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सिर्फ़ ‘मूर्ख’ नेता ही 23 लोगों को शहीद करके सुपरसोनिक रफ़्तार से फ़ैसले लेते हैं!

ये मूर्खता नहीं तो और क्या थी कि आपके ही सहयोगी दल शिवसेना के सांसद अरविन्द सावंत आपको बाक़ायदा लिखित तौर पर उस पुल के बेहद जर्जर होने को लेकर आगाह किया था, जिससे रोज़ाना क़रीब एक लाख मुसाफ़िर गुज़रते हैं!

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चाणक्य ने मनुष्य को चार श्रेणी में बाँटा। बुद्धिमान, औसत दिमाग़ वाला, मन्द बुद्धि और मूर्ख। जो दूसरे के अनुभवों से सीखे वो बुद्धिमान, जो औरों की ग़लतियों से सबक ले वो औसत बुद्धि वाला, जो ख़ुद ग़लतियाँ करके नसीहत ले वो मन्दबुद्धि तथा जो अपनी ग़लतियों से भी नहीं सीखे वो मूर्ख! भारत में संघियों से बड़ा मूर्ख कभी कोई और नहीं हुआ! अपने जन्म से लेकर आज तक संघियों ने कभी अपनी ग़लतियों से कुछ नहीं सीखा। वो कुतर्क में माहिर लोगों की जमात है। अपनी कमज़ोरी को छिपाने के लिए ये भाँति-भाँति के झूठ गढ़ने और अफ़वाहें फैलाने में माहिर रहे हैं। यही इनका जन्मजात गुण और विशेषता है। जागते हुए ख़्वाब देखना भी इस जमात की अहम विशेषता है। इनका ऐसा ही एक ख़्वाब है ‘भारत का विश्व गुरु बनाना’ तो दूसरा सपना है ‘हिन्दुत्ववादी हिन्दू राष्ट्र’। जिस दिन जागते हुए देखे जाने वाले ख़्वाब सच होने लगेंगे, उस दिन इनका मंसूबा भी पूरा हो जाएगा!

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फ़िलहाल, मूर्खों की इसी जमात का तीन-चौथाई भारत पर राज है। नरेन्द्र मोदी इसके शीर्ष नेता हैं। ये झूठ बोलने के ही नहीं, उसे गढ़ने के भी पुरोधा हैं। कहते थे, पिछली सरकार में निर्णय लेने का साहस नहीं था। इसीलिए फ़ैसले लिये जाने में नाहक देरी और कोताही होती थी। भ्रष्टाचार बढ़ता था। हमें पूर्ण बहुमत वाली सत्ता दीजिए। फिर देखिए, हम कैसे-कैसे फ़ैसलों को दनादन लेकर दिखाएँगे। दिखाये भी। लेकिन इनके 99.99% फ़ैसलों और उसके लेने की प्रक्रिया से सिर्फ़ इतना ही साबित हुआ है कि वाक़ई ये अव्वल दर्ज़े के मूर्खों की सरकार है। जैसे ही इनकी मूर्खता की पोल खुलती है, वैसे ही ये अपनी मूर्खता को छिपाने के लिए सुबह से शाम तक झूठ, अफ़वाह और विरोधियों के चरित्रहनन का सहारा लेने लगते हैं। दरअसल, इन्हें राज करने का सऊर ही नहीं है!

सर्ज़िकल हमला, नोटबन्दी, पेट्रोलियम पदार्थों के आसमान छूते दाम और हड़बड़ी में लागू की गयी त्रुटिपूर्ण GST जैसे बड़े फ़ैसलों से साफ़ है कि ये कड़े फ़ैसले लेने में असामान्य तेज़ी दिखाते हैं। इनकी सोच बचकाना रहती है। जैसे जल्दी का काम शैतान का! आगे-पीछे सोचने की न तो इन्हें अक़्ल है और न ही समझदार लोग इन्हें कभी फूटी आँख भी सोहाते हैं! यदि इन्हें दनादन फ़ैसले लेने को लेकर ग़लतफ़हमी नहीं होती तो मुम्बई में एलफिस्टन रेल-पुल हादसा नहीं होता। 23 घर नहीं उजड़ते! क्योंकि मूर्खों का ये बुनियादी गुण है कि उन्हें बाथरूम में रेनकोट पहनकर नहाते लोग तो दिख जाते हैं, लेकिन ख़तरों से आगाह कर रहे दोस्तों का मशविरा नज़र नहीं आता है!

