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ओपिनियन

झूठ और अर्धसत्य की बदौलत मोदी ने चुनाव तो जीता लेकिन दिल नहीं!

गुजरात मॉडल का हर वक़्त बख़ान करने वाले नरेन्द्र मोदी को गुजरात में प्रचार के लिए इतना अधिक वक़्त लगाना पड़ा, मानो वो देश के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री हों। इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार के दौरान तो प्रधानमंत्री अपने ‘विकास के गुजरात मॉडल’ की बातें करने से भी कतराते रहे।

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बीजेपी ने गुजरात ज़रूर जीता है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अच्छी तरह जानते है कि अपने गृहराज्य में उन्हें हार मिली है। चुनाव के नतीज़े साफ़ बता रहे हैं कि जनता ने नोटबन्दी को कैसे ख़ारिज़ किया है और कैसे जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बनाकर लागू किया गया। संख्या बल भले ही मोदी के साथ हो, लेकिन जिस पद पर वो आसीन हैं, उसकी गरिमा निश्चित रूप से गिरी है। वो ख़ुद भी आज बहुत कमतर हो चुके हैं।

काँग्रेस के लिहाज़ से सबसे महत्वपूर्ण ये है कि वो न सिर्फ़ बीजेपी की संख्या को दहाई तक ही सीमित रखने में सफल हुई, बल्कि जिस तरह से बीजेपी के व्यक्तिगत हमलों का सामना करके राहुल गाँधी उभरे हैं, उसने ये साबित कर दिया है कि उनमें देश की सबसे पुरानी पार्टी का नेतृत्व करने की क्षमता मौजूद है। राहुल गाँधी ने साबित किया है कि धर्मनिरपेक्षता, समाज के सभी तबकों का सम्मान, वैचारिक मतभेद रखने वालों का भी आदर और ध्येय में ईमानदारी के बग़ैर भारत को महान नहीं बनाया जा सकता। गुजरात ने प्रधानमंत्री को ये भी बता दिया है कि ‘काँग्रेस मुक्त भारत’ की हवा का रुख़ अब क्या है!

गुजरात चुनाव में सारी तिकड़में लगायी गयीं। पाकिस्तान, झूठ, अफ़वाह, मनगढ़न्त दावे और वादे, राजनीतिक विरोधियों का चरित्र-हनन जैसे हरेक हथकंडों को अपनाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के उस सर्वोच्च पद की गरिमा को भी तार-तार कर दिया, जिस पर वो आसीन हैं। मोदी और उनकी पार्टी की जीत वैसी ही है, जैसे मुक्केबाज़ी के खेल में प्वाइंट्स के आधार पर विजेता घोषित किया जाता है। गुजरात ने बहुत क़रीब से देखा है कि ख़ुद को ‘विकास-पुरुष’ बताने वालों ने कैसे बीजेपी के साम्प्रदायिक एजेंडा को हवा दी। इसीलिए, बीजेपी और प्रधानमंत्री दोनों की प्रतिष्ठा को भारी चोट पहुँचाने में काँग्रेस सफल रही।

हिमाचल प्रदेश ने दशकों से चली आ रही अपनी परम्परा के मुताबिक, सरकार को बदलने का फ़ैसला किया। लेकिन वहाँ भी जीत के बावजूद बीजेपी को इस तथ्य पर गहराई से विचार करना चाहिए कि क्या वजह रही है कि उसके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष, दोनों को ही चुनाव में मुँह की खानी पड़ी।

