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मप्र की सड़कों के गड्ढों में गिर जाते हैं राहगीर

मुख्यमंत्री भले ही यह कहें कि राज्य की सड़कें अमेरिका से बेहतर हैं, मगर यह बात भी उतनी ही सही है कि राज्य के कई इलाकों की सड़कों पर चलना आसान नहीं है। आलम यह है कि यहां जरा से सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।

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भोपाल, 25 अक्टूबर | मध्य प्रदेश की राजधानी के कोलार इलाके की सड़क के गड्ढ़े में पूर्व सेना अधिकार जॉय तिर्की का दुपहिया वाहन ऐसे गिरा कि उन्हें कई दिन तक होश नहीं आया। वे सड़क पर बने गड्ढ़े से हुए नुकसान के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। यह घटना राज्य की सड़कों की हालत बयां करने के लिए काफी है। वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान राज्य की सड़कों के अमेरिका से बेहतर होने का दावा कर रहे हैं।

तिर्की बताते हैं, “वे कोलार क्षेत्र में नगर निगम के दफ्तर से आगे निकल रहे थे, तभी उनका वाहन सड़क के गड्ढ़े में गिर गया और वह बुरी तरह घायल हो गए। कई दिन बाद होश आया, अब वे कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। उस अफसर, विभाग व ठेकेदार को सजा दिलाने की उनकी मुहिम है, जिसके चलते वे हादसे का शिकार हुए।”

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राजधानी की ही बात करें तो पिपलानी क्षेत्र को भारत टॉकीज से जोड़ने वाले मार्ग में बड़ा हिस्सा ऐसा है, जहां जगह-जगह गड्ढे हैं। अयोध्या नगर से करौंद के रास्ते की हालत भी ठीक नहीं है। यही हाल करौंद से भोपाल टॉकीज की ओर जाने वाले रास्ते का है। गड्ढ़े और उस पर उड़ती धूल लोगों का बुरा हाल कर देती है।

वहीं मुख्यमंत्री चौहान ने अमेरिका दौरे के दौरान मंगलवार को वाशिंगटन में यूएस-इंडिया स्ट्रेटेजिक फोरम द्वारा निवेशकों के साथ चर्चा के दौरान कहा, “जब मैं वाशिंगटन के हवाई अड्डे पर उतरने के बाद सड़क मार्ग से गया, तो मुझे महसूस हुआ कि मध्य प्रदेश की सड़कें अमेरिका से कहीं बेहतर हैं।”

मुख्यमंत्री ने जो वाशिंगटन में कहा, उससे राज्य के कई हिस्सों की सड़कें मेल नहीं खाती हैं। राजधानी से सागर, होशंगाबाद, विदिशा सहित कई अन्य रास्ते ऐसे हैं जहां सड़कों पर वाहन चलाना आसान नहीं है। छतरपुर से पन्ना, कटनी से जबलपुर, कटनी से दमोह, शिवपुरी से ग्वालियर जाने वाली सड़कों का बुरा हाल है।

केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय की राज्यसभा में पेश वर्ष 2015 रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के कई हिस्सों में सड़कों के खराब होने के कारण दुर्घटनाएं आम हैं। बीते वर्ष राज्य में कुल 3070 हादसे हुए। यह देश में हुए कुल हादसों का लगभग 10़ 7 फीसदी है। इतना ही नहीं प्रतिदिन नौ से 10 लोग मौत का शिकार होते हैं।

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राज्य के कई शहरों के भीतरी हिस्से की सड़कों का हाल तो और भी बुरा है। संभवत: राज्य का शायद ही कोई ऐसा नगर निगम, नगर पालिका या नगर पंचायत क्षेत्र हो, जहां सभी सड़कें अच्छी हों और उन पर आवागमन सुगमता से चल रहा हो। बरसात में तो आलम यह हो जाता है कि सड़क और गड्ढ़े में फर्क नजर नहीं आता।

