ब्लॉग

संघ-बीजेपी के ऐसे रवैये से तो भारतीय लोकतंत्र ही नहीं बचेगा…!

pm-modi

चुनावी जोड़-तोड़ और तिकड़मबाज़ी, लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। लोकतंत्र में मुख्य भूमिकाएँ निभाने वाले राजनेताओं से भी ये अपेक्षित है कि उनका व्यवहार हमेशा लोकलाज़ के दायर में रहे। लोकलाज़ में नियम-क़ायदा, क़ानून-परम्परा, रीति-रिवाज़ और नैतिकता सभी का समावेश होता है। जो जितने बड़े संवैधानिक पद पर होता है, उससे लोकलाज़ के उतने ही ऊँचे और गरिमावान आचरण की अपेक्षा होती है। लेकिन हमारे लोकतंत्र के लिए ये अतिशय दुर्भाग्यपूर्ण है कि गुजरात में राज्यसभा चुनाव में येन-केन-प्रकारेण क़ामयाबी पाने की हवस में बीजेपी के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने लोकलाज़ की धज़्ज़ियाँ उड़ा दीं। ये आचरण इसलिए भी बेहद अफ़सोसनाक हैं कि एक ओर तो ये भगवा ख़ानदान प्राचीन भारतीय मूल्य और सिद्धान्तों की पैरोकारी करते नहीं अघाता। दूसरी ओर, ये मर्यादाओं का मर्दन करने के किसी भी मौके पर सारे पिछले कीर्तिमानों को ध्वस्त कर देता है।

जगज़ाहिर है कि काँग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल, राज्यसभा का चुनाव हार जाएँ, इसके लिए बीजेपी ने धन-बल और सरकार के दुरुपयोग में कोई कसर नहीं छोड़ी। विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त, दलबदल और दग़ाबाज़ी को उकसाने वाले हथकंडों को कई बार राजनीति का हिस्सा बताया जा सकता है। अपने उम्मीदवार के जीतने और विरोधी के उम्मीदवार के हारने के दावे भी राजनीति का सहज अंग माना जाता है। लेकिन चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की गरिमा को तार-तार करना, उस पर बेज़ा दवाब डालना न सिर्फ़ अक्षम्य अपराध है, बल्कि लोकतंत्र-विरोधी हरक़त है। इसीलिए सर्वथा निन्दनीय है।

चुनाव के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी, पूर्व मुख्यमंत्री आनन्दीबेन पटेल और अपनी ही पार्टी के पीठ में छुरा भोंकने वाले शंकर सिंह वाघेला तथा उनके पिछलग्गू विधायकों का ये दावा तो राजनीतिक था कि अहमद पटेल चुनाव हार जाएँगे या नहीं जीतेंगे। लेकिन गाँधीनगर स्थित राज्य निर्वाचन आयोग और केन्द्रीय मंत्रियों अरुण जेटली, रवि शंकर प्रसाद, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमन, मुख़्तार अब्बास नक़वी और धर्मेन्द्र प्रधान जैसों के तेवर और बयानबाज़ियाँ पूरी तरह से नागवार थे। इसने लोकलाज़ के चीरहरण में कोई कोर-क़सर नहीं छोड़ी। इन सभी ने ऐसी-ऐसी दलीलें और बयान दिये जिससे उनके पदों की गरिमा ज़मींदोज़ हो गयी, क्योंकि ये सभी अहमद पटेल को हराने के लिए पहले तो चुनाव प्रक्रिया को ठेंगा दिखाते हैं और फिर जब इनकी घिनौनी क़रतूतों की पोल खुल जाती है तो सारी बेशर्मी दिखाते हुए चुनाव आयोग पर ही ग़लत चुनाव प्रक्रिया को सही ठहराने के लिए दबाव डालने लगते हैं।

सीधा सा नियम था कि राज्यसभा चुनाव में वोट डालते वक़्त कोई भी विधायक, अपना वोट अपनी पार्टी के ऐजेंट के अलावा किसी और को नहीं दिखा सकता। और, यदि ऐसा किया जाता है तो विधायक का वोट रद्द हो जाएगा। ग़नीमत है कि तकनीक के मौजूदा दौर में चुनाव आयोग की हिदायत के मुताबिक़, पूरी प्रक्रिया कैमरों में क़ैद हो रही थी। वर्ना, बीजेपी ने जैसी तैयारियाँ की थीं, उसके बाद तो अहमद पटेल सारी ताक़त होने के बावजूद चुनाव नहीं जीत पाते।

