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खोखली है मोदी की अर्थ-नीति

बैंकों का 11 प्रतिशत क़र्ज़ा डूब चुका है। इससे क़र्ज़ पाना मुश्किल हो गया है। माँग में कमी होने की वजह से क़र्ज़ लेने की गतिविधि का बुरी तरह से प्रभावित होना बेहद चिन्ताजनक है। बेरोज़गारी की भरमार है। हर साल रोज़गार की चाहत रखने वालों की संख्या में 1.2 करोड़ लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है। लेकिन साल 2015 में जहाँ 1.35 लाख लोगों को रोज़गार मिला, वहीं 2016 में रोज़गार पाने वालों की तादाद सिर्फ़ 2.31 लाख रहा।

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भारत में तीन साल से सूखा है। उम्मीदों का मॉनसून बहुत दूर है। लेकिन अभी सपने मरे नहीं हैं। हमारे लोकतंत्र की मौजूदा तस्वीर कुछ ऐसी ही है! मोदी सरकार नकारा साबित हुई है। इसे ग़लतफ़हमी है कि इसने काले धन की अर्थव्यवस्था पर करारा हमला किया है। इसे लगता है कि दुनिया में भारतीय अर्थव्यवस्था की 7.1 फ़ीसदी वाली विकास दर सबसे तेज़ है। सरकारी निवेश में उछाल की वजह से रोज़गार के अवसर पैदा हो रहे हैं। सरकार समझ रही है कि विदेशी निवेश में इज़ाफ़ा ये बता रहा है कि भारत की विकास यात्रा में निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है। आर्थिक सुधारों ने कारोबार को आसान बना दिया है।

जीएसटी पर आम सहमति बनाने के लिए पिछली सरकार भले ही बहुत तरसी हो, लेकिन इस सरकार को उसमें दिक्कत नहीं हुई। अब इसे 1 जुलाई से लागू होना है। शेयर बाज़ार का सूचकांक ‘सेंसेक्स’ अपने रिकॉर्ड स्तर पर है। ये सब कुछ इसलिए हो पा रहा है कि क्योंकि नोस्त्रादामस की भविष्यवाणी के मुताबिक़, नरेन्द्र मोदी, भारत की तस्वीर बदल रहे हैं! बहरहाल, आइए, अब ऐसे सभी दावों की सच्चाई को ज़रा परखकर देख लिया जाए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर को नोटबन्दी का ऐलान किया। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था में मौजूद 86 फ़ीसदी मुद्रा अचानक अवैध बन गयी जो 500 और 1000 रुपये के रूप में प्रचलित थी। इसे काले धन पर हुए सर्ज़िकल हमले की पेश किया गया। लेकिन ये अपने मकसद को हासिल करने में पूरी तरह से विफल साबित हुआ, क्योंकि काला धन, रियल एस्टेट या सोना या विदेश भेजने जैसे काम में ख़प गया। याद रहे कि अर्थव्यवस्था में क़रीब 5 फ़ीसदी काला धन ही चलन में रहता है। इसीलिए कालेधन को बैंकों में जमा करने और निकालने वाले दलालों के लिए नोटबन्दी, एक देवदूत बनकर आया। अब धीरे-धीरे ‘काला धन’ वापस लौट रहा है। इसे अपनी पूरी शक्ति पाने में भले ही थोड़ा वक़्त लगे, लेकिन काले धन की चुनौती बनी रहेगी। उल्टा नोटबन्दी की सबसे तगड़ी मार ग़रीबों पर पड़ी है। इसी तरह जाली नोट और आतंकवाद को नोटबन्दी से भारी चोट पहुँचाने का दावा भी खोखला ही निकला!

7.1 फ़ीसदी की आर्थिक विकास दर वाला दावा भी सन्देहास्पद है। अभी चौथी तिमाही में विकास दर गिरकर 6.1 फ़ीसदी पर थी। ये भी साबित कर रहा है कि नोटबन्दी ने अर्थव्यवस्था पर कितना प्रतिकूल प्रभाव डाला है। निजी निवेश वाला विकास का इंजन ठंडा पड़ा है। घरेलू बचत की दर गिरकर 30 फ़ीसदी पर जा पहुँची है। जबकि यूपीए सरकार में ये जीडीपी का 35 प्रतिशत थी। जून 2016 तक निर्यात में लगातार 19 महीने तक गिरावट दर्ज़ हुई। आईटी सेक्टर में प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए भारी पुनर्निवेश की ज़रूरत है। हाल ही में चार बड़ी कम्पनियों में हुई कर्मचारियों की छँटनी बता रही है कि आईटी क्षेत्र की सेहत कैसी है?

