख़र्च भी ज़्यादा करेंगे और टैक्स भी ज़्यादा भरेंगे। इससे भी अन्ततः सरकार का राजस्व बढ़ेगा।

2जी ने खोदी बैंकों की क़ब्र

दूसरी ओर, नीलामी वाली नीति के समर्थक कहेंगे कि सबसे पहले तो बिजली-पानी के अधिक पैसे भरो, सरकार को ज़्यादा राजस्व दो, फिर चाहे तुम बिजली-पानी का इस्तेमाल करो या भाड़ में जाओ! इसका नतीज़ा ये होगा कि जनता ऊँचे से ऊँचे ब्याज पर बैंकों से क़र्ज़ा लेकर बिजली-पानी ख़रीदने के लिए मज़बूर होगी, क्योंकि बिजली-पानी के बग़ैर ज़िन्दगी चलेगी नहीं। उधर, बिजली-पानी के लिए क़र्ज़ देने वाले बैंकों की हालत बिगड़ेगी, उनका डूबत खातों की तादाद बढ़ जाएगी। और, देखते ही देखते बिजली-पानी की नीलामी वाली नीति बैंकों के सामने आसमान छूते एनपीए की सुर्ख़ियाँ बटोरते हुए काल की तरह खड़ा हो जाएगा!

फिर जनता को मिलेगी नोटबन्दी! क्योंकि कोई नीम-हक़ीम उनके कान में मंत्र फूँक देगा कि बैंकों का एनपीए मिटाने के लिए जनता का सारा पैसा बैंकों में खींच लो! इस क़वायद पर भी वास्तव में भारी रक़म ख़र्च होगी। इसका चूना भी जनता को ही लगेगा। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था को जो चपत लगेगी वो वास्तविक या असली होगी। जबकि 2जी घोटाले के झूठ में लिखी गयी 1.76 लाख करोड़ रुपये की रकम काल्पनिक थी। मज़े की बात ये भी होगी कि नोटबन्दी की नीति की समीक्षा के लिए कोई सीएजी रिपोर्ट नहीं बनायी जाएगी, क्योंकि नये ज़माने में शीर्ष संवैधानिक संस्थाओं के मुखिया के बदलने से उसका अपना विधान भी तो बदल जाता है। इसीलिए कभी तो काल्पनिक नुक़सान का हिसाब भी लगा लिया जाता है, और कभी वास्तविक नुक़सान से भी मुँह फ़ेर लिया जाता है!

लेकिन वक़्त का पहिया तो लगातार घूमता रहता है। इसीलिए आख़िरकार वो दिन भी आता जब सारे झूठ, सारे ढकोसले, सारे दावे अदालत में फ़र्ज़ी साबित होते हैं। फिर नये तरह का एक और झूठ गढ़ा जाता है कि अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया इसका ये मतलब नहीं कि बिजली-पानी को तय दाम पर बेचने की नीति में भ्रष्टाचार नहीं था। किसी को बेईमान नहीं होने का सर्टिफ़िकेट कोर्ट कैसे दे सकता है? सर्टिफ़िकेट देना तो संघियों का जन्मजात विशेषाधिकार है। पुरानी नीति में भ्रष्टाचार हुआ है क्योंकि नीलामी की नीति पर चलने वालों ने दिखा दिया है कि बिजली-पानी से ज़्यादा कमाई हो सकती है!

स्वामी का मोदी पर हमला

इनका मानना है कि ‘हम ईमानदार हैं, क्योंकि हम कह रहे हैं। और, वो बेईमान है क्योंकि हमने उसे बेईमान कह दिया है! बस, बात ख़त्म!’ इसीलिए आये दिन अरूण जेटली को मूर्ख साबित करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने 2जी फ़ैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ही धज़्ज़ियाँ उड़ा दीं। स्वामी का कहना है कि ‘प्रधानमंत्री और उनकी सरकार भ्रष्टाचार के मामलों को गम्भीरता से नहीं ले रही है!’ इससे पहले यशवन्त सिन्हा भी देश की आँखें खोल चुके हैं कि ‘नोटबन्दी, एक निहायत ही बेवक़ूफ़ी भरा और अदूरदर्शी फ़ैसला था। इससे काले धन की रोकथाम तो छोड़िए, कुछ भी हासिल नहीं होने वाला, सिवाय जनता की दुश्वारियों के!’

