Connect with us

ओपिनियन

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

साफ़ है कि 2012 में हमारे सुप्रीम कोर्ट पर भी वो आम धारणा हावी थी, जिसमें ये माना जाता है कि हमारे सारे के सारे नेता चोर हैं, सारी की सारी पार्टियाँ बेईमान हैं। जबकि हमारी नौकरशाही बड़ी ईमानदार और कर्तव्यपरायण है।

Published

on

Modi Manmohan Sonia
A file photo of Prime Minister Narendra Modi (centre) with his predecessor Manmohan Singh

2जी का फ़ैसला आने के बाद सोची-समझी साज़िश के तहत देश में ये दुष्प्रचार फ़ैलाया जा रहा है कि ‘घोटाला तो हुआ है, भले ही वो कोर्ट में साबित नहीं हो सका!’ इसके पीछे ये दलील भी दी जा रही है कि ‘यदि घोटाला नहीं हुआ होता तो 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने सारे 2जी लाइसेंसों को क्यों रद्द किया होता!’ ये दलील भी उछाली जा रही है कि क्या ट्रायल कोर्ट का दर्जा सुप्रीम कोर्ट से बड़ा हो गया है? जब सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि आबंटन ग़लत हुआ तो फिर वो घोटाला नहीं और क्या था? मज़े की बात ये है कि इस दलील को हवा देने वाले पहले राजनीतिक शख़्स, देश के वित्तमंत्री और जाने-माने न्यायविद् अरूण जेटली हैं! जेटली के बयान से ही भगवा ट्रोल्स नये झूठ को फ़ैलाने का सिग्नल मिल गया। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि यदि तथ्यों और तर्कों के आईने में देखें तो ये समझना मुश्किल नहीं है कि जेटली का बयान ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे’ के सिवाय और कुछ नहीं था!

सबसे पहले ये जान लीजिए कि 2जी की जाँच जिस सीबीआई ने की, वो देश की सर्वोच्च, सबसे सुविधा सम्पन्न और सबसे क़ाबिल जाँच एजेंसी मानी जाती है। कोई उसे ‘पिंजड़े में बन्द तोता’ भले ही कहे, लेकिन इससे सीबीआई की हस्ती और हैसियत नहीं बदलती! सीबीआई में भी 2G मामले की जाँच को सबसे होशियार लोगों की टीम के हवाले किया गया था। भले ही ये होशियार अव्वल दर्जे के निक्कमे साबित हुए! इतना ही नहीं, सीबीआई जाँच की निगरानी भी ख़ुद वही सुप्रीम कोर्ट कर रहा था, जिसने 2जी लाइसेंसों को रद्द किया था। इसके अलावा, सीबीआई के वकील या सरकारी वकील यानी अभियोजक भी बेहद क़ाबिल और अनुभवी थे, कोई नौसिखिया या अनाड़ी नहीं! पिछले साढ़े तीन साल से ये सभी लोग उस मोदी सरकार के मातहत रहे हैं, जिसका दावा है कि वो आज़ाद भारत की सबसे ईमानदार और पारदर्शी सरकार है! लिहाज़ा, ये कैसे मान लिया जाए कि सारे श्रेष्ठ-संयोगों के बावजूद 2जी मामले की जाँच करने, सबूत जुटाने और आरोपियों को अदालत में दोषी साबित करने में ज़रा भी कोताही हुई होगी? साफ़ है कि तमाम श्रेष्ठ-संयोग भी यदि अदालत में घोटाले को घोटाला साबित नहीं कर सके तो सिर्फ़ इसलिए कि वो वास्तव में घोटाला था ही नहीं! घोटाला होता, तभी तो साबित होता! घोटाला होता, तो कौन माई का लाल उसे साबित होने से रोक लेता! अरे, 1.76 लाख करोड़ रुपये की तो छोड़िए, यदि कुछेक लाख रुपये का भी घोटाला हुआ होता तो जज ओ पी सैनी ने उसके लिए ज़िम्मेदारी अपराधी को सज़ा क्यों नहीं दी होती!

