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गहनों पर GST के नये फ़ॉर्मूले से बढ़ेगा ऐसे भ्रष्टाचार और काला धन…!

समाज का सामान्य नियम है कि अफ़सरों की मिलीभगत के बग़ैर कोई चोरी नहीं हो सकती। इसके अलावा, यदि कोई व्यापारी हर तरह से नियम-क़ायदों के मुताबिक़ भी काम करे तो भी उससे घूस ऐंठने के लिए सरकारी अफ़सर उसे तरह-तरह से उलझाते हैं और अन्ततः चढ़ावा लेकर ही शान्त होते हैं।

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मोदी सरकार ने सोने-चाँदी के गहनों के लिए जैसा GST बनाया है, उससे राजस्व को तो बहुत मामूली फ़ायदा होगा, लेकिन घूसख़ोर अफ़सरों की पौ-बारह होना तय है! जिस ढंग से नोटबन्दी के बाद मोदी सरकार रोज़ाना नये-नये फ़रमान जारी कर रही थी, उसी तरह से GST लागू होने के बाद भी सरकार ने दो दिन में दो तरह के आदेश जारी किये। बहरहाल, अभी जो आदेश प्रभावी है, उसके मुताबिक अब यदि आप अपने पुराने गहनों को बेचकर उसके बदले या उससे अधिक क़ीमत के नये गहने ख़रीदने चाहते हैं तो आपको पुराने गहने के दाम पर कोई GST नहीं चुकाना पड़ेगा। जबकि गहनों के दाम में जो हिस्सा उसकी बनवायी यानी ‘मेकिंग चार्ज़’ होगा, उस रक़म पर आपको 18 फ़ीसदी GST भी देना होगा। रही बात पूरी तरह से नये गहनों के ख़रीद की तो उस पर तीन फ़ीसदी GST चुकाना पड़ेगा, जबकि उसके ‘मेकिंग चार्ज़’ पर लगने वाला GST, 18 फ़ीसदी ही रहेगा।

अब ज़रा इस टैक्स प्रणाली के व्यावहारिक पहलू को समझिए। मान लीजिए कि आप सोनार या सर्राफ़ा व्यापारी के पास एक लाख रुपये मूल्य का पुराना गहना लेकर गये। दुकानदार को इसे बेचने के बाद आपने उससे सवा लाख रुपये का नया गहना ख़रीद लिया। इस तरह आपके नये सोने की ख़रीद 25 हज़ार रुपये की हुई। इस 25 हज़ार पर आपको 3% GST यानी 750 रुपये और देना होगा। और, यदि नये गहने का ‘मेकिंग चार्ज़’ 10 हज़ार रुपये है तो इस 10 हज़ार पर 18% GST यानी 1800 रुपये भी देना होगा। इस तरह, सोनार का कुल बिल (25000+750+1800) 27550 रुपये होगा। साफ़ है कि सवा लाख रुपये की ख़रीदारी पर 2550 रुपये यानी 2.04% GST चुकाना होगा। इस तरह, GST की प्रभावी दर (Effective Rate) ‘मेकिंग चार्ज़’ के घटने-बढ़ने पर भी निर्भर करेगी।

आइए अब ये समझने की कोशिश करते हैं कि इस कारोबार में व्यावहारिक रूप से टैक्स की चोरी कैसे की जाएगी और कैसे टैक्स अधिकारी घूसख़ोरी करेंगे? दरअसल, छोटे सर्राफ़ा व्यापारी बड़े पैमाने पर पुराने गहने ख़रीदते हैं। वो जिन नये गहनों को बेचते हैं वो भी आज आधुनिक फैक्ट्रियों में बनते हैं, जिनकी ख़रीद-बिक्री बड़े व्यापारियों की मुट्ठी में है। तकनीकी तौर पर GST क़ानून में ये व्यवस्था की गयी है कि जब छोटा व्यापारी, पुराने गहनों को बेचने के लिए बड़े व्यापारी को दे तो बड़ा व्यापारी उससे 3 फ़ीसदी GST भी वसूले और उसे सरकार को दे। लेकिन यदि काग़ज़ों का पेट भरकर इस ख़रीद-बिक्री को ‘व्यापारी-व्यापारी’ की जगह ‘व्यक्ति-व्यापारी’ बना दिया जाए तो 3 फ़ीसदी GST को बहुत आसानी से ख़ुर्द-बुर्द किया जा सकता है!

