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रोजगार के नाम पर सपने बेचे जा रहे हैं : प्रदर्शनकारी छात्र

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SSC-Protest-

‘वी वॉन्ट जस्टिस’ और ‘एसएससी हाय हाय’ के नारे लगाते और अपना भविष्य बचाने की पिछले 13 दिनों से गुहार लगाते छात्र, यह नजारा है कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों का। परीक्षा में धांधली को लेकर सीबीआई जांच की मांग कर रहे छात्रों का कहना है कि एसएससी की कार्यप्रणाली को लेकर छात्रों में लंबे समय से रोष था लेकिन इस घटना ने सब्र का बांध तोड़ दिया है।

प्रदर्शन कर रहे छात्रों ने रविवार को एसएससी की तेरहवीं मनाई और सरकार को कोरे आश्वासन नहीं देने की सलाह दी। यकीनन, छात्रों का इशारा गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सीबीआई जांच के आदेश देने के बयान के संदर्भ में था। छात्रों ने कहा कि रोजगार के नाम पर हमें सपने बेचे जा रहे हैं।

बीते 13 दिनों से प्रदर्शन स्थल पर डटे प्रदर्शनकारी छात्र विपिन गौतम ने आईएएनएस को बताया, “जिस उद्देश्य से एसएससी का गठन हुआ था, वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है। आयोग के चेयरमैन इस साल 55,661 छात्रों को नौकरियां देने का दंभ भर रह रहे हैं लेकिन क्या गारंटी है कि नौकरियां पाने वाले छात्रों का चुनाव मेरिट के दम पर होगा।”

बिहार के मोतिहारी से प्रदर्शन में हिस्सा लेने आए हिमांशु शेखर ने कहा, “पिछले चार सालों से एसएससी की तैयारी कर रहा हूं। इन सालों में दिन के 16 से 17 घंटे परीक्षा की तैयारी में लगा रहा हूं। एसएससी पर जो विश्वास था वह टूट गया। ये हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ है।”

एसएससी के खिलाफ इन प्रदर्शनों में देशभर से छात्र हिस्सा लेने पहुंच रहे हैं, जो सरकार से अपना भविष्य बचाने की गुहार लगा रहे हैं।

हरियाणा से प्रदर्शन में हिस्सा लेने आए प्रकाश माथुर कहते हैं, “हमारी सिर्फ दो मांगे हैं। पहली कि पिछले एक साल के दौरान हुई परीक्षाओं की सीबीआई जांच कराई जाए और जांच पूरी होने तक सभी परीक्षाएं स्थगित हों। सरकार आंदोलन बंद करवाने के लिए कोरे आश्वासन नहीं दे।”

दरअसल, एसएससी में धांधली के मामले ने उस समय तूल पकड़ा, जब एसएससी सीजीएल की ऑनलाइन परीक्षा शुरू होने से पहले ही उसका प्रश्नपत्र ऑनलाइन लीक हो गया। इसके बाद परीक्षा पहले कुछ घंटे के लिए स्थगित और बाद में रद्द कर दी गई।

बीते 27 फरवरी से एसएससी कार्यालय के बाहर प्रदर्शन कर रहे छात्रों में बड़ी संख्या में महिला प्रदर्शनकारी भी हैं। मध्य प्रदेश के शिवपुरी की लता कौशिक जो बीते चार दिनों से इस प्रदर्शन का हिस्सा हैं, गुस्से भरे लहजे में कहती हैं, “रोजगार के नाम पर हमें सपने बेचे जा रहे हैं। सच्चाई यह है कि नौकरियां नहीं है और जो है, उन पर धांधली से नियुक्तियां की जा रही है और अगर आयोग किसी भी तरह की धांधली से इनकार करता है तो जवाब दे कि एक ही छात्र के 700 एडमिट कार्ड कैसे बने? परीक्षा शुरू होने से पहले लीक कैसे हो गया? छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ हो रहा है और सरकार चुप्पी साधे बैठी है। ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा सिर्फ जुमला बन गया है। प्रधानमंत्री मोदी की जिम्मेदारी है कि वह आगे आकर छात्रों को भरोसा दिलाएं।”

