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बुलेट तो चलाएंगे, ट्रेनों की दुर्घटनाएं कब रुकेंगी?

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Bullet Train in India

अगले महीने हमारे प्रधानमंत्री और जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे मिलकर मुंबई-अहमदाबाद बुलेट ट्रेन की आधारशिला रखेंगे, जिसकी रफ्तार 350 किलोमीटर प्रतिघंटा होगी। रेलमंत्री सुरेश प्रभु कह चुके हैं कि वर्ष 2023 तक अहमदाबाद-मुंबई के बीच यह दौड़ने लगेगी। लेकिन सामान्य ट्रेनों की दुर्घटनाएं कब रुकेंगी, इस पर कोई कुछ नहीं बोलता।

विपक्ष है कि 27 रेल हादसे, 259 यात्रियों की मौत, 899 घायलों का आंकड़ा गिनाकर, मोदी सरकार को आईना दिखाना चाहता है। लेकिन सच्चाई यही है कि तेज रफ्तार वाले दौर में आज भी लंबी दूरी की महत्वपूर्ण एक्सप्रेस ट्रेनों में पुरानी तकनीक वाले कन्वेंशनल कोच लगे हैं।

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Picture : Kanpur Train Accident

लंबी दूरी की गाड़ियों में हालांकि आधुनिक टक्कररोधी लिंक हाफमेन बुश (एलएचबी) कोच लगाने के निर्देश हैं, ताकि दुर्घटना के दौरान सीबीसी कपलिंग से पलटने और एक-दूसरे पर चढ़ने की गुंजाइश न रहे। लेकिन इस निर्देश का पालन हो नहीं रहा है। यह विडंबना नहीं तो क्या है कि दौड़ रही ट्रेनों में पुराने परंपरागत कोच बदलने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं है और बुलेट ट्रेन का सपना देख रहे हैं!

उत्कल एक्सप्रेस हादसे में बेइंतहा लापरवाही हुई है। मुजफ्फरनगर के खतौली में जहां से ट्रेन गुजरी, वहां ट्रैक पर काम चल रहा था। पटरी को दुरुस्त करने के लिए आधे घंटे यातायात रोकने ब्लॉक भी मांगा गया था। साथ ही मरम्मत बजाय ट्रेंड कर्मचारियों के सहायकों से कराने का एक वायरल ऑडियो से सामने आया, जिसने सच्चाई की कलई खोल दी, वरना इसे भी आतंकी गतिविधि से जोड़ने की कोशिशें हुई थीं, ताकि लापरवाही की बात दब जाए।

इधर, चार अधिकारियों के निलंबन तथा एक के तबादले सहित रेलवे बोर्ड के सचिव स्तर के एक अधिकारी और तीन वरिष्ठ अधिकारियों को अवकाश पर भेजना ही लापरवाही के सच को बयां करता है। यकीनन तेज रफ्तार ट्रेन नासाज ट्रैक से गुजरी और 14 बोगियां खिलौने जैसे उछलकर यहां-वहां जा गिरीं। एक बोगी तो एक मकान में जा घुसी।

गनीमत थी कि हादसा आबादी वाले इलाके में हुआ और प्रशासन का इंतजार किए बगैर फरिश्ते बने स्थानीयों ने बिना समय गंवाए राहत का काम शुरू कर दिया, वरना जान गंवाने वालों का आंकड़ा 25 से कहीं ज्यादा पहुंच सकता था। टेढ़ी-मेढ़ी बोगियों में फंसे लोगों की जान बचाने वाले स्थानीय लोगों में ज्यादातर मुस्लिम थे, जिन्होंने इंसानों को बचाया। इंसान तो महज इंसान होते हैं, जिन्हें आपस में लड़ाकर, दंगों की आग में झोंककर राजनेता अपनी सियासी रोटियां सेंकते हैं।

लेकिन रेल हादसों पर एक बड़ा सच यह भी है कि जनवरी, 2016 से जुलाई, 2017 के बीच रेल पटरियों से छेड़छाड़ के 28 मामले उप्र में ही हुए। इनमें 25 की प्राथमिकी दर्ज है, लेकिन हैरानी है कि अलीगढ़ की घटना के अलावा पुलिस और जांच एजेंसियों के हाथ अब तक खाली हैं। जबकि इसी वर्ष 7 मार्च को मध्यप्रदेश में भोपाल-उज्जैन पैसेंजर में जबरी के पास बम फटा था, जिसमें जिसमें 10 लोग घायल हुए थे।

