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खोखली है मोदी की अर्थ-नीति

बैंकों का 11 प्रतिशत क़र्ज़ा डूब चुका है। इससे क़र्ज़ पाना मुश्किल हो गया है। माँग में कमी होने की वजह से क़र्ज़ लेने की गतिविधि का बुरी तरह से प्रभावित होना बेहद चिन्ताजनक है। बेरोज़गारी की भरमार है। हर साल रोज़गार की चाहत रखने वालों की संख्या में 1.2 करोड़ लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है। लेकिन साल 2015 में जहाँ 1.35 लाख लोगों को रोज़गार मिला, वहीं 2016 में रोज़गार पाने वालों की तादाद सिर्फ़ 2.31 लाख रहा।

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भारत में तीन साल से सूखा है। उम्मीदों का मॉनसून बहुत दूर है। लेकिन अभी सपने मरे नहीं हैं। हमारे लोकतंत्र की मौजूदा तस्वीर कुछ ऐसी ही है! मोदी सरकार नकारा साबित हुई है। इसे ग़लतफ़हमी है कि इसने काले धन की अर्थव्यवस्था पर करारा हमला किया है। इसे लगता है कि दुनिया में भारतीय अर्थव्यवस्था की 7.1 फ़ीसदी वाली विकास दर सबसे तेज़ है। सरकारी निवेश में उछाल की वजह से रोज़गार के अवसर पैदा हो रहे हैं। सरकार समझ रही है कि विदेशी निवेश में इज़ाफ़ा ये बता रहा है कि भारत की विकास यात्रा में निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है। आर्थिक सुधारों ने कारोबार को आसान बना दिया है।

जीएसटी पर आम सहमति बनाने के लिए पिछली सरकार भले ही बहुत तरसी हो, लेकिन इस सरकार को उसमें दिक्कत नहीं हुई। अब इसे 1 जुलाई से लागू होना है। शेयर बाज़ार का सूचकांक ‘सेंसेक्स’ अपने रिकॉर्ड स्तर पर है। ये सब कुछ इसलिए हो पा रहा है कि क्योंकि नोस्त्रादामस की भविष्यवाणी के मुताबिक़, नरेन्द्र मोदी, भारत की तस्वीर बदल रहे हैं! बहरहाल, आइए, अब ऐसे सभी दावों की सच्चाई को ज़रा परखकर देख लिया जाए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर को नोटबन्दी का ऐलान किया। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था में मौजूद 86 फ़ीसदी मुद्रा अचानक अवैध बन गयी जो 500 और 1000 रुपये के रूप में प्रचलित थी। इसे काले धन पर हुए सर्ज़िकल हमले की पेश किया गया। लेकिन ये अपने मकसद को हासिल करने में पूरी तरह से विफल साबित हुआ, क्योंकि काला धन, रियल एस्टेट या सोना या विदेश भेजने जैसे काम में ख़प गया। याद रहे कि अर्थव्यवस्था में क़रीब 5 फ़ीसदी काला धन ही चलन में रहता है। इसीलिए कालेधन को बैंकों में जमा करने और निकालने वाले दलालों के लिए नोटबन्दी, एक देवदूत बनकर आया। अब धीरे-धीरे ‘काला धन’ वापस लौट रहा है। इसे अपनी पूरी शक्ति पाने में भले ही थोड़ा वक़्त लगे, लेकिन काले धन की चुनौती बनी रहेगी। उल्टा नोटबन्दी की सबसे तगड़ी मार ग़रीबों पर पड़ी है। इसी तरह जाली नोट और आतंकवाद को नोटबन्दी से भारी चोट पहुँचाने का दावा भी खोखला ही निकला!

7.1 फ़ीसदी की आर्थिक विकास दर वाला दावा भी सन्देहास्पद है। अभी चौथी तिमाही में विकास दर गिरकर 6.1 फ़ीसदी पर थी। ये भी साबित कर रहा है कि नोटबन्दी ने अर्थव्यवस्था पर कितना प्रतिकूल प्रभाव डाला है। निजी निवेश वाला विकास का इंजन ठंडा पड़ा है। घरेलू बचत की दर गिरकर 30 फ़ीसदी पर जा पहुँची है। जबकि यूपीए सरकार में ये जीडीपी का 35 प्रतिशत थी। जून 2016 तक निर्यात में लगातार 19 महीने तक गिरावट दर्ज़ हुई। आईटी सेक्टर में प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए भारी पुनर्निवेश की ज़रूरत है। हाल ही में चार बड़ी कम्पनियों में हुई कर्मचारियों की छँटनी बता रही है कि आईटी क्षेत्र की सेहत कैसी है?

