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अरे, ये ‘तेल-पानी का मिलन’ नहीं, मोदी राज का मर्सिया है!

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MODI-SHAH

बेशक़, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को विपक्षी एकजुटता ने बेचैन कर दिया है। इससे तिलमिलाए मोदी ने अपने चिर-परिचित अन्दाज़ में ताबड़तोड़ और लम्बी-चौड़ी फेंकने का रास्ता थाम लिया। उनकी ताज़ा पेशकश है कि विपक्ष का निर्माणाधीन गठबन्धन, जो ‘तेल-पानी का बेमेल संगम है, जिसके बाद न तेल काम का रहता है और ना पानी!’ शायद, मोदी भूल चुके हैं कि वो ख़ुद भी तेल-पानी के बेमेल संगम वाली उस नाँव पर सवार हैं, जिसे एनडीए यानी राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबन्धन कहते हैं।

दरअसल, संघ-बीजेपी और मोदी-शाह इस ख़ुशफ़हमी में हैं कि एनडीए के दल एक-दूसरे के साथ इसलिए गलबहियाँ डाले हुए हैं क्योंकि वो प्राकृतिक गठबन्धन है। जबकि ज़मीनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है। उद्धव की शिवसेना, महबूबा की पीडीपी और चन्द्रबाबू की टीडीपी का अफ़साना सबके सामने है! ये नये किस्से हैं। पुराने तज़ुर्बों की बातें तो बहुत लम्बी-चौड़ी हैं। अटल बिहारी वाजपेयी आज इस हालत में नहीं हैं कि वो अपने सियासी वंशजों को गठबन्धन पर मुँह निपोड़ने से आगाह कर सकें। दरअसल, मोदी-शाह को ये समझना होगा कि गठबन्धन कभी प्राकृतिक नहीं होता।

मजबूरी और आपसी निर्भरता हरेक गठबन्धन की बुनियादी शर्त है। फिर भी कुछ गठबन्धन स्वाभाविक होते हैं तो कुछ सत्तालोलुप और मौक़ापरस्त। अच्छा हो या बुरा, हरेक गठबन्धन सियासी ही होता है। वाम मोर्चा और शिवसेना-अकाली-बीजेपी के गठबन्धन को स्वाभाविक माना जा सकता है। जबकि नीतीश, पासवान और महबूबा जैसों की नज़दीकी विशुद्ध रूप से सत्तालोलुप और मौक़ापरस्त गठबन्धन की श्रेणी में आएगी। इसीलिए मौक़ापरस्तों को बार-बार दावा करना पड़ता है कि वो बीजेपी के साम्प्रदायिक एजेंडे के ख़िलाफ़ हैं। इनके पास कभी इस सवाल का जबाब नहीं होता कि यदि वो संघियों की साम्प्रदायिकता ख़िलाफ़ हैं तो उस पर नकेल कसने के लिए करते क्या हैं?

गठबन्धन की एक और किस्म उन दलों से जुड़ी है जिनका अपने मुख्य विरोधी के रूप में काँग्रेस या बीजेपी से मुक़ाबला होता है। पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी ने टिकाऊ गठबन्धन की मिसाल क़ायम की, तो उन्हें सत्ता से बेदख़ल भी गठबन्धन ने ही किया। ऐसे दोनों गठबन्धनों यानी एनडीए और यूपीए के जन्म के दरम्यान वाजपेयी के कई सहयोगी पाला बदल चुके थे। गठबन्धनों में आना-जाना भले ही सामान्य हो, लेकिन बीजेपी से छिटकने वाले दलों की संख्या काँग्रेस के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा रही है। एक दौर था जब करूणानिधि, नवीन पटनायक, ममता बनर्जी, मायावती, फ़ारूख़ अब्दुल्ला, ओम प्रकाश चौटाला और चन्द्रबाबू नायडू ने बीजेपी की मदद से सत्ता-सुख भोगा। बीजेपी से गलबहियाँ का इनका तज़ुर्बा ऐसा रहा कि अगली बार इन्होंने भगवा गोदी से तौबा कर ली। जयललिता और नवीन पटनायक ने भले ही समय-समय पर एनडीए की मदद की, लेकिन दोनों ने बीजेपी से ख़ासी दूरी भी बनाये रखी।

Opposition leaders

In Pics: Opposition unity on display for 2019 as HD Kumaraswamy sworn in as Karnataka Chief Minister

इसीलिए जिन्हें विपक्षी दलों का निर्माणाधीन महागठबन्धन, ‘तेल और पानी के मेल’ जैसा दिख रहा है, उन्हें ज़रा अपने गठबन्धन के गिरेबान में भी झाँक लेना चाहिए। अरे, गठबन्धन का अर्थ ही है बेमेल को मेल बनाने का कौशल! दूसरों पर ‘तेल और पानी के मेल’ का कीचड़ फेंकने वाले नरेन्द्र मोदी को क्या याद है कि बेमेल जोड़-तोड़ की सबसे बड़ी मिसाल तो वो ख़ुद हैं! पवित्र अग्नि को साक्षी मानकर उन्होंने ऐसा बेमेल गठजोड़ बनाया कि वो न तो वर के काम आया और ना वधू के! उस गठबन्धन की गाँठ भी इतनी वाहियात निकली कि वर-वधू में से कोई भी उससे पिंड छुड़ाने नहीं गया। दोनों अभी तक गाँठ को दुम में लटकाये ढो रहे हैं!