Image result for mumbai stampede शिवसेना के सांसद अरविन्द सावंत

ये मूर्खता नहीं तो और क्या थी कि आपके ही सहयोगी दल शिवसेना के सांसद अरविन्द सावंत आपको बाक़ायदा लिखित तौर पर उस पुल के बेहद जर्जर होने को लेकर आगाह किया था, जिससे रोज़ाना क़रीब एक लाख मुसाफ़िर गुज़रते हैं! आपकी अर्थव्यवस्था रोज़ाना नये-नये कीर्तिमान बना रही है और आपकी रेलमंत्री मन्दी से मरा जा रहा है। या तो वो झूठा है या आप दोनों! सांसद मरम्मत के लिए 12 लाख रुपये माँग रहा था। उसने सांसद में इसी पुल की समस्या को उठाया था। लेकिन आपकी नीयत गन्दी थी। आपको ये कैसे बर्दाश्त होता कि केन्द्र और महाराष्ट्र में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद पुल की मरम्मत का श्रेय शिवसेना का मिल जाए! लिहाज़ा, दनदन फ़ैसले लेने का झूठ बोलने वाली सरकार ने कछुआ चाल पकड़ ली!

अरे, सरकार की फ़र्ज़ी वैश्विक मन्दी (ग्लोबल स्लो डाउन) और रुपयों की तंगी उस वक़्त कैसे उड़न छू हो जाती है, जब आप हर हफ़्ते कैबिनेट की बैठकों में लाखों-करोड़ों की योजनाओं का नारियल फोड़ते रहते हैं! मज़े की बात ये है कि देश को ये बताने वाला मीडिया नदारद है कि आपके ज़्यादातर ऐलान ढपोरशंखी हैं। फ़ाइलों में झूमते काग़ज़ी शेर हैं। इससे भी ज़्यादा दिलचस्प तथ्य ये है कि आपके मौजूदा और पुराने, दोनों रेलमंत्री बम्बईया हैं। ये पुल इतना महत्वपूर्ण है कि ऐसा हो नहीं सकता कि ख़ुद सुरेश प्रभु और पीयूष गोयल कभी न कभी इस पुल से पैदल न गुज़रे हों। ‘जाके पैर न फटे बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई’ का असर सिर्फ़ मूर्खों पर नहीं होता। वर्ना, इन्होंने ख़ुद यदि लाखों लोगों को हो रही तकलीफ़ का अनुभव किया होता तो आज इतनी गिनती बुद्धिमानों में होती! लेकिन बेचारे अपने डीएनए से लाचार हैं!

40 महीने के मोदी राज में हमेशा यही बात साबित हुई है कि विपक्ष में रहने लायक लोगों को यदि सत्ता मिल जाती है, तो उन्हें बौद्धिक बदहज़मी जकड़ लेती है। इनका हाल उस कुत्ते जैसा है जिसे देसी घी हज़म नहीं होता और इसके सेवन से उसे रोयें झड़ने लगते हैं। 2014 में जनता ने इन्हें सत्ता तो दे दी, लेकिन ये मूर्ख राज करने की बुद्धि कहाँ से लाएँगे! इनके तो दिमाग़ में दिन-रात सियासी फ़ायदा लेने का ही कीड़ा दौड़ता रहता है। इसीलिए जिन मूर्खों के पास पुल की मरम्मत के लिए 12 लाख रुपये नहीं जुटे, उन्होंने ही कुछ ही महीने बाद नये पुल के निर्माण के लिए 13 करोड़ रुपये की योजना बना डाली। तो क्या कुछ ही महीने में वैश्विक मन्दी रफ़ूचक्कर हो गयी? जी नहीं! असली मंशा तो ये थी कि नया पुल बनेगा तो टेंडर होगा, चढ़ावा चढ़ेगा, शिलान्यास होगा, शुभारम्भ का फ़ीता काटेगा, जलसा और भाषण होगा।

