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बेशक़, वो सही नहीं हैं, जो समझते हैं कि EVM में घपला नहीं हो सकता…!

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EVM

बात सिर्फ़ इतनी सी है कि ग़लतियाँ तो भगवानों से भी हुई हैं तो फिर इंसान-निर्मित EVM (Electronic Voting Machine) को कैसे ईश्वरीय सत्ता की तरह अकाट्य मान लें! आख़िर, चुनाव आयोग वाला EVM भी तो एक मानव-निर्मित माइक्रो प्रोसेसर ही है। कोई भी कम्प्यूटराइज़ड उपकरण इसी माइक्रो प्रोसेसर से चलता है। ये जिस प्रोग्राम से चलता है उसे BIOS (Basic Input Output System) कहते हैं। मोटी भाषा में ये कम्प्यूटर में लगे Hardware की वो प्रोग्रामिंग होती है, जिसके मुताबिक़, हार्डवेयर को अपने काम को अंज़ाम देना होता है। दरअसल, सामान्य कम्प्यूटर को बहुत सारे काम करने होते हैं, इसलिए उसमें ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) की ज़रूरत पड़ती है। ऑपरेटिंग सिस्टम का काम BIOS के पास उतना ही सामान और निर्देश (Data & Command) भेजने का होता है, जितनी उसकी ज़रूरत हो या जितना काम ऑपरेटिंग सिस्टम अपने माइक्रो प्रोसेसर से करवाना चाहता है।

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लेकिन EVM का मामला सामान्य कम्प्यूटर से कुछ अलग है। इसमें भी BIOS होता है, जो Mother Board का ही हिस्सा होता है। EVM का BIOS ही मतदान के दौरान जो डाटा प्राप्त करता, उसे वो वहीं अपने पास ही अलग-अलग उम्मीदवार के खाते में जोड़ता भी चलता है। ताकि वोटों की गिनती के वक़्त वो सारा हिसाब बता सके। इस प्रक्रिया में कुल जितना डाटा माइक्रो प्रोसेसर के पास पहुँचता है, उसकी मात्रा बहुत ही मामूली होती है। इतनी मामूली कि BIOS उसे अपने पास ही आसानी से सहेजकर रख लेता है। अब सवाल ये है कि क्या EVM के BIOS में छेड़छाड़ या Tempering हो सकती है या नहीं? चुनाव आयोग का दावा है कि ऐसा नहीं हो सकता। जबकि तमाम राजनीतिक दल को लगता है कि ऐसा मुमकिन है, तभी तो उनके पक्के वोट भी इधर से उधर हो जाते हैं।

अगला सवाल ये है कि यदि EVM के BIOS में छेड़छाड़ हो सकती है, तो ये कैसे मुमकिन है? ये सवाल इस धारणा पर आधारित है कि कोई भी तकनीक क्या बग़ैर किसी माध्यम के BIOS तक पहुँच सकती है। यहाँ माध्यम का मतलब Internet या Infrared या किसी Wired Device से है। दूसरी तरक़ीब है BIOS की ही ऐसी प्रोग्रामिंग करना जिससे मनचाहे नतीज़े हासिल किये जा सकें। BIOS की इसी प्रोग्रामिंग का सम्बन्ध उस कोड से है जो सारी बाज़ी में उलटफेर पैदा कर सके। कोड भी दो तरह के हैं। एक स्थायी जो BIOS में उस वक़्त डाला जाता है, जब EVM मशीन को बनाया जाता है। चुनाव आयोग का कहना रहा है कि इस स्थायी कोड को EVM निर्माता इंज़ीनियर और उनकी सरकारी कम्पनियाँ जिस तरह से निर्धारित करती हैं, उसका एक फूलप्रूफ और सुरक्षित तरीक़ा है, जिसमें कोई सेंधमारी नहीं हो सकती। दूसरा वो अस्थायी कोड है, जिसे मतदान से पहले निर्वाचन अधिकारी तय करते हैं। इसमें सिर्फ़ इतना तय होता है कि EVM पर लिखी उम्मीदवार संख्या का चुनाव में किस वास्तविक उम्मीदवार का प्रतीक होगी?

