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जून में लिखे मेरे लेख ने उमा भारती का क़द घटाने में निर्णायक भूमिका निभायी

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Uma Bharti

भक्ति भाव में डूबे भारतीय मीडिया को देख बहुत लोगों में ये धारणा घर कर गयी है कि मौजूदा दौर में स्तरीय पत्रकारिता बेमानी हो चुकी है। लेकिन ऐसा पूरी तरह से सही नहीं है! यदि पत्रकारिता को उसके मूल्यों और सिद्धान्तों के आधार पर किया जाए, तो आज भी ये सरकार की चूलें हिला सकती है, मंत्रियों की कुर्सी छीन सकती है, उनका क़द गिरा सकती है! ग़ौरतलब है कि जो उमा भारती कल तक मोदी सरकार की बेहद कद्दावर मंत्री समझी जाती थीं, उनकी विदाई का टिकट कटवाने में मेरे एक लेख ने निर्णायक भूमिका निभायी! 5 जून 2017 को प्रकाशित इस लेख में उमा भारती के झाँसेबाज़ बयानों की बदौलत, उनकी ऐसी बधिया उधेड़ी गयी कि आख़िरकार मोदी-शाह और संघ को उन्हें गंगा सफ़ाई के काम से ही सफ़ा कर दिया गया।

सच तो ये है कि राम मन्दिर आन्दोलन में उमा की भूमिका, इससे जुड़े मामलों का अदालत में नाज़ुक मोड़ पर होना और पार्टी में उनकी वरिष्ठता का लिहाज़ करते हुए उन्हें मोदी कैबिनेट से धक्के मारकर बाहर नहीं निकाला गया! इन्हीं दलीलों के आधार पर उन्होंने अमित शाह के कहने के बावजूद इस्तीफ़ा देने से इनकार कर दिया था। उमा ने बीजेपी नेतृत्व को चुनौती दे दी थी कि वो इस्तीफ़ा नहीं देंगी, प्रधानमंत्री चाहें तो उन्हें मंत्रिमंडल से बर्ख़ास्त कर दें। इसके बाद, पर्दे के पीछे सुलह-सफ़ाई का युद्ध चला। इसमें उमा विजयी हुईं। हालाँकि उनकी सल्तनत ‘केन्द्रीय जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्री’ से सिमटकर ‘पेयजल और स्‍वच्‍छता मंत्री’ हो गयी। मानो किसी मुख्यमंत्री को ज़िलाधिकारी बना दिया गया हो!

उमा भारती अब मोदी सरकार में सबसे कम प्रभाव और अधिकार वाली मंत्री हैं। कैबिनेट दर्जे वाले मंत्री के लिए ‘पेयजल और स्‍वच्‍छता’ विभाग की हस्ती किसी झुनझुने से ज़्यादा नहीं है। अब उनके मातहत कोई भी राज्यमंत्री नहीं है, क्योंकि इसकी ज़रूरत ही नहीं बची। उमा भारती को काम ढेले भर का नही करने और हमेशा तरह-तरह के बयान देकर सुर्ख़ियों में रहने की सज़ा मिली है। दरअसल, 2014 में सरकार बनते ही ‘गंगा की सफ़ाई’ का वादा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए गले की सबसे बड़ी फाँस बन गयी। क्योंकि चुनाव प्रचार में गंगा की दुर्दशा को बड़े ज़ोर-शोर से मुद्दा बनाया गया था। वो भी इस बात का अन्दाज़ा लगाये बग़ैर कि गंगा की सफ़ाई कितना व्यापक, ख़र्चीला और वक़्त खाने वाला काम है।

इसकी वजह ये है कि गंगा सिर्फ़ एक नदी नहीं बल्कि भारत की सबसे बड़ी पारिस्थितिकी संरचना (Ecological Structure) है। गंगा बेसिन को साफ़ किये बग़ैर गंगा का साफ़ हो पाना नामुमकिन है। गंगा बेसिन विकराल है। इसकी सैकड़ों सहायक नदियों और उनके जलग्रहण क्षेत्र से बना है। इसके उत्तर में हिमालय, चीन और तिब्बत है तो दक्षिण में नर्मदा और महानदी बेसिन है। इसके पूर्व में ब्रह्मपुत्र बेसिन है तो पश्चिम में सिन्धु (Indus) बेसिन। गंगा बेसिन में भारत की आधे से ज़्यादा आबादी रहती है।