सबसे पहले तो गाँधीनगर विधानसभा में बनाये गये पोलिंग बूथ के पीठासीन अधिकारी का व्यवहार पूरी तरह से बीजेपी के प्रति पक्षपातपूर्ण था। पीठासीन अधिकारी को काँग्रेस के दो बाग़ी विधायकों के वोट को बैलेट बॉक्स में डालने से पहले ही रद्द कर देना चाहिए था, क्योंकि उन्होंने अपने मत वाले मतपत्र को उन लोगों को दिखाया था, जो विरोधी ख़ेमे के थे और जिन्हें दिखाना वर्जित था। इसके नतीज़े के रूप में विधायकों का वोट रद्द हो जाता। हालाँकि, दो विधायकों के मामलों में इस नियम का उल्लंघन होने से उनका मत अन्ततः चुनाव आयोग के आदेश से रद्द हो गया।

यदि पीठासीन अधिकारी ने सत्यनिष्ठा से काम किया होता तो सारे झगड़े के दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन तक आने की नौबत ही नहीं आती। काँग्रेस और बीजेपी के नेताओं को मुख्य चुनाव आयुक्त के पास बारम्बार जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

लेकिन दूसरी ओर, इससे भी अधिक अफ़सोसनाक़ ये रहा कि दिल्ली में चुनाव आयोग पर दबाव डालने के लिए मोदी सरकार और बीजेपी ने अपने आधा दर्जन केन्द्रीय मंत्रियों की फ़ौज को झोंक दिया। अब ज़रा इन बदनीयत मंत्रियों की दलील पर ग़ौर कीजिए। इनका कहना था कि काँग्रेस के ख़रीदे जा चुके बाग़ी विधायकों ने मतदान के वक़्त कोई ग़लती नहीं की, काँग्रेस की शिकायत झूठी और बौख़लाहट से प्रेरित है, जब बैलेट को बैलेट बॉक्स में डाल दिया गया है तो मतदान को वैध माना जाए, बैलेट बॉक्स में डाले जा चुके बैलेट के बारे में कैसे पता चलेगा कि वो किसका है? लिहाज़ा, उसे वैध मान लिया जाए। यानी, चोरी तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी।

मुमकिन है कि कुछ तर्कों के लिहाज़ से चुनाव से जुड़ी ये तमाम बातें मुनासिब ठहरायी जा सकें। लेकिन इस तरह की ओछी हरक़तों को यदि सरकार के वो मंत्री करने लगेंगे जो संविधान की शपथ से भी बँधे हों तो पानी सिर के ऊपर से निकल जाता है। इसे बग़ैर किसी लाग-लपेट के संविधान और लोकतंत्र की हत्या के रूप में देखा जा सकता है। यही लोकलाज़ का चीरहरण भी है।

दरअसल, देश का ये सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि बीजेपी को फ़िलहाल लोकतंत्र की हत्या की लत लग गयी है। नरभक्षी शेर की तरह वो लोकतंत्र-भक्षी बन चुकी है। बीजेपी ने अभी-अभी बिहार में भी यही किया। 2015 में बिहार की जनता ने उसे विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया था। लेकिन उसने पूरी की पूरी पार्टी का दलबदल करवाकर सत्ता की मलाई ख़ाने का अपवित्र और अलोकतांत्रिक रास्ता अख़्तियार किया। बीजेपी ने यही काम गोवा, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी किया। संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग से पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी बीजेपी की ऐसी हरक़तों पर गम्भीर टिप्पणियाँ की थीं। लेकिन लोकतंत्र-भक्षियों का रवैया टस से मस नहीं हो रहा। उल्टा राजनीतिक अखाड़ों में बीजेपी दिनों-दिन और हिंसक होती जा रही है। भारतीय लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा अपशगुन और कुछ नहीं हो सकता।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular

To Top