Connect with us
congress-workers-gujarat congress-workers-gujarat

ओपिनियन

झूठ और अर्धसत्य की बदौलत मोदी ने चुनाव तो जीता लेकिन दिल नहीं!

गुजरात मॉडल का हर वक़्त बख़ान करने वाले नरेन्द्र मोदी को गुजरात में प्रचार के लिए इतना अधिक वक़्त लगाना पड़ा, मानो वो देश के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री हों। इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार के दौरान तो प्रधानमंत्री अपने ‘विकास के गुजरात मॉडल’ की बातें करने से भी कतराते रहे।

Published

on

बीजेपी ने गुजरात ज़रूर जीता है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अच्छी तरह जानते है कि अपने गृहराज्य में उन्हें हार मिली है। चुनाव के नतीज़े साफ़ बता रहे हैं कि जनता ने नोटबन्दी को कैसे ख़ारिज़ किया है और कैसे जीएसटी को गब्बर सिंह टैक्स बनाकर लागू किया गया। संख्या बल भले ही मोदी के साथ हो, लेकिन जिस पद पर वो आसीन हैं, उसकी गरिमा निश्चित रूप से गिरी है। वो ख़ुद भी आज बहुत कमतर हो चुके हैं।

काँग्रेस के लिहाज़ से सबसे महत्वपूर्ण ये है कि वो न सिर्फ़ बीजेपी की संख्या को दहाई तक ही सीमित रखने में सफल हुई, बल्कि जिस तरह से बीजेपी के व्यक्तिगत हमलों का सामना करके राहुल गाँधी उभरे हैं, उसने ये साबित कर दिया है कि उनमें देश की सबसे पुरानी पार्टी का नेतृत्व करने की क्षमता मौजूद है। राहुल गाँधी ने साबित किया है कि धर्मनिरपेक्षता, समाज के सभी तबकों का सम्मान, वैचारिक मतभेद रखने वालों का भी आदर और ध्येय में ईमानदारी के बग़ैर भारत को महान नहीं बनाया जा सकता। गुजरात ने प्रधानमंत्री को ये भी बता दिया है कि ‘काँग्रेस मुक्त भारत’ की हवा का रुख़ अब क्या है!

गुजरात चुनाव में सारी तिकड़में लगायी गयीं। पाकिस्तान, झूठ, अफ़वाह, मनगढ़न्त दावे और वादे, राजनीतिक विरोधियों का चरित्र-हनन जैसे हरेक हथकंडों को अपनाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के उस सर्वोच्च पद की गरिमा को भी तार-तार कर दिया, जिस पर वो आसीन हैं। मोदी और उनकी पार्टी की जीत वैसी ही है, जैसे मुक्केबाज़ी के खेल में प्वाइंट्स के आधार पर विजेता घोषित किया जाता है। गुजरात ने बहुत क़रीब से देखा है कि ख़ुद को ‘विकास-पुरुष’ बताने वालों ने कैसे बीजेपी के साम्प्रदायिक एजेंडा को हवा दी। इसीलिए, बीजेपी और प्रधानमंत्री दोनों की प्रतिष्ठा को भारी चोट पहुँचाने में काँग्रेस सफल रही।

हिमाचल प्रदेश ने दशकों से चली आ रही अपनी परम्परा के मुताबिक, सरकार को बदलने का फ़ैसला किया। लेकिन वहाँ भी जीत के बावजूद बीजेपी को इस तथ्य पर गहराई से विचार करना चाहिए कि क्या वजह रही है कि उसके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष, दोनों को ही चुनाव में मुँह की खानी पड़ी।

वापस गुजरात का रुख़ करें तो साफ़ दिखता है कि सत्ता की ख़ातिर बीजेपी कुछ भी कर सकती है। इस तथ्य की क्या व्याख्या हो सकती है कि गुजरात मॉडल का हर वक़्त बख़ान करने वाले नरेन्द्र मोदी को गुजरात में प्रचार के लिए इतना अधिक वक़्त लगाना पड़ा, मानो वो देश के प्रधानमंत्री नहीं बल्कि राज्य के मुख्यमंत्री हों। इतना ही नहीं, चुनाव प्रचार के दौरान तो प्रधानमंत्री अपने ‘विकास के गुजरात मॉडल’ की बातें करने से भी कतराते रहे। क्योंकि उन्हें मालूम है कि मौजूदा दौर में टीवी चैनलों से भी ज़्यादा तेज़ी से ख़बरें फैलती हैं, जिससे ये पता चलते देर नहीं लगेगी कि अन्य राज्यों के मुक़ाबले शिक्षा, स्वास्थ्य, आदिवासी कल्याण और ग़रीबी के मोर्चों पर गुजरात कहाँ खड़ा है? सच्चाई तो ये है कि ‘विकास के मोदी मॉडल’ में प्रधानमंत्री के चहेते पूँजीपति दोस्तों को जहाँ एक ओर खुलकर रेवड़ियाँ बाँटी गयी हैं, वहीं दूसरी ओर अमीर और ग़रीब के बीच की खाई बहुत बढ़ गयी है। 1994 में देश के 20 बड़े राज्यों में मौजूद ग़रीबी के लिहाज़ से जहाँ गुजरात का स्थान सातवाँ था, वो 2011 में नीचे गिरकर दसवें स्थान पर जा पहुँचा। इसीलिए आदिवासी और अन्य पिछड़े समुदायों की दशा आज भी दयनीय बनी हुई है और उन्हें दो वक़्त की रोटी के लिए भारी जद्दोज़हद करनी पड़ती है। नर्मदा बाँध की ऊँचाई बढ़ने के बावजूद गुजरात के बड़े हिस्से में किसान सिंचाई के पानी के लिए तरस रहे हैं। इसी तरह, राज्य के बड़े हिस्से को आज भी पर्याप्त बिजली नहीं मिल रही है। इसीलिए ये आश्चर्यजनक नहीं है कि प्रधानमंत्री और बीजेपी को अपने ‘विकास’ के दावों को ताक़ पर रखना पड़ा और पाकिस्तान का दामन थामना पड़ा। लेकिन चुनाव के नतीज़ों ने बता दिया कि क्या झूठ है और क्या अर्धसत्य!