गंगा की सफ़ाई का सिर्फ़ एक ही वैज्ञानिक तरीका हो सकता है कि पूरे गंगा बेसिन को प्रदूषण मुक्त बनाया जाए। नदियों में गिरने वाली गन्दगी पर पूर्ण रोक लगे। ये काम बोलने में बहुत छोटा लेकिन करने के लिए बहुत बड़ा है। भारत में जिस चाल से सरकारी योजनाएँ चलती हैं, उस लिहाज़ से तो ये काम 50 साल में भी पूरा नहीं हो सकता। आज तक किसी को नहीं पता कि गंगा की सफ़ाई के लिए कुल कितने सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की ज़रूरत होगी, उनके निर्माण और रखरखाव पर कितना खर्च आएगा? फिर भी चुनाव में जनता को ‘अच्छे दिनों’ की तरह झाँसा देकर सब्ज़बाग़ दिखाये गये कि बीजेपी के जीतते ही गंगा साफ़ हो जाएगी।

इसीलिए जैसे ही मई 2014 में उमा भारती को ‘केन्द्रीय जल संसाधन और गंगा संरक्षण मंत्री’ बनाया गया, वैसे ही उन्होंने चोटी की बयान-वीर बनने की रणनीति अपनायी। बीते साढ़े तीन साल में उमा भारती ने गंगा की सफ़ाई से जुड़े असंख्य बयान दिये। उमा भारती की धारणा थी कि जैसे नरेन्द्र मोदी तरह-तरह के झाँसे देकर देश की जनता को मूर्ख बना लेते हैं, वैसे ही वो भी अपने बयानों से अपनी सियासी दुकान चलाती रहेंगी। इसीलिए जैसे नरेन्द्र मोदी ने नोटबन्दी के वक़्त देश से 50 दिन की मोहलत माँगी और फिर सरे-चौराहे इंसाफ़ करने का शिगूफ़ा छोड़ा, वैसे ही उमा भारती का बयान था, “यदि गंगा की सफ़ाई नहीं करा पायी तो प्राण दे दूँगी!” ग़नीमत है, अब मंत्रालय बदलने की वजह से उनके प्राणों पर गहराया संकट भी मिट चुका है!

अब बात उमा भारती के उन बयानों की जिनका संग्रह मैंने अपने 5 जून 2017 के लेख “मोदी राज में गंगा सफ़ाई का ढोल फटा: उमा भारती अब 2027 का झाँसा दे रही हैं!” लिखा था। इस लेख में उमा भारती के झाँसेबाज़ बयानों की सबूतों के साथ पोल खोली गयी थी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की मीडिया पर नज़र रखने वाली टीम ने इस लेख का संज्ञान लिया। हरेक वेबलिंक से सबूतों की प्रतियाँ इक्कठा की गयीं और उसे ‘साहबों’ के सामने पेश किया गया। तभी उमा भारती की विदाई तय हो गयी। तय हुआ कि मंत्रिमंडल में फ़ेरबदल के वक़्त उमा भारती पर ग़ाज़ गिरेगी। अभी कैबिनेट से बाहर किये गये हरेक मंत्री का आँकलन मोदी-शाह के पास मौजूद था। रणनीति बनी कि इससे भी मोदी की ब्रॉन्डिंग की जाए और नये मंत्रियों को चुनने से पहले निकम्मों से इस्तीफ़ा लेकर ये छवि बनायी जाए कि मोदी को निकम्मे लोग बर्दाश्त नहीं हैं। हालाँकि, हक़ीक़त ये भी है कि एनडीए के कोटे वाले सारे मंत्री कहीं बड़े निकम्मे हैं!

