Connect with us
Modi Aiyer Modi Aiyer

Viral सच

भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी समस्या: तुम करो तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला!

Published

on

जिन लोगों ने भारत को आज़ाद करवाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि आज़ादी के महज 70 साल बाद ही उनके वंशजों की राजनीति का सबसे बड़ा सूक्ति वाक्य होगा, ‘तुम करो तो रासलीला, हम करें तो कैरेक्टर ढीला!’ इसे ही शायर अकबर इलाहाबादी (1846-1921) ने कहा कि ‘वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होती, हम आह भी भरते हैं तो हो जाते हैं बदनाम!’ दरअसल, भारतीय राजनीति अब बात का बतंगड़ बनाने की सारे सीमाएँ तोड़ चुकी है।

प्रधानमंत्री को ‘नीच’ कहा गया, लेकिन उन्होंने उसे ‘नीच कुल’ बना दिया। मणि शंकर अय्यर के बयान से मोदी इतनी बुरी तरह आहत हुए कि वो गुजरात की जनता के आगे वैसे ही सुबकते हुए अपनी चोट दिखाने लगे जैसे कोई छोटा बच्चे रोते हुए अपने भाई-बहनों या संगी-साथी से झगड़े की शिकायतें परिवार के बड़ों से करता है! इसकी पृष्ठभूमि वो झुझलाहट है जो मोदी को गुजरात के चुनावी माहौल में झेलनी पड़ रही है। इसीलिए चुनावी रैली में मोदी कहते हैं कि ‘श्रीमान मणिशंकर अय्यर ने आज कहा कि मोदी नीच है। मोदी नीच जाति का है। क्या यही भारत की महान परम्परा है? ये गुजरात का अपमान है। मुझे तो मौत का सौदागर तक कहा जा चुका है। गुजरात की सन्तानें इस तरह की भाषा का तब जवाब दे देगी, जब चुनाव के दौरान कमल का बटन दबेगा। मुझे भले ही नीच कहा है। लेकिन आप लोग अपनी गरिमा मत छोड़िएगा।’

मोदी का ये बयान एक-पक्षीय है। उनकी पार्टी का प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा, जहाँ उन्हीं के नक्शे-क़दम पर चलते हुए टीवी कैमरे के सामने भावुकता के आँसू बहाता नज़र आता है, वहीं इसी शख़्स को काँग्रेस और राहुल गाँधी को ‘बाबर भक्त’ और ‘ख़िलज़ी के रिश्तेदार’ कहते शर्म नहीं आयी। अभी-अभी गुजरात में ही राहुल को ढोंगी हिन्दू, नकली जनेऊधारी कहने वालों को क्या नरेन्द्र मोदी ने लताड़ लगायी? मोदी ये करते कैसे! वो तो ख़ुद अव्वल दर्जे के बड़बोले हैं। उन्होंने राहुल के शिव-भक्त होने पर चटकारें लीं। काँग्रेस के संगठन चुनाव और राहुल गाँधी के नामांकन को ‘औरंगज़ेब राज’ कहा। ये मोदी ही थे जिन्होंने शशि थरूर की पत्नी को 50 करोड़ की गर्लफ्रेंड कहा था।

अभी-अभी केन्द्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने काँग्रेस पार्टी को ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ कह डाला। इससे पहले सोनिया गाँधी को विदेशी, इटालियन जैसी कितनी ही बातें संघियों ने बोली। सुषमा स्वराज ने भी 2004 में अपना सिर मुड़ाने की धमकी दी थी। अभी-अभी अमित शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को ‘नमूना’ कहा। उन्हें देहाती औरत, मौनी बाबा, नपुसंक, साला, नामर्द वग़ैरह कितने ही विशेषणों से यही संघी नवाज़ चुके हैं। अमित शाह ने ही महात्मा गाँधी के लिए ‘चतुर बनिया’ जैसे बाज़ारू शब्दों का इस्तेमाल किया। तब भगवा ख़ानदान के बुज़ुर्गों और संस्कारी लोगों ने अपने चेले-चपाटियों को भाषायी संयम के उपदेश क्यों नहीं दिये? सच्चाई ये है कि संघियों के गन्दे बोल ने भारतीय राजनीति से सौहार्द ख़त्म कर दिया।

ऐसा भी नहीं है कि बीजेपी के छुटभैय्ये नेताओं के अंटशंट बयान को काँग्रेसी नेताओं की ओर से प्रतिक्रियात्मक जबाव नहीं मिला। गुजरात दंगों पर जिस तरह से लीपापोती की गयी उसे देखते हुए नरेन्द्र मोदी को ‘मौत का सौदागर’ कहा गया। 2014 के चुनाव से पहले मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि ‘मोदी चुनाव नहीं जीतने वाले। अलबत्ता, वो चाहें तो यहाँ काँग्रेस के अधिवेशन में आकर चाय ज़रूर बेच सकते हैं।’ इस बयान को तोड़मरोड़कर मोदी ने ख़ुद को ‘चायवाला’ बना लिया। अभी गुजरात की रैली में ही मोदी ने मणिशंकर अय्यर के हमले का जबाव देते हुए कहा कि ‘उनमें मुग़लों के संस्कार हैं। इसलिए वह इस तरह की बातें करते हैं। देश के पीएम के लिए ऐसे शब्द सिर्फ़ ऐसा ही व्यक्ति कह सकता है, जिसके संस्कारों में खोट हो।’ यहाँ मोदी ने अय्यर के संस्कारों पर हमला किया वो तो ठीक है, लेकिन उन्हें मुग़लों के संस्कार वाला बताने की क्या ज़रूरत थी?

