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इलाहाबाद ही क्यों, एक ही झटके में सारे शहरों के नाम बदलिए!

शहरों का नाम तो सिर्फ़ छलावा है! हिम्मत है तो शहरों की सूरत बदलकर दिखाओ!

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Allahabad Prayagraj

संघ-बीजेपी, योगी-मोदी और समूचे भगवा ख़ानदान की अब नयी फ़रमाइश है कि ‘इलाहाबाद’ का नाम बदल दिया जाना चाहिए। कोई इसे ‘प्रयाग’ बनाना चाहता है तो कोई ‘प्रयागराज’ और कोई ‘तीर्थराज प्रयाग’! वैसे भी 2014 के बाद देश का सूक्ति वाक्य तो ‘सत्यमेव जयते’ रहा नहीं! इसे बदला जा चुका है। अभी जो संघी सूक्ति वाक्य अस्तित्व में है, उसका जय-घोष है, ‘बहुत हुआ पुराना, अब नये की बारी है!’ हालाँकि, नया और प्रस्तावित नाम भी कितना पुराना है, ये शायद ही किसी संघी को पता हो!

मैं प्रगतिवादी हूँ। बदलाव का कट्टर पक्षधर होना मेरा स्वाभाविक गुण है। इसीलिए मैं ‘नाम बदलने’ का विरोधी कैसे हो सकता हूँ! मेरी तार्किकता, मुझे ‘बेहतरी के लिए होने वाले बदलाव का समर्थक’ बनाती है। मेरा ज़ोर महज ‘बदलाव’ पर नहीं, बल्कि ‘बेहतरी के लिए होने वाले बदलाव’ पर है! मैं नहीं मानता कि हर बदलाव सार्थक हो सकता है। मसलन, नोटबन्दी के बाद भारी संघर्ष से प्राप्त हुए नये और करारे नोट मुझे बहुत अच्छे लगे। लेकिन नये नोटों की वजह से नोटबन्दी को मैं उपयोगी नहीं मान सकता। मैं नहीं भूल सकता कि ‘नरेन्द्र मोदी की नोटबन्दी’ अपने हरेक घोषित उद्देश्य में पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है।

इसी तरह, मोदी राज में आये तक़रीबन सारे बदलाव मुझे निरर्थक या विध्वंसक लगते हैं। मोदी राज ने सिर्फ़ इतना साबित किया है कि नाम बदलने से हालात नहीं बदलते। हालात तो सिर्फ़ नीयत से ही बदल सकते हैं! वैसे, बदलाव का सबसे रोचक पहलू ये है कि ‘सिर्फ़ बदलाव ही स्थायी है!’ ‘Only Change is Constant’, बाकी हरेक चीज़ तत्कालिक या क्षणिक या परिवर्तनशील है! तमाम दार्शनिक और विद्वान भी अभी तक सिर्फ़ एक ही अमर-तत्व को ढूँढ़ पाये हैं, जिसे आत्मा (रूह या Soul) कहा गया और जिसे परमात्मा का अंश बताया गया। हालाँकि, वैज्ञानिकों को अभी तक अनन्त आकाशगंगा में भी कोई ऐसी चीज़ नहीं मिली जिसे वो आत्मा या परमात्मा की तरह अजर-अमर बता सकें!

संघियों को प्राचीन चीज़ें बहुत पसन्द हैं। वो बदलाव से कोई नयी चीज़ नहीं पाना चाहते। तरक्की के रास्ते पर नहीं बढ़ना चाहते बल्कि पुराने और लुप्तप्राय को ही बहाल करना चाहते हैं। संघियों को पोंगापन्थी और पुरातनपन्थी बने रहना ही पसन्द है। उन्हें लगता है कि सनातनियों के धार्मिक ग्रन्थों में लिखी तमाम पौराणिक कथाएँ सही हैं! तमाम चमत्कारिक बातें सच्ची ही हैं! फिर चाहे वो रावण का पुष्पक विमान हो या महाभारत का संजय (टीवी और इंटरनेट) या गणेश के सिर पर प्लास्टिक सर्ज़री से लगाया गया हाथी का सिर! हरेक बात आस्था से जुड़ी है। लिहाज़ा, उसे तर्क की कसौटी पर नहीं कसा जा सकता।