अगली बात कि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2012 में क्यों सारे 2जी लाइसेंसों को रद्द कर दिया था? तो इसके बारे में जस्टिस जी एस सिंघवी ने अख़बार इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि “उनकी बेंच के फ़ैसले को पूरा पढ़ा जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले का ये अर्थ नहीं है कि कोई मामला ही नहीं बनता था, बल्कि उसका कहना है कि अभियोजन आरोपों को साबित नहीं कर सका।” जस्टिस सिंघवी आगे कहते हैं कि “फौज़दारी क़ानून में दो पहलू होते हैं। पहला, कोई मामला नहीं बनता और दूसरा, कोई सबूत नहीं है। इस मामले में प्रेस रिपोर्ट्स के मुताबिक़, कोई सबूत नहीं था। यदि किसी ने कोई अपराध किया है, लेकिन अदालत में उसे साबित करने के लिए सबूत नहीं पेश किये जा सके, तो उसे सज़ा नहीं दी जा सकती।” यानी, जस्टिस सिंघवी को अब भी ये लगता है कि घोटाला तो था, भले सीबीआई, सीएजी और मोदी सरकार उसे अदालत में साबित नहीं कर पायी! ये तर्क कम और ज़िद ज़्यादा है!

फरवरी 2012 में अपने फ़ैसले में जस्टिस सिंघवी और जस्टिस ए के गाँगुली की खंडपीठ ने लिखा था, “सितम्बर 2007 और मार्च 2008 के दौरान संचार मंत्री की अगुवाई में उनके मातहत अफ़सरों ने जो फ़ैसले लिये वो पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध थे।” जस्टिस सिंघवी ने आगे कहा कि “सुप्रीम कोर्ट के सामने मुद्दा बिल्कुल अलग था। सुप्रीम कोर्ट को स्पेक्ट्रम आबंटन प्रक्रिया की क़ानून वैधता का परीक्षण करना था, जबकि ट्रायल कोर्ट को उसमें निहित अपराध का परीक्षण करना था।” जस्टिस सिंघवी ने ‘ज़ीरो-लॉस थ्योरी’ पर टिप्पणी करने से परहेज़ किया, लेकिन इतना ज़रूर कहा कि “उस वक़्त सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि स्पेक्ट्रम की नीलामी से 60 हज़ार करोड़ रुपये मिले हैं।”

आईए ज़रा अब ये भी समझते चलें कि 2012 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में जब ये कहा गया कि स्पेक्ट्रम आबंटन का काम ‘पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध’ था, तब इनमें से किसी भी बात का ‘अदालत में परीक्षण’ नहीं हुआ था। ‘अदालत में परीक्षण’ भी बाक़ायदा एक क़ानूनी प्रक्रिया है। किसी भी आरोप को सिर्फ़ ट्रायल कोर्ट में ही परखा जाता है, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नहीं। यही हमारे देश का विधान है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में तो सिर्फ़ ये परखा जाता है कि क्या ट्रायल कोर्ट और फिर हाईकोर्ट में क़ानून और उसकी प्रक्रिया का सही पालन हुआ है या नहीं। इसीलिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को अपीलीय अदालत कहा जाता है।

2जी मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले ने सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार की उन धारणाओं को भी ग़लत साबित कर दिया, जिसमें ये माना गया कि स्पेक्ट्रम आबंटन की नीति ग़लत थी। स्पेक्ट्रम जैसी किसी भी सीमित चीज़ के आबंटन का दो तरीक़ा हो सकता है। पहला, तय दाम पर बेचना-ख़रीदना और दूसरा, उसे नीलामी के ज़रिये बेचना। जब चीज़ सीमित होती है तो उसे ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति या नियम से भी जोड़ा जाता है। जैसे रेलवे, ट्रेन के टिकट को ‘पहले आओ पहले पाओ’ के नियम से ही बेचती है, नीलामी से नहीं। अब यदि सीएजी या सुप्रीम कोर्ट या विपक्ष ये कहने लगे कि ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति ग़लत है क्योंकि नीलामी से टिकट बेचने पर रेलवे को कहीं ज़्यादा आमदनी होगी, तो इससे तय दाम पर बेचने की नीति ग़लत साबित नहीं हो सकती!