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अब ये समझना है कि EVM में गड़बड़ी करने वाले कैसे अपना खेल खेलते हैं? यही सबसे मुश्किल सवाल है। चुनाव आयोग कहता है कि सामने आइए और करके दिखाइए। ये बात बिल्कुल तार्किक है, सही है, सटीक है। चुनाव आयोग ने पहले भी खुली चुनौती दे चुका है। लेकिन कोई आगे नहीं आया था। अबकी बार भी 12 मई को सभी 52 राजनीतिक दलों को बुलाया गया है। इसमें क्या होगा, ये तो अभी से कह नहीं सकते। लेकिन दो बातें साफ़ दिखती हैं। पहली ये है कि जो लोग EVM में खेल करने के खिलाड़ी हैं, क्या वो अपने हज़ारों करोड़ के गोरखधन्धे पर लात मारकर भारतीय चुनाव प्रणाली पर लगे ग्रहण को हटाने के लिए आगे आना चाहेंगे? कतई नही! दूसरी बात ये है कि क्या जिन राजनीतिक दलों का EVM पर से भरोसा उठ चुका है, उन्हें नज़रअंदाज़ करने से भारतीय लोकतंत्र मज़बूत होगा?

ये बात भी हमें हमेशा याद रखनी चाहिए कि लोकतंत्र की आत्मा लोक-लाज़ में बसती है! इसीलिए EVM पर उठे सवालों से जितना नुकसान चुनाव हारने वालों की प्रतिष्ठा पर पड़ता है, उससे लाख गुना अधिक नुकसान चुनाव के विजेताओं की इज़्ज़त औऱ इक़बाल को पहुँचता है! यदि विरोधी पार्टियाँ चुनाव के विजेता की जीत को झूठी और फ़रेबी बताती फिरेंगी तो क्या ऐसे आरोप चाहे जितने खोखले हों, उससे लोकतंत्र कमज़ोर नहीं होगा? क्या इससे समाज में उन्माद और हिंसा की प्रवृतियों को उकसावा नहीं मिलेगा? यदि ये ख़तरे हैं तो वक़्त आ गया है कि या तो हम EVM को अतिविश्वनीय बनाएँ या फिर वापस पेपर-बैलेट की ओर लौट चलें। राम को सीता के शील-चरित्र पर कभी सन्देह नहीं था, फिर भी उन्होंने लोक-लाज़ की ख़ातिर सीता की अग्नि-परीक्षा ली। इसके लिए राम की आज तक आलोचना होती है। लेकिन उन्होंने ये मिसाल तो बनायी ही कि आरोपों को हवा में तैरते रहने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता!

 

लगे हाथ ये भी जान लीजिए कि EVM के खिलाड़ियों को उलट-पुलट करने के लिए कितनी ताक़त लगाने की ज़रूरत पड़ती होगी? मान लीजिए, किसी विधानसभा की 200 सीटों का चुनाव होना है। तो क्या EVM के खिलाड़ियों को हरेक पोलिंग बूथ पर अपना खेल करना होगा? हर्ग़िज़ नहीं! हरेक पार्टी का अपना भीतरी आँकलन होता है। वो सबसे पहले वो सीटें छाँटकर अलग करती है, जहाँ उसे अपनी जीत पर सन्देह नहीं होता। इसी तरह, उन सीटों को छाँटकर अलग कर दिया जाता है, जहाँ विरोधी की जीत पक्की होती है। फ़र्ज़ कीजिए कि ‘प’ पार्टी के पास EVM का खेल खेलने का नुस्ख़ा है। उसे पता है कि 200 में से उसकी 50 सीटें पक्की हैं, तो 50 ऐसी भी हैं जहाँ विरोधी बहुत दमदार हैं। इन 100 सीटों को बिल्कुल छोड़ दिया जाएगा।

अब बाक़ी की 100 सीटों में से उन सीटों को छाँटा जाएगा जिसके चुनिन्दा बूथों पर ‘प’ पार्टी बहुत कमज़ोर है। क्योंकि पार्टियों को पता होता है कि किन बूथों पर वो आगे रहने वाले हैं और कहाँ नहीं। फ़र्ज़ कीजिए कि इन सीटों के आधे बूथ ऐसे हैं जहाँ ‘प’ पार्टी के विरोधी ख़ासे मज़बूत हैं। लिहाज़ा, बाक़ी बचे आधे बूथों पर ही हरेक के लिए 200-300 वोटों की हेराफेरी का लक्ष्य रखा जाएगा। प्रचार किया जाएगा कि इस सीटों पर कड़ी टक्कर है। ताकि जनता को आसानी से बेईमानी का शक़ नहीं हो। इस तरह, 200 सीटों में से 50 सीटों के भी आधे यानी 1/8 बूथों पर खेल खेलने से बाज़ी पलट जाएगी। इस तरह, बमुश्किल 12-15% बूथ के EVM को ही मुट्ठी में करना ही पर्याप्त होता है। अलबत्ता, यदि चुनाव में ‘प’ पार्टी की लहर भी रही तो सोने पे सुहागा हो जाता है!