यहाँ ये भी समझना बहुत ज़रूरी है कि आख़िर मणिशंकर अय्यर ने ऐसा क्या कहा था कि उन्हें राहुल गाँधी के दख़ल के बाद माफ़ी भी माँगनी पड़ी  और 75 साल की उम्र में पार्टी से निलम्बित होने की सज़ा भी मिली। अय्यर ने कहा था कि ‘मोदी को गाँधी परिवार के बारे में उस वक़्त ऐसी गन्दी बातें करने की क्या ज़रूरत थी जब दिल्ली में आम्बेडकर की याद में एक बड़े भवन का शुभारम्भ हो रहा है। इससे तो मुझे लगता है कि ये (मोदी) बहुत नीच किस्म का आदमी है। इसमें कोई सभ्यता नहीं है। ऐसे मौके पर ऐसी गन्दी राजनीति की क्या आवश्यकता है?’ यहाँ ये जानना भी दिलचस्प है कि ‘नीच’ स्वभाव को ज़ाहिर करने के लिए शब्दकोष में दर्जनों समानार्थी शब्द हैं। अँग्रेज़ी में तो इसके लिए कम से कम 74 शब्द हैं, जिन्हें इस लेख में अन्त में दिया भी गया है।

इससे पहले समारोह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जवाहर लाल नेहरू पर भीमराव आम्बेडकर के साथ पक्षपात करने और उनकी भूमिका को कम करके दिखाने का आरोप मढ़े थे। उससे पहले मोदी ने सरदार पटेल और सुभाष चन्द्र बोस जैसे काँग्रेस के बड़े नेताओं को लेकर भी ख़ूब झूठी बातें की हैं। सच तो ये भी है कि संघ-बीजेपी के नेताओं की एक स्थायी नीति रही है ‘विरोधियों का चरित्रहनन’ करने की। बीजेपी के कुछ नेताओं ख़ासकर साक्षी महाराज, गिरिराज सिंह और विनय कटियार जैसे लोगों की तो पहचान की सिर्फ़ बिगड़े बोलों की वजह से है। संघ-बीजेपी के लिए सैकड़ों लोगों को बाक़ायदा ग़ालियाँ और अपशब्द लिखने के लिए भर्ती किया गया है। इनका काम ही है ‘विरोधियों का चरित्रहनन करना’ और उसे सोशल मीडिया पर फैलाना।

समाज में भी अब ऐसा नहीं रहा कि आप किसी को अपशब्द बोलेंगे और उससे प्रतिक्रिया नहीं मिलेगी। कभी ‘ग़ाली’ का जबाव ‘बड़ी ग़ाली’ बनता है, तो कभी ग़ाली-गलौज़ की वजह से ही मारपीट की नौबत आ जाती है। लगातार लोगों के दिमाग़ में जहर भरने से एक उन्मादी फ़ौज तैयार हो जाती है, जो ज़रा सा इशारा मिलने ही साम्प्रदायिक दंगों को जन्म देती है। ज़रूरत पड़ने पर इसी उन्मादी मानसिकता से वो कारसेवक पैदा होते हैं, जो कुछ ही घंटों में बाबरी मस्जिद को नेस्तनाबूद कर देते हैं। यही मानसिकता कुछ लोगों को आतंकवाद की ओर भी ले जाती है। लगातार लोगों के दिमाग़ में ज़हर भरने के नतीज़े वैसे ही भयावह होते हैं, जैसा हमने अभी-अभी मेवाड़ के राजसमन्द ज़िले में मेवाड़ी युवक शम्भू लाला रेगर की बर्बरता के रूप में देखा है, जिसने माल्दा के 50 वर्षीय मज़बूर अफ़राज़ुल को पीट-पीटते मार जाने के बाद उस पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। इसीलिए राजनीति के इतने छिछोरे स्तर तक गिर जाने को यदि आप हँसी-मज़ाक या लतीफ़ेबाज़ी समझकर नज़रअन्दाज़ करना चाहते हैं, तो याद रखिए कि लोकतंत्र के लिए अमर्यादित शब्द बेहद घातक साबित हो रहे हैं। क्योंकि यदि जहरीली बयानबाज़ियाँ बन्द नहीं हुईं तो वो दिन भी दूर नहीं जब हम अपने नेताओं को एक-दूसरे के ख़ून का प्यासा बनकर हाथों में नंगी तलवार लिये घूमता देखेंगे। यदि किसी को ये लगता है कि बयान-वीरों को सुधारने का काम उनकी पार्टियाँ ही कर लेंगी तो वो मुग़ालते में है। यदि ये मुमकिन होता तो राजनीति के अपराधीकरण पर भी नकेल कस ली जाती। नेताओं को सुधारने का काम जनता को ही करना होगा। चाहे इसमें वक़्त जो भी लगे। जनता को अनर्गल बयान देने वालों से नफ़रत करना सीखना होगा। चुनाव में उन्हें हराना होगा।

Hindi to English with Synonyms

– नीच

[neech]