गंगा की सफ़ाई को लेकर उमा भारती की शिग़ूफ़ेबाज़ी का सिलसिला मोदी सरकार में उनके मंत्री बनने के साल भर बाद शुरू हुआ। उन्होंने 5 जून 2015 को पहला शिग़ूफ़ा छोड़ा कि ‘अक्टूबर 2016 तक गंगा प्रदूषण मुक्त हो जाएगी!’ फिर 15 अप्रैल 2016 को बोलीं कि ‘2016 के आख़िर तक गंगा में सफ़ाई का काम दिखने लगेगा!’ 29 अप्रैल 2016 को उन्होंने नया शिग़ूफ़ा छोड़ा कि ‘जुलाई 2018 तक गंगा साफ़ हो जाएगी!’ 21 मई 2017 को उमा भारती बोलतीं हैं कि “हमने पिछले वर्ष जुलाई [2016] में गंगा निर्मलीकरण अभियान का पहला चरण शुरू किया और अक्टूबर 2018 तक नमामि गंगे का कार्य पूरा करके गंगा को साफ़ कर दिया जाएगा। लेकिन गंगा की अविरल धारा बहाल करने में समय लगेगा। इसमें सात वर्ष तक का समय लग सकता है।” लेकिन 15 दिन में ये मियाद सात से बढ़कर दस साल हो गयी। 4 जून 2017 को फ़र्रूख़ाबाद में ‘गंगा निरीक्षण यात्रा’ के मौके पर उमा भारती ने ऐलान किया कि ‘गंगा साफ़ करने में लगेंगे 10 साल!’

साफ़ है कि गंगा की सफ़ाई के लिए उमा भारती, 2027 तक की मोहलत चाहती थीं! लेकिन मज़े की बात ये रही कि बात-बात पर 2022 को लेकर लम्बी-चौड़ी छोड़ने वालों को उमा भारती की ये अदा कैसे हज़म होती!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

(ये लेखक के निजी विचार है।)

ओपिनियन

विपक्षी दलों को साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए : सलमान खुर्शीद

राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

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Salman Khurshid

वरिष्ठ कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद का कहना है कि विपक्षी दलों को अगले लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के खिलाफ प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में अपना साझा उम्मीदवार उतारना चाहिए। इसके लिए उनके बीच गठबंधन पर बातचीत पहले शुरू होनी चाहिए, जिससे सभी दलों के कार्यकर्ता आपस में तालमेल बैठा सकें।

सलमान खुर्शीद ने आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि जाहिर है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी की पसंद हैं, लेकिन किसी प्रकार की घोषणा के लिए विपक्षी दलों के साथ गठबंधन की बातचीत के नतीजों का इंतजार करना होगा।

खुर्शीद का मानना है कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाले राजग के खिलाफ समान विचार वाले विपक्षी दलों को एक साथ लाने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की अध्यक्ष सोनिया गांधी सबसे उत्तम व्यक्ति हैं।

खुर्शीद ने कहा, “जहां तक मेरा और हमारी पार्टी की बात है, तो पसंद जाहिर है। लेकिन वृहत सहयोग व गठबंधन की स्थिति में तो यह होना चाहिए कि गठबंधन बनने तक हम प्रतीक्षा करें। लेकिन हमारे लिए बिल्कुल स्पष्ट है कि राहुल गांधी ही वह शख्सियत हैं, जो इस कार्य के लिए उपयुक्त हैं और वह हमारा नेतृत्व करेंगे।”

पूर्व केंद्रीय मंत्री से जब पूछा गया कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ 2019 के आम चुनाव में विपक्ष की ओर से किसी प्रधानमंत्री उम्मीदवार की घोषणा होनी चाहिए, तो उन्होंने कहा कि मोदी की विश्वसनीयता काफी घट गई है।

सलमान खुर्शीद की हाल ही में आई किताब ‘ट्रिपल तलाक : एग्जामिनिंग फेथ’ में उन्होंने तीन तलाक के मसले पर सवाल उठाया है।

उन्होंने कहा, “जहां तक मोदीजी का सवाल है, तो उनकी विश्वसनीयता में काफी कमी आई है, लेकिन मैं यह नहीं कहता कि यह गिरावट अभी पर्याप्त है। गिरावट लगातार जारी है।

राजग के खिलाफ विपक्षी एकता की संभावना के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “इस समय यह कहना कठिन है, लेकिन अगर गठबंधन नहीं बनता है तो मौका गंवाने का हमें खेद रहेगा।” उन्होंने कहा कि भिन्न-भिन्न स्तरों पर बातचीत चल रही है।

