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महज जीत है मोदी-शाह की ख़्वाहिश

मोदी के लिए सरकारी तंत्र का इकलौता मतलब है ‘आत्म-प्रचार’, जिसकी उपयोगिता तरह-तरह की घोषणाएँ करने और अपनी उपलब्धियों का सच्चा-झूठा और जायज़-नाजायज़ गुणगान करने के सिवाय और कुछ नहीं है।

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कपिल सिब्बल

मैं अपने देश को लेकर चिन्तित हूँ।

नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने देश की राजनीति और सरकार के लिए नये प्रतिमान बना दिये हैं। मोदी के लिए सरकारी तंत्र का इकलौता मतलब है ‘आत्म-प्रचार’, जिसकी उपयोगिता तरह-तरह की घोषणाएँ करने और अपनी उपलब्धियों का सच्चा-झूठा और जायज़-नाजायज़ गुणगान करने के सिवाय और कुछ नहीं है। जबकि शाह के लिए एकमात्र उद्देश्य बीजेपी की ऐसी आदमक़द छवि बनाना है, जो ये बताये कि 2014 के पहले देश में कुछ नहीं हुआ था। यही उनकी राजनीति का नया मुहावरा है। दोनों नेताओं की धारणा है कि सच्चाई कुछ भी हो, सिर्फ़ छवि मायने रखती है। दोनों की राजनीति का मक़सद बहुसंख्यकों के दिलों-दिमाग़ पर ऐसे उन्माद या नशे की तरह सवार रहना है जिसे हर क्षण ये ग़लतफ़हमी होती रहे कि परिवर्तन बहुत बढ़िया है।

इसी राजनीतिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दोनों ही नेता हमेशा जनता को फुसलाने और धमकाने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय, बीजेपी शासित राज्यों की पुलिस और केन्द्र तथा राज्य सरकारों के तमाम विभाग इनके साधन बन चुके हैं। मीडिया, ख़ासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया, अब दर्शकों को निष्पक्ष ख़बरें देने के बजाय सरकार और बीजेपी के प्रचार-तंत्र का भोंपू बन चुका है। सरकारी नीतियों को तोड़-मरोड़कर उनका फ़ायदा उठाने वाले व्यापारिक घराने इनका गुणगान करने के लिए मज़बूर किये जा रहे हैं। उन्हें डर है कि यदि वो सरकार के आगे घुटने नहीं टेकेंगे तो टैक्स-अधिकारी उन्हें राष्ट्र-विरोधी हरक़तों के मामले में फँसा देंगे।

लोकतंत्र से खिलवाड़ हो रहा है। 2014 के बाद से भारतीय गणराज्य की प्रकृति बदल गयी है। उस हिन्दुत्व के नाम पर असहिष्णुता और बहुसंख्यकों में उन्मादी तत्वों को हवा दी जा रही है, जिसका हिन्दुत्व से कोई वास्ता ही नहीं है। ताकि गाय की रक्षा के नाम पर इंसानों की हत्याएँ की जा सकें। एंटी-रोमियो, लव-जिहाद, तीन-तलाक़ और धर्मान्तरण की आड़ में असहिष्णुता को बढ़ाया जा रहा है। कुछ टीवी चैनलों का ढर्रा ही आग लगाना बन गया है। इसे सोशल मीडिया पर तैनात बीजेपी के भाड़े के सैनिकों के ज़रिये हवा दी जाती है। इन सबका साझा मक़सद है कि विपक्ष को डरा-धमकाकर उसे ख़ामोश रखा जाए। चर्चा और बहस की कोई गुँज़ाइश नहीं है। किसी भी मुद्दे पर मतभेद जताने की इजाज़त नहीं है।

नोटबन्दी सफल थी क्योंकि प्रधानमंत्री का निशाना काला धन पर था। हालाँकि, इसने लाखों लोगों का रोज़गार निगल लिया और कतारों में खड़े सौ से ज़्यादा लोगों की जान ले ली। अर्थव्यवस्था पर इसका दुष्प्रभाव अभी तक बना हुआ है। सर्ज़िकल हमले को राष्ट्रवाद और सीमापार से आने वाले घुसपैठियों को दंडित करने के ऐसे रामबाण के रूप में पेश किया गया, जिसके आगे पाकिस्तान की हिम्मत ही नहीं होगी कि वो सीमा की ओर नज़र भी उठाकर देख सके।

