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इलाहाबाद ही क्यों, एक ही झटके में सारे शहरों के नाम बदलिए!

शहरों का नाम तो सिर्फ़ छलावा है! हिम्मत है तो शहरों की सूरत बदलकर दिखाओ!

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Allahabad Prayagraj

संघ-बीजेपी, योगी-मोदी और समूचे भगवा ख़ानदान की अब नयी फ़रमाइश है कि ‘इलाहाबाद’ का नाम बदल दिया जाना चाहिए। कोई इसे ‘प्रयाग’ बनाना चाहता है तो कोई ‘प्रयागराज’ और कोई ‘तीर्थराज प्रयाग’! वैसे भी 2014 के बाद देश का सूक्ति वाक्य तो ‘सत्यमेव जयते’ रहा नहीं! इसे बदला जा चुका है। अभी जो संघी सूक्ति वाक्य अस्तित्व में है, उसका जय-घोष है, ‘बहुत हुआ पुराना, अब नये की बारी है!’ हालाँकि, नया और प्रस्तावित नाम भी कितना पुराना है, ये शायद ही किसी संघी को पता हो!

मैं प्रगतिवादी हूँ। बदलाव का कट्टर पक्षधर होना मेरा स्वाभाविक गुण है। इसीलिए मैं ‘नाम बदलने’ का विरोधी कैसे हो सकता हूँ! मेरी तार्किकता, मुझे ‘बेहतरी के लिए होने वाले बदलाव का समर्थक’ बनाती है। मेरा ज़ोर महज ‘बदलाव’ पर नहीं, बल्कि ‘बेहतरी के लिए होने वाले बदलाव’ पर है! मैं नहीं मानता कि हर बदलाव सार्थक हो सकता है। मसलन, नोटबन्दी के बाद भारी संघर्ष से प्राप्त हुए नये और करारे नोट मुझे बहुत अच्छे लगे। लेकिन नये नोटों की वजह से नोटबन्दी को मैं उपयोगी नहीं मान सकता। मैं नहीं भूल सकता कि ‘नरेन्द्र मोदी की नोटबन्दी’ अपने हरेक घोषित उद्देश्य में पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है।

इसी तरह, मोदी राज में आये तक़रीबन सारे बदलाव मुझे निरर्थक या विध्वंसक लगते हैं। मोदी राज ने सिर्फ़ इतना साबित किया है कि नाम बदलने से हालात नहीं बदलते। हालात तो सिर्फ़ नीयत से ही बदल सकते हैं! वैसे, बदलाव का सबसे रोचक पहलू ये है कि ‘सिर्फ़ बदलाव ही स्थायी है!’ ‘Only Change is Constant’, बाकी हरेक चीज़ तत्कालिक या क्षणिक या परिवर्तनशील है! तमाम दार्शनिक और विद्वान भी अभी तक सिर्फ़ एक ही अमर-तत्व को ढूँढ़ पाये हैं, जिसे आत्मा (रूह या Soul) कहा गया और जिसे परमात्मा का अंश बताया गया। हालाँकि, वैज्ञानिकों को अभी तक अनन्त आकाशगंगा में भी कोई ऐसी चीज़ नहीं मिली जिसे वो आत्मा या परमात्मा की तरह अजर-अमर बता सकें!

संघियों को प्राचीन चीज़ें बहुत पसन्द हैं। वो बदलाव से कोई नयी चीज़ नहीं पाना चाहते। तरक्की के रास्ते पर नहीं बढ़ना चाहते बल्कि पुराने और लुप्तप्राय को ही बहाल करना चाहते हैं। संघियों को पोंगापन्थी और पुरातनपन्थी बने रहना ही पसन्द है। उन्हें लगता है कि सनातनियों के धार्मिक ग्रन्थों में लिखी तमाम पौराणिक कथाएँ सही हैं! तमाम चमत्कारिक बातें सच्ची ही हैं! फिर चाहे वो रावण का पुष्पक विमान हो या महाभारत का संजय (टीवी और इंटरनेट) या गणेश के सिर पर प्लास्टिक सर्ज़री से लगाया गया हाथी का सिर! हरेक बात आस्था से जुड़ी है। लिहाज़ा, उसे तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता।

