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बेशक़, वो सही नहीं हैं, जो समझते हैं कि EVM में घपला नहीं हो सकता…!

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EVM

बात सिर्फ़ इतनी सी है कि ग़लतियाँ तो भगवानों से भी हुई हैं तो फिर इंसान-निर्मित EVM (Electronic Voting Machine) को कैसे ईश्वरीय सत्ता की तरह अकाट्य मान लें! आख़िर, चुनाव आयोग वाला EVM भी तो एक मानव-निर्मित माइक्रो प्रोसेसर ही है। कोई भी कम्प्यूटराइज़ड उपकरण इसी माइक्रो प्रोसेसर से चलता है। ये जिस प्रोग्राम से चलता है उसे BIOS (Basic Input Output System) कहते हैं। मोटी भाषा में ये कम्प्यूटर में लगे Hardware की वो प्रोग्रामिंग होती है, जिसके मुताबिक़, हार्डवेयर को अपने काम को अंज़ाम देना होता है। दरअसल, सामान्य कम्प्यूटर को बहुत सारे काम करने होते हैं, इसलिए उसमें ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) की ज़रूरत पड़ती है। ऑपरेटिंग सिस्टम का काम BIOS के पास उतना ही सामान और निर्देश (Data & Command) भेजने का होता है, जितनी उसकी ज़रूरत हो या जितना काम ऑपरेटिंग सिस्टम अपने माइक्रो प्रोसेसर से करवाना चाहता है।

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लेकिन EVM का मामला सामान्य कम्प्यूटर से कुछ अलग है। इसमें भी BIOS होता है, जो Mother Board का ही हिस्सा होता है। EVM का BIOS ही मतदान के दौरान जो डाटा प्राप्त करता, उसे वो वहीं अपने पास ही अलग-अलग उम्मीदवार के खाते में जोड़ता भी चलता है। ताकि वोटों की गिनती के वक़्त वो सारा हिसाब बता सके। इस प्रक्रिया में कुल जितना डाटा माइक्रो प्रोसेसर के पास पहुँचता है, उसकी मात्रा बहुत ही मामूली होती है। इतनी मामूली कि BIOS उसे अपने पास ही आसानी से सहेजकर रख लेता है। अब सवाल ये है कि क्या EVM के BIOS में छेड़छाड़ या Tempering हो सकती है या नहीं? चुनाव आयोग का दावा है कि ऐसा नहीं हो सकता। जबकि तमाम राजनीतिक दल को लगता है कि ऐसा मुमकिन है, तभी तो उनके पक्के वोट भी इधर से उधर हो जाते हैं।

अगला सवाल ये है कि यदि EVM के BIOS में छेड़छाड़ हो सकती है, तो ये कैसे मुमकिन है? ये सवाल इस धारणा पर आधारित है कि कोई भी तकनीक क्या बग़ैर किसी माध्यम के BIOS तक पहुँच सकती है। यहाँ माध्यम का मतलब Internet या Infrared या किसी Wired Device से है। दूसरी तरक़ीब है BIOS की ही ऐसी प्रोग्रामिंग करना जिससे मनचाहे नतीज़े हासिल किये जा सकें। BIOS की इसी प्रोग्रामिंग का सम्बन्ध उस कोड से है जो सारी बाज़ी में उलटफेर पैदा कर सके। कोड भी दो तरह के हैं। एक स्थायी जो BIOS में उस वक़्त डाला जाता है, जब EVM मशीन को बनाया जाता है। चुनाव आयोग का कहना रहा है कि इस स्थायी कोड को EVM निर्माता इंज़ीनियर और उनकी सरकारी कम्पनियाँ जिस तरह से निर्धारित करती हैं, उसका एक फूलप्रूफ और सुरक्षित तरीक़ा है, जिसमें कोई सेंधमारी नहीं हो सकती। दूसरा वो अस्थायी कोड है, जिसे मतदान से पहले निर्वाचन अधिकारी तय करते हैं। इसमें सिर्फ़ इतना तय होता है कि EVM पर लिखी उम्मीदवार संख्या का चुनाव में किस वास्तविक उम्मीदवार का प्रतीक होगी?