बहरहाल, अब सुब्रमण्यम स्वामी जैसे लफ़्फ़ाज़ को ये कौन बताए कि सीबीआई अपने आकाओं को ख़ुश रखने के लिए फ़र्ज़ी आरोप तो लगा सकती है लेकिन अदालत में इसे सही साबित करने के लिए फ़र्ज़ी सबूतों को वो आख़िर लाती तो लाती कहाँ से! अदालतों और सरकारी वकीलों की भी लाचारी है कि वो मोदी सरकार को ख़ुश करने के लिए मक्खी को तो देखकर भले ही निगल लें, लेकिन हाथी को भला कैसे निगलते! इसीलिए सारे के सारे आरोपी बाइज़्ज़त बरी हो गये। यहाँ तक सात साल तक आरोपों और सबूतों की चीड़-फाड़ करने वाले जज ओ पी सैनी को आख़िरकार ऐसी-ऐसी टिप्पणियाँ अपने फ़ैसले में लिखनी पड़ी जैसा देश के न्यायिक इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था।

उधर, विनोद राय जैसे धूर्ताधिराज ने ये साबित कर दिया कि वो एक अव्वल दर्जे का फ़र्ज़ी एकाउंटेंट और फ़रेबी ऑडिटर है। इसीलिए अब काँग्रेस का फ़र्ज़ बनता है कि वो ताल ठोंककर विनोद राय को बीजेपी का एजेंट बताये और उसके ख़िलाफ़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई की माँग करे। हालाँकि, ये भी सच है कि मोदी राज में धूर्त विनोद राय को किसी तरह का कष्ट नहीं होगा! वो बुराई के बेल की तरह नित बढ़ता ही रहेगा! मज़े की बात ये भी रही कि 2जी मामले के अगले ही दिन महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चाव्हाण को भी बॉम्बे हाईकोर्ट से क्लीन-चिट मिल गयी। वहाँ भी आदर्श घोटाले के सिलसिले में चाव्हाण के ख़िलाफ़ सीबीआई कोई सबूत नहीं पेश कर सकी। बीजेपी ने इस मामले को लेकर भी ख़ूब हाय-तौबा मचायी थी और काँग्रेस का जमकर चरित्रहनन किया था।

देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ये है कि मनगढ़न्त आरोपों, अफ़वाहों और झूठों की बदौलत कुछ लोगों ने ऐसी साज़िश रची जिससे सवा सौ करोड़ लोगों की आँखों में धूल झोंकी जा सके। लेकिन यहीं ये सौभाग्य भी देश के सामने है कि क़तरे-क़तरे पर पैनी नज़र रखने की अभ्यस्त हमारी अदालतों को गुमराह करना आसान नहीं है। फ़िलहाल, झूठ-फ़रेब और अज्ञानता के अथाह अन्धकार वाले मोदी युग से गुज़र रहे भारतवर्ष के लिए यही उम्मीद की आख़िरी किरण है! यही किरण आश्वस्त भी कर रही है कि यदि 2019 में मौजूदा दुर्योग का ख़त्म होना तय है। क्योंकि भारतीय समाज में देर तो क़दम-क़दम पर है, लेकिन अन्धा-युग अनन्तकाल तक कभी नहीं रहा!

