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ओपिनियन

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

साफ़ है कि 2012 में हमारे सुप्रीम कोर्ट पर भी वो आम धारणा हावी थी, जिसमें ये माना जाता है कि हमारे सारे के सारे नेता चोर हैं, सारी की सारी पार्टियाँ बेईमान हैं। जबकि हमारी नौकरशाही बड़ी ईमानदार और कर्तव्यपरायण है।

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Modi Manmohan Sonia
A file photo of Prime Minister Narendra Modi (centre) with his predecessor Manmohan Singh

2जी का फ़ैसला आने के बाद सोची-समझी साज़िश के तहत देश में ये दुष्प्रचार फ़ैलाया जा रहा है कि ‘घोटाला तो हुआ है, भले ही वो कोर्ट में साबित नहीं हो सका!’ इसके पीछे ये दलील भी दी जा रही है कि ‘यदि घोटाला नहीं हुआ होता तो 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने सारे 2जी लाइसेंसों को क्यों रद्द किया होता!’ ये दलील भी उछाली जा रही है कि क्या ट्रायल कोर्ट का दर्जा सुप्रीम कोर्ट से बड़ा हो गया है? जब सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि आबंटन ग़लत हुआ तो फिर वो घोटाला नहीं और क्या था? मज़े की बात ये है कि इस दलील को हवा देने वाले पहले राजनीतिक शख़्स, देश के वित्तमंत्री और जाने-माने न्यायविद् अरूण जेटली हैं! जेटली के बयान से ही भगवा ट्रोल्स नये झूठ को फ़ैलाने का सिग्नल मिल गया। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि यदि तथ्यों और तर्कों के आईने में देखें तो ये समझना मुश्किल नहीं है कि जेटली का बयान ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे’ के सिवाय और कुछ नहीं था!

सबसे पहले ये जान लीजिए कि 2जी की जाँच जिस सीबीआई ने की, वो देश की सर्वोच्च, सबसे सुविधा सम्पन्न और सबसे क़ाबिल जाँच एजेंसी मानी जाती है। कोई उसे ‘पिंजड़े में बन्द तोता’ भले ही कहे, लेकिन इससे सीबीआई की हस्ती और हैसियत नहीं बदलती! सीबीआई में भी 2G मामले की जाँच को सबसे होशियार लोगों की टीम के हवाले किया गया था। भले ही ये होशियार अव्वल दर्जे के निक्कमे साबित हुए! इतना ही नहीं, सीबीआई जाँच की निगरानी भी ख़ुद वही सुप्रीम कोर्ट कर रहा था, जिसने 2जी लाइसेंसों को रद्द किया था। इसके अलावा, सीबीआई के वकील या सरकारी वकील यानी अभियोजक भी बेहद क़ाबिल और अनुभवी थे, कोई नौसिखिया या अनाड़ी नहीं! पिछले साढ़े तीन साल से ये सभी लोग उस मोदी सरकार के मातहत रहे हैं, जिसका दावा है कि वो आज़ाद भारत की सबसे ईमानदार और पारदर्शी सरकार है! लिहाज़ा, ये कैसे मान लिया जाए कि सारे श्रेष्ठ-संयोगों के बावजूद 2जी मामले की जाँच करने, सबूत जुटाने और आरोपियों को अदालत में दोषी साबित करने में ज़रा भी कोताही हुई होगी? साफ़ है कि तमाम श्रेष्ठ-संयोग भी यदि अदालत में घोटाले को घोटाला साबित नहीं कर सके तो सिर्फ़ इसलिए कि वो वास्तव में घोटाला था ही नहीं! घोटाला होता, तभी तो साबित होता! घोटाला होता, तो कौन माई का लाल उसे साबित होने से रोक लेता! अरे, 1.76 लाख करोड़ रुपये की तो छोड़िए, यदि कुछेक लाख रुपये का भी घोटाला हुआ होता तो जज ओ पी सैनी ने उसके लिए ज़िम्मेदारी अपराधी को सज़ा क्यों नहीं दी होती!