छात्र आयोग की लचर कार्यप्रणालियों से भी खफा हैं और इसमें दुरुस्ती की मांग कर रहे हैं। ऐसे ही एक छात्र हैं, आशीष शर्मा जो कहते हैं, “छात्रों में एसएससी की कार्यप्रणालियों को लेकर लंबे समय से रोष था और इस घटना ने छात्रों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। मैंने 2016 में परीक्षा दी, 2017 में चयन हो गया लेकिन अब मार्च 2018 आ गया है लेकिन अभी तक नियुक्ति पत्र तक नहीं मिला है। मैं अकेला नहीं हूं, मेरे जैसे हजारों बच्चे हैं जो परीक्षा पास तो कर लेते हैं लेकिन कई सालों तक उनकी नियुक्तियां लटकी रहती हैं।”

इस पूरे प्रकरण पर स्वराज इंडिया के प्रवक्ता अनुपम कहते हैं, “पैसे के बल पर लोगों को नौकरियां मिल रही हैं। सीटें बिकी हुई हैं। राजनीतिक शह के बिना इस तरह की धांधली मुमकिन नहीं है। हम एसएससी के भ्रष्टाचार और अन्याय के खिलाफ हैं और छात्रों के साथ खड़े हैं।”

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हिंदी ब्लॉग्स को हर महीने 3 करोड़ पेज व्यू : मॉमस्प्रेसो

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Hindi Blog

नई दिल्ली, 14 सितम्बर | भारत के महिलाओं के लिए सबसे बड़े यूजर-जनरेटेड कंटेंट प्लेटफार्म मॉमस्प्रेसो ने हिंदी दिवस (14 सितंबर) पर अपने 6,500 से ज्यादा ब्लॉगर्स के डेटा का विश्लेषण कर नई रिपोर्ट प्रस्तुत की है। विश्लेषण कहता है कि हिन्दी ब्लॉग्स ने हर महीने 3 करोड़ से ज्यादा पेज व्यू हासिल की है। इसमें से 95 प्रतिशत की खपत पाठकों ने मोबाइल पर की है।

प्लेटफार्म ने बताया कि हिंदी पेज व्यू अंग्रेजी से ज्यादा हो गए हैं और इस समय कुल पेज व्यू का 50 प्रतिशत हो गया है।

मॉमस्प्रेसो की ओर से जारी बयान में कहा गया कि प्लेटफार्म पर हिंदी में लेखन की सूची मुख्य रूप से उन शहरों की माताओं ने तैयार की है, जिनकी तुलनात्मक रूप से भागीदारी कम रही है। इनमें पटना, आगरा, लखनऊ, शिमला, भुवनेश्वर और इंदौर शामिल है। 75 प्रतिशत हिन्दी ब्लॉग्स को मॉमस्प्रेसो मोबाइल ऐप के जरिये लिखा गया है, जबकि अंग्रेजी में ऐसा नहीं है। 60 प्रतिशत ब्लॉगर्स अभी भी ब्लॉग लिखने के लिए डेस्कटॉप उपयोग करते हैं। मोबाइल ऐप पर बने हिन्दी ब्लॉग्स में से 93 प्रतिशत एंड्रायड फोन पर बने हैं। प्लेटफार्म पर इस समय 1,595 हिन्दी ब्लॉगर्स हैं, जिन्होंने अब तक 14,746 ब्लॉग्स बनाए हैं। हर महीने करीब 1,800 ब्लॉग्स जोड़े जा रहे हैं।

मॉमस्प्रेसो ने बताया कि हिन्दी की अधिकतम रीडरशिप लखनऊ, जयपुर, इंदौर, चंडीगढ़, आगरा और पटना से है। यह भी बताया गया कि 95 प्रतिशत यूजर्स ने लेखन का इस्तेमाल मोबाइल पर किया। जिस कंटेंट ने अधिकतम रीडरशिप (65 प्रतिशत) हासिल की, वह ‘मां की जिंदगी’ या ‘मॉम्स लाइफ’ सेक्शन था। रिलेशनशिप्स से लेकर पैरेंटिंग और सामाजिक उत्तरदायित्व तक का लेखन इस पर उपलब्ध है। अन्य लोकप्रिय सेक्शन में प्रेग्नेंसी, बेबी, हेल्थ और रैसिपी भी शामिल हैं।

