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चुनाव

राष्ट्रपति पद को जातिवादी प्रतीकों से बचाना ज़रूरी है

आज यदि अम्बेडकर हमारे बीच होते तो वो इस पद के लिए आदर्श व्यक्ति होते। इसलिए नहीं कि वो दलित थे, बल्कि वो जातिवाद, कट्टरवाद और धर्मान्धता के धुर-विरोधी थे। यही वो संवैधानिक मूल्य हैं जिन्हें हमें बढ़ावा देना चाहिए।

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राजनीति में प्रतीक या निशान कुछ ख़ास तरह के बयान और मानसिकता को भी प्रदर्शित करते हैं। ये जोश भी भरते हैं तो कमज़ोर भी बनाते हैं। राजनीति के विपरीत, कारोबारी जगत में यही प्रतीक ‘ब्रॉन्ड’ बनकर अपनी गुणवत्ता को उभारते हैं। कई बार ‘ब्रॉन्ड’ से ही वस्तु की क्वालिटी और दाम का अहसास भी होता है। ग़रीबों के पास तो चुनने के लिए भी बहुत सीमित विकल्प होते हैं।

जब कोई पार्टी देश के सर्वोच्च पद के लिए अपना उम्मीदवार चुनती है, तो उसमें क्या ख़ासियत होनी चाहिए? सबसे पहले तो ऐसे उम्मीदवार में उन सारी बातों का प्रतिबिम्ब होना चाहिए जो हमारे देश की बुनियादी विशेषता है। मसलन, उसे उदार, समावेशी, सहिष्णु और सबको जोड़ने वाला व्यक्ति होना चाहिए। इसके बाद उसकी शख़्सियत ऐसी होनी चाहिए कि उसे देश के सुदूर इलाकों में ही नहीं बल्कि देश से बाहर भी लोग सम्मान से देखें।

दिखावेबाज़ी से मायूसियाँ पनपती हैं। आज यदि अम्बेडकर हमारे बीच होते तो वो इस पद के लिए आदर्श व्यक्ति होते। इसलिए नहीं कि वो दलित थे, बल्कि वो जातिवाद, कट्टरवाद और धर्मान्धता के धुर-विरोधी थे। यही वो संवैधानिक मूल्य हैं जिन्हें हमें बढ़ावा देना चाहिए। उन्होंने जाति-वर्ण आधारित उस सामाजिक ताने-बाने के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हुए ही बौद्ध धर्म की ओर पलायन किया था, जो समाज में ग़ैर-बराबरी और असहिष्णुता को बढ़ावा देती है। उन्हें भी अपनी ज़िन्दगी में इसका ज़बरदस्त दंश झेलना पड़ा था।

मैं इस बात से चिन्तित हूँ कि राम नाथ कोविन्द की उम्मीदवारी को ऐसे पेश किया जा रहा है जैसे इससे दलितों की सशक्तिकरण होगा। ऐतिहासिक रूप से बीजेपी, दलित-विरोधी रही है। इसीलिए अब वो कोविन्द रूपी मुखौटे की बदौलत ख़ुद को दलितों का हमदर्द दिखाना चाहती है। अमित शाह का नक्सलबाड़ी और वाराणसी में दलितों के घर भोजन करना भी ऐसा ही दिखावा ही है। विपक्ष को इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर बीजेपी को बेनक़ाब करना चाहिए।

विपक्ष को हाल की उन घटनाओं को आगे लाने चाहिए जिसमें दलितों को हिंसा का निशाना बनाया गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार दोनों ही राज्यों में ऐसी घटनाएँ सबसे अधिक होती हैं। आँकड़े बताते हैं कि गुजरात में दलितों पर अत्याचार से जुड़े अपराधों की राज्य के कुल अपराधों में हिस्सेदारी 163 फ़ीसदी है। राजस्थान के कुल अपराधों में 65 फ़ीसदी तक दलित उत्पीड़न के मामले हैं। हमें बिहार के राज्यपाल राम नाथ कोविन्द से पूछना चाहिए कि बिहार में दलित उत्पीड़न की रोकथाम के लिहाज़ से उनकी क्या उपलब्धि है?