बैंकों का 11 प्रतिशत क़र्ज़ा डूब चुका है। इससे क़र्ज़ पाना मुश्किल हो गया है। माँग में कमी होने की वजह से क़र्ज़ लेने की गतिविधि का बुरी तरह से प्रभावित होना बेहद चिन्ताजनक है। बेरोज़गारी की भरमार है। हर साल रोज़गार की चाहत रखने वालों की संख्या में 1.2 करोड़ लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है। लेकिन साल 2015 में जहाँ 1.35 लाख लोगों को रोज़गार मिला, वहीं 2016 में रोज़गार पाने वालों की तादाद सिर्फ़ 2.31 लाख रहा।

सरकारी क्षेत्र में ज़रूर नौकरी के कुछ अवसर बने हैं। लेकिन जब तक निजी क्षेत्र में भारी निवेश नहीं होगा तब तक रोज़गार के अवसरों में सन्तोषजनक तेज़ी नहीं लायी जा सकती। आईटी, इलेक्ट्रानिक्स और रक्षा जैसे अर्थव्यवस्था के चुनिन्दा क्षेत्रों में ही विदेश निवेश है। लेकिन इससे खेती-बाड़ी और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े छोटे तथा मझोले उद्योग-धन्धों में रोज़गार नहीं बढ़ता। बुनियादी क्षेत्र यानी कोर सेक्टर में विदेश निवेश के लिए भरोसेमन्द माहौल बनाने के लिए दिसम्बर 2015 में बनाये गये एनआईआईएफ यानी नैशनल इंवेस्टमेंट एंड इंफ्रास्टक्चर फंड ने अभी तक एक भी प्रोजेक्ट में निवेश नहीं किया है। प्रधानमंत्री मोदी को लगता है कि डिजिटाइज़ेशन के बढ़ते प्रभाव को देखकर विदेश निवेशक यहाँ पैसा लगाएँगे। लेकिन सच्चाई तो ये है कि ज़्यादातर भारतीयों की आमदनी 10 हज़ार रुपये महीना से कम है और इसीलिए वो अपना ज़्यादातर लेन-देन बैंकिंग और डिजिटाइज़ेशन के बग़ैर ही करते हैं।

हम जानते हैं कि सेंसेक्स का रिकॉर्ड स्तर ये नहीं बता सकता कि अर्थव्यवस्था की हालत कैसी है? रियल एस्टेट से कोई कमाई हो नहीं रही है, बैंकों से मिलने वाले ब्याज़ की दर बहुत कम है। लिहाज़ा, शेयर बाज़ार में निवेश ही इकलौता विकल्प है। लेकिन सेसेंक्स की ऐसी तेज़ी बहुत जोख़िम भरी है, क्योंकि इसका बुलबुला जब फूटता है तो निवेशकों को भारी चोट पहुँचाती है।

जहाँ तक कारोबार के लिए माकूल माहौल यानी ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ बनाने का ताल्लुक है तो विश्व बैंक ने 190 देशों की फ़ेहरिस्त में भारत को 130 वें स्थान पर बताया है। ज़रा सोचिए कि क्या ऐसी ही तब्दीलियाँ लाने का वादा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में किया था? उनके सपने हमें तब तक बरगलाते रहेंगे जब तक कि नौकरशाही के दाँव-पेंच को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी नियम-क़ायदे और निगरानी तंत्र को नहीं बनाया जाता।

मौजूदा सरकार तो व्यापारियों, कारोबारियों और उद्यमियों को आतंकित करके रखना चाहती है, हमारे टैक्स अधिकारियों की भूमिका फ़िरौती ऐंठने वालों जैसी है, हमारी जाँच एजेंसियाँ ऐसे सरकारी हथकंडों की तरह काम करती हैं जहाँ व्यापार-कारोबार का समृद्ध होना असम्भव है। इसीलिए बिज़नेस का भारत से पलायन हो रहा है। बड़े व्यापारी अब विदेश में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही हक़ीक़त है। ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ अब ख़्याली पुलाव बन चुका है। सुधारों की रफ़्तार बहुत धीमी और मामूली है। बड़े बदलावों का जो सपना दिखाया गया, जो वादे किये गये थे, उन्हें अब भुलाया जा चुका है।

मूलतः जिस जीएसटी (वस्तु और सेवा कर) की कल्पना की गयी है, वो तो अब एक भूत बन चुका है। यदि किसी सुधार की आत्मा ही मर जाए तो फिर उसे लेकर बनी आम सहमति पर जश्न मनाने का कोई तुक़ नहीं हो सकता। बिजली और रियल एस्टेट को जीएसटी के दायरे से बाहर रखना बहुत बड़ी ग़लती थी। मोदी सरकार ने ‘एक देश एक कर’ के पूरे सपने पर ही पानी फेर दिया। देश को ‘एक देश आठ कर’ वाली व्यवस्था दी जा रही है। टैक्स की इतनी सारी दरों से नौकरशाही के झगड़े बढ़ेंगे। बारम्बर रजिस्ट्रेशन करवाने की ज़रूरत से छोटे और मझोले क्षेत्रों की कमर टूट जाएगी।

व्यापारियों की शिकायत है कि जीएसटी को लेकर वित्त मंत्री अनावश्यक हड़बड़ी में हैं। वो चाहते हैं कि तैयारियों के पूरा होने तक इसे टाल दिया जाए। कई राज्य सरकारों का भी यही नज़रिया है। लेकिन जीएसटी जैसे ऐतिहासिक क़ानून को जिस तरह के समझौतों के साथ लागू किया जा रहा है, उसने इसकी सारी चमक पर ही बट्टा लगा दिया है। कुलमिलाकर, अर्थव्यवस्था भारी दबाव में है। शायद, मोदी के प्रशंसकों को ठीक से पता नहीं है कि नोस्त्रादामस की भविष्यवाणी का मतलब क्या है?