समाज का सामान्य नियम है कि अफ़सरों की मिलीभगत के बग़ैर कोई चोरी नहीं हो सकती। इसके अलावा, यदि कोई व्यापारी हर तरह से नियम-क़ायदों के मुताबिक़ भी काम करे तो भी उससे घूस ऐंठने के लिए सरकारी अफ़सर उसे तरह-तरह से उलझाते हैं और अन्ततः चढ़ावा लेकर ही शान्त होते हैं। इसीलिए, तमाम सरकारी फ़ज़ीहतों से बचने के लिए व्यापारी सीधे-सीधे चढ़ावा चढ़ाना पसन्द करते हैं। भ्रष्ट अफ़सरों को भी ये ढर्रा बहुत पसन्द आता है। इसीलिए, उनकी तरह-तरह की छापेमारी भी सिर्फ़ रस्म-अदायगी होती है!

दरअसल, व्यापारियों के पास सोना-चाँदी पहुँचने का दो तरीक़ा है। पहला, विदेशी आयात से और दूसरा, पुराने सोने की ख़रीद से, जिसे गलाकर भी नये गहने बनाये जाते हैं। आयातित सोने के बिस्कुट पर सरकार कम से कम 10% आयात शुल्क (Import Duty) भी वसूलती है, जबकि आयातित गहनों पर तो ये कर 40% फ़ीसदी तक हो सकता है। विश्व में भारत, सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता है। देश में सोने की ख़पत का 99% आयात होता है। साल 2016-17 में आधिकारिक तौर पर 650 टन सोने का आयात हुआ। दस फ़ीसदी आयात कर के हिसाब से इससे सरकार को 20 हज़ार करोड़ रुपये का टैक्स मिला। यूपीए सरकार के वक़्त जब कच्चे तेल का दाम आसमान छूने लगा तो केन्द्र सरकार ने 2013 में व्यापार घाटे को काबू में रखने के लिए सोने पर 4% आयात शुल्क लगाया था। मोदी सरकार ने इसे बढ़ाकर 10% पर पहुँचा दिया है।

सोने पर जितना अधिक टैक्स होता है, उसकी तस्करी भी उतनी ही बढ़ती जाती है। वर्ल्ड गोल्ड काउन्सिल के मुताबिक, भारत में साल 2016-17 में 150 टन से ज़्यादा सोना तस्करी के रास्ते से आया। तस्करी से देश की अर्थव्यवस्था में जितना भी नया सोना आता है, सर्राफ़ा व्यापारी उसे पुराने सोने का नाम देकर अपने स्टॉक में दिखाते हैं। ये प्रवृत्ति GST के लागू होने के बाद भी निर्बाध रूप से जारी रहेगी। इसके अलावा, देश में हर साल 100-200 टन पुराना सोना बेचकर नया सोना ख़रीदा जाता है। पुराने गहनों की ख़रीद और उसके बदले नये गहनों की बिक्री पर GST के लागू होने से पहले तक 1% उत्पाद शुल्क (Excise Duty) और 1% बिक्री कर लगता था। इस 2% टैक्स के रूप में सरकार को 4000-6000 करोड़ रुपये का राजस्व मिलता था। सरकार को उम्मीद है कि GST के नये फ़ॉर्मूले के बाद इस ख़ाते में वो ज़्यादा टैक्स उगाहने में सफल होगी। आख़िरकार, इसमें जो भी इज़ाफ़ा होगा वो जनता पर बोझ ही तो होगा!