अगली बात कि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2012 में क्यों सारे 2जी लाइसेंसों को रद्द कर दिया था? तो इसके बारे में जस्टिस जी एस सिंघवी ने अख़बार इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि “उनकी बेंच के फ़ैसले को पूरा पढ़ा जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले का ये अर्थ नहीं है कि कोई मामला ही नहीं बनता था, बल्कि उसका कहना है कि अभियोजन आरोपों को साबित नहीं कर सका।” जस्टिस सिंघवी आगे कहते हैं कि “फौज़दारी क़ानून में दो पहलू होते हैं। पहला, कोई मामला नहीं बनता और दूसरा, कोई सबूत नहीं है। इस मामले में प्रेस रिपोर्ट्स के मुताबिक़, कोई सबूत नहीं था। यदि किसी ने कोई अपराध किया है, लेकिन अदालत में उसे साबित करने के लिए सबूत नहीं पेश किये जा सके, तो उसे सज़ा नहीं दी जा सकती।” यानी, जस्टिस सिंघवी को अब भी ये लगता है कि घोटाला तो था, भले सीबीआई, सीएजी और मोदी सरकार उसे अदालत में साबित नहीं कर पायी! ये तर्क कम और ज़िद ज़्यादा है!

फरवरी 2012 में अपने फ़ैसले में जस्टिस सिंघवी और जस्टिस ए के गाँगुली की खंडपीठ ने लिखा था, “सितम्बर 2007 और मार्च 2008 के दौरान संचार मंत्री की अगुवाई में उनके मातहत अफ़सरों ने जो फ़ैसले लिये वो पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध थे।” जस्टिस सिंघवी ने आगे कहा कि “सुप्रीम कोर्ट के सामने मुद्दा बिल्कुल अलग था। सुप्रीम कोर्ट को स्पेक्ट्रम आबंटन प्रक्रिया की क़ानून वैधता का परीक्षण करना था, जबकि ट्रायल कोर्ट को उसमें निहित अपराध का परीक्षण करना था।” जस्टिस सिंघवी ने ‘ज़ीरो-लॉस थ्योरी’ पर टिप्पणी करने से परहेज़ किया, लेकिन इतना ज़रूर कहा कि “उस वक़्त सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि स्पेक्ट्रम की नीलामी से 60 हज़ार करोड़ रुपये मिले हैं।”

आईए ज़रा अब ये भी समझते चलें कि 2012 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में जब ये कहा गया कि स्पेक्ट्रम आबंटन का काम ‘पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध’ था, तब इनमें से किसी भी बात का ‘अदालत में परीक्षण’ नहीं हुआ था। ‘अदालत में परीक्षण’ भी बाक़ायदा एक क़ानूनी प्रक्रिया है। किसी भी आरोप को सिर्फ़ ट्रायल कोर्ट में ही परखा जाता है, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नहीं। यही हमारे देश का विधान है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में तो सिर्फ़ ये परखा जाता है कि क्या ट्रायल कोर्ट और फिर हाईकोर्ट में क़ानून और उसकी प्रक्रिया का सही पालन हुआ है या नहीं। इसीलिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को अपीलीय अदालत कहा जाता है।

2जी मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले ने सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार की उन धारणाओं को भी ग़लत साबित कर दिया, जिसमें ये माना गया कि स्पेक्ट्रम आबंटन की नीति ग़लत थी। स्पेक्ट्रम जैसी किसी भी सीमित चीज़ के आबंटन का दो तरीक़ा हो सकता है। पहला, तय दाम पर बेचना-ख़रीदना और दूसरा, उसे नीलामी के ज़रिये बेचना। जब चीज़ सीमित होती है तो उसे ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति या नियम से भी जोड़ा जाता है। जैसे रेलवे, ट्रेन के टिकट को ‘पहले आओ पहले पाओ’ के नियम से ही बेचती है, नीलामी से नहीं। अब यदि सीएजी या सुप्रीम कोर्ट या विपक्ष ये कहने लगे कि ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति ग़लत है क्योंकि नीलामी से टिकट बेचने पर रेलवे को कहीं ज़्यादा आमदनी होगी, तो इससे तय दाम पर बेचने की नीति ग़लत साबित नहीं हो सकती!

