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हिन्दू युवा वाहिनी के ज़रिये योगी की संघ-बीजेपी को खुली चुनौती…!

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जब तक संघ का योगी आदित्यनाथ से मोह भंग होगा, तब तक वो अपने हिन्दू युवा वाहिनी को इतना बड़ा बना चुकेंगे, जितना महाराष्ट्र में शिवसेना और उसके शिवसैनिक हैं! हिन्दू युवा वाहिनी के संरक्षक ख़ुद योगी ही हैं। वही इसके जन्मदाता और प्रतिपालक भी हैं। योगी के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद से हिन्दू युवा वाहिनी का क़द बहुत तेज़ी से बढ़ रहा है। इसकी उन्मादी हरक़तें इस क़दर बेलग़ाम हो चुकी हैं कि संघ-बीजेपी के लिए भी चिन्ता का सबब बन गयी हैं!

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शनिवार, 13 मई को बस्ती में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की शान में एक कार्यकर्ता सम्मेलन का आयोजन हुआ। वहाँ योगी के पहुँचने से पहले ही हिन्दू युवा वाहिनी और बीजेपी के कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर भिड़न्त हो गयी कि पंडाल में झंडा किसका लगेगा? हिन्दू युवा वाहिनी ने वहाँ पहले से ही अपने झंडे लगा रखे थे। उन्हें उतारकर बीजेपी कार्यकर्ता अपनी पार्टी का झंडा लगाना चाहते थे। हालाँकि, झगड़े को हिंसक बनने से पहले ही बीच-बचाव से सुलझा लिया गया। लेकिन सारे प्रसंग की जानकारी पाकर मुख्यमंत्री योगी ख़ासे नाराज़ हो गये। योगी ने कार्यक्रम में ही बीजेपी कार्यकर्ताओं को सलाह और चेतावनी दोनों दे दी कि वो क़ानून के दायरे में रहें!

Image result for keshav prasad maurya 14 may speech hindu yuvaयोगी आदित्यनाथ के ऐसे तेवरों के बाद बीजेपी के मठाधीशों के तन-बदन में आग लगना स्वाभाविक था! ख़बर ऊपर तक पहुँचायी गयी। बीजेपी में भी और संघ में भी। वहाँ से ख़ास हिदायतें पाने के बाद रविवार 14 मई को उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने हिन्दू युवा वाहिनी को उसकी औक़ात बताने का ज़िम्मा अपने हाथों में लिया। मौर्य ने बयान दिया कि हिन्दू युवा वाहिनी जैसा बीजेपी का कोई विंग नहीं है! बीजेपी की खिसियाहट को छिपाते हुए मौर्य ने हिन्दू युवा वाहिनी को बीजेपी के लिए किसी भी तरह का ख़तरा मानने से भी इनकार किया। लेकिन सच्चाई तो ये भी मौर्य अभी भी बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष हैं और वो अच्छी तरह से जान रहे हैं कि कट्टरवादी हिन्दुओं के बीच हिन्दू युवा वाहिनी का प्रभाव बहुत तेज़ी से बढ़ता जा रहा है। योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद से इसके सदस्यों की संख्या में भारी इज़ाफ़ा हुआ है।

केशव प्रसाद मौर्य पहले भी हिन्दू युवा वाहिनी के बढ़ते क़द को लेकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर चुके हैं। इसका नाम लिये बग़ैर मौर्य ने कहा था कि उत्तर प्रदेश शासन में ‘आउटसाइडर’ यानी बाहरी ताक़तों के प्रभाव को बढ़ने नहीं दिया जा सकता! इस तरह, साफ़ है कि मौर्य को उनके आकाओं की ओर से इशारा मिल चुका है कि वो अपने हिसाब से हिन्दू युवा वाहिनी से निपट लें। उधर, योगी भी किसी के सामने हल्का पड़ने की सोच तक नहीं सकते! लिहाज़ा, ये देखना बेहद दिलचस्प होगा कि संघ नेतृत्व योगी पर कैसे नकेल कसेगा…!