ऐसे में क्या आपको ये नहीं लगेगा कि टिकट बेचने की नीति को तय करना रेलवे या सरकार का काम है! सीएजी या सुप्रीम कोर्ट इसमें दख़ल नहीं दे सकते। लेकिन यदि नौकरशाही ने ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति को लागू करने में घपला किया है तो मामला ज़रूर अदालत में जा सकता है। अदालत ये तय करेगी कि घपला हुआ भी है या नहीं, और यदि हुआ तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है तथा क़सूरवार की सज़ा क्या होनी चाहिए? यहाँ ग़ौर करने की बात ये भी है कि अदालत को सज़ा या अपना फ़ैसला सुनाते वक़्त उसके प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए।

ज़रा सोचिए कि रेलवे के टिकटों को बेचने में यदि कोई घपला हुआ है तो क्या सुप्रीम कोर्ट को ये फ़ैसला सुनाने का हक़ हो सकता कि ‘बिके हुए सारे टिकट रद्द किये जाते हैं, क्योंकि सीएजी को लगता है कि टिकटों की नीलामी होनी चाहिए। और, यहाँ तक कि जब से टिकटों की नीलामी शुरू हुई है, तब से रेलवे की आमदनी लाखों-करोड़ों गुना बढ़ गयी है!’ सुप्रीम कोर्ट को ये भी सोचना पड़ेगा कि क्या कुछ लोगों के क़सूर की सज़ा हरेक रेल यात्री को देना मुनासिब होगा? क्या ज़ुर्माना वग़ैरह लगाने का भी कोई और विकल्प सम्भव है? क्योंकि ज़ुर्माना भी तो अपने आप में एक सज़ा है। वैसे भी देश में क़सूर के अनुपात में ही सज़ा देने का विधान है। यहाँ चींटी या ख़रगोश या शेर को मारने के लिए तोप चलाने का रिवाज़ नहीं है। यहाँ बड़ी से बड़ी चोरी करने वाले को भी सज़ा-ए-मौत नहीं दी जाती!

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? उसने एक झटके में सारे लाइसेंस रद्द कर दिये। जिसने आम जनता को कॉल ड्रॉप और धीमी इंटरनेट स्पीड की ऐसी समस्या सौग़ात में दी, जिससे हमारा टेलीकॉम सेक्टर आज तक नहीं उबर पाया है। उल्टा आगा-पीछा सोचे बग़ैर सुनाये गये सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की वजह से लाइसेंस पाने वाली कम्पनियों की भारी-भरकम रक़म डूब गयी, जो उन्होंने से बैंकों से क़र्ज़ लेकर निवेश किया था। इससे जहाँ एक ओर सुरक्षित निवेश के लिहाज़ से दुनियाभर में भारत की साख़ गिरी, वहीं भारतीय बैंकों पर एनपीए (डूबा क़र्ज़) ऐसी गाज़ गिरी कि आज सिर्फ़ टेलीकॉम सेक्टर का एनपीए ही 5 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जा पहुँचा है। ये देश के कुल एनपीए के आधे से भी अधिक है! लाइसेंस रद्द होने के बाद नीलामी की जिन क़ीमतों पर टेलीकॉम कम्पनियों को स्पेक्ट्रम ख़रीदकर अपनी जान बचानी पड़ी वो देखते ही देखते बीमार बन गयीं। क्योंकि वो इतना नहीं कमा पा रही हैं कि बैंकों से लिये गये भारी क़र्ज़ की क़िस्ते भर सकें। टेलीकॉम सेक्टर का विस्तार रूक गया। 50 हज़ार से ज़्यादा लोगों की रोज़ी-रोटी जाती रही!

लगे हाथ ये कल्पना करके भी देखिए कि यदि विपक्ष इस बात पर हाय-तौबा करने लगे कि रेल के टिकटों को ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति के मुताबिक़ बेचकर सरकार घोटाला कर रही है, क्योंकि यदि इन्हें नीलामी से बेचा जाता तो रेलवे मालामाल हो जाती, तो क्या इससे नीलामी की नीति सही साबित हो सकती है! यहीं मज़े की बात ये भी रही कि विपक्ष के दुष्प्रचार की वजह से आम जनता ही नहीं, आला सरकारी संस्थाओं में बैठे लोग भी ये धारणा बना बैठे कि घोटाला तो हो ही रहा था! अलबत्ता, जाँच से घोटाला इसलिए साबित नहीं हुआ क्योंकि सबूत नहीं मिले! इसका मतलब तो हुआ कि यदि कल को बीजेपी ये कहने लगे कि आप हत्यारे हैं, बलात्कारी हैं, राष्ट्रद्रोही हैं, आतंकी हैं तो आपको ये सब मान लिया जाएगा! भले ही इसका कोई सबूत नहीं हो। इसे ही चरित्रहनन कहते हैं। लिहाज़ा, कल्पना कीजिए कि हमारे समाज और लोकतंत्र के लिए चरित्रहनन का ऐसा हठकंडा कितना विनाशकारी साबित हो सकता है!