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अब ये समझना है कि EVM में गड़बड़ी करने वाले कैसे अपना खेल खेलते हैं? यही सबसे मुश्किल सवाल है। चुनाव आयोग कहता है कि सामने आइए और करके दिखाइए। ये बात बिल्कुल तार्किक है, सही है, सटीक है। चुनाव आयोग ने पहले भी खुली चुनौती दे चुका है। लेकिन कोई आगे नहीं आया था। अबकी बार भी 12 मई को सभी 52 राजनीतिक दलों को बुलाया गया है। इसमें क्या होगा, ये तो अभी से कह नहीं सकते। लेकिन दो बातें साफ़ दिखती हैं। पहली ये है कि जो लोग EVM में खेल करने के खिलाड़ी हैं, क्या वो अपने हज़ारों करोड़ के गोरखधन्धे पर लात मारकर भारतीय चुनाव प्रणाली पर लगे ग्रहण को हटाने के लिए आगे आना चाहेंगे? कतई नही! दूसरी बात ये है कि क्या जिन राजनीतिक दलों का EVM पर से भरोसा उठ चुका है, उन्हें नज़रअंदाज़ करने से भारतीय लोकतंत्र मज़बूत होगा?

ये बात भी हमें हमेशा याद रखनी चाहिए कि लोकतंत्र की आत्मा लोक-लाज़ में बसती है! इसीलिए EVM पर उठे सवालों से जितना नुकसान चुनाव हारने वालों की प्रतिष्ठा पर पड़ता है, उससे लाख गुना अधिक नुकसान चुनाव के विजेताओं की इज़्ज़त औऱ इक़बाल को पहुँचता है! यदि विरोधी पार्टियाँ चुनाव के विजेता की जीत को झूठी और फ़रेबी बताती फिरेंगी तो क्या ऐसे आरोप चाहे जितने खोखले हों, उससे लोकतंत्र कमज़ोर नहीं होगा? क्या इससे समाज में उन्माद और हिंसा की प्रवृतियों को उकसावा नहीं मिलेगा? यदि ये ख़तरे हैं तो वक़्त आ गया है कि या तो हम EVM को अतिविश्वनीय बनाएँ या फिर वापस पेपर-बैलेट की ओर लौट चलें। राम को सीता के शील-चरित्र पर कभी सन्देह नहीं था, फिर भी उन्होंने लोक-लाज़ की ख़ातिर सीता की अग्नि-परीक्षा ली। इसके लिए राम की आज तक आलोचना होती है। लेकिन उन्होंने ये मिसाल तो बनायी ही कि आरोपों को हवा में तैरते रहने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता!

 

लगे हाथ ये भी जान लीजिए कि EVM के खिलाड़ियों को उलट-पुलट करने के लिए कितनी ताक़त लगाने की ज़रूरत पड़ती होगी? मान लीजिए, किसी विधानसभा की 200 सीटों का चुनाव होना है। तो क्या EVM के खिलाड़ियों को हरेक पोलिंग बूथ पर अपना खेल करना होगा? हर्ग़िज़ नहीं! हरेक पार्टी का अपना भीतरी आँकलन होता है। वो सबसे पहले वो सीटें छाँटकर अलग करती है, जहाँ उसे अपनी जीत पर सन्देह नहीं होता। इसी तरह, उन सीटों को छाँटकर अलग कर दिया जाता है, जहाँ विरोधी की जीत पक्की होती है। फ़र्ज़ कीजिए कि ‘प’ पार्टी के पास EVM का खेल खेलने का नुस्ख़ा है। उसे पता है कि 200 में से उसकी 50 सीटें पक्की हैं, तो 50 ऐसी भी हैं जहाँ विरोधी बहुत दमदार हैं। इन 100 सीटों को बिल्कुल छोड़ दिया जाएगा।

अब बाक़ी की 100 सीटों में से उन सीटों को छाँटा जाएगा जिसके चुनिन्दा बूथों पर ‘प’ पार्टी बहुत कमज़ोर है। क्योंकि पार्टियों को पता होता है कि किन बूथों पर वो आगे रहने वाले हैं और कहाँ नहीं। फ़र्ज़ कीजिए कि इन सीटों के आधे बूथ ऐसे हैं जहाँ ‘प’ पार्टी के विरोधी ख़ासे मज़बूत हैं। लिहाज़ा, बाक़ी बचे आधे बूथों पर ही हरेक के लिए 200-300 वोटों की हेराफेरी का लक्ष्य रखा जाएगा। प्रचार किया जाएगा कि इस सीटों पर कड़ी टक्कर है। ताकि जनता को आसानी से बेईमानी का शक़ नहीं हो। इस तरह, 200 सीटों में से 50 सीटों के भी आधे यानी 1/8 बूथों पर खेल खेलने से बाज़ी पलट जाएगी। इस तरह, बमुश्किल 12-15% बूथ के EVM को ही मुट्ठी में करना ही पर्याप्त होता है। अलबत्ता, यदि चुनाव में ‘प’ पार्टी की लहर भी रही तो सोने पे सुहागा हो जाता है!

