ब्लॉग

गोरखालैंड के बहाने बीजेपी का ममता पर निशाना, दार्जिलिंग बना उपद्रव का अखाड़ा

Darjeeling GJM Protest

बीजेपी ने अलग गोरखालैंड की माँग का सैद्धान्तिक समर्थन करके 2009 में अपने वरिष्ठ नेता जसवन्त सिंह को और 2014 में एसएस अहलूवालिया को दार्जिलिंग लोकसभा सीट से जिताने में सफलता पायी।

सुहाने मौसम, चाय बाग़ान और ख़ूबसूरत नज़ारों के लिए विख्यात पहाड़ों की रानी दार्जिलिंग इन दिनों सुलग रही है। उसकी आबोहवा पर सियासी दाँवपेंच का ग्रहण लग गया है। अलग गोरखालैंड की 110 साल पुरानी माँग को हिंसा और उग्र आन्दोलन के ज़रिये पुनर्जीवित किया गया है। झूठ पर झूठ फैलाया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चाहती हैं कि दार्जिलिंग के स्कूलों में ज़बरन बाँग्ला भाषा पढ़ाया जाए। हालाँकि, ममता साफ़ कर चुकी हैं कि बाँग्ला को स्कूलों पर ज़बरन नहीं थोपा जाएगा, ये पूरी तरह से स्वैच्छिक ही रहेगी और हिन्दी, अँग्रेज़ी तथा नेपाली के बाद चौथी भाषा के रूप में इसे सीखने का विकल्प बना रहेगा।

अब सवाल ये है कि ममता की सफ़ाई के बावजूद दार्जिलिंग क्यों सुलग रहा है? दरअसल, बाँग्ला तो सिर्फ़ बहाना है। मक़सद तो ममता को सताना है, उनकी नाक में दम करना है, उनकी छवि को ख़राब करना है। क्योंकि बीजेपी को लगता है कि पश्चिम बंगाल में अपने पंख फैलाने के लिए ममता बनर्जी का चरित्र-हनन ज़रूरी है। कमोबेश वैसे ही जैसे उसने काँग्रेसियों का सफलतापूर्वक चरित्रहनन करके न सिर्फ़ देश बल्कि दर्जन भर राज्यों की सत्ता को हथियाया है। इसी लक्ष्य को हासिल करने के लिए बीजेपी के रणनीतिकारों ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) के मुखिया बिमल गुरुंग को भड़का दिया है।

बिमल गुरुंग को लगता है कि वो दार्जिलिंग के दस लाख लोगों से जुड़े गोरखालैंड क्षेत्रीय प्रशासन (जीटीए) के चीफ़ एक्जीक्यूटिव यानी मुख्य प्रशासक ही नहीं बल्कि वहाँ के अघोषित मुख्यमंत्री भी हैं। इसीलिए पश्चिम बंगाल सरकार और ममता बनर्जी से उन्हें दो-दो हाथ कर ही लेना चाहिए। इसके लिए उन्होंने ठंडे बस्ते में पड़े अलग गोरखालैंड की उस माँग को फिर से बुलन्द कर दिया जिसे लेकर 1980 में सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) ने आन्दोलन शुरू किया था। 1986 में ये आन्दोलन अपने उफ़ान पर था। इसके फलस्वरूप 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउन्सिल बना और घीसिंग उसके चेयरमैन बने। जीएनएलएफ से अलग होकर 2007 में बिमल गुरुंग ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा बनाया। आगे चलकर 2011 में वो जीटीए के मुखिया बन गये।

