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स्वास्थ्य

वायु प्रदूषण की जानकारी देगा ‘एयरलेंस डेटा’ मोबाइल एप

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File Photo

प्रौद्योगिकी स्टार्टअप कंपनी परसेपियन ने एक नया मोबाइल एप ‘एयरलेंस डेटा’ लांच किया है, जो लोगों को निजी स्तर पर वायु प्रदूषण की जानकारी देगी। यह एप डाउनलोड के लिए मुफ्त उपलब्ध है।

कंपनी ने एक बयान में कहा कि अभी तक जो एप उपलब्ध हैं, वे शहर के स्तर पर वायु प्रदूषण की जानकारी देते हैं, लेकिन ‘एयरलेंस डेटा’ स्थानीय स्तर पर वायु प्रदूषण के आंकड़े मुहैया कराएगी और हर किसी को वायु प्रदूषण की सार्थक जानकारी मुहैया कराएगा।

कंपनी ने कहा कि यह एप सैटेलाइट, ट्रैफिक आंकड़े, मौसम पूर्वानुमान और विभिन्न सेंसरों के मिले आंकड़ों के आधार पर वायु प्रदूषण का सटीक आंकड़ा मुहैया कराने में सक्षम है। कंपनी ने शहर के विभिन्न इलाकों में खुद के सेंसर लगाए हैं।

शुरुआत में यह एप सिर्फ दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए लांच किया गया है। बाद में इसे देश के अन्य भागों के लिए भी लांच किया जाएगा। परसेपियन के सहसंस्थापक डेवायन साहा ने बताया, धुंध एक विकट समस्या है, जिससे लोग पीड़ित हैं, क्योंकि प्रदूषण काफी बढ़ गया है।

इसे ध्यान में रखते हुए हमने ‘एयरलेंस डेटा’ मोबाइल एप लांच किया है। इससे पहले साल 2017 के अक्टूबर में परसेपियन ने एक नेसल प्यूरिफिकेशन डिवाइस लांच किया था। यह डिवाइस सांस में ली जानी वाली हवा को फिल्टर करती है।

–आईएएनएस

शहर

नागपुर में पत्रकार की मां और बेटी की मिली लाश

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NAGPUR
फोटो (ANI)

नागपुर में एक डबल मर्डर से सनसनी मच गई। एक क्राइम रिपोर्टर की मां और नाबालिग बेटी रविवार (18 फरवरी) को मृत पाईं गईं। इनकी खून से सनी हुई लाश एक बोरे में भरी हुई थी।

58 वर्षीय मां उषा एस. कांबले अपनी 18 महीने की पोती राशि को लेकर शनिवार शाम से लापता थीं। एक पोर्टल में क्राइम रिपोर्टर के तौर पर कार्यरत रविकांत कांबले ने बताया था कि दोनों शनिवार शाम रिहायशी इलाके दिघोरी स्थित बाजार गई थीं, लेकिन घर लौट कर नहीं आईं।

काफी तलाश करने के बाद उनके अगवा होने का संदेह जताया। रविवार को शहर के सिताबुल्दी इलाके में दोनों के शव मिले। दोनों की गला रेतकर हत्या की गई, उसके बाद बोरे में भरकर शवों को गटर में फेंका गया।

पुलिस को संदेह है कि पेशेवर या निजी रंजिश के चलते हत्या को अंजाम दिया गया है। इस दोहरी हत्या की वारदात में पुलिस ने दो संदिग्धों को हिरासत में लिया है।

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स्वास्थ्य

गर्भावस्था में लें विटामिन-डी, वरना बच्चे को सताएगा मोटापा

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फाइल फोटो

ऐसी महिलाएं, जो गर्भावस्था के दौरान विटामिन-डी की कमी से पीड़ित होती हैं, उनके बच्चों में जन्मजात और वयस्क होने पर मोटापा बढ़ने की अधिक संभावना रहती है।

एक शोध में यह पता चला है। ऐसी मां की कोख से जन्म लेने वाले बच्चे, जिनमें विटामिन-डी का स्तर बहुत कम है, उनकी कमर चौड़ी होने या छह वर्ष की आयु में मोटा होने की संभावना अधिक होती है। इन बच्चों में शुरुआती दौर में पर्याप्त विटामिन-डी लेने वाली मां के बच्चों की तुलना में दो प्रतिशत अधिक वसा होती है।