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इसीलिए, मतगणना के वक़्त उम्मीदवार कहता है कि EVM से उसका अपना वोट, उसके परिवार का वोट कहाँ चला गया? मुम्बई के बीएमसी चुनाव में वकोला (वार्ड 88) के 13 उम्मीदवारों में निर्दलीय नीलोत्पल मृणाल भी थे। उन्हें 375 वोट मिले। सीट शिवसेना को मिली। लेकिन अब इलाके के 600 मतदाताओं ने शपथपत्र के साथ अपना वोटर आईडी नम्बर, नाम, पता, मोबाइल नम्बर वग़ैरह लिखकर हाईकोर्ट में अर्ज़ी दी है कि उन्होंने नीलोत्पल को ही वोट दिया है। तो फिर उनके सिर्फ़ 375 कैसे निकले!

2014 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पुणे की पर्वती सीट पर काँग्रेस के उम्मीदवार अभय छाजेड़ ने हाईकोर्ट में अर्ज़ी लगायी कि जिस बूथ पर उन्हें 57 वोट मिले, वहाँ के 63 लोगों एफिडेविट दिया है कि उन्होंने काँग्रेस को वोट दिया था। इसीलिए बोम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के ज़िलाधिकारी को आदेश दिया कि वो सम्बन्धित बूथ के EVM की हैदराबाद के फोरेंसिक लैब से जाँच करवाएँ। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने भी 1 मई 2017 को राज्य की 7 विधानसभा सीटों – विकास नगर, मसूरी, राजपुर, रायपुर, रानीपुर, प्रतापपुर और हरिद्वार ग्रामीण के सारे बूथों के EVM को सील करके ज़ब्त करने का आदेश काँग्रेस उम्मीदवार नवप्रभात की याचिका पर यूँ ही नहीं दे दिया। ये वो उदाहरण हैं जो मीडिया की सुर्ख़ियाँ बने। उनका क्या, जहाँ EVM की कृपा के हारे उम्मीदवारों ने दिल पर पत्थर रख लिया!

चलते-चलते, जिन्हें लगता है कि हैकिंग या छेड़छाड़ के लिए इंटरनेट ज़रूरी है, उन्हें लखनऊ के पेट्रोल पम्पों से ज़ब्त हुई माइक्रो-प्रोसेसिंग चिप्स की बदौलत होने वाली घटतौली का संज्ञान लेना चाहिए। ज़रा सोचिए कि वहाँ कौन से इंटरनेट का इस्तेमाल हो रहा था! वो तकनीक़ कौन सा अमेरिका से आयी थी! इसीलिए, सोचिए कि जब दो रुपये की चोरी के लिए तिकड़म निकाली जा सकती है, तो देश की सत्ता को मुट्ठी में करने के लिए कितना बड़ा खेल खेला जा सकता है! भूलिए नहीं कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका के रक्षा मंत्रालय का मुख्यालय ‘पेंटागन’ भी हैकिंग से सुरक्षित नहीं है तो हमारे EVM की क्या औक़ात है! निश्चित रूप से इंटरनेट और इंफ्रारेड से आगे का खेल विकसित हो चुका है। याद कीजिए कि जब रडार की ख़ोज हुई तो कहा जाता था कि ये हरेक तरह के विमान को किसी भी वक़्त पहचान सकता है। लेकिन क्या अब ऐसे विमान नहीं बन चुके हैं, जो रडार की आँखों में भी धूल झोंक सकते हैं। ऐसे असंख्य उदाहरण हो सकते हैं। लिहाज़ा, चुनावों को निष्कलंक बनाने के लिए पेपर-बैलेट पर लौटना ही समझदारी है। इसमें जितनी देर होगी, देश को उतना ही नुक़सान होगा।

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कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

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कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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Ganga Polluton

लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

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Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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लोकतांत्रिक देश में पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड!