सरकार का दावा है कि, राज्य में पौने दो लाख किलोमीटर सड़कें बनाई गई हैं, राज्य के लोक निर्माण मंत्री रामपाल सिंह ने विभागीय अधिकारियों की बैठक में यह माना कि कुछ सड़कों की हालत अच्छी नहीं है। प्रदेश के विकास में सड़कों की अहम भूमिका है लिहाजा सड़कों को बेहतर बनाया जाए। चौहान के अमेरिका में दिए गए बयान को रामपाल सिंह ने सही ठहराया है।

राज्य के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग कहते हैं कि भोपाल के हवाई अड्डे से उतर कर वीआईपी रोड से आएं तो पता चलता है कि राज्य की सड़कें कैसी है। यह दुनिया की बेहतर सड़कों में से है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री ने अमेरिका में राज्य की सड़कों की चर्चा की है।

वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता के.के. मिश्रा का कहना है, “मुख्यमंत्री के गृह जिले सीहोर और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के संसदीय क्षेत्र विदिशा की सड़कों का हाल देख लें तो सारे राज्य का हाल पता चल जाएगा। यहां की सड़कों में गड्ढ़ों की भरमार है तो एक वाहन से उड़ती धूल दूसरे वाहन की रफ्तार को रोकने को मजबूर कर देती है। वास्तविकता यह है कि मुख्यमंत्री राज्य की वीआईपी सड़कों पर चले हैं, इसलिए उन्हें सड़कों का हाल पता नहीं है।”

मुख्यमंत्री भले ही यह कहें कि राज्य की सड़कें अमेरिका से बेहतर हैं, मगर यह बात भी उतनी ही सही है कि राज्य के कई इलाकों की सड़कों पर चलना आसान नहीं है। आलम यह है कि यहां जरा से सावधानी हटी और दुर्घटना घटी।

By : संदीप पौराणिक

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पाकिस्तान को पानी रोकने पर विशेषज्ञों की राय बंटी

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नई दिल्ली, 16 फरवरी | सीआरपीएफ की टुकड़ी पर गुरुवार को पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद कड़ी कार्रवाई करने की मांग को देखते हुए विशेषज्ञ पश्चिम और पूरब की तरफ बहने वाली सिंधु और ब्यास नदियों का पानी पाकिस्तान जाने से रोकने पर विचार कर रहे हैं। वहीं, कुछ इसकी संभाव्यता पर शक जता रहे हैं।

जल संसाधन मंत्रालय के सेवानिवृत्त शीर्ष अधिकारी एम. एस. मेनन का कहना है कि पाकिस्तान को दिए जानेवाले पानी को रोका जा सकता है। उन्होंने सिंधु जल समझौते पर लंबे समय से काम किया है।

उन्होंने कहा, “हमने अधिक पानी उपभोग करने की क्षमता विकसित कर ली है। स्टोरेज डैम में निवेश बढ़ाकर हम ऐसा कर सकते हैं। झेलम, चेनाब और सिंधु नदी का बहुत सारा पानी देश में ही इस्तेमाल किया जा सकता है।”

भारत और पाकिस्तान के बीच 1960 में हुआ सिंधु जल समझौता पूरब की तरफ बहने वाली नदियों – ब्यास, रावी और सतलुज के लिए हुआ है और भारत को 3.3 करोड़ एकड़ फीट (एमएएफ) पानी मिला है, जबकि पाकिस्तान को 80 एमएएफ पानी दिया गया है।

विवादास्पद यह है कि संधि के तहत पाकिस्तान को भारत से अधिक पानी मिलता है, जिससे यहां सिंचाई में भी इस पानी का सीमित उपयोग हो पाता है। केवल बिजली उत्पादन में इसका अबाधित उपयोग होता है। साथ ही भारत पर परियोजनाओं के निर्माण के लिए भी सटीक नियम बनाए गए हैं।

एक दूसरे सेवानिवृत्त अधिकारी, जो मंत्रालय में करीब दो दशकों तक सिंधु आयुक्त रह चुके हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान को पानी रोकना संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि यह अंतराष्ट्रीय संधि है, जिसका भारत को पालन करना अनिवार्य है। उन्होंने कहा, “मैं नहीं समझता कि इस प्रकार का कुछ करना संभव है। पानी प्राकृतिक रूप से बहता है। आप उसे रोक नहीं सकते।”

