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गुजरात में साम्प्रदायिक कार्ड खेलने के लिए ही नरेन्द्र मोदी को याद आया औरंगज़ेब

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आख़िरकार, नरेन्द्र मोदी ने काँग्रेस की तुलना औरंगज़ेब से कर ही दी। 4 दिसम्बर को मोदी ने गुजरात के धरमपुर की चुनावी रैली में कहा, ‘जहाँगीर की जगह जब शाहजहाँ आये, क्या तब इलेक्शन हुआ था? शाहजहाँ की जगह जब औरंगज़ेब आये, क्या तब कोई इलेक्शन हुआ था? बादशाह हैं, उनकी औलाद को ही सत्ता मिलेगी। ये औरंगज़ेब राज उनको मुबारक़!’ लगता है, बड़बोले मोदी ने अपना ये वाहियात बयान पहले से तैयार कर रखा था।

मोदी ने जिन वंशवादी मुस्लिम शासकों जहाँगीर और शाहजहाँ का नाम लिया, उनकी छवि इंसाफ़-पसन्द और कुशल-प्रशासक की रही है। वैसे तो ये गुण औरंगज़ेब में भी थे। लेकिन अपनी धार्मिक असहिष्णुता की नीति की वजह से इतिहास में औरंगज़ेब की छवि एक क्रूर शासक की बनी। ख़ासकर, इसलिए भी, क्योंकि उसके बाप-दादा-परदादा का इक़बाल उदार और समावेशी मुस्लिम शासकों का था। हिन्दुओं पर धार्मिक टैक्स ‘जजिया’ लगाकर औरंगज़ेब ने ख़ूब बदनामी बटोरी। सत्ता संघर्ष की ख़ातिर अपने पिता को क़ैद करने और भाईयों को मौत के घाट उतारने के लिए भी वो कुख़्यात रहा। हालाँकि, प्राचीन हिन्दू शासक अशोक महान ने भी अपने पिता जरासन्ध की हत्या करके सत्ता हथियाई थी, तो मध्यकाल में दर्जनों हिन्दू-मुसलिम राजवंशों में भी क़रीबी रिश्तेदारों ने बग़ावतबाज़ी की थी। लेकिन संघियों को हिन्दू अशोक की महत्वाकांक्षा जहाँ स्वाभाविक लगती है, वहीं औरंगज़ेब जैसे मुस्लिम शासकों के मामले में उसका रवैया बिल्कुल उल्टा रहा है। इतना ही नहीं, देश में असंख्य हिन्दू राजवंश भी रहे हैं, लेकिन वंशवाद को कोसने ने लिए मोदी ने इरादतन हिन्दू राजाओं का ज़िक्र नहीं करके, मुसलिम औरंगज़ेब की ही बात की। ये पूरी तरह से सियासी दाँव है। इसका मक़सद साम्प्रदायिक नफ़रत को फ़ैलाना है, ताकि गुजरात की बिगड़ी हवा में बीजेपी के लिए कुछ फ़ायदा बटोरा जा सके।

मुग़लिया इतिहास में औरंगज़ेब को रावण की तरह सबसे घटिया स्थान मिला। वो बात अलग है कि सीता रूपी नारी की इज़्ज़त से खेलने वाले करोड़ों लुच्चे-लफ़ंगे रूपी रावण आज भी हमें ग़ली-ग़ली में दिखते रहते हैं। लेकिन जनता को इनमें उस रावण का अक्स नहीं दिखायी देता, जिसका हरेक दशहरे पर तमाम पाखंडों के साथ दहन किया जाता है! वो रावण, विद्वान, शिवभक्त और ब्राह्मण था। सीता के प्रति उसके बर्ताव ने उसे बुराई का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया। उसी तरह, क्रूरता और असहिष्णुता का सर्वोच्च तमग़ा, औरंगज़ेब के ख़ाते में आया। रावण की तरह औरंगजेब की ख़ूबियाँ भी उसे कोई सम्मान नहीं दिला सकीं। मसलन, औरंगज़ेब बहुत साधारण जीवन जीता था। वो सरकारी ख़जाने की एक पाई का भी निजी इस्तेमाल नहीं करता था। अपनी निजी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए औरंगज़ेब छिपकर जालीदार टोपियाँ बनाता था। फिर उन टोपियों को भेष-बदलकर ज़ायरीनों को बेचता था। इससे होने वाली कमाई से ही वो अपना निजी ख़र्च चलाता था। यही नहीं, मुग़ल परम्परा से उलट औरंगज़ेब की ख़्वाहिश थी कि उसे खुले आकाश के नीचे ही दफ़नाया जाए और उसका कोई मक़बरा वगैरह नहीं बने। ऐसा ही हुआ भी।