ऐसे में क्या आपको ये नहीं लगेगा कि टिकट बेचने की नीति को तय करना रेलवे या सरकार का काम है! सीएजी या सुप्रीम कोर्ट इसमें दख़ल नहीं दे सकते। लेकिन यदि नौकरशाही ने ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति को लागू करने में घपला किया है तो मामला ज़रूर अदालत में जा सकता है। अदालत ये तय करेगी कि घपला हुआ भी है या नहीं, और यदि हुआ तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है तथा क़सूरवार की सज़ा क्या होनी चाहिए? यहाँ ग़ौर करने की बात ये भी है कि अदालत को सज़ा या अपना फ़ैसला सुनाते वक़्त उसके प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए।

ज़रा सोचिए कि रेलवे के टिकटों को बेचने में यदि कोई घपला हुआ है तो क्या सुप्रीम कोर्ट को ये फ़ैसला सुनाने का हक़ हो सकता कि ‘बिके हुए सारे टिकट रद्द किये जाते हैं, क्योंकि सीएजी को लगता है कि टिकटों की नीलामी होनी चाहिए। और, यहाँ तक कि जब से टिकटों की नीलामी शुरू हुई है, तब से रेलवे की आमदनी लाखों-करोड़ों गुना बढ़ गयी है!’ सुप्रीम कोर्ट को ये भी सोचना पड़ेगा कि क्या कुछ लोगों के क़सूर की सज़ा हरेक रेल यात्री को देना मुनासिब होगा? क्या ज़ुर्माना वग़ैरह लगाने का भी कोई और विकल्प सम्भव है? क्योंकि ज़ुर्माना भी तो अपने आप में एक सज़ा है। वैसे भी देश में क़सूर के अनुपात में ही सज़ा देने का विधान है। यहाँ चींटी या ख़रगोश या शेर को मारने के लिए तोप चलाने का रिवाज़ नहीं है। यहाँ बड़ी से बड़ी चोरी करने वाले को भी सज़ा-ए-मौत नहीं दी जाती!

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? उसने एक झटके में सारे लाइसेंस रद्द कर दिये। जिसने आम जनता को कॉल ड्रॉप और धीमी इंटरनेट स्पीड की ऐसी समस्या सौग़ात में दी, जिससे हमारा टेलीकॉम सेक्टर आज तक नहीं उबर पाया है। उल्टा आगा-पीछा सोचे बग़ैर सुनाये गये सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की वजह से लाइसेंस पाने वाली कम्पनियों की भारी-भरकम रक़म डूब गयी, जो उन्होंने से बैंकों से क़र्ज़ लेकर निवेश किया था। इससे जहाँ एक ओर सुरक्षित निवेश के लिहाज़ से दुनियाभर में भारत की साख़ गिरी, वहीं भारतीय बैंकों पर एनपीए (डूबा क़र्ज़) ऐसी गाज़ गिरी कि आज सिर्फ़ टेलीकॉम सेक्टर का एनपीए ही 5 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जा पहुँचा है। ये देश के कुल एनपीए के आधे से भी अधिक है! लाइसेंस रद्द होने के बाद नीलामी की जिन क़ीमतों पर टेलीकॉम कम्पनियों को स्पेक्ट्रम ख़रीदकर अपनी जान बचानी पड़ी वो देखते ही देखते बीमार बन गयीं। क्योंकि वो इतना नहीं कमा पा रही हैं कि बैंकों से लिये गये भारी क़र्ज़ की क़िस्ते भर सकें। टेलीकॉम सेक्टर का विस्तार रूक गया। 50 हज़ार से ज़्यादा लोगों की रोज़ी-रोटी जाती रही!