तेलंगाना पुलिस के अहम इनपुट से मध्यप्रदेश पुलिस ने पिपरिया में तीन युवकों को गिरफ्तार किया था। इसी इनपुट से लखनऊ में एटीएस ने 11 घण्टे के ऑपरेशन के बाद सैफुल्ला को मारा था, जबकि कानपुर से फैसल खां, इमरान और इटावा से फकरे आलम नामक संदिग्धों को पकड़ा। इसी तरह 20 नवंबर, 2016 को कानपुर के पुखरायां में इंदौर-राजेंद्र नगर एक्सप्रेस के पटरी से उतर जाने से 150 लोगों की मौत और लगभग 250 से ज्यादा घायलों की घटना को भी बतौर साजिश देखी गई।

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साजिश, लापरवाही या दुर्घटना..जो भी हो, इसी वर्ष 21 जनवरी को आंध्रप्रदेश में कुनेरू के पास जगदलपुर-भुवनेश्वर हीराखंड एक्सप्रेस भी पटरी से उतर गई थी, जिसमें 40 लोगों की मौत तथा 70 लोग घायल हुए थे। वहीं 28 दिसंबर को दूसरी बार कानपुर के पास अजमेर-सियालदाह एक्सप्रेस के 15 डिब्बे पटरी से उतर गए, जिसमें 40 लोग घायल हुए थे। 6 मई, 2016 को चेन्नई सेंट्रल-तिरुवनंतपुरम सेंट्रल सुपरफास्ट दूसरी ट्रेन से टकरा गई थी, जिसमें 7 लोग जख्मी हो गए थे। जबकि मई 2014 से अब तक के बड़े हादसों में गोरखधाम एक्सप्रेस 26 मई 2014 को उप्र में संत कबीरनगर जिले के चुरेन स्टेशन के पास एक मालगाड़ी से जा टकराई थी, जिसमें 22 लोगों की मौत हुई थी।

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Train crash: India Janta Express train derailment, at least 30 dead and several injured

20 मार्च, 2015 को देहरादून से वाराणसी जा रही जनता एक्सप्रेस रायबरेली के बछवारावां स्टेशन के पास पटरी से उतर गई थी, जिसमें 34 लोगों की दर्दनाक मौत हुई थी। जबकि 25 मई 2015 को उप्र में ही कौशांबी के सिराथू रेलवे स्टेशन के करीब मूरी एक्सप्रेस दुर्घटनाग्रस्त हुई थी, जिसमें 25 लोगों की मृत्यु हुई थी। 5 मई 2016 को महाराष्ट्र के रायगढ़ में कोंकण रेल खंड पर दिवा-सावंतवाडी ट्रेन के इंजन और 4 डिब्बों के पटरी से उतर जाने से कम से कम 19 यात्रियों की मौत हुई और 100 ज्यादा लोग घायल हुए।

देश में एक ही जगह पर 10 मिनट के भीतर दो ट्रेनों के दुर्घटनाग्रस्त होने का पहला मामला 5 अगस्त, 2015 को मप्र के हरदा में हुआ, जहां कामायनी और जनता एक्सप्रेस माचक नदी पर रेल पटरी धंस गई, जिससे फिसल कर दोनों ट्रेन दुर्घटना ग्रस्त हुईं और 31 लोगों की जान चली गई।

बेशक हम बेहतर तकनीकी दौर में हैं, मंगल तक पहुंच है। फिर मानवीय चूक या सिस्टम का खामियाजा बेगुनाह यात्री क्यों भुगते?

क्या सेंसर, लेजर, इंफ्रारेड, नाइट विजन कैमरे, 4जी, रेल टेल बेहतर कनेक्टिवटी संयोजन से रेल ट्रैक की रक्षा-सुरक्षा संभव नहीं? क्या यात्रियों से रोजाना करोड़ों रुपये कैंसिलेशन के जरिए सॉफ्टवेयर से कमाने वाला रेलवे, ट्रैक की ट्रैकिंग के लिए ऐसी तकनीकी नहीं ईजाद करा सकता?