सोना, नया हो या पुराना, इसके व्यापारी अन्तर्राष्ट्रीय भाव के हिसाब से ही अपना कारोबार करते हैं। नये आयातित सोने का आवागमन छिपाना तो व्यापारियों के लिए आसान नहीं होता। लेकिन पुराने सोने की आड़ में वो कब-कितना बड़ा खेल खेलेंगे, इसे वो ख़ुद भी नहीं जानते। वो करोड़ों रुपये के नये गहनों को भी पुराने गहनों के एवज में बिका हुआ दिखाकर 3 फ़ीसदी GST को यथासम्भव चुराने की कोशिश करते रहेंगे। मज़े की बात ये भी है कि जो व्यापारी ऐसा करने से परहेज़ करेगा, उसका कारोबार कम रहेगा और उसके लिए सरकारी अफ़सरों की जेब गरम करना भारी पड़ जाएगा। लिहाज़ा, देर-सबेर ईमानदार व्यापारी भी बेईमानी करने के लिए मज़बूर होंगे, क्योंकि यही उनके धन्धे का दस्तूर बन जाएगा!

ओपिनियन

अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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Bhim-Rao-Ambedkar

कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

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अंबेडकर ने हर शोषित वर्ग की लड़ाई लड़ी

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babasaheb ambedkar

नई दिल्ली, 13 अप्रैल | भारतरत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर को दलितों का मसीहा माना जाता है, जबकि असलियत में उन्होंने जीवन भर दलितों की नहीं, बल्कि समाज के सभी शोषित वर्गो के अधिकारों की लड़ाई लड़ी।

भीमराव अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को मध्य प्रदेश के महू नामक एक गांव में हुआ था। इनके पिता का नाम रामजी मालोजी सकपाल था। इनके पिता ब्रिटिश भारतीय सेना में काम करते थे। ये अपने माता-पिता की 14वीं संतान थे। ये महार जाति से ताल्लुक रखते थे, जिसे हिंदू धर्म में अछूत माना जाता था।

घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण इनका पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से हो पाया। इन परिस्थितियों में ये तीन भाई- बलराम, आनंदराव और भीमराव तथा दो बहनें मंजुला और तुलसा ही जीवित बच सके। सभी भाई-बहनों में सिर्फ इन्हें ही उच्च शिक्षा मिल सकी।

हिंदू धर्म में व्याप्त चतुष्वर्णीय जाति व्यवस्था के कारण इन्हें जीवन भर छुआछूत का सामना करना पड़ा। स्कूल के सबसे मेधावी छात्रों में गिने जाने के बावजूद इन्हें पानी का गिलास छूने का अधिकार नहीं था। उच्च जाति का छात्र काफी ऊपर से हाथ में डालकर इन्हें पानी पिलाता था। बाद में इन्होंने हिंदू धर्म की कुरीतियों को समाप्त करने का जिंदगी भर प्रयास किया। जब इन्हें लगा कि ये हिंदू धर्म से कुरीतियों को नहीं मिटा पाएंगे, तब 14 अक्टूबर, 1956 में अपने लाखों समर्थकों सहित बौद्ध धर्म अपना लिया।

आज के दौर में हिंदू के नाम पर राजनीति तो की जा रही है और दलितों का वोट पाने के लिए डॉ. अंबेडकर को ‘अपना’ बताया जा रहा है, लेकिन कोई यह सोचने के लिए तैयार नहीं है कि बाबा साहेब ने हिंदू धर्म क्यों छोड़ा।

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राजनीति करने वाले आज डॉ. अंबेडकर का भी भगवाकरण करने का प्रयास करते हैं, किसी के धर्मातरण पर व्यग्र और उग्र हो उठते हैं, लेकिन अपने धर्म पर आत्मचिंतन करना, सोच बदलना, कुरीतियां मिटाना जरूरी नहीं समझते। अगर सोच बदली होती तो जगह-जगह अंबेडकर की मूर्तियां नहीं तोड़ी जातीं।

डॉ. अंबेडकर की पहली शादी नौ साल की उम्र में रमाबाई से हुई। रमाबाई की मृत्यु के बाद इन्होंने ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखने वाली सविता से विवाह कर लिया। सविता ने भी इनके साथ ही बौद्ध धर्म अपना लिया था। अंबेडकर की दूसरी पत्नी सविता का निधन वर्ष 2003 में हुआ।