हिंदी पोस्ट्स को अंग्रेजी की तुलना में 4.2 गुना ज्यादा एंगेजमेंट मिला। इसमें लाइक्स, शेयर और कमेंट्स शामिल हैं। हिन्दी में हाइपर एंगेजमेंट की एक बड़ी वजह हिन्दी कंटेंट की क्वालिटी है। पहली बार महिलाओं को कई मुद्दों पर अपने विचार अभिव्यक्त करने के लिए सुरक्षित स्थान मिला है। कई महिलाएं जो लैंगिंक भेदभाव, सामाजिक मुद्दों और अन्य वजहों से खुलकर बोल नहीं पाती थी, वह भी इस पर अपने आपको अभिव्यक्त कर रही है।

मॉमस्प्रेसो के सह-संस्थापक और सीईओ विशाल गुप्ता ने कहा, “हमारा विजन यह है कि अगले तीन वर्षो में हमारे प्लेटफॉर्म पर सभी माताओं में से 70 फीसदी को लेकर आना है और क्षेत्रीय भाषा लेखन इस लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण है। हमें गर्व है कि मॉमस्प्रेसो एक ऐसा मंच प्रदान कर रहा है जहां भारत भर की माताएं बिना डर के अपने विचार व्यक्त कर रही हैं। इन विषयों पर बहस और चर्चाओं को प्रोत्साहित करती हैं। पिछले 12 महीनों में हमारे ट्रैफिक चार गुना बढ़ा है और हिंदी की भूमिका इस विकास में महत्वपूर्ण रही है। इस समय हमारे पास चार अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में लेखन है और वर्ष के अंत से पहले हमारी योजना 3 और जोड़ने की है।

हिंदी भाषा लेखन का उपयोग करने वाले ब्रांड्स की संख्या 2017 के 6 फीसदी से बढ़कर 2018 में 27 फीसदी हो गई है। इसमें पैम्पर्स, डेटॉल, बेबी डव, नेस्ले, जॉनसन एंड जॉन्सन, एचपी, ट्रॉपिकाना एसेंशियल्स और क्वैकर जैसे ब्रांड शामिल हैं।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

जानिये क्यों गिर रहा है रुपया

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Rupee Fall

नई दिल्ली, 13 सितम्बर | केंद्र सरकार ने रुपये की गिरावट को थामने की हरसंभव कोशिश करने का भरोसा दिलाया है। इसका असर पिछले सत्र में तत्काल देखने को मिला कि डॉलर के मुकाबले रुपये में जबरदस्त रिकवरी देखने को मिली। हालांकि रुपये में और रिकवरी की अभी दरकार है।

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार को रिकॉर्ड 72.91 के स्तर तक लुढ़कने के बाद संभला और 72.19 रुपये प्रति डॉलर के मूल्य पर बंद हुआ। इससे पहले मंगलवार को 72.69 पर बंद हुआ था।

रुपये की गिरावट से अभिप्राय डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी आना है। सरल भाषा में कहें तो इस साल जनवरी में जहां एक डॉलर के लिए 63.64 रुपये देने होते थे वहां अब 72 रुपये देने होते हैं। इस तरह रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है।

शेष दुनिया के देशों से लेन-देन के लिए प्राय: डॉलर की जरूरत होती है ऐसे में डॉलर की मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर देशी मुद्रा कमजोर होती है।

एंजेल ब्रोकिंग के करेंसी एनालिस्ट अनुज गुप्ता ने रुपये में आई हालिया गिरावट पर कहा, “भारत को कच्चे तेल का आयात करने के लिए काफी डॉलर की जरूरत होती है और हाल में तेल की कीमतों में जोरदार तेजी आई है जिससे डॉलर की मांग बढ़ गई है। वहीं, विदेशी निवेशकों द्वारा निवेश में कटौती करने से देश से डॉलर का आउट फ्लो यानी बहिगार्मी प्रवाह बढ़ गया है। इससे डॉलर की आपूर्ति घट गई है।”

उन्होंने बताया कि आयात ज्यादा होने और निर्यात कम होने से चालू खाते का घाटा बढ़ गया है, जोकि रुपये की कमजोरी की बड़ी वजह है।