धार्मिक अनुष्ठान के तहत वैदिक मंत्रोचार के बीच स्थापित वो गठबन्धन तकनीकी रूप से आज भी जीवित है। लेकिन जनाब नरेन्द्र मोदी और उनके प्रथम भक्त अमित शाह ने तो कभी उस गठबन्धन को तेल-पानी का संगम नहीं कहा। कभी उस नारी के हक़, गरिमा और स्वाभिमान की परवाह नहीं की जिसे बाक़ायदा, विधि-विधान से और गाजे-बाजे के साथ ब्याह कर लाया गया था। इसीलिए इन्हें जितनी परवाह तीन तलाक़ और हलाला से पीड़ित महिलाओं के अधिकारों की होती है, उतनी मुज़फ़्फ़रपुर, देवरिया, हरदोई, पटना जैसी जगहों पर रहने वाली बेसहारा महिलाओं के लिए क्यों नहीं होती?

बीजेपी की नैतिकता में यदि ज़रा भी दम होता तो इन दुष्कर्मों और बर्बरता की वारदातों के बाद वहाँ की सरकारें एक पल भी सत्ता में नहीं रह पातीं। ऐसे मामलों में प्रधानमंत्री को ‘तेल और पानी का बेमेल संगम’ कहीं नज़र नहीं आता। इसी तरह, बंगाल में दुर्गा पूजा में ख़लल पड़ने पर अमित शाह, सचिवालय की ईंट से ईंट बजा देने की धमकी तो देते हैं, लेकिन बेसहारा नारियों के ठिकानों पर साक्षात दुर्गाओं के साथ हो रहे ज़ुल्म को लेकर ना तो उनका ख़ून खौलता है और न ही उन्हें कहीं कोई ईंट दिखायी देती है।

भगवा ख़ानदान से जुड़ा एक भी नेता, कार्यकर्ता या ट्रोल ऐसा नहीं है, जिसे इस बात की चिन्ता खाये जा रही हो कि मोदी सरकार ने अभी तक अपना एक भी वादा निभाकर नहीं दिखाया! किसी मोदी भक्त को परवाह नहीं है कि चुनाव में विकास और अच्छे दिन की छटा को जनता को कैसे दिखाया जाएगा? हिन्दू-मुसलमान में उलझे भक्तों को अब एनआरसी के रूप में नया शिगूफ़ा मिल गया है। गाय-गोबर-बीफ़-लिंचिंग, लव-जिहाद, एंटी रोमियो, दलित उत्पीड़न जैसे कारतूसों को फ़ुस्स होता देख भगवा ख़ेमे में बेहद मायूसी है। इसीलिए विपक्षी एकजुटता का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।

विपक्षी एकता के अलावा बीजेपी के हरेक नेता को एनआरसी यानी नैशनल रज़िस्टर ऑफ़ सिटीजन्स की चिन्ता भी बहुत सता रही है। भगवा ख़ानदान को लगता है कि एनआरसी के रूप में उसे अलाद्दीन का चिराग़ या हर मर्ज़ की दवा मिल गयी है! दरअसल, कल तक जो भारत को काँग्रेस मुक्त करने का दावा कर रहे थे, उसे मरा हुआ बता रहे हैं, उन्हें अब ‘मरी हुई काँग्रेस और ज़िन्दा मुसलमानों’ का ख़ौफ़ जीने नहीं दे रहा। मोदी बेचैन हैं कि वो जिस काँग्रेस को मृतप्राय बताते नहीं अघाते थे, जनता उसे पुनर्जीवित कर रही है। तमाम विपक्षी दिग्गज काँग्रेस के साथ लामबन्द होकर उस फिर से सत्ता में लाना चाहते हैं, जिसे बड़ी मुश्किल से, असंख्य से झूठ फैलाकर मोदी की बीजेपी और एनडीए ने सत्ता से बाहर किया था।

अपने जुमलेबाज़ और अहंकारी स्वभाव की वजह से मोदी ये समझने में असमर्थ हैं कि देश को उनसे मुक्ति दिलाने के लिए शेर और बकरी भी एक घाट पर पानी पीने के लिए तैयार हो गये हैं। सियासत, इसीलिए अनन्त सम्भावनाओं की विधा है! इसीलिए, कल तक विकास की बाँसुरी बजा रहे अमित शाह अब बौराये हुए हैं कि मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़हर उगले बग़ैर हिन्दुओं को झाँसा कैसे देंगे? उनकी इसी दुविधा को देखते हुए संघ ने बाँग्लादेशी घुसपैठियों के लिए ‘हिन्दू अन्दर, मुस्लिम बाहर’ की नीति बनायी है। जो भी इस नीति में साम्प्रदायिकता, हिन्दू तुष्टिकरण या हिन्दू राष्ट्र जैसी बातों की बू सूँघने की ज़ुर्रत करेगा, उसे देशद्रोही माना जाएगा और फ़ौरन लिंचिंग की सज़ा मिलेगी!