‘मियाँ मुशर्रफ़’ का राग फिर आलापा गया। प्रधानमंत्री ने राम जन्मभूमि से जुड़े मुक़दमें में एक वकील के रूप में रही मेरी भूमिका पर सवाल उठाये। सुप्रीम कोर्ट में 5 दिसम्बर को इसकी सुनवाई हुई थी। कोर्ट में कही गयी मेरी बातों को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया गया और उसे काँग्रेस के नज़रिये की तरह पेश किया गया। इससे ऐसा लगा कि चुनाव में किसानों की आत्महत्या, ग़रीबी का स्तर, सामाजिक स्तर में गिरावट, नोटबन्दी का दुष्प्रभाव, नादान तरीक़े से लागू किया गया जीएसटी, असंगठित क्षेत्र की तबाही, सूरत की कपड़ा मिलों से कामग़ार की छँटनी और लाखों अन्य लोगों की रोज़ी-रोटी के छिन जाने, जैसे मुद्दों की कोई अहमियत ही नहीं है।

प्रधानमंत्री ने एक बार भी नोटबन्दी और जीएसटी के दोषपूर्ण क्रियान्वयन के लिए न तो माफ़ी माँगी और न ही अफ़सोस जताया। लेकिन एक काँग्रेसी के घर पर आयोजित हुए रात्रिभोज में पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री ख़ुर्शीद महमूद कसूरी की मौजूदगी को देश के ख़िलाफ़ साज़िश बनाकर पेश किया गया। ख़ुद प्रधानमंत्री ने इसे राष्ट्रद्रोही हरक़त बताया। जबकि उनकी सारी बातें मनगढ़न्त थीं। इसीलिए मतदाताओं ने उनकी तिकड़म को भाँप लिया। उन्हें मालूम है कि किसी पाकिस्तानी मेहमान के साथ डिनर करना राष्ट्रविरोधी नहीं हो सकता। हालाँकि, बीजेपी की अपनी परिभाषा के मुताबिक़, शपथ-ग्रहण समारोह में नवाज़ शरीफ़ का स्वागत करना और उन्हें अचानक जन्मदिन की बधाई देने के लिए लाहौर जा पहुँचना तो निश्चित रूप से राष्ट्रविरोधी होना चाहिए।

गुजरात चुनाव ने एक अन्य संवैधानिक संस्था, चुनाव आयोग की गरिमा को भी काफ़ी नीचे पहुँचा दिया। चुनाव कार्यक्रम के ऐलान में इसलिए देरी की गयी, ताकि प्रधानमंत्री ऐन चुनाव के वक़्त पैकेज़ों की घोषणा कर सके। इसी तरह, चुनाव प्रचार थमने के बाद राहुल गाँधी के टीवी इन्टरव्यू पर तो नोटिस जारी हुए, जबकि प्रधानमंत्री ने वोट डालने के बाद जिस नाजायज़ तरीके से अपना रोड-शो किया, ऐन मतदान वाले दिन जिस तरह से सी-प्लेन की यात्रा की गयी, उससे साफ़ है कि चुनाव आयोग पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करता रहा। इसीलिए यदि चुनाव आयोग का ही आचरण पक्षपातपूर्ण रहेगा तो निश्चित रूप से लोकतंत्र ख़तरे में है। मीडिया और ख़ासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया की ओर से भी तमाम सवालों पर सफ़ाई आना बाक़ी है।

प्रधानमंत्री और बीजेपी को ये समझना पड़ेगा कि अंकों के हिसाब से तो उन्होंने चुनाव जीत लिया लेकिन दिलों को वो नहीं जीत पाये। दिलों को जीतने के लिए समाज के हरेक तबक़े की ख़ुशहाली और विकास ज़रूरी है। यदि प्रधानमंत्री ने अपनी कार्यशैली बदलकर उन लोगों का दिल जीतने की कोशिश नहीं की जिन्होंने उन्होंने सत्ता दी है तो ये जीत बेमानी है। 2019 में, यही उन्हें हराएगा।

(साभार: डीएनए। लेखक, काँग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

ओपिनियन

मोदी विरोधी चेहरा के रूप में उभरीं ‘दीदी’

देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।

Published

on

mamata-modi

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्हें उनके समर्थक ‘दीदी’ कहते हैं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विरोधी अपनी लय को बरकरार रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साल भर हमलावर रहीं। उन्होंने अपने भाषणों व सोशल मीडिया पर लेखों व व्यंग्य के जरिए मोदी सरकार पर कड़े हमले किए और उनकी सरकार का केंद्र से कई मुद्दों पर संघर्ष जारी रहा।

पौराणिक कथाओं से लेकर प्राचीन भारतीय इतिहास तक तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी मोदी पर सभी तरह के हमलावर रहीं, जबकि पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट शेयर विभिन्न उपचुनावों व स्थानीय निकाय के चुनावों में बढ़ना जारी रहा।

भाजपा ने जिस तरह से तृणमूल के विकल्प के तौर पर उभरने का प्रयास किया, ममता ने इसके उलट राष्ट्रीय तौर पर खुद को हिंदुत्व समूह के प्रमुख विरोधी के तौर पर पेश किया।

