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संघ-बीजेपी के ऐसे रवैये से तो भारतीय लोकतंत्र ही नहीं बचेगा…!

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चुनावी जोड़-तोड़ और तिकड़मबाज़ी, लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा हैं। लोकतंत्र में मुख्य भूमिकाएँ निभाने वाले राजनेताओं से भी ये अपेक्षित है कि उनका व्यवहार हमेशा लोकलाज़ के दायर में रहे। लोकलाज़ में नियम-क़ायदा, क़ानून-परम्परा, रीति-रिवाज़ और नैतिकता सभी का समावेश होता है। जो जितने बड़े संवैधानिक पद पर होता है, उससे लोकलाज़ के उतने ही ऊँचे और गरिमावान आचरण की अपेक्षा होती है। लेकिन हमारे लोकतंत्र के लिए ये अतिशय दुर्भाग्यपूर्ण है कि गुजरात में राज्यसभा चुनाव में येन-केन-प्रकारेण क़ामयाबी पाने की हवस में बीजेपी के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने लोकलाज़ की धज़्ज़ियाँ उड़ा दीं। ये आचरण इसलिए भी बेहद अफ़सोसनाक हैं कि एक ओर तो ये भगवा ख़ानदान प्राचीन भारतीय मूल्य और सिद्धान्तों की पैरोकारी करते नहीं अघाता। दूसरी ओर, ये मर्यादाओं का मर्दन करने के किसी भी मौके पर सारे पिछले कीर्तिमानों को ध्वस्त कर देता है।

जगज़ाहिर है कि काँग्रेस के वरिष्ठ नेता अहमद पटेल, राज्यसभा का चुनाव हार जाएँ, इसके लिए बीजेपी ने धन-बल और सरकार के दुरुपयोग में कोई कसर नहीं छोड़ी। विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त, दलबदल और दग़ाबाज़ी को उकसाने वाले हथकंडों को कई बार राजनीति का हिस्सा बताया जा सकता है। अपने उम्मीदवार के जीतने और विरोधी के उम्मीदवार के हारने के दावे भी राजनीति का सहज अंग माना जाता है। लेकिन चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की गरिमा को तार-तार करना, उस पर बेज़ा दवाब डालना न सिर्फ़ अक्षम्य अपराध है, बल्कि लोकतंत्र-विरोधी हरक़त है। इसीलिए सर्वथा निन्दनीय है।

चुनाव के दौरान गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपानी, पूर्व मुख्यमंत्री आनन्दीबेन पटेल और अपनी ही पार्टी के पीठ में छुरा भोंकने वाले शंकर सिंह वाघेला तथा उनके पिछलग्गू विधायकों का ये दावा तो राजनीतिक था कि अहमद पटेल चुनाव हार जाएँगे या नहीं जीतेंगे। लेकिन गाँधीनगर स्थित राज्य निर्वाचन आयोग और केन्द्रीय मंत्रियों अरुण जेटली, रवि शंकर प्रसाद, पीयूष गोयल, निर्मला सीतारमन, मुख़्तार अब्बास नक़वी और धर्मेन्द्र प्रधान जैसों के तेवर और बयानबाज़ियाँ पूरी तरह से नागवार थे। इसने लोकलाज़ के चीरहरण में कोई कोर-क़सर नहीं छोड़ी। इन सभी ने ऐसी-ऐसी दलीलें और बयान दिये जिससे उनके पदों की गरिमा ज़मींदोज़ हो गयी, क्योंकि ये सभी अहमद पटेल को हराने के लिए पहले तो चुनाव प्रक्रिया को ठेंगा दिखाते हैं और फिर जब इनकी घिनौनी क़रतूतों की पोल खुल जाती है तो सारी बेशर्मी दिखाते हुए चुनाव आयोग पर ही ग़लत चुनाव प्रक्रिया को सही ठहराने के लिए दबाव डालने लगते हैं।

सीधा सा नियम था कि राज्यसभा चुनाव में वोट डालते वक़्त कोई भी विधायक, अपना वोट अपनी पार्टी के ऐजेंट के अलावा किसी और को नहीं दिखा सकता। और, यदि ऐसा किया जाता है तो विधायक का वोट रद्द हो जाएगा। ग़नीमत है कि तकनीक के मौजूदा दौर में चुनाव आयोग की हिदायत के मुताबिक़, पूरी प्रक्रिया कैमरों में क़ैद हो रही थी। वर्ना, बीजेपी ने जैसी तैयारियाँ की थीं, उसके बाद तो अहमद पटेल सारी ताक़त होने के बावजूद चुनाव नहीं जीत पाते।