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Indian Politics

इसमें कोई शक नहीं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, जिस पर गर्व भी है। सच्चाई भी है कि सरकार केंद्र या राज्य कहीं भी हो, पार्टियों के अंदर का लोकतंत्र दूर-दूर तक गायब है। विडंबना, कुटिलता या एकाधिकारवादी प्रवृत्ति, कुछ भी कहें, भारत में शुरू से ही राजनीतिक पार्टियां व्यक्ति के आसरे या प्रभाव से ही प्रभावित रही हैं।

फिलहाल ‘आप’ में भी इसी बात को लेकर घमासान मचा है, तो नया क्या है? रिवाज सरीखे तमाम पार्टियां ‘आम’ आदमी से ‘खास’ बन जाती हैं। गर्व कीजिए कि सरकारें तो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई होती हैं! ऐसे में ‘आप’ पर ही तोहमत क्यों?

दरअसल, राजनीति शह-मात का खेल है। नकेल जिसके हाथ है, पार्टी उसके नाम है। पुराने दौर से अब तक कमोवेश यही सिलसिला जारी है। ऐसी विविधता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, यानी भारत में ही दिखती है। खुश होइए कि लोकतंत्र जिंदाबाद है।

अहम यह कि पार्टियों के भीतर लोकतंत्र रहा ही कब? गांधीजी ने कांग्रेस के लिए देशभर में सदस्य बनाए। जिले तक को तवज्जो दी। सम्मेलनों में अध्यक्ष चुनने की शुरुआत हुई। लेकिन तब भी गांधीजी की पसंद खास होती थी। वर्ष 1937 को देखिए, पहला चर्चित चुनाव हुआ, तब सरदार पटेल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे, लेकिन उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से केंद्रीकृत रहा। कुछ लोकतंत्र बचा रहा, जिसे बाद में इंदिराजी ने खत्म कर दिया। अब अमूमन सारी पार्टियां यही व्यवहार कर रही हैं। एक-एक सीट आलाकमान से तय होती है।

प्रदेश, जिला, नगर, यहां तक कि वार्ड की अहमियत नकारा है। सुप्रीमो पद्धति जन्मी और पार्टियां एक तरह से प्राइवेट लिमिटेड बनती चली गईं। राजनैतिक अनुभव या समाजसेवा से इतर फिल्मी स्टारों ने भी बहती गंगा में गोते लगाए। दर्जनों स्टार देखते-देखते बड़े नेता बन गए, वहीं कई मुख्यमंत्री तक हुए। भला रिटायर्ड या इस्तीफा दिए नौकरशाह या सैन्य अधिकारी क्यों पीछे रहते? भारत की राजनीति सरकारी पदों की अहमियत को भुनाने का मौका जो देती है।

अभी तो आम आदमी पार्टी की बात है, धारा का रुख देख भ्रष्टाचार विरोधी गोते लगाए गए। समाज-सेवक से लेकर नौकरशाह, कवि से लेकर पत्रकार, सभी ने बहती बयार को समझा और एक आंदोलन उपजाया। भारतीय इतिहास में जितनी तेजी से इस पार्टी ने झंडा गाड़ा, यकीनन जात-पात, अगड़े-पिछड़े और फिल्मी लोकप्रियता के नाम की राजनीति भी पीछे हो गई।

आम आदमी की पार्टी कहां से चली और धीरे-धीरे कहां पहुंच गई, सबको दिख रहा है। जब बारी लोकतंत्र में आहूति देने की आई, तो उच्च सदन के खास यजमान एकाएक अवतरित हुए! कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र में मतदाता केवल एक वोट बनकर रह गया है, जिसकी अहमियत चंद सेकेंड में बटन दबाने से ज्यादा कुछ नहीं। बाद में उसकी क्या पूछ परख है, खुली किताब है।

दूसरी पार्टियां ‘आप’ के घमासान पर विलाप करें या प्रलाप, लेकिन जब बात उनकी होती है तो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं अघाते। पार्टी कुछ नहीं होती, होते हैं उनको चलाने वाले ही बलशाली और महारथी।