हमें बताया जा रहा है कि समूचा विपक्ष भ्रष्ट है और सरकार घोटाला-मुक्त है। मोदी-शाह कहते हैं कि तीन साल में बीजेपी सरकार ने भारत का कायाकल्प कर दिया है। आम जनता में उम्मीद का संचार हुआ है। शाह तो कहते हैं कि जो बीजेपी ने तीन साल में करके दिखा दिया, उसे काँग्रेस 70 साल में भी नहीं कर पायी। दावा है कि बीजेपी ने भाई-भतीजावाद और जातिवादी राजनीति को ख़त्म कर दिया है। तो फिर उन दलितों को साबुन-शैम्पू बाँटा जाता है जो योगी आदित्यनाथ से मिलते हैं। जातिवाद नहीं है तो उना में दलितों पर कोड़े क्यों बरसाये गये!

असम और अरुणाचल को जोड़ने वाले 9.15 किलोमीटर लम्बे डोला-सादिया पुल का निर्माण 2010 में शुरू हुआ था। जम्मू और श्रीनगर की दूरी को 30 किलोमीटर कम कर देने वाली 9.2 किलोमीटर लम्बी सुरंग का निर्माण मई 2011 में चालू हुआ था। लेकिन 2 अप्रैल 2017 को मोदी वहाँ ऐसी तस्वीरें खिंचवाते हैं, जैसे ये ऐतिहासिक प्रोजेक्ट उनकी सरकार की देन हों। इस सरकार का दावा है कि अर्थव्यवस्था की 7% से ज़्यादा की विकास-दर और सेसेंक्स की रिकॉर्ड ऊँचाई उनकी उपलब्धियों का बखान करती हैं। मोदी-शाह के मुताबिक़, लोगों को जश्न मनाना चाहिए कि भारत जल्द ही 200 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला देश बनने वाला है।

ऐसा लगता है कि भारत का इतिहास 2014 से ही शुरू हुआ है। आज़ादी के बाद से अब तक कुछ नहीं हुआ। हर साल 1.2 करोड़ बच्चे स्कूलों से निकलकर रोज़गार के बाज़ार में आ पहुँचते हैं। लेकिन इनकी बेरोज़गारी की चर्चा सरकार का गुणगान कर रहे चैनलों पर नहीं होती। हमें ये नहीं बताया जाता कि मोदी सरकार ने साल 2015 में 1.35 लाख और 2016 में 2 लाख से अधिक रोज़गार के अवसर ही पैदा किये हैं, क्योंकि अमित शाह कह चुके हैं कि सरकार का काम रोज़गार देना नहीं है। मोदी-शाह की सेहत पर इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता कि दुनिया ‘ऑटोमेशन’ की तरफ तेज़ी से भाग रही है और इससे भारत में लाखों लोग बेरोज़गार होने की राह पर हैं। इनकी राजनीति तो सिर्फ़ अगला चुनाव जीतने की है। बग़ैर सोचे-विचारे शैक्षिक पाठ्यक्रमों में बदलाव किया गया है, जबकि हमारी चुनौती अपने बच्चों को वैश्विक माहौल के अनुरूप बनाने की होनी चाहिए। लेकिन सरकार और मीडिया दोनों ही इससे बेपरवाह है। सरकारी संस्थाओं का भगवाकरण करके वहाँ संघ के प्रचारकों को बिठाया जा रहा है। इससे उन संस्थानों की गुणवत्ता और हमारे संविधान की भावना को गहरी चोट पहुँच रही है।