ताजा आंकड़ों के अनुसार, चालू खाते का घाटा तकरीबन 18 अरब डॉलर हो गया है। जुलाई में भारत का आयात बिल 43.79 अरब डॉलर और निर्यात 25.77 अरब डॉलर रहा।

वहीं, विदेशी मुद्रा का भंडार लगातार घटता जा रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार 31 अगस्त को समाप्त हुए सप्ताह को 1.19 अरब डॉलर घटकर 400.10 अरब डॉलर रह गया।

गुप्ता बताते हैं, “राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बनने से भी रुपये में कमजोरी आई है। आर्थिक विकास के आंकड़े कमजोर रहने की आशंकाओं का भी असर है कि देशी मुद्रा डॉलर के मुकाबले कमजोर हो रही है। जबकि विश्व व्यापार जंग के तनाव में दुनिया की कई उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले कमजोर हुई हैं।”

अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार मजबूती के संकेत मिल रहे हैं जिससे डॉलर दुनिया की प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले मजबूत हुआ है। अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती आने से विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से अपना पैसा निकाल कर ले जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संरक्षणवादी नीतियों और व्यापारिक हितों के टकराव के कारण अमेरिका और चीन के बीच पैदा हुई व्यापारिक जंग से वैश्विक व्यापार पर असर पड़ा है।

–आईएएनएस

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ब्लॉग

मोदी सरकार को बिना विचारे नयी नीतियाँ लागू करने की बीमारी है!

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kapil-sibal

काग़ज़ों पर कोई नीति भले ही शानदार लगे, लेकिन उसे सफलतापूर्वक लागू करना ही सबसे अहम है। युगान्कारकारी नीतियों का ऐलान करने से पहले ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लेना बेहद ज़रूरी है। एनडीए की विफलता की सबसे बड़ी वजह ही ये है कि वो नयी नीतियों को लागू करने से पहले उसके प्रभावों का आंकलन नहीं पाती है। नोटबन्दी, इसका सबसे जीता-जागता उदाहरण है। मोदी सरकार को इसका अन्दाज़ा ही नहीं था कि नोटबन्दी, देश के लिए विनाशकारी साबित होगा। इसी वजह से जीएसटी को घटिया ढंग से लागू किया गया और उससे भी फ़ायदे की जगह नुक़सान ही हाथ लगा।

दिवालिया और कंगाली क़ानून यानी इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी को मई 2016 में संसद ने पारित किया। मोदी सरकार ने इसे बहुत बड़े आर्थिक सुधार की तरह पेश किया और ख़ूब अपनी पीठ थपथपाई। इसका मक़सद बैंकों की बैलेंस शीट को साफ़-सुथरा करना, कॉरपोरेट को उनके पापों की सज़ा दिलाना, बैंकिंग प्रणाली में हेराफेरी करने वालों को दंडित करना और सबसे बढ़कर बैंकों के डूबे क़र्ज़ यानी एनपीए के लिए ज़िम्मेदार कम्पनियों पर कार्रवाई करना था।

12 फरवरी 2018 को रिज़र्व बैंक ने क़र्ज़ पुनर्निर्धारण यानी ‘लोन रिस्ट्रकचरिंग’ से जुड़ी आधा दर्जन योजनाओं को ख़त्म कर दिया। इसकी जगह नयी नीति सामने आयी जिसमें कॉरपोरेट्स को 180 दिनों के भीतर अपने बकाया क़र्ज़ों को चुकाने या फिर दिवालिया क़ानून यानी आईबीसी का सामना करने का बेहद सख़्त प्रावधान था। ज़मीनी हक़ीक़त का जायज़ा लिये गये बनी इस नीति का नतीज़ा ये निकला कि सुप्रीम कोर्ट ने रिज़र्व बैंक के 12 फरवरी वाले फ़रमान पर रोक लगा ही। लिहाज़ा, दिवालिया क़ानून को लागू करने की क़वायद बैंकों को रोक देनी पड़ी।

