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बेशक़, वो सही नहीं हैं, जो समझते हैं कि EVM में घपला नहीं हो सकता…!

EVM

बात सिर्फ़ इतनी सी है कि ग़लतियाँ तो भगवानों से भी हुई हैं तो फिर इंसान-निर्मित EVM (Electronic Voting Machine) को कैसे ईश्वरीय सत्ता की तरह अकाट्य मान लें! आख़िर, चुनाव आयोग वाला EVM भी तो एक मानव-निर्मित माइक्रो प्रोसेसर ही है। कोई भी कम्प्यूटराइज़ड उपकरण इसी माइक्रो प्रोसेसर से चलता है। ये जिस प्रोग्राम से चलता है उसे BIOS (Basic Input Output System) कहते हैं। मोटी भाषा में ये कम्प्यूटर में लगे Hardware की वो प्रोग्रामिंग होती है, जिसके मुताबिक़, हार्डवेयर को अपने काम को अंज़ाम देना होता है। दरअसल, सामान्य कम्प्यूटर को बहुत सारे काम करने होते हैं, इसलिए उसमें ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) की ज़रूरत पड़ती है। ऑपरेटिंग सिस्टम का काम BIOS के पास उतना ही सामान और निर्देश (Data & Command) भेजने का होता है, जितनी उसकी ज़रूरत हो या जितना काम ऑपरेटिंग सिस्टम अपने माइक्रो प्रोसेसर से करवाना चाहता है।

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लेकिन EVM का मामला सामान्य कम्प्यूटर से कुछ अलग है। इसमें भी BIOS होता है, जो Mother Board का ही हिस्सा होता है। EVM का BIOS ही मतदान के दौरान जो डाटा प्राप्त करता, उसे वो वहीं अपने पास ही अलग-अलग उम्मीदवार के खाते में जोड़ता भी चलता है। ताकि वोटों की गिनती के वक़्त वो सारा हिसाब बता सके। इस प्रक्रिया में कुल जितना डाटा माइक्रो प्रोसेसर के पास पहुँचता है, उसकी मात्रा बहुत ही मामूली होती है। इतनी मामूली कि BIOS उसे अपने पास ही आसानी से सहेजकर रख लेता है। अब सवाल ये है कि क्या EVM के BIOS में छेड़छाड़ या Tempering हो सकती है या नहीं? चुनाव आयोग का दावा है कि ऐसा नहीं हो सकता। जबकि तमाम राजनीतिक दल को लगता है कि ऐसा मुमकिन है, तभी तो उनके पक्के वोट भी इधर से उधर हो जाते हैं।

अगला सवाल ये है कि यदि EVM के BIOS में छेड़छाड़ हो सकती है, तो ये कैसे मुमकिन है? ये सवाल इस धारणा पर आधारित है कि कोई भी तकनीक क्या बग़ैर किसी माध्यम के BIOS तक पहुँच सकती है। यहाँ माध्यम का मतलब Internet या Infrared या किसी Wired Device से है। दूसरी तरक़ीब है BIOS की ही ऐसी प्रोग्रामिंग करना जिससे मनचाहे नतीज़े हासिल किये जा सकें। BIOS की इसी प्रोग्रामिंग का सम्बन्ध उस कोड से है जो सारी बाज़ी में उलटफेर पैदा कर सके। कोड भी दो तरह के हैं। एक स्थायी जो BIOS में उस वक़्त डाला जाता है, जब EVM मशीन को बनाया जाता है। चुनाव आयोग का कहना रहा है कि इस स्थायी कोड को EVM निर्माता इंज़ीनियर और उनकी सरकारी कम्पनियाँ जिस तरह से निर्धारित करती हैं, उसका एक फूलप्रूफ और सुरक्षित तरीक़ा है, जिसमें कोई सेंधमारी नहीं हो सकती। दूसरा वो अस्थायी कोड है, जिसे मतदान से पहले निर्वाचन अधिकारी तय करते हैं। इसमें सिर्फ़ इतना तय होता है कि EVM पर लिखी उम्मीदवार संख्या का चुनाव में किस वास्तविक उम्मीदवार का प्रतीक होगी?