1. lowly: नीच, नम्र, अधीन, नीचा, अधम

2. wretched: नीच, अतिदुखी, घृणायोग्य, निकम्मा, अधम

3. low: निम्न, नीच, हल्का, सामान्य

4. cowardly: कायर, नीच

5. craven: डरपोक, नीच, उत्साहहीन

6. degenerate: भ्रष्ट, कुलाचार, अपकृष्ट, अधम, नीच

7. demiss: आत्‍म-समर्पणशील, नीच, अघम, पतित

8. execrable: घृणित, गर्हणीय, नीच, अधम

9. hang dog: कमीना, नीच, अधम

10. humble: नीच, क्षुद्र, अल्पमति, विनयशील

11. low clown: दीनहीन, नीच, कमीना

12. mingy: नीच, कमीना

13. pleb: नीच, घटिया व्यक्ति, निम्‍न वर्ग का व्‍यक्ति

14. proletarian: साधारण, नीच

15. sorry: नीच, दुःखी, शोकार्त, अधम

16. slavish: कमीना, दासवत, दास सम्बन्धी, नीच, परिश्रमी

17. sneak: नीच, अधम मनुष्य, मुखबिर, चुगलखोर

18. lousy: घटिया, गंदा, नीच, घिनावना, बीभत्स से भरपूर

– नीच

adjective

1. vile: नीच, घिनौना, नीचतापूर्ण, पाजी

2. despicable: नीच, घिनौना, कुत्सित, नफ़रत पैदा करनेवाला, तिरस्कार-योग्य

3. dishonorable: नीच, लज्जाजनक, अपमानपूर्ण, बेइज़्ज़त

4. ignoble: नीच, अकुलीन, अप्रतिष्ठित

5. sneaky: डरपोक, नीच, चापलूस, पाजी, ख़ुशामदी

6. sordid: घिनौना, नीच, पतित

7. moldy: खोटा, फफूंदी लगा हुआ, पुराने ढंग का, नीच, बुरा, पुराने फ़ैशन का

8. reprobate: नीच, पाजी, नीचतापूर्ण

9. poky: सँकरा, नीच, तंग, तुच्छ, गंदा, कम

10. miscreant: नीच, भ्रष्ट, पाजी

11. fiendish: पैशाचिक, नीच, दुष्ट

12. shabby: जर्जर, नीच, दरिद्र, कंजूस, मलीन, अन्यायी

13. mean: नीच, मध्य, तुच्छ, बीच का, मंझला, अधम

14. pitchy: नीच, रालयुक्त, राल का, रालदार, चिपचिपा, लसदार

15. sneaking: चापलूस, छिपा हुआ, नीच, पाजी, गुप्त

16. base: आधारभूत, बुनियादी, नीच, खोटा, क्षुद्र

17. villainous: शरारतपूर्ण, नीच, दुर्जनोचित, घिनौना, बुरा

18. ribald: नीच, अशिष्ट

19. dirty: गंदा, मैला, मलिन, नीच, मैली, गंदला

20. pitiful: दयापूर्ण, रहमदिल, कृपालु, दयालू, नीच, पाजी

21. ghoulish: घृणास्पद, घिनौना, शैतान का, दुष्ट, नीच, पिशाच का

22. dastardly: कायर, नीच, नीचतापूर्ण, डरपोक

23. scabby: खुजलीवाला, नीच, खुजली का, पपड़ीदार, रूखा

24. nasty: बुरा, दुष्ट, नीच, घिनौना, घृणास्पद

25. hangdog: नीच, पाजी, नीचतापूर्ण

26. picayune: छोटा, निकम्मा, नीच, पाजी, तुच्छ

27. unblooded: नीचा, नीच, अशुद्ध, अधम, ख़राब

28. scurvy: रूसीदार, पाजी, अशिष्ट, बेअदब, रक्तस्राव रोग का, नीच

29. nefarious: कुटिल, बेईमान, नीच, खोटा

30. abject: अधम, नीच

31. meanspirited: कंजूस, पाजी, लोभी, नीच, नीचतापूर्ण

32. scummy: झागदार, फेनिल, नीच, पाजी

33. paltry: तुच्छ, क्षुद्र, निकम्मा, नीच

34. shocking: भयानक, घिनौना, दिल दहलानेवाला, घृणाजनक, बीभत्स, नीच

35. unroyal: नीच

36. plebeian: लौकिक, असभ्य, नीच, अशिष्ट, सामान्य मनुष्य-संबंधी

37. bass: नीच

38. scoundrelly: नीच, अधम, पाजी, दुष्ट

39. undeveloped: अविकसित, पिछड़ा हुआ, अधकचरा, अनुन्नत, नीच

40. doggerel: खोटा, भद्दा, बेजोड़, असंगत, बेहूदा, नीच

41. rotting: पाजी, नीच, नीचतापूर्ण

42. stingy: कंजूस, नीच, मक्खीचूस, डंक मारनेवाला

43. third-rate: ख़राब, बुरा, नीच

44. dishonourable: नीच, लज्जाजनक, अपमानपूर्ण, बेइज़्ज़त

45. mouldy: खोटा, फफूंदी लगा हुआ, पुराने ढंग का, नीच, बुरा, पुराने फ़ैशन का

46. noun – नीच

47. reprobate: नीच, बदमाश, पाजी, कापुस्र्ष

48. miscreant: नीच, बदमाश, कापुस्र्ष, पाषंडी, नीच मनुष्य, विधर्मी

49. scoundrel: बदमाश, लुच्चा, दुष्ट, नीच, लफ़ंगा, दुरात्मा

50. rascal: दुष्ट, पापी, नीच, धूर्त व्यक्ति

51. rotter: बदमाश, कापुस्र्ष, पाजी, नीच

52. dog: कुत्ता, नीच, शूर, पाजी, बदमाश, लौंडा

53. pimp: दलाल, कुटना, भड़ुआ, पाजी, नीच, बदमाश

54. sycophant: चापलूस, अति अनुरोधी, चुगलखोर, नीच

55. groveller: अधम, नीच

Viral सच

ये सरासर झूठ है कि भारतीय अर्थव्यवस्था ने फ़्राँस को पछाड़ दिया है!

यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है?

Published

on

Indian economy

भारत का भक्त-मीडिया आपको ये तो बताता है कि हम अब दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में छठे स्थान पर आ चुके हैं और अब फ़्राँस से आगे हैं। लेकिन वो आपको ये नहीं बताता कि भारतीयों के मुक़ाबले फ़्राँसिसियों की प्रति व्यक्ति आय 20 गुना ज़्यादा है। आपको ये भी नहीं बताया जाता कि फ़्राँस की आबादी से ज़्यादा लोग भारत में आज भी ग़रीबी रेखा से नीचे हैं। राजा का बाजा बन चुका भारतीय मीडिया आपको ये भी नहीं समझता कि कैसे मोदी सरकार ने भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास-दर का हिसाब रखने वाले फ़ार्मूले को ही बदल दिया, जिसकी वजह से मनमोहन सरकार के मुक़ाबले अभी दर्ज होने वाली विकास-दर में दो फ़ीसदी का इज़ाफ़ा अपने आप आ जाता है।

भारतीय मीडिया अपने आप बेईमान नहीं हो गया। मोदी राज में एक बड़ी साज़िश के तहत मीडिया संस्थानों को हिदायत दी गयी कि वो ख़बरों को ऐसे तोड़-मरोड़कर पेश करें, जिससे जनता के सामने हमेशा सरकार की उपलब्धियों की झूठी तस्वीरें ही पहुँचती रहें। वर्ना, हरेक पेशेवर पत्रकार और उसके मीडिया संस्थान को अच्छी तरह पता है कि भारत का फ़्राँस से आगे निकलना सिर्फ़ एक आँकड़ा है। आँकड़ों की तुलनात्मक व्याख्या के बग़ैर वो सिर्फ़ अंक हैं और कुछ नहीं! किसी देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने का मतलब है कि उसकी आबादी की ख़ुशहाली का बढ़ना। ख़ुशहाली को नापने के कई पैमाने हैं। लेकिन सबसे आसान है प्रति व्यक्ति आय। दूसरा पैमाना है कि शिक्षा-स्वास्थ्य-सड़क-पानी-बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं का स्तर और इस पर होने वाला ख़र्च।

अब ज़रा ये सोचिए कि क्या आप उस व्यक्ति को ज़्यादा धनवान मानेंगे जिसके पास ज़्यादा ज़मीन हो या फिर उसे जिसके पास ज़्यादा उपजाऊ ज़मीन हो? हो सकता है कि किसी के पास सौ बीघा ज़मीन हो, लेकिन वो बंजर हो। जबकि किसी के पास दस बीघा ही हो और वो खेतीहर हो। अब यदि आप अंक के आधार पर सोचेंगे तो ज़ाहिर है कि आप सौ को दस के मुक़ाबले दस गुना बड़ा ही मानेंगे। ऐसा ही बड़क्पन विश्व बैंक की ओर से जारी सालाना, सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का है। ये आँकड़ा कहता है कि साल 2017 में भारत की जीडीपी 2597 अरब डॉलर हो गयी, जबकि फ़्राँस की जीडीपी 2582 अरब डॉलर दर्ज की गयी। ये आँकड़ा ऊपर दिये गये उदाहरण के मुताबिक़, सकल या कुल ज़मीन जैसा है।

विश्व बैंक के आँकड़े के आधार पर ये हर्ग़िज़ नहीं कहा जा सकता कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। क्योंकि फ़्राँस के 6.04 करोड़ लोगों की उत्पादकता की तुलना यदि भारत 134 करोड़ की आबादी की उत्पादकता से की जाएगी तो हम उसके मुक़ाबले बेहद बौने साबित होंगे। इसीलिए, लोगों की ख़ुशहाली जानने के लिए प्रति व्यक्ति आय को आधार माना जाता है। फ़्राँसिसियों की सालाना प्रति व्यक्ति आय जहाँ 38,477 डॉलर है, वहीं भारत के मामले में ये सिर्फ़ 1,940 डॉलर ही बैठती है। इसका मतलब ये हुआ कि एक आम फ़्राँसिसी नागरिक के मुक़ाबले एक आम भारतीय 20 गुना ग़रीब है।

लगे हाथ ग़रीबी को भी समझते चलें। वर्ल्ड पावर्टी क्लॉक और ब्रूकिंग्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अब भी भारत में 7 करोड़ लोग बेहद ग़रीबी में जी रहे हैं। भारत अब दुनिया में सबसे ज़्यादा ग़रीबों की आबादी वाला देश नहीं रहा। क्योंकि नाइजीरिया में बेहद ग़रीब लोगों की आबादी 8.7 करोड़ है। ग़रीबों की संख्या की तुलना करने वक़्त भी ये ग़ौर करना ज़रूरी होगा कि बीते दशकों में देश की कुल आबादी में बेहद ग़रीबों की संख्या और उनका अनुपात क्या रहा है? क्या मोदी राज में ग़रीब घटे हैं? कुल आबादी में ग़रीबों का अनुपात कम हुआ है? क्या ये संख्या और अनुपात मोदी राज से पहले की सरकारों के मुक़ाबले बेहतर हुआ है या बदतर? याद रखिये कि संख्या का महत्व बेहद मामूली है। असली आँकड़ा तो अनुपात का है। यदि अनुपात सुधर रहा है, तभी हम बेहतर हो रहे हैं। वर्ना, नहीं।