ढोल पीटा जाएगा कि अँग्रेज़ों के ज़माने के पुल की 70 साल तक अनदेखी होती रही। लेकिन देखिए, हमने कैसे चुटकियों में पुल बनाकर इसे चालू भी कर दिया! यदि पिछली सरकारें पॉलिसी पैरालिसिस (फ़ैसले लेने में ढिलाई) से पीड़ित नहीं होती तो हम 40 महीने में उतना काम करके कैसे दिखा देते जितना 70 साल में भी नहीं हुआ! लेकिन आपकी सारी बातें खोखली हैं। जुमला हैं। ढोंग हैं। फ़रेब हैं। शिवसेना को सियासी फ़ायदा न मिल जाए, इसलिए आपने उसके कहने पर लाखों लोगों की सुरक्षा से जुड़े पुल की ख़ातिर 12 लाख रुपये नहीं दिये। लेकिन हादसा होने के बाद जनता के ख़ून-पसीने की कमाई से आपको हरेक मृतक के परिजनों को दस-दस लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा करनी पड़ी। 5 लाख रेलवे और 5 लाख महाराष्ट्र सरकार। जिन अक़्ल के अन्धों ने 12 लाख रुपये नहीं दिये, वही 2.3 करोड़ रुपये राहत के नाम पर देंगे। यदि वक़्त रहते बुद्धिमानी दिखायी होती, तो 23 घर उजड़ने से बच जाते!

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वैसे 23 लोगों के शहीद होने के बाद अब रेलवे के पास कहाँ से इतने रुपये आ जाएँगे कि पीयूष गोयल ने ऐलान कर दिया कि मुम्बई में भीड़-भाड़ वाले हरेक स्टेशन पर एस्केलेटर्स लगेंगे। अरे मूर्खों, ये साहस आपने पहले क्यों नहीं दिखाया! सिर्फ़ मूर्ख ही हादसों के होने के इन्तज़ार करते हैं! इन्हीं मूर्खों के बारे में याद है ना कि कैसे 2014 के चुनाव से पहले और बाद में भी कई बार भारतीय रेल की तुलना चीन की रेलवे से की जाती रही! तुलना करने में कोई ख़राबी नहीं। लेकिन मूर्खों को कौन समझाए कि भाई, भारत की चीन से तुलना वैसी ही है, जैसे घोड़े की तुलना कार से! यही भगवा ख़ानदान तो कहता रहा है कि भारत को दूसरों (पश्चिम) की नक़ल नहीं करनी चाहिए। हमारी योजनाएँ और नीतियाँ, हमारे स्वभाव और संस्कार के मुताबिक होनी चाहिए।

अरे, 40 महीने से तो आप भी इस देश के ख़ुदा बने बैठे हैं, आपने किस-किस क्षेत्र में चीन को टक्कर देकर दिखाया है? आप सिर्फ़ जुमलों और हवाबाज़ी के सिकन्दर हैं! आपने ताबड़तोड़ रेल परियोजनाओं का ऐलान किया। बुलेट ट्रेन दौड़ाने के लिए आप ऐसे मचलते हैं जैसे बक़ौल सूरदास, ‘मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं’। लेकिन आपके राज में रेलवे का और सत्यानाश हो गया। आपने जितना किराया बढ़ाया है, वैसा तो आज़ादी के बाद से कोई भी सरकार नहीं बढ़ा पायी। फिर भी आपकी रेलवे ठन-ठन गोपाल ही बनी रही, क्योंकि आप मूर्ख हैं! आपको राज करने नहीं आता! आपके राज में ऑक्सीजन बम बन जाता है, बग़ैर पटरी ट्रेन दौड़ती पायी जाती है और आपको हवा तक नहीं लगती!

क्योंकि आप तो पॉलिसी पैरालिसिस (फ़ैसले लेने में ढिलाई) से पीड़ित नहीं हैं! आपने तो 40 महीने में इतना काम करके दिखा दिया है जितना 70 साल में भी नहीं हुआ! इसीलिए आपकी रेलवे दलील देती है कि तेज़ बारिश की वजह से पुल पर जाम लग गया और हादसा हो गया। आपके पास रेलवे के उद्धार के लिए फंड नहीं है, लेकिन आप 3600 करोड़ रुपये की लागत से छत्रपति शिवाजी की मूर्ति लगवाने की लिए लालायित हैं! यही है, आपकी प्राथमिकता! इसके बारे में ही तो संघ प्रमुख मोहन भागवत कहते हैं कि ’70 साल में अब पहली बार महसूस हो रही है आज़ादी!’ भई वाह, ये मूर्खों के मुखिया यूँ ही नहीं हैं। इन्होंने तो बग़ैर बोले ही बता दिया कि बीते 40 महीने भी ग़ुलामी की यातनाओं से भरे हुए ही थे! बहरहाल, अब मुम्बई के जो 23 परिवार उजड़ गये हैं, उन्हें आप निर्माणाधीन शिवाजी स्मारक पर ही भीख माँगने के लिए बैठा दीजिएगा, क्योंकि आपके राज में तो फ़ाइलें, सुपरसोनिक (आवाज़ की गति से तेज़) रफ़्तार से दौड़ती हैं!