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अब ये समझना है कि EVM में गड़बड़ी करने वाले कैसे अपना खेल खेलते हैं? यही सबसे मुश्किल सवाल है। चुनाव आयोग कहता है कि सामने आइए और करके दिखाइए। ये बात बिल्कुल तार्किक है, सही है, सटीक है। चुनाव आयोग ने पहले भी खुली चुनौती दे चुका है। लेकिन कोई आगे नहीं आया था। अबकी बार भी 12 मई को सभी 52 राजनीतिक दलों को बुलाया गया है। इसमें क्या होगा, ये तो अभी से कह नहीं सकते। लेकिन दो बातें साफ़ दिखती हैं। पहली ये है कि जो लोग EVM में खेल करने के खिलाड़ी हैं, क्या वो अपने हज़ारों करोड़ के गोरखधन्धे पर लात मारकर भारतीय चुनाव प्रणाली पर लगे ग्रहण को हटाने के लिए आगे आना चाहेंगे? कतई नही! दूसरी बात ये है कि क्या जिन राजनीतिक दलों का EVM पर से भरोसा उठ चुका है, उन्हें नज़रअंदाज़ करने से भारतीय लोकतंत्र मज़बूत होगा?

ये बात भी हमें हमेशा याद रखनी चाहिए कि लोकतंत्र की आत्मा लोक-लाज़ में बसती है! इसीलिए EVM पर उठे सवालों से जितना नुकसान चुनाव हारने वालों की प्रतिष्ठा पर पड़ता है, उससे लाख गुना अधिक नुकसान चुनाव के विजेताओं की इज़्ज़त औऱ इक़बाल को पहुँचता है! यदि विरोधी पार्टियाँ चुनाव के विजेता की जीत को झूठी और फ़रेबी बताती फिरेंगी तो क्या ऐसे आरोप चाहे जितने खोखले हों, उससे लोकतंत्र कमज़ोर नहीं होगा? क्या इससे समाज में उन्माद और हिंसा की प्रवृतियों को उकसावा नहीं मिलेगा? यदि ये ख़तरे हैं तो वक़्त आ गया है कि या तो हम EVM को अतिविश्वनीय बनाएँ या फिर वापस पेपर-बैलेट की ओर लौट चलें। राम को सीता के शील-चरित्र पर कभी सन्देह नहीं था, फिर भी उन्होंने लोक-लाज़ की ख़ातिर सीता की अग्नि-परीक्षा ली। इसके लिए राम की आज तक आलोचना होती है। लेकिन उन्होंने ये मिसाल तो बनायी ही कि आरोपों को हवा में तैरते रहने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता!

 

लगे हाथ ये भी जान लीजिए कि EVM के खिलाड़ियों को उलट-पुलट करने के लिए कितनी ताक़त लगाने की ज़रूरत पड़ती होगी? मान लीजिए, किसी विधानसभा की 200 सीटों का चुनाव होना है। तो क्या EVM के खिलाड़ियों को हरेक पोलिंग बूथ पर अपना खेल करना होगा? हर्ग़िज़ नहीं! हरेक पार्टी का अपना भीतरी आँकलन होता है। वो सबसे पहले वो सीटें छाँटकर अलग करती है, जहाँ उसे अपनी जीत पर सन्देह नहीं होता। इसी तरह, उन सीटों को छाँटकर अलग कर दिया जाता है, जहाँ विरोधी की जीत पक्की होती है। फ़र्ज़ कीजिए कि ‘प’ पार्टी के पास EVM का खेल खेलने का नुस्ख़ा है। उसे पता है कि 200 में से उसकी 50 सीटें पक्की हैं, तो 50 ऐसी भी हैं जहाँ विरोधी बहुत दमदार हैं। इन 100 सीटों को बिल्कुल छोड़ दिया जाएगा।

अब बाक़ी की 100 सीटों में से उन सीटों को छाँटा जाएगा जिसके चुनिन्दा बूथों पर ‘प’ पार्टी बहुत कमज़ोर है। क्योंकि पार्टियों को पता होता है कि किन बूथों पर वो आगे रहने वाले हैं और कहाँ नहीं। फ़र्ज़ कीजिए कि इन सीटों के आधे बूथ ऐसे हैं जहाँ ‘प’ पार्टी के विरोधी ख़ासे मज़बूत हैं। लिहाज़ा, बाक़ी बचे आधे बूथों पर ही हरेक के लिए 200-300 वोटों की हेराफेरी का लक्ष्य रखा जाएगा। प्रचार किया जाएगा कि इस सीटों पर कड़ी टक्कर है। ताकि जनता को आसानी से बेईमानी का शक़ नहीं हो। इस तरह, 200 सीटों में से 50 सीटों के भी आधे यानी 1/8 बूथों पर खेल खेलने से बाज़ी पलट जाएगी। इस तरह, बमुश्किल 12-15% बूथ के EVM को ही मुट्ठी में करना ही पर्याप्त होता है। अलबत्ता, यदि चुनाव में ‘प’ पार्टी की लहर भी रही तो सोने पे सुहागा हो जाता है!