वापस गुजरात का रुख़ करें तो साफ़ दिखता है कि सत्ता की ख़ातिर बीजेपी कुछ भी कर सकती है। इस तथ्य की क्या व्याख्या हो सकती है कि गुजरात मॉडल का हर वक़्त बख़ान करने वाले नरेन्द्र मोदी को गुजरात में प्रचार के लिए इतना अधिक वक़्त लगाना पड़ा, मानो वो देश के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री हों। इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार के दौरान तो प्रधानमंत्री अपने ‘विकास के गुजरात मॉडल’ की बातें करने से भी कतराते रहे। क्योंकि उन्हें मालूम है कि मौजूदा दौर में टीवी चैनलों से भी ज़्यादा तेज़ी से ख़बरें फैलती हैं, जिससे ये पता चलते देर नहीं लगेगी कि अन्य राज्यों के मुक़ाबले शिक्षा, स्वास्थ्य, आदिवासी कल्याण और ग़रीबी के मोर्चों पर गुजरात कहाँ खड़ा है? सच्चाई तो ये है कि ‘विकास के मोदी मॉडल’ में प्रधानमंत्री के चहेते पूँजीपति दोस्तों को जहाँ एक ओर खुलकर रेवड़ियाँ बाँटी गयी हैं, वहीं दूसरी ओर अमीर और ग़रीब के बीच की खाई बहुत बढ़ गयी है। 1994 में देश के 20 बड़े राज्यों में मौजूद ग़रीबी के लिहाज़ से जहाँ गुजरात का स्थान सातवाँ था, वो 2011 में नीचे गिरकर दसवें स्थान पर जा पहुँचा। इसीलिए आदिवासी और अन्य पिछड़े समुदायों की दशा आज भी दयनीय बनी हुई है और उन्हें दो वक़्त की रोटी के लिए भारी जद्दोज़हद करनी पड़ती है। नर्मदा बाँध की ऊँचाई बढ़ने के बावजूद गुजरात के बड़े हिस्से में किसान सिंचाई के पानी के लिए तरस रहे हैं। इसी तरह, राज्य के बड़े हिस्से को आज भी पर्याप्त बिजली नहीं मिल रही है। इसीलिए ये आश्चर्यजनक नहीं है कि प्रधानमंत्री और बीजेपी को अपने ‘विकास’ के दावों को ताक़ पर रखना पड़ा और पाकिस्तान का दामन थामना पड़ा। लेकिन चुनाव के नतीज़ों ने बता दिया कि क्या झूठ है और क्या अर्धसत्य!

‘मियाँ मुशर्रफ़’ का राग फिर आलापा गया। प्रधानमंत्री ने राम जन्मभूमि से जुड़े मुक़दमें में एक वकील के रूप में रही मेरी भूमिका पर सवाल उठाये। सुप्रीम कोर्ट में 5 दिसम्बर को इसकी सुनवाई हुई थी। कोर्ट में कही गयी मेरी बातों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया गया और उसे काँग्रेस के नज़रिये की तरह पेश किया गया। इससे ऐसा लगा कि चुनाव में किसानों की आत्महत्या, ग़रीबी का स्तर, सामाजिक स्तर में गिरावट, नोटबन्दी का दुष्प्रभाव, नादान तरीक़े से लागू किया गया जीएसटी, असंगठित क्षेत्र की तबाही, सूरत की कपड़ा मिलों से कामग़ार की छँटनी और लाखों अन्य लोगों की रोज़ी-रोटी के छिन जाने, जैसे मुद्दों की कोई अहमियत ही नहीं है।

प्रधानमंत्री ने एक बार भी नोटबन्दी और जीएसटी के दोषपूर्ण क्रियान्वयन के लिए न तो माफ़ी माँगी और न ही अफ़सोस जताया। लेकिन एक काँग्रेसी के घर पर आयोजित हुए रात्रिभोज में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद कसूरी की मौजूदगी को देश के ख़िलाफ़ साज़िश बनाकर पेश किया गया। ख़ुद प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रद्रोही हरक़त बताया। जबकि उनकी सारी बातें मनगढ़न्त थीं। इसीलिए मतदाताओं ने उनकी तिकड़म को भाँप लिया। उन्हें मालूम है कि किसी पाकिस्तानी मेहमान के साथ डिनर करना राष्ट्रविरोधी नहीं हो सकता। हालाँकि, बीजेपी की अपनी परिभाषा के मुताबिक़, शपथ-ग्रहण समारोह में नवाज़ शरीफ़ का स्वागत करना और उन्हें अचानक जन्मदिन की बधाई देने के लिए लाहौर जा पहुँचना तो निश्चित रूप से राष्ट्रविरोधी होना चाहिए।

गुजरात चुनाव ने एक अन्य संवैधानिक संस्था, चुनाव आयोग की गरिमा को भी काफ़ी नीचे पहुँचा दिया। चुनाव कार्यक्रम के ऐलान में इसलिए देरी की गयी, ताकि प्रधानमंत्री ऐन चुनाव के वक़्त पैकेज़ों की घोषणा कर सके। इसी तरह, चुनाव प्रचार थमने के बाद राहुल गाँधी के टीवी इन्टरव्यू पर तो नोटिस जारी हुए, जबकि प्रधानमंत्री ने वोट डालने के बाद जिस नाजायज़ तरीके से अपना रोड-शो किया, ऐन मतदान वाले दिन जिस तरह से सी-प्लेन की यात्रा की गयी, उससे साफ़ है कि चुनाव आयोग पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करता रहा। इसीलिए यदि चुनाव आयोग का ही आचरण पक्षपातपूर्ण रहेगा तो निश्चित रूप से लोकतंत्र ख़तरे में है। मीडिया और ख़ासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया की ओर से भी तमाम सवालों पर सफ़ाई आना बाक़ी है।