तब तक आईबीसी के मामलों के निपटारे के लिए दिवालियेपन से निपटने वाली तीन पेशेवर कम्पनियों के ज़रिये 1300 कर्मचारियों की भर्ती हो चुकी थी। नैशनल कम्पनी लॉ ट्राइबुनल (एनसीएलटी) की शाखाओं में कॉरपोरेट्स के ख़िलाफ़ 525 मामले भी दर्ज़ हो गये। 108 मामलों में कम्पनियाँ स्वेच्छा से दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए आगे आ गयीं। इनमें स्टील, निर्माण और खदान से जुड़ी ऐसी कम्पनियाँ हैं, जिन पर बैंकों के 1,28,810 करोड़ रुपये बकाया है। इतनी बड़ी तादाद के बावजूद, 2014 से अभी महज कुछ ही मामलों में आईबीसी के तहत कार्रवाई आगे बढ़ी।

आईबीसी के तहत अगस्त और दिसम्बर 2017 के दौरान जिन 10 शुरुआती मामलों का निपटारा हुआ उसमें भी बैंकों को उनके कुल बकाये का सिर्फ़ 33.53 फ़ीसदी रक़म ही मिल पायी। 13 जून 2017 को रिज़र्व बैंक ने 12 बड़े बकायेदारों की पहचान दिवालियेपन की कार्रवाई के लिए की। एक साल बीतने के बावजूद, इन 12 कम्पनियों में से भूषण स्टील और इलेक्ट्रो स्टील के अलावा अन्य किसी का निपटारा नहीं हुआ।

12 बड़े क़र्ज़दारों का 3,12,947 करोड़ रुपये का दावा मंज़ूर हुआ था। लगता नहीं है कि आईबीसी की नीति के मुताबिक़, इतनी रक़म कभी वसूल हो पाएगी। ऐसे मामलों में 180 दिनों की निर्धारित अवधि के ख़त्म होने के बाद बाक़ी वक़्त मुक़दमेबाज़ी में खर्च हो रहा है। ऐसे मामलों से सिर्फ़ वकीलों और दिवालियापन की कार्रवाई से जुड़े पेशेवर लोगों को फ़ायदा हो रहा है।

बिजली क्षेत्र में 34 बीमार कम्पनियों पर 1.5 लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। बैंकों की चिन्ता है कि दिवालियेपन की कार्रवाई के ख़त्म होते-होते इन कम्पनियों की सम्पत्ति का दाम और घट जाएगा। रिज़र्व बैंक ने बैंकों को सख़्त हिदायत दी है कि यदि उसके 12 फरवरी वाले फ़रमान को सख़्ती से लागू नहीं किया गया तो उन्हें गम्भीर नतीज़े भुगतने होंगे। यही वजह है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को हिदायत दी है कि वो रिज़र्व बैंक से बात करके आईबीसी के प्रावधानों पर राहत देने का पता लगाये, वर्ना आशंका है कि दिवालियेपन की कार्रवाई में बैंकों का 85 फ़ीसदी बकाया डूब जाएगा।

आईबीसी से जुड़ी पूरी तस्वीर का स्याह पहलू ये है कि कॉरपोरेट सेक्टर में कुछ ही कम्पनियाँ ऐसी हैं जो दिवालियेपन की कार्रवाई के बाद ज़ब्त होने वाली कम्पनी को ख़रीदने के लिए उसकी क़ीमत के मुक़ाबले 15 से लेकर 35 फ़ीसदी रक़म ही जुटा सकती हैं। स्टील सेक्टर की दोनों बड़ी कम्पनियों की नीलामी के वक़्त सिर्फ़ दो घरेलू कम्पनियाँ ही बोली लगा पायी थीं। विदेशी कम्पनियों ने तो जैसी बोलियाँ लगायीं, उससे लगा कि वो बीमार कम्पनियों को कौड़ियों के मोल, बिल्कुल वैसे ही ख़रीदना चाहती हैं, जैसा वाजपेयी सरकार के ज़माने में विनिवेश के बहाने कुछ चहेती कम्पनियों को औने-पौने दाम में सरकारी कम्पनियों को बेचा गया था।