झूठ, जुमला, अफ़वाह, नफ़रत और बदलाव – यही वो पंचतत्व है, जिससे संघियों की नश्वर काया का सृजन होता है! इसीलिए संघियों को ये पंचतत्व वैसे ही अति-प्रिय होते हैं, जैसे शिशु को माँ या चींटी को शक्कर या हाथी को गन्ना! लेकिन संघी-पंचतत्वों से निर्मित काया का जीवन-ध्येय सिर्फ़ सत्ता हथियाना है। संघियों के लिए सत्ता को पाने और सत्ता में बने रहने का सारा दारोमदार इन्हीं पंचतत्वों पर निर्भर है। इसीलिए उन्हें नाम बदलने में अलौकिक सुख और आनन्द की अनुभूति होती है। संघियों का यक़ीन है कि नाम बदलने से अतीत बदल जाएगा। उन्हें मुग़ालता है कि अतीत बदल गया तो इतिहास बदल जाएगा। इतिहास में दर्ज़ ख़ामियाँ और कमज़ोरियाँ ख़त्म हो जाएँगी। लेकिन काश! ऐसा हो पाता।

शहर का नाम बदल दो, सड़क का नाम बदल दो, अँग्रेज़ों और मुसलिम शासकों की विरासत को अपनी बताते रहो। झूठ फैलाओ कि उन विदेशियों ने भारत के गौरवशाली अतीत को मिटाया है। हम उसी अतीत को बहाल करना चाहते हैं। यही संघियों की ऐसी नीति है जिससे वो मन्द-बुद्धि हिन्दुओं को लुभाते हैं। हिन्दुओं में धारणा फैलाते हैं कि जो कुछ वो कहते हैं, वही हिन्दुत्व है और हिन्दुत्व के वो ही इकलौते रक्षक और संरक्षक हैं। जबकि तथ्य और तर्क संघियों की अवधारणाओं के सर्वथा ख़िलाफ़ होते हैं। लेकिन धर्म के नाम पर वो मन्द-बुद्धि हिन्दुओं के क़रीब पहुँचना संघियों के लिए आसान हो जाता है। फिर यही मन्द-बुद्धि हिन्दू, संघियों का वोट-बैंक बनकर, बीजेपी, वीएचपी, बजरंग दल जैसे संघ से जुड़े 135 संगठनों के माध्यम से भारतीय समाज का धार्मिक ध्रुवीकरण करते हैं। ताकि देश की सत्ता इनकी मुट्ठी में हो। बदकिस्मती से 2014 से संघियों का वो मंसूबा पूरा होने लगा जिसे तब तक भारतीय जनमानस ने या तो हाशिये पर रखा या विपक्ष में।

अब चूँकि संघियों की एक अहम नीति है शहरों और सड़कों का नाम बदलना, लिहाज़ा ये बहुत ज़रूरी है कि सारे बदलाव जल्द से जल्द हो जाने चाहिए। संघियों की नामकरण नीति के बारे में बीजेपी के चुनावी घोषणापत्र में कोई ज़िक्र नहीं क्यों नहीं होता? नामकरण के मोर्चे पर तो मोदी राज ने हिन्दुओं को बेहद निराश किया है! चार साल बर्बाद कर दिये! दो-चार नाम ही बदल सके! जबकि ज़रूरत ‘संघी नामकरण परियोजना’ की है। बात सिर्फ़ दो-चार नामों में बदलाव की नहीं है। देश के अधिकतर शहरों, बस्तियों और मोहल्लों के नाम को बदलना ज़रूरी है! लेकिन निक्कमी मोदी सरकार ने इसके लिए अभी तक न तो कोई मंत्रालय बनाया, ना आयोग, ना ही कोई संस्था या क़ानून! इससे मोदी सरकार की लापरवाही साफ़ दिखती है!