इसी तरह, 2जी मामले में ट्रायल कोर्ट को यही तो तय करना था कि जिस सरकारी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट, सीएजी और बीजेपी ‘पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध’ बताती रही है, क्या वो वास्तव में ऐसी ही है भी या नहीं। किसी भी आरोप की सच्चाई को तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट में अभियोजन पक्ष को वो सारे सबूत रखने होते हैं, जिनसे आरोप साबित हों। इसीलिए यदि अदालत में आरोप साबित नहीं हुए तो ताल ठोंककर कहा जाएगा कि आरोप झूठे थे, मनगढ़न्त थे, राजनीतिक द्वेष और दुर्भावना से प्रेरित थे। ध्यान रहे कि आरोपियों को बेक़सूर पाने पर ही अदालतें उन्हें बाइज़्ज़त बरी करती हैं। वर्ना, यदि अदालत को लगता है कि आरोपों में आंशिक सच्चाई है तो भी आरोपी को अपराधी ही करार दिया जाता है। हालाँकि, उसकी सज़ा, उसके अपराधों के अनुपात में होती है। 2जी मामले में सारे के सारे आरोपी का बाइज़्ज़त बरी हो जाना, निश्चित रूप से ये साबित करता है कि 1.76 लाख करोड़ रुपये का कथित घोटाला महज़ एक बुलबुला था, जो अब फूट चुका है!

साफ़ है कि बीजेपी के दुष्प्रचार की वजह से 2012 में हमारे सुप्रीम कोर्ट पर भी ये आम धारणा हावी थी, जिसमें ये मान लिया गया है कि बीजेपी को छोड़कर सारी पार्टियाँ बेईमान हैं। बीजेपी के अलावा अन्य पार्टियों के सारे के सारे नेता चोर हैं, जबकि हमारी नौकरशाही बड़ी ईमानदार और कर्तव्यपरायण है। हालाँकि, ये सच भी किसी से छिपा नहीं है कि हमारे नेताओं से ज़्यादा भ्रष्ट और निक्कमी हमारी नौकरशाही है। नेताओं को तो जनता हर पाँच साल पर आज़माकर जनादेश देती है, लेकिन नौकरशाही तो बेताज बादशाह है। जनता इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। 2जी मामले में भी पूरी तरह से नकारा साबित हुए सीबीआई और सीएजी भी तो हमारी नौकरशाही का ही हिस्सा हैं। इनका बाल तक बाँका नहीं होगा!

ओपिनियन

समाज में बदलाव के लिए अपने घर में झांकने की जरूरत : निकिता आनंद

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

Published

on

By

नई दिल्ली, 7 दिसंबर | साल 2003 की मिस इंडिया टाइटल विजेता व अभिनेत्री निकिता आनंद का मानना है कि समाज में कोई भी सुधार लाने के लिए हमें सबसे पहले अपने घर में झांककर देखना चाहिए और घर से सुधार व बदलाव लाने की कोशिश करनी चाहिए।

निकिता हाल ही में राष्ट्रीय राजधानी में ‘इंटरनेशनल वीमेन पॉलिटेक्निक’ द्वारा आयोजित ‘मिराकी 2018’ कार्यक्रम का हिस्सा बनीं, जहां उन्होंेने आईएएनएस से बात की।

निकिता से जब पूछा गया कि मॉडलिंग में उनका कैसे आना हुआ तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “मैं आर्मी बैकग्राउंड से हूं मेरे पिता डॉक्टर हैं। 10वीं के बाद या 12 वीं के आसपास मेरी मॉडलिंग शुरू हो गई थी और मैंने काफी लोकल पेजेन्ट्स भी जीते हैं और साथ ही साथ प्रोफेशनल रैंप वॉक भी शुरू कर दिया था और मैं एनआईएफटी की स्टूडेंट थीं तो फैशन डिजाइनिंग भी हो रही थी और फैशन रैंप वॉक भी हो रहा था। मुझे मिस इंडिया के लिए पार्टिसिपेट करने का ख्याल आया और थोड़ा सोचने के बाद हिस्सा ले लिया और फिर मैंने मिस इंडिया का टाइटल जीत लिया।”