लगे हाथ ये कल्पना करके भी देखिए कि यदि विपक्ष इस बात पर हाय-तौबा करने लगे कि रेल के टिकटों को ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति के मुताबिक़ बेचकर सरकार घोटाला कर रही है, क्योंकि यदि इन्हें नीलामी से बेचा जाता तो रेलवे मालामाल हो जाती, तो क्या इससे नीलामी की नीति सही साबित हो सकती है! यहीं मज़े की बात ये भी रही कि विपक्ष के दुष्प्रचार की वजह से आम जनता ही नहीं, आला सरकारी संस्थाओं में बैठे लोग भी ये धारणा बना बैठे कि घोटाला तो हो ही रहा था! अलबत्ता, जाँच से घोटाला इसलिए साबित नहीं हुआ क्योंकि सबूत नहीं मिले! इसका मतलब तो हुआ कि यदि कल को बीजेपी ये कहने लगे कि आप हत्यारे हैं, बलात्कारी हैं, राष्ट्रद्रोही हैं, आतंकी हैं तो आपको ये सब मान लिया जाएगा! भले ही इसका कोई सबूत नहीं हो। इसे ही चरित्रहनन कहते हैं। लिहाज़ा, कल्पना कीजिए कि हमारे समाज और लोकतंत्र के लिए चरित्रहनन का ऐसा हठकंडा कितना विनाशकारी साबित हो सकता है!

इसी तरह, 2जी मामले में ट्रायल कोर्ट को यही तो तय करना था कि जिस सरकारी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट, सीएजी और बीजेपी ‘पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध’ बताती रही है, क्या वो वास्तव में ऐसी ही है भी या नहीं। किसी भी आरोप की सच्चाई को तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट में अभियोजन पक्ष को वो सारे सबूत रखने होते हैं, जिनसे आरोप साबित हों। इसीलिए यदि अदालत में आरोप साबित नहीं हुए तो ताल ठोंककर कहा जाएगा कि आरोप झूठे थे, मनगढ़न्त थे, राजनीतिक द्वेष और दुर्भावना से प्रेरित थे। ध्यान रहे कि आरोपियों को बेक़सूर पाने पर ही अदालतें उन्हें बाइज़्ज़त बरी करती हैं। वर्ना, यदि अदालत को लगता है कि आरोपों में आंशिक सच्चाई है तो भी आरोपी को अपराधी ही करार दिया जाता है। हालाँकि, उसकी सज़ा, उसके अपराधों के अनुपात में होती है। 2जी मामले में सारे के सारे आरोपी का बाइज़्ज़त बरी हो जाना, निश्चित रूप से ये साबित करता है कि 1.76 लाख करोड़ रुपये का कथित घोटाला महज़ एक बुलबुला था, जो अब फूट चुका है!

साफ़ है कि बीजेपी के दुष्प्रचार की वजह से 2012 में हमारे सुप्रीम कोर्ट पर भी ये आम धारणा हावी थी, जिसमें ये मान लिया गया है कि बीजेपी को छोड़कर सारी पार्टियाँ बेईमान हैं। बीजेपी के अलावा अन्य पार्टियों के सारे के सारे नेता चोर हैं, जबकि हमारी नौकरशाही बड़ी ईमानदार और कर्तव्यपरायण है। हालाँकि, ये सच भी किसी से छिपा नहीं है कि हमारे नेताओं से ज़्यादा भ्रष्ट और निक्कमी हमारी नौकरशाही है। नेताओं को तो जनता हर पाँच साल पर आज़माकर जनादेश देती है, लेकिन नौकरशाही तो बेताज बादशाह है। जनता इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। 2जी मामले में भी पूरी तरह से नकारा साबित हुए सीबीआई और सीएजी भी तो हमारी नौकरशाही का ही हिस्सा हैं। इनका बाल तक बाँका नहीं होगा!

ओपिनियन

प्रणब का मिशन नागपुर लोकतंत्र के लिए कितना सही?