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अमेरिका में दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर वइया लिदा चाटझी ने कहा, “ये बढ़ोतरी बहुत ज्यादा नहीं दिखती, लेकिन हम वयस्कों के बारे में बात नहीं कर रहे, जिनके शरीर में 30 प्रतिशत वसा होती है।”

विटामिन-डी की कमी को ‘सनशाइन विटामिन’ के रूप में भी जाना जाता है। इसे हृदय रोग, कैंसर, मल्टीपल स्केलेरोसिस और टाइप 1 मधुमेह के खतरे से जोड़ा जाता है।

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चाटझी ने कहा कि आपके शरीर में उत्पादित विटामिन-डी का लगभग 95 प्रतिशत धूप से आता है। शेष पांच प्रतिशत अंडे, वसा वाली मछली, फिश लिवर ऑयल, दूध, पनीर, दही और अनाज जैसे खाद्य पदार्थो से मिलता है।

पत्रिका ‘पेडिएट्रिक ओबेसिटी’ में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, टीम ने 532 मां-बच्चों के जोड़े की जांच की, जिसमें बच्चे के जन्म से पहले मां में विटामिन-डी को मापा गया। परिणाम बताते हैं कि लगभग 66 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में पहले त्रैमासिक में विटामिन-डी अपर्याप्त थी।

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चाटझी ने कहा, “गर्भावस्था में ओपटिमल विटामिन-डी का स्तर बचपन के मोटापे से बचा सकता है, लेकिन हमारे शोध को सुनिश्चित करने के लिए अधिक शोध आवश्यक है। गर्भावस्था के प्रारंभिक दिनों में विटामिन-डी की खुराक लेते रहना भावी पीढ़ियों को ठीक रखने का अच्छा उपाय है।”

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स्वास्थ्य

गर्भावस्था में लें विटामिन-डी, वरना बच्चे को सताएगा मोटापा

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ऐसी महिलाएं,जो गर्भावस्था के दौरान विटामिन-डी की कमी से पीड़ित होती हैं, उनके बच्चों में जन्मजात और वयस्क होने पर मोटापा बढ़ने की अधिक संभावना रहती है। एक शोध में यह पता चला है।

ऐसी मां की कोख से जन्म लेने वाले बच्चे, जिनमें विटामिन-डी का स्तर बहुत कम है, उनकी कमर चौड़ी होने या छह वर्ष की आयु में मोटा होने की संभावना अधिक होती है। इन बच्चों में शुरुआती दौर में पर्याप्त विटामिन-डी लेने वाली मां के बच्चों की तुलना में दो प्रतिशत अधिक वसा होती है।

अमेरिका में दक्षिणी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के सहायक प्रोफेसर वइया लिदा चाटझी ने कहा, ये बढ़ोतरी बहुत ज्यादा नहीं दिखती, लेकिन हम वयस्कों के बारे में बात नहीं कर रहे, जिनके शरीर में 30 प्रतिशत वसा होती है। विटामिन-डी की कमी को ‘सनशाइन विटामिन’ के रूप में भी जाना जाता है।

इसे हृदय रोग, कैंसर, मल्टीपल स्केलेरोसिस और टाइप 1 मधुमेह के खतरे से जोड़ा जाता है। चाटझी ने कहा कि आपके शरीर में उत्पादित विटामिन-डी का लगभग 95 प्रतिशत धूप से आता है। शेष पांच प्रतिशत अंडे, वसा वाली मछली, फिश लिवर ऑयल, दूध, पनीर, दही और अनाज जैसे खाद्य पदार्थो से मिलता है।

पत्रिका ‘पेडिएट्रिक ओबेसिटी’ में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, टीम ने 532 मां-बच्चों के जोड़े की जांच की, जिसमें बच्चे के जन्म से पहले मां में विटामिन-डी को मापा गया।परिणाम बताते हैं कि लगभग 66 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं में पहले त्रैमासिक में विटामिन-डी अपर्याप्त थी।

चाटझी ने कहा, गर्भावस्था में ओपटिमल विटामिन-डी का स्तर बचपन के मोटापे से बचा सकता है, लेकिन हमारे शोध को सुनिश्चित करने के लिए अधिक शोध आवश्यक है। गर्भावस्था के प्रारंभिक दिनों में विटामिन-डी की खुराक लेते रहना भावी पीढ़ियों को ठीक रखने का अच्छा उपाय है।

–आईएएनएस

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