ममता ने क्षेत्रीय नेताओं के साथ मिलकर संघ परिवार का विरोध किया और अपने फैसलों व कार्रवाई से केंद्र के कामकाज पर दबाव बनाया व अपना हित साधा।

उन्होंने मोदी की प्रमुख नीतियों जैसे नोटबंदी व वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर उन पर निशाना साधा, जबकि आर्थिक वृद्धि में गिरावट, अहिष्णुता, गोमांस प्रतिबंध व गोरक्षकों जैसे ज्वलंत मुद्दों से फायदा उठाने की कोशिश की।

हालांकि, वह मोदी पर जोरदार हमलों की वजह से सुर्खियों में रहीं।

ममता ने एक मौके पर मोदी की तुलना संस्कृत के महान कवि व नाटककार कालिदास से की थी। हालांकि उन्होंने तुलना उस कालिदास से की थी, जिसे कभी महान मूर्ख समझा जाता था। कहानी का संदर्भ यह था कि राजकुमारी विद्योत्तमा के लिए जब महामूर्ख की तलाश की जा रही थी तो देखा गया कि एक युवक बुद्धिमत्ता की कमी की वजह से जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। वह युवक कालिदास था, जो विद्योत्तमा के साथ विवाह के बाद बुद्धिमान बना।

ममता बनर्जी ने अपनी टिप्पणी में कहा, “देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।”

ममता ने अपने एक अन्य आक्रामक भाषण में मोदी व रामायण महाकाव्य के दैत्य राजा रावण की तुलना की।

मोदी के 56 इंच के सीने की टिप्पणी का जिक्र करते हुए ममता ने कहा, “वह दावा करते हैं कि उनका सीना व कंधा चौड़ा है। रावण के कंधे भी चौड़े थे और उसके दस सिर थे।”

बंकुरा जिले में एक सार्वजनिक सभा में ममता बनर्जी ने मोदी पर फिर से हमला किया और मोदी सरकार को ‘गूंगा व बहरा’ बताया।

उन्होंने कहा, “वह पहले खुद को चायवाला कहते थे। अब वह करोड़पति पेटीएम वाला बन चुके हैं।”

ममता बनर्जी ने नोटबंदी को ‘शर्मनाक’ बताया और ट्विटर पर मोदी के इस फैसले को ‘एक तानाशाह की दृष्टिहीन, उद्देश्यहीन व दिशाहीन फैसला’ बताकर खारिज किया था।

ममता बनर्जी ने लोकतांत्रिक प्रदर्शन के हर तरीके को अपनाया। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का दरवाजा भी खटखटाया था और उनसे देश की अव्यवस्था को बचाने का आग्रह किया था।

ममता ने मोदी से इतर भाजपा के दूसरे नेताओं- लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह व अरुण जेटली के नेतृत्व को स्वीकार करने की बात कही।

जीएसटी को समर्थन देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि मोदी सरकार ने इस नई प्रणाली को ‘विनाशकारी रूप से जल्दबाजी’ में एक जुलाई से लागू कर दिया। उन्होंने केंद्र के इस कदम को ‘एक अन्य बड़ी भूल’ बताया।

हालांकि, ममता बनर्जी ने ‘संयुक्त नेतृत्व’ के जरिए मोदी को चुनौती देने पर जोर दिया। लेकिन एक मीडिया कॉन्क्लेव में बीते महीने उन्होंने संकेत दिया कि वह 2019 में सभी विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ एक मंच पर लाने में कोई भूमिका निभाने नहीं जा रही हैं, कोई ऐसा साझा मंच बनेगा तो उसका समर्थन जरूर करेंगी।

By : शीर्षेदु पंत

–आईएएनएस

Continue Reading

ओपिनियन

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’

Published

on

ananth-kumar-hegde

ये किसी से छिपा नहीं है कि संघियों को और ख़ासकर मोदी सरकार तथा बीजेपी के नेताओं को ‘बदज़ुबानी’ का कितना प्रचंड संक्रमण है! 2014 के बाद से तो इस भगवा संक्रमण ने दमघोटू महामारी का रूप ले लिया! इससे भी ज़्यादा ताज़्ज़ुब की बात तो ये रहा कि शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ख़ुद इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी के सबसे गम्भीर मरीज़ हैं। इसीलिए मोदी की ज़ुबान आये दिन लपलपाती रहती है। उनके रोग का लक्षण चुनाव सभाओं में इतना उग्र रूप धारण कर लेता है कि उन्हें पहचानना तक मुश्किल हो जाता है। लेकिन अक्सर चुनाव के बाद मोदी की ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी का ज्वार कुछ अरसे के लिए शान्त भी पड़ने लगता है।

मोदी की एक और विशेषता है! उन्हें विरोधियों के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अपने सहयोगियों के नितान्त मूर्खतापूर्ण बयान की अनदेखी करने में भी महारथ हासिल है। वैसे भी गिरगिट की तरह रंग बदलने में नेताओं की पूरी कूँ पूरी बिरादरी का ही कोई जबाब नहीं होता, लेकिन प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ नरेन्द्र मोदी में जैसा गिरगिटिया कौशल है, वैसे बीते 70 सालों में पहले कभी किसी और प्रधानमंत्री में नहीं नज़र आया। मोदी की ये ऐसी अद्भुत पहचान है। इसका ज़िक्र उस दौर में भी होता रहेगा, जब मोदी कहीं के नहीं होंगे! दरअसल, इतिहास ने हमेशा प्रमुख हस्तियों को उनके ऐसे कामों के लिए याद रखा है, जिसने जनमानस पर अच्छी या ख़राब, लेकिन गहरी छाप छोड़ी हो। इस लिहाज़ से मोदी काल को इतिहास, ‘बदज़ुबानी युग’ के रूप में ही याद रखेगा, क्योंकि नीयतख़ोर नेताओं को ये संसार उनके कुकर्मों के लिए ही याद रखता है।