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

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Pranab Mukherjee

नागपुर से प्रणब की जो तस्वीरें देखने को मिलीं, उसे एक कांग्रेस नेता के शब्दों में हजम करना मुश्किल था। जो शख्स धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंगे रहे, जिदंगी के कई साल कांग्रेस पार्टी को दिए और फिर संविधान कायम रखने की जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रपति बने, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे संगठन के प्रमुख के साथ मंच साझा कर रहे थे और उनकी आवभगत का आनंद ले रहे थे। यह उन्हें उन मूल्यों व आदर्शो का समर्थन करता दिखाता है, जिनके विरोध में वे हमेशा खड़े रहे और संघर्ष करते रहे।

मुखर्जी के पहली बार हिंदूवादी संगठन के मुख्यालय में जाने के विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वैचारिक सलाहकार ने मध्यम स्तर के एक कांग्रेस नेता से पूछा, “आप उस सरकार का हिस्सा थे, जिसने 1975 में और फिर 1992 में आरएसएस को प्रतिबंधित किया। क्या आपको नहीं लगता कि आपको हमें बताना चाहिए कि उस समय आरएसएस में क्या बुराई थी, जो अब उसका गुण बन गया है?”

प्रणब की बेटी शर्मिष्ठा सहित कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं ने ऐसे संगठन से मिले निमंत्रण को स्वीकार करने पर सवाल उठाए, जो वामपंथी-उदारवादी- धर्मनिरपेक्षता की स्थापना को नापसंद करता आया है। न सिर्फ समर्पित, बल्कि चिंतित नागरिक भी भी देश में नफरत और पूर्वाग्रह वाले माहौल में अपनी व्यथा जाहिर कर रहे हैं और अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित हमले और सामाजकि रूप से सताए दलितों व पिछड़ों के दमन के लिए आरएसएस और उससे संबद्ध संघ परिवार के संगठनों की विचारधारा को दोषी ठहराते रहे हैं।

कई लोगों ने आवाज उठाई है कि यदि इस तरह से नफरत का जहर फैलाने दिया जाता रहा, तो यह भारत के उस बहुपक्षीय, बहुसंख्यक और बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचना व तानेबाने को खत्म कर सकता है, जो देश को इतना अनोखा व अद्वितीय बनाता है।

कथित रूप से हिंदू राष्ट्रवादी समूहों से संबद्ध कमसिन लड़कियों के खिलाफ क्रूर हिंसा के बाद अप्रैल में देशभर में चलाए गए ‘हैशटैगनॉटइन माइनेम’ विरोध अभियान के दौरान ऐसे संदेश छाए रहे कि “आज हम घृणा की राजनीति का सामना कर रहे हैं जो हमारे देश के बड़े हिस्सों में फैल गया है .. मुसलमान अगले दौर के हमलों के डर के साये में रहते हैं, यहां तक कि संविधान में दलितों और आदिवासियों को जो अधिकार मिले हैं, उस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।”

83 वर्षीय मुखर्जी ने बढ़ते ध्रुवीकरण के इस माहौल में पुराने कैबिनेट और पार्टी के कुछ सहयोगियों की अपील को अनदेखा कर दिया। राष्ट्रीय स्तर पर टेलीविजन पर सीधे प्रसारित भाषण में मुखर्जी ने कहा “भारत की आत्मा बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है” और “धर्मनिरपेक्षता व समावेश हमारे लिए विश्वास का विषय है।”

उन्होंने उस आरएसएस रैंक और फाइल की याद दिलाई, जिन्होंने हिंदू सर्वोच्चवादी विचारधारा का प्रचार किया और जिसके संस्थापक ने मुसलमानों और ईसाइयों को ‘आक्रमणकारी’ माना। यह (विभिन्न धर्म) वह चीज है जिससे “हमारी संस्कृति, विश्वास और भाषा की बहुतायत भारत को विशेष बनाती है” और “धर्मशास्त्र, धर्म, क्षेत्र, घृणा और असहिष्णुता के सिद्धांत व पहचान के आधार पर हमारे राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का कोई प्रयास हमारी राष्ट्रीय पहचान को धूमिल करने का ही काम करेगा।”