टीएलसी के शो ‘ओ माई गोल्ड’ की मेजबानी कर चुकीं निकिता को वास्तविक जीवन में गोल्ड के बजाय प्लेटिनम ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। शो के बारे में उन्होंने कहा, “इस शो के लएि हमने पूरे देशभर में ट्रैवल किया जो दिलचस्प था। इसमें हमने गोल्ड के बारे में बात की थी, क्योंकि भारत में पारंपरिक आभूषण के तौर पर ज्यादातर पीले सोने का इस्तेमाल होता है। शो करके मुझे मुझे दक्षिण भारतीय और बंगाली ज्यूलरी के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला, लेकिन मुझे निजी तौर पर गोल्ड के बजाय प्लेटिनम और डायमंड ज्यूलरी ज्यादा पसंद है। मैं इनेक आभूषण ज्यादातर पहनती हूं।”

साल 2003 की मिस इंडिया का कहना है कि महिलाओं के साथ हो रहे उत्पीड़न पर लगाम लगाने व समाज में सुधार और बदलाव लाने के लिए घर से शुरुआत करनी चाहिए और बाहर के बजाय सबसे पहले घर में झांककर देखना चाहिए कि घर में क्या हो रहा है।

उन्होंेने कहा, “महिलाओं के साथ उत्पीड़न की बहुत सारी घटनाएं होती हैं। भारत में हर रोज हर क्षण कहीं न कहीं नाइंसाफी होती है। ऐसे लाखों केस होते होंगे जो कि रिपोर्ट नहीं होते हैं। किसी भी क्षेत्र में किसी भी किस्म के इंसान में बदलाव लाने का काम हमेशा शिक्षा से ही होता है। अपने बच्चों को क्या सिखाते हैं यह मायने रखता है। लोगों की मानसिकता होती है कि पहले बाहर देखो, वहां क्या खराब हो रहा है। लेकिन अपने घर में नहीं झांककर देखते कि उनके घर में क्या हो रहा है।”

निकिता ने कहा कि बच्चा स्कूल से ज्यादा वक्त घर में बिताता है, तो घर में अच्छे संस्कार व माहौल देने की कोशिश करनी चाहिए, तभी वह अच्छा नागरिक बन सकेगा। समाज में सुधार और बदलाव लाने की कोशिश घर से की जानी चाहिए। इस तरह की घटनाओं पर लगाम लगाने और समाज में बदलाव लाने के मानसिकता में बदलाव लाना बेहद जरूरी है।

उनका मानना है कि ‘हैशटैगमीटू’ मूवमेंट को आगे बढ़ाया जाना चाहिए, जिससे और महिलाओं को भी आगे आकर अपनी दास्तां बयां करने का प्रोत्साहन मिले।

उन्होंने कहा, “मेरा मानना है कि इस मूवमेंट को आगे बढ़ाना चाहिए, आवाज तो हर किसी की है तो क्यों एक हिस्से को बोलने दिया जाए और एक हिस्से को दबाया जाए वो नहीं होना चाहिए। जब हम समानता की और सशक्तिकरण की बात करते हैं तो इसका मतलब यही है न कि सबको समान अधिकार मिले। अगर किसी और के आगे आने से और उसकी कहानी आगे आने से किसी और को प्रोत्साहन मिलता है तो ये एक अच्छी बात है। किसी भी महिला के लिए अपने हुए दर्दनाक वाकये को याद करना मुश्किल होता है। उसकी भावना को समझने की कोशिश करनी चाहिए।”

मॉडलिंग में आने की ख्वाहिश रखने वाली लड़कियों के लिए दिए संदेश में उन्होंने कहा, “सबसे पहले आपको तय करना चाहिए कि आपको कहां जाना है, क्योंकि यह आसान लाइन नहीं है, आपके पास जरूरी क्राइटेरिया होनी चाहिए जैसे रैंप वॉक के लिए एक परफेक्ट बॉडी स्ट्रक्चर और हाइट होनी चाहिए। अगर, आपको प्रिंट मॉडलिंग के लिए जाना है तो फिर आपके पास वैसा चेहरा-मोहरा, भाव-भंगिमा होनी चाहिए, जिसे कैमरा अच्छे से कैप्चर कर सकें। आप किसी भी फील्ड को बस इसलिए नहीं चुने कि वो आपको आकर्षित कर रहा है, बल्कि अच्छे से आकलन कर लें कि आप उसके लायक है या नहीं।”

