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जून में लिखे मेरे लेख ने उमा भारती का क़द घटाने में निर्णायक भूमिका निभायी

Uma Bharti

भक्ति भाव में डूबे भारतीय मीडिया को देख बहुत लोगों में ये धारणा घर कर गयी है कि मौजूदा दौर में स्तरीय पत्रकारिता बेमानी हो चुकी है। लेकिन ऐसा पूरी तरह से सही नहीं है! यदि पत्रकारिता को उसके मूल्यों और सिद्धान्तों के आधार पर किया जाए, तो आज भी ये सरकार की चूलें हिला सकती है, मंत्रियों की कुर्सी छीन सकती है, उनका क़द गिरा सकती है! ग़ौरतलब है कि जो उमा भारती कल तक मोदी सरकार की बेहद कद्दावर मंत्री समझी जाती थीं, उनकी विदाई का टिकट कटवाने में मेरे एक लेख ने निर्णायक भूमिका निभायी! 5 जून 2017 को प्रकाशित इस लेख में उमा भारती के झाँसेबाज़ बयानों की बदौलत, उनकी ऐसी बधिया उधेड़ी गयी कि आख़िरकार मोदी-शाह और संघ को उन्हें गंगा सफ़ाई के काम से ही सफ़ा कर दिया गया।

सच तो ये है कि राम मन्दिर आन्दोलन में उमा की भूमिका, इससे जुड़े मामलों का अदालत में नाज़ुक मोड़ पर होना और पार्टी में उनकी वरिष्ठता का लिहाज़ करते हुए उन्हें मोदी कैबिनेट से धक्के मारकर बाहर नहीं निकाला गया! इन्हीं दलीलों के आधार पर उन्होंने अमित शाह के कहने के बावजूद इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया था। उमा ने बीजेपी नेतृत्व को चुनौती दे दी थी कि वो इस्तीफ़ा नहीं देंगी, प्रधानमंत्री चाहें तो उन्हें मंत्रिमंडल से बर्ख़ास्त कर दें। इसके बाद, पर्दे के पीछे सुलह-सफ़ाई का युद्ध चला। इसमें उमा विजयी हुईं। हालाँकि उनकी सल्तनत ‘केन्द्रीय जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्री’ से सिमटकर ‘पेयजल और स्‍वच्‍छता मंत्री’ हो गयी। मानो किसी मुख्यमंत्री को ज़िलाधिकारी बना दिया गया हो!

उमा भारती अब मोदी सरकार में सबसे कम प्रभाव और अधिकार वाली मंत्री हैं। कैबिनेट दर्जे वाले मंत्री के लिए ‘पेयजल और स्‍वच्‍छता’ विभाग की हस्ती किसी झुनझुने से ज़्यादा नहीं है। अब उनके मातहत कोई भी राज्यमंत्री नहीं है, क्योंकि इसकी ज़रूरत ही नहीं बची। उमा भारती को काम ढेले भर का नही करने और हमेशा तरह-तरह के बयान देकर सुर्ख़ियों में रहने की सज़ा मिली है। दरअसल, 2014 में सरकार बनते ही ‘गंगा की सफ़ाई’ का वादा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए गले की सबसे बड़ी फाँस बन गयी। क्योंकि चुनाव प्रचार में गंगा की दुर्दशा को बड़े ज़ोर-शोर से मुद्दा बनाया गया था। वो भी इस बात का अन्दाज़ा लगाये बग़ैर कि गंगा की सफ़ाई कितना व्यापक, ख़र्चीला और वक़्त खाने वाला काम है।

इसकी वजह ये है कि गंगा सिर्फ़ एक नदी नहीं बल्कि भारत की सबसे बड़ी पारिस्थितिकी संरचना (Ecological Structure) है। गंगा बेसिन को साफ़ किये बग़ैर गंगा का साफ़ हो पाना नामुमकिन है। गंगा बेसिन विकराल है। इसकी सैकड़ों सहायक नदियों और उनके जलग्रहण क्षेत्र से बना है। इसके उत्तर में हिमालय, चीन और तिब्बत है तो दक्षिण में नर्मदा और महानदी बेसिन है। इसके पूर्व में ब्रह्मपुत्र बेसिन है तो पश्चिम में सिन्धु (Indus) बेसिन। गंगा बेसिन में भारत की आधे से ज़्यादा आबादी रहती है।

गंगा की सफ़ाई का सिर्फ़ एक ही वैज्ञानिक तरीका हो सकता है कि पूरे गंगा बेसिन को प्रदूषण मुक्त बनाया जाए। नदियों में गिरने वाली गन्दगी पर पूर्ण रोक लगे। ये काम बोलने में बहुत छोटा लेकिन करने के लिए बहुत बड़ा है। भारत में जिस चाल से सरकारी योजनाएँ चलती हैं, उस लिहाज़ से तो ये काम 50 साल में भी पूरा नहीं हो सकता। आज तक किसी को नहीं पता कि गंगा की सफ़ाई के लिए कुल कितने सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की ज़रूरत होगी, उनके निर्माण और रखरखाव पर कितना खर्च आएगा? फिर भी चुनाव में जनता को ‘अच्छे दिनों’ की तरह झाँसा देकर सब्ज़बाग़ दिखाये गये कि बीजेपी के जीतते ही गंगा साफ़ हो जाएगी।

