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गुजरात में दिख रहे संघियों के दोमुँही बातों का इतिहास भी बेहद शर्मनाक रहा है!

काँग्रेस की हर बात का विरोध करने की आदत से लाचार संघ ने संविधान सभा में तिरंगे का भी विरोध किया था। वो संघ के भगवा ध्वज को ही राष्ट्रीय ध्वज और धर्मनिरपेक्ष भारत की जगह हिन्दू राष्ट्र का हिमायती था।

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देश की बहुत बड़ी आबादी को दिख रहा है कि बीजेपी ने कैसे गुजरात चुनाव में प्रचार को न्यूनतम स्तर पर पहुँचा दिया है। दरअसल, विरोधियों का चरित्र-हनन करना एक ऐसी बीमारी है जो हरेक संघी में जन्मजात विकृति की तरह होती है। इसीलिए, संघ से आने वाले बीजेपी के सभी नेता में ये विकृति पायी जाती है। वर्ना, ज़रा सोचिए कि गुजरात चुनाव का इस बात से क्या नाता होना चाहिए कि किसका धर्म क्या है? कौन सच्चा हिन्दू है और कौन नहीं? किसके लिए धर्म, आस्था का विषय है और किसके लिए ढोंग? कौन धर्मी माना जाएगा और कौन अधर्मी?

लोकतंत्र के सबसे बड़े पर्व चुनाव में जनता की तकलीफ़ें, उनका समाधान, उनकी अपेक्षाएँ, नीतियाँ, घोषणा, उपलब्धियाँ… वग़ैरह गौण, कैसे हो सकती हैं? लेकिन बीजेपी इन्हें दरकिनार करके धार्मिक उन्माद और ध्रुवीकरण फैलाना चाहती है। इसीलिए धर्म, मन्दिर, असली बनाम नकली हिन्दू, जैसे बातों को बीजेपी चिन्ताजनक बनाकर पेश करना चाहती है! सबसे अफ़सोस की बात है कि ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसा देश का शीर्षस्थ नेता ही साम्प्रदायिक नफ़रत को हवा दे रहा है। वैसे, चुनावी नतीज़ों की आहट को भाँपते हुए मोदी ने अपना मुँह छिपाने के लिए अनोखी दलीलें भी गढ़ ली है। जैसे, मोदी कहते हैं कि उन्हें इसलिए विफल बताया जा रहा है क्योंकि वो भ्रष्टाचार से युद्ध कर रहे हैं! यानी, यदि 18 दिसम्बर को मोदी को हार का मुँह देखना पड़ा तो वो विरोधियों की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार की जीत होगी!

दरअसल, संघियों का स्थायी संस्कार है दोगलापन! यानी, दो मुँही बातें करना। ‘मौक़ा ताड़कर अपना रंग-रूप बदल लेना’ ही दोगलों की ख़ासियत होती है! यही वजह है कि संघ ने 1925 में अपने जन्म से लेकर अभी तक असंख्य रंग बदले हैं! अनगिनत झूठ बोले हैं! अपरिमित स्वाँग रचे हैं! अभी गुजरात में भी यही प्रवृत्ति अपने उफ़ान पर है। चूँकि, चुनाव में संघियों के पास नाज़ करने और उसे भुनाने लायक कुछ भी नहीं है, इसीलिए वो बात-बात पर विरोधियों का चरित्र-हनन करके जनता की आँखों में धूल झोंकते हैं।

मोदी राज में बीजेपी को विरोधियों के दिवंगत नेताओं के बारे में सफ़ाई माँगने और उनके पुरखों की करनी पर जबाव माँगने का अज़ीब-ओ-ग़रीब चस्का लग चुका है। इसीलिए हरेक चुनाव में बीजेपी को नेहरू-गाँधी परिवार के ख़िलाफ़ अफ़वाहें फैलानी पड़ती हैं। वैसे भी अब राजनीति में ऐसी शालीनता का दौर नहीं रहा, जिसमें दिवगंत नेताओं के लिए अपशब्द नहीं बोलने की परम्परा को निभाया जाता था। ऐसा इसलिए भी होता था क्योंकि दिवंगत नेता अपना बचाव करने के लिए ख़ुद मौजूद नहीं हो सकता।

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इतिहास गवाह है कि दोगलों का कभी कोई दीन-ईमान नहीं रहा! आज़ादी से पहले, इन्हीं संघियों को ‘वन्दे मातरम्’ बोलना गँवारा नहीं था! लेकिन आज यही लोग ‘वन्दे मातरम्’ के नाम पर उन्माद (Hatred) फ़ैलाने के लिए किसी भी सीमा को पार कर जाते हैं। इन्हें किसी की मर्यादा का कोई लिहाज़ नहीं रहता। यहीं ये जानना ज़रूरी है कि ‘भारत माता’ रूपी भौगोलिक प्रतीक का जन्म 1873 में हुआ था। ये प्रतीक पृथ्वी के उस भूभाग की राजनीतिक सत्ता के लिए तैयार किया गया था जिसे भूगोल की भाषा में भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) कहा जाता था।