 

ओपिनियन

मोदी राज में लुप्त हुआ संसदीय संवाद

संसद में सार्थक चर्चा नहीं हो रही। प्रक्रिया और परम्परा दम तोड़ चुकी है। नौकरशाही भी दमघोटू हाल में है। लोकतंत्र की लौ फड़फड़ा रही है।

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Parliament of India
Indian Parliament Picture

देश पर विश्वास के संकट छाया है। संसद रूपी लोकतांत्रिक संस्था का तेज़ी से पतन हो रहा है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच होने वाला सार्थक संवाद नदारद है। विपक्ष का गला घोंटकर सियासी लाभ उठाने के क़ानून बनाये जा रहे हैं। विधेयकों को उन संसदीय समितियों की समीक्षा से बचाया जा रहा है, जो प्रस्तावित क़ानून को कारगर बनाने के लिए सभी पक्षों की राय को समायोजन करती हैं। झूठी वाहवाही बटोरने के लिए मंत्रीगण ग़लत आँकड़ों को परोसते हैं, क्योंकि उन्हें विशेषाधिकार हनन की परवाह नहीं है। अभी जो मंत्री संसद में गतिरोध से आहत होने की दलीलें देते हैं, वहीं जब विपक्ष में थे तो उनकी दलील होती थी कि गतिरोध भी संसदीय रणनीति का हिस्सा है। सरकार हमारे विरोध को भले ही ढोंग बताये, हमें श्रेय नहीं दे, लेकिन हम वही कर रहे हैं, जो हमारा दायित्व है। सरकार के ऐसे रवैये की वजह से ही संसद पर जनता का भरोसा न्यूनतम स्तर पर जा पहुँचा है।

वो दिन लद गये जब जजों के पास मुक़दमों के लिए इत्मिनान भरा वक़्त होता था। मुक़दमों का अम्बार है। न्यायतंत्र चरमरा चुका है। लेकिन कसूर जजों का नहीं है। न्यायालयों की गरिमा तार-तार हो चुकी है। अदालतों को बाहरी दख़ल से सुरक्षित होना चाहिए। लेकिन पूर्व प्रधान न्यायाधीश जैसे उच्च पद पर बैठे व्यक्ति पर ही ‘मास्टर ऑफ़ रोस्टर’ के अधिकार के दुरुपयोग का आरोप लगा। लेकिन कोई सच्चाई की तह तक नहीं जाना चाहता। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार उसके चार वरिष्ठतम जजों को अपने अन्तःकरण की आवाज़ का ख़ुलासा प्रेस कॉन्फ़्रेंस में करना पड़ा। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ख़तरे में है। अदालतों के बाहर घड़ल्ले से ऐसी हरक़तें हो रही हैं, जिससे न्यायिक फ़ैसलों को प्रभावित किया जा सके। न्यायिक फ़ैसलों में समानता वाली परम्परा को अनोखे तर्कों के सहारे ध्वस्त किया जा रहा है।

अदालतें बेहद उदारता से सील-बन्द लिफ़ाफ़ों में मिली सरकारी दलीलें स्वीकार कर रही हैं, ताकि दूसरे पक्ष उसे चुनौती भी नहीं दे सकें। ऐसी बोझिल प्रक्रिया से न्यायिक आदेश का प्रभावित होना लाज़िमी है। घपलों-घोटालों से जुड़े काग़ज़ातों पर कोर्ट ग़ौर तक नहीं कर रही। जज लोया मामले की कार्यवाही, राफ़ेल सौदे में जाँच को नकारना और सीबीआई निदेशक के तबादले से जुड़े प्रसंगों से साफ़ है कि देश को झकझोरने वाले मुद्दों के प्रति न्याय-तंत्र का रवैया भी सवालों के घेरे में है। दुहाई तो क़ानून की दी जाती है, लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मोर्चे पर सारे वादे पीछे छूट जाते हैं। अलग-अलग बेंच में संवैधानिक पीठ के जजों के फ़ैसले भी बदल जाते हैं। इसीलिए जनता के बढ़ते मोहभंग के प्रति न्यायपालिका को ख़ासतौर पर सचेत रहने की ज़रूरत है।