भीमराव ने अपने एक ब्राह्मण दोस्त के कहने पर अपने नाम से सकपाल हटाकर अंबेडकर जोड़ लिया, जो अंबावड़े गांव से प्रेरित था।

अंबेडकर की गिनती दुनिया के सबसे मेधावी व्यक्तियों में होती थी। वे नौ भाषाओं के जानकार थे। इन्हें देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों से पीएचडी की कई मानद उपाधियां मिली थीं। इनके पास कुल 32 डिग्रियां थीं।

अंबेडकर को 15 अगस्त, 1947 को देश की आजादी के बाद देश के पहले देशी संविधान के निर्माण के लिए 29 अगस्त, 1947 को संविधान की प्रारूप समिति का अध्यक्ष बनाया गया। फिर दो वर्ष, 11 माह, 18 दिन के बाद संविधान बनकर तैयार हुआ, 26 नवंबर, 1949 को इसे अपनाया गया और 26 जनवरी, 1950 को लागू कर दिया गया।

कानूनविद् अंबेडकर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारत का पहला कानून मंत्री बनाया था।

डॉ. अंबेडकर ने समाज में व्याप्त बुराइयों के लिए सबसे ज्यादा महिलाओं की अशिक्षा को जिम्मेदार माना। इन्होंने महिलाओं की शिक्षा पर जोर दिया। उनके सशक्तिकरण के लिए इन्होंने हिंदू कोड अधिनियम की मांग की। तब भारी विरोध के चलते वह पारित नहीं हो सका, लेकिन बाद में वही अधिनियम हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम और हिंदू विशेष विवाह अधिनियम के नाम से 1956 में पारित हुआ। इससे हिंदू महिलाओं को मजबूती मिलती थी।

बाबा साहेब ने सिर्फ अछूतों के अधिकार के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण समाज के पुनर्निर्माण के लिए प्रयासरत रहे। उन्होंने मजदूर वर्ग के कल्याण के लिए भी उल्लेखनीय कार्य किया। पहले मजदूरों से प्रतिदिन 12-14 घंटों तक काम लिया जाता था। इनके प्रयासों से प्रतिदिन आठ घंटे काम करने का नियम पारित हुआ।

इसके अलावा इन्होंने मजदूरों के लिए इंडियन ट्रेड यूनियन अधिनियम, औद्योगिक विवाद अधिनियम, मुआवजा आदि सुधार भी इन्हीं के प्रयासों से हुए। उन्होंने मजदूरों को राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने के लिए प्रेरित किया। वर्तमान के लगभग सभी श्रम कानून बाबा साहेब के ही बनाए हुए हैं।

बाबा साहेब कृषि को उद्योग का दर्जा देना चाहते थे। उन्होंने कृषि का राष्ट्रीयकरण करने का प्रयास किया। राष्ट्रीय झंडे में अशोक चक्र लगाने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है।

ये अकेले भारतीय हैं, जिनकी प्रतिमा लंदन संग्रहालय में कार्ल मार्क्‍स के साथ लगी है। साल 1948 में डॉ. अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित हो गए। छह दिसंबर, 1956 को इनका निधन हो गया।

डॉ. अंबेडकर को देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। इनके निधन के 34 साल बाद वर्ष 1990 में जनता दल की वी.पी. सिंह सरकार ने इन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारतरत्न से सम्मानित किया था। इस सरकार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) बाहर से समर्थन दे रही थी। वी.पी. सिंह ने जब वी.पी. मंडल कमीशन की सिफारिश लागू कर दलितों, पिछड़ों को आरक्षण का अधिकार दिया, तब भाजपा ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी थी और सवर्ण युवाओं को आरक्षण के खिलाफ आत्मदाह के लिए उकसाया था। देशभर में कई युवकों ने आत्मदाह कर लिया था और जातीय दंगे हुए थे, जिसे ‘मंडल-कमंडल विवाद’ नाम दिया गया था।