2019 में बीजेपी ने 350 सीटें जीतने वाला मुँगेरी लाल का अद्भुत सपना देखा है। इस सपने का झाँसा देने के लिए फेंकने की आदत से लाचार होने अनिवार्य है। इसीलिए नरेन्द्र मोदी को रोज़ाना कुछ न कुछ फेंके बग़ैर चैन नहीं मिलता। वो देश में हों या विदेश में, फेंकने का योगाभ्यास जारी रहता है। फेंकना अब उनके लिए शौक़ नहीं बल्कि नशा बन चुका है। एकजुट विपक्ष उन्हें नशामुक्त कर देगा, इसीलिए वो अपने विरोधियों के लिए हमेशा उटपटांग शब्द ही ढूँढ़ते रहते हैं। अभी राज्यसभा में इसी नशे की वजह से उन्होंने ‘बीके’ में ‘बिके’ बना दिया। इससे प्रधानमंत्री की गरिमा को ऐसी चोट पहुँची जैसा 70 साल में कभी नहीं हुआ। इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री के शब्द सदन की कार्यवाही से बाहर किये गये।

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नरेन्द्र मोदी अपनी छीछालेदर से कभी शर्मिन्दा नहीं होते। शायद, कम शिक्षित होने की वजह से ऐसा होता हो। मुमकिन है कि कामदार और चौकीदार जैसे जुमलों के अति-इस्तेमाल की वजह से उनका मन-मस्तिष्क वैसे ही ढीठ हो गया हो जैसे कई किस्म के एंटीबायटिक असरहीन बन जाते हैं। मोदी की तरह अमित शाह को भी ‘लपलपाती जीभ’ वाले असाध्य रोग ने जकड़ रखा है। इस रोग के लक्षणों ने 2013 में ही उस वक़्त महामारी का रूप ले लिया था जब गुजरात मॉडल, अच्छे दिन, महँगाई की मार, पेट्रोल और डॉलर के भाव, काला धन वापस लाने, सबको 15–15 लाख रुपये देने जैसे जुमलों ने धमाका किया था। तब भारत की भोली-भाली जनता समझ नहीं पायी कि उन्हें उल्लू बनाया गया है।

मज़े की बात ये है कि 2014 के बाद तीन साल तक जनता के उल्लू बनने का संक्रमण राज्य दर राज्य फैलता गया। संघी मदमस्त थे कि जनता में इस बात की होड़ लग चुकी है कि अन्य राज्यों की तरह हम भी कम से कम एक बार तो बीजेपी के झूठे वादों और इरादों को चखकर ज़रूर देखेंगे। लेकिन जिस तरह से तमाम विपक्षी नेताओं ने बीजेपी को एक बार आज़माने के बाद उसे अगली बार के लिए भरोसेमन्द नहीं पाया, उसी तरह से तमाम उपचुनावों में जनता भी उस बीजेपी से अपना दामन छुड़ाने लगी, जिसे थोड़े वक़्त पहले उसने चुना था।

इसीलिए, विपक्षी एकता को ‘तेल-पानी का मिलन’ बताने वाले गाँठ बाँध लें कि उनका नज़रिया ‘दिल बहलाने को ग़ालिब ख़्याल अच्छा है’ के सिवाय और कुछ नहीं है! यही मोदी राज का मर्सिया है! फ़िलहाल, बीजेपी की झूठ फैलाने वाली महामारी का प्रकोप देश को अभी और नौ महीने तक सताता रहेगा। तब तक जनता को ‘तेल-पानी के बेमेल मिलन’, ‘हिन्दू अन्दर, मुस्लिम बाहर’ जैसी असंख्य बातें वैसे ही बतायी जाएँगी जैसे ‘अच्छे दिन’ का खेल हुआ था!