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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चीन ने मोदी को दिखाया आईना

वुहान सम्मेलन से सिर्फ़ भारतीय अर्थव्यवस्था की कमज़ोरी और लाचारी ज़ाहिर हुई

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Kapil Sibal

चीन के वुहान शहर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति झी जिनपिंग के बीच हुए अनौपचारिक शिखर वार्ता को बदलते वैश्विक माहौल को मद्देनज़र रखकर देखा जाना चाहिए। ये वो दौर है जिसमें चीनी अर्थव्यवस्था और विश्व व्यापार में उसके दख़ल को अमेरिका की श्रेष्ठता से चुनौती मिल रही है।

हाल के वर्षों में चीनी विकास का सामना नरमी से हुआ है। इसकी ‘वन बेल्ट बन रोड’ योजना की शुरुआत का मक़सद सिर्फ़ विकास दर में तेज़ी लाने का नहीं, बल्कि अपने पड़ोसियों को भी प्रभावित करने का है। इस योजना के तहत चीन की रणनीति 150 अरब डॉलर से ज़्यादा बाँग्लादेश, मालदीव, म्याँमार, पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका की अर्थव्यवस्थाओं में निवेश करने की है। इसके अलावा, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह के विकास के पीछे खड़े चीन का असली मक़सद भारत की सांकेतिक घेराबन्दी है।

दूसरी ओर, राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रम्प की ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाली नीति से वैश्वरीकरण को गहरा आघात लगा है। ट्रम्प चाहते हैं कि चीन के पक्ष में मौजूद 200 अरब डॉलर के भुगतान सन्तुलन को अमेरिका टैक्स-अंकुश से नियंत्रित कर ले। ट्रम्प चाहते हैं कि अमेरिका का चीनी बाज़ार में दख़ल बढ़े और अमेरिकी हितों के बोझ को नाटो के सहयोगी देश भी साझा करें। ट्रम्प उन देशों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहते हैं जो रूस से नज़दीकी रखते हैं। इरान के साथ हुई परमाणु सन्धि को तोड़ देने का भी भारत और विश्व के व्यापार को असर पड़ना स्वाभाविक है।

चीन इन सभी बातों को बख़ूबी समझता है। भारत के पड़ोसियों में चीन की बढ़ती दख़लंदाज़ी और ट्रम्प का व्यापार और कूटनीति के प्रति ग़ैर-भावनात्मक रवैया ही वुहान के केन्द्र में था। बीते चार साल में मोदी सरकार की चीन के प्रति सुविचारित और निरन्तरता वाली नीति नहीं रही है। इसी दिशाहीनता के माहौल की वजह से वुहान में दोनों नेताओं की शिखर वार्ता हुई।

हम देख चुके हैं कि न तो साबरमती के तट पर झूला झूलने से कुछ हासिल हुआ और ना ही डोकलाम में भारतीय रवैये से कोई फ़ायदा हुआ। मोदी ने महसूस किया कि यही वक़्त है ख़ुद को दलाई लामा से दूर कर लिया जाए और चीन से सहयोग बढ़ाया जाए। क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था को कई अहम क्षेत्रों में भारी निवेश की ज़रूरत है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के संचार, बिजली, इंज़ीनियरिंग और बुनियादी क्षेत्रों में चीन ने गहरी पैठ बना ली है। चीन ने यहाँ औद्योगिक पार्क बनाने में भी रूचि दिखायी है। भारत डिज़ीटल प्लेटफ़ॉर्म पेटीएम में 40 फ़ीसदी हिस्सेदारी चीन की है। चीनी कम्पनियाँ जैसे हार्बिन इलेक्ट्रिक, डोंगफैंग इलेक्ट्रिनिक्स, शंघाई इलेक्ट्रिक और सिफांग ऑटोमेशन की ओर से देश के 18 शहरों के बिजली नेटवर्क को या को चलाया जा रहा है या फिर ये उपकरण मुहैया करवा रहे हैं। मोदी राज के पाँच साल पूरे होने तक ये सिलसिला और आगे बढ़ चुका होगा। ज़ाहिर है कि तस्वीरें खिंचवाने और लम्बे-चौड़े बयान देने से कूटनीति के जटिल मसले हल नहीं हो सकते।