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इसीलिए, मतगणना के वक़्त उम्मीदवार कहता है कि EVM से उसका अपना वोट, उसके परिवार का वोट कहाँ चला गया? मुम्बई के बीएमसी चुनाव में वकोला (वार्ड 88) के 13 उम्मीदवारों में निर्दलीय नीलोत्पल मृणाल भी थे। उन्हें 375 वोट मिले। सीट शिवसेना को मिली। लेकिन अब इलाके के 600 मतदाताओं ने शपथपत्र के साथ अपना वोटर आईडी नम्बर, नाम, पता, मोबाइल नम्बर वग़ैरह लिखकर हाईकोर्ट में अर्ज़ी दी है कि उन्होंने नीलोत्पल को ही वोट दिया है। तो फिर उनके सिर्फ़ 375 कैसे निकले!

2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पुणे की पर्वती सीट पर काँग्रेस के उम्मीदवार अभय छाजेड़ ने हाईकोर्ट में अर्ज़ी लगायी कि जिस बूथ पर उन्हें 57 वोट मिले, वहाँ के 63 लोगों एफिडेविट दिया है कि उन्होंने काँग्रेस को वोट दिया था। इसीलिए बोम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के ज़िलाधिकारी को आदेश दिया कि वो सम्बन्धित बूथ के EVM की हैदराबाद के फोरेंसिक लैब से जाँच करवाएँ। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी 1 मई 2017 को राज्य की 7 विधानसभा सीटों – विकास नगर, मसूरी, राजपुर, रायपुर, रानीपुर, प्रतापपुर और हरिद्वार ग्रामीण के सारे बूथों के EVM को सील करके ज़ब्त करने का आदेश काँग्रेस उम्मीदवार नवप्रभात की याचिका पर यूँ ही नहीं दे दिया। ये वो उदाहरण हैं जो मीडिया की सुर्ख़ियाँ बने। उनका क्या, जहाँ EVM की कृपा के हारे उम्मीदवारों ने दिल पर पत्थर रख लिया!

चलते-चलते, जिन्हें लगता है कि हैकिंग या छेड़छाड़ के लिए इंटरनेट ज़रूरी है, उन्हें लखनऊ के पेट्रोल पम्पों से ज़ब्त हुई माइक्रो-प्रोसेसिंग चिप्स की बदौलत होने वाली घटतौली का संज्ञान लेना चाहिए। ज़रा सोचिए कि वहाँ कौन से इंटरनेट का इस्तेमाल हो रहा था! वो तकनीक़ कौन सा अमेरिका से आयी थी! इसीलिए, सोचिए कि जब दो रुपये की चोरी के लिए तिकड़म निकाली जा सकती है, तो देश की सत्ता को मुट्ठी में करने के लिए कितना बड़ा खेल खेला जा सकता है! भूलिए नहीं कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के रक्षा मंत्रालय का मुख्यालय ‘पेंटागन’ भी हैकिंग से सुरक्षित नहीं है तो हमारे EVM की क्या औक़ात है! निश्चित रूप से इंटरनेट और इंफ्रारेड से आगे का खेल विकसित हो चुका है। याद कीजिए कि जब रडार की ख़ोज हुई तो कहा जाता था कि ये हरेक तरह के विमान को किसी भी वक़्त पहचान सकता है। लेकिन क्या अब ऐसे विमान नहीं बन चुके हैं, जो रडार की आँखों में भी धूल झोंक सकते हैं। ऐसे असंख्य उदाहरण हो सकते हैं। लिहाज़ा, चुनावों को निष्कलंक बनाने के लिए पेपर-बैलेट पर लौटना ही समझदारी है। इसमें जितनी देर होगी, देश को उतना ही नुक़सान होगा।