क्या जरूरी नहीं कि इंजन और ट्रैक के बीच सुरक्षित, संवेदनशील मजबूत सामंजस्य प्रणाली विकसित हो? काश! बुलेट से पहले मौजूदा ट्रेनें सुरक्षित हो पातीं।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

ओपिनियन

विपक्षी दलों को साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए : सलमान खुर्शीद

राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

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Salman Khurshid

वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का कहना है कि विपक्षी दलों को अगले लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के खिलाफ प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में अपना साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए। इसके लिए उनके बीच गठबंधन पर बातचीत पहले शुरू होनी चाहिए, जिससे सभी दलों के कार्यकर्ता आपस में तालमेल बैठा सकें।

सलमान खुर्शीद ने आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि जाहिर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी की पसंद हैं, लेकिन किसी प्रकार की घोषणा के लिए विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की बातचीत के नतीजों का इंतजार करना होगा।

खुर्शीद का मानना है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राजग के खिलाफ समान विचार वाले विपक्षी दलों को एक साथ लाने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गांधी सबसे उत्तम व्यक्ति हैं।

खुर्शीद ने कहा, “जहां तक मेरा और हमारी पार्टी की बात है, तो पसंद जाहिर है। लेकिन वृहत सहयोग व गठबंधन की स्थिति में तो यह होना चाहिए कि गठबंधन बनने तक हम प्रतीक्षा करें। लेकिन हमारे लिए बिल्कुल स्पष्ट है कि राहुल गांधी ही वह शख्सियत हैं, जो इस कार्य के लिए उपयुक्त हैं और वह हमारा नेतृत्व करेंगे।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2019 के आम चुनाव में विपक्ष की ओर से किसी प्रधानमंत्री उम्मीदवार की घोषणा होनी चाहिए, तो उन्होंने कहा कि मोदी की विश्वसनीयता काफी घट गई है।

सलमान खुर्शीद की हाल ही में आई किताब ‘ट्रिपल तलाक : एग्जामिनिंग फेथ’ में उन्होंने तीन तलाक के मसले पर सवाल उठाया है।

उन्होंने कहा, “जहां तक मोदीजी का सवाल है, तो उनकी विश्वसनीयता में काफी कमी आई है, लेकिन मैं यह नहीं कहता कि यह गिरावट अभी पर्याप्त है। गिरावट लगातार जारी है।

राजग के खिलाफ विपक्षी एकता की संभावना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “इस समय यह कहना कठिन है, लेकिन अगर गठबंधन नहीं बनता है तो मौका गंवाने का हमें खेद रहेगा।” उन्होंने कहा कि भिन्न-भिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है।

खुर्शीद ने कहा, “सभी दल मान रहे हैं कि भारत के इतिहास के लिए यह बेहद अहम व क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर है। मेरा मानना है कि बीती बातों को भुला देना चाहिए। लेकिन इसके लिए अभी कदम उठाने होंगे। कुछ लोगों को धीरे-धीरे ऐसी पहल शुरू कर देनी चाहिए। मैं नहीं बता सकता कि वह शख्सियत कौन होंगे और कौन इस काम को अंजाम देंगे। लेकिन धीरे-धीरे बातचीत चल रही है।”

विपक्षी दलों को एकजुट करने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अहम भूमिका होने की संभावना के बावत पूछे जाने पर खुर्शीद ने कहा कि वही नहीं, कोई और भी यह काम कर सकता है।

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

पूर्व विदेश मंत्री ने माना कि पूर्वोत्तर के प्रांत त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है, लेकिन उन्होंने अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में पार्टी की बेहतर स्थिति रहने की संभावना जताई।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

हिंदू चरमपंथियों को परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रही है सरकार : रामानुन्नी

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Ramanunney

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक के. पी. रामानुन्नी का कहना है कि भाजपानीत केंद्रीय सरकार अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है और उन्हें बढ़ावा दे रही है। इस वजह से देश में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

रामानुन्नी ने आईएएनएस के साथ एक साक्षात्कार में कहा, “(केंद्रीय) सरकार हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है। वह इस मुद्दे से बच रही है। यह अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने जैसा है।”

उन्होंने कहा, “जब बात अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार की आती है तो वे (सरकार) कानून के तहत सख्त कदम नहीं उठाते हैं। अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं।”

मलयालम भाषा के लेखक रामानुन्नी पिछले सप्ताह सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने अपनी साहित्य अकदामी पुरस्कार की इनामी राशि लेने के कुछ ही मिनटों बाद उसे जुनैद खान की मां को दे दिया था। 16 वर्षीय जुनैद की जून 2017 में एक ट्रेन के अंदर लोगों के एक समूह ने हत्या कर दी थी।