इसी तरह, विश्व बैंक की रिपोर्ट की आड़ में भक्त-मीडिया हमें बता रहा है कि नोटबन्दी और जीएसटी से भारतीय अर्थव्यवस्था में तेज़ी आयी है। और, बीते दशक में भारत की जीडीपी दोगुनी हो गयी है। जबकि सच्चाई ये है कि मोदी सरकार यही झूठ तो फैलाना चाहती है। सवाल है कि ये तेज़ी क्या होती है? तेज़ एक तुलनात्मक दशा है। सजातीय की तो तुलना हो सकती है, लेकिन विजातीय की नहीं। मिसाल के तौर पर, साइकिल और बाइक की रफ़्तार की तुलना नहीं हो सकती, हाथी और घोड़े की ताक़त की तुलना नहीं हो सकती, स्त्री और पुरुष की तुलना नहीं हो सकती। लिहाज़ा, जब हम विकास-दर की तेज़ी पर ग़ौर करें, तब ये देखना ज़रूरी होगा कि सम्बन्धित अर्थव्यवस्था का आकार कितना बड़ा है। चीन की अर्थव्यवस्था भारत से छह गुना बड़ी है। वास्तविक मात्रा के लिहाज़ से उनका आकार का 6 फ़ीसदी हमारे आकार के 36 फ़ीसदी के बराबर होगा।

हम देख चुके हैं कि नोटबन्दी अपने हरेक मक़सद में विफल साबित हुई है। इससे काले धन की कोई रोकथाम नहीं हो सकी। उल्टा, सारा काला धन सरकार की मिली-भगत से सफ़ेद होकर बैंकों में जा पहुँचा। आतंकवाद और नक्सलवाद पर भी नोटबन्दी ने कोई प्रभाव नहीं डाला। कैश-लेस यानी डिज़ीटाइज़ेशन के मोर्चे पर भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं हुआ। दूसरी ओर, नोटबन्दी का भारी-भरकम ख़र्च अर्थव्यवस्था पर पड़ा। करोड़ों लोगों का काम-धन्धा चौपट हो गया। रोज़गार-व्यापार पर ऐसा असर पड़ा कि अभी तक हालात सामान्य नहीं हो पाया है। इसी तरह, जीएसटी को भी जिस तरह से लागू किया गया, उसने महँगाई तथा जनता की मुश्किलों को बढ़ाया ही।

इस तरह, बीते एक दशक में भारत की जीडीपी के दोगुना होने की बातों को भी गहराई से समझना बेहद ज़रूरी है। दस साल की उपलब्धि में से मोदी राज के चार साल की औसत विकास-दर की तुलना मनमोहन सिंह सरकार के छह सालों की औसत विकास-दर से करने पर पता चलेगा कि मौजूदा चार साल के मुक़ाबले उससे पहले के छह साल बेहद उम्दा थे। मनमोहन सरकार में औसत विकास-दर 8.5 फ़ीसदी रही, जबकि मोदी राज में यही औसत 6.5 फ़ीसदी का रहा है। इससे दशक का औसत 7.7 फ़ीसदी बैठेगा। अब ज़रा सोचिए कि जो ख़ुद को तेज़ बता रहे हैं क्या वो अपने से पहले वालों के मुक़ाबले 1.2 अंक या 18 फ़ीसदी धीमे नहीं है!

इसी धीमेपन का दूसरे पहलू को भी हमें समझना होगा कि यदि भारत की जीडीपी एक दशक में दोगुनी हो गयी और वो कौन-कौन से देश हैं, जिनकी जीडीपी इसी दौरान भारत की जीडीपी से पहले दोगुनी हुई है? ऐसी तुलना के बग़ैर कोई कैसे कह सकता है कि हमारी उपलब्धि औरों से बेहतर है। विकास-दर की तुलना करते समय ये देखना भी ज़रूरी है कि अलग-अलग अर्थव्यवस्थाओं में महँगाई और मुद्रास्फीति का दशा क्या रही है? क्योंकि जिन देशों में महँगाई नियंत्रण में है, वहाँ ब्याज़-दरें बहुत कम हैं। उनकी मुद्रा की क्रय-शक्ति जहाँ दस साल पहले जितनी ही है, वहीं हमारे रुपये की औक़ात कहीं ज़्यादा कम हो चुकी है। लिहाज़ा, मुमकिन है कि हम रुपये ज़्यादा कमाने लगें, लेकिन ज़रूरी नहीं कि ज़्यादा रुपयों से हमारी ख़ुशहाली भी बढ़ी ही होगी। इसीलिए, हमें आँकड़ों की बाज़ीगरी को समझना आना चाहिए।

Continue Reading

Viral सच

बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर

Published

on

Climate change

मार्च 2014 में संयुक्त राष्ट्र की एक वैज्ञानिक समिति के प्रमुख ने चेतावनी दी है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का प्रदूषण कम नहीं किया गया तो जलवायु परिवर्तन का दुष्प्रभाव बेकाबू हो सकता है। ग्रीनहाउस गैसें धरती की गर्मी को वायुमंडल में अवरुद्ध कर लेती हैं, जिससे वायुमंडल का तामपान बढ़ जाता है और ऋतुचक्र में बदलाव देखे जा रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति ने इस विषय पर 32 खंडों की एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट 2610 पृष्ठ की है।