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येदियुरप्पा के बाद प्रोटेम स्पीकर के चयन में भी राज्यपाल का शर्मनाक रवैया

उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

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KG Bopaiah

पुरानी कहावत है कि ‘चोर चोरी से जाए, मगर हेराफ़ेरी से जाए!’ फ़िलहाल, कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला का रवैया बिल्कुल इसी कहावत के मुताबिक़ है। वजुभाई वाला का बर्ताव उन शातिर अपराधियों जैसा भी है जो एक झूठ या ग़लती को छिपाने के लिए बार-बार झूठ बोलता है या ग़लती पर ग़लती ही करता चला जाता है। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का पहला कर्त्तव्य होना चाहिए कि उसका आचरण संवैधानिक, विधायी और न्यायिक सुचिता के अनुकूल हो और वो सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का सबसे बड़ा संरक्षक हो!

बदकिस्मती से वजुभाई वाला ने लोकलाज़ की सारी सीमाओं को तार-तार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ये बात साफ़ हो चुकी है कि वजुभाई वाला एक निष्पक्ष राज्यपाल की तरह नहीं बल्कि बीजेपी की कठपुलती और एजेंट की तरह व्यवहार कर रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर यानी कार्यवाहक सभापति की देखरेख में विधानसभा में बहुमत का परीक्षण करवाने का आदेश दिया। लेकिन बेहयाई की सारी सीमाओं और विधायी परम्पराओं को तोड़ते हुए राज्यपाल ने केजी बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त कर दिया। जबकि नव-निर्वाचित विधायकों में उनके भी वरिष्ठ लोग मौजूद हैं।

इसीलिए, काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन ने राज्यपाल के इस फ़ैसले को भी पक्षपातपूर्ण और विधायी परम्पराओं के ख़िलाफ़ बताया है। इस धड़े का कहना है कि बोपय्या जहाँ 4 कार्यकाल (टर्म) से विधायक हैं और 2008 में स्पीकर भी रह चुके हैं वो प्रोटेम स्पीकर बनाये जाने के लिए सर्वथा अयोग्य हैं। क्योंकि सदन में दो विधायक ऐसे हैं जो 8 टर्म का अनुभव रखते हैं और उम्र में भी बोपय्या से बड़े हैं। इनमें पहले स्थान पर हैं काँग्रेस के आरवी देशपांडे और बीजेपी के उमेश विश्वनाथ कट्टी। इन दोनों में से भी उमेश के मुक़ाबले देशपांडे की उम्र अधिक है।

काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि प्रोटेम स्पीकर के चयन का मुद्दा राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के दायरे में नहीं आता है। बल्कि इसका निर्धारण विधायी परम्पराओं के मुताबिक़ होता है। इस परम्परा के मुताबिक़, सबसे अनुभवी या उम्रदराज़ विधायक को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है। उधर, राज्यपाल के फ़ैसले को सही ठहराते हुए बीजेपी ने दलील दी है कि चार टर्म की वरिष्ठता भी कम नहीं होती। बोपय्या को इसलिए वरीयता दी गयी है क्योंकि वो पूर्व स्पीकर रह चुके हैं।

लेकिन काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि बोपय्या जब स्पीकर रहे तो कई मौकों पर उनका आचरण निष्पक्ष नहीं रहा। उन्होंने बीजेपी के पक्ष में काम किया। 2008 में बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर बनाने के फ़ैसले की इसलिए भी अनदेखी की गयी क्योंकि तब एक-एक वोट की मारामारी वाले हालात नहीं थे। दोनों पक्षों की इसी टकराहट को देखते हुए काँग्रेस-जेडीएस की ओर से देर शाम एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया।

विधायी परम्परा ये है कि नयी विधानसभा के चुनाव के बाद राज्यपाल सबसे अनुभवी या/और उम्रदराज़ राजनेता को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं। प्रोटेम स्पीकर का काम है कि वो सभी विधायकों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाये। इसके बाद सदन के सभी विधायक अपना नया स्पीकर चुनते हैं। नये स्पीकर का चुनाव सत्ता पक्ष का पहला शक्ति परीक्षण होता है। क्योंकि स्पीकर को भी सदन के बहुमत से ही चुना जाता है। अब यदि सत्ता पक्ष के पास बहुमत नहीं हुआ तो उसका स्पीकर चुना नहीं जा सकता।