बैंकों का 11 प्रतिशत क़र्ज़ा डूब चुका है। इससे क़र्ज़ पाना मुश्किल हो गया है। माँग में कमी होने की वजह से क़र्ज़ लेने की गतिविधि का बुरी तरह से प्रभावित होना बेहद चिन्ताजनक है। बेरोज़गारी की भरमार है। हर साल रोज़गार की चाहत रखने वालों की संख्या में 1.2 करोड़ लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है। लेकिन साल 2015 में जहाँ 1.35 लाख लोगों को रोज़गार मिला, वहीं 2016 में रोज़गार पाने वालों की तादाद सिर्फ़ 2.31 लाख रहा।

सरकारी क्षेत्र में ज़रूर नौकरी के कुछ अवसर बने हैं। लेकिन जब तक निजी क्षेत्र में भारी निवेश नहीं होगा तब तक रोज़गार के अवसरों में सन्तोषजनक तेज़ी नहीं लायी जा सकती। आईटी, इलेक्ट्रानिक्स और रक्षा जैसे अर्थव्यवस्था के चुनिन्दा क्षेत्रों में ही विदेश निवेश है। लेकिन इससे खेती-बाड़ी और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े छोटे तथा मझोले उद्योग-धन्धों में रोज़गार नहीं बढ़ता। बुनियादी क्षेत्र यानी कोर सेक्टर में विदेश निवेश के लिए भरोसेमन्द माहौल बनाने के लिए दिसम्बर 2015 में बनाये गये एनआईआईएफ यानी नैशनल इंवेस्टमेंट एंड इंफ्रास्टक्चर फंड ने अभी तक एक भी प्रोजेक्ट में निवेश नहीं किया है। प्रधानमंत्री मोदी को लगता है कि डिजिटाइज़ेशन के बढ़ते प्रभाव को देखकर विदेश निवेशक यहाँ पैसा लगाएँगे। लेकिन सच्चाई तो ये है कि ज़्यादातर भारतीयों की आमदनी 10 हज़ार रुपये महीना से कम है और इसीलिए वो अपना ज़्यादातर लेन-देन बैंकिंग और डिजिटाइज़ेशन के बग़ैर ही करते हैं।

हम जानते हैं कि सेंसेक्स का रिकॉर्ड स्तर ये नहीं बता सकता कि अर्थव्यवस्था की हालत कैसी है? रियल एस्टेट से कोई कमाई हो नहीं रही है, बैंकों से मिलने वाले ब्याज़ की दर बहुत कम है। लिहाज़ा, शेयर बाज़ार में निवेश ही इकलौता विकल्प है। लेकिन सेसेंक्स की ऐसी तेज़ी बहुत जोख़िम भरी है, क्योंकि इसका बुलबुला जब फूटता है तो निवेशकों को भारी चोट पहुँचाती है।

जहाँ तक कारोबार के लिए माकूल माहौल यानी ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ बनाने का ताल्लुक है तो विश्व बैंक ने 190 देशों की फ़ेहरिस्त में भारत को 130 वें स्थान पर बताया है। ज़रा सोचिए कि क्या ऐसी ही तब्दीलियाँ लाने का वादा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में किया था? उनके सपने हमें तब तक बरगलाते रहेंगे जब तक कि नौकरशाही के दाँव-पेंच को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी नियम-क़ायदे और निगरानी तंत्र को नहीं बनाया जाता।

मौजूदा सरकार तो व्यापारियों, कारोबारियों और उद्यमियों को आतंकित करके रखना चाहती है, हमारे टैक्स अधिकारियों की भूमिका फ़िरौती ऐंठने वालों जैसी है, हमारी जाँच एजेंसियाँ ऐसे सरकारी हथकंडों की तरह काम करती हैं जहाँ व्यापार-कारोबार का समृद्ध होना असम्भव है। इसीलिए बिज़नेस का भारत से पलायन हो रहा है। बड़े व्यापारी अब विदेश में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही हक़ीक़त है। ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ अब ख़्याली पुलाव बन चुका है। सुधारों की रफ़्तार बहुत धीमी और मामूली है। बड़े बदलावों का जो सपना दिखाया गया, जो वादे किये गये थे, उन्हें अब भुलाया जा चुका है।