उन्होंने इनाम राशि में से केवल तीन रुपये अपने पास रखे और बाकी के एक लाख रुपये जुनैद की मां सायरा बेगम को दे दिए थे।

रामानुन्नी ने आईएएनएस से कहा, “सांप्रदायिक घृणा कैंसर की तरह है और जब यह हो जाता है तो इसे रोक पाना बहुत मुश्किल होता है।”

यह पूछने पर कि क्या आपको लगता है कि सांप्रदायिक घटनाएं वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद बढ़ गई हैं, उन्होंने कहा, ‘हां।’

उन्होंने कहा, “वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद कई सांप्रदायिक मुद्दे उठे हैं। जब मैं सांप्रदायिक कहता हूं तो मेरा दोनों पक्षों से मतलब नहीं होता, यह अधिकतर हिंदू समुदाय के लिए है जो मुस्लिमों के साथ असहिष्णुता बरत रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि सरकार इन सांप्रदायिक झगड़ों को समाप्त करने का प्रयास नहीं कर रही और एक दर्शक की तरह बर्ताव कर रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात राष्ट्र के हित के लिए खराब हैं।

रामानुन्नी के साहित्यिक काम सांप्रदायिक सद्धभाव के उनके संदेश के लिए जानें जाते हैं। उनकी किताब ‘दैवाथिंते पुस्तकम’ (ईश्वर की अपनी पुस्तक) के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 2017 मिला है।

जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने अपनी इनाम की राशि जुनैद की मां को क्यों दी, तो उन्होंने कहा, “यह दान नहीं है। अगर ऐसा होता तो मैं जुनैद की मां को उनके घर जाकर यह देता। जब आप यह साहित्य अकादमी के मंच पर दे रहे हैं तो इसके कई मायने हैं। यह अन्य लेखकों को अत्याचारों के बारे में लिखने के लिए प्रोत्साहित करेगा और दूसरे हिंदुओं को बताएगा कि असली और सच्चे हिंदू सिद्धांतों के मुताबिक आपको सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि जुनैद की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह मुस्लिम था और यह सच्ची और असली हिंदू संस्कृति के लिए शर्मनाक है।

रामानुन्नी को जुलाई 2017 में उनका दाहिना हाथ काटने की धमकी मिली थी। उन्होंने कहा कि इस तरह की बातें लेखक के दिमाग को जकड़ देती हैं।

उन्होंने कहा, “बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा कि क्या मैं सांप्रदायिक एकता पर लिखना बंद कर दूंगा। मैंने उनसे कहा कि नहीं। यह आत्महत्या करने जैसा होगा। एक लेखक के लिए अपना पक्ष नहीं जाहिर करना आत्महत्या के समान है।”

लेखक ने कहा, “हालांकि यह भी सही है कि आप यह सब कहते तो हैं, लेकिन जब आपको धमकियां मिलती हैं तो कई लोगों का अवचेतन मन उन्हें सब कुछ कहने से रोकता है। यह एक तरह से किसी को परोक्ष रूप से नियंत्रित करना है। धमकियां लोगों में यह डर पैदा करती हैं। यह तथ्य है।”

इंटरनेट के आज के दौर में किताबों के बारे में पूछने पर रामानुन्नी ने कहा कि पढ़ने की गुणवत्ता पिछले कुछ सालों में कम हुई है। उन्होंने कहा कि पढ़ने में लोग अब उस तरह का आनंद नहीं लेते जैसे पहले लिया जाता था। पढ़ने की आदत मरी तो नहीं है लेकिन इसकी गुणवत्ता घटी है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

बात महात्मा गांधी की, काम उसके ठीक उलट : राजगोपाल

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Gandhi Ji

भोपाल, 26 जनवरी | एकता परिषद के संस्थापक पी.वी. राजगोपाल का कहना है कि देश के 69वें गणतंत्र दिवस पर सभी राजनेता महात्मा गांधी के आदर्शो को अपनाने और उस पर चलने की बात तो कर रहे हैं, मगर उस पर अमल नहीं होगा।

यही कारण है कि राष्ट्रीय पर्व के बावजूद गरीब को गड्ढ़ा खोदकर, पसीना बहाकर रोटी का इंतजाम करना पड़ रहा होगा।

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एकता परिषद के संस्थापक और गांधीवादी नेता डॉ. पी.वी. राजगोपाल