प्रधानमंत्री और बीजेपी को ये समझना पड़ेगा कि अंकों के हिसाब से तो उन्होंने चुनाव जीत लिया लेकिन दिलों को वो नहीं जीत पाये। दिलों को जीतने के लिए समाज के हरेक तबक़े की ख़ुशहाली और विकास ज़रूरी है। यदि प्रधानमंत्री ने अपनी कार्यशैली बदलकर उन लोगों का दिल जीतने की कोशिश नहीं की जिन्होंने उन्होंने सत्ता दी है तो ये जीत बेमानी है। 2019 में, यही उन्हें हराएगा।

(साभार: डीएनए। लेखक, काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

ओपिनियन

प्रणब का मिशन नागपुर लोकतंत्र के लिए कितना सही?

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

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Pranab Mukherjee

नागपुर से प्रणब की जो तस्वीरें देखने को मिलीं, उसे एक कांग्रेस नेता के शब्दों में हजम करना मुश्किल था। जो शख्स धर्मनिरपेक्षता के रंग में रंगे रहे, जिदंगी के कई साल कांग्रेस पार्टी को दिए और फिर संविधान कायम रखने की जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रपति बने, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) जैसे संगठन के प्रमुख के साथ मंच साझा कर रहे थे और उनकी आवभगत का आनंद ले रहे थे। यह उन्हें उन मूल्यों व आदर्शो का समर्थन करता दिखाता है, जिनके विरोध में वे हमेशा खड़े रहे और संघर्ष करते रहे।

मुखर्जी के पहली बार हिंदूवादी संगठन के मुख्यालय में जाने के विवाद पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वैचारिक सलाहकार ने मध्यम स्तर के एक कांग्रेस नेता से पूछा, “आप उस सरकार का हिस्सा थे, जिसने 1975 में और फिर 1992 में आरएसएस को प्रतिबंधित किया। क्या आपको नहीं लगता कि आपको हमें बताना चाहिए कि उस समय आरएसएस में क्या बुराई थी, जो अब उसका गुण बन गया है?”

प्रणब की बेटी शर्मिष्ठा सहित कांग्रेस पार्टी के कई नेताओं ने ऐसे संगठन से मिले निमंत्रण को स्वीकार करने पर सवाल उठाए, जो वामपंथी-उदारवादी- धर्मनिरपेक्षता की स्थापना को नापसंद करता आया है। न सिर्फ समर्पित, बल्कि चिंतित नागरिक भी भी देश में नफरत और पूर्वाग्रह वाले माहौल में अपनी व्यथा जाहिर कर रहे हैं और अल्पसंख्यकों पर सुनियोजित हमले और सामाजकि रूप से सताए दलितों व पिछड़ों के दमन के लिए आरएसएस और उससे संबद्ध संघ परिवार के संगठनों की विचारधारा को दोषी ठहराते रहे हैं।

कई लोगों ने आवाज उठाई है कि यदि इस तरह से नफरत का जहर फैलाने दिया जाता रहा, तो यह भारत के उस बहुपक्षीय, बहुसंख्यक और बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचना व तानेबाने को खत्म कर सकता है, जो देश को इतना अनोखा व अद्वितीय बनाता है।

कथित रूप से हिंदू राष्ट्रवादी समूहों से संबद्ध कमसिन लड़कियों के खिलाफ क्रूर हिंसा के बाद अप्रैल में देशभर में चलाए गए ‘हैशटैगनॉटइन माइनेम’ विरोध अभियान के दौरान ऐसे संदेश छाए रहे कि “आज हम घृणा की राजनीति का सामना कर रहे हैं जो हमारे देश के बड़े हिस्सों में फैल गया है .. मुसलमान अगले दौर के हमलों के डर के साये में रहते हैं, यहां तक कि संविधान में दलितों और आदिवासियों को जो अधिकार मिले हैं, उस पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।”

83 वर्षीय मुखर्जी ने बढ़ते ध्रुवीकरण के इस माहौल में पुराने कैबिनेट और पार्टी के कुछ सहयोगियों की अपील को अनदेखा कर दिया। राष्ट्रीय स्तर पर टेलीविजन पर सीधे प्रसारित भाषण में मुखर्जी ने कहा “भारत की आत्मा बहुलवाद और सहिष्णुता में बसती है” और “धर्मनिरपेक्षता व समावेश हमारे लिए विश्वास का विषय है।”