मोदी सरकार के पास समाज में सकारात्मक बदलाव लाने की कोई नीति नहीं है। क्या आपने महसूस किया कि देश की न्यायिक व्यवस्था बदली है? क्या क़ानून-व्यवस्था में आया कोई सुधार आप तक पहुँचा है? क्या शिक्षा व्यवस्था में आपने कोई ऐसा बदलाव देखा है जिससे देश की युवा पीढ़ी को कोई फ़ायदा पहुँचा हो? क्या आपसे जुड़ा स्वास्थ्य तंत्र सुधरा है? क्या रोज़गार की दशाएँ बदली हैं? क्या किसानों के दिन फिरे हैं? ऐसे ही असंख्य सवाल आज भी देश को घेरे खड़े हैं। मोदी राज में इन्हें बदलने की परवाह कहीं नज़र नहीं आती। जो है वो सिर्फ़ लफ़्फ़ाज़ी है। जुमलेबाज़ी है। सत्ता हथियाने की नौटंकी है। अरे संघियों, बदलना है तो इसे बदलकर दिखाओ!

शहरों का नाम तो सिर्फ़ छलावा है! हिम्मत है तो शहरों की सूरत बदलकर दिखाओ! रोज़-रोज़ की नौटंकी की कोई ज़रूरत नहीं है। एक साथ हज़ारों-लाखों नामों को बदल दो। अँग्रेज़ों और मुसलिम शासकों की सारी धरोहरों को एक-झटके में मिटा दो। यदि तुम्हारा मक़सद ऐसे ढोंगी बदलवों की बदौलत हिन्दुस्तान की विरासत को बदलने का है, तो वो मुराद भी पूरी कर लो। हालाँकि, इतिहास गवाह है कि नीयतख़ोरों की बदौलत कभी सार्थक बदलाव नहीं आता! इसीलिए, बनावटी को नहीं बल्कि असलियत को बदलने पर ध्यान दो। रूढ़ियाँ मिटाओ, कुरीतियाँ मिटाओ, विकृतियाँ मिटाओ। वर्ना, ये तीनों सबको मिटा देंगी।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

चुनाव

मप्र में शिवराज के दांव पर कांग्रेस ने फेंका जाल

कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।

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Shivraj-Ajay

भोपाल, 10 नवंबर | मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के ‘किसानपुत्र’, ‘महिला हितैषी’ और ‘युवाओं के हमदर्द’ होने के दांव पर कांग्रेस ने ‘वचनपत्र’ के जरिए ऐसा जाल फेंका है, जो शिवराज की बीते डेढ़ दशक में बनी छवि पर चादर डालता दिख रहा है।

शिवराज की अगुवाई में भाजपा तीसरा विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है। पिछले दो चुनावों में शिवराज की जीत में किसानों और महिलाओं की बड़ी भूमिका रही है। लाडली लक्ष्मी योजना और किसानों के लिए बनी योजनाओं ने शिवराज के सिर जीत का सेहरा बांधा था। शिवराज और भाजपा इस बार भी जीतने की रणनीति में व्यस्त है, मगर इसी बीच शनिवार को कांग्रेस ने ऐसा ‘वचनपत्र’ जारी किया, जिसमें सरकार बनने पर किसानों, युवाओं और महिलाओं के जीवन में बड़ा बदलाव लाने के वादे किए गए हैं।

वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक साजी थॉमस कहते हैं कि शिवराज बीते डेढ़ दशक में राज्य में खुद को किसानपुत्र, महिलाओं का भाई, लड़कियों का मामा और युवाओं के आदर्श के तौर पर स्थापित हो चुके हैं। कांग्रेस ने अपने वचनपत्र में उन्हीं वर्गो के जीवन को बदलने का वादा किया है, जो शिवराज के निशाने पर और उनका सबसे बड़ा वोट बैंक रहा है। कांग्रेस के वादे पर यह वर्ग कितना भरोसा करता है, यह तो समय ही बताएगा।

विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष अजय सिंह ने कहा, “कांग्रेस का वचनपत्र मध्यप्रदेश की समृद्धि का नया इतिहास लिखेगा। यह विकास के साथ-साथ प्रदेश के हर नागरिक, चाहे वह किसान हो, युवा हो, गरीब मजदूर हो, महिला हो, इससे सभी वर्गो की तरक्की का मार्ग प्रशस्त होगा।”

वहीं कांग्रेस के वचनपत्र पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने चुटकी लेते हुए कहा कि कांग्रेस वचन तो देती है, मगर उसे पूरा कभी नहीं करती। इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाने का वचन दिया था, मगर गरीबी नहीं हटी। राजीव गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था, मगर गरीबी की जगह गरीब ही हटा दिए।

सच तो यह है कि भाजपा किसानों की आय दोगुनी करने और उन्हें फसल का उचित दाम दिलाने के वादे करती रही, मगर सरकार की ये कोशिशें जमीनी स्तर पर रंग नहीं ला पाईं। बीते दो साल में किसानों के कई आंदोलनों ने सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया है।

वहीं उद्योगों की स्थापना के बावजूद पर्याप्त संख्या में युवाओं को रोजगार नहीं मिला, साथ ही महिला असुरक्षा की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई। इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर कांग्रेस ने वचनपत्र तैयार किया है, और सभी वर्गो से वादे किए हैं कि उनके कल्याण की योजनाएं तो बनेंगी ही, साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य के हालात में बदलाव आाएगा।

बहरहाल, कांग्रेस का वचनपत्र तो आ गया है, अब भाजपा का घोषणापत्र आने वाला है। अब देखना होगा कि भाजपा की क्या रणनीति होती है और वह कांग्रेस के वादों का किस तरह जवाब देती है। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ ने तो मीडिया के सामने कह दिया है कि भाजपा संकल्पपत्र बनाती है, जो महज ‘जुमलापत्र’ बनकर रह जाता है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

व्यंग्य – जन-गण नामकरण आन्दोलन: मुसलमान मंत्री बदलें नाम, अब ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी।

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Politicians Cartoon

अभी-अभी केन्द्रीय कैबिनेट की एक आपात और बेहद ख़ुफ़िया बैठक हुई है! इसमें पहली बार संघ, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के शीर्ष पदाधिकारी भी शामिल हुए! महामहिम चौकीदार महोदय ने सर्वोच्च स्तर की इस रणनीतिक मंत्रणा में अपने मंत्रियों को पीछे बैठाया और हिन्दू हित के संरक्षक महापुरुषों को अगली पंक्ति में बैठाया गया! बैठक में कई क्रान्तिकारी फ़ैसले लिये गये, लेकिन ये भी तय हुआ कि इनका औपचारिक ऐलान नहीं होगा! लिहाज़ा, सोशल मीडिया पर प्रकाशित इस पोस्ट को आप बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ मान सकते हैं!

सरकार ने तय किया है कि अब देश में ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ चलाया जाएगा! चुनाव आचार संहिता को देखते हुए अभी इस आन्दोलन का ऐलान नहीं किया जाएगा, लेकिन भगवा ख़ानदान का इरादा है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ को राम मन्दिर आन्दोलन से भी बड़ा और विश्वव्यापी बनाया जाएगा! हिन्दुत्व के नायकों का मानना है कि ‘जन-गण नामकरण आन्दोलन’ के आगे बढ़ने से मुसलमानों में गुस्सा पैदा होगा। यदि इस गुस्से को और भड़का दिया जाए तो जहाँ-तहाँ साम्प्रदायिक दंगों की आग भड़क जाएगी। और, ऐसा होते ही जहाँ मुसलमानों का क़त्लेआम शुरू हो जाएगा, वहीं हिन्दुओं के ध्रुवीकरण इतना ज़ोर पकड़ लेगा, जैसे जंगल की बेक़ाबू आग!