खुर्शीद ने कहा, “सभी दल मान रहे हैं कि भारत के इतिहास के लिए यह बेहद अहम व क्रांतिकारी परिवर्तन का दौर है। मेरा मानना है कि बीती बातों को भुला देना चाहिए। लेकिन इसके लिए अभी कदम उठाने होंगे। कुछ लोगों को धीरे-धीरे ऐसी पहल शुरू कर देनी चाहिए। मैं नहीं बता सकता कि वह शख्सियत कौन होंगे और कौन इस काम को अंजाम देंगे। लेकिन धीरे-धीरे बातचीत चल रही है।”

विपक्षी दलों को एकजुट करने में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अहम भूमिका होने की संभावना के बावत पूछे जाने पर खुर्शीद ने कहा कि वही नहीं, कोई और भी यह काम कर सकता है।

उन्होंने कहा कि राहुल गांधी पार्टी में बदलाव लाएंगे और वह कांग्रेस को नया स्वरूप देंगे।

पूर्व विदेश मंत्री ने माना कि पूर्वोत्तर के प्रांत त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ रही है, लेकिन उन्होंने अन्य राज्यों में होने वाले चुनावों में पार्टी की बेहतर स्थिति रहने की संभावना जताई।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

हिंदू चरमपंथियों को परोक्ष रूप से बढ़ावा दे रही है सरकार : रामानुन्नी

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Ramanunney

साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता लेखक के. पी. रामानुन्नी का कहना है कि भाजपानीत केंद्रीय सरकार अप्रत्यक्ष रूप से हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है और उन्हें बढ़ावा दे रही है। इस वजह से देश में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना बढ़ी है।

रामानुन्नी ने आईएएनएस के साथ एक साक्षात्कार में कहा, “(केंद्रीय) सरकार हिंदू सांप्रदायिक चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रही है। वह इस मुद्दे से बच रही है। यह अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा देने जैसा है।”

उन्होंने कहा, “जब बात अल्पसंख्यकों के खिलाफ अत्याचार की आती है तो वे (सरकार) कानून के तहत सख्त कदम नहीं उठाते हैं। अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं।”

मलयालम भाषा के लेखक रामानुन्नी पिछले सप्ताह सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने अपनी साहित्य अकदामी पुरस्कार की इनामी राशि लेने के कुछ ही मिनटों बाद उसे जुनैद खान की मां को दे दिया था। 16 वर्षीय जुनैद की जून 2017 में एक ट्रेन के अंदर लोगों के एक समूह ने हत्या कर दी थी।

उन्होंने इनाम राशि में से केवल तीन रुपये अपने पास रखे और बाकी के एक लाख रुपये जुनैद की मां सायरा बेगम को दे दिए थे।

रामानुन्नी ने आईएएनएस से कहा, “सांप्रदायिक घृणा कैंसर की तरह है और जब यह हो जाता है तो इसे रोक पाना बहुत मुश्किल होता है।”

यह पूछने पर कि क्या आपको लगता है कि सांप्रदायिक घटनाएं वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद बढ़ गई हैं, उन्होंने कहा, ‘हां।’

उन्होंने कहा, “वर्तमान सरकार के सत्ता में आने के बाद कई सांप्रदायिक मुद्दे उठे हैं। जब मैं सांप्रदायिक कहता हूं तो मेरा दोनों पक्षों से मतलब नहीं होता, यह अधिकतर हिंदू समुदाय के लिए है जो मुस्लिमों के साथ असहिष्णुता बरत रहे हैं।”

उन्होंने कहा कि सरकार इन सांप्रदायिक झगड़ों को समाप्त करने का प्रयास नहीं कर रही और एक दर्शक की तरह बर्ताव कर रही है। उन्होंने कहा कि वर्तमान हालात राष्ट्र के हित के लिए खराब हैं।

रामानुन्नी के साहित्यिक काम सांप्रदायिक सद्धभाव के उनके संदेश के लिए जानें जाते हैं। उनकी किताब ‘दैवाथिंते पुस्तकम’ (ईश्वर की अपनी पुस्तक) के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 2017 मिला है।