अब मोदी-शाह के कमल की बहार हो, राहुल की कांग्रेस का हाथ हो, केजरीवाल के आप की झाड़ू, अखिलेश-मुलायम की साइकिल, मायावती का हाथी, ममता के दो फूल, लालू का लालटेन, उद्धव का तीर कमान, राज ठाकरे का रेल इंजन, अभिनेत्री जयललिता के बाद पनीर सेल्वम-पलनीस्वामी की दो पत्तियां, करुणानिधि का उगता सूरज, शरद पवार की घड़ी, बीजू जनता दल का शंख, कभी जॉर्ज फर्नांडीज तो अब नीतीश के जद (यू) का तीर, अभिनेता एनटी रामाराव के बाद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी की साइिकल। हाल-फिलहाल रजनीकांत की दहाड़। इनके अलावा देश में न जाने कितने क्षत्रप और उनकी पार्टियां हैं, सच्चाई सबको पता है।

दलों का दलदल हो या हमाम, बस नजर का पर्दा ही है, जिसमें सब कुछ दिखकर भी कुछ नहीं दिखता। यही भारतीय लोकतंत्र है। अब इसे खूबी कहें या दाग, पार्टी तो चलाते हैं केवल सरताज। ऐसे में आम आदमी की क्या हैसियत? जो अंदर है, वह बाहर दिखता जरूर है। अब इस पर चीत्कार करें या आर्तनाद, कोई फर्क नहीं पड़ता।

कहने को कुछ भी कह लें, लेकिन हकीकत यही है कि कम से कम भारतीय राजनीति की यही सुंदरता है, उसका कलेवर हाड़-मांस का तो नहीं, कांच का भी नहीं, लेकिन फिर भी इतना कुछ पारदर्शी है कि सब कुछ दिखता है। इसे मत-मतांतर का फेर, सपनों की सौदागीरी, शब्दों की बाजीगरी कुछ भी कह लें।

लेकिन जानते, देखते और समझते हुए भी दलदल में हर बार हमारा वोट गोता खाकर रह जाता है और हम कहते हैं कि ‘अबकी बार हमारी सरकार।’ इतना कहना ही क्या कम है? तो आइए, एक बार फिर से कहें ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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रूपाणी कैबिनेट में दरार के आसार! नितिन पटेल के समर्थन में उतरे बीजेपी नेता नरोत्‍तम पटेल

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राजनीति2 weeks ago

चारा घोटाला: लालू को साढ़े तीन साल की सजा

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ब्लॉग4 weeks ago

संघ के 92 साल के इतिहास में विनोद राय की टक्कर का फ़रेबी और कोई नहीं हुआ!

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केपटाउन टेस्‍ट: गेंदबाजों की मेहनत पर बल्‍लेबाजों ने फेरा पानी, 72 रनों से हारी टीम इंडिया

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काँग्रेसियों की अग्निपरीक्षा! इन्हें ही एक बार फिर देश को आज़ाद करवाना होगा

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ज़रा हटके3 weeks ago

आजीवन क्यों कुंवारे रह गए अटल बिहारी बाजपेयी?

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राजनीति3 weeks ago

नितिन पटेल की नाराजगी पर हार्दिक की चुटकी, कहा- ’10 एमएलए लेकर आओ, मनमाफिक पद पाओ’

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ओपिनियन3 weeks ago

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

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ओपिनियन4 weeks ago

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

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ओपिनियन4 weeks ago

2017 In Retrospect : दुष्कर्म के 5 चर्चित मामलों ने खोली महिला सुरक्षा की पोल

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राष्ट्रीय8 hours ago

सुखोई-30 लड़ाकू विमान में उड़ान भरने वाली देश की पहली महिला रक्षा मंत्री बनीं निर्मला सीतारमण

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शहर11 hours ago

बीजेपी नेता ने अधिकारी को जड़ा थप्पड़, देखें वीडियो…

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राजनीति1 day ago

शिवराज सिंह ने किसको जड़ा थप्पड़? देखें वीडियो…

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PoK में पाक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे व्यापारी

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राष्ट्रीय5 days ago

पहली बार SC के जज आए सामने, कहा- ‘हम नहीं बोले तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा’

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राजनीति6 days ago

नौसेना पर बरसे गडकरी, कहा- ‘दक्षिणी मुंबई में नहीं दूंगा एक इंच जमीन’

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मुंबई के हुक्काबार में जमकर तोड़फोड़

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आर्मी-डे परेड की रिहर्सल के दौरान 3 जवान घायल…देखें वीडियो

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भाजपा सांसद का बयान- 2019 में जिताओगे तो 2014 के वादे पूरे करूंगा, देखिए वीडियो

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