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गुजरात के उना में गोरक्षकों ने बर्बरता

गुजरात और मध्य प्रदेश में तो बीजेपी अरसे से सत्ता में है। लेकिन दलित उत्पीड़न के लिहाज़ से इनकी दशा सबसे ख़राब है। गुजरात के उना में गोरक्षकों ने बर्बरता के बावजूद प्रधानमंत्री की ख़ामोशी ये बताने के लिए काफ़ी है कि बीजेपी किस तरह से दलितों की हमदर्द होने का दिखावा करती है। मध्य प्रदेश के सिहोर में दबंगों ने दलितों की ज़मीन पर ज़बरन कब्ज़ा कर लिया तो 50 पीड़ित परिवारों ने इच्छा-मृत्यु की माँग की थी। किसी को पता है कि दोषियों के ख़िलाफ़ शिवराव सिंह चौहान ने क्या कार्रवाई की? हरियाणा के फ़रीदाबाद में 2015 में पुलिस की भारी तैनातगी के बावजूद दो दलित बालकों को मार डाला गया। इससे अधिक शर्मनाक और क्या होगा!

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राजस्थान के नागौर में मई 2016 में तीन दलितों को टैक्टर से कुचलकर मार डाला गया। इसके जवाब में राजस्थान सरकार ने क्या कार्रवाई की? ‘मेरा जन्म ही मेरी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा हादसा है’, ऐसा कहकर रोहित वेमुला ने जनवरी 2016 में आत्महत्या कर ली। ये वाक़या इस बात की गवाही देता है कि हमारे विश्वविद्यालयों में जातिवादी जहर ने किस क़दर सेंधमारी कर ली है। रोहित का क़सूर सिर्फ़ इतना था कि वो अम्बेडकर स्टूडेंट एसोसिएशन का सदस्य था, वो याक़ूब मेमन की फाँसी देने के ख़िलाफ़ था और उसने दिल्ली विश्वविद्यालय में डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म ‘मुज़फ़्फ़रनगर बाक़ी है’ को दिखाये जाने से रोकने के लिए अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की निन्दा की थी।

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विद्यार्थी परिषद ने कथित तौर पर उससे हाथापायी की थी और उसकी गतिविधियों को देश-द्रोही बताते हुए केन्द्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय से शिकायत की थी। उन्होंने शिकायत को तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री स्मृति इरानी के पास भेज दिया। फिर इन सभी को सन्तुष्ट करने के लिए हैदराबाद विश्वविद्यालय के कुलपति ने रोहित को न सिर्फ़ निलम्बित कर दिया बल्कि उसकी सात महीने की फेलोशिप को भी रोक दिया। अभी हाल ही में भीम सेना ने दिल्ली के जन्तर-मन्तर पर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर ज़िले में ठाकुरों की ओर से दलितों पर किये गये अत्याचार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया था। इसीलिए ऐसी असहिष्णुता और हिंसा को नज़रअन्दाज़ करने जब महज़ दिखावे के लिए किसी दलित को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाता है तो बीजेपी की नीयत पर सवाल उठना लाज़िमी है।

रंगनाथ मिश्रा आयोग ने कहा था कि मुसलिम और ईसाई दलितों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाना चाहिए। इस पर ज़ोरदार ऐतराज़ जताते हुए 2010 में राम नाथ कोविन्द ने कथित तौर पर कहा था कि ‘इस्लाम और ईसाईयत तो देश में एलेन [यानी अन्य ग्रह के काल्पनिक प्राणी] की तरह हैं।’ यदि उन्होंने ऐसा बयान दिया था तो उन्हें अल्पसंख्यकों को ये भरोसा दिलाना चाहिए कि यदि वो चुनाव जीते तो देश के लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षण करेंगे। यदि उन्होंने ऐसा कोई बयान नहीं दिया है, तो उन्हें इस आशय का स्पष्टीकरण देना चाहिए। अन्यथा, अल्पसंख्यकों में असुरक्षा का भावना घर कर जाएगी। सच तो ये है कि भारत में अन्य ग्रह के काल्पनिक प्राणी यानी एलेन तो वो लोग हैं जो संविधान की भावना के विपरीत हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा देते हैं।