समय की पुकार है कि अब कार्रवाई की जाए। ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं किया गया, तो हालात बेकाबू हो जाएंगे। नोबल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के दल द्वारा तैयार इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने यह दिखा दिया है कि मानवता के लिए मौसम का खतरा कितना बड़ा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अधिक बढ़ा तो खतरा और बढ़ जाएगा।

Image result for climate change,

अभी हाल ही में उत्तर भारत के कई राज्यों के साथ-साथ हिमालय पर स्थित नेपाल में आया भूकंप, उत्तराखण्ड में आई भीषण प्राकृतिक आपदा, जापान के पिछले 140 सालों के इतिहास में आए सबसे भीषण 8.9 की तीव्रता वाले भूकंप की वजह से प्रशांत महासागर में आई सुनामी के साथ ही यूरोप में जानलेवा लू, अमेरिका में दावानल, आस्ट्रेलिया में भीषण सूखा और मोजाम्बिक, थाईलैंड और पाकिस्तान में प्रलयकारी बाढ़ जैसी 21वीं शताब्दी की आपदाओं ने सारे विश्व का ध्यान इस अत्यन्त ही विनाशकारी समस्या की ओर आकर्षित किया है।

कुछ समय पूर्व पर्यावरण विज्ञान के पितामह जेम्स लवलौक ने चेतावनी दी थी कि यदि दुनिया के निवासियों ने एकजुट होकर पर्यावरण को बचाने का प्रभावशाली प्रयत्न नहीं किया तो जलवायु में भारी बदलाव के परिणामस्वरूप 21वीं सदी के अन्त तक छह अरब व्यक्ति मारे जाएंगे। संसार के एक महान पर्यावरण विशेषज्ञ की इस भविष्यवाणी को मानव जाति को हलके से नहीं लेना चाहिए।

Related image

आज जब दक्षिण अमेरिका में जंगल कटते हैं तो उससे भारत का मानसून प्रभावित होता है। इस प्रकार प्रकृति का कहर किसी देश की सीमाओं को नहीं जानती। वह किसी धर्म किसी जाति व किसी देश व उसमें रहने वाले नागरिकों को पहचानती भी नहीं। वास्तव में आज पूरे विश्व के जलवायु में होने वाले परिवर्तन मनुष्यों के द्वारा ही उत्पन्न किये गये हैं। परमात्मा द्वारा मानव को दिया अमूल्य वरदान है पृथ्वी, लेकिन चिरकाल से मानव उसका दोहन कर रहा है। पेड़ों को काटकर, नाभिकीय यंत्रों का परीक्षण कर वह भयंकर जल, वायु और ध्वनि प्रदूषण फैला रहा है। जिस पृथ्वी का वातावरण कभी पूरे विश्व के लिए वरदान था आज वहीं अभिशाप बनता जा रहा है।

डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में दिसम्बर, 2010 में आयोजित सम्मेलन में दुनिया भर के 192 देशों से जुटे नेता जलवायु परिवर्तन से संबंधित किसी भी नियम को बनाने में सफल नहीं हुए थे। इस सम्मेलन के तुरंत बाद आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ब्राउन ने कहा कि ‘यह तो बस एक पहला कदम है, इसे कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाने से पहले बहुत से कार्य किये जाने हैं। असली दिक्कत यह है कि सार्वभौमिक हित का मसला होते हुए भी यहा राष्ट्रीय हितों का विकट टकराव है। हमारा मानना है कि कई दशकों से पर्यावरण बचाने के लिए माथापच्ची कर रही दुनिया अब अलग-अलग देशों के कानूनों से ऊब चुकी है। विश्व की कई जानी-मानी हस्तियों का मानना है कि अब अंतर्राष्ट्रीय अदालत बनाने का ही रास्ता बचा है, ताकि हमारी गलतियों की सजा अगली पीढ़ी को न झेलनी पड़ी।

अभी हाल ही में सैन फ्रांसिस्को स्थित गोल्डमैन एनवार्नमेंट फाउंडेशन द्वारा भारत के रमेश अग्रवाल को पर्यावरण के सबसे बड़े पुरस्कार ‘गोल्डमैन प्राइज’ से नवाजा गया है। उन्होंने छत्तीसगढ़ में अंधाधुंध कोयला खनन से निपटने में ग्रामीणों ने मदद की और एक बड़ी कोयला परियोजना को बंद कराया। रमेश अग्रवाल छत्तीसगढ़ में काम करते हैं और वह लोगों की मदद से एक बड़े प्रस्तावित कोयला खनन को बंद कराने में सफल रहे। उनके साथ इस पुरस्कार को पाने वाले अन्य लोगों में पेरु, रूस, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और अमरीका के 6 पर्यावरण कार्यकर्ता शामिल हैं। इन सभी विजेताओं को प्रत्येक को पौने दो लाख डालर की राशि मिलेगी। इससे पहले ग्लोबल वार्मिग के खिलाफ लड़ाई के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के क्लाइमेट पैनल के राजेन्द्र पचौरी और अमेरिका के पूर्व उप राष्ट्रपति अलगोर को शांति के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है।