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

उनकी सोच की एक झलक उनके भाषण में दिखाई पड़ती है, जिसमें उन्होंने इस बात पर दुख जाहिर किया कि ‘क्रोध की अभिव्यक्ति’ राष्ट्रीय संरचना को पूरी तरह से नष्ट कर रही है। उन्होंने कहा, “बातचीत न केवल प्रतिस्पर्धी हितों को संतुलित करने के लिए, बल्कि उन्हें सुलझाने के लिए भी जरूरी है .. सिर्फ संवाद के माध्यम से हम बिना हमारे राजनीति के भीतर अस्वास्थ्यकर संघर्ष के जटिल समस्याओं को हल करने की समझ विकसित कर सकते हैं।

संवाद और समायोजन लोकतांत्रिक कार्यकलापों के आधारशिला हैं और उनकी अनुपस्थिति अक्सर लोकतंत्र की मौत की घंटी बजती है।

अपनी किताब ‘हाउ डेमोक्रेसीज डाई’ में हार्वर्ड के प्रोफेसरों स्टीवन लेविट्स्की और डेनियल जिबलाट ने आज अमेरिकी लोकतंत्र में मौजूद ‘चरम कट्टरपंथी विभाजन’ के बारे में बात की है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में सामाजिक धारणाओं व मान्यताओं के टूटने को दर्शाता है, यह न सिर्फ डेमोक्रेट और रिपब्लिकन नेताओं के बीच बढ़ते नीतिगत मतभेद में नजर आ रहा है, बल्कि नस्ली और धार्मिक मतभेदों का भी बढ़ना नजर आ रहा है और लोकतंत्र की सुरक्षा रेलिंग को भी नुकसान पहुंच रहा है।

भारत आज भी दोराहे पर खड़ा है, जो शायद 71 साल के इतिहास में अभूतपूर्व है। जैसे ही कोई राष्ट्रीय प्रवचन दिनभर में चर्चा का विषय बन जाता है, सोशल मीडिया पर अक्सर दो चरम विभाजनकारी और नफरत फैलाने वाली विचारधाराओं के बीच ठन जाती है। इससे लोकतंत्र के हिमायती आम नागरिकों, खासकर युवा, जो परिवर्तन और प्रगति के लिए उत्सुक हैं, उन्हें निराशा हाथ लगती है।

देश में हाल के चुनावों में बुरी स्थिति देखने को मिली है। न सिर्फ शपथ ग्रहण करने वाले राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच, बल्कि विचारधाराओं के बीच भी विरोध देखने को मिला है जो मूल रूप से उनके राष्ट्रीय दृष्टिकोण में भी एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत है।

और शायद यही कारण है कि मुखर्जी ने महसूस किया कि उन्हें राष्ट्रीय भाषण में विचारों में गहराती खाई को पाटने के लिए आगे आना होगा और संवाद के लिए आग्रह करना होगा।

द इकोनॉमिस्ट ने अपने हालिया स्तंभों में से एक में प्यू ग्लोबल सर्वेक्षण का जिक्र करते हुए कहा, “यह शायद अप्रियकर हो सकता है, भारत की राजनीतिक व्यवस्था को शायद बड़ी उपलब्धियों के साथ श्रेय दिया जा सके।” सर्वेक्षण में पाया गया कि किसी अन्य लोकतांत्रिक देशों के नागरिकों के मुकाबले भारतीय लोग लोकतंत्र को लेकर कम उत्साहित हैं और मजबूत नेता चाहने या सैन्य शासन की ओर ज्यादा आकर्षित हैं।

लोकतंत्र ने एक विशाल और लगभग असंभव रूप से विविधता वाले देश को एकजुट रखने में मदद की है। इसने सेना को सत्ता से बाहर रखा है और इसने नागरिक स्वतंत्रता को बरकरार रखा है। भारत अपनी लचीली व्यवस्था के कारण ही कई पड़ोसियों के लिए ईष्र्या का विषय बना हुआ है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