2009 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने दार्जिलिंग के गोरखाओं के साथ अपना शानदार तालमेल बना लिया, जो अभी तक क़ायम है। तब पश्चिम बंगाल में घुसने के लिए बीजेपी बेहद बेकरार थी। बीजेपी ने अलग गोरखालैंड की माँग का सैद्धान्तिक समर्थन करके 2009 में अपने वरिष्ठ नेता जसवन्त सिंह को और 2014 में एसएस अहलूवालिया को दार्जिलिंग लोकसभा सीट से जिताने में सफलता पायी। लेकिन बाक़ी बंगाल में बीजेपी की पैठ नहीं बन पा रही थी। ममता के ख़िलाफ़ छोटे से छोटे मसले को हवा देकर बीजेपी राज्य में अपनी पैठ बढ़ाना चाहती है। इसीलिए अभी बाँग्ला भाषा को लेकर नाहक बवाल खड़ा किया गया है। इसके ज़रिये अभी फिर से ये माँग बुलन्द की जा रही है कि पश्चिम बंगाल से सिलिगुड़ी, कर्सियांग, दार्जिलिंग और कलिमपोंग जैसे पहाड़ी इलाकों को काटकर अलग गोरखालैंड राज्य बनाया जाए। नेपाल और भूटान की सीमा से लगने वाले इन इलाकों की बहुसंख्यक आबादी गोरखा हैं। ये नेपाली भाषा-भाषी हैं।

मज़े की बात ये भी है कि जीटीए के रूप में गोरखालैंड को जो स्वायत्तता मिली है, वो ऐसे हरेक लिहाज़ से तब तक पर्याप्त है, जब तक कि दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल राज्य का हिस्सा है। इस स्वायत्तता की छतरी तले गोरखाओं को अपनी जातीय और भाषायी विविधिता को क़ायम रखने और उसे पल्लवित-पुष्पित करने की पूरी आज़ादी हासिल है। उधर, गोरखालैंड का इलाका इतना बड़ा नहीं है कि वो पूर्ण राज्य के रूप में व्यावहारिक बन सके। इसीलिए स्वायत्तता वाले मॉडल को अपनाया गया था। लेकिन जब सियासी मक़सद ही उत्पात मचाने का हो जाए तो फिर मुद्दे का बदल जाना स्वाभाविक है। इसीलिए ममता बनर्जी ने जब देखा कि उनकी साफ़-सफ़ाई के बावजूद बीजेपी के केन्द्रीय नेतृत्व की ओर से बिमल गुरुंग को उकसाया जा रहा है, तो उन्होंने अपनी पुलिस को बिमल गुरुंग के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई का इशारा कर दिया।

बिमल गुरुंग के कई ठिकानों पर ताबरतोड़ छापे मारे गये। इससे भारी मात्रा में हथियार और नक़दी बरामद हुआ। छटपटाये बिमल गुरुंग ने छापेमारी के विरोध में अनिश्तिकालीन दार्जिलिंग बन्द का ऐलान कर दिया। बिमल गुरुंग के इशारे पर दार्जिलिंग के पर्यटकों को मुसीबत में ढकेला गया। उपद्रव के हालात बने तो राज्य सरकार ने सेना से मदद माँगी। सेना के सक्रिय होते ही केन्द्रीय गृह मंत्रालय को आग में घी डालने का मौक़ा मिल गया। देखते ही देखते दार्जिलिंग को पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। वहाँ का काम-धन्धा और रोज़ी-रोज़गार बुरी तरह प्रभावित हुआ तो बिमल गुरुंग को केन्द्र सरकार ने बातचीत के लिए दिल्ली बुला लिया।

छापों के दौरान दार्जिलिंग पुलिस को बिमल गुरुंग के ठिकानों से भारी मात्रा में हथियार, विस्फोटक और नक़दी मिली। लेकिन बीजेपी की शह पर बिमल गुरुंग की आपराधिक और देशद्रोही गतिविधियों को राजनीतिक जामा पहनाया जा रहा है। हिंसा और अलगाववाद को राजनीति का हथकंडा बनाया जा रहा है। इसीलिए दार्जिलिंग तब तक धधकता रहेगा, जब तक बीजेपी आग में घी डालती रहेगी।

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular

To Top