मूलतः जिस जीएसटी (वस्तु और सेवा कर) की कल्पना की गयी है, वो तो अब एक भूत बन चुका है। यदि किसी सुधार की आत्मा ही मर जाए तो फिर उसे लेकर बनी आम सहमति पर जश्न मनाने का कोई तुक़ नहीं हो सकता। बिजली और रियल एस्टेट को जीएसटी के दायरे से बाहर रखना बहुत बड़ी ग़लती थी। मोदी सरकार ने ‘एक देश एक कर’ के पूरे सपने पर ही पानी फेर दिया। देश को ‘एक देश आठ कर’ वाली व्यवस्था दी जा रही है। टैक्स की इतनी सारी दरों से नौकरशाही के झगड़े बढ़ेंगे। बारम्बर रजिस्ट्रेशन करवाने की ज़रूरत से छोटे और मझोले क्षेत्रों की कमर टूट जाएगी।

व्यापारियों की शिकायत है कि जीएसटी को लेकर वित्त मंत्री अनावश्यक हड़बड़ी में हैं। वो चाहते हैं कि तैयारियों के पूरा होने तक इसे टाल दिया जाए। कई राज्य सरकारों का भी यही नज़रिया है। लेकिन जीएसटी जैसे ऐतिहासिक क़ानून को जिस तरह के समझौतों के साथ लागू किया जा रहा है, उसने इसकी सारी चमक पर ही बट्टा लगा दिया है। कुलमिलाकर, अर्थव्यवस्था भारी दबाव में है। शायद, मोदी के प्रशंसकों को ठीक से पता नहीं है कि नोस्त्रादामस की भविष्यवाणी का मतलब क्या है?

By : Kapil Sibal

(The writer, a senior Congress leader, is former Union Law Minister and a lawyer)

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ओपिनियन

राहुल गांधी कर सकते हैं मप्र में मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा : कमलनाथ

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kamal nath

नई दिल्ली, 7 मई | मध्यप्रदेश कांग्रेस के नए अध्यक्ष कमलनाथ का कहना कि पार्टी में चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करने की परंपरा नहीं है। मगर, जरूरत पड़ी तो पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर सकते हैं।

कमलनाथ ने कहा कि मध्यप्रदेश के लोग शिवराज सिंह चौहान की सरकार की ‘ठगी’ से नाराज हैं और कांग्रेस ने इस साल के आखिर में राज्य में होने वाले विधानसभा चुनाव में उन्हें हराने के लिए कमर कस ली है।

उन्होंने आईएएनएस से बातचीत में कहा, “बेशक, समय कम है मगर मुझे पक्का विश्वास है कि मैं गांव स्तर पर पार्टी के संगठन को मजबूत बनाने में सक्षम साबित होऊंगा। यह मुकाबला भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की संगठन-शक्ति व पैसे की ताकत के साथ है।”

कांग्रेस के 71 वर्षीय वरिष्ठ नेता और छिंदवाड़ा से सांसद कमलनाथ नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। उन्होंने कहा कि आगामी चुनाव के मद्देनजर पार्टी की प्रदेश इकाई में बदलाव संबंधी फैसला बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था। लेकिन वह अब बीती बातों पर नुक्ताचीनी नहीं करना चाहते कि इस संबंध में फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया।

पूर्व केंद्रीय मंत्री कमलनाथ को 26 अप्रैल को मध्यप्रदेश कांग्रेस की प्रदेश इकाई का अध्यक्ष बनाया गया। उन्होंने कहा कि उनका कोई गुट नहीं है और पार्टी के सभी नेताओं से उनके अच्छे रिश्ते हैं।

कमलनाथ की बातों से जाहिर होता है कि विधानसभा चुनाव में खुद उतरने को लेकर उन्होंने अपना विकल्प खुला रखा है। उन्होंने कहा, “मैं 40 साल से चुनाव लड़ता आ रहा हूं। बतौर सांसद मेरा सेवाकाल सबसे लंबा रहा है।”

जब पूछा गया कि क्या ज्योतिरादित्य सिंधिया विधानसभा चुनाव मैदान में उतरेंगे तो उन्होंने कहा, “मुझे नहीं मालूम।”