मुकेश कुमार सिंह, वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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संशय भरे आधुनिक युग में हिंदू आदर्श धर्म : थरूर

वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।

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न्यूयॉर्क, 21 सितंबर | कांग्रेस सांसद व लेखक शशि थरूर के अनुसार, हिंदू एक अनोखा धर्म है और यह संशय के मौजूदा दौर के लिए अनुकूल है। थरूर ने धर्म के राजनीतिकरण की बखिया भी उधेड़ी।

न्यूयॉर्क में जयपुर साहित्य महोत्सव के एक संस्करण में के बातचीत सत्र के दौरान गुरुवार को थरूर ने कहा, “हिंदूधर्म इस तथ्य पर निर्भर करता है कि कई सारी बातें ऐसी हैं जिनके बारे में हम नहीं जानते हैं।”

मौजूदा दौर में इसके अनुकूल होने को लेकर उन्होंने कहा, “पहली बात यह अनोखा तथ्य है कि अनिश्चितता व संशय के युग में आपके पास एक विलक्षण प्रकार का धर्म है जिसमें संशय का विशेष लाभ है।”

सृजन के संबंध में उन्होंने कहा, “ऋग्वेद वस्तुत: बताता है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति कहां से हुई, किसने आकाश और धरती सबको बनाया, शायद स्वर्ग में वह जानता हो या नहीं भी जानता हो।”

उन्होंने कहा, “वह धर्म जो सर्वज्ञानी सृजनकर्ता पर सवाल करता हो वह मेरे विचार से आधुनिक और उत्तर आधुनिक चैतन्य के लिए अनोखा धर्म है।”

उन्होंने कहा, “उससे भी बढ़कर आपके पास असाधारण दर्शनग्रहण है और चूंकि कोई नहीं जानता कि भगवान किस तरह दिखते हैं इसलिए हिंदूधर्म में हर कोई भगवान की कल्पना करने को लेकर स्वतंत्र है।”

कांग्रस सांसद और ‘व्हाइ आई एम हिंदू’ के लेखक ने उन लोगों का मसला उठाया जो स्त्री-द्वेष और भेदभाव आधारित धर्म की निंदा करते हैं।

मनु की आचार संहिता के बारे में उन्होंने कहा, “इस बात के बहुत कम साक्ष्य हैं। क्या उसका पालन किया गया और इसके अनेक सूत्र विद्यमान हैं।”

उन्होंने उपहास करते हुए कहा, “इन सूत्रों में मुझे नहीं लगता कि हर हिंदू कामसूत्र की भी सलाह मानते हैं।”

थरूर ने कहा, “प्रत्येक स्त्री विरोधी या जातीयता कथन (हिंदू धर्मग्रंथ में) के लिए मैं आपको समान रूप से पवित्र ग्रंथ दे सकता हूं, जिसमें जातीयता के विरुद्ध उपदेश दिया गया है।”

–आईएएनएस

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मोहन भागवत झूठ पर झूठ परोसते रहे और भक्त झूम-झूमकर कीर्तिन करते रहे!

आख़िरी हथकंडे के रूप में संघ प्रमुख मोहन भागवत ये दिखाना चाहता है कि वो भविष्य के भारत की ख़ातिर ख़ुद को बदल चुका है। इसमें लेस-मात्र भी सच्चाई नहीं है।

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‘भविष्य का भारत’ के नाम पर दिल्ली में तीन दिन चली संघ प्रमुख मोहन भागवत की भाषण-माला ने जितने सवालों को सुलझाने की कोशिश की, उससे कई गुणा ज़्यादा सवाल तो और उलझ गये! इसकी सबसे आसान वजह ये रही कि भागवत की बातें झूठ का पुलिन्दा हैं। उनकी वो हरेक बात जो मीडिया में सुर्ख़ियाँ बनी, वो सरासर झूठी, मक्कारी भरी और दुर्भावनापूर्ण हैं। इसका सिर्फ़ एक ही मक़सद है कि जनता को संघ के बारे में और ग़ुमराह किया जाए, क्योंकि चुनाव सिर पर हैं और मोदी राज की पतन निश्चित है। इसीलिए मोहन भागवत झूठ पर झूठ परोसते रहे और संघी-भक्त झूम-झूमकर कीर्तिन करते रहे! यही वजह है कि देश के जितने बुद्धिजीवी संघ को पहचानते हैं, उनमें से किसी ने भी भागवत की बातों पर यक़ीन नहीं किया, बल्कि ऐसे हरेक शख़्स को भागवत की बातों में साज़िश नज़र आयी।

ये साज़िश नहीं तो और क्या है कि जिस मुस्लिम-विरोध से संघ का जन्म हुआ, जो मुस्लिम-घृणा संघियों के साहित्य में बिखरी पड़ी है, उसे ख़ारिज़ किये बग़ैर मोहन भागवत कहते हैं कि ‘मुसलमान के बिना हिन्दुत्व बेमानी है!’ एक जगह भागवत कहते हैं कि ‘भारत हिन्दू राष्ट्र था, है और रहेगा!’ दूसरी जगह बोलते हैं कि ‘हिन्दू राष्ट्र का मतलब यह नहीं है कि इसमें मुस्लिम नहीं रहेगा। जिस दिन ऐसा कहा जाएगा उस दिन वो हिन्दुत्व नहीं रहेगा। हिन्दुत्व तो वसुधैव कुटुम्बकम् की बात करता है।’ जबकि संघियों के भगवान समझे जाने वाले गोलवलकर अपनी किताब ‘बंच ऑफ़ थॉट’ में समझा चुके हैं कि “ये सोचना आत्मघाती होगा कि पाकिस्तान बनने के बाद वे रातोंरात देशभक्त हो गये हैं। इसके विपरीत पाकिस्तान बनने के बाद मुस्लिम ख़तरा सैकड़ों गुना बढ़ गया है।” इसी किताब में मुसलमानों और ईसाइयों को देश का दुश्मन बताया गया है।