गुजरात के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने मनमोहन सिंह और अन्य काँग्रेसियों को पाकिस्तान परस्त राष्ट्रद्रोही या देश का दुःखचिन्तक करार दिया। मोदी ने यहाँ तक कहा कि काँग्रेस, गुजरात को जीतने के लिए और अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सीमापार पाकिस्तान के साथ मिलकर साज़िश कर रही है।

इससे पहले मोदी ने मणिशंकर अय्यर के बयान को बड़ी चतुराई से तोड़-मरोड़कर पेश किया। ‘नीच’ आचरण, ‘नीच’ सोच, ‘नीच’ विचार, ‘नीच’ नज़रिया जैसी बातों को मोदी ने ‘नीच’ जाति में बदल दिया। इसीलिए जब मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी जैसे शीर्ष संवैधानिक पदों पर रहे नेताओं के लिए अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर नरेन्द्र मोदी ने माफ़ी नहीं माँगी तो संसद के मौजूदा सत्र का पहिया जाम होने लगा।

संसद में अपनी छीछालेदर करवाने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर शर्मिन्दगी नहीं ज़ाहिर की, बल्कि अपनी पार्टी की ओर से सिर्फ़ ये बयान दिलाना मुनासिब समझा कि बीजेपी, मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी के संसदीय योगदान का आदर करती है। हालाँकि, ये कहना अनावश्यक है कि मनमोहन सिंह के लिए ‘देहाती औरत’, ‘रेनकोट पहनकर नहाने वाला’, ‘मौन-मोहन’ वग़ैरह कैसी-कैसी बातें कह चुके नरेन्द्र मोदी के ज़ुबान की लपलपाहट यहीं ख़त्म नहीं होने वाली! इसीलिए मनमोहन सिंह को पाकिस्तान परस्त बताने के बाद तो काँग्रेस ने मोदी को ललकार दिया कि वो राष्ट्रविरोधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करके ख़ुद राष्ट्रविरोधी आचरण कर रही है। उधर, मोदी का भी कहना रहा है कि काँग्रेसियों ने उन्हें ख़ून का सौदागर, चायवाला, ‘नीच’ वगैरह क्या-क्या नहीं कहा!

कह तो मोदी भी सही रहे हैं। भारतीय राजनीति ने तमाम स्तरहीन बयान देखे हैं, कोई भी पार्टी इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी से अछूती नहीं है। लेकिन अनाप-शनाप बोलने वालों की जितनी तादाद बीजेपी में है और वो जितनी ज़हरीली बातें करते हैं, उसे देश की कोई भी अन्य पार्टी टक्कर नहीं दे सकती! लेकिन ‘मैं अच्छा और तुम ख़राब’ करते-करते अब तो मोदी सरकार के मंत्रियों ने उस संविधान की ही धज़्ज़ियाँ उड़ाना शुरू कर दिया, जिसकी शपथ लेकर वो मंत्री बने हैं। केन्द्रीय कौशल विकास राज्‍यमंत्री अनन्त कुमार हेगड़े ने तो यहाँ तक कह दिया कि बीजेपी संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को ही उखाड़ फेंकेगी।

दरअसल, अगला चुनाव कर्नाटक विधानसभा का है। हेगड़े, कर्नाटक से ही आते हैं। वहाँ बीजेपी को हिन्दुओं के उन्मादी ध्रुवीकरण से बहुत बड़ा आसरा है। इसीलिए हेगड़े ने उन लोगों के तन-बदन में आग लगाने की सोची, जो संघियों के हिन्दुत्व को हमेशा से सिरे से ख़ारिज़ करते रहे हैं। तभी तो हेगड़े ने कहा कि “अगर आप कहते हैं कि मैं एक मुस्लिम, ईसाई, लिंगायत, ब्राह्मण या हिन्दू हूँ तो ऐसे में हम अपने धर्म और जाति से जुड़े होने पर गर्व महसूस करते हैं। लेकिन ये सेक्युलर कौन लोग हैं? इनका कोई माई-बाप नहीं होता। जो लोग ख़ुद को सेक्युलर कहते हैं, वो नहीं जानते कि उनका ख़ून क्या है? हाँ, संविधान ये अधिकार देता है कि हम ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहें, लेकिन संविधान में कई बार संशोधन हो चुके हैं। हम भी उसमें संशोधन करेंगे। हम सत्ता में इसीलिए आये हैं।”

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’ वैसे तो संघियों का सेक्युलरों से बैर उतना ही पुराना है, जितना पुराना ख़ुद संघ है। लेकिन संविधान की शपथ लेकर मंत्री बनने वाले किसी भी धूर्त को संविधान का अनादर करके पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। ऐसे मंत्री को मूर्ख नहीं तो फिर और क्या कहेंगे जिसे इतना भी पता नहीं कि बीजेपी को चाहे जितना बड़ा बहुमत मिल जाए, वो तो क्या, कोई भी दूसरी पार्टी संविधान के मूल ढाँचे को चाहकर भी नहीं बदल सकती।

संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट कई बार स्थापित कर चुका है कि ‘धर्मनिरपेक्षता’, भारतीय संविधान की बुनियादी अवधारणा है और कोई भी संशोधन, संविधान की मूल भावना को नहीं बदल सकता। इसीलिए जब संसद में विपक्ष ने हेगड़े को अपने बयान के लिए माफ़ी माँगने या फिर उन्हें मंत्री पद से हटाने की माँग गरमायी तो ‘संविधान बदलने के लिए सत्ता में आयी बीजेपी’ का ख़म ठोंकने वाले अनन्त हेगड़े को थूककर चाटना पड़ा। उन्होंने कथित सफ़ाई भी दी कि “मैं सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ कि मोदी जी और हमारी सरकार देश के संविधान और बाबा साहेब के आदर्शों को लेकर प्रतिबद्ध है।”