सबसे पहले तो गाँधीनगर विधानसभा में बनाये गये पोलिंग बूथ के पीठासीन अधिकारी का व्यवहार पूरी तरह से बीजेपी के प्रति पक्षपातपूर्ण था। पीठासीन अधिकारी को काँग्रेस के दो बाग़ी विधायकों के वोट को बैलेट बॉक्स में डालने से पहले ही रद्द कर देना चाहिए था, क्योंकि उन्होंने अपने मत वाले मतपत्र को उन लोगों को दिखाया था, जो विरोधी ख़ेमे के थे और जिन्हें दिखाना वर्जित था। इसके नतीज़े के रूप में विधायकों का वोट रद्द हो जाता। हालाँकि, दो विधायकों के मामलों में इस नियम का उल्लंघन होने से उनका मत अन्ततः चुनाव आयोग के आदेश से रद्द हो गया।

यदि पीठासीन अधिकारी ने सत्यनिष्ठा से काम किया होता तो सारे झगड़े के दिल्ली स्थित निर्वाचन सदन तक आने की नौबत ही नहीं आती। काँग्रेस और बीजेपी के नेताओं को मुख्य चुनाव आयुक्त के पास बारम्बार जाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

लेकिन दूसरी ओर, इससे भी अधिक अफ़सोसनाक़ ये रहा कि दिल्ली में चुनाव आयोग पर दबाव डालने के लिए मोदी सरकार और बीजेपी ने अपने आधा दर्जन केन्द्रीय मंत्रियों की फ़ौज को झोंक दिया। अब ज़रा इन बदनीयत मंत्रियों की दलील पर ग़ौर कीजिए। इनका कहना था कि काँग्रेस के ख़रीदे जा चुके बाग़ी विधायकों ने मतदान के वक़्त कोई ग़लती नहीं की, काँग्रेस की शिकायत झूठी और बौख़लाहट से प्रेरित है, जब बैलेट को बैलेट बॉक्स में डाल दिया गया है तो मतदान को वैध माना जाए, बैलेट बॉक्स में डाले जा चुके बैलेट के बारे में कैसे पता चलेगा कि वो किसका है? लिहाज़ा, उसे वैध मान लिया जाए। यानी, चोरी तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी।

मुमकिन है कि कुछ तर्कों के लिहाज़ से चुनाव से जुड़ी ये तमाम बातें मुनासिब ठहरायी जा सकें। लेकिन इस तरह की ओछी हरक़तों को यदि सरकार के वो मंत्री करने लगेंगे जो संविधान की शपथ से भी बँधे हों तो पानी सिर के ऊपर से निकल जाता है। इसे बग़ैर किसी लाग-लपेट के संविधान और लोकतंत्र की हत्या के रूप में देखा जा सकता है। यही लोकलाज़ का चीरहरण भी है।

दरअसल, देश का ये सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि बीजेपी को फ़िलहाल लोकतंत्र की हत्या की लत लग गयी है। नरभक्षी शेर की तरह वो लोकतंत्र-भक्षी बन चुकी है। बीजेपी ने अभी-अभी बिहार में भी यही किया। 2015 में बिहार की जनता ने उसे विपक्ष में बैठने का जनादेश दिया था। लेकिन उसने पूरी की पूरी पार्टी का दलबदल करवाकर सत्ता की मलाई ख़ाने का अपवित्र और अलोकतांत्रिक रास्ता अख़्तियार किया। बीजेपी ने यही काम गोवा, मणिपुर, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड में भी किया। संवैधानिक संस्था चुनाव आयोग से पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी बीजेपी की ऐसी हरक़तों पर गम्भीर टिप्पणियाँ की थीं। लेकिन लोकतंत्र-भक्षियों का रवैया टस से मस नहीं हो रहा। उल्टा राजनीतिक अखाड़ों में बीजेपी दिनों-दिन और हिंसक होती जा रही है। भारतीय लोकतंत्र के लिए इससे बड़ा अपशगुन और कुछ नहीं हो सकता।

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कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

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कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

Image result for स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह

Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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लोकतांत्रिक देश में पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड!

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Indian Politics

इसमें कोई शक नहीं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, जिस पर गर्व भी है। सच्चाई भी है कि सरकार केंद्र या राज्य कहीं भी हो, पार्टियों के अंदर का लोकतंत्र दूर-दूर तक गायब है। विडंबना, कुटिलता या एकाधिकारवादी प्रवृत्ति, कुछ भी कहें, भारत में शुरू से ही राजनीतिक पार्टियां व्यक्ति के आसरे या प्रभाव से ही प्रभावित रही हैं।

फिलहाल ‘आप’ में भी इसी बात को लेकर घमासान मचा है, तो नया क्या है? रिवाज सरीखे तमाम पार्टियां ‘आम’ आदमी से ‘खास’ बन जाती हैं। गर्व कीजिए कि सरकारें तो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई होती हैं! ऐसे में ‘आप’ पर ही तोहमत क्यों?