हमारी पूर्व पीढ़ियों ने तो हमारे भविष्य की चिंता की और प्रकृति की धरोहर को संजोकर रखा जबकि वर्तमान पीढ़ी प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने में लगी है। एक बार गांधीजी ने दातुन मंगवाई। किसी ने नीम की पूरी डाली तोड़कर उन्हें ला दिया। यह देखकर गांधीजी उस व्यक्ति पर बहुत बिगड़े। उसे डांटते हुए उन्होंने कहा ‘जब छोटे से टुकड़े से मेरा काम चल सकता था तो पूरी डाली क्यों तोड़ी? यह न जाने कितने व्यक्तियों के उपयोग में आ सकती थी।’ गांधीजी की इस फटकार से हम सबको भी सीख लेनी चाहिए। प्रकृति से हमें उतना ही लेना चाहिए जितने से हमारी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है।

जलवायु परिवर्तन की समस्या पर अभी हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी कहा है कि जलवायु परिवर्तन पृथ्वी पर ऐसे बदलाव ला रहा है जिससे मानव जाति पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। उन्होंने अमेरिका के लोगों से स्वस्थ एवं बेहतर भविष्य के लिए पर्यावरण सुरक्षा का आग्रह किया। वास्तव में आज मानव और प्रकृति का सह-संबंध सकारात्मक न होकर विध्वंसात्मक होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में पर्यावरण का प्रदूषण सिर्फ किसी राष्ट्र विशेष की निजी समस्या न होकर एक सार्वभौमिक चिंता का विषय बन गया है। पर्यावरण असंतुलन हर प्राणी को प्रभावित करता है। इसलिए पर्यावरण असंतुलन पर अब केवल विचार-विमर्श के लिए बैठकें आयोजित नहीं करना है वरन अब उसके लिए ठोस पहल करने की आवश्यकता है, अन्यथा बदलता जलवायु, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर जीवन के अस्तित्व को ही संकट में डाल देंगे। अत: जरूरी हो जाता है कि विश्व का प्रत्येक नागरिक पर्यावरण समस्याओं के समाधान हेतु अपना-अपना योगदान दें।

विश्व भर में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न होने वाले खतरों से निपटने के लिए विश्व के सभी देशों को एक मंच पर आकर तत्काल विश्व संसद, विश्व सरकार तथा विश्व न्यायालय के गठन पर सर्वसम्मति से निर्णय लिया जाना चाहिए। इस विश्व संसद द्वारा विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए जो भी नियम व कानून बनाए जाए, उसे विश्व सरकार द्वारा प्रभावी ढंग से लागू किया जाए और यदि इन कानूनों का किसी देश द्वारा उल्लघंन किया जाए तो उस देश को विश्व न्यायालय द्वारा दण्डित करने का प्राविधान पूरी शक्ति के साथ लागू किया जाए। इस प्रकार विश्व के 2.4 अरब बच्चों के साथ ही आगे जन्म लेने वाली पीढ़ियों को जलवायु परिवर्तन जैसे महाविनाश से बचाने के लिए अति शीघ्र विश्व संसद, विश्व सरकार एवं विश्व न्यायालय का गठन नितान्त आवश्यक है। (आईएएनएस/आईपीएन)

( आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।)

— आईएएनएस

Continue Reading

Viral सच

BJP कॉर्पोरेट की चहेती, 5 पार्टियों के संयुक्त चंदे से 9 गुणा अधिक चंदा मिला : report

Published

on

bjp corporate donations

नई दिल्ली, 30 मई | सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी(भाजपा) को वर्ष 2016-17 में पांच राष्ट्रीय पार्टियों के संयुक्त चंदे का नौ गुणा चंदा प्राप्त हुआ है। एक रपट से यह खुलासा हुआ। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने बुधवार को अपनी रपट में बताया, “भाजपा कॉर्पोरेट दानदाताओं के लिए स्पष्ट रूप से पसंदीदा पार्टी है। इनके द्वारा चंदे के रूप में दी गई यह राशि कांग्रेस को पहले दी गई राशि से 14 गुणा ज्यादा है।”

20,000 रुपये से अधिक चंदा पाने वाली सात राष्ट्रीय पार्टियों द्वारा घोषित चंदे की कुल राशि 589.38 करोड़ रुपये है, जिसे 2,123 चंदों (निजी और कॉर्पोरेट) के द्वारा दिया गया।

भाजपा ने 1,194 चंदों के जरिए प्राप्त 532.27 करोड़ रुपये की घोषणा की, जबकि कांग्रेस ने 599 चंदों के जरिए प्राप्त 41.90 करोड़ रुपये की घोषणा की।

रपट के अनुसार, “एक ही समय में भाजपा द्वारा घोषित चंदा कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी(राकांपा), मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी(माकपा), भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और तृणमूल कांग्रेस द्वारा मिलाकर घोषित किए गए चंदे का नौ गुणा ज्यादा है।”

मायावती की बहुजन समाज पार्टी(बसपा) ने घोषणा की है कि पार्टी को वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान 20,000 रुपये से ज्यादा का चंदा नहीं मिला।

 

रपट के अनुसार, “वित्त वर्ष 2016-17 में कॉर्पोरेट सेक्टर ने 708 चंदों के रूप में 563.24 करोड़ रुपये का चंदा दिया, जबकि 1,354 व्यक्तिगत डोनरों ने 25.07 करोड़ रुपये चंदे के रूप में दिए।”