झूठ, जुमला, अफ़वाह, नफ़रत और बदलाव – यही वो पंचतत्व है, जिससे संघियों की नश्वर काया का सृजन होता है! इसीलिए संघियों को ये पंचतत्व वैसे ही अति-प्रिय होते हैं, जैसे शिशु को माँ या चींटी को शक्कर या हाथी को गन्ना! लेकिन संघी-पंचतत्वों से निर्मित काया का जीवन-ध्येय सिर्फ़ सत्ता हथियाना है। संघियों के लिए सत्ता को पाने और सत्ता में बने रहने का सारा दारोमदार इन्हीं पंचतत्वों पर निर्भर है। इसीलिए उन्हें नाम बदलने में अलौकिक सुख और आनन्द की अनुभूति होती है। संघियों का यक़ीन है कि नाम बदलने से अतीत बदल जाएगा। उन्हें मुग़ालता है कि अतीत बदल गया तो इतिहास बदल जाएगा। इतिहास में दर्ज़ ख़ामियाँ और कमज़ोरियाँ ख़त्म हो जाएँगी। लेकिन काश! ऐसा हो पाता।

शहर का नाम बदल दो, सड़क का नाम बदल दो, अँग्रेज़ों और मुसलिम शासकों की विरासत को अपनी बताते रहो। झूठ फैलाओ कि उन विदेशियों ने भारत के गौरवशाली अतीत को मिटाया है। हम उसी अतीत को बहाल करना चाहते हैं। यही संघियों की ऐसी नीति है जिससे वो मन्द-बुद्धि हिन्दुओं को लुभाते हैं। हिन्दुओं में धारणा फैलाते हैं कि जो कुछ वो कहते हैं, वही हिन्दुत्व है और हिन्दुत्व के वो ही इकलौते रक्षक और संरक्षक हैं। जबकि तथ्य और तर्क संघियों की अवधारणाओं के सर्वथा ख़िलाफ़ होते हैं। लेकिन धर्म के नाम पर वो मन्द-बुद्धि हिन्दुओं के क़रीब पहुँचना संघियों के लिए आसान हो जाता है। फिर यही मन्द-बुद्धि हिन्दू, संघियों का वोट-बैंक बनकर, बीजेपी, वीएचपी, बजरंग दल जैसे संघ से जुड़े 135 संगठनों के माध्यम से भारतीय समाज का धार्मिक ध्रुवीकरण करते हैं। ताकि देश की सत्ता इनकी मुट्ठी में हो। बदकिस्मती से 2014 से संघियों का वो मंसूबा पूरा होने लगा जिसे तब तक भारतीय जनमानस ने या तो हाशिये पर रखा या विपक्ष में।

अब चूँकि संघियों की एक अहम नीति है शहरों और सड़कों का नाम बदलना, लिहाज़ा ये बहुत ज़रूरी है कि सारे बदलाव जल्द से जल्द हो जाने चाहिए। संघियों की नामकरण नीति के बारे में बीजेपी के चुनावी घोषणापत्र में कोई ज़िक्र नहीं क्यों नहीं होता? नामकरण के मोर्चे पर तो मोदी राज ने हिन्दुओं को बेहद निराश किया है! चार साल बर्बाद कर दिये! दो-चार नाम ही बदल सके! जबकि ज़रूरत ‘संघी नामकरण परियोजना’ की है। बात सिर्फ़ दो-चार नामों में बदलाव की नहीं है। देश के अधिकतर शहरों, बस्तियों और मोहल्लों के नाम को बदलना ज़रूरी है! लेकिन निक्कमी मोदी सरकार ने इसके लिए अभी तक न तो कोई मंत्रालय बनाया, ना आयोग, ना ही कोई संस्था या क़ानून! इससे मोदी सरकार की लापरवाही साफ़ दिखती है!