इसीलिए जैसे ही मई 2014 में उमा भारती को ‘केन्द्रीय जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्री’ बनाया गया, वैसे ही उन्होंने चोटी की बयान-वीर बनने की रणनीति अपनायी। बीते साढ़े तीन साल में उमा भारती ने गंगा की सफ़ाई से जुड़े असंख्य बयान दिये। उमा भारती की धारणा थी कि जैसे नरेन्द्र मोदी तरह-तरह के झाँसे देकर देश की जनता को मूर्ख बना लेते हैं, वैसे ही वो भी अपने बयानों से अपनी सियासी दुकान चलाती रहेंगी। इसीलिए जैसे नरेन्द्र मोदी ने नोटबन्दी के वक़्त देश से 50 दिन की मोहलत माँगी और फिर सरे-चौराहे इंसाफ़ करने का शिगूफ़ा छोड़ा, वैसे ही उमा भारती का बयान था, “यदि गंगा की सफ़ाई नहीं करा पायी तो प्राण दे दूँगी!” ग़नीमत है, अब मंत्रालय बदलने की वजह से उनके प्राणों पर गहराया संकट भी मिट चुका है!

अब बात उमा भारती के उन बयानों की जिनका संग्रह मैंने अपने 5 जून 2017 के लेख “मोदी राज में गंगा सफ़ाई का ढोल फटा: उमा भारती अब 2027 का झाँसा दे रही हैं!” लिखा था। इस लेख में उमा भारती के झाँसेबाज़ बयानों की सबूतों के साथ पोल खोली गयी थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की मीडिया पर नज़र रखने वाली टीम ने इस लेख का संज्ञान लिया। हरेक वेबलिंक से सबूतों की प्रतियाँ इक्कठा की गयीं और उसे ‘साहबों’ के सामने पेश किया गया। तभी उमा भारती की विदाई तय हो गयी। तय हुआ कि मंत्रिमंडल में फ़ेरबदल के वक़्त उमा भारती पर ग़ाज़ गिरेगी। अभी कैबिनेट से बाहर किये गये हरेक मंत्री का आँकलन मोदी-शाह के पास मौजूद था। रणनीति बनी कि इससे भी मोदी की ब्रॉन्डिंग की जाए और नये मंत्रियों को चुनने से पहले निकम्मों से इस्तीफ़ा लेकर ये छवि बनायी जाए कि मोदी को निकम्मे लोग बर्दाश्त नहीं हैं। हालाँकि, हक़ीक़त ये भी है कि एनडीए के कोटे वाले सारे मंत्री कहीं बड़े निकम्मे हैं!

गंगा की सफ़ाई को लेकर उमा भारती की शिग़ूफ़ेबाज़ी का सिलसिला मोदी सरकार में उनके मंत्री बनने के साल भर बाद शुरू हुआ। उन्होंने 5 जून 2015 को पहला शिग़ूफ़ा छोड़ा कि ‘अक्टूबर 2016 तक गंगा प्रदूषण मुक्त हो जाएगी!’ फिर 15 अप्रैल 2016 को बोलीं कि ‘2016 के आख़िर तक गंगा में सफ़ाई का काम दिखने लगेगा!’ 29 अप्रैल 2016 को उन्होंने नया शिग़ूफ़ा छोड़ा कि ‘जुलाई 2018 तक गंगा साफ़ हो जाएगी!’ 21 मई 2017 को उमा भारती बोलतीं हैं कि “हमने पिछले वर्ष जुलाई [2016] में गंगा निर्मलीकरण अभियान का पहला चरण शुरू किया और अक्टूबर 2018 तक नमामि गंगे का कार्य पूरा करके गंगा को साफ़ कर दिया जाएगा। लेकिन गंगा की अविरल धारा बहाल करने में समय लगेगा। इसमें सात वर्ष तक का समय लग सकता है।” लेकिन 15 दिन में ये मियाद सात से बढ़कर दस साल हो गयी। 4 जून 2017 को फ़र्रूख़ाबाद में ‘गंगा निरीक्षण यात्रा’ के मौके पर उमा भारती ने ऐलान किया कि ‘गंगा साफ़ करने में लगेंगे 10 साल!’

साफ़ है कि गंगा की सफ़ाई के लिए उमा भारती, 2027 तक की मोहलत चाहती थीं! लेकिन मज़े की बात ये रही कि बात-बात पर 2022 को लेकर लम्बी-चौड़ी छोड़ने वालों को उमा भारती की ये अदा कैसे हज़म होती!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

(ये लेखक के निजी विचार है।)

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