हेगड़े के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर कोहराम मचना ही था। मचा भी। क्योंकि भारतवर्ष में आज भी बहुसंख्यक लोग सेक्युलर हैं। उन्हें सेक्युलर होने पर गर्व है। ये वो लोग नहीं हैं जो किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता हों। अब यदि मोदी सरकार का कोई मंत्री इन सेक्युलरों की वल्दियत पर सवाल उठाकर उन्हें हरामी बताना चाहेगा तो इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

वैसे नेताओं की ‘बदज़ुबानी’ भी एक क्रमागत प्रक्रिया से ही विकसित होती है। याद है ना कि केन्द्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ‘मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते तो उन्हें टिकट क्यों दें!’ लेकिन इससे एक क़दम आगे बढ़कर मध्य प्रदेश के सहकारिता राज्यमंत्री विश्वास सारंग ने बोल दिया कि ‘भाजपा को वोट न देने वाला पाकिस्तानी है!’ अब ज़रा सोचिए कि सार्वजनिक जीवन में क़मीनेपन की क्या सीमा होनी चाहिए? क्या 2014 में बीजेपी को वोट नहीं देने वाले 69 फ़ीसदी लोग पाकिस्तानी हैं? फिर राष्ट्रीयता का सर्टिफ़िकेट जारी करने का अधिकार आख़िरकार संघियों को मिल कहाँ से गया?

सबसे बड़ा और विचारनीय प्रश्न यही है। भारत को बचाना है तो ऐसी मानसिकता को उखाड़ फेंकना होगा, जिसमें सेक्युलर लोगों को हरामी और बीजेपी को वोट नहीं देने वालों को पाकिस्तानी कहने वालों की ज़ुबान बन्द की जा सके! वर्ना, ‘बदज़ुबानी’ का सिलसिला थमने वाला नहीं है और यही प्रवृत्ति हमें व्यापक हिंसा और अराजकता की ओर ढकेले बिना नहीं मानेगी!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनका निजी विचार है)

Continue Reading

ओपिनियन

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

साफ़ है कि 2012 में हमारे सुप्रीम कोर्ट पर भी वो आम धारणा हावी थी, जिसमें ये माना जाता है कि हमारे सारे के सारे नेता चोर हैं, सारी की सारी पार्टियाँ बेईमान हैं। जबकि हमारी नौकरशाही बड़ी ईमानदार और कर्तव्यपरायण है।

Published

on

Modi Manmohan Sonia
A file photo of Prime Minister Narendra Modi (centre) with his predecessor Manmohan Singh

2जी का फ़ैसला आने के बाद सोची-समझी साज़िश के तहत देश में ये दुष्प्रचार फ़ैलाया जा रहा है कि ‘घोटाला तो हुआ है, भले ही वो कोर्ट में साबित नहीं हो सका!’ इसके पीछे ये दलील भी दी जा रही है कि ‘यदि घोटाला नहीं हुआ होता तो 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने सारे 2जी लाइसेंसों को क्यों रद्द किया होता!’ ये दलील भी उछाली जा रही है कि क्या ट्रायल कोर्ट का दर्जा सुप्रीम कोर्ट से बड़ा हो गया है? जब सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि आबंटन ग़लत हुआ तो फिर वो घोटाला नहीं और क्या था? मज़े की बात ये है कि इस दलील को हवा देने वाले पहले राजनीतिक शख़्स, देश के वित्तमंत्री और जाने-माने न्यायविद् अरूण जेटली हैं! जेटली के बयान से ही भगवा ट्रोल्स नये झूठ को फ़ैलाने का सिग्नल मिल गया। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि यदि तथ्यों और तर्कों के आईने में देखें तो ये समझना मुश्किल नहीं है कि जेटली का बयान ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे’ के सिवाय और कुछ नहीं था!

सबसे पहले ये जान लीजिए कि 2जी की जाँच जिस सीबीआई ने की, वो देश की सर्वोच्च, सबसे सुविधा सम्पन्न और सबसे क़ाबिल जाँच एजेंसी मानी जाती है। कोई उसे ‘पिंजड़े में बन्द तोता’ भले ही कहे, लेकिन इससे सीबीआई की हस्ती और हैसियत नहीं बदलती! सीबीआई में भी 2G मामले की जाँच को सबसे होशियार लोगों की टीम के हवाले किया गया था। भले ही ये होशियार अव्वल दर्जे के निक्कमे साबित हुए! इतना ही नहीं, सीबीआई जाँच की निगरानी भी ख़ुद वही सुप्रीम कोर्ट कर रहा था, जिसने 2जी लाइसेंसों को रद्द किया था। इसके अलावा, सीबीआई के वकील या सरकारी वकील यानी अभियोजक भी बेहद क़ाबिल और अनुभवी थे, कोई नौसिखिया या अनाड़ी नहीं! पिछले साढ़े तीन साल से ये सभी लोग उस मोदी सरकार के मातहत रहे हैं, जिसका दावा है कि वो आज़ाद भारत की सबसे ईमानदार और पारदर्शी सरकार है! लिहाज़ा, ये कैसे मान लिया जाए कि सारे श्रेष्ठ-संयोगों के बावजूद 2जी मामले की जाँच करने, सबूत जुटाने और आरोपियों को अदालत में दोषी साबित करने में ज़रा भी कोताही हुई होगी? साफ़ है कि तमाम श्रेष्ठ-संयोग भी यदि अदालत में घोटाले को घोटाला साबित नहीं कर सके तो सिर्फ़ इसलिए कि वो वास्तव में घोटाला था ही नहीं! घोटाला होता, तभी तो साबित होता! घोटाला होता, तो कौन माई का लाल उसे साबित होने से रोक लेता! अरे, 1.76 लाख करोड़ रुपये की तो छोड़िए, यदि कुछेक लाख रुपये का भी घोटाला हुआ होता तो जज ओ पी सैनी ने उसके लिए ज़िम्मेदारी अपराधी को सज़ा क्यों नहीं दी होती!