कॉर्पोरेट घरानों ने भाजपा को 531 बार 515.43 करोड़ रुपये चंदे के रूप में दिए, जबकि 663 व्यक्तिगत डोनरों ने 16.82 करोड़ रुपये चंदे के तौर पर दिए।

वहीं कांग्रेस को कॉर्पोरेट घरानों ने 98 बार चंदा दिया, जिससे उसे 36.06 करोड़ रुपये प्राप्त हुए, वहीं इसी दौरान 501 व्यक्तिग डोनरों ने 5.84 करोड़ रुपये का चंदा दिया।

–आईएएनएस

Continue Reading
Advertisement
जम्मू
अंतरराष्ट्रीय3 mins ago

जम्मू-कश्मीर में 30 टीवी चैनल पर प्रतिबंध

madhyapradesh-wefornews
शहर6 mins ago

मध्य प्रदेश में ‘एक्सीडेंट रिस्पॉन्स सिस्टम’ लागू

Mohmmad shami-
खेल30 mins ago

पंत पहली बार टेस्ट टीम में, शमी की वापसी

delhi high court-min
राष्ट्रीय39 mins ago

दिल्ली हाई कोर्ट ने शिशु पोषण कक्षों की कमी पर केंद्र से मांगा जवाब

richa chadda
मनोरंजन58 mins ago

‘सेव द एलिफेंट्स’ का चेहरा बनीं ऋचा चढ्ढा

supreme-court
राष्ट्रीय1 hour ago

अधिकारियों का तबादला नहीं कर पाने से दिल्ली सरकार शक्तिहीन : आप

parliament-min
राष्ट्रीय2 hours ago

मानसून सत्र: संसद की कार्यवाही जारी

lok sabha-min
राष्ट्रीय2 hours ago

विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में 20 जुलाई को चर्चा

Punjab
राष्ट्रीय2 hours ago

हिमाचल प्रदेश में वायुसेना का मिग-21 प्लेन क्रैश, पायलट की मौत

American University-
अंतरराष्ट्रीय2 hours ago

MBBS करने वाले भारतीयों को स्कॉलरशिप देगी टेक्सिला अमेरिकन यूनिवर्सिटी

TEMPLE-min
ज़रा हटके23 hours ago

भारत के इन मंदिरों में मिलता है अनोखा प्रसाद

theater-min
ज़रा हटके2 weeks ago

ये हैं दुनिया के सबसे शानदार थिएटर…

finland-min
ज़रा हटके1 week ago

रुकने के लिए ही नहीं एडवेंचर के लिए भी खास हैं ये जगह

bundelkhand water crisis
ब्लॉग4 weeks ago

बुंदेलखंड की महिलाएं पानी से भरेंगी धरती का पेट

Santa Monica Pier Area-Ocean Ave
ब्लॉग4 weeks ago

दुनिया के सबसे रोमांटिक डेस्टीनेशंस में से एक है सैंटा मोनिका

Social Media Political Communication in India
टेक2 weeks ago

अभी तो परमात्मा भी हमें सोशल मीडिया के प्रकोप से नहीं बचा सकता!

Femina Miss India 2018 AnuKreethy Vas
राष्ट्रीय4 weeks ago

तमिलनाडु की अनुकृति वास के सिर सजा मिस इंडिया 2018 का ताज

Femina Miss India 2018 AnuKreethy Vas
मनोरंजन4 weeks ago

अकेली मां से मिली परवरिश प्रेरणादायक रही : Miss India World 2018

Madhubani Painting
ज़रा हटके3 weeks ago

मधुबनी पेंटिंग से बदली पटना के विद्यापति भवन की रंगत

Jal Styagrha
ज़रा हटके4 weeks ago

शिवराज के गांव में अवैध रेत खनन रोकने को जल सत्याग्रह

saheb-biwi-aur-gangster-
मनोरंजन3 days ago

संजय की फिल्म ‘साहब बीवी और गैंगस्टर 3’ का पहला गाना रिलीज

Aitbh bacchan-
मनोरंजन4 days ago

बॉलीवुड के इन बड़े सितारों के लाखों ट्विटर फॉलोवर हुए कम

मनोरंजन5 days ago

पर्दे पर मधुबाला और मीना कुमारी का जादू लाना चाहती हूं: जाह्नवी कपूर

fanney-khan-
मनोरंजन6 days ago

‘जवां है मोहब्बत…’ पर ख़ूब थिरकीं ऐश्वर्या, देखें वीडियो

mulk--
मनोरंजन1 week ago

ऋषि कपूर की फिल्म ‘मुल्क’ का ट्रेलर रिलीज

Dilbar Song Satyameva Jayate
मनोरंजन2 weeks ago

‘Satyameva Jayate’ का नया गाना हुआ रिलीज, नोरा फतेही ने दिखाया बेली डांस

मनोरंजन3 weeks ago

‘सूरमा’ का नया गाना ‘गुड मैन दी लालटेन’ रिलीज

varun and sharddha-
मनोरंजन3 weeks ago

गुरु रंधावा के High rated गबरू पर थि‍रकते नजर आए वरुण-श्रद्धा

Fanney Khan-
मनोरंजन3 weeks ago

अनिल कपूर की फिल्म फन्‍ने खां का टीजर रिलीज

SANJU-
मनोरंजन4 weeks ago

‘संजू’ में रहमान का गाना ‘रूबी रूबी’ रिलीज

Most Popular