उन्होंने उस आरएसएस रैंक और फाइल की याद दिलाई, जिन्होंने हिंदू सर्वोच्चवादी विचारधारा का प्रचार किया और जिसके संस्थापक ने मुसलमानों और ईसाइयों को ‘आक्रमणकारी’ माना। यह (विभिन्न धर्म) वह चीज है जिससे “हमारी संस्कृति, विश्वास और भाषा की बहुतायत भारत को विशेष बनाती है” और “धर्मशास्त्र, धर्म, क्षेत्र, घृणा और असहिष्णुता के सिद्धांत व पहचान के आधार पर हमारे राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का कोई प्रयास हमारी राष्ट्रीय पहचान को धूमिल करने का ही काम करेगा।”

अपने अब तक के राजनीतिक करियर में मुखर्जी जिन मान्यताओं और मूल्यों पर कायम रहने के लिए जाने जाते रहे, क्या उन्हें ताक पर रखकर उनका नागपुर जाने का फैसला गलत था?

उनकी सोच की एक झलक उनके भाषण में दिखाई पड़ती है, जिसमें उन्होंने इस बात पर दुख जाहिर किया कि ‘क्रोध की अभिव्यक्ति’ राष्ट्रीय संरचना को पूरी तरह से नष्ट कर रही है। उन्होंने कहा, “बातचीत न केवल प्रतिस्पर्धी हितों को संतुलित करने के लिए, बल्कि उन्हें सुलझाने के लिए भी जरूरी है .. सिर्फ संवाद के माध्यम से हम बिना हमारे राजनीति के भीतर अस्वास्थ्यकर संघर्ष के जटिल समस्याओं को हल करने की समझ विकसित कर सकते हैं।

संवाद और समायोजन लोकतांत्रिक कार्यकलापों के आधारशिला हैं और उनकी अनुपस्थिति अक्सर लोकतंत्र की मौत की घंटी बजती है।

अपनी किताब ‘हाउ डेमोक्रेसीज डाई’ में हार्वर्ड के प्रोफेसरों स्टीवन लेविट्स्की और डेनियल जिबलाट ने आज अमेरिकी लोकतंत्र में मौजूद ‘चरम कट्टरपंथी विभाजन’ के बारे में बात की है जो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में सामाजिक धारणाओं व मान्यताओं के टूटने को दर्शाता है, यह न सिर्फ डेमोक्रेट और रिपब्लिकन नेताओं के बीच बढ़ते नीतिगत मतभेद में नजर आ रहा है, बल्कि नस्ली और धार्मिक मतभेदों का भी बढ़ना नजर आ रहा है और लोकतंत्र की सुरक्षा रेलिंग को भी नुकसान पहुंच रहा है।

भारत आज भी दोराहे पर खड़ा है, जो शायद 71 साल के इतिहास में अभूतपूर्व है। जैसे ही कोई राष्ट्रीय प्रवचन दिनभर में चर्चा का विषय बन जाता है, सोशल मीडिया पर अक्सर दो चरम विभाजनकारी और नफरत फैलाने वाली विचारधाराओं के बीच ठन जाती है। इससे लोकतंत्र के हिमायती आम नागरिकों, खासकर युवा, जो परिवर्तन और प्रगति के लिए उत्सुक हैं, उन्हें निराशा हाथ लगती है।

देश में हाल के चुनावों में बुरी स्थिति देखने को मिली है। न सिर्फ शपथ ग्रहण करने वाले राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के बीच, बल्कि विचारधाराओं के बीच भी विरोध देखने को मिला है जो मूल रूप से उनके राष्ट्रीय दृष्टिकोण में भी एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत है।

और शायद यही कारण है कि मुखर्जी ने महसूस किया कि उन्हें राष्ट्रीय भाषण में विचारों में गहराती खाई को पाटने के लिए आगे आना होगा और संवाद के लिए आग्रह करना होगा।

द इकोनॉमिस्ट ने अपने हालिया स्तंभों में से एक में प्यू ग्लोबल सर्वेक्षण का जिक्र करते हुए कहा, “यह शायद अप्रियकर हो सकता है, भारत की राजनीतिक व्यवस्था को शायद बड़ी उपलब्धियों के साथ श्रेय दिया जा सके।” सर्वेक्षण में पाया गया कि किसी अन्य लोकतांत्रिक देशों के नागरिकों के मुकाबले भारतीय लोग लोकतंत्र को लेकर कम उत्साहित हैं और मजबूत नेता चाहने या सैन्य शासन की ओर ज्यादा आकर्षित हैं।