संघियों के दूसरे देवताओं वीर सावरकर, केशव बलिराम हेडगेवार और दीन दयाल उपाध्याय ने जैसे हिन्दुत्व का ढाँचा संघ को दिया है उसमें सत्ता पाने के लिए हिंसा, नफ़रत और उन्माद को बेहद पवित्र हथियार की तरह पेश किया गया है। मनुवाद से बढ़कर संघ के लिए कोई विधान या संविधान कभी नहीं रहा। भागवत आज जाति-अव्यवस्था की दुहाई देते हैं, लेकिन संघ का स्नायु-तंत्र यानी ‘नर्वस सिस्टम’ इसी से चलता है। मुसलमानों के अलावा दलितों और महिलाओं को भी संघ ने हमेशा हेय दृष्टि से देखा है। ये किसी से छिपा नहीं है कि संघ बुनियादी तौर पर एक फ़ासिस्ट संगठन है। इसीलिए मोहन भागवत के शब्दों और उनकी मंशा पर शक होना लाज़िमी है।

अगर भागवत की ये बातें संघ के दोमुँहापन की पुष्टि नहीं करतीं या क्या वाकई संघ बदल गया है या बदलना चाहता है, तो भागवत को विज्ञान भवन के उसी मंच से बीजेपी के सिरफिरे नेताओं और विश्व हिन्दू परिषद तथा बजरंग दल जैसे हिन्दू तालिबानी संगठनों को दो-टूक कहना चाहिए था कि उन्हें संघ के नये नज़रिये को अपनाना होगा। क्योंकि अब संघ की संविधान और तिरंगे को लेकर राय बदल चुकी है। भागवत ने संघी हिन्दुत्व के शीर्ष प्रचारक और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के भी उन बयानों की भर्त्सना नहीं की, जिसमें योगी कह चुके हैं कि ‘क़ब्र से निकालकर मुस्लिम महिलाओं से बलात्कार’ किया जाएगा। यही योगी चुनावी मंच से ‘एक के बदले सौ मुस्लिम बेटियों की इज़्ज़त लूटने’ की भी धमकी भी दे चुका है। इसी ने क़ब्रिस्तान और श्मशान के नाम पर हिन्दू-मुस्लिम को लड़ाने का खेल खेला था। इसे ही ईद मनाने पर गर्व नहीं होता।

दरअसल संघ, अष्टावक्र से भी ज़्यादा विचित्र किस्म का संगठन है। रंग बदलने के लिहाज़ से संघ के आगे गिरगिट में पानी भरेंगे। संघ ख़ुद को विचारधारा आधारित संगठन बताते नहीं अघाता है। लेकिन सच्चाई ये है कि संघ में इतना साहस कभी नहीं रहा कि वो अपनी करतूतों के लिए ख़ुद को जबाबदेह मानने के लिए तैयार हो जाए। उसे सत्ता की दरकार होती है तो वो 370, समान नागरिक संहिता और अयोध्या मसले को ताक पर रख देता है। सत्ता से हटने के बाद इन्हें फिर सिर पर लाद लेता है। संघ पूरी बेशर्मी से कहता है कि उसकी सरकारें नागपुर से नहीं चलतीं। जबकि सच्चाई बिल्कुल उल्टी है। झूठ फैलाते हैं संघी कि उन्होंने तिरंगे को सर्वोपरि माना। अगर तिरंगा संविधान की श्रेष्ठता को स्थापित करता है तो भगवा को ‘गुरु’ क्यों होना चाहिए? संविधान ही ‘गुरु’ क्यों नहीं है? लोकतंत्र में संविधान को किसी ‘गुरु’ से कमतर क्यों होना चाहिए? हिन्दुत्व को संविधान से ऊपर क्यों होना चाहिए?

अब मोहन भागवत ये क्यों स्वीकार करना चाहते हैं कि 2014 से पहले भी भारत था? अब भागवत को ये दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त हो गया कि ‘काँग्रेस ने देश को बहुत से महापुरुष दिये और आज़ादी की लड़ाई में काँग्रेस की भूमिका सराहनीय रही?’ भागवत ने ये क्यों नहीं बताया कि किन-किन काँग्रेसियों को अब संघ-ख़ानदान महापुरुष मानेगा? किनके ख़िलाफ़ अब झूठ नहीं फैलाया जाएगा? किनका चरित्रहरण अब व्हाट्सअप पर नहीं दिखायी देगा? गाँधी-नेहरू परिवार के चरित्रहनन में लगे लाखों संघी-उत्पातियों को अब कौन सा रोज़गार दिया जाएगा? क्या ये ट्रोल्स अब गायों को सड़कों पर भटकने से रोकने के काम में झोंके जाएँगे? काश! तीन दिन की जुगाली के दौरान मोहन भागवत ने ये ख़ुलासा भी किया होता कि ‘स्वतंत्रता आन्दोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका क्या थी?’