मोदी सरकार के पास समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोई नीति नहीं है। क्या आपने महसूस किया कि देश की न्यायिक व्यवस्था बदली है? क्या क़ानून-व्यवस्था में आया कोई सुधार आप तक पहुँचा है? क्या शिक्षा व्यवस्था में आपने कोई ऐसा बदलाव देखा है जिससे देश की युवा पीढ़ी को कोई फ़ायदा पहुँचा हो? क्या आपसे जुड़ा स्वास्थ्य तंत्र सुधरा है? क्या रोज़गार की दशाएँ बदली हैं? क्या किसानों के दिन फिरे हैं? ऐसे ही असंख्य सवाल आज भी देश को घेरे खड़े हैं। मोदी राज में इन्हें बदलने की परवाह कहीं नज़र नहीं आती। जो है वो सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी है। जुमलेबाज़ी है। सत्ता हथियाने की नौटंकी है। अरे संघियों, बदलना है तो इसे बदलकर दिखाओ!

शहरों का नाम तो सिर्फ़ छलावा है! हिम्मत है तो शहरों की सूरत बदलकर दिखाओ! रोज़-रोज़ की नौटंकी की कोई ज़रूरत नहीं है। एक साथ हज़ारों-लाखों नामों को बदल दो। अँग्रेज़ों और मुसलिम शासकों की सारी धरोहरों को एक-झटके में मिटा दो। यदि तुम्हारा मक़सद ऐसे ढोंगी बदलवों की बदौलत हिन्दुस्तान की विरासत को बदलने का है, तो वो मुराद भी पूरी कर लो। हालाँकि, इतिहास गवाह है कि नीयतख़ोरों की बदौलत कभी सार्थक बदलाव नहीं आता! इसीलिए, बनावटी को नहीं बल्कि असलियत को बदलने पर ध्यान दो। रूढ़ियाँ मिटाओ, कुरीतियाँ मिटाओ, विकृतियाँ मिटाओ। वर्ना, ये तीनों सबको मिटा देंगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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हिंदी ब्लॉग्स को हर महीने 3 करोड़ पेज व्यू : मॉमस्प्रेसो

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Hindi Blog

नई दिल्ली, 14 सितम्बर | भारत के महिलाओं के लिए सबसे बड़े यूजर-जनरेटेड कंटेंट प्लेटफार्म मॉमस्प्रेसो ने हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर अपने 6,500 से ज्यादा ब्लॉगर्स के डेटा का विश्लेषण कर नई रिपोर्ट प्रस्तुत की है। विश्लेषण कहता है कि हिन्दी ब्लॉग्स ने हर महीने 3 करोड़ से ज्यादा पेज व्यू हासिल की है। इसमें से 95 प्रतिशत की खपत पाठकों ने मोबाइल पर की है।

प्लेटफार्म ने बताया कि हिंदी पेज व्यू अंग्रेजी से ज्यादा हो गए हैं और इस समय कुल पेज व्यू का 50 प्रतिशत हो गया है।

मॉमस्प्रेसो की ओर से जारी बयान में कहा गया कि प्लेटफार्म पर हिंदी में लेखन की सूची मुख्य रूप से उन शहरों की माताओं ने तैयार की है, जिनकी तुलनात्मक रूप से भागीदारी कम रही है। इनमें पटना, आगरा, लखनऊ, शिमला, भुवनेश्वर और इंदौर शामिल है। 75 प्रतिशत हिन्दी ब्लॉग्स को मॉमस्प्रेसो मोबाइल ऐप के जरिये लिखा गया है, जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। 60 प्रतिशत ब्लॉगर्स अभी भी ब्लॉग लिखने के लिए डेस्कटॉप उपयोग करते हैं। मोबाइल ऐप पर बने हिन्दी ब्लॉग्स में से 93 प्रतिशत एंड्रायड फोन पर बने हैं। प्लेटफार्म पर इस समय 1,595 हिन्दी ब्लॉगर्स हैं, जिन्होंने अब तक 14,746 ब्लॉग्स बनाए हैं। हर महीने करीब 1,800 ब्लॉग्स जोड़े जा रहे हैं।