दरअसल, राजनीति शह-मात का खेल है। नकेल जिसके हाथ है, पार्टी उसके नाम है। पुराने दौर से अब तक कमोवेश यही सिलसिला जारी है। ऐसी विविधता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, यानी भारत में ही दिखती है। खुश होइए कि लोकतंत्र जिंदाबाद है।

अहम यह कि पार्टियों के भीतर लोकतंत्र रहा ही कब? गांधीजी ने कांग्रेस के लिए देशभर में सदस्य बनाए। जिले तक को तवज्जो दी। सम्मेलनों में अध्यक्ष चुनने की शुरुआत हुई। लेकिन तब भी गांधीजी की पसंद खास होती थी। वर्ष 1937 को देखिए, पहला चर्चित चुनाव हुआ, तब सरदार पटेल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे, लेकिन उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से केंद्रीकृत रहा। कुछ लोकतंत्र बचा रहा, जिसे बाद में इंदिराजी ने खत्म कर दिया। अब अमूमन सारी पार्टियां यही व्यवहार कर रही हैं। एक-एक सीट आलाकमान से तय होती है।

प्रदेश, जिला, नगर, यहां तक कि वार्ड की अहमियत नकारा है। सुप्रीमो पद्धति जन्मी और पार्टियां एक तरह से प्राइवेट लिमिटेड बनती चली गईं। राजनैतिक अनुभव या समाजसेवा से इतर फिल्मी स्टारों ने भी बहती गंगा में गोते लगाए। दर्जनों स्टार देखते-देखते बड़े नेता बन गए, वहीं कई मुख्यमंत्री तक हुए। भला रिटायर्ड या इस्तीफा दिए नौकरशाह या सैन्य अधिकारी क्यों पीछे रहते? भारत की राजनीति सरकारी पदों की अहमियत को भुनाने का मौका जो देती है।

अभी तो आम आदमी पार्टी की बात है, धारा का रुख देख भ्रष्टाचार विरोधी गोते लगाए गए। समाज-सेवक से लेकर नौकरशाह, कवि से लेकर पत्रकार, सभी ने बहती बयार को समझा और एक आंदोलन उपजाया। भारतीय इतिहास में जितनी तेजी से इस पार्टी ने झंडा गाड़ा, यकीनन जात-पात, अगड़े-पिछड़े और फिल्मी लोकप्रियता के नाम की राजनीति भी पीछे हो गई।

आम आदमी की पार्टी कहां से चली और धीरे-धीरे कहां पहुंच गई, सबको दिख रहा है। जब बारी लोकतंत्र में आहूति देने की आई, तो उच्च सदन के खास यजमान एकाएक अवतरित हुए! कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र में मतदाता केवल एक वोट बनकर रह गया है, जिसकी अहमियत चंद सेकेंड में बटन दबाने से ज्यादा कुछ नहीं। बाद में उसकी क्या पूछ परख है, खुली किताब है।

दूसरी पार्टियां ‘आप’ के घमासान पर विलाप करें या प्रलाप, लेकिन जब बात उनकी होती है तो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं अघाते। पार्टी कुछ नहीं होती, होते हैं उनको चलाने वाले ही बलशाली और महारथी।

अब मोदी-शाह के कमल की बहार हो, राहुल की कांग्रेस का हाथ हो, केजरीवाल के आप की झाड़ू, अखिलेश-मुलायम की साइकिल, मायावती का हाथी, ममता के दो फूल, लालू का लालटेन, उद्धव का तीर कमान, राज ठाकरे का रेल इंजन, अभिनेत्री जयललिता के बाद पनीर सेल्वम-पलनीस्वामी की दो पत्तियां, करुणानिधि का उगता सूरज, शरद पवार की घड़ी, बीजू जनता दल का शंख, कभी जॉर्ज फर्नांडीज तो अब नीतीश के जद (यू) का तीर, अभिनेता एनटी रामाराव के बाद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी की साइिकल। हाल-फिलहाल रजनीकांत की दहाड़। इनके अलावा देश में न जाने कितने क्षत्रप और उनकी पार्टियां हैं, सच्चाई सबको पता है।

दलों का दलदल हो या हमाम, बस नजर का पर्दा ही है, जिसमें सब कुछ दिखकर भी कुछ नहीं दिखता। यही भारतीय लोकतंत्र है। अब इसे खूबी कहें या दाग, पार्टी तो चलाते हैं केवल सरताज। ऐसे में आम आदमी की क्या हैसियत? जो अंदर है, वह बाहर दिखता जरूर है। अब इस पर चीत्कार करें या आर्तनाद, कोई फर्क नहीं पड़ता।

कहने को कुछ भी कह लें, लेकिन हकीकत यही है कि कम से कम भारतीय राजनीति की यही सुंदरता है, उसका कलेवर हाड़-मांस का तो नहीं, कांच का भी नहीं, लेकिन फिर भी इतना कुछ पारदर्शी है कि सब कुछ दिखता है। इसे मत-मतांतर का फेर, सपनों की सौदागीरी, शब्दों की बाजीगरी कुछ भी कह लें।

लेकिन जानते, देखते और समझते हुए भी दलदल में हर बार हमारा वोट गोता खाकर रह जाता है और हम कहते हैं कि ‘अबकी बार हमारी सरकार।’ इतना कहना ही क्या कम है? तो आइए, एक बार फिर से कहें ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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