By : Kapil Sibal

(The writer, a senior Congress leader, is former Union Law Minister and a lawyer)

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मोदी विरोधी चेहरा के रूप में उभरीं ‘दीदी’

देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, जिन्हें उनके समर्थक ‘दीदी’ कहते हैं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विरोधी अपनी लय को बरकरार रखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर साल भर हमलावर रहीं। उन्होंने अपने भाषणों व सोशल मीडिया पर लेखों व व्यंग्य के जरिए मोदी सरकार पर कड़े हमले किए और उनकी सरकार का केंद्र से कई मुद्दों पर संघर्ष जारी रहा।

पौराणिक कथाओं से लेकर प्राचीन भारतीय इतिहास तक तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी मोदी पर सभी तरह के हमलावर रहीं, जबकि पश्चिम बंगाल में भाजपा का वोट शेयर विभिन्न उपचुनावों व स्थानीय निकाय के चुनावों में बढ़ना जारी रहा।

भाजपा ने जिस तरह से तृणमूल के विकल्प के तौर पर उभरने का प्रयास किया, ममता ने इसके उलट राष्ट्रीय तौर पर खुद को हिंदुत्व समूह के प्रमुख विरोधी के तौर पर पेश किया।

ममता ने क्षेत्रीय नेताओं के साथ मिलकर संघ परिवार का विरोध किया और अपने फैसलों व कार्रवाई से केंद्र के कामकाज पर दबाव बनाया व अपना हित साधा।

उन्होंने मोदी की प्रमुख नीतियों जैसे नोटबंदी व वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर उन पर निशाना साधा, जबकि आर्थिक वृद्धि में गिरावट, अहिष्णुता, गोमांस प्रतिबंध व गोरक्षकों जैसे ज्वलंत मुद्दों से फायदा उठाने की कोशिश की।

हालांकि, वह मोदी पर जोरदार हमलों की वजह से सुर्खियों में रहीं।

ममता ने एक मौके पर मोदी की तुलना संस्कृत के महान कवि व नाटककार कालिदास से की थी। हालांकि उन्होंने तुलना उस कालिदास से की थी, जिसे कभी महान मूर्ख समझा जाता था। कहानी का संदर्भ यह था कि राजकुमारी विद्योत्तमा के लिए जब महामूर्ख की तलाश की जा रही थी तो देखा गया कि एक युवक बुद्धिमत्ता की कमी की वजह से जिस डाल पर बैठा था, उसी को काट रहा था। वह युवक कालिदास था, जो विद्योत्तमा के साथ विवाह के बाद बुद्धिमान बना।

ममता बनर्जी ने अपनी टिप्पणी में कहा, “देश की सभी संस्थाओं पर हमले हो रहे हैं। यह एक खतरनाक खेल है। प्रधानमंत्री कालिदास की तरह व्यवहार कर रहे हैं, वह जिस शाखा पर बैठे हैं उसी को काटने की कोशिश कर रहे हैं।”

ममता ने अपने एक अन्य आक्रामक भाषण में मोदी व रामायण महाकाव्य के दैत्य राजा रावण की तुलना की।

मोदी के 56 इंच के सीने की टिप्पणी का जिक्र करते हुए ममता ने कहा, “वह दावा करते हैं कि उनका सीना व कंधा चौड़ा है। रावण के कंधे भी चौड़े थे और उसके दस सिर थे।”

बंकुरा जिले में एक सार्वजनिक सभा में ममता बनर्जी ने मोदी पर फिर से हमला किया और मोदी सरकार को ‘गूंगा व बहरा’ बताया।

उन्होंने कहा, “वह पहले खुद को चायवाला कहते थे। अब वह करोड़पति पेटीएम वाला बन चुके हैं।”

ममता बनर्जी ने नोटबंदी को ‘शर्मनाक’ बताया और ट्विटर पर मोदी के इस फैसले को ‘एक तानाशाह की दृष्टिहीन, उद्देश्यहीन व दिशाहीन फैसला’ बताकर खारिज किया था।

ममता बनर्जी ने लोकतांत्रिक प्रदर्शन के हर तरीके को अपनाया। उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का दरवाजा भी खटखटाया था और उनसे देश की अव्यवस्था को बचाने का आग्रह किया था।

ममता ने मोदी से इतर भाजपा के दूसरे नेताओं- लालकृष्ण आडवाणी, राजनाथ सिंह व अरुण जेटली के नेतृत्व को स्वीकार करने की बात कही।

जीएसटी को समर्थन देते हुए ममता बनर्जी ने कहा कि मोदी सरकार ने इस नई प्रणाली को ‘विनाशकारी रूप से जल्दबाजी’ में एक जुलाई से लागू कर दिया। उन्होंने केंद्र के इस कदम को ‘एक अन्य बड़ी भूल’ बताया।

हालांकि, ममता बनर्जी ने ‘संयुक्त नेतृत्व’ के जरिए मोदी को चुनौती देने पर जोर दिया। लेकिन एक मीडिया कॉन्क्लेव में बीते महीने उन्होंने संकेत दिया कि वह 2019 में सभी विपक्षी दलों को भाजपा के खिलाफ एक मंच पर लाने में कोई भूमिका निभाने नहीं जा रही हैं, कोई ऐसा साझा मंच बनेगा तो उसका समर्थन जरूर करेंगी।

By : शीर्षेदु पंत

–आईएएनएस

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ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’

