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देश का भला चाहते हैं तो सिर्फ़ अपनी समझ और जानकारी से काम लें, वर्ना…

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कोई नहीं कह सकता कि काँग्रेस ईमानदार पार्टी है! बीजेपी भी कभी ईमानदार नहीं रही! कोई पार्टी ईमानदार नहीं होती। हो भी नहीं सकती। उसे उन लोगों का ख़्याल रखना ही होता है, जिनकी बदौलत वो सत्ता में पहुँचती है या सियासी अखाड़े में डटी रहती है। इसीलिए जो किसान-मज़दूरों की पार्टी होती है वो उनके हितों की बात करती है। जबकि जो पूँजीपतियों के सहारे खड़ी होती है, उसे धन्ना सेठों को फ़ायदा पहुँचाना पड़ता है! कुछ नेता ईमानदार हैं तो बहुतेरे आकंठ बेईमान और मक्कार। ऐसा सभी पार्टियों में है। कोई पार्टी अपवाद नहीं है।

प्रमोद महाजन उम्दा फंड मैनेजर थे। उनके असंख्य चेले थे। अभी नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, नितिन गडकरी और जेपी नड्डा पर ख़ासा दारोमदार है। दूसरी पार्टियों में भी इनके समकक्ष लोग हैं। होने भी चाहिए। नहीं रहेंगे तो पार्टी चलेगी कैसे! इसमें कोई बुराई भी नहीं है, क्योंकि यही दस्तूर है और सब पर बराबर से हावी है। ऐसा सिर्फ़ इसलिए है क्योंकि राजनीति करने के लिए भी पैसा चाहिए होता है। पैसा तो पैसा है। उसमें जायज़-नाजायज़ सब शामिल रहता है। हरेक पार्टी में यही हाल है। तो फिर जनता क्या देखे?

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जनता देखे कि कौन उसे कितना कम उल्लू बनाकर सत्ता में आना चाहता है? कौन सबको साथ लेकर चलना जानता है? कौन लोकतांत्रिक मूल्यों का ज़्यादा से ज़्यादा सम्मान करता है? कौन कम तानाशाही से चलता है? कौन कम साम्प्रदायिक है? किसकी कथनी और करनी में कम फ़र्क़ है? यानी, जनता को सिर्फ़ इतना तय करना होता है कि नैतिक और व्यावहारिक बुराइयों के लिहाज़ से कौन कम बुरा है, कम ख़राब है, कम घटिया है, कम मक्कार है, कम झूठा है, कम व्याभिचारी है!

कौन जिस तरह के आरोप अपने विरोधियों पर लगाता है, उनसे ख़ुद कितना अछूता है? कौन है जिसने अपने विरोधियों को उनकी काली करतूतों की सज़ा दिलाने में संजीदगी दिखायी है? कौन है जो अपने विरोधियों का चरित्र-हनन करके सत्ता की मलाई तो काटना चाहता है, लेकिन सत्ता पाने के बाद अपने आरोपों को दोषी साबित करने और सलाखों के पीछे पहुँचाने के लिए कुछ नहीं करता? कौन है जो अपने भ्रष्ट विरोधियों से शालीनता और गरिमा से निपटना जानता है? इन पैमानों को जानने-समझने और आज़माने में कौन कितना पारदर्शी है? कौन कितना दबंग और दुस्साहसी है?

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अब याद कीजिए कि कौन कहता था कि शीला दीक्षित को जेल भिजवाकर रहूँगा। अभी तक क्यों नहीं भिजवाया? कौन कहता था कि काँग्रेसी राज में हुए कथित घोटालों के ज़िम्मेदार लोगों को उनके पापों की सज़ा दिलायी जाएगी? अभी तक कितनों को सलाखों के पीछे पहुँचाया? देरी क्यों हो रही है?

सीबीआई आपकी, पुलिस आपकी, अदालत आपकी, सीवीसी आपका, ईडी आपका… सब कुछ तो आपकी मुट्ठी में है तो फिर नतीज़ा क्यों नहीं निकला? भ्रष्टाचार जेल में क्यों नहीं ठूँसे गये? शायद इसलिए कि सरकार में बैठकर सारी बेईमानियाँ काग़ज़ का पेट भरकर की जाती हैं! सारी कुकर्म सबकी मिलीभगत से होते है। बेईमानी और रिश्वत की कमाई की बन्दरबाँट बहुत ईमानदारी से होती है। ऑडिट की बाधाओं का ख़्याल रखा जाता है। उन्हें दूर करने के लिए ‘सेटिंग’ की जाती है।

इसीलिए जब भी कोई नयी पार्टी सत्ता में पहुँचती है तो वो भी अपने पूर्ववर्तियों की तरह ही काग़ज़ का पेट भरकर ही गोलमाल करना चालू कर देती हैं। इसीलिए, विरोधियों को बदनाम करके सत्ता हथियाना आसान है लेकिन भ्रष्ट लोगों को उनके भ्रष्टाचार की सज़ा दिला पाना बेहद मुश्किल होता है। कोई भी सत्तारूढ़ पार्टी बेहद मुश्किल काम में हाथ नहीं डालना चाहती। सभी पार्टियाँ सियासी विवाद को ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त तक ज़िन्दा रखना चाहते हैं। ताकि विपक्ष का चरित्र-हनन किया जाता रहे। सियासी उल्लू को सीधा किया जा सके!

बोफ़ोर्स सौदे में क्या किसी को सज़ा मिली? तहलका मामले में किसकी ज़िन्दगी जेलों में गुज़री? कितना काला धन देश में आ चुका है? कितने बेईमान और राष्ट्रद्रोही जेलों में हैं? 84 के दंगाई, गुजरात के दंगाई, गोधरा के गुनहगार, बाबरी मसजिद ढहाने के साज़िशकर्ता क्यों आज भी बिन्दास घूम रहे हैं? ऐसे लोगों के गिरेबान तक क्यों देश का क़ानून कभी पहुँच नहीं पाता? व्यापमं के कितनों गुनहगारों को हम सलाखों के पीछे पहुँचा चुके हैं? क्या पंजाब का बादल परिवार अब जेल जाने वाला है? क्या लालू, अभी जेल में चक्की पीस रहे हैं? कोयला घोटाला, 2जी/3जी घोटाला, कॉमनवेल्थ घोटाला, आदर्श घोटाला जैसे कितने ही कारनामों से जुड़े खिलाड़ियों का क्यों देश का क़ानून कुछ नहीं बिगाड़ सका? कहीं ऐसा तो नहीं कि सारे के सारे आरोप ही किसी बड़ी साज़िश का हिस्सा हों!

इसीलिए अगली बार जब आप वोट देने जाएँ तो पहले ज़रा उपरोक्त सवालों के उत्तर तलाशने की कोशिश करें। इसके लिए भी सिर्फ़ और सिर्फ़ अपनी समझ और जानकारी से काम लें। किसी और के बहकावे और समझाने-बुझाने में नहीं आयें! अपने दिमाग़ से चलेंगे तो आप देश का, समाज का और परिवार का सबसे ज़्यादा हित करेंगे। वर्ना, अभी तक की तरह भैंस पानी में ही रहेगी!

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