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लोकतंत्र में ‘धर्म की राजनीति’ को ‘राजनीति का धर्म’ से अलग रहना ज़रूरी

kapil sibal

सदियों से सामाजिक सुधार की प्रक्रिया बहुत धीमी और कष्टकारी रही है। 500 साल पहले मार्टिन लूथर किंग ने कैथोलिक चर्च में सुधार लाने की कोशिश की थी। फिर भी चर्च में मतभेद बने ही रहे। इसने 30 वर्षीय धार्मिक युद्ध को भी जन्म दिया। कालान्तर में भी कैथोलिक (रूढ़िवादी) और प्रोटेस्टेंट्स (सुधारवादी) के बीच समानता को विकसित करना मुश्किल ही बना रहा। इसी तरह से शिया और सुन्नी के बीच पनपे मतभेद ने देशों को बाँट डाला। ये ऐसी मिसाल हैं जहाँ राजनीतिक सत्ता ने धार्मिक सुधार लाने की अगुवाई की और इससे समाज बुरी तरह से विभाजित हो गया। इसीलिए लोकतंत्र में ‘धर्म की राजनीति’ को ‘राजनीति का धर्म’ से अलग रहना ज़रूरी है।

सुधारवादी चिन्तन को समुदाय के भीतर से उभरना चाहिए और सामुदायिक तौर पर ही इसे बढ़ावा दिया जाना चाहिए। लोगों को अपने समुदाय पर दबाव बनाना चाहिए कि वो घृणित परम्पराओं का ख़त्म करे। सती-प्रथा ऐसे ही ख़त्म हुई थी। विधवा विवाह को ऐसे ही सामाजिक मान्यता मिली। पति की ओर से पत्नी को एक ही झटके में ‘तलाक़-तलाक़-तलाक़’ कहकर (तलाक़-ए-बिद्दत) निकाह को ख़त्म करने की प्रथा को भारतीय मुसलमान भी घृणित ही मानते हैं। इसीलिए ये प्रथा दिनों-दिन कमज़ोर पड़ रही है।

मुसलमानों के बीच होने वाले कुल तलाक़ के मामलों में ‘फ़ौरी तलाक़’ के इस तरीक़े के ज़रिये महज 0.44 फ़ीसदी तलाक़ ही होता है। सुप्रीम कोर्ट के दो न्यायमूर्तियों आरएफ नरीमन और यूयू ललित ने कहा है कि ‘फ़ौरी तलाक़’ का रिवाज़ संविधान के अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) का उल्लघंन है। लिहाज़ा, असंवैधानिक है। जस्टिस कुरियन जोसेफ़ की राय है कि ‘फ़ौरी तलाक़’ को क़ुरान की मान्यता नहीं हासिल है। इसीलिए इस्लामी विद्वानों ने इसे ‘पाप’ की संज्ञा दी है। उन्होंने कहा कि जो पाप है, वो न्यायपूर्ण नहीं हो सकता। जबकि प्रधान न्यायमूर्ति जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नज़ीर की राय थी कि ‘फ़ौरी तलाक़’, पर्सनल लॉ का अंग है। लिहाज़ा, संसद को इसे ख़त्म करने का क़ानून बनाना चाहिए।

इसके बावजूद, संविधान के अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ‘फ़ौरी तलाक़’ के रिवाज़ पर छह महीने के लिए रोक लगा दी। इस दरम्यान संसद को ज़रूरी क़ानून उपाय करने का आदेश दिया। बेशक़, जस्टिस खेहर और जस्टिस नज़ीर का फ़ैसला अल्पमत में रहा। यानी संविधान पीठ के पाँचों जजों के बीच ‘फ़ौरी तलाक़’ को मुनासिब मानने पर सहमति नहीं बनी।