मध्यप्रदेश में कांग्रेस द्वारा मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं किए जाने और सिंधिया को चुनाव अभियान समिति का प्रमुख नियुक्त कर संतुलन कायम किए जाने के संबंध में पूछे गए सवालों पर कमलनाथ ने कहा, “मध्यप्रदेश एक बड़ा राज्य है और यहां कोई एक शख्स चुनाव नहीं जीत सकता। आपको कई चेहरों की जरूरत होती है। यही कारण है कि पार्टी ने ऐसा फैसला लिया है।”

जब पूछा गया कि क्या वह चाहेंगे कि पार्टी मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा करे तो उन्होंने कहा कि हर राज्य के लिए अगल रणनीति होती है।

कमलनाथ ने कहा, “कभी-कभी यह जरूरी होता है, जबकि कभी इसकी जरूरत नहीं होती। क्या भाजपा ने उत्तर प्रदेश में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था? क्या उन्होंने उत्तराखंड में किसी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया? उनका कभी कोई मुख्यमंत्री उम्मीदवार (चुनाव से पूर्व) नहीं था। इसलिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।”

कमलनाथ ने इससे पहले अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि पार्टी को हर राज्य में बताना चाहिए कि वहां उसका नेता कौन है। इसका जिक्र करने पर उन्होंने कहा, “अगर जरूरत महसूस होगी तो कांग्रेस अध्यक्ष किसी के नाम की घोषणा करेंगे।”

कमलनाथ ने कहा कि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख के तौर पर उनकी प्राथमिकता पार्टी को गांव स्तर पर मजबूत करना होगा। उन्होंने कहा, “चुनाव बहुत मायने में स्थानीय बन गया है और हमें यह समझना होगा।”

कांग्रेस को मध्यप्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखना पड़ा है। कमलनाथ का आरोप है कि भाजपा पूर्व में किए अपने वादों को पूरा करने में विफल रही है।

पार्टी के प्रदेश प्रमुख के तौर पर अपनी नियुक्ति के संबंध मे कमलनाथ ने कहा, “मेरे सभी से अच्छे रिश्ते हैं। इसलिए मेरे लिए पार्टी में एकता लाना कोई चुनौती नहीं है। मैं भाग्यशाली हूं कि इसकी कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि पार्टी में पहले से ही एकता है।” उन्होंने पार्टी में सिंधिया के साथ किसी भी प्रकार के मतभेद से इनकार किया।

कमलनाथ ने कहा कि उनका मुकाबला अभी वर्तमान मुख्यमंत्री शिवराज से है।

–आईएएनएस

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ओपिनियन

मोदी राज की सबसे ग़ैर-मामूली घटना है ‘रेपिस्ट समर्थक मंत्री बनो’ योजना…!

अभी तो संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से तो ये यक्ष-प्रश्न उछाला ही नहीं गया है कि काँग्रेस के ज़माने में कितने बलात्कार और हत्याएँ होती थीं! राहुल गाँधी पहले अपनी चार पीढ़ियों के राज में हुए रेप का ब्यौरा दें, फिर उनके कैंडल-मार्च को गम्भीरता से लेने पर विचार किया जा सकता है!

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Deputy CM Kavinder Gupta

‘कठुआ रेप एंड मर्डर मामूली घटना है!’ और ‘इतने बड़े देश में कठुआ और उन्नाव जैसी घटनाएँ होती रहती हैं! इसे लेकर बात का बतंगड़ नहीं बनाना चाहिए!’ ये दोनों बयान बीजेपी के दो वरिष्ठ नेताओं के हैं। ‘मामूली घटना’ बताने वाले कविन्द्र गुप्ता को जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री का ताज मिला है तो ‘बतंगड़’ सिद्धान्त के प्रतिपादक और परम विद्वान सन्तोष गंगवार, मोदी सरकार में राज्यमंत्री के आसान पर शोभायमान हैं!

यदि इतना पढ़कर आप क्रोधित हो रहे हों, जो ज़रा ये भी जान लीजिए कि इन दोनों और लाखों भक्तों के गुरु घंटाल श्रीमान नरेन्द्र मोदी जी उर्फ़ प्रधानमंत्री सेवक उर्फ़ माननीय चौकीदार महाशय उर्फ़ ज़नाब नसीबवाला साहब का तो मानना है कि ‘कठुआ रेप को लेकर आरोप-प्रत्यारोप नहीं होना चाहिए!’ जन्म-जन्मान्तर से ‘आरोप-प्रत्यारोप’ से बचते आये मितभाषी मोदी तो कठुआ रेप एंड मर्डर से इस क़दर सदमे में जा डूबे थे कि भारत में प्रवास के दौरान उसके मुँह से रविशंकर प्रसाद की शैली में ‘कड़ी भर्त्सना’ का बोल तक नहीं फूट सका!