सच्चाई तो ये है कि हरेक 18 मिनट पर भारत में दलितों उत्पीड़न का एक मामला होता है, ऐसे मामलों में 6 फ़ीसदी से कम आरोपियों को ही सज़ा मिल पाती है। इन तथ्यों को देखते हुए राष्ट्रपति के कार्यालय पर ख़ासा दबाव रहेगा, ख़ासकर तब जब वहाँ कोई दलित आसीन हो। सभी जानते हैं कि जातिवादी कुरीतियों और दुराग्रहों में धँसे भारतीय समाज को रातों-रात सुधार पाना नामुमकिन है। मेरी उम्मीद है कि सरकार की भविष्य के ख़तरों पर नज़र अवश्य होगी। प्रधानमंत्री के लिए ये बड़ा मौक़ा है कि वो साबित करें कि उन्हें वाक़ई दलितों की परवाह है, उनसे हमदर्दी है। ताक़ि समाज में ये सन्देश जाए कि दलितों को निशाना बनाने वाले बख़्शे नहीं जाएँगे। गोरक्षकों के ख़िलाफ़ तो अत्यधिक सख़्ती से पेश आने की ज़रूरत है।

योगी आदित्यनाथ को हिदायत दी जानी चाहिए कि वो दलितों के घरों में जाने से पहले वहाँ साबुन-शैम्पू भिजवाने से बाज़ आये। इसी तरह, अपने आराम के लिए सोफ़ा-एसी वग़ैरह लगवाने की प्रवृत्ति भी बन्द होनी चाहिए। सरकार यदि वाक़ई दलितों की ख़ैरख़्वाह बनना चाहती है कि तो उसे सिविल सर्विसेज़ में दलितों के समुचित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना चाहिए और नौकरियों में आरक्षण की उनकी माँगों को पूरा करना चाहिए। लेकिन क्या मोदी सरकार ने ऐसा करके दिखाने का साहस है? दिखावेबाज़ी और सच्ची हमदर्दी, एक साथ नहीं चल सकते। कारोबार की दुनिया में जो ब्रॉन्ड अपनी छवि पर ख़रा नहीं उतरता है, वो नष्ट हो जाता है। हमें राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद को किसी खोखली ब्रॉन्डिंग के हवाले करने से बचना चाहिए। देश के लिए ये बहुत ख़तरनाक़ साबित होगा।

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By : Kapil Sibal

[अख़बार इंडियन एक्सप्रेस से साभार। लेखक एक वरिष्ठ काँग्रेस नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री हैं]

चुनाव

राजस्थान निकाय उपचुनाव में कांग्रेस ने दी बीजेपी को टक्कर

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राजस्थान के पंचायती राज और शहरी निकाय के उपचुनाव नतीजों ने कांग्रेस में जोश भर दिया है। कुल 27 सीटों के लिए उपचुनाव हुए थे। इसमें से 13 बीजेपी ने जीतीं जबकि कांग्रेस ने 11 सीटें जीतीं। नगर पालिका की एक सीट पर एनसीपी ने जीत दर्ज की है। पंचायत समिति और नगरपालिका की एक-एक सीट पर निर्दलीयों ने विजय दर्ज की है।

सवाई माधोपुर जिले में कांग्रेस ने जिला परिषद की सीट जीती। यहां पर कांग्रेस के उम्मीदवार लोकेश ने भाजपा के अपने निकटतम प्रतिद्वंदी कमल को 358 मतों से पराजित किया है। पार्टी ने 9 निगम वार्ड के पदों में से 5 पर कब्जा जमाया। जबकि बीजेपी को मात्र 2 ऐसे वार्ड पर जीत मिल सकी। कांग्रेस ने पंचायत समिति की 5 सीटों और नगरपालिका परिषद की पांच सीटों पर विजय हांसिल की है।

स्थानीय निकाय के उपचुनावों के परिणामों पर भाजपा के प्रदेश महासचिव भजनलाल शर्मा ने कहा कि लोगों ने एक बार फिर से भाजपा पर विश्वास व्यक्त किया है और पार्टी के 13 उम्मीदवारों ने उपचुनावों में जीत दर्ज की है।

वहीं कांग्रेस के प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट ने कहा कि शहरी मतदाताओं ने सत्ताधारी भाजपा के खिलाफ मतदान किया है। जनविरोधी योजनाओं के कारण लोगों ने भाजपा को नकार दिया है। सचिन पायलट ने कहा कि लोग बीजेपी की जन विरोधी नीतियों से बेहद खफा हैं। उन्होंने कहा कि शहरी मतदाता भी अब बीजेपी से दूरी बनाने लगे हैं। उन्होंने कहा, बीजेपी म्यूनिसिपल वार्ड में 2 सीटें ही जीत सकी, जबकि कांग्रेस ने 5 सीटें जीती।