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ये किसी से छिपा नहीं है कि संघियों को और ख़ासकर मोदी सरकार तथा बीजेपी के नेताओं को ‘बदज़ुबानी’ का कितना प्रचंड संक्रमण है! 2014 के बाद से तो इस भगवा संक्रमण ने दमघोटू महामारी का रूप ले लिया! इससे भी ज़्यादा ताज़्ज़ुब की बात तो ये रहा कि शीर्ष संवैधानिक पद पर बैठे हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ख़ुद इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी के सबसे गम्भीर मरीज़ हैं। इसीलिए मोदी की ज़ुबान आये दिन लपलपाती रहती है। उनके रोग का लक्षण चुनाव सभाओं में इतना उग्र रूप धारण कर लेता है कि उन्हें पहचानना तक मुश्किल हो जाता है। लेकिन अक्सर चुनाव के बाद मोदी की ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी का ज्वार कुछ अरसे के लिए शान्त भी पड़ने लगता है।

मोदी की एक और विशेषता है! उन्हें विरोधियों के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने और अपने सहयोगियों के नितान्त मूर्खतापूर्ण बयान की अनदेखी करने में भी महारथ हासिल है। वैसे भी गिरगिट की तरह रंग बदलने में नेताओं की पूरी कूँ पूरी बिरादरी का ही कोई जबाब नहीं होता, लेकिन प्रधानमंत्री के पद पर आरूढ़ नरेन्द्र मोदी में जैसा गिरगिटिया कौशल है, वैसे बीते 70 सालों में पहले कभी किसी और प्रधानमंत्री में नहीं नज़र आया। मोदी की ये ऐसी अद्भुत पहचान है। इसका ज़िक्र उस दौर में भी होता रहेगा, जब मोदी कहीं के नहीं होंगे! दरअसल, इतिहास ने हमेशा प्रमुख हस्तियों को उनके ऐसे कामों के लिए याद रखा है, जिसने जनमानस पर अच्छी या ख़राब, लेकिन गहरी छाप छोड़ी हो। इस लिहाज़ से मोदी काल को इतिहास, ‘बदज़ुबानी युग’ के रूप में ही याद रखेगा, क्योंकि नीयतख़ोर नेताओं को ये संसार उनके कुकर्मों के लिए ही याद रखता है।

गुजरात के चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने मनमोहन सिंह और अन्य काँग्रेसियों को पाकिस्तान परस्त राष्ट्रद्रोही या देश का दुःखचिन्तक करार दिया। मोदी ने यहाँ तक कहा कि काँग्रेस, गुजरात को जीतने के लिए और अहमद पटेल को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सीमापार पाकिस्तान के साथ मिलकर साज़िश कर रही है।

इससे पहले मोदी ने मणिशंकर अय्यर के बयान को बड़ी चतुराई से तोड़-मरोड़कर पेश किया। ‘नीच’ आचरण, ‘नीच’ सोच, ‘नीच’ विचार, ‘नीच’ नज़रिया जैसी बातों को मोदी ने ‘नीच’ जाति में बदल दिया। इसीलिए जब मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी जैसे शीर्ष संवैधानिक पदों पर रहे नेताओं के लिए अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर नरेन्द्र मोदी ने माफ़ी नहीं माँगी तो संसद के मौजूदा सत्र का पहिया जाम होने लगा।

संसद में अपनी छीछालेदर करवाने के बावजूद प्रधानमंत्री ने अपने मूर्खतापूर्ण बयान पर शर्मिन्दगी नहीं ज़ाहिर की, बल्कि अपनी पार्टी की ओर से सिर्फ़ ये बयान दिलाना मुनासिब समझा कि बीजेपी, मनमोहन सिंह और हामिद अंसारी के संसदीय योगदान का आदर करती है। हालाँकि, ये कहना अनावश्यक है कि मनमोहन सिंह के लिए ‘देहाती औरत’, ‘रेनकोट पहनकर नहाने वाला’, ‘मौन-मोहन’ वग़ैरह कैसी-कैसी बातें कह चुके नरेन्द्र मोदी के ज़ुबान की लपलपाहट यहीं ख़त्म नहीं होने वाली! इसीलिए मनमोहन सिंह को पाकिस्तान परस्त बताने के बाद तो काँग्रेस ने मोदी को ललकार दिया कि वो राष्ट्रविरोधियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करके ख़ुद राष्ट्रविरोधी आचरण कर रही है। उधर, मोदी का भी कहना रहा है कि काँग्रेसियों ने उन्हें ख़ून का सौदागर, चायवाला, ‘नीच’ वगैरह क्या-क्या नहीं कहा!

कह तो मोदी भी सही रहे हैं। भारतीय राजनीति ने तमाम स्तरहीन बयान देखे हैं, कोई भी पार्टी इस ‘बदज़ुबानी’ वाली महामारी से अछूती नहीं है। लेकिन अनाप-शनाप बोलने वालों की जितनी तादाद बीजेपी में है और वो जितनी ज़हरीली बातें करते हैं, उसे देश की कोई भी अन्य पार्टी टक्कर नहीं दे सकती! लेकिन ‘मैं अच्छा और तुम ख़राब’ करते-करते अब तो मोदी सरकार के मंत्रियों ने उस संविधान की ही धज़्ज़ियाँ उड़ाना शुरू कर दिया, जिसकी शपथ लेकर वो मंत्री बने हैं। केन्द्रीय कौशल विकास राज्‍यमंत्री अनन्त कुमार हेगड़े ने तो यहाँ तक कह दिया कि बीजेपी संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को ही उखाड़ फेंकेगी।