मप्र : विधानसभा चुनाव में निर्णायक होंगे फर्जी मतदाता

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Fake Voter ID

भोपाल, 4 जून | मध्य प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसे लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग के यहां शिकायत दर्ज कराई है। कांग्रेस ने 60 लाख फर्जी मतदाता होने का दावा किया है।

फर्जी मतदाताओं का सबसे पहला और बड़ा खुलासा तो इसी साल के फरवरी माह में शिवपुरी के कोलारस और अशोकनगर के मुंगावली में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान हुआ था। आगामी चुनाव में राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता सजग व सर्तक रहे तो चुनाव के नतीजों में बड़े बदलाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

पिछले माह की नौ मई को आईएएनएस ने सिर्फ शिवपुरी जिले में 60 हजार फर्जी मतदाताओं का खुलासा किया था। इनमें से 21,000 मतदाता ऐसे थे, जिनकी वषरें पहले मौत हो चुकी थी।

इस सूची में 28,067 मतदाता ऐसे हैं, जो दूसरी जगह चले गए, फिर भी सूची में उनके नाम हैं। जिले में अपने स्थान पर अनुपस्थित पाए गए मतदाताओं की संख्या 5,633, और एक से ज्यादा स्थानों पर 5,031 मतदाताओं के नाम पाए गए थे।

गौरतलब है कि फरवरी माह में कोलारस विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी यह बात सामने आई थी कि 5,537 मृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद थे। शिकायत के बाद शिवपुरी के तत्कालीन जिलाधिकारी तरुण राठी को इस मामले में चुनाव आयोग ने लापरवाही का दोषी पाया था।

आयोग ने जांच में पाया था कि जिलाधिकारी तरुण राठी ने सूची में गड़बड़ी पर सही मॉनिटरिंग नहीं की। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह को पत्र भी लिखा था। बाद में राठी का तबादला कर दिया गया।

ऐसे में सवाल उठा कि जब शिवपुरी जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में 60,000 फर्जी मतदाता अर्थात औसतन एक विधानसभा में 12,000 फर्जी मतदाता हो सकते हैं, तो प्रदेश के 230 विधानसभा क्षेत्रों का क्या हाल होगा। इसी आधार पर कांग्रेस ने विधानसभा की 100 सीटों पर मतदाताओं की स्थिति का पता लगाया, जिसमें औसत तौर पर एक बात सामने आई कि राज्य में 6000,000 फर्जी मतदाता हैं। एक मतदाता की 10 से 20 मतदान केंद्रों की सूची में नाम और तस्वीरें हैं।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा अन्य नेताओं ने चुनाव आयोग को शिकायत की, जिस पर जांच भी शुरू हो गई है। आयोग ने एक जांच दल भोपाल भी भेजे हैं।

राज्य की मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह का कहना है, “जो हुआ है वह नहीं होना चाहिए। इसमें सुधार के लिए हमारी ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जिला स्तर पर ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश हो रही है, जिसके जरिए एक ही तस्वीर कई स्थानों पर पाए जाने पर उन्हें हटाया जाए। हमारी सबसे मजबूत कड़ी ब्लॉक स्तर का अधिकारी होता है, वह अच्छा काम करेगा, कलेक्टर उस पर निगरानी अच्छे से रखेंगे तो तस्वीरों का दोहराव नहीं होगा।”

राज्य सरकार के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, “मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसमें सुधार होना चाहिए, मगर एक सवाल यह भी उठता है कि मतदाता सूची ब्रेक कैसे हुई। ऐसा कौन सा सॉफ्टवेयर आ गया, यह भी जांच का विषय है। इतना तय है कि इससे सरकार या उससे जुड़े लोगों का कोई लेना-देना नहीं है।”