दरअसल, यदि संघ से झूठ-फ़रेब, मक्कारी, हिन्दुत्ववादी उन्माद, मुस्लिम-ईसाई नफ़रत और मनुवाद को निकाल दिया जाए तो फिर वहाँ स्वयंसेवकों की लाठी और उनकी ख़ाकी नेकर के सिवाय और कुछ नहीं बचेगा। मोहन भागवत को साफ़ दिख रहा है कि बीते साढ़े चार साल में संघ-बीजेपी की नीतियों और उपलब्धि की वजह से हिन्दुओं का वो बहुत बड़ा वर्ग बेहद नाराज़ है जिसकी संविधान में आस्था है, जो हरेक भारतीय के साथ मेल-मिलाप से रहने और शान्तिपूर्वक देश की जटिल चुनौतियों से निपटने का हिमायती है, जिसे मालूम है कि देश जादू या जुमलों से नहीं बल्कि सच्ची नीयत से आगे बढ़ता है। मोदी राज में हर मोर्चे पर मुँह की खाने के बाद संघ का हिन्दुत्ववादी कॉडर, जनता में सिर्फ़ ये बात फैला रहे हैं कि ‘और कुछ हो या ना हो, लेकिन मोदी-योगी ने मुसलमानों को उनकी औक़ात दिखा दी है!’

लेकिन ज़्यादातर हिन्दू सिर्फ़ इस बात के लिए मोदी को वोट देने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्हें लिंचिंग के नाम पर मुसलमानों के प्रति क्रूरता दिखाने का सिलसिला पूरी तरह से नामंज़ूर है। उन्हें हिन्दू-मुस्लिम नफ़रत की भट्ठी में जलना स्वीकार नहीं है। उन्हें उना से लेकर वेमुला तक का दलित उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं है। वो गाँधी के हत्यारों के समर्थकों को पराक्रमी नहीं मानते। वो पिछली सरकारों के योगदान को समझते हैं। उन्हें मालूम है कि शेर कभी झुंड में नहीं रहता और ना ही उसे जंगली कुत्तों से कोई ख़तरा महसूस होता है। हिन्दुओं को अब समझ में आने लगा है कि किस मायावी शेर की ख़ातिर उन्हें कुत्तों के झुंड की तरह रहने की नसीहत दी जा रही है?

संघ की सबसे बड़ी शक्ति हैं सवर्ण हिन्दुओं की अज्ञानता। इसी से संघ, असहिष्णुता पैदा करता है। झूठ और अफ़वाह, उसके दुष्प्रचार का सबसे बड़ा हथियार है। संघ के लाखों प्रशिक्षित कार्यकर्ता इसी हथियार से उसे मज़बूती प्रदान करते हैं। लेकिन सवर्णों को अब समझ में आ रहा है कि सियासी रोटियाँ सेंकने के लिए जो संघ कल तक आरक्षण की समीक्षा की दुहाई देता था, जाति और सामाजिक पिछड़ेपन को आरक्षण का आधार बनाये रखने का विरोधी था, ग़रीब सवर्णों को भी आरक्षण देने का झूठ फैलाता था, वही संघ अब कह रहा है कि ‘संविधान में आरक्षण की जो व्यवस्था है उसे संघ का पूरा समर्थन है। कब तक चलेगा ये उन्हें ही तय करना है, जो आरक्षण के लाभार्थी हैं? क्रीमी लेयर का क्या करना है? ये समाज ही तय करेगा। आरक्षण समस्या नहीं है। आरक्षण पर राजनीति समस्या है। हाथ से हाथ मिलाकर जो गड्ढे में गिरा है उसे ऊपर लाना चाहिए। एक हज़ार साल की बेमानी दूर करने के लिए 100-150 साल झुककर रहना पड़े तो महँगा सौदा नहीं है।’

अब यदि भागवत का ये नज़रिया सही है तो फिर पिछले दिनों संघ-समर्थित सवर्णों का भारत बन्द क्यों हुआ था? वो बन्द भी बाक़ायदा था। एससी-एसटी एक्ट तो मुखौटा था। असली आग तो आरक्षण-विरोध की थी। दरअसल, भागवत की सारी बातें चुनावी पैंतरा है। संघ के ख़ास डीएनए से बना है, जिसे बदला गया तो संघ की ख़त्म हो जाएगा। इसीलिए भागवत की मंशा संघ के पुराने कुकर्मो पर सफ़ेदी पोतने की है। उसकी चालें धूर्ततापूर्ण हैं। उस पर लगे दाग़ इतने गहरे हैं कि सदियों तक नहीं मिटेंगे। महात्मा गाँधी की हत्या पर मिठाई बाँटने बाला ये संगठन मानवता का दुश्मन और संविधान का विरोधी है। इसके लोग तर्कवादियों की हत्या का जश्न मनाते हैं और हत्यारों को माला पहनाते हैं।