वो तो भला हो मोदी जी की विदेश यात्रा का, जिसमें साफ़ और ताज़ा हवा के सेवन के बाद उनकी सुध-बुध वापस लौट पायी। तब कहीं जाकर लन्दन में वो बोल पाये कि ‘एक बेटी के साथ अत्याचार कैसे सहन कर सकते हैं! मैंने लाल क़िले से कहा था कि बेटियों से सवाल करने वाले बेटों से सवाल क्यों नहीं करते? बेटी के साथ जघन्य अपराध करने वाला भी तो, किसी का बेटा ही होता है!’

अब देश की आदत तो रही ही नहीं कि वो अपने नेता की किसी पते की बात पर ग़ौर करे और द्रवित हो। क्योंकि जब रात-दिन जुमलों की फेंका-फेंकी ही होती रहेगी तो काम की बात को पकड़ना, हर किसी के लिए मुश्किल ही होता जाएगा। बहरहाल, जनता ने जब अपने लफ़्फ़ाज़ चौकीदार की बातें नहीं सुनी तो उसने उस लाल क़िले की ही पहचान बदल देने का फ़ैसला ले लिया जहाँ से उसने जनता को अपनी आँखें खोलने का सन्देश दिया था। लाल क़िले को अब डालमिया समूह के हवाले करने के पीछे की सबसे बड़ी वजह यही है।

इससे पहले अत्यन्त बहादुरी दिखाते हुए 56 इंची वाले के चेलों ने अध्यादेश लाकर उस POSCO क़ानून को बदल दिया, जिसका कठुआ कांड पर कोई असर नहीं पड़ सकता। क्योंकि आपराधिक दंड विधान के मुताबिक़, किसी भी अपराध की सज़ा को किसी भी पिछली तारीख़ से प्रभावी नहीं किया जा सकता। ज़ाहिर है कि जब अगली ‘मामूली घटना’ यानी किसी मासूम के साथ रेप होगा तो नये अध्यादेश के मुताबिक़, मुक़दमा चलाया जाएगा, वो भी तब यदि रेपिस्टों के समर्थन में संघियों ने तिरंगा चमकाकर रैलियाँ नहीं निकाली तो…!

बाक़ी, यदि रेप में ‘आरोप-प्रत्यारोप’ और ‘बतंगड़’ बनाने की गुँजाइश हुई तो आसाराम और गुरमीत राम रहीम फ़ार्मूले का इस्तेमाल किया जाएगा! वो भी तभी जब विजय रुपाणी वाले नारद जी, त्रिपुरा के परम प्रतापी मुख्यमंत्री बिप्लव देब के कान में ज्ञान-मंत्र फूँकेंगे कि इंटरनेट से पता चला है कि महाभारत काल में राजकुमारी द्रौपदी का जब भरे राज दरबार चीरहरण हो सकता है तो देश की आम महिलाओं की बिसात ही क्या है!

अभी तो संघ प्रमुख मोहन भागवत की ओर से तो ये यक्ष-प्रश्न उछाला ही नहीं गया है कि काँग्रेस के ज़माने में कितने बलात्कार और हत्याएँ होती थीं! राहुल गाँधी पहले अपनी चार पीढ़ियों के राज में हुए रेप का ब्यौरा दें, फिर उनके कैंडल-मार्च को गम्भीरता से लेने पर विचार किया जा सकता है! इतना ही नहीं, ममता बनर्जी भी पहले ये साफ़ करें कि पश्चिम बंगाल में होने वाले रेप की रोकथाम में वो सफल क्यों नहीं हुई?