लिहाज़ा, चीन के साथ सम्बन्धों को बढ़ाने से पहले भारत को कई बातों को अच्छी तरह से समझ देना होगा। मसलन, चीन अपने सदाबहार दोस्त पाकिस्तान से कभी कन्नी नहीं काटेगा। चीन कभी संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत का साथ नहीं देगा। भारत को न्यूक्लिर सप्लाई ग्रुप में जगह देने पर चीन कभी राज़ी नहीं होगा। चीन को भारतीय बाज़ार में आने की तो पूरी छूट है, लेकिन वो अपने बाज़ार में भारत को जगह देने के मामले में बेहद सुस्त है। हमारी आईटी कम्पनियाँ भी इस नीति से प्रभावित होती हैं। भारत-चीन व्यापार में भुगतान सन्तुलन बहुत हद्द तक चीन के हक़ में है। हाल ही में चीन ने भारतीय दवा कम्पनियों के प्रति जो नरमी दिखायी है, वही नीति ही हमारे हित में है।

भारत को ये भी समझना होगा कि हमें चीन से टकराव मोल लेकर नहीं बल्कि उसके साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाने से ही फ़ायदा होगा, क्योंकि दोनों देशों में विश्व की 2.5 अरब आबादी का बसेरा है और विश्व के इस इलाके में हम दोनों ही सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। विश्व मंच पर कई जगह हमें ऐसी नीति अपनानी होगी जो हमारे विकास की ज़रूरतों को पूरा कर सके। कूटनीति के लिहाज़ से हम अमेरिका से कहीं ज़्यादा क़रीब हैं। वैश्विक ताक़तों के लिहाज़ से भारत को अमेरिका और जापान के साथ ज़्यादा सहयोग रखना चाहिए। हालाँकि, हमारे आर्थिक और विकास से जुड़े हित हमें चीन के ज़्यादा नज़दीकी रखने के लिए मज़बूर करते हैं। इसीलिए हमारा पूरा ज़ोर तेज़ विकास और विश्व व्यापार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने पर होना चाहिए।

वुहान में जारी हुए भारत और चीन के वक्तव्यों से पता चलता है कि दोनों देशों का ज़ोर अलग-अलग मुद्दों पर था। भारतीय बयान में जहाँ आतंकवाद का ज़िक्र विस्तार से होता है, वहीं चीनी बयान में ये सिर्फ़ एक बार नज़र आया। चीन सीमा पार से आने वाले आतंकवाद पर सिर्फ़ लीपापोती ही करेगा। वो पाकिस्तान की निन्दा तक नहीं करेगा। डोकलाम संकट के वक़्त सिर्फ़ जापान ने ही भारत के हक़ में बयान जारी किया था, जबकि ट्रम्प ने तो पूरी तरह से चुप्पी ही साधे रखी। दूसरा अन्तर ये रहा कि जहाँ चीन ने भारत में निवेश की बातें कीं, वहीं हमारा ज़ोर भुगतान सन्तुलन की अहमियत पर रहा।

भारत ने सीमा से जुड़े मसलों को लेकर परस्पर विश्वास को बढ़ाने पर ज़ोर दिया, लेकिन चीनी बयान में इसका कोई ज़िक्र नहीं है। भारतीय बयान के अनुसार, हमने सीमा पर शान्ति को बहाल रखने और उसे हद्द से बाहर निकलने से रोकने के लिए समुचित तंत्र बनाने की बात की तो चीन की ओर से अपनी सम्प्रभुता को आगे कर दिया गया। चीन के बयान में 2016-17 में रहे 71.5 अरब डॉलर के व्यापार-अतिरेक यानी ट्रेड सरप्लस की चुनौती का कोई ज़िक्र तक नहीं है।

किसी भी देश की विदेश नीति की रीढ़ उसकी अर्थव्यवस्था होती है। जब विकास दर अधिक होती है, तो कूटनीति के पास विकल्प बढ़ जाते हैं। इसीलिए उन्हीं देशों की विदेश नीति ज़्यादा मज़बूत हो सकती है, जिनकी अर्थव्यवस्था उसे ताक़त दे। इस मोर्चे पर हम चीन की बराबरी नहीं कर सकते।