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मोदी सरकार के 4 साल में भारत हुआ पड़ोसियों से दूर

हमारा पड़ोसी श्रीलंका पाला बदलकर अब चीन के ज्यादा नजदीक हो गया है। चीन और श्रीलंका के बीच हम्बनटोटा को लेकर हुए समझौते ने भारत को श्रीलंका से दूर कर दिया। चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के जरिए भारत को उसके पड़ोसी देशों से दूर करने की कूटनीतिक चाल चली, जिससे बेपरवाह मोदी ब्रिटेन और अमेरिका सहित यूरोपीय देशों का दौरा करने में मशगूल रहे।

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Narendra Modi

नई दिल्ली, 24 मई | आज से लगभग चार साल पहले जब भाजपा सत्ता में आई थी, तो सरकार ने ‘पड़ोसी प्रथम’ का नारा दिया था। सरकार की मंशा पड़ोसियों को अधिक तवज्जो देकर रिश्ते बेहतर करने की थी, लेकिन अब जब सरकार अपने कार्यकाल के चार साल पूरे करने जा रही है तो पलटकर देखने की जरूरत है कि हमारे पड़ोसियों ने हमसे दूरी क्यों बना ली?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में सार्क देशों के प्रमुखों को न्योता दिया था, जिसमें बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को छोड़कर बाकी देशों के प्रमुखों ने शिरकत भी की थी। मोदी की ‘नेबर डिप्लोमेसी’ शुरुआती साल में चर्चा का विषय भी रही, लेकिन आज की तारीख में पाकिस्तान के साथ नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, बांग्लादेश और भूटान के साथ भी भारत के संबंधों में तल्खी आ गई है।

हमारा पड़ोसी श्रीलंका पाला बदलकर अब चीन के ज्यादा नजदीक हो गया है। चीन और श्रीलंका के बीच हम्बनटोटा को लेकर हुए समझौते ने भारत को श्रीलंका से दूर कर दिया। चीन ने अपनी महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट, वन रोड’ के जरिए भारत को उसके पड़ोसी देशों से दूर करने की कूटनीतिक चाल चली, जिससे बेपरवाह मोदी ब्रिटेन और अमेरिका सहित यूरोपीय देशों का दौरा करने में मशगूल रहे।

राजनीतिक मामलों के जानकार पुष्पेश पंत कहते हैं, “चीन एक सोची-समझी राजनीति के जरिए भारत के पड़ोसी देशों में अपना प्रभुत्व बढ़ा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी के दौरे अपनी छवि चमकाने के मकसद से अधिक हो रहे हैं। किसी देश का दौरा करने मात्र से संबंध नहीं सुधरते। आप पड़ोसी देशों की किस तरह से मदद करते हैं, यह अधिक मायने रखता है।”

हालांकि, श्रीलंका में चीन की चाल को नाकाम करने के लिए सेना प्रमुख ने कोलंबो का दौरा किया था, लेकिन श्रीलंका में चीन के लगातार निवेश के कारण यह दूरी कम नहीं हो पाई।

मोदी ने हमेशा से अपनी ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति में नेपाल को प्राथमिकता देने की बात कही। नेपाल में 2015 में भीषण भूकंप के बाद भारत ने बढ़-चढ़कर मदद भी की थी, जिससे नेपाल में मोदी की छवि को जबरदस्त लाभ पहुंचा लेकिन नेपाल में नए संविधान निर्माण के बाद मधेशियों की उपेक्षा से दोनों देशों के संबंधों में तल्खी बढ़ा दी।

इस दौरान नेपाल ने भारत पर आर्थिक नाकेबंदी का आरोप लगाया। इस आर्थिक नाकेबंदी के बीच नेपाल ने चीन से उम्मीदें लगाईं। इस आर्थिक नाकेबंदी के बाद ही नेपाल ने विचार किया कि यदि भविष्य में इस तरह की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो भारत का विकल्प तो होना ही चाहिए और वह विकल्प नेपाल को चीन में नजर आया। भारत और नेपाल के बीच 2016 में संबंध उस समय निचले स्तरों तक पहुंच गए थे, जब नेपाली की राष्ट्रपति बिद्यादेवी भंडारी ने भारत दौरा रद्द कर अपने राजदूत को वापस बुला लिया था।

अब एक अन्य पड़ोसी म्यांमार की बात करें, तो म्यांमार में लगभग चार लाख भारतीय मूल के लोग रहते हैं। हाल के दिनों में म्यांमार और बांग्लादेश के बीच रोहिंग्या शरणार्थियों को लेकर विवाद रहा, लेकिन भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार ने इस विवाद को धार्मिक चोला पहनाकर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली और चीन तीन सूत्रीय सुलह का फॉर्मूला सुझाकर म्यांमार के करीब पहुंच गया।