लोकतंत्र ने एक विशाल और लगभग असंभव रूप से विविधता वाले देश को एकजुट रखने में मदद की है। इसने सेना को सत्ता से बाहर रखा है और इसने नागरिक स्वतंत्रता को बरकरार रखा है। भारत अपनी लचीली व्यवस्था के कारण ही कई पड़ोसियों के लिए ईष्र्या का विषय बना हुआ है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

मप्र : विधानसभा चुनाव में निर्णायक होंगे फर्जी मतदाता

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Fake Voter ID

भोपाल, 4 जून | मध्य प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसे लेकर कांग्रेस ने चुनाव आयोग के यहां शिकायत दर्ज कराई है। कांग्रेस ने 60 लाख फर्जी मतदाता होने का दावा किया है।

फर्जी मतदाताओं का सबसे पहला और बड़ा खुलासा तो इसी साल के फरवरी माह में शिवपुरी के कोलारस और अशोकनगर के मुंगावली में हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान हुआ था। आगामी चुनाव में राजनीतिक दल और उनके कार्यकर्ता सजग व सर्तक रहे तो चुनाव के नतीजों में बड़े बदलाव की संभावना को नकारा नहीं जा सकता है।

पिछले माह की नौ मई को आईएएनएस ने सिर्फ शिवपुरी जिले में 60 हजार फर्जी मतदाताओं का खुलासा किया था। इनमें से 21,000 मतदाता ऐसे थे, जिनकी वषरें पहले मौत हो चुकी थी।

इस सूची में 28,067 मतदाता ऐसे हैं, जो दूसरी जगह चले गए, फिर भी सूची में उनके नाम हैं। जिले में अपने स्थान पर अनुपस्थित पाए गए मतदाताओं की संख्या 5,633, और एक से ज्यादा स्थानों पर 5,031 मतदाताओं के नाम पाए गए थे।

गौरतलब है कि फरवरी माह में कोलारस विधानसभा उपचुनाव के दौरान भी यह बात सामने आई थी कि 5,537 मृत मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में मौजूद थे। शिकायत के बाद शिवपुरी के तत्कालीन जिलाधिकारी तरुण राठी को इस मामले में चुनाव आयोग ने लापरवाही का दोषी पाया था।

आयोग ने जांच में पाया था कि जिलाधिकारी तरुण राठी ने सूची में गड़बड़ी पर सही मॉनिटरिंग नहीं की। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने मुख्य सचिव बसंत प्रताप सिंह को पत्र भी लिखा था। बाद में राठी का तबादला कर दिया गया।

ऐसे में सवाल उठा कि जब शिवपुरी जिले के पांच विधानसभा क्षेत्रों में 60,000 फर्जी मतदाता अर्थात औसतन एक विधानसभा में 12,000 फर्जी मतदाता हो सकते हैं, तो प्रदेश के 230 विधानसभा क्षेत्रों का क्या हाल होगा। इसी आधार पर कांग्रेस ने विधानसभा की 100 सीटों पर मतदाताओं की स्थिति का पता लगाया, जिसमें औसत तौर पर एक बात सामने आई कि राज्य में 6000,000 फर्जी मतदाता हैं। एक मतदाता की 10 से 20 मतदान केंद्रों की सूची में नाम और तस्वीरें हैं।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के अलावा अन्य नेताओं ने चुनाव आयोग को शिकायत की, जिस पर जांच भी शुरू हो गई है। आयोग ने एक जांच दल भोपाल भी भेजे हैं।

राज्य की मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी सलीना सिंह का कहना है, “जो हुआ है वह नहीं होना चाहिए। इसमें सुधार के लिए हमारी ओर से लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। जिला स्तर पर ऐसा सिस्टम बनाने की कोशिश हो रही है, जिसके जरिए एक ही तस्वीर कई स्थानों पर पाए जाने पर उन्हें हटाया जाए। हमारी सबसे मजबूत कड़ी ब्लॉक स्तर का अधिकारी होता है, वह अच्छा काम करेगा, कलेक्टर उस पर निगरानी अच्छे से रखेंगे तो तस्वीरों का दोहराव नहीं होगा।”