अगली बात कि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2012 में क्यों सारे 2जी लाइसेंसों को रद्द कर दिया था? तो इसके बारे में जस्टिस जी एस सिंघवी ने अख़बार इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि “उनकी बेंच के फ़ैसले को पूरा पढ़ा जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले का ये अर्थ नहीं है कि कोई मामला ही नहीं बनता था, बल्कि उसका कहना है कि अभियोजन आरोपों को साबित नहीं कर सका।” जस्टिस सिंघवी आगे कहते हैं कि “फौज़दारी क़ानून में दो पहलू होते हैं। पहला, कोई मामला नहीं बनता और दूसरा, कोई सबूत नहीं है। इस मामले में प्रेस रिपोर्ट्स के मुताबिक़, कोई सबूत नहीं था। यदि किसी ने कोई अपराध किया है, लेकिन अदालत में उसे साबित करने के लिए सबूत नहीं पेश किये जा सके, तो उसे सज़ा नहीं दी जा सकती।” यानी, जस्टिस सिंघवी को अब भी ये लगता है कि घोटाला तो था, भले सीबीआई, सीएजी और मोदी सरकार उसे अदालत में साबित नहीं कर पायी! ये तर्क कम और ज़िद ज़्यादा है!

फरवरी 2012 में अपने फ़ैसले में जस्टिस सिंघवी और जस्टिस ए के गाँगुली की खंडपीठ ने लिखा था, “सितम्बर 2007 और मार्च 2008 के दौरान संचार मंत्री की अगुवाई में उनके मातहत अफ़सरों ने जो फ़ैसले लिये वो पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध थे।” जस्टिस सिंघवी ने आगे कहा कि “सुप्रीम कोर्ट के सामने मुद्दा बिल्कुल अलग था। सुप्रीम कोर्ट को स्पेक्ट्रम आबंटन प्रक्रिया की क़ानून वैधता का परीक्षण करना था, जबकि ट्रायल कोर्ट को उसमें निहित अपराध का परीक्षण करना था।” जस्टिस सिंघवी ने ‘ज़ीरो-लॉस थ्योरी’ पर टिप्पणी करने से परहेज़ किया, लेकिन इतना ज़रूर कहा कि “उस वक़्त सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि स्पेक्ट्रम की नीलामी से 60 हज़ार करोड़ रुपये मिले हैं।”

आईए ज़रा अब ये भी समझते चलें कि 2012 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में जब ये कहा गया कि स्पेक्ट्रम आबंटन का काम ‘पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध’ था, तब इनमें से किसी भी बात का ‘अदालत में परीक्षण’ नहीं हुआ था। ‘अदालत में परीक्षण’ भी बाक़ायदा एक क़ानूनी प्रक्रिया है। किसी भी आरोप को सिर्फ़ ट्रायल कोर्ट में ही परखा जाता है, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नहीं। यही हमारे देश का विधान है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में तो सिर्फ़ ये परखा जाता है कि क्या ट्रायल कोर्ट और फिर हाईकोर्ट में क़ानून और उसकी प्रक्रिया का सही पालन हुआ है या नहीं। इसीलिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को अपीलीय अदालत कहा जाता है।

2जी मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले ने सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार की उन धारणाओं को भी ग़लत साबित कर दिया, जिसमें ये माना गया कि स्पेक्ट्रम आबंटन की नीति ग़लत थी। स्पेक्ट्रम जैसी किसी भी सीमित चीज़ के आबंटन का दो तरीक़ा हो सकता है। पहला, तय दाम पर बेचना-ख़रीदना और दूसरा, उसे नीलामी के ज़रिये बेचना। जब चीज़ सीमित होती है तो उसे ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति या नियम से भी जोड़ा जाता है। जैसे रेलवे, ट्रेन के टिकट को ‘पहले आओ पहले पाओ’ के नियम से ही बेचती है, नीलामी से नहीं। अब यदि सीएजी या सुप्रीम कोर्ट या विपक्ष ये कहने लगे कि ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति ग़लत है क्योंकि नीलामी से टिकट बेचने पर रेलवे को कहीं ज़्यादा आमदनी होगी, तो इससे तय दाम पर बेचने की नीति ग़लत साबित नहीं हो सकती!

ऐसे में क्या आपको ये नहीं लगेगा कि टिकट बेचने की नीति को तय करना रेलवे या सरकार का काम है! सीएजी या सुप्रीम कोर्ट इसमें दख़ल नहीं दे सकते। लेकिन यदि नौकरशाही ने ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति को लागू करने में घपला किया है तो मामला ज़रूर अदालत में जा सकता है। अदालत ये तय करेगी कि घपला हुआ भी है या नहीं, और यदि हुआ तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है तथा क़सूरवार की सज़ा क्या होनी चाहिए? यहाँ ग़ौर करने की बात ये भी है कि अदालत को सज़ा या अपना फ़ैसला सुनाते वक़्त उसके प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए।