बांग्लादेश और भारत के बीच संबंध 2014 में हुए कुछ समझौतों के साथ सही दिशा में आगे चल रहे थे, लेकिन तीस्ता जल समझौते को लेकर दोनों देशों के बीच कुछ खटास देखने को मिली। बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर भी भारत और पड़ोसी देश बांग्लादेश के बीच संबंधों में तल्खी बढ़ी।

मालदीव की संसद में आधीरात के समय चीन का विवादित ‘फ्री ट्रेड समझौता’ पारित होने से मालदीव चीन के करीब पहुंच गया। मालदीव ने भारत के राजदूत से मिलने वाले अपने तीन स्थानीय काउंसिलर को बर्खास्त करने से मामला और पेचीदा हो गया। यह भी सोचने की बात है कि नेपाल का चार बार दौरा कर चुके मोदी ने पद संभालने के बाद से एक बार भी मालदीव का दौरा नहीं किया है।

पाकिस्तान के साथ भारत के संबंध किसी से छिपे नहीं है तो ऐसे में सरकार अपने पड़ोसियों को लेकर कहां चूक कर रहा है?

चीन और पाकिस्तान की दोस्ती भारत के लिए सिरदर्द से कम नहीं है। इन चार वर्षों में सरकार पाकिस्तान के साथ टकराव की स्थिति को कम नहीं कर सकी। सर्जिकल स्ट्राइक से जरूर सरकार ने दुश्मन के घर में घुसकर उसे सबक सिखाने का ढोल पीटा हो, लेकिन उसके बाद सीमा पर किस तरह का माहौल रहा, वह किसी से छिपा नहीं है।

चीन के साथ रिश्ते खट्टे हुए, उसी का नतीजा रहा कि चीन ने एनएसजी में भारत की स्थायी सदस्यता में रोड़े अटकाए तो मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित होने से बचाने के लिए अपने वीटो का इस्तेमाल किया। डोकलाम विवाद इसका ज्वलंत उदाहरण है। डोकलाम विवाद के समय भारत-चीन युद्ध का अंदेशा तक जताए जाने लगा था।

By : रीतू तोमर

–आईएएनएस

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मोदी राज के 4 साल में जनता के सुख बढ़े या दुःख ?

अब मोदी राज की चौथी सालगिरह के मौके पर सबसे अहम यक्ष-प्रश्न यही है कि क्या 2014 में मोदी को पूर्ण बहुमत देने से जनता के दिन फिरने जैसा कुछ हुआ या उसकी हालत पहले से बद्तर हो गयी?

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लोकतंत्र में जनता की सरकार से अपेक्षा होती है कि वो उनकी ज़िन्दगी के कष्टों को दूर करेगी और इसे सुखमय बनाएगी। इसी मकसद को हासिल करने के लिए जनता की ओर से सरकार को ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ बनाया जाता है। सरकार को अपने वादों को निभाने के लिए मनमाफ़िक क़ानून बनाने और उसे लागू करने की छूट होती है। जनता से वो मनमाफ़िक टैक्स वसूलती है। इसी से उसे सारी व्यवस्था को इस ढंग से चलाना होता है जिससे जनता की ज़िन्दगी ख़ुशगवार बन सके। अब मोदी राज की चौथी सालगिरह के मौके पर सबसे अहम यक्ष-प्रश्न यही है कि क्या 2014 में मोदी को पूर्ण बहुमत देने से जनता के दिन फिरने जैसा कुछ हुआ या उसकी हालत पहले से बद्तर हो गयी?