सामान्य तौर पर नये स्पीकर को अपने निर्वाचन के तुरन्त बाद सदन के संचालन से जुड़े नियमों के मुताबिक़, विश्वास मत पर बहस और मतदान का संचालन करना होता है। किस पक्ष को कितने मत मिले और प्रस्ताव का क्या हश्र हुआ ये तय करने का अधिकार स्पीकर का ही होता है। स्पीकर का फ़ैसला एक तरह से अन्तिम ही होता है। क्योंकि उसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है। इन अदालती कार्रवाई में भी ज़्यादा से ज़्यादा स्पीकर के फ़ैसले को ग़लत करार दिया जाता है। स्पीकर की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

इसीलिए. जब कभी स्पीकर का आचरण पक्षपातपूर्ण होता है तो विधानसभा में अव्यवस्था फैल जाती है। यही अव्यवस्था अन्ततः विधायकों के बीच की हिंसा में बदल जाती है। स्पीकर के आपत्तिजनक व्यवहार की वजह से देश की कई विधानसभाओं में कई बार शर्मसार करने वाली हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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सत्ता के नाटक का कर्नाटक में खेल

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Yeddyrappa

खंडित जनादेश, राज्यपाल का स्वविवेक और लोकतंत्र की परीक्षा ऐसा ही कुछ माहौल कर्नाटक में चुनाव नतीजों के बाद दिख रहा है। नतीजों के मायने क्या कहें कांग्रेस मुक्त भारत या नए गठबंधन युक्त राजनीतिक संभावनाएं? इतना जरूर है कि इंदिरा गांधी ने राजनीति में जो पहचान बनाई थी उसे वो उतार-चढ़ाव के बावजूद 4.5 दशक तक बरकरार रख पाईं तो क्या नरेन्द्र मोदी की पहचान वैसी ही राजनीति की नई पैकेजिंग तो नहीं? सवाल कई हैं और जवाब भी समय के साथ मिलता जाएगा।

फिलाहाल कर्नाटक की सियासी तस्वीर काफी दिलचस्प हो गई है। गेंद राज्यपाल के पाले में है। वह सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं या बहुमत का आंकड़ा पार कर चुके कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को? गोवा, मेघालय और मणिपुर की थोड़ा पहले की सियासी तस्वीरों की नजीर सामने है। जिन हालातों में राज्यपालों ने बहुमत वाले गठबंधन को वहां सरकार बनाने का न्योता दिया, क्या वैसा ही न्योता कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को यहां मिलेगा या सबसे बड़े दल भाजपा को? जेडीएस-कांग्रेस की साझा सीटें बहुमत के पार हैं यहां भी दावा मजबूत है। ऐसे में राज्यपाल चाहें तो बहुमत के आंकड़े को देखते हुए कांग्रेस-जेडीएस को भी सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं।

अब यहीं इंतजार करना होगा, लेकिन कर्नाटक के ही पूर्व मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई बनाम केंद्र सरकार का एक अहम मामला नजीर बन सकता है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय आदेश दे चुका है कि बहुमत का फैसला राजनिवास में नहीं बल्कि विधानसभा के पटल पर होगा। कई तरह के तर्को से हटकर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार बनाने का न्योता देने का अधिकार राज्यपाल को उनके विवेक पर छोड़ रखा है। राज्यपाल चुनाव से पहले या बाद में बने गठबंधन को भी न्योता दे सकते हैं लेकिन संतुष्ट हों कि वह सदन में बहुमत साबित करेगा।

राज्यपाल का फैसला गलत भी हो सकता है फिर भी उनसे यह अधिकार छीना नहीं गया है। हां बहुमत सदन में ही साबित करना होगा। जस्टिस आरएस सरकारिया कमिशन ने विकल्पों और उनकी प्राथमिकताओं को साफ किया है लेकिन साथ ही राज्यपाल के खुद के फैसले को भी अहम बताया है। संविधान में गठबंधन सरकार बनने पर राज्यपाल को कैसे मुख्यमंत्री की नियुक्ति करनी है, इस बारे में कुछ साफ नहीं है।