हरेक अलोकतांत्रिक और संविधान विरोधी गतिविधि में संघ की प्रत्यक्ष या परोक्ष हिस्सेदारी होती है। ऐसे हरेक सवाल का संघ हमेशा गोलमोल जबाब देता रहा है, जो उसे बेनक़ाब करते हैं। संघ उसी रास्ते पर चलने के लिए अभिशप्त है जो उसके पुरखों ने दिखाया है। इसीलिए सावधान रहिए, सतर्क रहिए, भागवत की बातों में मत आइए और 2019 में संघियों को बुरी तरह से परास्त कीजिए। चोला बदलने से मानसिकता या विचारधारा नहीं बदला करती। वर्ना, भागवत डंके की चोट पर इतना सनसनीखेज़ झूठ हर्ग़िज़ नहीं बोलते कि ‘स्वयंसेवक को किसी पार्टी को वोट या सपोर्ट करने के लिए नहीं कहा जाता’ और ‘संघ का राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है!’

तमाम मुद्दों पर संघ प्रमुख के नये और पुराने बयानों का मिलान करके देख लीजिए। आपको संविधान की जयजयकार भी मिलेगी और हिन्दू राष्ट्र भी मिलेगा। विश्व शान्ति का जाप भी मिलेगा और बाहुबल से दोबारा अखंड भारत बनाने का संकल्प भी। आधुनिक समाज की वकालत भी मिलेगी और ये दलील भी कि यदि पत्नी अपने पति की इच्छाएँ पूरी नहीं करे तो उसे छोड़ देना चाहिए। अब ये आप पर है कि आपको क्या अच्छा लगता है। जो अच्छा लगे उसे चुन लीजिए और जैसे संघ आपको भरमाना चाहता है, वैसे भरमाते रहिए। क्योंकि संघ कभी किसी बात की ज़िम्मेदारी नहीं लेता। संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ाकर बाबरी मस्जिद को गिरवाने वाले वाजपेयी- आडवाणी समेत संघियों ने उन्मादी भीड़ पर ठीकरा फोड़ दिया और ख़ुद दुःख व्यक्त करने लगे।

संघियों में नैतिकता का नामोनिशाँ भी नहीं होता। लिहाज़ा, इस पर चर्चा बेमानी है। संघ हमेशा मुखौटों में जीता है। इसके नेता संवाद नहीं करते, बल्कि प्रवचन देते हैं। प्रधानमंत्री भी सिर्फ़ भाषण देते हैं, किसी सवाल का जबाब देना उनके आत्म-सम्मान के ख़िलाफ़ है। संघियों की पुख़्ता मान्यता है कि समाज पर बुद्धिजीवियों का कोई असर नहीं होता। समाज, उनके पीछे चलता है जो आम आदमी से ज़रा सा ऊपर होते हैं। यही आदमी संघ की असली ताकत है। ऐसे लोग घर-घर में हैं। वही संघियों के असली ‘ओपिनयन मेकर’ हैं। वर्ना, ज़रा सोचिए कि यदि तीन दिनों में मोहन भागवत ने जितनी बातें की हैं, यदि उसे नरेन्द्र मोदी और अमित शाह तथा सैकड़ों छुटभैय्ये नेता सही मान लेंगे तो क्या बीजेपी में लौट पाएगी?

भागवत को अच्छी तरह से पता है कि मोदी राज में अर्थव्यवस्था का कचूमर निकल चुका है। मोदी सरकार की हरेक महत्वपूर्ण नीति और योजना विफल साबित हुई है। जनता बेहद तकलीफ़ में है। राम राज्य के सारे भ्रम टूट चुके हैं। दलित और आदिवासी बीजेपी से बहुत दूर जा चुके हैं। मुसलमान तो हमेशा से ही संघियों से दूर रहे हैं। शहरी, शिक्षित, मध्य वर्ग पर बेरोज़गारी और महँगाई की ज़बरदस्त मार है। विपक्ष एकजुट हो रहा है। हिन्दुओं को अब विकास के झुनझुने की हक़ीक़त समझ में आ चुकी है। इसीलिए आख़िरी हथकंडे के रूप में संघ प्रमुख ये दिखाना चाहता है कि वो भविष्य के भारत की ख़ातिर ख़ुद को बदल चुका है। इसमें लेस-मात्र भी सच्चाई नहीं है।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह वरिष्ठ पत्रकार

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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हिंदी ब्लॉग्स को हर महीने 3 करोड़ पेज व्यू : मॉमस्प्रेसो