मज़े की बात ये है कि इस आसान से सवाल का जबाब हर कोई जानता है! फिर चाहे वो भक्त हो या अभक्त! मोदी समर्थक हो या विरोधी! लेकिन अफ़सोस कि सच बोलने और बताने वालों की संख्या आज अँगुलियों पर गिनी जा सकती है। क्योंकि मोदी राज ने उस मीडिया को अपना भोंपू बना लिया है, जिसका पहला फ़र्ज़ है जनसरोकारों को लेकर सरकारों को झकझोरना और व्यवस्था में जबाबदेही तथा पारदर्शिता को बढ़ाना। इसीलिए मीडिया को लोकतंत्र की इमारत का चौथा खम्भा कहा जाता है। लेकिन आज आपको देश में एक भी ऐसा समझदार व्यक्ति नहीं मिलेगा जिसे लगता हो कि मोदी राज में मीडिया अपना काम ठीक से कर रहा है। वो उन मुद्दों और मसलों पर अपनी संवेदनशीलता दिखा रहा है, जो किसी स्वस्थ लोकतंत्र में जबाबददेह मीडिया से अपेक्षित है। मीडिया की ऐसी दुर्दशा से लोकतंत्र का चौथा खम्भा ख़ुद को कोस रहा है। मोदी राज की पहली और सबसे बड़ी दुःखद देन है!

लोकतंत्र अपनी संस्थाओं और क़ानून के राज से चलता है। इस मोर्चे पर भी मोदी राज के चार सालों ने भारत की छवि पर ऐसा बट्टा लगाया है, जो पहले कभी नहीं दिखा। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस हर मायने में ना सिर्फ़ ऐतिहासिक है, बल्कि वो जीता-जागता सबूत भी है कि कैसे सियासी दख़ल की वजह हमारी न्यायपालिका सिसक रही है! जो लोग इसे मामूली खींचतान के रूप में देखते हैं, उन्हें पता ही नहीं है कि न्यायपालिका को मुट्ठी में रखने के लिए मोदी सरकार ने चार साल में क्या-क्या खिचड़ी पकायी है! जनता को सच्चाई का पता इसलिए भी नहीं चल रहा क्योंकि मीडिया अपना काम नहीं कर रहा। यहाँ तक कि वो विपक्ष की आवाज़ को भी जनता तक नहीं पहुँचने दे रहा। न्यायपालिका का गला घोटना, मोदी राज की दूसरी सबसे दुःखद और विनाशकारी देन है।

चुनाव आयोग की गरिमा का पतन! ये मोदी राज की तीसरी सबसे दुःखद उपलब्धि है। चुनाव आयोग के रूप में मोदी सरकार ने जिन लोगों को वहाँ नियुक्त किया, उनकी निष्ठा देश के संविधान के प्रति नहीं, बल्कि अपने सियासी आकाओं के प्रति है। यही वजह है कि मोदी राज में चुनाव आयोग ने एक से बढ़कर एक, ऐसे फ़ैसले लिये, जिससे उसकी निष्पक्षता तार-तार हो गयी। मिसाल के तौर पर हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनावों के कार्यक्रम को अलग-अलग करना, चुनाव की तारीख़ों का लीक होना। आयोग के ईवीएम पर उठे सवालों ने तो उसकी सारी प्रतिष्ठा को ही मिट्टी में मिला दिया।

सीएजी यानी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक भी देश की अहम संवैधानिक संस्था है। इसका काम सरकारी पैसे के सही इस्तेमाल पर नज़र रखना है। लेकिन मोदी राज में ये संस्था भी रीढ़-विहीन हो गयी। पूर्व सीएजी विनोद राय ने मनमोहन सिंह सरकार को बदनाम करने के लिए संघ की कठपुतली का काम किया। उन्होंने तमाम मनगढ़न्त घोटालों की बातें कीं। लेकिन मोदी राज के चार साल में एक भी कथित घोटाले के आरोपियों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र तक दाख़िल नहीं हो सका। 2जी और आदर्श मामले में तो बाक़ायदा अदालतों ने फ़ैसला सुनाया है कि कोई घोटाला नहीं हुआ। लेकिन सीएजी के क़ायदे उस वक़्त बदल गये, जब उससे नोटबन्दी के फ़ैसले से हुए नफ़ा-नुकसान का पता लगाने की माँग की गयी। यानी, इस अहम संवैधानिक संस्था का हाल ये हो चुका है कि व्यक्ति के बदलने से उसकी नीतियाँ बदल गयीं! सीएजी का पतन, मोदी राज की चौथी सबसे दुःखद उपलब्धि है।