कर्नाटक के नतीजे सभी दलों के लिए काफी सबक देने वाले हैं क्योंकि शुरू में लगा कि भाजपा स्पष्ट बहुमत की ओर अग्रसर है लेकिन बाद में 104 पर ही अटक गई। जबकि कांग्रेस दूसरे और जेडीएस तीसरे नंबर रह गई। प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा 21 जन सभाएं कर्नाटक में की थीं वहीं अमित शाह ने पूरी ताकत झोंक दी थी। वोट शेयर के मामले में कांग्रेस जीतकर भी हार गई और भाजपा हारकर भी जीत गई। भाजपा और कांग्रेस के बीच मत प्रतिशत क्रमश: 37 प्रतिशत और 38 प्रतिशत है।

हां, कर्नाटक में ही इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है। लगभग 2004 वाली स्थिति है। उस वक्त भाजपा को 79, कांग्रेस को 65 और जेडीएस को 58 सीटें मिली थीं। कांग्रेस एसएम कृष्णा को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी जबकि देवगौड़ा एन धरम सिंह को। तब भी कांग्रेस को झुकना पड़ा था। यकीनन देवगौड़ा का ठीक वैसा ही दांव 2018 के इस चुनाव में दिखा जब उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों को चित्त कर दिया। इस चुनाव में फिर रोचक स्थिति बनी कि राजनीति में कोई दुश्मन या दोस्त नहीं होता है। याद कीजिए 2005 में कुमार स्वामी से मतभेदों के कारण ही सिद्धारमैया पार्टी से निकाले गए थे लेकिन हालात देखिए 12 साल बाद उन्हीं सिद्धारमैया ने अपने राजनैतिक विरोधी का नाम मुख्यमंत्री के लिए आगे किया।

फिलाहाल कर्नाटक नतीजों को 2019 का सेमीफाइनल कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि अभी सबसे अधिक सांसद देने वाले उप्र के कैराना में 28 मई को होने जा रहे उपचुनाव में नए फार्मूले की टेस्टिंग होगी। यहां सपा-बसपा के बजाय अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के चिन्ह पर सपा उम्मीदवार तबस्सुम का लड़ना और बसपा का समर्थन करना बड़ा पैंतरा है। निश्चित रूप से यह जहां भाजपा को परेशान करने वाला है वहीं 2019 के आम चुनाव के लिए गठबंधन की नई संभावनाओं का दरवाजा भी खोलता दिख रहा है। लेकिन मप्र और राजस्थान में हुए उपचुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता के बाद कर्नाटक के नतीजों ने मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

साल के आखिर में मप्र, राजस्थान, छग में विधानसभा चुनाव हैं और यहां भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस जोश में थी। यकीनन कांग्रेस का मनोबल गिरा होगा क्योंकि तीनों राज्यों में मुख्य विपक्षी भूमिका में वही है। साथ ही गठबंधन के लिहाज से तीनों राज्यों की राजनैतिक पैंतरेबाजी भी जुदा है। ऐसे में तीनों राज्य में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा देश की गठबंधन राजनीति में निश्चित रूप से बेहद उलझा और नाजुक होगा। फिलहाल कर्नाटक के नाटक पर सबकी नजर है।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

–आईएएनएस

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मोदी-लहर का कच्चा चिट्ठा

2018 में ही बीजेपी को मोदी-लहर की सबसे बड़ी अग्नि-परीक्षा अभी बाक़ी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इसी साल मोदी-लहर को सबसे बड़ी चुनौती उस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में झेलनी है, जहाँ अभी वो सत्ता में है। इन राज्यों में मोदी-लहर का ज़बरदस्त मुक़ाबला सत्ता-विरोधी लहर से होना है।

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narendra modi wave in india

ये सच है कि 2014 में केन्द्र में सत्ता पाने के बाद बीजेपी का प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया है। ये भी सच है कि मोदी युग में काँग्रेस को एक के बाद एक करके कई राज्यों की सत्ता से बाहर होना पड़ा है। लेकिन याद रखिए कि बीजेपी की सारी की सारी कमाई नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की बदौलत नहीं है। मोदी-शाह के राष्ट्रीय पटल पर आने से पहले भी देश के 31 राज्यों में से 14 में बीजेपी या उसके सहयोगी दल की सरकारें थीं। अब 22 राज्यों में भगवा परचम ज़रूर लहरा रहा है, लेकिन मोदी-शाह का प्रदर्शन भी वैसा चमचदार नहीं है, जैसा भक्तों की ओर से फैलाये जाने वाले झूठ के ज़रिये पेश किया जाता है। मिसाल के तौर पर मोदी-लहर को ही लीजिए। नरेन्द्र मोदी सरकार के कामकाज की तरह मोदी-लहर की भी जैसी डुगडुगी बजायी जाती है, वैसी वो कतई नहीं है।