जब उनसे यह पूछा गया कि उन्होंने अपनी इनाम की राशि जुनैद की मां को क्यों दी, तो उन्होंने कहा, “यह दान नहीं है। अगर ऐसा होता तो मैं जुनैद की मां को उनके घर जाकर यह देता। जब आप यह साहित्य अकादमी के मंच पर दे रहे हैं तो इसके कई मायने हैं। यह अन्य लेखकों को अत्याचारों के बारे में लिखने के लिए प्रोत्साहित करेगा और दूसरे हिंदुओं को बताएगा कि असली और सच्चे हिंदू सिद्धांतों के मुताबिक आपको सांप्रदायिक नहीं होना चाहिए।”

उन्होंने कहा कि जुनैद की हत्या इसलिए कर दी गई क्योंकि वह मुस्लिम था और यह सच्ची और असली हिंदू संस्कृति के लिए शर्मनाक है।

रामानुन्नी को जुलाई 2017 में उनका दाहिना हाथ काटने की धमकी मिली थी। उन्होंने कहा कि इस तरह की बातें लेखक के दिमाग को जकड़ देती हैं।

उन्होंने कहा, “बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा कि क्या मैं सांप्रदायिक एकता पर लिखना बंद कर दूंगा। मैंने उनसे कहा कि नहीं। यह आत्महत्या करने जैसा होगा। एक लेखक के लिए अपना पक्ष नहीं जाहिर करना आत्महत्या के समान है।”

लेखक ने कहा, “हालांकि यह भी सही है कि आप यह सब कहते तो हैं, लेकिन जब आपको धमकियां मिलती हैं तो कई लोगों का अवचेतन मन उन्हें सब कुछ कहने से रोकता है। यह एक तरह से किसी को परोक्ष रूप से नियंत्रित करना है। धमकियां लोगों में यह डर पैदा करती हैं। यह तथ्य है।”

इंटरनेट के आज के दौर में किताबों के बारे में पूछने पर रामानुन्नी ने कहा कि पढ़ने की गुणवत्ता पिछले कुछ सालों में कम हुई है। उन्होंने कहा कि पढ़ने में लोग अब उस तरह का आनंद नहीं लेते जैसे पहले लिया जाता था। पढ़ने की आदत मरी तो नहीं है लेकिन इसकी गुणवत्ता घटी है।

–आईएएनएस

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श्रीलंका में चीन की उपस्थिति भारत के लिए चिंताजनक!

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं।

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70th Independence Day celebrations in Colombo,

मेरी पत्नी और मैं हाल ही में अपने कुछ मित्रों के साथ छुट्टियों के लिए श्रीलंका गए थे। हम दोनों के लिए लगभग 15 वर्षों बाद यह पहली श्रीलंका यात्रा थी, जबकि उससे पहले यह सुंदर द्वीपीय देश हिंसक गृहयुद्ध में जकड़ा था, जिसने अनगिनत जानें लीं और देश की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया था।

यह वह दौर था जब महिंदा राजपक्षे ने श्रीलंका के राष्ट्रपति के रूप में सत्ता संभाली और तमिल टाइगर्स के सफाए को अपना सबसे प्रमुख उद्देश्य बनाया। 30 महीनों की असहनीय हिंसा के बाद लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम(लिट्टे) के नेता वेलु पिल्लई प्रभाकरन और उसके समर्थकों की मौत के साथ ही 2009 में 26 सालों का गृहयुद्ध समाप्त हो गया।

यह तर्क दिया जाता है कि उस समय बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हुआ था और तमिलों के साथ खुले तौर पर भेदभाव किया गया था। यह सच है। लेकिन सच यह भी है कि यह द्वीपीय देश अंत में अशांति, अनिश्चितता और आतंकवाद के दशकों के बाद पहली बार शांति की ओर लौट आया। जिस श्रीलंका का मैं पहले आदी हो गया था, वह अब उससे बिलकुल विपरीत है। उस समय बंदूक लिए सुरक्षा कर्मी हर तरफ घूमते रहते थे। अब यहां शांति है।

