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महज जीत है मोदी-शाह की ख़्वाहिश

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मोदी के लिए सरकारी तंत्र का इकलौता मतलब है ‘आत्म-प्रचार’, जिसकी उपयोगिता तरह-तरह की घोषणाएँ करने और अपनी उपलब्धियों का सच्चा-झूठा और जायज़-नाजायज़ गुणगान करने के सिवाय और कुछ नहीं है।

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कपिल सिब्बल

मैं अपने देश को लेकर चिन्तित हूँ।

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने देश की राजनीति और सरकार के लिए नये प्रतिमान बना दिये हैं। मोदी के लिए सरकारी तंत्र का इकलौता मतलब है ‘आत्म-प्रचार’, जिसकी उपयोगिता तरह-तरह की घोषणाएँ करने और अपनी उपलब्धियों का सच्चा-झूठा और जायज़-नाजायज़ गुणगान करने के सिवाय और कुछ नहीं है। जबकि शाह के लिए एकमात्र उद्देश्य बीजेपी की ऐसी आदमक़द छवि बनाना है, जो ये बताये कि 2014 के पहले देश में कुछ नहीं हुआ था। यही उनकी राजनीति का नया मुहावरा है। दोनों नेताओं की धारणा है कि सच्चाई कुछ भी हो, सिर्फ़ छवि मायने रखती है। दोनों की राजनीति का मक़सद बहुसंख्यकों के दिलों-दिमाग़ पर ऐसे उन्माद या नशे की तरह सवार रहना है जिसे हर क्षण ये ग़लतफ़हमी होती रहे कि परिवर्तन बहुत बढ़िया है।

इसी राजनीतिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दोनों ही नेता हमेशा जनता को फुसलाने और धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, बीजेपी शासित राज्यों की पुलिस और केन्द्र तथा राज्य सरकारों के तमाम विभाग इनके साधन बन चुके हैं। मीडिया, ख़ासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया, अब दर्शकों को निष्पक्ष ख़बरें देने के बजाय सरकार और बीजेपी के प्रचार-तंत्र का भोंपू बन चुका है। सरकारी नीतियों को तोड़-मरोड़कर उनका फ़ायदा उठाने वाले व्यापारिक घराने इनका गुणगान करने के लिए मज़बूर किये जा रहे हैं। उन्हें डर है कि यदि वो सरकार के आगे घुटने नहीं टेकेंगे तो टैक्स-अधिकारी उन्हें राष्ट्र-विरोधी हरक़तों के मामले में फँसा देंगे।

लोकतंत्र से खिलवाड़ हो रहा है। 2014 के बाद से भारतीय गणराज्य की प्रकृति बदल गयी है। उस हिन्दुत्व के नाम पर असहिष्णुता और बहुसंख्यकों में उन्मादी तत्वों को हवा दी जा रही है, जिसका हिन्दुत्व से कोई वास्ता ही नहीं है। ताकि गाय की रक्षा के नाम पर इंसानों की हत्याएँ की जा सकें। एंटी-रोमियो, लव-जिहाद, तीन-तलाक़ और धर्मान्तरण की आड़ में असहिष्णुता को बढ़ाया जा रहा है। कुछ टीवी चैनलों का ढर्रा ही आग लगाना बन गया है। इसे सोशल मीडिया पर तैनात बीजेपी के भाड़े के सैनिकों के ज़रिये हवा दी जाती है। इन सबका साझा मक़सद है कि विपक्ष को डरा-धमकाकर उसे ख़ामोश रखा जाए। चर्चा और बहस की कोई गुँज़ाइश नहीं है। किसी भी मुद्दे पर मतभेद जताने की इजाज़त नहीं है।

नोटबन्दी सफल थी क्योंकि प्रधानमंत्री का निशाना काला धन पर था। हालाँकि, इसने लाखों लोगों का रोज़गार निगल लिया और कतारों में खड़े सौ से ज़्यादा लोगों की जान ले ली। अर्थव्यवस्था पर इसका दुष्प्रभाव अभी तक बना हुआ है। सर्ज़िकल हमले को राष्ट्रवाद और सीमापार से आने वाले घुसपैठियों को दंडित करने के ऐसे रामबाण के रूप में पेश किया गया, जिसके आगे पाकिस्तान की हिम्मत ही नहीं होगी कि वो सीमा की ओर नज़र भी उठाकर देख सके।

हमें बताया जा रहा है कि समूचा विपक्ष भ्रष्ट है और सरकार घोटाला-मुक्त है। मोदी-शाह कहते हैं कि तीन साल में बीजेपी सरकार ने भारत का कायाकल्प कर दिया है। आम जनता में उम्मीद का संचार हुआ है। शाह तो कहते हैं कि जो बीजेपी ने तीन साल में करके दिखा दिया, उसे काँग्रेस 70 साल में भी नहीं कर पायी। दावा है कि बीजेपी ने भाई-भतीजावाद और जातिवादी राजनीति को ख़त्म कर दिया है। तो फिर उन दलितों को साबुन-शैम्पू बाँटा जाता है जो योगी आदित्यनाथ से मिलते हैं। जातिवाद नहीं है तो उना में दलितों पर कोड़े क्यों बरसाये गये!