राष्ट्रवाद की नयी भौगोलिक पहचान को देव-तत्व यानी देवत्व (Divinity) से जोड़ने और उसे सर्वोपरि बताने के लिए पहली बार मातृभूमि को ‘भारत माता’ का नाम दिया गया। ‘भारत माता’ रूपी प्रतीक ने उस आज़ादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभायी, जिसमें संघियों का लेश-मात्र भी योगदान नहीं था। उल्टा संघी तो अँग्रेज़ों की कठपुतली थे। उनके मुख़बिर थे। ‘भारत माता’ की परिकल्पना के बाद नौ साल बाद 1882 में, ‘माँ की वन्दना करो’ का सन्देश देने वाले ‘वन्दे मातरम्’ का जन्म हुआ।

1921 के असहयोग आन्दोलन ने अँग्रेज़ों के नाम में दम कर दिया। तब अँग्रेज़ों ने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति बनायी। इसके लिए कट्टरवादी हिन्दुओं को कट्टरवादी मुसलमानों से लड़ाने के लिए रणनीति बनी। 1925 में बने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुसलिम लीग़, दोनों को ही अँग्रेज़ों ने अपनी कठपुतली बना लिया। इन्हें सिर्फ़ यही काम दिया गया था कि वो काँग्रेस की अगुवाई में चल रहे स्वतंत्रता आन्दोलन को कमज़ोर करें। इसीलिए कोई संघी न तो कभी जेल गया, न ही उसने कभी अँग्रेज़ों की लाठियाँ खायीं। यही वजह है कि अपवाद स्वरूप भी कोई ऐसा संघी नहीं पैदा ही हुआ जिसने आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया हो!

अँग्रज़ों के इशारे पर संघियों ने ये कहकर भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की माँग की कि यदि हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर देश बँटेगा, तो पाकिस्तान की तरह हमें भी हिन्दुओं का अलग देश बनाना चाहिए और उसे हिन्दू राष्ट्र कहना चाहिए। लेकिन संविधान सभा में संघियों की एक नहीं चली। संघियों ने तिरंगे का भी विरोध किया। इन्होंने नागपुर स्थित संघ मुख्यालय पर कभी तिरंगा नहीं फ़हराया। ये आज भी वहाँ अपना भगवा ध्वज ही फ़हराते हैं!

आज़ादी के बाद जब संघियों ने देखा कि काँग्रेसी नेता ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ के नारे से देश भर में राष्ट्रीय गौरव और चेतना को भरने में सफल होते हैं तो फिर इन्होंने भी अपना ‘रंग-ढंग’ बदलकर ‘भारत माता’ और ‘वन्दे मातरम्’ को न सिर्फ़ लपक लिया, बल्कि ऐसी धारणा बनाने की कोशिश की, मानो ये इन्हीं के चिन्तन की देन हो!

लगे हाथ, ‘भारत माता’ और ‘वन्दे मातरम्’ की ऐतिहासिकता को भी जान लीजिए। ‘भारत माता’ का नामकरण, पहली बार, 1873 में मंचित किरन चन्द्र बनर्जी के बाँग्ला नाटक से हुआ। इससे प्रेरित होकर ही 1882 में बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय ने ‘आनन्द मठ’ नामक बाँग्ला उपन्यास लिखा। इस उपन्यास में ‘वन्दे मातरम्’ नामक कविता संस्कृत में लिखी गयी। कालान्तर में स्वतंत्रता आन्दोलन को नयी बुलन्दियों पर पहुँचाने में भी ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम्’ जैसे नारों ने अहम भूमिका निभायी।

इसीलिए आज़ादी के बाद संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने प्रस्ताव पारित किया कि रवीन्द्र नाथ टैगोर (1861-1941) की कविता ‘भारत भाग्य विधाता’ का पहला अन्तरा ‘जन-मन-गण’, भारत का राष्ट्रीय गान (National Anthem) होगा और बंकिम बाबू की रचना ‘आनन्द मठ’ की कविता ‘वन्दे मातरम्’ का पहला अन्तरा, राष्ट्रीय गीत (National Song) कहलाएगा। राष्ट्रीय गौरव के लिहाज़ से ‘राष्ट्रीय गान’ और ‘राष्ट्रीय गीत’, दोनों का दर्ज़ा बराबर होगा। दोनों समान आदर पाएँगे। उस वक़्त ‘जन-मन-गण’ को राष्ट्रीय गान का दर्ज़ा इसलिए मिला क्योंकि उसे गाना और उसकी स्वर-लहरियाँ (Musical Tunes) बनाना आसान समझा गया। ‘वन्दे मातरम्’ संस्कृत में था और ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ उर्दू में। इसीलिए आज़ादी के बाद हिन्दुस्तानी ज़ुबान का नारा बना ‘जय हिन्द’। इसमें सबका समावेश था। इसीलिए, सेना और पुलिस जैसे वर्दीधारी लोग परस्पर सैल्यूट करते वक़्त ‘जय हिन्द’ बोलते हैं, कोई धर्म-सूचक नारा नहीं! देश में धर्मनिरपेक्ष संस्कारों को बनाने में इस सम्बोधन की बहुत बड़ी भूमिका रही है।