संसद में हासिल पूर्ण बहुमत का सही इस्तेमाल जटिल जनसमस्याओं को लोकतांत्रिक ढंग से निपटाने के लिए होना चाहिए। लेकिन ये तभी मुमकिन है, जब सबको साथ लेकर चलने की भावना से काम किया जाए। सरकार को सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का ज़रिया बनना चाहिए, लेकिन वो मतभेद के स्वरों को दबाने में जुटी हुई है। इन सन्दर्भों में देखें तो हमारी संस्थाओं पर भारी संकट गहराया हुआ है, कुछेक तो बन्धक बन चुकी हैं। कई संस्थाएँ तो सिर्फ़ आपने आकाओं की जी-हुज़ूरी कर रही हैं। सीबीआई, ईडी, एनआईए और सीबीडीटी यानी केन्द्रीय जाँच ब्यूरो, प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जाँच एजेंसी और केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड जैसी संस्थाओं से जुड़ा ताज़ा घटनाक्रम इन्हीं बातों का साबित करता है। ये संस्थाएँ आज क़ानून को सर्वोपरि बनाये रखने के लिए काम नहीं कर रहीं, बल्कि वो अक्सर इसे तबाह करती नज़र आती हैं। इसीलिए संस्थाओं में कलह बढ़ रहा है। वो शर्मसार हो रही हैं। जो पतन के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है, उसे निकाल बाहर किया जा रहा है। जिनका काम क़ानून को सर्वोपरि बनाना है, वो बौने साबित हो रहे हैं। यदि जाँच एजेंसियाँ दाग़दार होंगी तो अदालती फ़ैसले भी वैसे ही होंगे। पक्षपात और दुर्भावनापूर्ण जाँच से अन्याय और आक्रोश पैदा होता है। तब जनता सड़कों पर उतरने के लिए मज़बूर होती है।

नौकरशाही का दम घुट रहा है। निष्कलंक निष्ठा वाले अफ़सरों का सताया जा रहा है। क्योंकि उनके पुराने बॉस मौजूदा सत्ता की आँखों में खटक रहे हैं। इसने कार्यपालिका में उदासी भरी थकान भर दी है। चहेते अफ़सर अपने आकाओं के इशारों पर नाच रहे हैं। बाक़ी उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। प्रशासन इसी का नतीज़ा भुगत रहा है, योजनाओं में देरी हो रही है और आर्थिक विकास सुस्त पड़ा हुआ है। विकास दर में शिथिलता की वजह से स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे उन दो बुनियादी क्षेत्रों के लिए संसाधन नहीं जुटा पा रही, जो सामाजिक बदलाव के सबसे अहम तत्व हैं। हमने देखा है कि भ्रष्टाचार के आरोपी अफ़सरों का गुस्सा कैसे मासूम लोगों पर फूट रहा है! ऐसे वातावरण की वजह से अफ़सरों का सारा ज़ोर सत्ता के प्रति वफ़ादार रहने का बन जाता है, जबकि उनसे भय और पक्षपात से मुक्त रहकर काम करना चाहिए।

संचार क्रान्ति ने नये तरह के दमन को बढ़ाया है। झूठ और अफ़वाह के ज़रिये लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरा जा रहा है। ख़ासकर, इलेक्ट्रानिक मीडिया और काफ़ी हद्द तक प्रिंट मीडिया भी उन उद्योगों की मुट्ठी में है, जो अर्थव्यवस्था में भारी दबदबा रखते हैं। बड़े-बड़े मीडिया मालिक, सरकार की मदद से अपने कॉरपोरेट को चमकाने के लिए पत्रकारीय उसूलों से समझौता कर रहे हैं। मीडिया के ऐसे समझौते से लोकतंत्र का पतन निश्चित है।

