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जेनेवा में मुकुल रोहतगी ने झूठ के एक से बढ़कर एक पकवान बनाये…!

Rohtagi In UNHRC-2

जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) के 27 वें सत्र में भारत के महान्यायवादी यानी अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने ऐसी लम्बी-चौड़ी फेंकी कि उनके सियासी आका नरेन्द्र मोदी, पेशेवर मसीहा अरूण जेटली और बौद्धिक गुरु मोहन भागवत भी शरमा जाएँ! जिस संविधान का उसके निर्माण के वक़्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने ज़ोरदार विरोध किया था उसी की दुहाई देते हुए मुकुल रोहतगी डींगें हाँकीं कि “भारत अपने नागरिकों की जाति, नस्, रंग या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करता है। क्योंकि इस धर्मनिरपेक्ष देश में सरकार का कोई धर्म नहीं है। फिर भी भारतीय संविधान अपने हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है।”

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अब ज़रा सच्चाई पर ग़ौर फ़रमाएँ…!

1. जाति: भारत में आज भी जाति प्रथा है। छुआछूत है। दलित उत्पीड़न है। जाति आधारित अगड़ा-पिछड़ा समाज है। चुनाव में जातिगत वैमनस्य और प्राथमिकताएँ सिर चढ़कर बोलती हैं! इसी आधार पर टिकट बँटते हैं। प्रचार होता है। मंत्री पद बँटते हैं। जातीय हिंसा होती है। जातिगत विवाद की मज़बूत परम्परा है।

2. नस्ल: यहाँ नस्स के नाम पर उत्तर पूर्व राज्यों के लोगों को हिंसा को शिकार बनाया जाता है। तरूण विजय जैसे संघ के नेता और पूर्व सांसद नस्लीय टिप्पणी करते हैं कि दक्षिण भारत के काले लोगों के साथ भी उन्हें रहना पड़ता है।
3. रंग: भारत में त्वचा के रंग के आधार पर ही तो ग्राहम स्टेंस को निशाना बनाया जाता है और उन्हें उनके दो बेटों समेत ज़िन्दा जला दिया जाता है। गुजरात के उना में दलितों और उनके पेशे का रंग भी तो उनके हिंसक दमन की वजह बना था। दलितों के नरसंहार के तो असंख्य क़िस्से दर्ज़ हैं!

4. धर्म: ये तो भारत में भेदभाव की सबसे बड़ी वजह है। पहलू ख़ान और अख़लाक़ को अपने धर्म की क़ीमत चुकानी पड़ती है। यहाँ तो गाय जैसा पशु भी धार्मिक बनाया जा चुका है। कहीं बीफ़ खाना जायज़ है तो कहीं नाजायज़! यहाँ तक कि गौरक्षा का क़ानून भी पूरे देश में एक जैसा नहीं है। लेकिन भारत इंसानों के लिए समान नागरिक संहिता की बनाने की बात करता है!
5. धर्मनिरपेक्ष: ये भारत का सबसे बड़ा ढकोसला है। यहाँ बात मुसलमानों के तुष्टिकरण की होती है। लेकिन हवा हिन्दुत्ववादी तुष्टिकरण की बहती है। अल्पसंख्यक सिखों और मुसलमानों के ख़िलाफ़ दंगों के मामले में भी भारत में काले पन्नों की कोई क़िल्लत नहीं है।

6. धार्मिक स्वतंत्रता: भारत में हिन्दू-मुसलमान के बीच प्यार और विवाह नहीं हो सकता। वर्ना, बहुसंख्यक लोग अल्पसंख्यक समाज को पीटते-पीटते मौत के घाट पहुँचा देता है।

मुकुल रोहतगी ने ये भी नहीं बताया कि हमारे राम-भक्त ज़बरन मसजिद तोड़ देते हैं। संविधान की धज़्ज़ियाँ उड़ाने में अव्वल रहते हैं, क्योंकि भारत के हिन्दुत्ववादी ख़ुद को शायद, संविधान से भी ऊपर समझते हैं। हमारी न्यायप्रणाली विश्व में सबसे घटिया है। हमारे यहाँ 20/30/40 साल में न्याय मिलना मुहाल रहता है! फिर भी भारत विश्व गुरु होने होने का दावा करता है!

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