पूर्व अधिकारी ने कहा कि अतीत में भी इस मुद्दे पर चर्चा हुई है, लेकिन लोग ऐसी मांग भावनाओं में बहकर करते रहते हैं।

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काले धन को सफेद करने के लिए भावांतर योजना शुरू की गई थी : कमलनाथ

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प्रमुख राज्यों और सहयोगियों को संभालने वाले एक सशक्त कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस महासचिव कमलनाथ ने मध्यप्रदेश की सत्ता के केंद्र भोपाल को बखूबी अपना लिया है। विशुद्ध राजनीति की कला में माहिर राज्य के 18वें मुख्यमंत्री जिन्होंने भारत को कांग्रेस मुक्त करने की भाजपा के विजय रथ को रोक दिया है, उन पर अब एक बड़ी जिम्मेदारी है। जन्मजात रणनीतिक और सामरिक सोच के धनी नेता अब राज्य में हर उस चीज को दुरुस्त करने के काम में जुट गए हैं जो गड़बड़ाई हुई है।

राज्य में खेती और ग्रामीण संकट के साथ ही संभवत: बेरोजगारी वह एकमात्र सबसे बड़ा कारण रही, जिसने कांग्रेस को जीत दिलाई।

इस संकट की गंभीरता के बारे में पूछे जाने पर नाथ ने इसके उन्मूलन के उपायों पर बात करते हुए कहा, “राज्य में रोजगार की स्थिति बहुत बुरी है। जिन संसाधनों का प्रयोग राज्य के विकास को गति देने के लिए किया जा सकता था, उनका व्यर्थ जाना बेहद दुखद है। पद संभालने के पहले दिन ही, मैंने राज्य में 70 प्रतिशत स्थानीय युवाओं को उद्यमों में रोजगार देना अनिवार्य कर दिया ताकि उन्हें औद्योगिक प्रोत्साहन मिले।”

उन्होंने कहा, “समय के साथ हम ऐसी और योजनाएं लेकर आएंगे, जिनसे रोजगार पैदा होंगे और उद्यमों के सशक्तीकरण के लिए काम करेंगे। हमारी सरकार युवाओं के कौशल विकास, रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए उद्यमों के विकास और शिक्षा की गुणवत्ता पर ध्यान दे रही है। गणतंत्र दिवस के मौके पर हमने एक नई योजना ‘युवा स्वाभिमान योजना’ की घोषणा की। इसके तहत हम साल में पूरे 100 दिन राज्य के युवाओं को काम देंगे। कृषि संकट के मामले में, पिछले कुछ सालों में मंदसौर दो बार किसानों के लिए कृषि संकट के क्षेत्र में भाजपा की नीतियों के खिलाफ मोर्चा खोलने का मुख्य केंद्र बना।”

दिल्ली में बैठे हुए भी, हर किसी ने मध्यप्रदेश में कृषि संकट और किस प्रकार मंदसौर इसके खिलाफ विरोध का केंद्र बना, इस बारे में सुना।

कमलनाथ ने भाजपा सरकार की भावांतर योजना शुरू होने और फिर उसे बंद करने के बारे में बात करते हुए कहा, “मध्यप्रदेश भारत के सबसे बड़े कृषि प्रधान राज्यों में से एक है। इसकी करीब 70 फीसदी आबादी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर कृषि से जुड़ी है। यह बेहद दुख की बात है कि किसानों की आत्महत्या के मामले में मध्यप्रदेश देश में सबसे ऊपर है। अगर राज्य किसानों के लिए किसी आदर्श स्थिति में होता, जैसा कि पिछली भाजपा सरकार द्वारा कहा जा रहा था, तो स्थिति काफी अलग होती।”