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नई दिल्ली, 14 सितम्बर | भारत के महिलाओं के लिए सबसे बड़े यूजर-जनरेटेड कंटेंट प्लेटफार्म मॉमस्प्रेसो ने हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर अपने 6,500 से ज्यादा ब्लॉगर्स के डेटा का विश्लेषण कर नई रिपोर्ट प्रस्तुत की है। विश्लेषण कहता है कि हिन्दी ब्लॉग्स ने हर महीने 3 करोड़ से ज्यादा पेज व्यू हासिल की है। इसमें से 95 प्रतिशत की खपत पाठकों ने मोबाइल पर की है।

प्लेटफार्म ने बताया कि हिंदी पेज व्यू अंग्रेजी से ज्यादा हो गए हैं और इस समय कुल पेज व्यू का 50 प्रतिशत हो गया है।

मॉमस्प्रेसो की ओर से जारी बयान में कहा गया कि प्लेटफार्म पर हिंदी में लेखन की सूची मुख्य रूप से उन शहरों की माताओं ने तैयार की है, जिनकी तुलनात्मक रूप से भागीदारी कम रही है। इनमें पटना, आगरा, लखनऊ, शिमला, भुवनेश्वर और इंदौर शामिल है। 75 प्रतिशत हिन्दी ब्लॉग्स को मॉमस्प्रेसो मोबाइल ऐप के जरिये लिखा गया है, जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। 60 प्रतिशत ब्लॉगर्स अभी भी ब्लॉग लिखने के लिए डेस्कटॉप उपयोग करते हैं। मोबाइल ऐप पर बने हिन्दी ब्लॉग्स में से 93 प्रतिशत एंड्रायड फोन पर बने हैं। प्लेटफार्म पर इस समय 1,595 हिन्दी ब्लॉगर्स हैं, जिन्होंने अब तक 14,746 ब्लॉग्स बनाए हैं। हर महीने करीब 1,800 ब्लॉग्स जोड़े जा रहे हैं।

मॉमस्प्रेसो ने बताया कि हिन्दी की अधिकतम रीडरशिप लखनऊ, जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़, आगरा और पटना से है। यह भी बताया गया कि 95 प्रतिशत यूजर्स ने लेखन का इस्तेमाल मोबाइल पर किया। जिस कंटेंट ने अधिकतम रीडरशिप (65 प्रतिशत) हासिल की, वह ‘मां की जिंदगी’ या ‘मॉम्स लाइफ’ सेक्शन था। रिलेशनशिप्स से लेकर पैरेंटिंग और सामाजिक उत्तरदायित्व तक का लेखन इस पर उपलब्ध है। अन्य लोकप्रिय सेक्शन में प्रेग्नेंसी, बेबी, हेल्थ और रैसिपी भी शामिल हैं।

हिंदी पोस्ट्स को अंग्रेजी की तुलना में 4.2 गुना ज्यादा एंगेजमेंट मिला। इसमें लाइक्स, शेयर और कमेंट्स शामिल हैं। हिन्दी में हाइपर एंगेजमेंट की एक बड़ी वजह हिन्दी कंटेंट की क्वालिटी है। पहली बार महिलाओं को कई मुद्दों पर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए सुरक्षित स्थान मिला है। कई महिलाएं जो लैंगिंक भेदभाव, सामाजिक मुद्दों और अन्य वजहों से खुलकर बोल नहीं पाती थी, वह भी इस पर अपने आपको अभिव्यक्त कर रही है।

मॉमस्प्रेसो के सह-संस्थापक और सीईओ विशाल गुप्ता ने कहा, “हमारा विजन यह है कि अगले तीन वर्षो में हमारे प्लेटफॉर्म पर सभी माताओं में से 70 फीसदी को लेकर आना है और क्षेत्रीय भाषा लेखन इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण है। हमें गर्व है कि मॉमस्प्रेसो एक ऐसा मंच प्रदान कर रहा है जहां भारत भर की माताएं बिना डर के अपने विचार व्यक्त कर रही हैं। इन विषयों पर बहस और चर्चाओं को प्रोत्साहित करती हैं। पिछले 12 महीनों में हमारे ट्रैफिक चार गुना बढ़ा है और हिंदी की भूमिका इस विकास में महत्वपूर्ण रही है। इस समय हमारे पास चार अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में लेखन है और वर्ष के अंत से पहले हमारी योजना 3 और जोड़ने की है।

हिंदी भाषा लेखन का उपयोग करने वाले ब्रांड्स की संख्या 2017 के 6 फीसदी से बढ़कर 2018 में 27 फीसदी हो गई है। इसमें पैम्पर्स, डेटॉल, बेबी डव, नेस्ले, जॉनसन एंड जॉन्सन, एचपी, ट्रॉपिकाना एसेंशियल्स और क्वैकर जैसे ब्रांड शामिल हैं।

–आईएएनएस

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