संसद देश की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था है। लेकिन पूर्ण बहुमत वाली मोदी राज में भी संसद की गरिमा की धज़्ज़ियाँ उड़ती रहीं। और, इससे भी दुःखद ये है कि इस कुकर्म को सीधे-सीधे सरकार में बैठे लोगों में डंके की चोट पर अंज़ाम दिया। सरकार ने उस विश्वास मत का सामना करने की भी हिम्मत नहीं दिखायी, जिसमें उसके गिरने की कोई आशंका तक नहीं थी। बीते चार साल में मोदी सरकार के पास कभी ऐसी लचीलापन नज़र नहीं आया, जब ये लगा हो कि वो विपक्ष को भी साथ लेकर चलने का जज़्बा, लचीलापन और दूरदर्शिता रखती है।

सरकार ने विपक्ष के अंकुश से बचने के लिए स्पीकर की संवैधानिक संस्था का भी बेज़ा इस्तेमाल किया। इससे विधेयकों को भी वित्तीय विधेयक बना दिया, जो इसके दायरे में नहीं आते थे, ताकि वो राज्यसभा की ताक़त से बचाये जा सकें। क्योंकि तब राज्यसभा में मोदी सरकार के पास बहुमत नहीं था। लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति मोदी सरकार में निष्ठा के नदारद होने की वजह से ही अब संसद सत्र की मियाद अपने निम्नतम स्तर पर आ चुकी है। संसद की दुर्दशा, मोदी राज की पाँचवी सबसे दुःखद उपलब्धि है।

विपक्ष की ओर से मोदी राज की होने वाली सटीक आलोचनाओं को भी राजनीति से प्रेरित बताया जा सकता है। लेकिन यही बात बीजेपी के वरिष्ठ नेता रहे यशवन्त सिन्हा, अरूण शौरी, शत्रुघ्न सिन्हा और राम जेठमलानी जैसे लोगों की आलोचना पर लागू नहीं हो सकती। इन्होंने बीजेपी में रहते हुए मोदी राज की इतनी तीख़ी आलोचनाएँ की हैं, जिसकी कोई और मिसाल नहीं है। यही वजह है कि चाल-चरित्र और चेहरा की बातें करने वाले सत्ता की ख़ातिर किसी भी स्तर तक न सिर्फ़ ख़ुद गिरने को तैयार हो जाते हैं बल्कि अपने निहित स्वार्थों की ख़ातिर वो राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद को भी कलंकित करने से बाज़ नहीं आते।

अब बात मोदी सरकार की आर्थिक उपलब्धियों की। इसका सिर्फ़ एकलौता सुखद पहलू ये रहा है कि मोदी सरकार ने देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा हासिल किया है। हालाँकि, आयकर जैसे प्रत्यक्ष करों से सरकारी ख़ज़ाने को होने वाली आमदनी में कोई ख़ास बढ़ोत्तरी नहीं हुई। दूसरी ओर मोदी राज में अप्रत्यक्ष करों की दरों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अप्रत्यक्ष करों की मार ग़रीबों पर ज़्यादा पड़ती है। पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमतों में लगी आग से भी सबसे अधिक ग़रीबों को ही चोट पहुँची है। क्योंकि हमारे देश में ग़रीबों और निम्न आयवर्ग के लोगों की तादाद बहुत अधिक है। ईंधन के महँगा होने का भारी असर उन सभी चीज़ों पर कहीं अधिक पड़ता है, जिनका ताल्लुक इन कमज़ोर तबकों से होता है।

अन्य आर्थिक नीतियों के लिहाज़ से देखें तो नोटबन्दी की नीति न सिर्फ़ हर मायने में फेल रही है, बल्कि इसने अर्थव्यवस्था का भट्टा बिठाने का काम किया है। मोदी राज में सरकारी बैंकों ने सुनियोजित लूट की ऐसी वारदातें हुई, जिनसे पता चलता है कि सरकार अपना काम ठीक से करने में पूरी तरह विफल रही है। रिकॉर्ड-तोड़ एनपीए की वजह से हमारे ज़्यादातर बैंकों की हालत तो ये हो चुकी है कि यदि उनमें जनता के गाढ़े ख़ून-पसीने की कमाई को नहीं ठूँसा गया तो वो दम तोड़ देंगे। नोटबन्दी ने उद्योग-व्यापार की कमर तोड़ दी। इससे बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी पैदा हुई। इसकी सबसे तगड़ी मार तो देश के उस असंगठित क्षेत्र पर पड़ी, जिसमें देश की 90 फ़ीसदी आबादी रहती है और जिसकी दुर्दशा के बारे में सरकार के पास कोई आँकड़ा तक नहीं है। जीएसटी एक अच्छा आर्थिक सुधार साबित हो सकता था। लेकिन मोदी राज ने जिस तरह से पर्याप्त तैयारी किये बग़ैर इसे लागू किया, उससे नकारात्मक नतीज़े ही हासिल हुए।