अमेरिका के साथ भी हमारे द्विपक्षीय सम्बन्धों में उसके आर्थिक हित ही प्रमुखता पा रहे हैं। एच1-बी वीज़ा में कटौती और अमेरिकीयों के आर्थिक हितों को प्रमुखता देने की नीति से साफ़ है कि हम अमेरिका पर ज़्यादा भरोसा नहीं कर सकते। साफ़ है कि चीन हो या अन्य देश, हमें संस्थागत प्रतिक्रिया देने वाली व्यवस्था को बेहद सूझबूझ के साथ विकसित करना होगा। अपनी छवि को चमकाने वाली सोच से संस्थागत तंत्र मज़बूत नहीं बनते। मैं उम्मीद करूँगा कि मोदी ने इस बात तो समझा होगा और वुहान की बातचीत इसी दिशा में बढ़ेगी।

(साभार: टाइम्स ऑफ़ इंडिया)

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येदियुरप्पा के बाद प्रोटेम स्पीकर के चयन में भी राज्यपाल का शर्मनाक रवैया

उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

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KG Bopaiah

पुरानी कहावत है कि ‘चोर चोरी से जाए, मगर हेराफ़ेरी से जाए!’ फ़िलहाल, कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला का रवैया बिल्कुल इसी कहावत के मुताबिक़ है। वजुभाई वाला का बर्ताव उन शातिर अपराधियों जैसा भी है जो एक झूठ या ग़लती को छिपाने के लिए बार-बार झूठ बोलता है या ग़लती पर ग़लती ही करता चला जाता है। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का पहला कर्त्तव्य होना चाहिए कि उसका आचरण संवैधानिक, विधायी और न्यायिक सुचिता के अनुकूल हो और वो सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का सबसे बड़ा संरक्षक हो!

बदकिस्मती से वजुभाई वाला ने लोकलाज़ की सारी सीमाओं को तार-तार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ये बात साफ़ हो चुकी है कि वजुभाई वाला एक निष्पक्ष राज्यपाल की तरह नहीं बल्कि बीजेपी की कठपुलती और एजेंट की तरह व्यवहार कर रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर यानी कार्यवाहक सभापति की देखरेख में विधानसभा में बहुमत का परीक्षण करवाने का आदेश दिया। लेकिन बेहयाई की सारी सीमाओं और विधायी परम्पराओं को तोड़ते हुए राज्यपाल ने केजी बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त कर दिया। जबकि नव-निर्वाचित विधायकों में उनके भी वरिष्ठ लोग मौजूद हैं।

इसीलिए, काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन ने राज्यपाल के इस फ़ैसले को भी पक्षपातपूर्ण और विधायी परम्पराओं के ख़िलाफ़ बताया है। इस धड़े का कहना है कि बोपय्या जहाँ 4 कार्यकाल (टर्म) से विधायक हैं और 2008 में स्पीकर भी रह चुके हैं वो प्रोटेम स्पीकर बनाये जाने के लिए सर्वथा अयोग्य हैं। क्योंकि सदन में दो विधायक ऐसे हैं जो 8 टर्म का अनुभव रखते हैं और उम्र में भी बोपय्या से बड़े हैं। इनमें पहले स्थान पर हैं काँग्रेस के आरवी देशपांडे और बीजेपी के उमेश विश्वनाथ कट्टी। इन दोनों में से भी उमेश के मुक़ाबले देशपांडे की उम्र अधिक है।

काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि प्रोटेम स्पीकर के चयन का मुद्दा राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के दायरे में नहीं आता है। बल्कि इसका निर्धारण विधायी परम्पराओं के मुताबिक़ होता है। इस परम्परा के मुताबिक़, सबसे अनुभवी या उम्रदराज़ विधायक को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है। उधर, राज्यपाल के फ़ैसले को सही ठहराते हुए बीजेपी ने दलील दी है कि चार टर्म की वरिष्ठता भी कम नहीं होती। बोपय्या को इसलिए वरीयता दी गयी है क्योंकि वो पूर्व स्पीकर रह चुके हैं।

लेकिन काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि बोपय्या जब स्पीकर रहे तो कई मौकों पर उनका आचरण निष्पक्ष नहीं रहा। उन्होंने बीजेपी के पक्ष में काम किया। 2008 में बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर बनाने के फ़ैसले की इसलिए भी अनदेखी की गयी क्योंकि तब एक-एक वोट की मारामारी वाले हालात नहीं थे। दोनों पक्षों की इसी टकराहट को देखते हुए काँग्रेस-जेडीएस की ओर से देर शाम एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया।