उन्होंने कहा, “किसानों का आक्रोश और उनके प्रति सरकार की बेरुखी मंदसौर की घटना से ही स्पष्ट है। कृषि संकट का एक बड़ा कारण यह है कि किसानों को उनकी फसलों का उचित मूल्य नहीं मिलता। भावांतर योजना केवल काले धन को सफेद करने के लिए शुरू की गई थी, इस संकट को दूर करने के लिए नहीं। यह पूरी तरह त्रुटिपूर्ण थी और इसलिए इसका विफल होना तय था।”

कमलनाथ ने कहा, “हम ‘भावांतर योजना’ को नए रूप में पेश करने जा रहे हैं और ऐसे उपाय लेकर आ रहे हैं, जिनसे किसानों को उनका हक मिलेगा। अपने वादे पर कायम रहते हुए हमने सरकार में आते ही किसानों के ऋण माफ कर दिए और राज्य के किसानों के कल्याण के लिए ऐसी और भी नीतियां बनाएंगे।”

फिर से कांग्रेस के केंद्र की सत्ता में आने के सवाल पर कमलनाथ ने कहा, “मुझे पूरा भरोसा है कि हम बहुमत के साथ सत्ता में आएंगे। पिछले चुनाव में भाजपा की जीत और कुछ नहीं, बस एक संयोग था। हालांकि आप लोगों को लंबे समय तक मूर्ख नहीं बना सकते। नोटबंदी और जीएसटी जैसी चीजें पूरी तरह विफल हुई हैं और लोग अब बदलाव चाहते हैं।”

उन्होंने कहा, “लोगों में भाजपा विरोधी भावना है और हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव के परिणामों में यह साफ दिखाई दे रहा है। अगर हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता की बात करें तो यह कम होने लगी है। हमारे प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ जहां नीचे गिर रहा है, राहुल गांधी का ऊपर बढ़ रहा है।”

भाजपा और कांग्रेस का वोट शेयर काफी ज्यादा था और अंत में केवल मामूली अंतर से ही कांग्रेस को जीत हासिल हुई। कांग्रेस के पक्ष में बाजी जाने में किस चीज की भूमिका रही?

इस सवाल पर दून स्कूल और कोलकाता के सेंट जेवियर स्कूल से शिक्षित कमलनाथ ने कहा, “वक्त है बदलाव का। राज्य के लोग विकास की धीमी गति से थक चुके थे और बदलाव चाहते थे। हमारी रैलियों में भी सरकार विरोधी भावना साफ नजर आई।”

उन्होंने कहा, “अब राज्य के लोग दोनों सरकारों के बीच के अंतर को साफ महसूस कर रहे हैं। एक प्रदर्शन कर रही है और दूसरी ने कभी नहीं किया। मुझे पूरा भरोसा है कि लोग कांग्रेस को समर्थन देंगे जिसकी राज्य के विकास और सम्पन्नता के लिए काम करने की मजबूत इच्छाशक्ति है।”

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मोदी की किसान आय योजना सही उपाय नहीं : चिदंबरम

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नई दिल्ली, 9 फरवरी | पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने अंतरिम बजट में सरकार द्वारा किसानों के लिए की गई सीधी आय सहयोग योजना (डायरेक्ट इनकम सपोर्ट स्कीम) को विलाप बताया।

उन्होंने कहा कि यह सही उपाय के बदले एक विलाप है क्योंकि इसका लाभ सिर्फ भूस्वामी को ही मिलेगा और गरीबों का एक बड़ा वर्ग वंचित रह जाएगा।

उधर, राहुल गांधी ने घोषणा की है कि उनकी पार्टी के सत्ता में आने पर देशभर के किसानों का कर्ज माफ किया जाएगा। उनकी इस घोषणा की आलोचनाओं को खारिज करते हुए चिदंबरम ने कहा कि कृषि क्षेत्र के लिए इसकी जरूरत है।

कांग्रेस द्वारा गरीबों के लिए किए गए न्यूनतम आय गारंटी के वादे का बचाव करते हुए पूर्व वित्तमंत्री ने कहा कि यह लागू होने योग्य योजना है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के घोषणा पत्र में इस योजना की रूपरेखा की व्याख्या की जाएगी कि यह किस प्रकार लागू होगी।