मोदी सरकार ने जनहित से जुड़ी बहुत सारी पुरानी योजनाओं के नाम बदलकर उन्हें अपनी कामयाबी के रूप में पेश किया। लेकिन हरेक योजना के मोर्चे पर सरकार के दावों और सच्चाई में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। इसीलिए अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के लिए मोदी सरकार ने क़रीब साढ़े चार हज़ार करोड़ रुपये प्रचार और विज्ञापनों पर बहा दिये।

संचार भी पूरी तरह से केन्द्र सरकार का विषय है। ये किसी से छिपा नहीं है कि यदि आज हरेक व्यक्ति के हाथ में मोबाइल है तो ये पिछली सरकार की देन है। लेकिन यदि आज हरेक व्यक्ति चरमरा चुकी मोबाइल व्यवस्था से पीड़ित है तो वो पूरी तरह से मोदी सरकार की नाकामी की कहानी ही कहता है। कॉल ड्रॉप और डाटा स्पीड की समस्या देशव्यापी है और बीते चार साल में ये बद से बदतर ही होती रही।

रक्षा क्षेत्र में भी मोदी सरकार का प्रदर्शन बहुत दुःखद रहा है। कश्मीर के हालात मोदी राज में और बिगड़े हैं। अनुच्छेद 370 को ख़त्म करने और कश्मीरी पंडितों की घर-वापसी के बेहद अहम वादों पर मोदी राज की कोई उपलब्धि नहीं है। सीमा पर होने वाली गोलीबारी और कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद की वजह से मोदी राज में सैनिकों और नागरिकों दोनों को हुए नुकसान ने कीर्तिमान बनाया है।

विदेश नीति के मोर्चे पर भी मोदी सरकार को चौतरफ़ा नाकामी ही हाथ लगी है। मोदी राज में भारत के अपने सभी पड़ोसियों से रिश्ते मज़बूत नहीं बल्कि कमज़ोर हुए हैं। यही वजह है कि मोदी सरकार को विदेश में भी अपनी ब्रॉन्डिंग पर पानी की तरह पैसा बहाना पड़ता है। जबकि दूसरी ओर, देश का विदेशी व्यापार, निर्यात, विदेश निवेश सभी अहम क्षेत्रों की गिरावट का दौर रुकने का नाम नहीं ले रहा। इन क्षेत्रों की दशा कितनी ख़राब है, इसे डॉलर के मुक़ाबले लगातार और तेज़ी से गिर रहे रुपये की दशा से बहुत ही आसानी से समझा जा सकता है।

कुलमिलाकर, चार साल में मोदी राज ने तक़रीबन हर मोर्चे पर नाकाम किया है। अलबत्ता, अपने झूठ फैलाने वाली नीति और संघ जैसे फासिस्ट संगठन की बदौलत मोदी सरकार ने जनता में अपनी ऐसी छवि ज़रूर बनायी जिसमें उसे चुनावों में भरपूर कामयाबी मिली। इसीलिए, मोदी सरकार के कामकाज़ को यदि आप उसके झूठे दावों के आईने में देखेंगे तो आप धोखे में ही रहेंगे। सच्चाई को जानने के लिए आपको, अपने आप से, बस एक लाइन का सवाल पूछना चाहिए कि क्या मोदी राज के 4 साल में आपकी तकलीफ़ों में इज़ाफ़ा हुआ है या नहीं? इस राज में आप ज़्यादा सुखी बने हैं या ज़्यादा दुःखी? आपके अनुभव आपको सच के सिवाय और कुछ नहीं बताएँगे। फिर आपको किसी और की बातों में आने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी!