भगवा ख़ानदान का यक़ीन है कि यदि उसकी ये रणनीति परवान चढ़ गयी तो न सिर्फ़ आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ऐतिहासिक कामयाबी मिलेगी, बल्कि 2019 के आम चुनाव में भी पार्टी कम से कम 350 सीटें जीतने में सफल होगी! कैबिनेट की विशेष बैठक में ये भी तय हुआ कि भगवा ख़ानदान के जुड़े लोग बड़े पैमाने पर शहरों, जगहों और भवनों के नाम बदलने की माँग करने वाले बयान देने पर ज़ोर दें। ताकि मीडिया में उन्हें भरपूर सुर्ख़ियाँ मिलती रहें। इसका सबसे बड़ा फ़ायदा ये होगा कि जनता का ध्यान राफ़ेल और नोटबन्दी जैसे विश्वस्तरीय घोटालों से हट जाएगा और वो मूर्खों की तरह से इस झाँसे में फँस जाएगी कि मोदी का कोई विकल्प नहीं है! मोदी अजेय है!

  1. मुसलमान मंत्री बदले नाम

भगवा ख़ानदान के आग्रह पर ढोंगी सरकार ने तय किया है कि देश भर में बीजेपी की सरकारों में जो भी इक्का-दुक्का मुसलमान मंत्री हैं, उनके नाम फ़ौरन बदले जाएँ! वर्ना, इन मुसलमानों को मंत्री पद गँवाना होगा!

  1. ‘पक्षीफल’ कहलाएगा अंडा

भगवान ख़ानदान ने तय किया है कि अब अंडे को ‘पक्षीफल’ कहा जाएगा! इस फल से न सिर्फ़ मन्दिरों में भगवान का भोग लगाया जा सकेगा, बल्कि व्रत-उपवास में इसे फलाहार के रूप में इस्तेमाल करना होगा!

  1. वीर सावरकर पक्षीपालक योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना की आत्मा को मेक इन इंडिया की आत्मा से जोड़ा जाएगा। भगवा ख़ानदान को यक़ीन है कि आत्माओं के मिलन वाली इस क्रान्तिकारी नीति से पक्षीफलों की माँग में ज़बरदस्त उछाल आएगा और पक्षीपालकों के रूप में कम से कम 10 करोड़ युवाओं के लिए रोज़गार के अवसर खुलेंगे। इसे वीर सावरकर पक्षीपालक योजना कहा जाएगा। प्रधानमंत्री फ़सल बीमा की सुविधा भी आरक्षण की तरह इस अद्भुत योजना के तहत में पहले दस साल तक मुफ़्त मिलेगी और भविष्य में भी इसे आरक्षण की ही तरह दस-दस वर्षों के लिए बढ़ाया जा सकेगा।

  1. दीनदयाल पकौड़ा योजना

वीर सावरकर पक्षीपालक योजना में उन लोगों को वरीयता मिलेगी जो अपने ‘भक्त होने का आधार कार्ड’ दिखा सकें और जो ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ के लाभार्थी नहीं हो! ग़ौरतलब है कि प्रधानमंत्री पकौड़ा रोज़गार योजना का भी नया नामकरण कर दिया गया है! उसे अब ‘दीनदयाल पकौड़ा योजना’ कहा जाएगा!

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ओपिनियन

अंतिम सांस तक कांग्रेसी, मगर बेटे का साथ दूंगा : सत्यव्रत चतुर्वेदी

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे।

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Satyavrat Chaturvedi

छतरपुर, 9 नवंबर | कांग्रेस के पूर्व प्रवक्ता और पूर्व राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी के बेटे नितिन बंटी चतुर्वेदी ने बगावत कर समाजवादी पार्टी का दामन थामकर छतरपुर जिले के राजनगर विधानसभा क्षेत्र से नामांकनपत्र भरा है। चतुर्वेदी का कहना है कि वे अंतिम सांस तक कांग्रेसी हैं, मगर एक पिता के तौर पर बेटे का हर संभव साथ देंगे, क्योंकि छुपकर राजनीति करना उनकी आदत में नहीं है।