उसी औरंगज़ेब की कट्टर मुसलमान वाली छवि को नरेन्द्र मोदी ने बहुत चतुराई से राहुल गाँधी और काँग्रेस पर चस्पाँ किया है। ऐसा करके वो काँग्रेस की कथित हिन्दू विरोधी और मुसलिम-परस्त छवि को हवा देना चाहते हैं। ताकि, ‘संघी ट्रोल’ तरह-तरह का जहर उगलकर उनके मंसूबों को पूरा करते रहें। गुजरात चुनाव को देखते हुए संघ-बीजेपी की यही सोच धार्मिक ध्रुवीकरण को उकसाने के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। लेकिन किसी भी क़ीमत पर चुनावी जंग को जीतने के लक्ष्य की वजह से प्रधानमंत्री को इस बात का कोई अख़्तियार नहीं हो सकता कि वो अपने प्रतिद्वन्दी का चरित्रहनन करने के लिए किसी भी सीमा को पार कर जाएँ।

मोदी का बयान राजनीतिक शिष्टाचार के भी सर्वथा ख़िलाफ़ है। काँग्रेस पार्टी के गौरवशाली इतिहास पर वंशवाद की आड़ में ‘औरंगज़ेब-राज’ की कालिख़ पोतना भी उम्दा शील-स्वभाव का प्रतीक नहीं हो सकता। आने वाले दिनों में यही गन्दगी कई और रूपों में दिखायी देगी, क्योंकि जब प्रधानमंत्री अपने विरोधी के लिए अशिष्ट शब्दावली अपनाएँगे तो उनकी पार्टी के बाक़ी नेता तो उनसे भी चार क़दम आगे निकलने की कोशिश करेंगे। लिहाज़ा, आने वाले दिनों में और सिरफिरे तथा जहरीले बयान सुनने के लिए तैयार रहिए!

संघियों को अपने विरोधियों के चरित्रहनन का चस्का इन्दिरा गाँधी के ज़माने में लगा। इन्दिरा का चरित्रहनन करने के लिए संघियों ने उन्हें वंशवादी कहना शुरू किया। हालाँकि, नेहरू और शास्त्री के ज़माने में काँग्रेस के अलग-अलग लोग अध्यक्ष बने। तब काँग्रेस का सांगठनिक ढाँचा तमाम क्षेत्रीय क्षत्रपों के इक़बाल से मिलकर बनता था। हालाँकि, आगामी पीढ़ियों में ये बदलता चला गया। ये भी जगज़ाहिर सच है कि महात्मा गाँधी, सरदार बल्लभभाई पटेल, भीम राव आम्बेडकर, लाल बहादुर शास्त्री, सुभाष चन्द्र बोस, राजेन्द्र प्रसाद वग़ैरह की तरह जवाहर लाल नेहरू ने भी अपने जीते-जी अपनी सन्तानों को पिता के नाम पर राजनीति चमकाने पर मौक़ा नहीं दिया। वो भी तब जबकि इन सभी नेताओं की सन्तानों ने भी आज़ादी की लड़ाई में बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था।

नेहरू के ज़िन्दा रहते इन्दिरा सक्रिय राजनीति में आना चाहती थीं लेकिन नेहरू ने उन्हें टिकट नहीं पाने दिया। यही हाल सरदार पटेल की बेटी-बेटे का भी था। पटेल के निधन के बाद नेहरू ने उनकी सन्तानों को सांसद बनवाया। लाल बहादुर शास्त्री के आकस्मिक निधन के बाद, काँग्रेस के संगठन पर क़ाबिज़ कद्दावर नेताओं ने ‘गूंगी गुड़िया’ इन्दिरा गाँधी को प्रधानमंत्री बनवा दिया। लेकिन सरकार के काम में संगठन की दख़लंदाज़ी को लेकर इन्दिरा की अपने ही नेताओं से दूरी बनती गयी। ये कटुता इतनी बढ़ी कि 1969 में इन्दिरा को काँग्रेस से निकाल भी दिया गया।