दरअसल, अगला चुनाव कर्नाटक विधानसभा का है। हेगड़े, कर्नाटक से ही आते हैं। वहाँ बीजेपी को हिन्दुओं के उन्मादी ध्रुवीकरण से बहुत बड़ा आसरा है। इसीलिए हेगड़े ने उन लोगों के तन-बदन में आग लगाने की सोची, जो संघियों के हिन्दुत्व को हमेशा से सिरे से ख़ारिज़ करते रहे हैं। तभी तो हेगड़े ने कहा कि “अगर आप कहते हैं कि मैं एक मुस्लिम, ईसाई, लिंगायत, ब्राह्मण या हिन्दू हूँ तो ऐसे में हम अपने धर्म और जाति से जुड़े होने पर गर्व महसूस करते हैं। लेकिन ये सेक्युलर कौन लोग हैं? इनका कोई माई-बाप नहीं होता। जो लोग ख़ुद को सेक्युलर कहते हैं, वो नहीं जानते कि उनका ख़ून क्या है? हाँ, संविधान ये अधिकार देता है कि हम ख़ुद को धर्मनिरपेक्ष कहें, लेकिन संविधान में कई बार संशोधन हो चुके हैं। हम भी उसमें संशोधन करेंगे। हम सत्ता में इसीलिए आये हैं।”

हेगड़े, उस धूर्त भगवा रणनीति को हवा देना चाहते हैं, जिसके तहत कर्नाटक के मन्दबुद्धि और अशिक्षित हिन्दुओं में ये ज़हर भरा जा सके कि ‘तख़्त बदल देंगे, ताज बदल देंगे, कर्नाटक जीते तो संविधान बदल देंगे!’ वैसे तो संघियों का सेक्युलरों से बैर उतना ही पुराना है, जितना पुराना ख़ुद संघ है। लेकिन संविधान की शपथ लेकर मंत्री बनने वाले किसी भी धूर्त को संविधान का अनादर करके पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं हो सकता। ऐसे मंत्री को मूर्ख नहीं तो फिर और क्या कहेंगे जिसे इतना भी पता नहीं कि बीजेपी को चाहे जितना बड़ा बहुमत मिल जाए, वो तो क्या, कोई भी दूसरी पार्टी संविधान के मूल ढाँचे को चाहकर भी नहीं बदल सकती।

संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ देश कहा गया है। सुप्रीम कोर्ट कई बार स्थापित कर चुका है कि ‘धर्मनिरपेक्षता’, भारतीय संविधान की बुनियादी अवधारणा है और कोई भी संशोधन, संविधान की मूल भावना को नहीं बदल सकता। इसीलिए जब संसद में विपक्ष ने हेगड़े को अपने बयान के लिए माफ़ी माँगने या फिर उन्हें मंत्री पद से हटाने की माँग गरमायी तो ‘संविधान बदलने के लिए सत्ता में आयी बीजेपी’ का ख़म ठोंकने वाले अनन्त हेगड़े को थूककर चाटना पड़ा। उन्होंने कथित सफ़ाई भी दी कि “मैं सिर्फ़ यह कहना चाहता हूँ कि मोदी जी और हमारी सरकार देश के संविधान और बाबा साहेब के आदर्शों को लेकर प्रतिबद्ध है।”

हेगड़े के बयान को लेकर सोशल मीडिया पर कोहराम मचना ही था। मचा भी। क्योंकि भारतवर्ष में आज भी बहुसंख्यक लोग सेक्युलर हैं। उन्हें सेक्युलर होने पर गर्व है। ये वो लोग नहीं हैं जो किसी राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ता हों। अब यदि मोदी सरकार का कोई मंत्री इन सेक्युलरों की वल्दियत पर सवाल उठाकर उन्हें हरामी बताना चाहेगा तो इसे कैसे बर्दाश्त किया जा सकता है!

वैसे नेताओं की ‘बदज़ुबानी’ भी एक क्रमागत प्रक्रिया से ही विकसित होती है। याद है ना कि केन्द्रीय क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि ‘मुसलमान भाजपा को वोट नहीं देते तो उन्हें टिकट क्यों दें!’ लेकिन इससे एक क़दम आगे बढ़कर मध्य प्रदेश के सहकारिता राज्यमंत्री विश्वास सारंग ने बोल दिया कि ‘भाजपा को वोट न देने वाला पाकिस्तानी है!’ अब ज़रा सोचिए कि सार्वजनिक जीवन में क़मीनेपन की क्या सीमा होनी चाहिए? क्या 2014 में बीजेपी को वोट नहीं देने वाले 69 फ़ीसदी लोग पाकिस्तानी हैं? फिर राष्ट्रीयता का सर्टिफ़िकेट जारी करने का अधिकार आख़िरकार संघियों को मिल कहाँ से गया?