बता दें कि राजस्थान में इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने है। बीजेपी को इस चुनाव में सरकार बनाने की चुनौती है, तो कांग्रेस के पास सत्ता पर फिर से काबिज होने का मौका भी है।

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चुनाव

भाजपा को लगा झटका, कांग्रेस ने जीती जयनगर सीट

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कांग्रेस की सौम्‍या रेड्डी ने जयनगर सीट बीजेपी से छीन ली। (प्रतीकात्‍म तस्‍वीर) 

कर्नाटक की जयनगर विधानसभा सीट कांग्रेस ने जीत ली है। मतगणना में कांग्रेस की सौम्‍या रेड्डी ने बीजेपी के बीएन प्रहलाद को 3775 वोटों से हरा दिया। कांग्रेस की सौम्या रेड्डी को 54045 जबकि बीजेपी के बीएन प्रहलाद को 50270 वोट मिले।

कर्नाटक विधानसभा के लिये 12 मई को प्रदेश भर में चुनाव कराये गए थे। हालांकि बीजेपी प्रत्याशी बी एन विजयकुमार के निधन के बाद जयनगर में चुनाव स्थगित कर दिया गया था। विजयकुमार इस सीट से विधायक थे। जयनगर सीट पर 11 जून को हुये मतदान में करीब 55 प्रतिशत वोट पड़े थे।

इस सीट पर विजयकुमार के भाई भाजपा के बी एन प्रहलाद और वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री रामलिंगा रेड्डी की बेटी सौम्या रेड्डी के बीच सीधा मुकाबला था। चुनाव से पहले जनता दल (एस) ने पांच जून को अपने प्रत्याशी को मैदान से हटा लिया और अपने सत्तारूढ़ गठबंधन सहयोगी कांग्रेस को समर्थन दिया। मतगणना केन्द्र के भीतर और आसपास पुलिस ने सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किये हैं।

इस जीत के बाद कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस सदस्यों की संख्या अब बढ़कर 79 हो गई है। 15 मई को घोषित हुए चुनाव नतीजों में कांग्रेस को 78 सीटें मिली थीं। लेकिन बीते 28 मई को उसके एक नवनिर्वाचित विधायक सिद्दू न्यामागोडा की सड़क हादसे में मौत हो गई थी।

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चुनाव

राहुल के ‘मास्टर स्ट्रोक’ से बिगड़ी भाजपा की फील्डिंग

राहुल की सभा के बाद भाजपा में अचानक सक्रियता बढ़ गई है। पार्टी की चुनाव प्रबंधन समिति के प्रमुख नरेंद्र सिंह तोमर ने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे लोगों के बीच जाएं और उनकी समस्याओं को जानकर समाधान के प्रयास करें।

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मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और उनकी सरकार की पहचान या यूं कहें कि ‘किसान हितैषी सरकार’ के तौर पर प्रचार कुछ ज्यादा ही हुआ है, मगर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मंदसौर की श्रद्धांजलि सभा में किसानों के कर्ज माफ करने का भरोसा दिलाकर ऐसा मास्टर स्ट्रोक मारा है कि भाजपा की लगभग डेढ़ दशक पुरानी फील्डिंग ही बिखरने लगी है।

मंदसौर गोलीकांड की पहली बरसी पर कांग्रेस की ओर से आयोजित श्रद्धांजलि सभा में पहुंचे राहुल गांधी ने प्रदेश की शिवराज सरकार को किसान, गरीब, मजदूर और युवा विरोधी करार दिया। साथ ही सत्ता में आने के 10 दिन के भीतर किसानों का कर्ज माफ करने का ऐलान किया।

राहुल के कर्जमाफी के ऐलान या क्रिकेट की भाषा में कहें तो मास्टर स्ट्रोक से भाजपा की लाइन लेंथ पूरी तरह गड़बड़ा गई है। राहुल का एक तरफ भाजपा की सबसे बड़ी ‘किसान हितैषी’ होने की ताकत पर वार और दूसरी ओर बड़ी-बड़ी बाधाओं को लांघकर बड़ी संख्या में पहुंचे किसानों के जमावड़े ने सत्ताधारी दल के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर दी हैं।