जब तक इन सवालों का जबाब देश के सामने नहीं होगा, तब तक पेट्रोल-डीज़ल का दाम कुलाँचे भरता रहेगा, नोटबन्दी में बन्द हुए 1000/500 के नोट गिने ही जाते रहेंगे, ‘विकास’ नज़रबन्द ही रहेगा, कालाधन भूमिगत ही रहेगा, दलितों पर अत्याचार जारी रहेंगे, बेरोज़गारों की फौज़ बढ़ती रहेगी, जजों की रहस्यमय मौत होती रहेगी, नीरव-चोकसी-माल्या-ललित देश को लूटकर फ़ुर्र होते रहेंगे, सुप्रीम कोर्ट के जज ख़तरे में फँसे लोकतंत्र को बचाने की दुहाई देते रहेंगे, अविश्वास प्रस्ताव की गरिमा तार-तार होती रहेगी, चीन और पाकिस्तान के साथ बग़ैर एजेंडा वाली शिखर बैठकें होती रहेंगी! जनता के ख़ून-पसीने की कमाई पर सैर-सपाटा होता रहेगा! अर्थव्यवस्था, आईसीयू में कोमा में पड़ी रहेगी! क्योंकि ये सब तो रेप से कहीं अधिक ‘मामूली’ हैं!

एक बात और गाँठ बाँध लीजिए कि जम्मू-कश्मीर के नवनियुक्त उपमुख्यमंत्री को शपथ लेते ही कठुआ रेप एंड मर्डर कांड के ‘मामूली’ होने का दिव्य ज्ञान यूँ ही नहीं प्राप्त हो गया! ऐसा मोदी राज की चमत्कारी ‘रेपिस्ट समर्थक मंत्री बनो’ योजना के सफल क्रियान्वयन की वजह से ही हो पाया है!

दरअसल, बीजेपी बुनियादी तौर पर एक चमत्कारी पार्टी रही है। लेकिन मोदी राज में तो तक़रीबन रोज़ाना ही कोई न चमत्कार होता है! बीजेपी का ताज़ा चमत्कार ये है कि रेपिस्टों के समर्थन में तिरंगा चमकाओ, रैली निकालो और मंत्री पद पाओ!

तभी तो जम्मू-कश्मीर की महबूबा मुफ़्ती सरकार में बीजेपी के कोटे से मंत्री बनाये गये लोगों में वो विधायक भी शामिल है जिसने कठुआ रेप और हत्याकांड के आरोपियों के समर्थन में ज़ोरदार प्रदर्शन किया था।

जम्मू-कश्मीर सरकार तो पूरी की पूरी चमत्कारों से भरी पड़ी है। सबसे बड़ा और बुनियादी चमत्कार तो वहाँ का गठबन्धन है। एक ओर उत्कट राष्ट्रवादी पार्टी बीजेपी जिसकी नीति है, रेपिस्टों का समर्थन तो दूसरी तरफ़ है पीडीपी, जो अलगाववादियों का समर्थन करके गौरवान्वित होती रही है!

ऐसे चमत्कार को ही शास्त्रों में ‘एक ही घाट पर शेर और बकरी के पानी पीने’ की उपमा दी गयी है! ऐसा चमत्कार सिर्फ़ इसलिए मुमकिन हो पाता है कि बीजेपी हो या पीडीपी, दोनों का एजेंडा साफ़ है कि उसूल सिर्फ़ विरोधियों के लिए होने चाहिए, हमें तो हर हाल में सत्ता चाहिए!

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

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ओपिनियन

अंबेडकर ने नहीं सीखा था अन्याय के आगे झुकना

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Bhim-Rao-Ambedkar

कबीरपंथी परिवार में जन्मे डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी 127वीं जयंती के मौके पर भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना संविधान के निर्माण के बाद और दलितों के संघर्ष के दौरान थे। दलितों और पिछड़ों को वोट बैंक समझने वाले सभी दल आज अंबेडकर को अपना मार्गदर्शक और प्रेरणा पुंज कहते नहीं अघाते हैं।

अंबेडकर के नाम पर कसमें खाई जाती हैं, आंदोलन किए जाते हैं और यह संदेश देने की पुरजोर कोशिशें की जाती हैं कि दलितों का सबसे बड़ा सिपहसालार कौन है। लेकिन यह भी हकीकत है कि राजनीति के मौजूदा बदले हुए तेवर में अगर वाकई कोई पीछे छूटता जा रहा है तो वह है सिर्फ और सिर्फ भीमराव अंबेडकर।

विलक्षण प्रतिभा के धनी भीमराव बेहद निर्भीक थे। वे न चुनौतियों से डरते थे, न झुकते थे। लड़ाकू और हठी अंबेडकर ने अन्याय के आगे झुकना तो जैसे सीखा ही न था।