सबसे बड़ा और विचारनीय प्रश्न यही है। भारत को बचाना है तो ऐसी मानसिकता को उखाड़ फेंकना होगा, जिसमें सेक्युलर लोगों को हरामी और बीजेपी को वोट नहीं देने वालों को पाकिस्तानी कहने वालों की ज़ुबान बन्द की जा सके! वर्ना, ‘बदज़ुबानी’ का सिलसिला थमने वाला नहीं है और यही प्रवृत्ति हमें व्यापक हिंसा और अराजकता की ओर ढकेले बिना नहीं मानेगी!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और ये उनका निजी विचार है)

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ओपिनियन

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

साफ़ है कि 2012 में हमारे सुप्रीम कोर्ट पर भी वो आम धारणा हावी थी, जिसमें ये माना जाता है कि हमारे सारे के सारे नेता चोर हैं, सारी की सारी पार्टियाँ बेईमान हैं। जबकि हमारी नौकरशाही बड़ी ईमानदार और कर्तव्यपरायण है।

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Modi Manmohan Sonia
A file photo of Prime Minister Narendra Modi (centre) with his predecessor Manmohan Singh

2जी का फ़ैसला आने के बाद सोची-समझी साज़िश के तहत देश में ये दुष्प्रचार फ़ैलाया जा रहा है कि ‘घोटाला तो हुआ है, भले ही वो कोर्ट में साबित नहीं हो सका!’ इसके पीछे ये दलील भी दी जा रही है कि ‘यदि घोटाला नहीं हुआ होता तो 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने सारे 2जी लाइसेंसों को क्यों रद्द किया होता!’ ये दलील भी उछाली जा रही है कि क्या ट्रायल कोर्ट का दर्जा सुप्रीम कोर्ट से बड़ा हो गया है? जब सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि आबंटन ग़लत हुआ तो फिर वो घोटाला नहीं और क्या था? मज़े की बात ये है कि इस दलील को हवा देने वाले पहले राजनीतिक शख़्स, देश के वित्तमंत्री और जाने-माने न्यायविद् अरूण जेटली हैं! जेटली के बयान से ही भगवा ट्रोल्स नये झूठ को फ़ैलाने का सिग्नल मिल गया। लेकिन मज़े की बात तो ये है कि यदि तथ्यों और तर्कों के आईने में देखें तो ये समझना मुश्किल नहीं है कि जेटली का बयान ‘खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे’ के सिवाय और कुछ नहीं था!

सबसे पहले ये जान लीजिए कि 2जी की जाँच जिस सीबीआई ने की, वो देश की सर्वोच्च, सबसे सुविधा सम्पन्न और सबसे क़ाबिल जाँच एजेंसी मानी जाती है। कोई उसे ‘पिंजड़े में बन्द तोता’ भले ही कहे, लेकिन इससे सीबीआई की हस्ती और हैसियत नहीं बदलती! सीबीआई में भी 2G मामले की जाँच को सबसे होशियार लोगों की टीम के हवाले किया गया था। भले ही ये होशियार अव्वल दर्जे के निक्कमे साबित हुए! इतना ही नहीं, सीबीआई जाँच की निगरानी भी ख़ुद वही सुप्रीम कोर्ट कर रहा था, जिसने 2जी लाइसेंसों को रद्द किया था। इसके अलावा, सीबीआई के वकील या सरकारी वकील यानी अभियोजक भी बेहद क़ाबिल और अनुभवी थे, कोई नौसिखिया या अनाड़ी नहीं! पिछले साढ़े तीन साल से ये सभी लोग उस मोदी सरकार के मातहत रहे हैं, जिसका दावा है कि वो आज़ाद भारत की सबसे ईमानदार और पारदर्शी सरकार है! लिहाज़ा, ये कैसे मान लिया जाए कि सारे श्रेष्ठ-संयोगों के बावजूद 2जी मामले की जाँच करने, सबूत जुटाने और आरोपियों को अदालत में दोषी साबित करने में ज़रा भी कोताही हुई होगी? साफ़ है कि तमाम श्रेष्ठ-संयोग भी यदि अदालत में घोटाले को घोटाला साबित नहीं कर सके तो सिर्फ़ इसलिए कि वो वास्तव में घोटाला था ही नहीं! घोटाला होता, तभी तो साबित होता! घोटाला होता, तो कौन माई का लाल उसे साबित होने से रोक लेता! अरे, 1.76 लाख करोड़ रुपये की तो छोड़िए, यदि कुछेक लाख रुपये का भी घोटाला हुआ होता तो जज ओ पी सैनी ने उसके लिए ज़िम्मेदारी अपराधी को सज़ा क्यों नहीं दी होती!

अगली बात कि सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2012 में क्यों सारे 2जी लाइसेंसों को रद्द कर दिया था? तो इसके बारे में जस्टिस जी एस सिंघवी ने अख़बार इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि “उनकी बेंच के फ़ैसले को पूरा पढ़ा जाना चाहिए। ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले का ये अर्थ नहीं है कि कोई मामला ही नहीं बनता था, बल्कि उसका कहना है कि अभियोजन आरोपों को साबित नहीं कर सका।” जस्टिस सिंघवी आगे कहते हैं कि “फौज़दारी क़ानून में दो पहलू होते हैं। पहला, कोई मामला नहीं बनता और दूसरा, कोई सबूत नहीं है। इस मामले में प्रेस रिपोर्ट्स के मुताबिक़, कोई सबूत नहीं था। यदि किसी ने कोई अपराध किया है, लेकिन अदालत में उसे साबित करने के लिए सबूत नहीं पेश किये जा सके, तो उसे सज़ा नहीं दी जा सकती।” यानी, जस्टिस सिंघवी को अब भी ये लगता है कि घोटाला तो था, भले सीबीआई, सीएजी और मोदी सरकार उसे अदालत में साबित नहीं कर पायी! ये तर्क कम और ज़िद ज़्यादा है!