BY : अनुराग सक्सेना

–आईएएनएस

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अन्ना ने गलती की, मगर साथ नहीं छोड़ सकता : विनायक राव

“लातूर वह स्थान है, जहां भूकंप आया था। उसके बाद राजनीति से तौबा कर मैंने समाज सेवा का काम शुरू किया। 1993 के बाद से पानी और किसानी के काम में लगा हूं।

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भीकमपुरा (राजस्थान), 9 अप्रैल (आईएएनएस)| सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे के करीबी विनायक राव पाटिल इन दिनों अन्ना हजारे के दिल्ली में अनशन के हश्र से काफी दुखी हैं। वह कहते हैं कि अन्ना हजारे ने अनशन खत्म करने से पहले किसी की नहीं सुनी। अन्ना ने गलती की, मगर एक पिता गलती करे तो उसका साथ नहीं छोड़ सकते।

राजस्थान के अलवर जिले के भीकमपुरा में तरुण भारत संघ के आश्रम में चल रहे तीन दिवसीय चिंतन शिविर में हिस्सा लेने आए पाटिल ने आईएएनएस से कई विषयों पर खुलकर चर्चा की।

अन्ना द्वारा किसानों की मांगों को लेकर किए गए अनशन को छह दिन में ही खत्म कर दिए जाने के सवाल पर पाटिल ने कहा, “अन्ना को राजेंद्र सिंह सहित अन्य लोगों ने समझाया था कि वे सरकार से वार्ता बंद करें, क्योंकि तानाशाही के बीच सत्याग्रह कोई असर नहीं दिखा पाता। लिहाजा वे अनशन खत्म कर देशव्यापी यात्रा का ऐलान करें, मगर अन्ना नहीं माने।”

पाटिल ने आगे कहा, “अन्ना मेरे लिए पिता समान हैं, हमारी संस्कृति पिता के कुछ भी गलत करने पर उनका साथ छोड़ने की अनुमति नहीं देती है, लिहाजा मैंने तय किया है कि उनका सम्मान करूंगा और साथ नहीं छोड़ूंगा। उन्हें समझाऊंगा कि क्या गलती हुई और आगे ऐसा न हो, इसका प्रयास करूंगा।”

अन्ना का आंदोलन खत्म कराए जाने के सवाल पर उन्होंने बताया कि अन्ना ने चार पेज का मांगपत्र हाथ से लिखकर भेजा था, जिसे सरकार ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया और अपना नया मांगपत्र बनाकर भेज दिया। उसमें वे मांगें थी ही नहीं, जिनको लेकर यह अनशन था। हां, इतना जरूर लिखा था कि ‘सभी मांगें पूरी की जाती हैं।’

लातूर स्थित अपने घर से बहुत बड़ा बैग लेकर निकले पाटिल ने कहा, “अब सिर्फ किसानों के लिए काम करूंगा, घर वापस नहीं जाऊंगा, इलाहाबाद में गंगा के संगम स्थल से एक यात्रा शुरू की जाएगी। इस यात्रा के जरिए लोगों को जगाया जाएगा।”

महाराष्ट्र के मराठवाड़ा की स्थिति का जिक्र करते हुए पाटिल ने कहा, “वहां के बुरे हाल हैं, एक साल में दो-दो हजार किसान आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठाने को मजबूर हैं। इन किसानों को कम पानी वाली खेती के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है। दो साल पहले हालात ये थे कि लोग अपने रिश्तेदारों से कहते थे कि अपने साथ पीने का पानी लाना, मगर अब मांजरा नदी की हालत सुधरने से काफी बदलाव आया है, पीने का पानी मिलने लगा है।”

उन्होंने आगे कहा, “लातूर वह स्थान है, जहां भूकंप आया था। उसके बाद राजनीति से तौबा कर मैंने समाज सेवा का काम शुरू किया। 1993 के बाद से पानी और किसानी के काम में लगा हूं। लोगों को पानी मिले, बारिश के पानी को संजोया जाए, इसके प्रयास जारी हैं। लोगों का साथ भी मिल रहा है। यही कारण है कि लातूर की हालत बदल चली है।”

–आईएएनएस

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