असली समस्या ये है कि सरकार सभी तरह के तलाक़ को एक ही नज़र से देखना चाहती है। सरकार ने बहुपत्नी की प्रथा पर भी हमला किया है। लेकिन जजों ने बहुमत से कहा कि पर्सनल लॉ को संवैधानिक मान्यता हासिल है। जस्टिल कुरियन जोसेफ़ के इस नज़रिये से जस्टिस खेहर और जस्टिस नज़ीर ने सहमति जतायी कि संविधान हर व्यक्ति को अपने धर्म को स्वतंत्रपूर्वक अपनाने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। लिहाज़ा, किसी मूल अधिकार के उल्लंघन की आड़ में मुस्लिम पर्सनल लॉ को चुनौती नहीं दी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत से फ़ैसला दिया कि राजनीतिक सत्ता और अदालती आदेशों के ज़रिये इस्लाम की उन प्रथाओं को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता, जो इस्लाम का अभिन्न अंग हैं। इस प्रसंग में केन्द्र सरकार का रवैया सुधार की आड़ में एक धर्म विशेष के पर्सनल लॉ को निशाना बनाने का था। जबकि ज़रूरत सुधारों पर एक व्यापक नज़रिया अपनाने की है। किसी भी समुदाय में मौजूद कुरीतियों को ख़त्म करने के लिए उसी समुदाय को पहल करनी चाहिए। इसे अदालती लड़ाई का हिस्सा बनाने से परहेज़ किया जाना चाहिए, क्योंकि अदालती जंग के नतीज़े बेहद गम्भीर होते हैं। इससे समुदाय में ये धारणा पनपती है कि अदालतें उनके मामलों में दख़ल दे रही हैं। अदालतों को भी अपवादजनक परिस्थितियों के सिवाय ऐसे मामले से परहेज़ करना चाहिए। क़ानून बनाना संसद का कर्त्तव्य है और इसे वहीं बनाया जाना चाहिए। वर्ना, समाज में तरह-तरह के मतभेद पनपते रहेंगे।

यदि राजनीतिक सत्ता का लक्ष्य अलग-अलग धार्मिक समुदायों में व्याप्त कुरीतियों को दूर कर सुधारवादी उपायों को बढ़ावा देना ही है तो उसे हिन्दू समाज में फैली तमाम कुरीतियों पर भी वैसे ही हमला करना चाहिए, जैसा वो अन्य धर्मावलम्बियों के मामले में करना चाहती है। लेकिन वोट-बैंक की राजनीति के आगे सरकार कोई जोख़िम नहीं लेना चाहती। हिन्दू परिवारों में भी माँ-बाप स्वअर्जित सम्पत्तियों की वसीयत को सिर्फ़ अपने पुरुष वारिसों में क्यों बाँटते हैं? हिन्दुओं के बीच भी सांकेतिक विवाह और तलाक़ का रिवाज़ मौजूद है। इसे हिन्दू रीति की मान्यता हासिल है। लेकिन इसे कभी संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन नहीं माना गया। उत्तर पूर्वी राज्यों के कई रिवाज़ों को भी संवैधानिक संरक्षण हासिल है।

बेशक़, सुधार ज़रूरी हैं। जिन समुदायों में सुधार नहीं आता, वो ज़्यादा वक़्त तक क़ायम नहीं रहते। मौजूदा समाज में महिलाओं को बराबरी का हक़ देकर ही हम देश को आगे बढ़ा सकते हैं। जबकि समाज के हर समुदाय में पिता की सत्ता को श्रेष्ठता हासिल है। महिलाओं के साथ भेदभाव की असली वजह यही है। हर समुदाय को इसे ख़त्म करने के लिए और महिलाओं को बराबरी का दर्ज़ा देने के लिए आगे आना होगा। हर स्तर पर महिलाओं को बराबरी की साझेदारी देनी होगी। फिर चाहे वो शिक्षा का क्षेत्र हो या आर्थिक आत्मनिर्भरता का। हमें अपनी संस्कृति में बदलाव लाने की मानसिकता विकसित करनी होगी। लेकिन हरेक मतभेद को अदालती तरीक़ों से सुलझाने की प्रवृति से समाज और विभाजित होगा। हमें महिलाओं को साथ लेकर पितृसत्तात्मक व्यवस्था को ध्वस्त करना होगा।

(साभार: डीएनए में प्रकाशित लेख का हिन्दी अनुवाद। लेखक राज्यसभा सदस्य और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं।)

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