विधायी परम्परा ये है कि नयी विधानसभा के चुनाव के बाद राज्यपाल सबसे अनुभवी या/और उम्रदराज़ राजनेता को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं। प्रोटेम स्पीकर का काम है कि वो सभी विधायकों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाये। इसके बाद सदन के सभी विधायक अपना नया स्पीकर चुनते हैं। नये स्पीकर का चुनाव सत्ता पक्ष का पहला शक्ति परीक्षण होता है। क्योंकि स्पीकर को भी सदन के बहुमत से ही चुना जाता है। अब यदि सत्ता पक्ष के पास बहुमत नहीं हुआ तो उसका स्पीकर चुना नहीं जा सकता।

सामान्य तौर पर नये स्पीकर को अपने निर्वाचन के तुरन्त बाद सदन के संचालन से जुड़े नियमों के मुताबिक़, विश्वास मत पर बहस और मतदान का संचालन करना होता है। किस पक्ष को कितने मत मिले और प्रस्ताव का क्या हश्र हुआ ये तय करने का अधिकार स्पीकर का ही होता है। स्पीकर का फ़ैसला एक तरह से अन्तिम ही होता है। क्योंकि उसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है। इन अदालती कार्रवाई में भी ज़्यादा से ज़्यादा स्पीकर के फ़ैसले को ग़लत करार दिया जाता है। स्पीकर की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

इसीलिए. जब कभी स्पीकर का आचरण पक्षपातपूर्ण होता है तो विधानसभा में अव्यवस्था फैल जाती है। यही अव्यवस्था अन्ततः विधायकों के बीच की हिंसा में बदल जाती है। स्पीकर के आपत्तिजनक व्यवहार की वजह से देश की कई विधानसभाओं में कई बार शर्मसार करने वाली हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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सत्ता के नाटक का कर्नाटक में खेल

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Yeddyrappa

खंडित जनादेश, राज्यपाल का स्वविवेक और लोकतंत्र की परीक्षा ऐसा ही कुछ माहौल कर्नाटक में चुनाव नतीजों के बाद दिख रहा है। नतीजों के मायने क्या कहें कांग्रेस मुक्त भारत या नए गठबंधन युक्त राजनीतिक संभावनाएं? इतना जरूर है कि इंदिरा गांधी ने राजनीति में जो पहचान बनाई थी उसे वो उतार-चढ़ाव के बावजूद 4.5 दशक तक बरकरार रख पाईं तो क्या नरेन्द्र मोदी की पहचान वैसी ही राजनीति की नई पैकेजिंग तो नहीं? सवाल कई हैं और जवाब भी समय के साथ मिलता जाएगा।

फिलाहाल कर्नाटक की सियासी तस्वीर काफी दिलचस्प हो गई है। गेंद राज्यपाल के पाले में है। वह सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं या बहुमत का आंकड़ा पार कर चुके कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को? गोवा, मेघालय और मणिपुर की थोड़ा पहले की सियासी तस्वीरों की नजीर सामने है। जिन हालातों में राज्यपालों ने बहुमत वाले गठबंधन को वहां सरकार बनाने का न्योता दिया, क्या वैसा ही न्योता कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को यहां मिलेगा या सबसे बड़े दल भाजपा को? जेडीएस-कांग्रेस की साझा सीटें बहुमत के पार हैं यहां भी दावा मजबूत है। ऐसे में राज्यपाल चाहें तो बहुमत के आंकड़े को देखते हुए कांग्रेस-जेडीएस को भी सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं।

अब यहीं इंतजार करना होगा, लेकिन कर्नाटक के ही पूर्व मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई बनाम केंद्र सरकार का एक अहम मामला नजीर बन सकता है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय आदेश दे चुका है कि बहुमत का फैसला राजनिवास में नहीं बल्कि विधानसभा के पटल पर होगा। कई तरह के तर्को से हटकर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार बनाने का न्योता देने का अधिकार राज्यपाल को उनके विवेक पर छोड़ रखा है। राज्यपाल चुनाव से पहले या बाद में बने गठबंधन को भी न्योता दे सकते हैं लेकिन संतुष्ट हों कि वह सदन में बहुमत साबित करेगा।