नितिन बंटी चतुर्वेदी राजनगर विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के दावेदार थे, मगर कांग्रेस ने अंतिम समय में उसका टिकट काट दिया। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के कहने पर नितिन ने सपा का दामन थामकर चुनाव लड़ने का फैसला लिया।

सत्यव्रत चतुर्वेदी ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, “नितिन बालिग है, उसे अपने फैसले करने का हक है, पिछले दो चुनाव से वह कांग्रेस से टिकट मांग रहा था, पार्टी ने हर बार अगले चुनाव का भरोसा दिलाया, मगर इस बार फिर वही हुआ। पार्टी ने टिकट नहीं दिया, इन स्थितियों में बंटी ने सपा से चुनाव लड़ने का फैसला लिया, यह उसका व्यक्तिगत फैसला है। मैं तो अंतिम सांस तक कांग्रेसी रहूंगा। हां, पिता के नाते बंटी का साथ दूंगा। छुपकर कहने और राजनीति करना आदत में नहीं है, जो करना है वह कहकर करता हूं, छुपाता नहीं हूं।”

चतुर्वेदी से जब पूछा गया कि बेटा सपा से चुनाव लड़ रहा है, पार्टी आप पर कार्रवाई कर सकती है, तो उनका जवाब था, “मैं कांग्रेस में जन्मा हूं, कांग्रेसी रक्त मेरी नसों में प्रवाहित होता है, दिल में कांग्रेस है, पार्टी को फैसले लेने का अधिकार है, मगर मेरे दिल से कोई कांग्रेस को नहीं निकाल सकता। अंतिम सांस भी कांग्रेस के लिए होगी।”

सत्यव्रत चतुर्वेदी के पिता बाबूराम चतुर्वेदी और मां विद्यावती चतुर्वेदी कांग्रेस की प्रमुख नेताओं में रही हैं। दोनों ने आजादी की लड़ाई लड़ी, इंदिरा गांधी के काफी नजदीक रहे। बाबूराम चतुर्वेदी राज्य सरकार में मंत्री रहे और विद्यावती कई बार सांसद का चुनाव जीतीं। बुंदेलखंड में उनकी हैसियत दूसरी इंदिरा गांधी के तौर पर रही है।

चतुर्वेदी के समकालीन नेताओं में शामिल दिग्विजय सिंह, कांतिलाल भूरिया, सुभाष यादव आदि ऐसे नेता हैं, जिनके परिवार में एक और एक से ज्यादा सदस्यों को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया है, मगर चतुर्वेदी के बेटे को पार्टी ने टिकट देना उचित नहीं समझा। इसी के चलते उनके बेटे बंटी ने बगावत कर दी।

अन्य नेताओं के परिजनों को टिकट दिए जाने के सवाल पर चतुर्वेदी का कहना है, “इस सवाल का जवाब तो मैं नहीं दे सकता, यह जवाब तो पार्टी के बड़े नेता और टिकटों का वितरण करने वाले ही दे सकते हैं, जहां तक बात मेरी है, मन में तो मेरे भी सवाल आता है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों।”

कांग्रेस में टिकट वितरण की कवायद छह माह पहले ही शुरू करने का ऐलान कर दिया गया था, जगह जगह पर्यवेक्षक भेजे गए, सर्वे का दौर चला, नेताओं की टीमों ने डेरा डाला और वादा किया गया कि न तो पैराशूट वाले नेता चुनाव मैदान में उतारे जाएंगे और न ही बीते चुनावों में भारी मतों से हारे उम्मीदवारों को मौका दिया जाएगा। मगर उम्मीदवारों की सूचियां इन सारे दावे और वादे की पोल खोलने के लिए काफी है।

चतुर्वेदी भी इस बात से हैरान हैं कि जो व्यक्ति पिछला चुनाव 38 और 40 हजार से हारा, उसे उम्मीदवार बना दिया गया। आखिर किसने और कैसा सर्वे किया, यह वे समझ नहीं पा रहे हैं। अब तो चुनाव के बाद ही पार्टी को इन हालात की समीक्षा करनी चाहिए, आखिर किसने किस तरह का खेल ख्ेाला।

–आईएएनएस

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