फरवरी 2012 में अपने फ़ैसले में जस्टिस सिंघवी और जस्टिस ए के गाँगुली की खंडपीठ ने लिखा था, “सितम्बर 2007 और मार्च 2008 के दौरान संचार मंत्री की अगुवाई में उनके मातहत अफ़सरों ने जो फ़ैसले लिये वो पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध थे।” जस्टिस सिंघवी ने आगे कहा कि “सुप्रीम कोर्ट के सामने मुद्दा बिल्कुल अलग था। सुप्रीम कोर्ट को स्पेक्ट्रम आबंटन प्रक्रिया की क़ानून वैधता का परीक्षण करना था, जबकि ट्रायल कोर्ट को उसमें निहित अपराध का परीक्षण करना था।” जस्टिस सिंघवी ने ‘ज़ीरो-लॉस थ्योरी’ पर टिप्पणी करने से परहेज़ किया, लेकिन इतना ज़रूर कहा कि “उस वक़्त सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि स्पेक्ट्रम की नीलामी से 60 हज़ार करोड़ रुपये मिले हैं।”

आईए ज़रा अब ये भी समझते चलें कि 2012 के सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में जब ये कहा गया कि स्पेक्ट्रम आबंटन का काम ‘पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध’ था, तब इनमें से किसी भी बात का ‘अदालत में परीक्षण’ नहीं हुआ था। ‘अदालत में परीक्षण’ भी बाक़ायदा एक क़ानूनी प्रक्रिया है। किसी भी आरोप को सिर्फ़ ट्रायल कोर्ट में ही परखा जाता है, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में नहीं। यही हमारे देश का विधान है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में तो सिर्फ़ ये परखा जाता है कि क्या ट्रायल कोर्ट और फिर हाईकोर्ट में क़ानून और उसकी प्रक्रिया का सही पालन हुआ है या नहीं। इसीलिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को अपीलीय अदालत कहा जाता है।

2जी मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले ने सुप्रीम कोर्ट और मोदी सरकार की उन धारणाओं को भी ग़लत साबित कर दिया, जिसमें ये माना गया कि स्पेक्ट्रम आबंटन की नीति ग़लत थी। स्पेक्ट्रम जैसी किसी भी सीमित चीज़ के आबंटन का दो तरीक़ा हो सकता है। पहला, तय दाम पर बेचना-ख़रीदना और दूसरा, उसे नीलामी के ज़रिये बेचना। जब चीज़ सीमित होती है तो उसे ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति या नियम से भी जोड़ा जाता है। जैसे रेलवे, ट्रेन के टिकट को ‘पहले आओ पहले पाओ’ के नियम से ही बेचती है, नीलामी से नहीं। अब यदि सीएजी या सुप्रीम कोर्ट या विपक्ष ये कहने लगे कि ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति ग़लत है क्योंकि नीलामी से टिकट बेचने पर रेलवे को कहीं ज़्यादा आमदनी होगी, तो इससे तय दाम पर बेचने की नीति ग़लत साबित नहीं हो सकती!

ऐसे में क्या आपको ये नहीं लगेगा कि टिकट बेचने की नीति को तय करना रेलवे या सरकार का काम है! सीएजी या सुप्रीम कोर्ट इसमें दख़ल नहीं दे सकते। लेकिन यदि नौकरशाही ने ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति को लागू करने में घपला किया है तो मामला ज़रूर अदालत में जा सकता है। अदालत ये तय करेगी कि घपला हुआ भी है या नहीं, और यदि हुआ तो उसके लिए कौन ज़िम्मेदार है तथा क़सूरवार की सज़ा क्या होनी चाहिए? यहाँ ग़ौर करने की बात ये भी है कि अदालत को सज़ा या अपना फ़ैसला सुनाते वक़्त उसके प्रभाव को भी ध्यान में रखना चाहिए।

ज़रा सोचिए कि रेलवे के टिकटों को बेचने में यदि कोई घपला हुआ है तो क्या सुप्रीम कोर्ट को ये फ़ैसला सुनाने का हक़ हो सकता कि ‘बिके हुए सारे टिकट रद्द किये जाते हैं, क्योंकि सीएजी को लगता है कि टिकटों की नीलामी होनी चाहिए। और, यहाँ तक कि जब से टिकटों की नीलामी शुरू हुई है, तब से रेलवे की आमदनी लाखों-करोड़ों गुना बढ़ गयी है!’ सुप्रीम कोर्ट को ये भी सोचना पड़ेगा कि क्या कुछ लोगों के क़सूर की सज़ा हरेक रेल यात्री को देना मुनासिब होगा? क्या ज़ुर्माना वग़ैरह लगाने का भी कोई और विकल्प सम्भव है? क्योंकि ज़ुर्माना भी तो अपने आप में एक सज़ा है। वैसे भी देश में क़सूर के अनुपात में ही सज़ा देने का विधान है। यहाँ चींटी या ख़रगोश या शेर को मारने के लिए तोप चलाने का रिवाज़ नहीं है। यहाँ बड़ी से बड़ी चोरी करने वाले को भी सज़ा-ए-मौत नहीं दी जाती!