जो लोग मोदी-लहर का गुणगान करते हैं वो भूल जाते हैं कि ये लहर जिस साल चलती है, उसके अगले साल नहीं चलती! मसलन…

2014 में मोदी-लहर थी तो बीजेपी ने लोकसभा के अलावा महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और झारखंड पर क़ब्ज़ा जमाया।

2015 में मोदी-लहर नहीं थी! तभी तो बीजेपी को दिल्ली और बिहार में हार का मुँह देखना पड़ा!

2016 में मोदी-लहर बेहद मामूली थी। बीजेपी सिर्फ़ असम जीत सकी। जबकि पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में उसे हार झेलनी पड़ी।

2017 में मोदी-लहर वापस लौटी। हिमाचल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में बीजेपी ने तख़्ता पटल किया। गोवा और मणिपुर में उसके तिकड़म और ख़रीद-फ़रोख़्त सफल रही। लेकिन पंजाब में उसे झटका लगा, जबकि गुजरात में उसने बड़ी मुश्किल से अपनी लाज़ बचायी।

2018 में मोदी-लहर की रंगत धूप-छाँव जैसी हो गयी। कर्नाटक में जैसी मोदी-लहर चली उसने बीजेपी को सत्ता के पाले से पहले ही पटक दिया। त्रिपुरा और नगालैंड में आंशिक लहर रही। जबकि मेघालय में गोवा और मणिपुर की ख़रीद-फ़रोख़्त वाली तिकड़म को ही दोहराया गया।

2018 में ही बीजेपी को मोदी-लहर की सबसे बड़ी अग्नि-परीक्षा अभी बाक़ी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इसी साल मोदी-लहर को सबसे बड़ी चुनौती उस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में झेलनी है, जहाँ अभी वो सत्ता में है। इन राज्यों में मोदी-लहर का ज़बरदस्त मुक़ाबला सत्ता-विरोधी लहर से होना है। इन तीनों बीजेपी शासित राज्यों के अलावा मोदी-लहर की जाँच उत्तर-पूर्व के छोटे से राज्य मिज़ोरम में भी होगी!

••• सबसे दिलचस्प बात ये है कि जिस ‘मोदी-लहर’ या ‘मोदी का करिश्मा’ या ‘मोदी का जादू’ पर भक्त मंडली इतराती फिरती है, उसने 2014 में ही अपना दम तोड़ना शुरू कर दिया था! तथाकथित मोदी-लहर की बदौलत लोकसभा की 282 सीटें जीतने वाली बीजेपी, 2014 से अब तक हुई 23 संसदीय सीटों के उपचुनाव में सिर्फ़ 4 सीटों पर ही अपनी जीत को बरक़रार रख सकी। ये सीटें हैं – वडोदरा, शाहडोल, लखीमपुर (असम) और बीड। दूसरी ओर, काँग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली बीजेपी को 2014 से लेकर अभी तक अपनी 7 जीती हुई सीटों से हाथ धोना पड़ा है। इनमें से रतलाम, अमृतसर, गुरदासपुर, अजमेर और अलवर की सीटें जहाँ काँग्रेस ने जीतीं। वहीं फूलपुर और गोरखपुर की सीटों को उस समाजवादी पार्टी ने बीजेपी से छीना है, जो काँग्रेस का मित्र-दल है। माना जा रहा है कि विपक्ष का साझा उम्मीदवार ही, 28 मई को कैराना सीट को भी, मोदी-लहर को आठवीं चपत देने वाला है।