मॉमस्प्रेसो ने बताया कि हिन्दी की अधिकतम रीडरशिप लखनऊ, जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़, आगरा और पटना से है। यह भी बताया गया कि 95 प्रतिशत यूजर्स ने लेखन का इस्तेमाल मोबाइल पर किया। जिस कंटेंट ने अधिकतम रीडरशिप (65 प्रतिशत) हासिल की, वह ‘मां की जिंदगी’ या ‘मॉम्स लाइफ’ सेक्शन था। रिलेशनशिप्स से लेकर पैरेंटिंग और सामाजिक उत्तरदायित्व तक का लेखन इस पर उपलब्ध है। अन्य लोकप्रिय सेक्शन में प्रेग्नेंसी, बेबी, हेल्थ और रैसिपी भी शामिल हैं।

हिंदी पोस्ट्स को अंग्रेजी की तुलना में 4.2 गुना ज्यादा एंगेजमेंट मिला। इसमें लाइक्स, शेयर और कमेंट्स शामिल हैं। हिन्दी में हाइपर एंगेजमेंट की एक बड़ी वजह हिन्दी कंटेंट की क्वालिटी है। पहली बार महिलाओं को कई मुद्दों पर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए सुरक्षित स्थान मिला है। कई महिलाएं जो लैंगिंक भेदभाव, सामाजिक मुद्दों और अन्य वजहों से खुलकर बोल नहीं पाती थी, वह भी इस पर अपने आपको अभिव्यक्त कर रही है।

मॉमस्प्रेसो के सह-संस्थापक और सीईओ विशाल गुप्ता ने कहा, “हमारा विजन यह है कि अगले तीन वर्षो में हमारे प्लेटफॉर्म पर सभी माताओं में से 70 फीसदी को लेकर आना है और क्षेत्रीय भाषा लेखन इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण है। हमें गर्व है कि मॉमस्प्रेसो एक ऐसा मंच प्रदान कर रहा है जहां भारत भर की माताएं बिना डर के अपने विचार व्यक्त कर रही हैं। इन विषयों पर बहस और चर्चाओं को प्रोत्साहित करती हैं। पिछले 12 महीनों में हमारे ट्रैफिक चार गुना बढ़ा है और हिंदी की भूमिका इस विकास में महत्वपूर्ण रही है। इस समय हमारे पास चार अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में लेखन है और वर्ष के अंत से पहले हमारी योजना 3 और जोड़ने की है।

हिंदी भाषा लेखन का उपयोग करने वाले ब्रांड्स की संख्या 2017 के 6 फीसदी से बढ़कर 2018 में 27 फीसदी हो गई है। इसमें पैम्पर्स, डेटॉल, बेबी डव, नेस्ले, जॉनसन एंड जॉन्सन, एचपी, ट्रॉपिकाना एसेंशियल्स और क्वैकर जैसे ब्रांड शामिल हैं।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

जानिये क्यों गिर रहा है रुपया

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Rupee Fall

नई दिल्ली, 13 सितम्बर | केंद्र सरकार ने रुपये की गिरावट को थामने की हरसंभव कोशिश करने का भरोसा दिलाया है। इसका असर पिछले सत्र में तत्काल देखने को मिला कि डॉलर के मुकाबले रुपये में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। हालांकि रुपये में और रिकवरी की अभी दरकार है।

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर तक लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को 72.69 पर बंद हुआ था।

रुपये की गिरावट से अभिप्राय डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आना है। सरल भाषा में कहें तो इस साल जनवरी में जहां एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे वहां अब 72 रुपये देने होते हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।

शेष दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए प्राय: डॉलर की जरूरत होती है ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर देशी मुद्रा कमजोर होती है।

एंजेल ब्रोकिंग के करेंसी एनालिस्ट अनुज गुप्ता ने रुपये में आई हालिया गिरावट पर कहा, “भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। वहीं, विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश में कटौती करने से देश से डॉलर का आउट फ्लो यानी बहिगार्मी प्रवाह बढ़ गया है। इससे डॉलर की आपूर्ति घट गई है।”