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? उसने एक झटके में सारे लाइसेंस रद्द कर दिये। जिसने आम जनता को कॉल ड्रॉप और धीमी इंटरनेट स्पीड की ऐसी समस्या सौग़ात में दी, जिससे हमारा टेलीकॉम सेक्टर आज तक नहीं उबर पाया है। उल्टा आगा-पीछा सोचे बग़ैर सुनाये गये सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले की वजह से लाइसेंस पाने वाली कम्पनियों की भारी-भरकम रक़म डूब गयी, जो उन्होंने से बैंकों से क़र्ज़ लेकर निवेश किया था। इससे जहाँ एक ओर सुरक्षित निवेश के लिहाज़ से दुनियाभर में भारत की साख़ गिरी, वहीं भारतीय बैंकों पर एनपीए (डूबा क़र्ज़) ऐसी गाज़ गिरी कि आज सिर्फ़ टेलीकॉम सेक्टर का एनपीए ही 5 लाख करोड़ रुपये से ऊपर जा पहुँचा है। ये देश के कुल एनपीए के आधे से भी अधिक है! लाइसेंस रद्द होने के बाद नीलामी की जिन क़ीमतों पर टेलीकॉम कम्पनियों को स्पेक्ट्रम ख़रीदकर अपनी जान बचानी पड़ी वो देखते ही देखते बीमार बन गयीं। क्योंकि वो इतना नहीं कमा पा रही हैं कि बैंकों से लिये गये भारी क़र्ज़ की क़िस्ते भर सकें। टेलीकॉम सेक्टर का विस्तार रूक गया। 50 हज़ार से ज़्यादा लोगों की रोज़ी-रोटी जाती रही!

लगे हाथ ये कल्पना करके भी देखिए कि यदि विपक्ष इस बात पर हाय-तौबा करने लगे कि रेल के टिकटों को ‘पहले आओ पहले पाओ’ की नीति के मुताबिक़ बेचकर सरकार घोटाला कर रही है, क्योंकि यदि इन्हें नीलामी से बेचा जाता तो रेलवे मालामाल हो जाती, तो क्या इससे नीलामी की नीति सही साबित हो सकती है! यहीं मज़े की बात ये भी रही कि विपक्ष के दुष्प्रचार की वजह से आम जनता ही नहीं, आला सरकारी संस्थाओं में बैठे लोग भी ये धारणा बना बैठे कि घोटाला तो हो ही रहा था! अलबत्ता, जाँच से घोटाला इसलिए साबित नहीं हुआ क्योंकि सबूत नहीं मिले! इसका मतलब तो हुआ कि यदि कल को बीजेपी ये कहने लगे कि आप हत्यारे हैं, बलात्कारी हैं, राष्ट्रद्रोही हैं, आतंकी हैं तो आपको ये सब मान लिया जाएगा! भले ही इसका कोई सबूत नहीं हो। इसे ही चरित्रहनन कहते हैं। लिहाज़ा, कल्पना कीजिए कि हमारे समाज और लोकतंत्र के लिए चरित्रहनन का ऐसा हठकंडा कितना विनाशकारी साबित हो सकता है!

इसी तरह, 2जी मामले में ट्रायल कोर्ट को यही तो तय करना था कि जिस सरकारी प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट, सीएजी और बीजेपी ‘पूरी तरह से मनमानीपूर्ण, सनक-भरा, जनहित-विरोधी और समानता के सिद्धान्त के विरूद्ध’ बताती रही है, क्या वो वास्तव में ऐसी ही है भी या नहीं। किसी भी आरोप की सच्चाई को तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट में अभियोजन पक्ष को वो सारे सबूत रखने होते हैं, जिनसे आरोप साबित हों। इसीलिए यदि अदालत में आरोप साबित नहीं हुए तो ताल ठोंककर कहा जाएगा कि आरोप झूठे थे, मनगढ़न्त थे, राजनीतिक द्वेष और दुर्भावना से प्रेरित थे। ध्यान रहे कि आरोपियों को बेक़सूर पाने पर ही अदालतें उन्हें बाइज़्ज़त बरी करती हैं। वर्ना, यदि अदालत को लगता है कि आरोपों में आंशिक सच्चाई है तो भी आरोपी को अपराधी ही करार दिया जाता है। हालाँकि, उसकी सज़ा, उसके अपराधों के अनुपात में होती है। 2जी मामले में सारे के सारे आरोपी का बाइज़्ज़त बरी हो जाना, निश्चित रूप से ये साबित करता है कि 1.76 लाख करोड़ रुपये का कथित घोटाला महज़ एक बुलबुला था, जो अब फूट चुका है!

साफ़ है कि बीजेपी के दुष्प्रचार की वजह से 2012 में हमारे सुप्रीम कोर्ट पर भी ये आम धारणा हावी थी, जिसमें ये मान लिया गया है कि बीजेपी को छोड़कर सारी पार्टियाँ बेईमान हैं। बीजेपी के अलावा अन्य पार्टियों के सारे के सारे नेता चोर हैं, जबकि हमारी नौकरशाही बड़ी ईमानदार और कर्तव्यपरायण है। हालाँकि, ये सच भी किसी से छिपा नहीं है कि हमारे नेताओं से ज़्यादा भ्रष्ट और निक्कमी हमारी नौकरशाही है। नेताओं को तो जनता हर पाँच साल पर आज़माकर जनादेश देती है, लेकिन नौकरशाही तो बेताज बादशाह है। जनता इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। 2जी मामले में भी पूरी तरह से नकारा साबित हुए सीबीआई और सीएजी भी तो हमारी नौकरशाही का ही हिस्सा हैं। इनका बाल तक बाँका नहीं होगा!

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