ज़रा सोचिए कि रेलवे के टिकटों को बेचने में यदि कोई घपला हुआ है तो क्या सुप्रीम कोर्ट को ये फ़ैसला सुनाने का हक़ हो सकता कि ‘बिके हुए सारे टिकट रद्द किये जाते हैं, क्योंकि सीएजी को लगता है कि टिकटों की नीलामी होनी चाहिए। और, यहाँ तक कि जब से टिकटों की नीलामी शुरू हुई है, तब से रेलवे की आमदनी लाखों-करोड़ों गुना बढ़ गयी है!’ सुप्रीम कोर्ट को ये भी सोचना पड़ेगा कि क्या कुछ लोगों के क़सूर की सज़ा हरेक रेल यात्री को देना मुनासिब होगा? क्या ज़ुर्माना वग़ैरह लगाने का भी कोई और विकल्प सम्भव है? क्योंकि ज़ुर्माना भी तो अपने आप में एक सज़ा है। वैसे भी देश में क़सूर के अनुपात में ही सज़ा देने का विधान है। यहाँ चींटी या ख़रगोश या शेर को मारने के लिए तोप चलाने का रिवाज़ नहीं है। यहाँ बड़ी से बड़ी चोरी करने वाले को भी सज़ा-ए-मौत नहीं दी जाती!

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? उसने एक झटके में सारे लाइसेंस रद्द कर दिये। जिसने आम जनता को कॉल ड्रॉप और धीमी इंटरनेट स्पीड की ऐसी समस्या सौग़ात में दी, जिससे हमारा टेलीकॉम सेक्टर आज तक नहीं उबर पाया है। उल्टा आगा-पीछा सोचे बग़ैर सुनाये गये सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की वजह से लाइसेंस पाने वाली कम्पनियों की भारी-भरकम रक़म डूब गयी, जो उन्होंने से बैंकों से क़र्ज़ लेकर निवेश किया था। इससे जहाँ एक ओर सुरक्षित निवेश के लिहाज़ से दुनियाभर में भारत की साख़ गिरी, वहीं भारतीय बैंकों पर एनपीए (डूबा क़र्ज़) ऐसी गाज़ गिरी कि आज सिर्फ़ टेलीकॉम सेक्टर का एनपीए ही 5 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जा पहुँचा है। ये देश के कुल एनपीए के आधे से भी अधिक है! लाइसेंस रद्द होने के बाद नीलामी की जिन क़ीमतों पर टेलीकॉम कम्पनियों को स्पेक्ट्रम ख़रीदकर अपनी जान बचानी पड़ी वो देखते ही देखते बीमार बन गयीं। क्योंकि वो इतना नहीं कमा पा रही हैं कि बैंकों से लिये गये भारी क़र्ज़ की क़िस्ते भर सकें। टेलीकॉम सेक्टर का विस्तार रूक गया। 50 हज़ार से ज़्यादा लोगों की रोज़ी-रोटी जाती रही!

लगे हाथ ये कल्पना करके भी देखिए कि यदि विपक्ष इस बात पर हाय-तौबा करने लगे कि रेल के टिकटों को ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति के मुताबिक़ बेचकर सरकार घोटाला कर रही है, क्योंकि यदि इन्हें नीलामी से बेचा जाता तो रेलवे मालामाल हो जाती, तो क्या इससे नीलामी की नीति सही साबित हो सकती है! यहीं मज़े की बात ये भी रही कि विपक्ष के दुष्प्रचार की वजह से आम जनता ही नहीं, आला सरकारी संस्थाओं में बैठे लोग भी ये धारणा बना बैठे कि घोटाला तो हो ही रहा था! अलबत्ता, जाँच से घोटाला इसलिए साबित नहीं हुआ क्योंकि सबूत नहीं मिले! इसका मतलब तो हुआ कि यदि कल को बीजेपी ये कहने लगे कि आप हत्यारे हैं, बलात्कारी हैं, राष्ट्रद्रोही हैं, आतंकी हैं तो आपको ये सब मान लिया जाएगा! भले ही इसका कोई सबूत नहीं हो। इसे ही चरित्रहनन कहते हैं। लिहाज़ा, कल्पना कीजिए कि हमारे समाज और लोकतंत्र के लिए चरित्रहनन का ऐसा हठकंडा कितना विनाशकारी साबित हो सकता है!

इसी तरह, 2जी मामले में ट्रायल कोर्ट को यही तो तय करना था कि जिस सरकारी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट, सीएजी और बीजेपी ‘पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध’ बताती रही है, क्या वो वास्तव में ऐसी ही है भी या नहीं। किसी भी आरोप की सच्चाई को तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट में अभियोजन पक्ष को वो सारे सबूत रखने होते हैं, जिनसे आरोप साबित हों। इसीलिए यदि अदालत में आरोप साबित नहीं हुए तो ताल ठोंककर कहा जाएगा कि आरोप झूठे थे, मनगढ़न्त थे, राजनीतिक द्वेष और दुर्भावना से प्रेरित थे। ध्यान रहे कि आरोपियों को बेक़सूर पाने पर ही अदालतें उन्हें बाइज़्ज़त बरी करती हैं। वर्ना, यदि अदालत को लगता है कि आरोपों में आंशिक सच्चाई है तो भी आरोपी को अपराधी ही करार दिया जाता है। हालाँकि, उसकी सज़ा, उसके अपराधों के अनुपात में होती है। 2जी मामले में सारे के सारे आरोपी का बाइज़्ज़त बरी हो जाना, निश्चित रूप से ये साबित करता है कि 1.76 लाख करोड़ रुपये का कथित घोटाला महज़ एक बुलबुला था, जो अब फूट चुका है!