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सुप्रीम कोर्ट को ही बचानी होगी राज्यपाल की गरिमा

यदि सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शिता दिखाते हुए विश्वास मत हासिल करने के लिए 19 मई का वक़्त तय नहीं किया होता तो विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की रोकथाम बेहद मुश्किल होती। विश्वास मत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की शर्त ने भी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने में बेहद अहम भूमिका निभायी।

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यदि राज्यपाल ने नियमों का पालन किया होता तो देश को तमाम नागवार नज़ारों से बचाया जा सकता था। इसमें कोई शक़ नहीं था कि चुनाव बाद बने काँग्रेस-जनता दल सेक्यूलर के पास बहुमत था। बीजेपी के 104 विधायकों की संख्या को तिकड़मबाज़ी के बग़ैर बढ़ाया नहीं जा सकता था। ऐसे हालात में संवैधानिक पद पर बैठे राज्यपाल को अपने पद की शपथ के मुताबिक़, लोकतंत्र का संरक्षण करना चाहिए, लेकिन उन्होंने ताल ठोंककर पक्षपातपूर्ण तरीका अपनाया।

आइये अब ये समझें कि राज्यपाल के संवैधानिक लक्ष्मण रेखा लाँघने का नतीज़ा क्या होता है? पहली बात, नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ने राज्यपाल को अपने ही लम्बे हाथों की तरह इस्तेमाल किया, फिर चाहे वो गोवा हो या मणिपुर और मेघालय या अरूणाचल और उत्तराखंड। राज्यपालों को वही धुन बजानी पड़ी जिसे दिल्ली से कहा गया। इससे राज्यपाल की संस्था ही सन्देह के घेरे में आ गयी। दूसरी और शायद ज़्यादा गम्भीर बात ये है कि ऐसे ‘खेल’ का आम आदमी पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। जनता चुनावी राजनीति के स्वभाव को तो ख़ूब समझती है। लेकिन जब वो संवैधानिक संस्थाओं के सतत पतन को देखती है तो उसका इन संस्थाओं और वहाँ बैठे लोगों पर से ऐतबार उठ जाता है। ये बेहद चिन्ताजनक दशा है।

तीसरा पहलू है कि जिस तरह से 17 मई को राज्यपाल ने बीएस येदियुरप्पा को शपथ दिलाने का फ़ैसला लिया और उन्हें विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन का वक़्त दिया। राज्यपाल ने 16 मई की देर शाम को निर्णय लिया कि अगले दिन सुबह 9 बजे ही शपथ समारोह होगा। राज्यपाल को पता था कि उनके ग़लत फ़ैसले को काँग्रेस-जेडीएस अदालत में चुनौती ज़रूर देंगे। लिहाज़ा, अदालतों के खुलने से पहले ही शपथ दिलवाने की सोची गयी। लेकिन सौभाग्यवश, सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश ने मामले को तत्काल सुनवाई के लायक माना। इससे काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन को लगा कि जंग को अब भी जीता जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने लम्बी बहस सुनने के बाद तय किया कि वो शपथ ग्रहण के वक़्त में दख़ल नहीं देगा। लेकिन उसे लगा कि विधानसभा में विश्वास मत हासिल करने के लिए दी गयी 15 दिन की मोहलत पूरी तरह से नाकाफ़ी है। क्योंकि इस मियाद का इस्तेमाल सिर्फ़ विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त के लिए होना था। वर्ना, चुनाव आयोग की ओर से जारी अधिसूचना के मुताबिक़, काँग्रेस-जेडीएस के विधायकों की संख्या 116 है। एक निर्दलीय के समर्थन के जुड़ने से ये संख्या 117 तक पहुँचती है।

साफ़ है कि येदियुरप्पा को शपथ दिलाने का फ़ैसला राज्यपाल ने उन्हें हासिल संख्या-बल के आधार पर नहीं लिया गया था। तब अदालत को ये देखना चाहिए था कि जब गठबन्धन के पास स्पष्ट बहुमत है तो फिर येदियुरप्पा को प्राथमिकता क्यों दी गयी? लेकिन अदालत के सामने वो ख़त नहीं था जो राज्यपाल की ओर से 15 मई को येदियुरप्पा को शपथ लेने के लिए आमंत्रित करने के लिए भेजा गया था। अदालत में कोई ऐसे सबूत नहीं पेश किया गया, जिससे लगे कि येदियुरप्पा को गठबन्धन के किसी भी विधायक का समर्थन हासिल है। ऐसी दशा में राज्यपाल को येदियुरप्पा को न्योता देने की बजाय एच डी कुमारास्वामी को आमंत्रित करना चाहिए था, क्योंकि काँग्रेस ने 15 मई को ही राज्यपाल को लिखकर दे चुकी थी कि वो जेडीएस को उसका समर्थन है।