निकिता ने ‘लाइफ में कभी-कभी’ और ‘फोर टू का वन’ जैसी फिल्मों में भी काम किया है। लेकिन अब वह फिल्में नहीं कर रही हैं। फिल्मों से दूरी बनाने के बारे में उन्होंने कहा, “मैंने फिल्मों में काम किया है, लेकिन मुझे टेलीविजन प्रेजेंट करना या फिर लाइव शो करना ज्यादा पसंद है। आजकल मैं गायन का भी प्रशिक्षण ले रही हूं आगे जाकर मैं गायन में भी परफार्मेस दूंगी। अगर मैं टीवी की बात करूं तो मैंने लाइफस्टाइल के अलावा स्पोर्ट्स शो भी बहुत किया है, क्रिकेट पर भी बहुत शो किया है। मुझे टीवी बहुत पसंद आता है, क्योंकि निजी जिंदगी में मैं बहुत आर्गनाइज हूं और यही चीज टीवी में भी है।”

–आईएएनएस

Continue Reading

ओपिनियन

सहित्य साधना सृजन की चीज : वीणा ठाकुर

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

Published

on

By

veena thakur maithili sahitya
Picture Cridit : Swatva Samachar

दरभंगा, 6 दिसंबर | सर्वोच्च साहित्यिक संस्था साहित्य अकादमी से मिथिला क्षेत्र की समृद्ध मैथिली भाषा ही बिहार को अमूमन हर साल पुरस्कार दिलाती रही है। इस बार इस पुरस्कार के लिए दरभंगा की रहने वाली कथाकार प्रो.वीणा ठाकुर को चुना गया है। वीणा का चयन उनके कथा-संग्रह ‘परिणीता’ के लिए किया गया है।

वीणा का कहना है कि साहित्य साधना की चीज है। किसी भी कृति का समय खुद मूल्यांकन करता है, इस कारण साहित्यकारों को हड़बड़ी में नहीं, बल्कि किसी भी रचना के लिए धैर्य रखने की जरूरत है।

बचपन से ही लिखने-पढ़ने की शौक रखने वाली वीणा अपने संस्मरणों को याद करते हुए बताती हैं, “जब मैं पांचवीं कक्षा में थी, तभी तुलसीदास की रामचरित मानस पढ़ ली थी। यही नहीं, छठे वर्ग की पढ़ाई के दौरान ही घर से पैसे चुराकर विमल मित्र के बांग्ला उपन्यास का हिंदी अनुवाद ‘खरीदी कौड़ियों का मोल’ खरीदकर लाई थी और उसे मैंने पढ़ा था। पैसे चुराने को लेकर मुझे घर में डांट भी पड़ी थी।”

मधुबनी जिले के भवानीपुर की बेटी और दरभंगा के पंचोभ गांव की बहू वीणा ने अकादमी पुरस्कार की घोषणा के बाद आईएएनएस से खास बातचीत में कहा कि यह सम्मान मैथिली भाषा का है। इस पुरस्कार के बाद उनकी जिम्मेवारी और बढ़ गई है।

उन्होंने कहा कहा, “वैसे तो साहित्यकारों के लिए कई पुरस्कार हैं, लेकिन साहित्य अकादमी पुरस्कार साहित्यकारों के लिए सर्वोच्च पुरस्कार है। मुझ पर ईश्वर की असीम अनुकंपा है कि इस पुरस्कार के लिए मेरा नाम चयनित हुआ।”

कथा-संग्रह ‘परिणीता’ की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इस कथा संग्रह में वैसे तो कई कहानियां हैं, मगर कथा ‘निरूत्तरित प्रश्न’ आज की जीवनशैली के काफी नजदीक है। उन्होंने कहा कि इसमें बुढ़ापे की अवस्था में पहुंचने और पुत्रों के रवैये को बताया गया है।

उपन्यास ‘भारती’, कथा-संग्रह ‘आलाप’, समीक्षा ‘मैथिली रामकाव्यक परंपरा’, ‘विद्यापतिक उत्स’, ‘इतिहास दर्पण’, ‘वाणिनी’, ‘मैथिली गीत साहित्यक विकास आ परंपरा’ तथा अनुवाद की पुस्तक ‘हाट-बाजार’ और ‘भारतीय कविता संचयन : हिंदी’ की रचनाकार वीणा का कहना है कि आज के युवा साहित्यकार किसी भी काम में हड़बड़ी में रहते हैं और तुरंत सभी कुछ पा लेना चाहते हैं।