साफ़ है कि बीजेपी के दुष्प्रचार की वजह से 2012 में हमारे सुप्रीम कोर्ट पर भी ये आम धारणा हावी थी, जिसमें ये मान लिया गया है कि बीजेपी को छोड़कर सारी पार्टियाँ बेईमान हैं। बीजेपी के अलावा अन्य पार्टियों के सारे के सारे नेता चोर हैं, जबकि हमारी नौकरशाही बड़ी ईमानदार और कर्तव्यपरायण है। हालाँकि, ये सच भी किसी से छिपा नहीं है कि हमारे नेताओं से ज़्यादा भ्रष्ट और निक्कमी हमारी नौकरशाही है। नेताओं को तो जनता हर पाँच साल पर आज़माकर जनादेश देती है, लेकिन नौकरशाही तो बेताज बादशाह है। जनता इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। 2जी मामले में भी पूरी तरह से नकारा साबित हुए सीबीआई और सीएजी भी तो हमारी नौकरशाही का ही हिस्सा हैं। इनका बाल तक बाँका नहीं होगा!

Continue Reading
Advertisement
राष्ट्रीय5 mins ago

बाड़मेर पहुंचे PM, ऑयल रिफाइनरी का करेंगे शुभारंभ

loya
राष्ट्रीय9 mins ago

जस्टिस लोया केस: कोर्ट ने कहा- महाराष्ट्र सरकार याचिकाकर्ताओं को दें सभी दस्‍तावेज

Sidharth-Malhotra-wefornews
मनोरंजन15 mins ago

लड़कियों के मामले में बेहद शर्मीले हैं सिद्धार्थ मल्होत्रा

Emraan Hashmi
मनोरंजन20 mins ago

‘चीट इंडिया’ मेरे करियर का ऐतिहासिक किरदार होगा : इमरान हाशमी

PAK Bus
राष्ट्रीय22 mins ago

सीमा पर बढ़ते तनाव के बीच भारत-पाक के बीच चलने वाली बस सेवा रोकी गई

NetanyahuInIndia
राष्ट्रीय33 mins ago

इजरायली PM ने पत्नी संग किया ताज का दीदार

supreme-court
राष्ट्रीय35 mins ago

सुप्रीम कोर्ट ने मोदी सरकार को लगाई फटकार, कहा- प्रेम विवाह मामले में खाप पंचायतों के हस्तक्षेप पर लगाए रोक

virat kohli1
खेल41 mins ago

सेंचुरियन में सेंचुरी लगाकर कोहली ने किया कमाल, मैरिज रिंग को चूमकर अनुष्का को दिया गिफ्ट

मनोरंजन56 mins ago

पद्मावत के गाने पर बच्‍चे कर रहे थे डांस, करणी सेना ने स्कूल में की तोड़फोड़

Google Drive,-
टेक56 mins ago

अब गूगल ड्राइव में करें ट्रकॉलर कांटैक्स को बैकअप, रिस्टोर

narottam patel
राजनीति2 weeks ago

रूपाणी कैबिनेट में दरार के आसार! नितिन पटेल के समर्थन में उतरे बीजेपी नेता नरोत्‍तम पटेल

lalu yadav
राजनीति1 week ago

चारा घोटाला: लालू को साढ़े तीन साल की सजा

Vinod Rai CAG
ब्लॉग4 weeks ago

संघ के 92 साल के इतिहास में विनोद राय की टक्कर का फ़रेबी और कोई नहीं हुआ!

sports
खेल1 week ago

केपटाउन टेस्‍ट: गेंदबाजों की मेहनत पर बल्‍लेबाजों ने फेरा पानी, 72 रनों से हारी टीम इंडिया

Congress party
ब्लॉग3 weeks ago

काँग्रेसियों की अग्निपरीक्षा! इन्हें ही एक बार फिर देश को आज़ाद करवाना होगा

hardik-nitin
राजनीति2 weeks ago

नितिन पटेल की नाराजगी पर हार्दिक की चुटकी, कहा- ’10 एमएलए लेकर आओ, मनमाफिक पद पाओ’

atal bihari vajpai
ज़रा हटके3 weeks ago

आजीवन क्यों कुंवारे रह गए अटल बिहारी बाजपेयी?

ananth-kumar-hegde
ओपिनियन3 weeks ago

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

Modi Manmohan Sonia
ओपिनियन3 weeks ago

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

rape case
ओपिनियन4 weeks ago

2017 In Retrospect : दुष्कर्म के 5 चर्चित मामलों ने खोली महिला सुरक्षा की पोल

अंतरराष्ट्रीय2 days ago

PoK में पाक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे व्यापारी

Supreme Court Judges
राष्ट्रीय4 days ago

पहली बार SC के जज आए सामने, कहा- ‘हम नहीं बोले तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा’

gadkari
राजनीति5 days ago

नौसेना पर बरसे गडकरी, कहा- ‘दक्षिणी मुंबई में नहीं दूंगा एक इंच जमीन’

mumbai-
शहर5 days ago

मुंबई के हुक्काबार में जमकर तोड़फोड़

helicopter
शहर5 days ago

आर्मी-डे परेड की रिहर्सल के दौरान 3 जवान घायल…देखें वीडियो

Ashwini-Kumar-Chopra
राजनीति6 days ago

भाजपा सांसद का बयान- 2019 में जिताओगे तो 2014 के वादे पूरे करूंगा, देखिए वीडियो

iligaters
अन्य6 days ago

ठंड का कहर: मगरमच्छ बन गया बर्फ…देखें वीडियो

bjp mla
राजनीति1 week ago

बीजेपी विधायक ने खुद को बताया ‘महागुंडा’, देखें वीडियो…

Dinesh Sharma
राजनीति1 week ago

वोट मांगने गए बीजेपी प्रत्याशी को जनता ने पहनाई जूतों की माला

us
राष्ट्रीय1 week ago

जाधव मामले पर ‘चप्पल चोर पाकिस्तान’ टैग के साथ अमेरिका में प्रदर्शन

Most Popular