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आज़ादी के बाद जब संघियों ने अपनी प्रार्थना ‘नमस्ते सदा वत्सले’ को गुरुदेव टैगोर के जन-मन-गण की लोकप्रियता के आगे बहुत धूमिल पड़ते पाया तो उन्होंने एक साज़िश के तहत ये झूठ फैलाना शुरू किया कि टैगोर ने ‘जन-मन-गण’ तो इंग्लैंड के राजा जॉर्ज पंचम की शान में लिखा था, जो उस वक़्त भारत आने वाले थे। धूर्त संघियों का ये भी दुष्प्रचार रहा है कि राष्ट्रीय गान में आये ‘अधिनायक’ शब्द का इस्तेमाल जॉर्ज पंचम के लिए ही हुआ है। जबकि सच्चाई इसके बिल्कुल विपरीत है।

ऐसा माना गया कि गुरुदेव की कविता ‘भारत भाग्य विधाता’ 1905 में लिखा गयी थी। इसी कविता के ज़रिये टैगोर ने भारतीय लोकतंत्र का ख़ाक़ा उस दौर में ही खींच लिया था, जब ज़्यादातर भारतीयों के लिए आज़ादी बहुत दूर का ख़्वाब थी। देशभक्ति वाली कविता ‘भारत भाग्य विधाता’ को पहली बार 1911 में काँग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गाया गया। तब इसे बड़ी पहचान मिली। उस दौर में हमारा स्वतंत्रता आन्दोलन बहुत छितराया हुआ था। देश में दर्जनों संगठन अपने-अपने ढंग से अँग्रेज़ों के ज़ुल्म और शोषण का विरोध कर रहे थे। लेकिन ज़्यादातर विरोध हिंसक होते थे। इसीलिए अँग्रेज़ अपनी बन्दूकों, हुक़ूमत, कोर्ट-कचहरी और सेना की बदौलत विद्रोहों पर क़ाबू पा लेते थे।

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1914 में महात्मा गाँधी, दक्षिण अफ्रीका से लौटे। उन्होंने कुछ वक़्त गुरुदेव के शान्ति निकेतन में बिताया। उनका पहला सत्याग्रह 1917 का चम्पारन आन्दोलन था, जहाँ उन्होंने शोषणकारी नील की खेती का विरोध करके देश को लम्बे संघर्ष के लिए एक अचूक हथियार दिया। इसे ‘अहिंसक सत्याग्रह’ या ‘असहयोग आन्दोलन’ कहा गया। गाँधी के इसी हथियार ने भारतीयों में एकता का ऐसा मंत्र फूँका जिससे अँग्रेज़ों की चूलें हिलने लगीं। उनका हौसला लगातार पस्त होता गया। इससे उबरने के लिए ही उन्होंने ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति बनायी। इसके लिए कालापानी की सज़ा से लौटे और फिर महाराष्ट्र में अपने घर में नज़रबन्दी झेल रहे वीर सावरकर पर डोरे डाले गये।

अँग्रेज़ों ने सावरकर और उनके साथियों में जहाँ हिन्दूवादी कट्टरता के बीज बोये, वहीं मुस्लिम कट्टरता का वाहन बना ‘मुस्लिम लीग़’। 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और मुस्लिम लीग़ का जन्म हुआ। हेडगेवार, संघ के मुखिया बनाये गये। लेकिन उनकी हैसियत मुखौटे जैसी ही रही। असली सत्ता महासचिव, वीर सावरकर के पास थी। अँग्रेज़ों ने संघ और मुस्लिम लीग़ को काँग्रेस के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने और उसकी हरेक नीति तथा नेता का विरोध करने के लिए तैयार किया था। जल्द ही भारतीय समाज तीन ख़ेमों में गोलबन्द होने लगा। सबसे बड़ा ख़ेमा उदारवादी काँग्रेस के पीछे खड़ा था, जिसकी अगुवाई महात्मा गाँधी कर रहे थे। दूसरे नम्बर पर मुस्लिम लीग़ था। लेकिन संघ को हमेशा ही बहुत कम लोगों का समर्थन हासिल हुआ। राम मन्दिर आन्दोलन तक भारतीय राजनीति में संघ, हमेशा हाशिये पर ही रहा। लेकिन साम्प्रदायिक नफ़रत फैलाने में इसे हमेशा कामयाबी मिलती रही। उधर, मुस्लिम लीग़ से भी ऐसी ही प्रतिक्रियाएँ आतीं, जिससे संघ के पीछे खड़े कट्टर, मूर्ख और अदूरदर्शी हिन्दू भड़कते रहें। इसीलिए अपनी भरसक कोशिशों के बावज़ूद महात्मा गाँधी देश को बँटवारे को नहीं बचा सके।