अमीरों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएँ हैं, लेकिन ग़रीबों के इलाज़ की व्यवस्था ख़स्ताहाल है। ‘रियल एस्टेट सेक्टर’ ध्वस्त हो चुका है। जनता को उसकी बचत पर मिलने वाला ब्याज़ ख़ासा गिर चुका है, क्योंकि अर्थव्यवस्था में ठहराव है। बैंकों से क़र्ज़ा लेने वाले नदारद हैं, क्योंकि फैक्ट्रियों को अपना उत्पादन बढ़ाने की ज़रूरत ही नहीं दिख रही। अर्थव्यवस्था की रीढ़ है छोटे और मझोले क्षेत्र। लेकिन वो बदहाल हैं, क्योंकि कोई उनका हाथ थामने वाला नहीं है। जाली नोटों के साथ काला धन फिर से चलन में आ गया है। नोटबन्दी से आतंकवादियों पर कोई असर नहीं पड़ा। जीडीपी की विकास दर सिर्फ़ बौद्धिक बहस के लिए है। लेकिन सरकार को अपनी पीठ थपथपाने से फ़ुर्सत कहाँ!

आम जनता की तकलीफ़ और परेशानियों से सरकार और उसकी राजनीति का कोई नाता नहीं बचा है। समाज को तोड़ने वालों को सत्ता तंत्र का भरपूर सहयोग और समर्थन मिल रहा है। सरकार को शान्ति और सौहार्द स्थापित करने के संवैधानिक दायित्व की कोई परवाह नहीं है। मोदी-शाह की जोड़ी भारत को हर मोर्चे पर अलग-थलग करना चाहती है। इसीलिए हमें इन्हें चुनौती देनी चाहिए और ये सुनिश्चित करना चाहिए कि 2019 में एक नयी शुरुआत हो सके।

(लेखक पूर्व केन्द्रीय मंत्री और कांग्रेस से राज्यसभा के सांसद हैं।)

(साभार: इंडियन एक्सप्रेस दिनांक 16/06/17)

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कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

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कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

Image result for स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह

Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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लोकतांत्रिक देश में पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड!

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Indian Politics

इसमें कोई शक नहीं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, जिस पर गर्व भी है। सच्चाई भी है कि सरकार केंद्र या राज्य कहीं भी हो, पार्टियों के अंदर का लोकतंत्र दूर-दूर तक गायब है। विडंबना, कुटिलता या एकाधिकारवादी प्रवृत्ति, कुछ भी कहें, भारत में शुरू से ही राजनीतिक पार्टियां व्यक्ति के आसरे या प्रभाव से ही प्रभावित रही हैं।

फिलहाल ‘आप’ में भी इसी बात को लेकर घमासान मचा है, तो नया क्या है? रिवाज सरीखे तमाम पार्टियां ‘आम’ आदमी से ‘खास’ बन जाती हैं। गर्व कीजिए कि सरकारें तो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई होती हैं! ऐसे में ‘आप’ पर ही तोहमत क्यों?

दरअसल, राजनीति शह-मात का खेल है। नकेल जिसके हाथ है, पार्टी उसके नाम है। पुराने दौर से अब तक कमोवेश यही सिलसिला जारी है। ऐसी विविधता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, यानी भारत में ही दिखती है। खुश होइए कि लोकतंत्र जिंदाबाद है।

अहम यह कि पार्टियों के भीतर लोकतंत्र रहा ही कब? गांधीजी ने कांग्रेस के लिए देशभर में सदस्य बनाए। जिले तक को तवज्जो दी। सम्मेलनों में अध्यक्ष चुनने की शुरुआत हुई। लेकिन तब भी गांधीजी की पसंद खास होती थी। वर्ष 1937 को देखिए, पहला चर्चित चुनाव हुआ, तब सरदार पटेल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे, लेकिन उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से केंद्रीकृत रहा। कुछ लोकतंत्र बचा रहा, जिसे बाद में इंदिराजी ने खत्म कर दिया। अब अमूमन सारी पार्टियां यही व्यवहार कर रही हैं। एक-एक सीट आलाकमान से तय होती है।