उपरोक्त तथ्यों से साफ़ है कि 2014 वाली मोदी-लहर 2015 में नदारद थी, 2016 में इसकी औक़ात मामूली हवा जैसी ही थी, क्योंकि असम में 15 साल से चल रही काँग्रेस के तरूण गोगोई की सरकार के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर को सियासी जगत में बेहद स्वाभाविक माना गया। 2017 वाली मोदी-लहर का ज़ायक़ा ऐसा रहा मानो दाल में कंकड़ों की भरमार रही हो। सत्ता हथियाने के लिए होने वाली तिकड़म, विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की नीति, ईवीएम पर लगे सवालिया निशान तथा चुनाव आयोग का पक्षपातपूर्ण रवैये को भी बाक़ायदा दाल के कंकड़ों की तरह देखा जा सकता है। 2018 की पहली छमाही के दौरान यदि मोदी-लहर की वापसी नहीं हो पायी तो फ़िलहाल, ऐसे कोई आसार नहीं दिखते कि साल की दूसरी छमाही में कोई बीजेपी को बीते हुए दिन लौटा पाएगा!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर बढ़ रही हैं दुर्घटनाएं

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स्वास्थ्य7 hours ago

खीरा खाने से होंगे ये फायदे, रहेगा वजन कंट्रोल

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राष्ट्रीय7 hours ago

प्रधानमंत्री मोदी आज रूस होंगे रवाना

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मनोरंजन7 hours ago

अलगाव के बाद पहली बार साथ नजर आए जॉन सीना, निकी बेला

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शहर7 hours ago

उत्तर प्रदेश: 13 पेटी अवैध शराब के साथ 3 तस्कर गिरफ्तार

yashwant sinha
राष्ट्रीय3 days ago

कर्नाटक के नाटक से आहत यशवन्त सिन्हा, राष्ट्रपति भवन के बाहर धरने पर बैठे

HD Deve Gowda
राजनीति1 week ago

देवगौड़ा के गठबंधन वाले बयान से कांग्रेस को फायदा

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ज़रा हटके4 weeks ago

उज्जवला योजना : सिलेंडर मिला, गैस भरवाने के पैसे नहीं

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खेल2 weeks ago

पुलिस-वकील के साथ शमी के घर पहुंचीं हसीन जहां

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चुनाव2 weeks ago

कांग्रेस कर्नाटक में 115-120 सीटें जीतेगी : अहमद पटेल

Kamal Nath Sciendia
ब्लॉग3 weeks ago

मप्र कांग्रेस में अनुभवी और युवा का समन्वय

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चुनाव4 weeks ago

कर्नाटक चुनाव: कांग्रेस ने जारी की स्टार प्रचारकों की लिस्‍ट, अखिलेश और तेजस्‍वी का भी नाम शामिल

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लाइफस्टाइल4 weeks ago

इस गर्मी चटख रंगों के कपड़ों से पाएं आकर्षक लुक

CJI Dipak Misra
ब्लॉग4 weeks ago

अब सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा कि उसके मुखिया पर महाभियोग चलेगा या नहीं?

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ब्लॉग3 weeks ago

ज़रा देखिए तो कि न्यायपालिका के पतन की दुहाई कौन दे रहा है!

yashwant sinha
राष्ट्रीय3 days ago

कर्नाटक के नाटक से आहत यशवन्त सिन्हा, राष्ट्रपति भवन के बाहर धरने पर बैठे

kapil sibal
राजनीति1 week ago

कर्नाटक चुनाव: बीजेपी प्रत्‍याशी श्रीमुलु की उम्‍मीदवारी रद्द करने की कांग्रेस ने EC से की मांग

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राजनीति2 weeks ago

जिन्ना और श्यामा प्रसाद के ज़रिये संजय सिंह का बीजेपी पर करारा हमला

Sona Mohapatra
मनोरंजन3 weeks ago

सोना महापात्रा को छोटे कपड़ों में सूफी गाना गाने पर मिली धमकी

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मनोरंजन4 weeks ago

करीना की फिल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ का ट्रेलर लॉन्च

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शहर4 weeks ago

एयर इंडिया के प्लेन में उड़ान के दौरान गिरी खिड़की

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खेल1 month ago

आईपीएल-11: गेल के शतक से पंजाब ने दर्ज की तीसरी जीत

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मनोरंजन1 month ago

नेहा कक्कड़ ने बॉयफ्रेंड हिमांश कोहली को बनाया ‘हमसफर’, देखें वीडियो

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राष्ट्रीय1 month ago

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मनोरंजन1 month ago

आलिया भट्ट की फिल्म ‘Raazi’ का ट्रेलर रिलीज

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