राज्यपाल का फैसला गलत भी हो सकता है फिर भी उनसे यह अधिकार छीना नहीं गया है। हां बहुमत सदन में ही साबित करना होगा। जस्टिस आरएस सरकारिया कमिशन ने विकल्पों और उनकी प्राथमिकताओं को साफ किया है लेकिन साथ ही राज्यपाल के खुद के फैसले को भी अहम बताया है। संविधान में गठबंधन सरकार बनने पर राज्यपाल को कैसे मुख्यमंत्री की नियुक्ति करनी है, इस बारे में कुछ साफ नहीं है।

कर्नाटक के नतीजे सभी दलों के लिए काफी सबक देने वाले हैं क्योंकि शुरू में लगा कि भाजपा स्पष्ट बहुमत की ओर अग्रसर है लेकिन बाद में 104 पर ही अटक गई। जबकि कांग्रेस दूसरे और जेडीएस तीसरे नंबर रह गई। प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा 21 जन सभाएं कर्नाटक में की थीं वहीं अमित शाह ने पूरी ताकत झोंक दी थी। वोट शेयर के मामले में कांग्रेस जीतकर भी हार गई और भाजपा हारकर भी जीत गई। भाजपा और कांग्रेस के बीच मत प्रतिशत क्रमश: 37 प्रतिशत और 38 प्रतिशत है।

हां, कर्नाटक में ही इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है। लगभग 2004 वाली स्थिति है। उस वक्त भाजपा को 79, कांग्रेस को 65 और जेडीएस को 58 सीटें मिली थीं। कांग्रेस एसएम कृष्णा को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी जबकि देवगौड़ा एन धरम सिंह को। तब भी कांग्रेस को झुकना पड़ा था। यकीनन देवगौड़ा का ठीक वैसा ही दांव 2018 के इस चुनाव में दिखा जब उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों को चित्त कर दिया। इस चुनाव में फिर रोचक स्थिति बनी कि राजनीति में कोई दुश्मन या दोस्त नहीं होता है। याद कीजिए 2005 में कुमार स्वामी से मतभेदों के कारण ही सिद्धारमैया पार्टी से निकाले गए थे लेकिन हालात देखिए 12 साल बाद उन्हीं सिद्धारमैया ने अपने राजनैतिक विरोधी का नाम मुख्यमंत्री के लिए आगे किया।

फिलाहाल कर्नाटक नतीजों को 2019 का सेमीफाइनल कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि अभी सबसे अधिक सांसद देने वाले उप्र के कैराना में 28 मई को होने जा रहे उपचुनाव में नए फार्मूले की टेस्टिंग होगी। यहां सपा-बसपा के बजाय अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के चिन्ह पर सपा उम्मीदवार तबस्सुम का लड़ना और बसपा का समर्थन करना बड़ा पैंतरा है। निश्चित रूप से यह जहां भाजपा को परेशान करने वाला है वहीं 2019 के आम चुनाव के लिए गठबंधन की नई संभावनाओं का दरवाजा भी खोलता दिख रहा है। लेकिन मप्र और राजस्थान में हुए उपचुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता के बाद कर्नाटक के नतीजों ने मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

साल के आखिर में मप्र, राजस्थान, छग में विधानसभा चुनाव हैं और यहां भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस जोश में थी। यकीनन कांग्रेस का मनोबल गिरा होगा क्योंकि तीनों राज्यों में मुख्य विपक्षी भूमिका में वही है। साथ ही गठबंधन के लिहाज से तीनों राज्यों की राजनैतिक पैंतरेबाजी भी जुदा है। ऐसे में तीनों राज्य में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा देश की गठबंधन राजनीति में निश्चित रूप से बेहद उलझा और नाजुक होगा। फिलहाल कर्नाटक के नाटक पर सबकी नजर है।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

–आईएएनएस

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