चौतरफ़ा संकट वाले मौजूदा माहौल में उम्मीद की किरण सिर्फ़ यही है कि 2019 में भारत की जनता इसे पहचाने और इससे लोहा ले। सिर्फ़ जनता ही लोकतंत्र को बचा सकती है। वो चुनौतियों से कैसे निपटेगी, ये तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन यदि वो नहीं चेती तो लोकतंत्र की फड़फड़ाती लौ को असहिष्णुता की तेज़ हवाएँ बुझा देंगी।

(लेखक, राज्यसभा सांसद, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और वरिष्ठ काँग्रेस नेता हैं।)

(साभार:इंडियन एक्सप्रेस)

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तसलीमा नसरीन ने ‘बेशरम’ के हिंदी संस्करण का विमोचन किया

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taslima nasreen

नई दिल्ली, 12 जनवरी | बांग्लादेशी लेखिका और महिला अधिकार कार्यकर्ता तसलीमा नसरीन ने शनिवार को यहां नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में विवादास्पद ‘लज्जा’ उपन्यास की उत्तर कथा ‘बेशरम’ का विमोचन किया। उपन्यास ‘बेशरम’ का लोकार्पण राजकमल प्रकाशन के स्टाल जलसाघर में हुआ। इस मौके पर लेखिका अल्पना मिश्रा, हिमांशु बाजपेयी एवं राजकमल प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अशोक महेश्वरी मौजूद थे।

इस उपन्यास का बांग्ला भाषा से हिंदी में अनुवाद उत्पल बैनर्जी द्वारा किया गया है।

उपन्यास ‘लज्जा’ में हिन्दुओं को बांग्लादेश से कैसे सांप्रदायिक दंगों के कारण देश छोड़ना पड़ा, इसकी कहानी थी। वहीं ‘बेशरम’ उपन्यास के पात्र सुरंजन और माया, जो बांग्लादेश छोड़ने के बाद हिंदुस्तान आए और उन लोगों ने कैसे पराये देश में अपने जीवन यापन के लिए संघर्ष किया, उनकी कहानी है।

नसरीन ने कहा, “यह कोई राजनीतिक कहानी नहीं बल्कि एक सामाजिक कहानी है, जो उनकी जिंदगी, परिवार और संबंधों के बारे में है। मैं खुद को इस उपन्यास में देखती हूं क्योंकि किताब को लिखते वक्त मैं कोलकाता में रह रही थी।”

निर्वासन के बारे में अपना व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए तसलीमा ने माना कि जो लोग उस समय बांग्लादेश छोड़ कर भारत आए थे अगर वे चाहें तो वापस अपने देश जा सकते हैं लेकिन उनके पास वह मौका नहीं है।

उन्होंने कहा, ” ‘लज्जा’ लिखने के बाद मुझे बांग्लादेशी सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया। यहां आने वाले लोगों की तुलना में मेरी पीड़ा में अंतर है।”

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मौलाना आजाद के योगदान को महत्व मिलना चाहिए : निर्देशक

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Maulana Azad

कोलकाता, 12 जनवरी | फिल्म ‘वो जो था एक मसीहा-मौलाना आजाद’ के निर्देशक राजेंद्र संजय ने यहां फिल्म के ट्रेलर लांच के मौके पर कहा कि राष्ट्रीय नेता मौलाना आजाद के सभी समुदायों में एकता कायम रहने के दृष्टिकोण और देश के प्रति योगदान को और ज्यादा प्रमुखता के साथ रखा जाना चाहिए और ज्यादा महत्व मिलना चाहिए। फिल्म का ट्रेलर शुक्रवार को लांच हुआ। देशभर में यह 18 जनवरी को रिलीज हो रही है।

संजय ने कहा, “बहुत कम लोग उनके बचपन के दिनों के बारे में और योगदान के बारे में जानते हैं। रिसर्च के दौरान, मैंने पाया कि वह मुखर और निष्पक्ष थे। वह धर्म से प्रभावित नहीं हुए और मानवता के प्रति भावुक थे। उनके अनोखे व्यक्तित्व को और ज्यादा हाईलाइट किया जाना चाहिए। “

सेंसर बोर्ड ने फिल्म को बिना किसी कट के पास कर दिया है और इसे ‘यू’ सर्टिफिकेट दिया है।

–आईएएनएस

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