भारत के लिए भी गृहयुद्ध और लिट्टे का अंत अच्छी खबर थी। इससे पहले ही लिट्टे को एक आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया था, लेकिन तमिलनाडु में प्रभाकरन के साथ कुछ संगठनों का गठबंधन नई दिल्ली के लिए चुनौती बन गया था। दुर्भाग्य से गृहयुद्ध के अंत के साथ इतिहास ने खुद को एक बार फिर दोहराया और भारत ने अपनी स्थिति खराब कर ली और आज हम एक बार फिर चीन की कूटनीति के बीच श्रीलंका को खोने के कगार पर हैं।

श्रीलंका में चीनी उपस्थिति कोई छिपी हुई बात नहीं है। आप उन्हें हर जगह पाएंगे। चीनी ड्रेजिंग (समुद्री पानी को साफ करने वाले) जहाजों को खुले तौर पर काम करते हुए देखा जा सकता है। हंबनटोटा बंदरगाह पर काम शुरू हो गया है। शॉपिंग मॉल से लेकर पब तक हर जगह चीनी श्रमिक नजर आएंगे। कई चीनी श्रीलंका की भाषा सिंहली बोलना सीख रहे हैं। होटल, सड़कों, बुनियादी ढांचों, थिएटरों और सुख-सुविधाओं से लैस क्रिकेट स्टेडियम केवल कागजों पर लिखी परियोजना भर नहीं हैं, बल्कि लोग उन्हें देख सकते हैं। आंखों देखी चीजों के महत्व को कभी भी कम करके आंका नहीं जाना चाहिए और जिस गति से चीन यहां परियोजनाओं को अंजाम दे रहा है, वह इस बात की बानगी है कि श्रीलंका में रियल एस्टेट परिवर्तन तेजी से हो रहा है।

2005-17 के बीच 12 वर्षों की अवधि में बीजिंग ने श्रीलंका की परियोजनाओं में 15 अरब डॉलर का निवेश किया है। वहीं, चीन के एक राजदूत भारत को एक स्पष्ट संदेश दे चुके हैं, जो श्रीलंका में चीनी उपस्थिति को अपने प्रभाव क्षेत्र में घुसपैठ के रूप में देखता है। राजदूत ने भारत को स्पष्ट जवाब देते हुए कहा था, “कोई नकारात्मक ताकत श्रीलंका और चीन के बीच सहयोग को कमजोर नहीं कर सकती है।”

भारत के लिए यह परेशान करने वाला है। भारतीय विदेश नीति समय की कसौटी पर खरा उतरे संबंधों पर काफी भरोसा करती है, लेकिन श्रीलंकाई लोगों में उम्मीदों की अधीरता रही है, जिन पर भारत ध्यान देने और प्रतिक्रिया करने में विफल रहा और चीन सफल रहा है।

श्रीलंकाई लोगों के मुंह से अक्सर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि वे चीनी उपस्थिति से कितने असंतुष्ट और नाखुश हैं, जो काफी कठोर और अभिमानी हैं। इसे एक खतरे को गले लगाने के रूप में समझा जा सकता है, लेकिन जब उनके मन-मस्तिष्क में एक समृद्ध भविष्य की इच्छा उभरती है तो वे इस मौके को काफी आकर्षक पाते हैं।

वहीं, दूसरी ओर भारत सभी ओर से अलग-थलग पड़ता जा रहा है। पाकिस्तान से दुश्मनी है। मालदीव अस्थिर है। नेपाल की स्थिति लगभग असमजंस से भरी है और श्रीलंका एक स्पष्ट लुभावने मायाजाल में फंसा है। भारत वास्तव में इस समय अब तक की सबसे गंभीर सुरक्षा चुनौती का सामना कर रहा है।

अगर भारत को एक साथ मिलकर काम करना है तो इसके लिए केवल कल्पना की नहीं, बल्कि गति और दक्षता की जरूरत है, ताकि श्रीलंका के भविष्य को लेकर किए गए वादे पूरे हो सकें।

दिग्गज शतंरज खिलाड़ी बॉबी फिशर ने एक बार कहा था, “अगर आप खेल खेल रहे हैं तो आप जीतने के लिए खेलें, लेकिन अगर आप खेल हार गए तो वह इसलिए क्योंकि आपने अपनी आंखों को प्यादों से हटा लिया था, इसलिए आप हारने के ही लायक थे।”

By : अमित दासगुप्ता

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