उन्होंने बताया कि आयात ज्यादा होने और निर्यात कम होने से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है, जोकि रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खाते का घाटा तकरीबन 18 अरब डॉलर हो गया है। जुलाई में भारत का आयात बिल 43.79 अरब डॉलर और निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा।

वहीं, विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार घटता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह को 1.19 अरब डॉलर घटकर 400.10 अरब डॉलर रह गया।

गुप्ता बताते हैं, “राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से भी रुपये में कमजोरी आई है। आर्थिक विकास के आंकड़े कमजोर रहने की आशंकाओं का भी असर है कि देशी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है। जबकि विश्व व्यापार जंग के तनाव में दुनिया की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती के संकेत मिल रहे हैं जिससे डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती आने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल कर ले जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक हितों के टकराव के कारण अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुई व्यापारिक जंग से वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।

–आईएएनएस

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मोदी सरकार को बिना विचारे नयी नीतियाँ लागू करने की बीमारी है!

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kapil-sibal

काग़ज़ों पर कोई नीति भले ही शानदार लगे, लेकिन उसे सफलतापूर्वक लागू करना ही सबसे अहम है। युगान्कारकारी नीतियों का ऐलान करने से पहले ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लेना बेहद ज़रूरी है। एनडीए की विफलता की सबसे बड़ी वजह ही ये है कि वो नयी नीतियों को लागू करने से पहले उसके प्रभावों का आंकलन नहीं पाती है। नोटबन्दी, इसका सबसे जीता-जागता उदाहरण है। मोदी सरकार को इसका अन्दाज़ा ही नहीं था कि नोटबन्दी, देश के लिए विनाशकारी साबित होगा। इसी वजह से जीएसटी को घटिया ढंग से लागू किया गया और उससे भी फ़ायदे की जगह नुक़सान ही हाथ लगा।

दिवालिया और कंगाली क़ानून यानी इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी को मई 2016 में संसद ने पारित किया। मोदी सरकार ने इसे बहुत बड़े आर्थिक सुधार की तरह पेश किया और ख़ूब अपनी पीठ थपथपाई। इसका मक़सद बैंकों की बैलेंस शीट को साफ़-सुथरा करना, कॉरपोरेट को उनके पापों की सज़ा दिलाना, बैंकिंग प्रणाली में हेराफेरी करने वालों को दंडित करना और सबसे बढ़कर बैंकों के डूबे क़र्ज़ यानी एनपीए के लिए ज़िम्मेदार कम्पनियों पर कार्रवाई करना था।

12 फरवरी 2018 को रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ पुनर्निर्धारण यानी ‘लोन रिस्ट्रकचरिंग’ से जुड़ी आधा दर्जन योजनाओं को ख़त्म कर दिया। इसकी जगह नयी नीति सामने आयी जिसमें कॉरपोरेट्स को 180 दिनों के भीतर अपने बकाया क़र्ज़ों को चुकाने या फिर दिवालिया क़ानून यानी आईबीसी का सामना करने का बेहद सख़्त प्रावधान था। ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लिये गये बनी इस नीति का नतीज़ा ये निकला कि सुप्रीम कोर्ट ने रिज़र्व बैंक के 12 फरवरी वाले फ़रमान पर रोक लगा ही। लिहाज़ा, दिवालिया क़ानून को लागू करने की क़वायद बैंकों को रोक देनी पड़ी।