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह चौहान ने पिछले दिनों चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि भोपाल जिले के नरेला विधानसभा क्षेत्र में कई मकान ऐसे हैं, जिनका आकार 1550 से 2000 वर्ग फुट है और वहां 100 से 150 तक मतदाता होना बताया गया है।

राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता का मसला काफी अहम रहने वाला है, क्योंकि 230 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 50 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जीत हार का अंतर अधिकतम 5,000 रहता है। इस स्थिति में अगर फर्जी मतदाताओं के नाम काट दिए गए और उनके स्थान पर कोई वोट नहीं डाल पाया तो नतीजे चुनावी तस्वीर बदलने वाले साबित हो सकते हैं।

–आईएएनएस

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राहुल गांधी कर सकते हैं मप्र में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा : कमलनाथ

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kamal nath

नई दिल्ली, 7 मई | मध्यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष कमलनाथ का कहना कि पार्टी में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करने की परंपरा नहीं है। मगर, जरूरत पड़ी तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर सकते हैं।

कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ‘ठगी’ से नाराज हैं और कांग्रेस ने इस साल के आखिर में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए कमर कस ली है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “बेशक, समय कम है मगर मुझे पक्का विश्वास है कि मैं गांव स्तर पर पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने में सक्षम साबित होऊंगा। यह मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संगठन-शक्ति व पैसे की ताकत के साथ है।”

कांग्रेस के 71 वर्षीय वरिष्ठ नेता और छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव के मद्देनजर पार्टी की प्रदेश इकाई में बदलाव संबंधी फैसला बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वह अब बीती बातों पर नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि इस संबंध में फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को 26 अप्रैल को मध्यप्रदेश कांग्रेस की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है और पार्टी के सभी नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं।

कमलनाथ की बातों से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव में खुद उतरने को लेकर उन्होंने अपना विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा, “मैं 40 साल से चुनाव लड़ता आ रहा हूं। बतौर सांसद मेरा सेवाकाल सबसे लंबा रहा है।”

जब पूछा गया कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

मध्यप्रदेश में कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं किए जाने और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त कर संतुलन कायम किए जाने के संबंध में पूछे गए सवालों पर कमलनाथ ने कहा, “मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां कोई एक शख्स चुनाव नहीं जीत सकता। आपको कई चेहरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी ने ऐसा फैसला लिया है।”

जब पूछा गया कि क्या वह चाहेंगे कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करे तो उन्होंने कहा कि हर राज्य के लिए अगल रणनीति होती है।

कमलनाथ ने कहा, “कभी-कभी यह जरूरी होता है, जबकि कभी इसकी जरूरत नहीं होती। क्या भाजपा ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था? क्या उन्होंने उत्तराखंड में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया? उनका कभी कोई मुख्यमंत्री उम्मीदवार (चुनाव से पूर्व) नहीं था। इसलिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

कमलनाथ ने इससे पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पार्टी को हर राज्य में बताना चाहिए कि वहां उसका नेता कौन है। इसका जिक्र करने पर उन्होंने कहा, “अगर जरूरत महसूस होगी तो कांग्रेस अध्यक्ष किसी के नाम की घोषणा करेंगे।”

कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के तौर पर उनकी प्राथमिकता पार्टी को गांव स्तर पर मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “चुनाव बहुत मायने में स्थानीय बन गया है और हमें यह समझना होगा।”

कांग्रेस को मध्यप्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। कमलनाथ का आरोप है कि भाजपा पूर्व में किए अपने वादों को पूरा करने में विफल रही है।

पार्टी के प्रदेश प्रमुख के तौर पर अपनी नियुक्ति के संबंध मे कमलनाथ ने कहा, “मेरे सभी से अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए मेरे लिए पार्टी में एकता लाना कोई चुनौती नहीं है। मैं भाग्यशाली हूं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टी में पहले से ही एकता है।” उन्होंने पार्टी में सिंधिया के साथ किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया।

कमलनाथ ने कहा कि उनका मुकाबला अभी वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज से है।

–आईएएनएस

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