स्टील सेक्टर में बीमार कम्पनियों को ख़रीदने के लिए आगे आने वाली घरेलू कम्पनियों को तक़रीबन एकाधिकार नज़र आया है। बिजली क्षेत्र में भी दो मुख्य खिलाड़ी हैं। इसमें से एक को अयोग्य ठहराये जाने के बाद दूसरे के लिए कोई प्रतिस्पर्धी बचा ही नहीं। इस तरह से एक कॉरपोरेट को निहाल किया जा रहा है। स्टील और बिजली ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ बैंकों की भारी रक़म डूब रही है। आईबीसी की बदौलत स्टील सेक्टर में जहाँ 35 फ़ीसदी क़र्ज़ की वसूली हो पा रही है, वहीं बिजली क्षेत्र में तो ये कुल बकाया का महज 15 फ़ीसदी है। सारा माज़रा ही अपने आप में घोटाला है, क्योंकि बीमार कम्पनियों के ख़रीदार भी बैंकों से क़र्ज़ लेकर ही सम्पत्तियाँ ख़रीदेंगी!

आप चाहें तो सरकार की सूझबूझ पर तरस खा रहे हैं, क्योंकि शायद, उसने ऐसी परिस्थितियों का अन्दाज़ा ही नहीं लगाया हो। तभी तो एक ओर रिज़र्व बैंक का 12 फरवरी वाला सर्कुलर क़ायम रहता है और दूसरी ओर 19 जुलाई को बिजली मंत्रालय की ओर से स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया से कहा जाता है कि वो ‘समाधान’ योजना के तहत बीमार कम्पनियों के क़र्ज़ों का पुनर्निर्धारण कर दे। ये योजना ठंडे बस्ते में चली गयी। ऐसी ही एक अन्य योजना ग्रामीण विद्युतीकरण निगम पर बकाया 17,000 करोड़ रुपये के लिए भी प्रस्तावित हुई। लेकिन वो भी बेकार साबित हुई।

रिज़र्व बैंक भी समय-समय पर ऐसे दिशा-निर्देश जारी कर रहा है, जो बताते हैं कि नीतियों का ऐलान करते वक़्त उसके अंज़ाम के बारे में नहीं सोचा जाता। ऊर्जा से जुड़ी संसदीय समिति ने मार्च 2018 में जारी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि “यदि रिज़र्व बैंक ज़मीनी सच्चाई को नज़रअन्दाज़ करके दिशानिर्देश जारी करता रहेगा तो इसका मतलब ये है कि बैंक, वित्तीय संस्थाएँ और अन्य निवेशकों की रक़म की वसूली की उम्मीद घटाई में पड़ जाएगी।” संसदीय समिति की ऐसी प्रतिक्रिया से साफ़ है कि सरकार की न सिर्फ़ नीतियाँ ग़लत हैं, बल्कि उन्हें लागू करने का सलीका भी सही नहीं है।

संसदीय समिति की ये भी राय है कि “180 दिनों की मियाद में लक्ष्य को हासिल करना तक़रीबन असम्भव है।” उसने सचेत किया कि जिस दिन एनपीए के जुड़े सारे मामले राष्ट्रीय कम्पनी लॉ ट्राइबुनल में पहुँच जाएँगे, उस दिन वहाँ जाम लग जाएगा। समिति ने आगे कहा कि बिजली क्षेत्र अभी बदलाव के दौर में है। ऐसे में यदि रिज़र्व बैंक सिर्फ़ वित्तीय नज़रिये से देखेगा तो कई अन्य चुनौतियाँ भी खड़ी होंगी, जो वित्तीय परिधि से बाहर होगी। इसीलिए ये समझना ज़रूरी है कि बिजली क्षेत्र की बीमार कम्पनियाँ “राष्ट्रीय सम्पत्ति” हैं और “आख़िरकार इन्हें बचाना बहुत ज़रूरी है।”

नीति में ही घोटाला है। दो या तीन कॉरपोरेट कम्पनियों के बीच में महँगी सम्पत्तियों की बन्दरबाँट, सरकार से जुड़े पूँजीपति दोस्तों को निहाल करने का तरीका है। नीतियों को समुचित समीक्षा के बग़ैर लागू कर देना, उस आरोप के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा घटिया है जिसमें निर्णय लेने की ढिलाई के बावजूद 2004 से 2014 के दौरान अर्थव्यवस्था की विकास दर 8.2 फ़ीसदी दर्ज होती है।

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