तब तक आईबीसी के मामलों के निपटारे के लिए दिवालियेपन से निपटने वाली तीन पेशेवर कम्पनियों के ज़रिये 1300 कर्मचारियों की भर्ती हो चुकी थी। नैशनल कम्पनी लॉ ट्राइबुनल (एनसीएलटी) की शाखाओं में कॉरपोरेट्स के ख़िलाफ़ 525 मामले भी दर्ज़ हो गये। 108 मामलों में कम्पनियाँ स्वेच्छा से दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए आगे आ गयीं। इनमें स्टील, निर्माण और खदान से जुड़ी ऐसी कम्पनियाँ हैं, जिन पर बैंकों के 1,28,810 करोड़ रुपये बकाया है। इतनी बड़ी तादाद के बावजूद, 2014 से अभी महज कुछ ही मामलों में आईबीसी के तहत कार्रवाई आगे बढ़ी।

आईबीसी के तहत अगस्त और दिसम्बर 2017 के दौरान जिन 10 शुरुआती मामलों का निपटारा हुआ उसमें भी बैंकों को उनके कुल बकाये का सिर्फ़ 33.53 फ़ीसदी रक़म ही मिल पायी। 13 जून 2017 को रिज़र्व बैंक ने 12 बड़े बकायेदारों की पहचान दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए की। एक साल बीतने के बावजूद, इन 12 कम्पनियों में से भूषण स्टील और इलेक्ट्रो स्टील के अलावा अन्य किसी का निपटारा नहीं हुआ।

12 बड़े क़र्ज़दारों का 3,12,947 करोड़ रुपये का दावा मंज़ूर हुआ था। लगता नहीं है कि आईबीसी की नीति के मुताबिक़, इतनी रक़म कभी वसूल हो पाएगी। ऐसे मामलों में 180 दिनों की निर्धारित अवधि के ख़त्म होने के बाद बाक़ी वक़्त मुक़दमेबाज़ी में खर्च हो रहा है। ऐसे मामलों से सिर्फ़ वकीलों और दिवालियापन की कार्रवाई से जुड़े पेशेवर लोगों को फ़ायदा हो रहा है।

बिजली क्षेत्र में 34 बीमार कम्पनियों पर 1.5 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। बैंकों की चिन्ता है कि दिवालियेपन की कार्रवाई के ख़त्म होते-होते इन कम्पनियों की सम्पत्ति का दाम और घट जाएगा। रिज़र्व बैंक ने बैंकों को सख़्त हिदायत दी है कि यदि उसके 12 फरवरी वाले फ़रमान को सख़्ती से लागू नहीं किया गया तो उन्हें गम्भीर नतीज़े भुगतने होंगे। यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को हिदायत दी है कि वो रिज़र्व बैंक से बात करके आईबीसी के प्रावधानों पर राहत देने का पता लगाये, वर्ना आशंका है कि दिवालियेपन की कार्रवाई में बैंकों का 85 फ़ीसदी बकाया डूब जाएगा।

आईबीसी से जुड़ी पूरी तस्वीर का स्याह पहलू ये है कि कॉरपोरेट सेक्टर में कुछ ही कम्पनियाँ ऐसी हैं जो दिवालियेपन की कार्रवाई के बाद ज़ब्त होने वाली कम्पनी को ख़रीदने के लिए उसकी क़ीमत के मुक़ाबले 15 से लेकर 35 फ़ीसदी रक़म ही जुटा सकती हैं। स्टील सेक्टर की दोनों बड़ी कम्पनियों की नीलामी के वक़्त सिर्फ़ दो घरेलू कम्पनियाँ ही बोली लगा पायी थीं। विदेशी कम्पनियों ने तो जैसी बोलियाँ लगायीं, उससे लगा कि वो बीमार कम्पनियों को कौड़ियों के मोल, बिल्कुल वैसे ही ख़रीदना चाहती हैं, जैसा वाजपेयी सरकार के ज़माने में विनिवेश के बहाने कुछ चहेती कम्पनियों को औने-पौने दाम में सरकारी कम्पनियों को बेचा गया था।