राजगोपाल को अभी हाल ही में पुणे में आयोजित ‘छात्र संसद’ में कृषि योद्धा पुरस्कार दिया गया। उन्होंने गणतंत्र दिवस के मौके पर आईएएनएस से दूरभाष पर बातचीत करते हुए कहा, “संविधान में आम आदमी को मतदान का अधिकार दिया गया तब भी बात उठी थी कि आर्थिक अधिकार भी मिलना चाहिए। तब ऐसा नहीं हो पाया। उसी का नतीजा है कि तमाम अध्ययन बता रहे हैं कि इस देश की 73 फीसदी संपत्ति पर सिर्फ एक फीसदी लोगों का अधिकार है और शेष लोग रोज कमाने खाने में अपनी जिंदगी निकाल देते हैं।

राजगोपाल ने कहा, “गणतंत्र दिवस हो या स्वाधीनता दिवस या अन्य राष्ट्रीय पर्व हर मौके पर राजनेता और सरकारें महात्मा गांधी को याद करते हैं। आज भी ऐसा हुआ मगर यह सिर्फ बातें ही हैं, इन बातों पर आजादी के बाद आज तक अमल नहीं हुआ, अगर अमल हुआ होता तो देश में इतनी आर्थिक विषमता नहीं होती।”

महात्मा गांधी की भावना और संदेशों का जिक्र करते हुए राजगोपाल ने कहा, “गांधी ने कहा था कि आप जो भी योजनाएं बनाएं, अंतिम व्यक्ति को अपनी नजर में रखें, अंतिम व्यक्ति को ताकतवर बनाएंगे तभी आपको यह कहने का अधिकार है कि हमने विकास किया। एक बार फिर गांधी को याद करने और उनके बताए मार्ग पर चलने का समय आ गया है।”

एक सवाल के जवाब में राजगोपाल ने कहा, “वास्तव में अंतिम व्यक्ति को सक्षम और ताकतवर बनाना है तो योजनाएं गांव के स्तर पर बनानी होगी, दिल्ली या भोपाल से बनी योजनाएं गांव की हालत नहीं बदल सकती। अभी हाल ही में ‘सस्टेनेवल गोल’ में भारत सरकार ने वर्ष 2030 तक देश में गरीबी खत्म करने का वादा किया है मगर जब तक लोगों को जमीन नहीं मिलेगी, काम नहीं मिलेगा, जीने के संसाधन नहीं मिलेंगे, सम्मान को बढ़ाएंगे नहीं, तो गरीबी मिटाएंगे कैसे। गरीबी मिटाने का काम पलभर में तो नहीं होगा।”

उन्होंने कहा, “गांव के सारे संसाधन जमीन, खदान, जंगल जब सरकारें पूंजीपतियों को देगी और गांव वालों को धक्का मारकर झुग्गी-झोपड़ी में रहने को मजबूर करेंगी तो सवाल उठता है कि आखिर गरीबी दूर होगी कैसे।”

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा सहरिया आदिवासियों को एक हजार रुपये प्रतिमाह दिए जाने की घोषणा पर राजगोपाल ने कहा कि हजार दो हजार रुपयों से इन परिवारों का क्या होगा। जब तक गांव स्तर पर योजना नहीं बनेगी उनकी जरूरतों को ध्यान नहीं रखा जाएगा तब तक गांव की स्थिति और गरीबी खत्म नहीं हो सकती। उन गांव के पंच और सरपंचों को प्रोत्साहित करना होगा जो गरीबी मिटाने और गांव को संपन्न बनाने की कोशिश करें। इसके लिए प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित करना होगी, जैसी रेलवे प्लेटफॉर्म की सफाई को लेकर प्रतिस्पर्धा का दौर चल रहा है और अच्छे स्टेशन पुरस्कृत किए जा रहे हैं।

राजगोपाल का मानना है कि गांव के विकास की जिम्मेदारी पंचायतों को सौंपनी चाहिए। सरकार अपने स्तर पर हालात नहीं बदल सकती है। वर्तमान में जो चल रहा है उससे न तो गरीबी खत्म होगी और न ही भ्रष्टाचार। लिहाजा सरकारों को अपना तरीका बदलना हेागा। गांव को अपनी जिम्मेदारी उठाने के लिए छोड़ना होगा। बच्चा भी जब पांच साल का हो जाता है तो मां-बाप उंगली पकड़कर चलाना छोड़ देते हैं, ताकि वह गिरे और खुद चलना सीखे, मगर सरकारें आजादी के 70 साल बाद भी गांव की उंगली छोड़ने को तैयार नहीं है।

(आईएएनएस)

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