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आज़ादी के बाद जब संविधान सभा में संघियों को बात-बात पर मुँह की खानी पड़ी तो उन्होंने महात्मा गाँधी की हत्या की साज़िश रच डाली। अफ़वाह फैलायी गयी कि गाँधी जी यदि ज़िन्दा रह गये तो मुसलमानों को ख़ुश करने के लिए देश के और बँटवारे भी करवा देंगे। लिहाज़ा, उनका मरना ज़रूरी है। जल्द ही ये उन्माद, चरम पर जा पहुँचा। फिर सावरकर ने गोडसे बन्धुओं को गाँधी का हत्यारा बनने के लिए तैयार कर लिया। सावरकर, इस हत्याकांड के मुख्य साज़िशकर्ता थे। हालाँकि, ये बात अदालत में साबित नहीं हो सकी।

उधर, काँग्रेस के नेहरू-पटेल ने साढ़े पाँच सौ से ज़्यादा रज़वाड़ों का एकीकरण करके और आम्बेडकर, राजेन्द्र प्रसाद, कृपलानी, पन्त, मौलाना आज़ाद, रफ़ी अहमद क़िदवई जैसे नेताओं ने क़माल का संविधान बनाकर देश को ऐसे लोकतांत्रिक संस्कारों में पिरो दिया, जिसमें संघ की विचारधारा दिनों-दिन हाशिये पर सरकती चली गयी। फिर सातवें दशक में, अपने निधन से पहले, सावरकर ने संघियों को नया मंत्र दिया कि ‘यदि सच तुम्हारे अनुकूल नहीं हो तो झूठ को ही तब तक फैलाते रहो जब तक कि लोग उसे ही सच न मानने लगें।’ यही मंत्र आज भी संघियों की सबसे ख़ास पहचान है। इसीलिए यदि ‘सत्यमेव जयते’ वाकई धर्म-सम्मत है तो संघियों के झूठ के क़िले को नेस्तनाबूद तो करना ही पड़ेगा! वक़्त चाहे इसमें जो भी लगे।

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काँग्रेस की हर बात का विरोध करने की आदत से लाचार, संघ ने संविधान सभा में तिरंगे का भी विरोध किया था। संघ अपने भगवा ध्वज को ही राष्ट्रीय ध्वज और धर्मनिरपेक्ष की जगह हिन्दू राष्ट्र का हिमायती था। हालाँकि, उसके ऐसे नज़रिये संविधान सभा में हमेशा अल्पमत में ही रहे। आज़ादी के बाद जब संघ को हर जगह मात मिलने लगी तो उसने काँग्रेस के महापुरुषों के चरित्र-हनन की रणनीति बनायी, जो आजतक जारी है।

चरित्र-हनन के मकसद से ही गुरुदेव को अँग्रेज़ों का चाटुकार बनाकर पेश करने की साज़िश रची गयी। ‘अधिनायक’ शब्द को लेकर तो घनघोर झूठ फैलाया गया। टैगोर ने ‘जन गण मन’ को ही ‘अधिनायक’ की संज्ञा दी थी। यानी, ऐसा देश, ऐसी व्यवस्था जिसमें जनता ही अपनी शासक हो। जनता जनार्दन की जय की कामना ही टैगोर ने ‘जय हे’ कहकर की थी। ग़ौर कीजिए, ये ‘जय है’ नहीं है! झूठ फैलाने वाले संघी, ‘हे’ और ‘है’ को एक ही बनाकर पेश करते हैं। हालाँकि, दोनों अलग-अलग शब्द हैं। ‘हे’ संज्ञा है, सम्बोधन है। जबकि ‘है’ क्रिया है। दूसरी बात, ‘अधिनायक’ का शब्दार्थ है ‘स्वाभाविक नेता, लीडर, अगुआ, सरदार, रहनुमा’। जबकि इसका भावार्थ है ‘प्रजा-वत्सल शासक’, जिसे किसी निरंकुश राजा, बादशाह या तानाशाह के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता!

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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