स्टील सेक्टर में बीमार कम्पनियों को ख़रीदने के लिए आगे आने वाली घरेलू कम्पनियों को तक़रीबन एकाधिकार नज़र आया है। बिजली क्षेत्र में भी दो मुख्य खिलाड़ी हैं। इसमें से एक को अयोग्य ठहराये जाने के बाद दूसरे के लिए कोई प्रतिस्पर्धी बचा ही नहीं। इस तरह से एक कॉरपोरेट को निहाल किया जा रहा है। स्टील और बिजली ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ बैंकों की भारी रक़म डूब रही है। आईबीसी की बदौलत स्टील सेक्टर में जहाँ 35 फ़ीसदी क़र्ज़ की वसूली हो पा रही है, वहीं बिजली क्षेत्र में तो ये कुल बकाया का महज 15 फ़ीसदी है। सारा माज़रा ही अपने आप में घोटाला है, क्योंकि बीमार कम्पनियों के ख़रीदार भी बैंकों से क़र्ज़ लेकर ही सम्पत्तियाँ ख़रीदेंगी!

आप चाहें तो सरकार की सूझबूझ पर तरस खा रहे हैं, क्योंकि शायद, उसने ऐसी परिस्थितियों का अन्दाज़ा ही नहीं लगाया हो। तभी तो एक ओर रिज़र्व बैंक का 12 फरवरी वाला सर्कुलर क़ायम रहता है और दूसरी ओर 19 जुलाई को बिजली मंत्रालय की ओर से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से कहा जाता है कि वो ‘समाधान’ योजना के तहत बीमार कम्पनियों के क़र्ज़ों का पुनर्निर्धारण कर दे। ये योजना ठंडे बस्ते में चली गयी। ऐसी ही एक अन्य योजना ग्रामीण विद्युतीकरण निगम पर बकाया 17,000 करोड़ रुपये के लिए भी प्रस्तावित हुई। लेकिन वो भी बेकार साबित हुई।

रिज़र्व बैंक भी समय-समय पर ऐसे दिशा-निर्देश जारी कर रहा है, जो बताते हैं कि नीतियों का ऐलान करते वक़्त उसके अंज़ाम के बारे में नहीं सोचा जाता। ऊर्जा से जुड़ी संसदीय समिति ने मार्च 2018 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “यदि रिज़र्व बैंक ज़मीनी सच्चाई को नज़रअन्दाज़ करके दिशानिर्देश जारी करता रहेगा तो इसका मतलब ये है कि बैंक, वित्तीय संस्थाएँ और अन्य निवेशकों की रक़म की वसूली की उम्मीद घटाई में पड़ जाएगी।” संसदीय समिति की ऐसी प्रतिक्रिया से साफ़ है कि सरकार की न सिर्फ़ नीतियाँ ग़लत हैं, बल्कि उन्हें लागू करने का सलीका भी सही नहीं है।

संसदीय समिति की ये भी राय है कि “180 दिनों की मियाद में लक्ष्य को हासिल करना तक़रीबन असम्भव है।” उसने सचेत किया कि जिस दिन एनपीए के जुड़े सारे मामले राष्ट्रीय कम्पनी लॉ ट्राइबुनल में पहुँच जाएँगे, उस दिन वहाँ जाम लग जाएगा। समिति ने आगे कहा कि बिजली क्षेत्र अभी बदलाव के दौर में है। ऐसे में यदि रिज़र्व बैंक सिर्फ़ वित्तीय नज़रिये से देखेगा तो कई अन्य चुनौतियाँ भी खड़ी होंगी, जो वित्तीय परिधि से बाहर होगी। इसीलिए ये समझना ज़रूरी है कि बिजली क्षेत्र की बीमार कम्पनियाँ “राष्ट्रीय सम्पत्ति” हैं और “आख़िरकार इन्हें बचाना बहुत ज़रूरी है।”

नीति में ही घोटाला है। दो या तीन कॉरपोरेट कम्पनियों के बीच में महँगी सम्पत्तियों की बन्दरबाँट, सरकार से जुड़े पूँजीपति दोस्तों को निहाल करने का तरीका है। नीतियों को समुचित समीक्षा के बग़ैर लागू कर देना, उस आरोप के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा घटिया है जिसमें निर्णय लेने की ढिलाई के बावजूद 2004 से 2014 के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर 8.2 फ़ीसदी दर्ज होती है।

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