1971 के चुनाव में इन्दिरा सबसे बड़ी नेता बनकर उभरीं। लेकिन 1977 में जनता पार्टी से मिली क़रारी शिकस्त के बाद एक बार फिर उनकी पार्टी ने उनसे दामन छुड़ा लिया। फिर 1980 में इन्दिरा गाँधी पुनर्जीवित होकर सत्ता में लौटीं। तब तक राजनीति में विचारधारा और वफ़ादारी कई करवटें ले चुकी थी। तब काँग्रेस ऐसी पार्टी बन गयी जिसकी इन्दिरा, सिर्फ़ आलाक़मान ही नहीं बल्कि सर्वे-सर्वा थीं। 1984 में इन्दिरा गाँधी की हत्या तक काँग्रेस ने तरह-तरह के परिवर्तन देखे। इसीलिए उनकी मृत्यु के वक़्त उनके इर्द-गिर्द रहने वाले वफ़ादारों ने राजीव गाँधी को उनका उत्तराधिकारी बना दिया।

इस वंशवादी उत्तराधिकार की सबसे बड़ी वजह ये थी कि इन्दिरा काल में ही भारतीय राजनीति को करिश्माई नेताओं के पीछे चलने की लत लग चुकी थी। इसीलिए वफ़ादारों ने राजीव को ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया जिसमें नेहरू और इन्दिरा का असली अक्स हो। राजीव के काँग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री बनते ही संघियों ने वंशवाद के पुराने ढोल को और ज़ोर-ज़ोर से पीटना शुरू कर दिया। वही सिलसिला आज तक बदस्तूर ज़ारी है। मज़े की बात ये है कि इन्दिरा-राजीव के दौर में ही बीजेपी और कम्युनिस्टों को छोड़ देश की हरेक छोटी-बड़ी पार्टी में वंशवादी प्रवृत्ति स्थापित हो चुकी थी। यही ढर्रा आज भी है।

वंशवाद को लेकर संघ-बीजेपी हमेशा मुखर रहे हैं। हालाँकि, भगवा ख़ानदान में भी बाप की विरासत को भुनाने की प्रथा अब अच्छी तरह से स्थापित हो चुकी है। तकनीकी रूप से इसमें कोई बुराई नहीं है। भारतीय जनमानस ने भी वंशवाद को कभी ख़राब नहीं माना। बशर्ते, वंशवादी वारिसों में जनसमर्थन पाने का माद्दा हो। आज़ादी के बाद से अब तक हज़ारों मंत्रियों ने अपनी औलादों को राजनीति में आगे बढ़ाने की कोशिश की। लेकिन कामयाबी सिर्फ़ मुट्ठी भर नेताओं की औलादों के ही हाथ लगी। जनता ने हर नेता के बेटे-बेटी को पसन्द नहीं किया। बहुत सारी नेता-संतति धूल-धूसरित हो गयी और आगे भी होती रहेगी।

लोकतंत्र में माँ-बाप की वजह से किसी की पहचान बनना तो आसान है, लेकिन उसे भी चुनाव और जनता की कसौटी पर ख़रा तो उतरना ही होगा। अभी राहुल गाँधी, काँग्रेस अध्यक्ष बने। लेकिन उनका दबदबा अनन्तकाल तक नहीं रह सकता। राहुल भी तब तक ही सहूलियत से शीर्ष पर रह पाएँगे, जब तक उनमें अपने उम्मीदवारों को जिताने की क्षमता दिखायी देती रहेगी। राजीव और सोनिया को भी ऐसी ही अग्निपरीक्षा से गुज़रना पड़ा था। राहुल भी इससे बच नहीं सकते। हाँ, इतना ज़रूर है कि गाँधी परिवार के वारिसों को नरसिम्हा राव और सीता राम केसरी जैसे परिवार के बाहर के नेताओं के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा मौके मिलते रहेंगे! इसे वंशवाद की वजह से हासिल विशेषाधिकार की तरह देखा जा सकता है। लेकिन यदि काँग्रेसी, राहुल गाँधी को अपना नेता मानने को तैयार हैं, तो इसके लिए बीजेपी के पेट में दर्द क्यों होना चाहिए? अरे संधियों, जैसे तुम्हें अपना संघ-परिवार पसन्द है, वैसे ही काँग्रेसियों को उनका गाँधी-परिवार प्रिय है! तो फिर परिवारवाद के नाम पर विधवा-विलाप क्यों?