प्रदेश, जिला, नगर, यहां तक कि वार्ड की अहमियत नकारा है। सुप्रीमो पद्धति जन्मी और पार्टियां एक तरह से प्राइवेट लिमिटेड बनती चली गईं। राजनैतिक अनुभव या समाजसेवा से इतर फिल्मी स्टारों ने भी बहती गंगा में गोते लगाए। दर्जनों स्टार देखते-देखते बड़े नेता बन गए, वहीं कई मुख्यमंत्री तक हुए। भला रिटायर्ड या इस्तीफा दिए नौकरशाह या सैन्य अधिकारी क्यों पीछे रहते? भारत की राजनीति सरकारी पदों की अहमियत को भुनाने का मौका जो देती है।

अभी तो आम आदमी पार्टी की बात है, धारा का रुख देख भ्रष्टाचार विरोधी गोते लगाए गए। समाज-सेवक से लेकर नौकरशाह, कवि से लेकर पत्रकार, सभी ने बहती बयार को समझा और एक आंदोलन उपजाया। भारतीय इतिहास में जितनी तेजी से इस पार्टी ने झंडा गाड़ा, यकीनन जात-पात, अगड़े-पिछड़े और फिल्मी लोकप्रियता के नाम की राजनीति भी पीछे हो गई।

आम आदमी की पार्टी कहां से चली और धीरे-धीरे कहां पहुंच गई, सबको दिख रहा है। जब बारी लोकतंत्र में आहूति देने की आई, तो उच्च सदन के खास यजमान एकाएक अवतरित हुए! कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र में मतदाता केवल एक वोट बनकर रह गया है, जिसकी अहमियत चंद सेकेंड में बटन दबाने से ज्यादा कुछ नहीं। बाद में उसकी क्या पूछ परख है, खुली किताब है।

दूसरी पार्टियां ‘आप’ के घमासान पर विलाप करें या प्रलाप, लेकिन जब बात उनकी होती है तो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं अघाते। पार्टी कुछ नहीं होती, होते हैं उनको चलाने वाले ही बलशाली और महारथी।

अब मोदी-शाह के कमल की बहार हो, राहुल की कांग्रेस का हाथ हो, केजरीवाल के आप की झाड़ू, अखिलेश-मुलायम की साइकिल, मायावती का हाथी, ममता के दो फूल, लालू का लालटेन, उद्धव का तीर कमान, राज ठाकरे का रेल इंजन, अभिनेत्री जयललिता के बाद पनीर सेल्वम-पलनीस्वामी की दो पत्तियां, करुणानिधि का उगता सूरज, शरद पवार की घड़ी, बीजू जनता दल का शंख, कभी जॉर्ज फर्नांडीज तो अब नीतीश के जद (यू) का तीर, अभिनेता एनटी रामाराव के बाद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी की साइिकल। हाल-फिलहाल रजनीकांत की दहाड़। इनके अलावा देश में न जाने कितने क्षत्रप और उनकी पार्टियां हैं, सच्चाई सबको पता है।

दलों का दलदल हो या हमाम, बस नजर का पर्दा ही है, जिसमें सब कुछ दिखकर भी कुछ नहीं दिखता। यही भारतीय लोकतंत्र है। अब इसे खूबी कहें या दाग, पार्टी तो चलाते हैं केवल सरताज। ऐसे में आम आदमी की क्या हैसियत? जो अंदर है, वह बाहर दिखता जरूर है। अब इस पर चीत्कार करें या आर्तनाद, कोई फर्क नहीं पड़ता।

कहने को कुछ भी कह लें, लेकिन हकीकत यही है कि कम से कम भारतीय राजनीति की यही सुंदरता है, उसका कलेवर हाड़-मांस का तो नहीं, कांच का भी नहीं, लेकिन फिर भी इतना कुछ पारदर्शी है कि सब कुछ दिखता है। इसे मत-मतांतर का फेर, सपनों की सौदागीरी, शब्दों की बाजीगरी कुछ भी कह लें।

लेकिन जानते, देखते और समझते हुए भी दलदल में हर बार हमारा वोट गोता खाकर रह जाता है और हम कहते हैं कि ‘अबकी बार हमारी सरकार।’ इतना कहना ही क्या कम है? तो आइए, एक बार फिर से कहें ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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