उनका मानना है साहित्य हड़बड़ी नहीं, धैर्य की चीज है, जिसमें आपकी कृति या रचना को पाठक अवलोकन और मूल्यांकन करते हैं।

कथाकार वीणा का कहना है कि पुरस्कार एक उपलब्धि होती है, इसे नकारा नहीं जा सकता, लेकिन साहित्य सृजन की चीज है, जिसका सही मूल्यांकन पाठक ही करते हैं।

मधुबनी जिले के भवानीपुर गांव में प्रो. मोहन ठाकुर के घर 19 मार्च, 1954 को जन्म लेने वाली और दरभंगा के पंचोभ गोव में पशु चिकित्सा पदाधिकारी डॉ़ दिलीप झा की पत्नी वीणा ठाकुर बिरला फाउंडेशन के प्रतिष्ठित सम्मान के लिए गठित मैथिली भाषा समिति की संयोजिका हैं।

ललित नारायण विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर मैथिली विभाग की पूर्व अध्यक्ष वीणा की प्रारंभिक शिक्षा सहरसा में हुई और उच्च शिक्षा भागलपुर विश्वविद्यालय में हुई।

मैथिली भाषा के विषय में पूछे जाने पर प्रोफेसर वीणा कहती हैं, “मैंने तो मैथिली भाषा मां की गोद में सीखी। मैं इस भाषा की कृतज्ञ हूं। मेरे लिए यह भाषा नहीं, मेरा साहित्य सफर है। यही कारण है कि मेरी कहानियों में परंपरा, साहित्य, संस्कृति के साथ आधुनिकता से मैथिली के जुड़ने की भी कहानी रहती है।”


Continue Reading

ओपिनियन

आज के भारतीय सिनेमा में कंटेंट महत्वपूर्ण : मेघना गुलजार

“अब लोग कंटेंट के भूखे हैं..चीजें बदल गई हैं। पहले लोग अक्सर बड़े पर्दे पर बस अपने पसंदीदा सितारों को देखने के लिए थिएटर जाते थे, उन्हें कहानी से कोई मतलब नहीं होता था और अब वही लोग हैं जो कहानी के बारे में जानना चाहते हैं। वे फिल्म की समीक्षा पढ़ते हैं और उसके बाद किसी एक फिल्म को देखने के लिए थिएटर पर जाते हैं।”

Published

on

By

Filmmaker, Meghna Gulzar

फिल्मकार मेघना गुलजार का कहना है कि वह दिन चले गए जब फिल्में स्टार वैल्यू पर हिट हुआ करती थीं। अब भारतीय सिनेमा के दर्शक स्टार के साथ-साथ स्टोरी भी चाहते हैं। उनके मुताबिक, अच्छा कंटेंट आज के समय में फिल्मों की सफलता में एक बड़ी भूमिका निभा रहा है।

टाइम्स लिटफेस्ट दिल्ली 2018 में रविवार को ‘हिंदी सिनेमा के बदलते चलन’ सत्र में मेघना ने कहा, “भारतीय सिनेमा में पहले हीरो और हिरोइनों को ज्यादा तवज्जो दी जाती थी लेकिन अब चीजें पहले जैसी नहीं हैं। अब लोग अभिनेताओं के अलावा कंटेंट को भी महत्व दे रहे हैं..कंटेंट भारतीय सिनेमा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।”

पैनल का हिस्सा रहे गीतकार प्रसून जोशी ने भी इसपर सहमति जताई और कहा कि इस मामले में विकास हुआ है।

उन्होंने कहा, “अब लोग कंटेंट के भूखे हैं..चीजें बदल गई हैं। पहले लोग अक्सर बड़े पर्दे पर बस अपने पसंदीदा सितारों को देखने के लिए थिएटर जाते थे, उन्हें कहानी से कोई मतलब नहीं होता था और अब वही लोग हैं जो कहानी के बारे में जानना चाहते हैं। वे फिल्म की समीक्षा पढ़ते हैं और उसके बाद किसी एक फिल्म को देखने के लिए थिएटर पर जाते हैं।”

सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी ने कहा कि भारत में ‘जानकार (इन्फॉर्म्ड) सिनेमा’ का उदय हुआ है।

–आईएएनएस

Continue Reading

Most Popular