दरअसल, बीजेपी चाहे जितना ढोल पीटे कि उसने ‘काँग्रेस मुक्त भारत’ बना दिया है। लेकिन संघ-बीजेपी को भी अच्छी तरह से पता है कि वो काँग्रेसियों की तरह सबको साथ लेकर राज करने का कौशल नहीं रखते। उन्हें अपने अस्तित्व के लिए साम्प्रदायिक उन्माद का सहारा लेना ही पड़ेगा। यदि साम्प्रदायिकता की भट्ठी नहीं धधकेगी तो बीजेपी का वज़ूद ही ख़तरे में पड़ जाएगा। इन्दिरा, राजीव और सोनिया काल के कटु अनुभवों से बीजेपी बख़ूबी जानती है कि देश में सिर्फ़ काँग्रेस और गाँधी परिवार में उसके वर्चस्व को ख़त्म करने का दमख़म है। क्योंकि काँग्रेस चाहे जितनी कमज़ोर दिखती हो, देश भर में इसकी जड़ें सबसे गहरी हैं। इसीलिए चरित्रहनन रूपी संघियों की चिर-परिचित तोप का मुँह फ़िलहाल राहुल गाँधी की तरफ़ है। इसीलिए उन्हें ‘पप्पू’ बनाकर वैसे ही पेश किया जाता है, जैसे सोनिया गाँधी को विदेशी और राजीव को अनाड़ी बनाकर पेश किया गया था। इसी साज़िश  के तहत, मनमोहन सिंह जैसे दक्ष नेता को भी कभी गूँगा, तो कभी दस जनपथ का तनख़्यया, तो कभी रबर स्टैम्प, तो कभी मुखौटा और कभी ‘नमूना’ कहा जाता है।

संघियों की ओर से ढोल पीटा जाता है कि नरेन्द्र मोदी की कोई औलाद नहीं है तो वो किसके लिए भ्रष्टाचार करेंगे। यह दुर्भावनापूर्ण दुष्प्रचार है। मनमोहन सिंह, दस साल प्रधानमंत्री रहे। क्या कभी उन पर अपना घर भर लेने का लाँछन लगा? उनकी सरकार पर असंख्य आरोप लगे। लेकिन कितने साबित हुए? कितनों आरोपियों को, 42 महीने से सत्ता पर क़ाबिज़ मोदी सरकार ने सलाखों के पीछे पहुँचाया? यदि मोदी ऐसा नहीं कर सके, तो क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि वो झूठे आरोपों को ही हवा देकर अपना सियासी उल्लू सीधा करते रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं!

लोकतंत्र के लिए ये बेहद दुर्भाग्यपूर्ण दशा है कि चुनाव के नतीज़ों को जाँच-मुकदमा और कोर्ट-कचहरी के विकल्प की तरह पेश किया जाता है। हरेक पार्टी ऐसा करती है। इसीलिए नेताओं से जुड़े आपराधिक मामलों को बिल्कुल अलग ढंग से देखना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश, मोदी सरकार ने भी इस लिहाज़ से बयानबाज़ी के सिवाय और कुछ नहीं किया। मज़े की बात ये भी है कि जिन लोगों ने काँग्रेसियों पर भ्रष्टाचार के असंख्य आरोप लगाये, आज वो भी आरोपों के कठघरे में ही खड़े हैं। जय अमित शाह, शौर्य डोभाल, अभिषेक सिंह (रमन सिंह का बेटा) जैसे दर्जनों भगवा नेताओं और उनकी सन्तानों पर गम्भीर आरोप हैं। कीर्ति आज़ाद ने अरूण जेटली पर कोई मामूली आरोप नहीं लगाया था। नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, पीयूष गोयल जैसे तमाम नेताओं पर भी गम्भीर आरोप हैं। लेकिन यदि जाँच नहीं होगी, लोकपाल नहीं बनेगा तो सभी सत्यवादी बनकर ही मौज़ करेंगे। इसीलिए कोई नहीं जानता कि सरकार में बैठे ‘कलाकारों’ की जाँच कब होगी, कैसे होगी और उसका अंज़ाम क्या निकलेगा?  भ्रष्टाचार और वंशवादी डीएनए का दबदबा भगवा ख़ानदान में भी कोई कम नहीं है। तमाम बड़े नेताओं की औलादें बाप की हैसियत की वजह से मज़े लूट रही हैं। शीशे के घर में बैठकर औरों पर पत्थर फेंकना संघ-बीजेपी का पैदाइशी शग़ल रहा है!

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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