चिदंबरम ने अपनी किताब ‘अनडॉटेड-सेविंग द आइडिया ऑफ इंडिया’ के विमोचन के मौके पर आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा, “यह (सरकार की किसान राहत योजना) एक विलाप है। यह कहना सही युक्ति नहीं कि मैं आपके हर परिवार को 6,000 रुपये देता हूं। ये 6,000 रुपये किनको मिलेंगे? भूस्वामियों को यह रकम मिलेगी। भू-स्वामी खुद कृषक हो सकते हैं। लेकिन अनेक मामलों में भूस्वामी नदारद रहते हैं क्योंकि वे राज्य की राजधानी में बैठे होते हैं।”

उन्होंने कहा, “काश्तकार किसानों को पैसे नहीं मिलते हैं। खेतिहर मजदूरों को पैसे नहीं मिलते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले खेती नहीं करने वाले सुनार, बढ़ई, लुहार, दुकानदार और दर्जी को पैसे नहीं मिलते हैं।”

कांग्रेस नेता ने कहा कि अगर सरकार गरीबों की मदद की बात कर रही है तो फिर वह अधिकांश गरीबों को छोड़कर सिर्फ भू-स्वामियों को क्यों इस योजना का लाभ दे रही है। हालांकि उनमें गरीब भूस्वामी हो सकते हैं, लेकिन उनमें अनुपस्थित रहने वाले भू-स्वामी (ऐसे लोग हैं जो गांव में रहते ही नहीं हैं और अपनी जमीन खेती के लिए किराए पर किसी काश्तकार को देते हैं।) भी शामिल हैं।

उन्होंने कहा, “इसलिए इससे गरीबों को फायदा नहीं होता है।”

मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम समेत अन्य लोगों द्वारा कृषि कर्जमाफी की आलोचना किए जाने पर चिदंबरम ने कहा कि कर्ज के बोझ तले दबे लोगों की मदद करना सरकार का कर्तव्य है।

कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम ने कृषि कर्जमाफी को नैतिक संकट बताया है।

चिदंबरम ने कहा, “कर्जमाफी को अनैतिक बताने पर मुझे हंसी आती है। तो फिर आप उद्योपतियों के लिए बैंकों को राहत (हेयरकट) देने के लिए क्यों कहते हैं। इसलिए नैतिकता के तर्क को इससे अलग रखें और सरल अर्थशास्त्र और कृषि से जुड़े लोगों की समस्या पर गौर करें।”

उन्होंने कहा, “कर्जदार किसान 90,000 से लेकर एक लाख रुपये का कर्ज कैसे चुका सकता है, क्योंकि वह आईसीयू में है। आपको सबसे पहले उनकी जिंदगी बचानी है। उनको तंदुरुस्त करना है। कर्जमाफी का यही मकसद है। अगर लोग सूखा या बाढ़ या अन्य कारणों से कर्ज में दबे हुए हैं तो सरकार कैसे कह सकती है कि मैं आपको कर्ज से राहत नहीं दूंगा।”

हालांकि वह इस बात से सहमत हैं कि यह पूर्ण समाधान नहीं है। कांग्रेस ने कहा, “इसके बाद आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि उत्पादकता और उत्पादन में बढ़ोतरी हो और किसानों को उनकी फसलों का वाजिब दाम मिले। अगर आप ऐसा करने में विफल होंगे तो 10 साल बाद आपको वैसी ही समस्या से जुझना पड़ेगा।”

रोजगार सृजन से जुड़े सवालों पर चिदंबरम ने कहा, “कांग्रेस को मालूम है कि रोजगार का सृजन कैसे होता है। हमें मालूम है कि नौकरियां देनेवाले क्षेत्र कौन-कौन से हैं। हमारे घोषणा पत्र में यह बताया जाएगा कि नौकरियां देने वाले क्षेत्रों के माध्यम से नौकरियां कैसे पैदा की जा सकती हैं।”

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