राज्य सरकार के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, “मतदाता सूची में गड़बड़ी है तो उसमें सुधार होना चाहिए, मगर एक सवाल यह भी उठता है कि मतदाता सूची ब्रेक कैसे हुई। ऐसा कौन सा सॉफ्टवेयर आ गया, यह भी जांच का विषय है। इतना तय है कि इससे सरकार या उससे जुड़े लोगों का कोई लेना-देना नहीं है।”

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता महेंद्र सिंह चौहान ने पिछले दिनों चुनाव आयोग से शिकायत की थी कि भोपाल जिले के नरेला विधानसभा क्षेत्र में कई मकान ऐसे हैं, जिनका आकार 1550 से 2000 वर्ग फुट है और वहां 100 से 150 तक मतदाता होना बताया गया है।

राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में फर्जी मतदाता का मसला काफी अहम रहने वाला है, क्योंकि 230 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 50 विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां जीत हार का अंतर अधिकतम 5,000 रहता है। इस स्थिति में अगर फर्जी मतदाताओं के नाम काट दिए गए और उनके स्थान पर कोई वोट नहीं डाल पाया तो नतीजे चुनावी तस्वीर बदलने वाले साबित हो सकते हैं।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

राहुल गांधी कर सकते हैं मप्र में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा : कमलनाथ

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kamal nath

नई दिल्ली, 7 मई | मध्यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष कमलनाथ का कहना कि पार्टी में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करने की परंपरा नहीं है। मगर, जरूरत पड़ी तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर सकते हैं।

कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ‘ठगी’ से नाराज हैं और कांग्रेस ने इस साल के आखिर में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए कमर कस ली है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “बेशक, समय कम है मगर मुझे पक्का विश्वास है कि मैं गांव स्तर पर पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने में सक्षम साबित होऊंगा। यह मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संगठन-शक्ति व पैसे की ताकत के साथ है।”

कांग्रेस के 71 वर्षीय वरिष्ठ नेता और छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव के मद्देनजर पार्टी की प्रदेश इकाई में बदलाव संबंधी फैसला बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वह अब बीती बातों पर नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि इस संबंध में फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को 26 अप्रैल को मध्यप्रदेश कांग्रेस की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है और पार्टी के सभी नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं।

कमलनाथ की बातों से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव में खुद उतरने को लेकर उन्होंने अपना विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा, “मैं 40 साल से चुनाव लड़ता आ रहा हूं। बतौर सांसद मेरा सेवाकाल सबसे लंबा रहा है।”

जब पूछा गया कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

मध्यप्रदेश में कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं किए जाने और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त कर संतुलन कायम किए जाने के संबंध में पूछे गए सवालों पर कमलनाथ ने कहा, “मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां कोई एक शख्स चुनाव नहीं जीत सकता। आपको कई चेहरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी ने ऐसा फैसला लिया है।”

जब पूछा गया कि क्या वह चाहेंगे कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करे तो उन्होंने कहा कि हर राज्य के लिए अगल रणनीति होती है।

कमलनाथ ने कहा, “कभी-कभी यह जरूरी होता है, जबकि कभी इसकी जरूरत नहीं होती। क्या भाजपा ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था? क्या उन्होंने उत्तराखंड में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया? उनका कभी कोई मुख्यमंत्री उम्मीदवार (चुनाव से पूर्व) नहीं था। इसलिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

कमलनाथ ने इससे पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पार्टी को हर राज्य में बताना चाहिए कि वहां उसका नेता कौन है। इसका जिक्र करने पर उन्होंने कहा, “अगर जरूरत महसूस होगी तो कांग्रेस अध्यक्ष किसी के नाम की घोषणा करेंगे।”

कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के तौर पर उनकी प्राथमिकता पार्टी को गांव स्तर पर मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “चुनाव बहुत मायने में स्थानीय बन गया है और हमें यह समझना होगा।”

कांग्रेस को मध्यप्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। कमलनाथ का आरोप है कि भाजपा पूर्व में किए अपने वादों को पूरा करने में विफल रही है।

पार्टी के प्रदेश प्रमुख के तौर पर अपनी नियुक्ति के संबंध मे कमलनाथ ने कहा, “मेरे सभी से अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए मेरे लिए पार्टी में एकता लाना कोई चुनौती नहीं है। मैं भाग्यशाली हूं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टी में पहले से ही एकता है।” उन्होंने पार्टी में सिंधिया के साथ किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया।

कमलनाथ ने कहा कि उनका मुकाबला अभी वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज से है।

–आईएएनएस

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