15 मई की शाम को ही जेडीएस और काँग्रेस ने अपने दो विधायकों के सिवाय सभी विधायकों के दस्तख़त के साथ राज्यपाल को ख़त लिखा था कि वो कुमारास्वामी के नेतृत्व का समर्थन करते हैं। उस ख़तों की प्रतिलिपि सुप्रीम कोर्ट के सामने थी। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने ये कहकर येदियुरप्पा की शपथ पर रोक लगाने से इनकार कर दिया कि उसके सामने राज्यपाल की चिट्ठी नहीं है और याचिका के पक्षकार के रूप में वो सामने मौजूद भी नहीं हैं। लिहाज़ा, राज्यपाल की ग़ैरमौजूदगी में वो शपथ ग्रहण को नहीं रोक सकता। अब ये इतिहास बन चुका है कि क्या सुप्रीम कोर्ट ऐसा कोई आदेश दे सकता था या नहीं।

लेकिन येदियुरप्पा के शपथ ग्रहण को नहीं रोकने के सुप्रीम कोर्ट के रुख़ का बहुत गम्भीर और दूरगामी नतीज़े होंगे। राज्यपाल के आदेश के प्रधानमंत्री के उस बयान के आलोक में देखना होगा, जिसमें उन्होंने कहा था कि “सरकार तो हमारी ही बनेगी”। ये बयान इस बात का साफ़ ऐलान था कि राज्यपाल को सही या ग़लत किसी भी तरह से प्रधानमंत्री की बात को सही साबित करने का सूत्रधार बनना होगा और कर्नाटक में बीजेपी की ही सरकार बनवानी होगी। आलाक़मान की इस मंशा को पूरा करने के लिए अमित शाह ने पूरी ताक़त झोंक दी, बेल्लारी बन्धुओं को झोंक दिया गया, जिन्होंने काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन के दो विधायकों को बन्धक भी बना लिया। ज़ाहिर है ये सब कुछ बहुमत का निर्माण करने के लिए हो रहा था।

कल्पना कीजिए कि ऐसे हथकंडों से यदि बीजेपी को बहुमत हासिल हो जाता तो फिर क्या होता? सुप्रीम कोर्ट उस सरकार को वैध मान लेती जिसका जन्म कुकर्मों से हुआ हो और जिसने क़ानून की पोशाक ओढ़ रखी हो। ऐसी सरकार को अदालत में असंवैधानिक साबित करना असम्भव होता। भ्रष्टाचार, ग़ैरक़ानूनी और अनीतिपूर्ण, इन सभी की जीत का जश्न होता और सुप्रीम कोर्ट ऐसी पतित सरकार को भी सत्ता से बाहर नहीं कर पाती। सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण को रोकने से परहेज़ करके बहुमत के निर्माण का रास्ता खुला रखा। हमें काँग्रेस और जनता दल सेक्यूलर को शाबाशी देनी चाहिए कि उन्होंने अपने विधायकों को एकत्रित रखा। यहाँ तक कि जिन दो विधायकों को बन्धन बनाकर रखा गया था, उनकी भी ऐन वक़्त पर रिहा करवाने में सफलता मिल गयी।

यदि सुप्रीम कोर्ट ने दूरदर्शिता दिखाते हुए विश्वास मत हासिल करने के लिए 19 मई का वक़्त तय नहीं किया होता तो विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की रोकथाम बेहद मुश्किल होती। विश्वास मत की कार्यवाही के सीधे प्रसारण की शर्त ने भी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने में बेहद अहम भूमिका निभायी।

पूरे प्रसंग के दो सबक हैं। पहला, राज्यपाल की संस्था को सियासी दाँवपेंच से सुरक्षित रखना बेहद ज़रूरी है। दूसरा, सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षित है कि वो ऐसे हालात से निपटने और राज्यपाल की भूमिका के बारे में स्पष्ट फ़ैसला दे। ताकि, भविष्य में किसी और राज्य में जनता को संवैधानिक मूल्यों की धज़्ज़ियों को उड़ते हुए नहीं देखना पड़े। ऐसे दौर में, जब राजनीतिक सुचिता पतनशील हो और संवैधानिक मूल्यों पर संकट गहराया हो, तब अदालतों से अपेक्षित है कि वो सबसे सजग रहें। आज यही सबसे महत्वपूर्ण है।

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

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