राहुल की सभा के बाद भाजपा में अचानक सक्रियता बढ़ गई है। पार्टी की चुनाव प्रबंधन समिति के प्रमुख नरेंद्र सिंह तोमर ने कार्यकर्ताओं से कहा कि वे लोगों के बीच जाएं और उनकी समस्याओं को जानकर समाधान के प्रयास करें। साथ ही यह जानें कि आमजन की बेहतरी के लिए और क्या किया जा सकता है।

वहीं पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह ने राहुल गांधी के किसानों के कर्ज माफ करने वाले बयान पर तंज कसा और किसानों के कर्ज के बोझ को ही झुठला दिया।

उन्होंने कहा, “यहां किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर कर्ज मिलता है और 10 प्रतिशत बतौर अनुदान दिया जाता है। ऐसे में किसान कर्ज के बोझ तले कैसे दबेगा? राज्य में भाजपा की सरकार बनने के बाद किसानों की स्थिति सुधरी है, सिंचाई सुविधा में बढ़ोतरी हुई है। यही कारण है कि पांच बार कृषि कर्मण पुरस्कार मिला है।”

मुख्यमंत्री शिवराज ने तो कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने के लिए यहां तक कह दिया कि उनकी सरकार ने ऐसे काम किए हैं, जिनके उदाहरण दुनिया में कहीं नहीं मिलते।

उन्होंने कहा, “संघर्ष का शंख बज चुका है, हमें लड़ना है और जीतना है। लड़ाई के लिए जो हथियार चाहिए, वह सरकार की उपलब्धियों के रूप में हमारे हाथ में है। सरकार ने मुख्यमंत्री जनकल्याण योजना सहित किसान, युवा और महिलाओं के हित में ऐसे-ऐसे काम किए हैं जिनके दूसरे उदाहरण दुनिया में कहीं नहीं मिलते।”

राहुल की सभा के बाद ‘डैमेज कंट्रोल’ के लिए भाजपा नेताओं के बयानों तक ही बात नहीं ठहरी है। पार्टी ने मीडिया में अपनी बात पूरी ताकत से उठाने के लिए पूर्व पत्रकार और सांसद प्रभात झा के हाथ में कमान सौंपी है। उन्हें प्रवक्ताओं, पैनलिस्टों के बीच समन्वय बनाने के लिए पार्टी के समग्र मीडिया का प्रभारी बनाया गया है।

वहीं दूसरी ओर, कांग्रेस की प्रचार समिति के अध्यक्ष ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा सरकार को ‘किसान विरोधी’ बताते हुए कहते हैं, “इस सरकार के राज में किसानों का नहीं, दलालों और बिचौलियों का फायदा हुआ है। यह किसान को लूटने वाली सरकार है।”

वरिष्ठ पत्रकार भारत शर्मा का कहना है, “राज्य में भाजपा के खिलाफ तीन स्तर की एंटी इंकम्बेंसी है। पहला, स्थानीय स्तर के नेताओं की राज्य सरकार और केंद्र सरकार से नाराजगी है। दूसरा, गोलीकांड के बाद से किसानों में बेहद नाराजगी है। तीसरा, उत्तर प्रदेश के कैराना लोकसभा उपचुनाव में पार्टी की हार ने भाजपा को सचेत किया है। वहां जातिवाद, संप्रदायवाद का जहर घोलने के बाद भी पार्टी जीत नहीं पाई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनके बैबिनेट के धुआंधार प्रचार, मतदान से ठीक एक दिन पहले कैराना के पास बागपत में प्रधानमंत्री का रोड शो और मेरठ में उनकी रैली भी भाजपा को जिता नहीं पाई। इससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल गिरा है। इसी बीच यहां राहुल ने सत्ता में आने पर कर्जमाफी की घोषणा कर दी, जिससे भाजपा सकते में आ गई है।”

राहुल की मंदसौर सभा और उसमें किसानों की कर्जमाफी के वादे के बाद भाजपा को किसानों को खुश करने की चुनौती है, मगर सूझ नहीं रहा कि क्या किया जाए। लिहाजा, भाजपा बड़े बदलाव के साथ ज्यादा आक्रामक होने की नीति बनाने में जुट गई है।

–आईएएनएस

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