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इसीलिए, मतगणना के वक़्त उम्मीदवार कहता है कि EVM से उसका अपना वोट, उसके परिवार का वोट कहाँ चला गया? मुम्बई के बीएमसी चुनाव में वकोला (वार्ड 88) के 13 उम्मीदवारों में निर्दलीय नीलोत्पल मृणाल भी थे। उन्हें 375 वोट मिले। सीट शिवसेना को मिली। लेकिन अब इलाके के 600 मतदाताओं ने शपथपत्र के साथ अपना वोटर आईडी नम्बर, नाम, पता, मोबाइल नम्बर वग़ैरह लिखकर हाईकोर्ट में अर्ज़ी दी है कि उन्होंने नीलोत्पल को ही वोट दिया है। तो फिर उनके सिर्फ़ 375 कैसे निकले!

2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पुणे की पर्वती सीट पर काँग्रेस के उम्मीदवार अभय छाजेड़ ने हाईकोर्ट में अर्ज़ी लगायी कि जिस बूथ पर उन्हें 57 वोट मिले, वहाँ के 63 लोगों एफिडेविट दिया है कि उन्होंने काँग्रेस को वोट दिया था। इसीलिए बोम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के ज़िलाधिकारी को आदेश दिया कि वो सम्बन्धित बूथ के EVM की हैदराबाद के फोरेंसिक लैब से जाँच करवाएँ। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी 1 मई 2017 को राज्य की 7 विधानसभा सीटों – विकास नगर, मसूरी, राजपुर, रायपुर, रानीपुर, प्रतापपुर और हरिद्वार ग्रामीण के सारे बूथों के EVM को सील करके ज़ब्त करने का आदेश काँग्रेस उम्मीदवार नवप्रभात की याचिका पर यूँ ही नहीं दे दिया। ये वो उदाहरण हैं जो मीडिया की सुर्ख़ियाँ बने। उनका क्या, जहाँ EVM की कृपा के हारे उम्मीदवारों ने दिल पर पत्थर रख लिया!

चलते-चलते, जिन्हें लगता है कि हैकिंग या छेड़छाड़ के लिए इंटरनेट ज़रूरी है, उन्हें लखनऊ के पेट्रोल पम्पों से ज़ब्त हुई माइक्रो-प्रोसेसिंग चिप्स की बदौलत होने वाली घटतौली का संज्ञान लेना चाहिए। ज़रा सोचिए कि वहाँ कौन से इंटरनेट का इस्तेमाल हो रहा था! वो तकनीक़ कौन सा अमेरिका से आयी थी! इसीलिए, सोचिए कि जब दो रुपये की चोरी के लिए तिकड़म निकाली जा सकती है, तो देश की सत्ता को मुट्ठी में करने के लिए कितना बड़ा खेल खेला जा सकता है! भूलिए नहीं कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के रक्षा मंत्रालय का मुख्यालय ‘पेंटागन’ भी हैकिंग से सुरक्षित नहीं है तो हमारे EVM की क्या औक़ात है! निश्चित रूप से इंटरनेट और इंफ्रारेड से आगे का खेल विकसित हो चुका है। याद कीजिए कि जब रडार की ख़ोज हुई तो कहा जाता था कि ये हरेक तरह के विमान को किसी भी वक़्त पहचान सकता है। लेकिन क्या अब ऐसे विमान नहीं बन चुके हैं, जो रडार की आँखों में भी धूल झोंक सकते हैं। ऐसे असंख्य उदाहरण हो सकते हैं। लिहाज़ा, चुनावों को निष्कलंक बनाने के लिए पेपर-बैलेट पर लौटना ही समझदारी है। इसमें जितनी देर होगी, देश को उतना ही नुक़सान होगा।

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