असम और अरुणाचल को जोड़ने वाले 9.15 किलोमीटर लम्बे डोला-सादिया पुल का निर्माण 2010 में शुरू हुआ था। जम्मू और श्रीनगर की दूरी को 30 किलोमीटर कम कर देने वाली 9.2 किलोमीटर लम्बी सुरंग का निर्माण मई 2011 में चालू हुआ था। लेकिन 2 अप्रैल 2017 को मोदी वहाँ ऐसी तस्वीरें खिंचवाते हैं, जैसे ये ऐतिहासिक प्रोजेक्ट उनकी सरकार की देन हों। इस सरकार का दावा है कि अर्थव्यवस्था की 7% से ज़्यादा की विकास-दर और सेसेंक्स की रिकॉर्ड ऊँचाई उनकी उपलब्धियों का बखान करती हैं। मोदी-शाह के मुताबिक़, लोगों को जश्न मनाना चाहिए कि भारत जल्द ही 200 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला देश बनने वाला है।

ऐसा लगता है कि भारत का इतिहास 2014 से ही शुरू हुआ है। आज़ादी के बाद से अब तक कुछ नहीं हुआ। हर साल 1.2 करोड़ बच्चे स्कूलों से निकलकर रोज़गार के बाज़ार में आ पहुँचते हैं। लेकिन इनकी बेरोज़गारी की चर्चा सरकार का गुणगान कर रहे चैनलों पर नहीं होती। हमें ये नहीं बताया जाता कि मोदी सरकार ने साल 2015 में 1.35 लाख और 2016 में 2 लाख से अधिक रोज़गार के अवसर ही पैदा किये हैं, क्योंकि अमित शाह कह चुके हैं कि सरकार का काम रोज़गार देना नहीं है। मोदी-शाह की सेहत पर इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि दुनिया ‘ऑटोमेशन’ की तरफ तेज़ी से भाग रही है और इससे भारत में लाखों लोग बेरोज़गार होने की राह पर हैं। इनकी राजनीति तो सिर्फ़ अगला चुनाव जीतने की है। बग़ैर सोचे-विचारे शैक्षिक पाठ्यक्रमों में बदलाव किया गया है, जबकि हमारी चुनौती अपने बच्चों को वैश्विक माहौल के अनुरूप बनाने की होनी चाहिए। लेकिन सरकार और मीडिया दोनों ही इससे बेपरवाह है। सरकारी संस्थाओं का भगवाकरण करके वहाँ संघ के प्रचारकों को बिठाया जा रहा है। इससे उन संस्थानों की गुणवत्ता और हमारे संविधान की भावना को गहरी चोट पहुँच रही है।

अमीरों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएँ हैं, लेकिन ग़रीबों के इलाज़ की व्यवस्था ख़स्ताहाल है। ‘रियल एस्टेट सेक्टर’ ध्वस्त हो चुका है। जनता को उसकी बचत पर मिलने वाला ब्याज़ ख़ासा गिर चुका है, क्योंकि अर्थव्यवस्था में ठहराव है। बैंकों से क़र्ज़ा लेने वाले नदारद हैं, क्योंकि फैक्ट्रियों को अपना उत्पादन बढ़ाने की ज़रूरत ही नहीं दिख रही। अर्थव्यवस्था की रीढ़ है छोटे और मझोले क्षेत्र। लेकिन वो बदहाल हैं, क्योंकि कोई उनका हाथ थामने वाला नहीं है। जाली नोटों के साथ काला धन फिर से चलन में आ गया है। नोटबन्दी से आतंकवादियों पर कोई असर नहीं पड़ा। जीडीपी की विकास दर सिर्फ़ बौद्धिक बहस के लिए है। लेकिन सरकार को अपनी पीठ थपथपाने से फ़ुर्सत कहाँ!

आम जनता की तकलीफ़ और परेशानियों से सरकार और उसकी राजनीति का कोई नाता नहीं बचा है। समाज को तोड़ने वालों को सत्ता तंत्र का भरपूर सहयोग और समर्थन मिल रहा है। सरकार को शान्ति और सौहार्द स्थापित करने के संवैधानिक दायित्व की कोई परवाह नहीं है। मोदी-शाह की जोड़ी भारत को हर मोर्चे पर अलग-थलग करना चाहती है। इसीलिए हमें इन्हें चुनौती देनी चाहिए और ये सुनिश्चित करना चाहिए कि 2019 में एक नयी शुरुआत हो सके।

(लेखक पूर्व केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस से राज्यसभा के सांसद हैं।)

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस दिनांक 16/06/17)

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