14 अप्रैल, 1891 को तत्कालीन ब्रिटिश भारत के केंद्रीय प्रांत (मध्य प्रदेश) के इंदौर के पास महू नगर की छावनी में एक महार परिवार में माता-पिता की 14वीं संतान के रूप में जन्मे भीमराव के पिता की मृत्यु बालपन में ही हो गई थी। 1897 में बॉम्बे के एलफिन्सटोन हाईस्कूल में पहले अस्पृश्य के रूप में दाखिला लेकर 1907 में मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई के दौरान ही 15 साल की उम्र में 1906 में 9 साल की रमाबाई से इनकी शादी हुई।

अंबेडकर ने अर्थशास्त्र और राजनीति शास्त्र में डिग्री हासिल की। हिंदू धर्म में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव और छुआछूत से दुखी होकर उन्होंने इसके खिलाफ संघर्ष भी किया, लेकिन विशेष सफलता न मिलने पर इस धर्म को ही त्याग दिया। 14 अक्टूबर, 1956 को उन्होंने लाखों दलितों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। यह क्रम निरंतर जारी है।

कहा जाता है कि दलित मुद्दों पर अंबेडकर के गांधीजी से मतभेद रहे हैं। पत्रिका ‘हरिजन’ के 18 जुलाई, 1936 के अंक में अंबेडकर के ‘एनिहिलेशन ऑफ कास्ट’ की समीक्षा में गांधीजी ने जोर दिया था कि हर किसी को अपना पैतृक पेशा जरूर मानना चाहिए, जिससे अधिकार ही नहीं, कर्तव्यों का भी बोध हो। यह सच्चाई है कि ब्रिटिश शासन के डेढ़ सौ वर्षों में भी अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई थी, जिससे अंबेडकर आहत थे।

लेकिन धुन के पक्के अंबेडकर ने गोलमेज कॉन्फ्रें स में जो तर्क रखे, वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार तक को उनके सामने झुकना पड़ा और 1932 में ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तात्कालिक योजना की घोषणा की जिसे कम्युनल अवार्ड के नाम से जाना गया। इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दोहरा अधिकार मिला। पहला यह कि वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे और दूसरे में दो वोटों का अधिकार मिला। एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए। इसके बाद बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर का कद समाज में काफी ऊंचा हो गया।

उनकी अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग का गांधीजी ने पुरजोर विरोध कर एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। उनकी दलील थी कि इससे हिंदू समाज बिखर जाएगा, लेकिन जब अंबेडकर जीत गए तो गांधीजी ने पूना पैक्ट (समझौता) पर दस्तखत के लिए उन्हें मजबूर कर दिया और आमरण अनशन पर चले गए।

गांधीजी की बिगड़ती तबीयत और उससे बढ़ते दबाव के चलते अंबेडकर 24 सितंबर, 1932 की शाम येरवदा जेल पहुंचे, जहां पर दोनों के बीच समझौता हुआ। इसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। समझौते के तहत डॉ. अंबेडकर ने दलितों को कम्युनल अवार्ड में मिले पृथक निर्वाचन के अधिकार को छोड़ने की घोषणा की, लेकिन इसी में 78 आरक्षित सीटों को बढ़ाकर 148 करवाया। साथ ही अस्पृश्य लोगों के लिए हर प्रांत में शिक्षा अनुदान के लिए पर्याप्त रकम की व्यवस्था के साथ नौकरियों में बिना किसी भेदभाव के दलित वर्ग के लोगों की भर्ती को सुनिश्चित कराया।

उन्हें हालांकि इसके क्रियान्वयन की चिंता थी, तभी तो 25 सितंबर 1932 को बंबई में सवर्ण हिंदुओं की बहुत बड़ी सभा में अंबेडकर ने कहा, “हमारी एक ही चिंता है, क्या हिंदुओं की भावी पीढ़ियां इस समझौते का अनुपालन करेंगी?” इस पर सभी सवर्ण हिंदुओं ने एक स्वर में कहा था कि करेंगे।

डॉ. अंबेडकर ने यह भी कहा था, “हम देखते हैं कि दुर्भाग्यवश हिंदू संप्रदाय एक संघटित समूह नहीं है, बल्कि विभिन्न संप्रदायों का फेडरेशन है। मैं आशा और विश्वास करता हूं कि आप अपनी तरफ से इस अभिलेख को पवित्र मानेंगे तथा सम्मानजनक भावना से काम करेंगे।”

लेकिन आज जो हो रहा है, क्या इसी भाव से हो रहा है? कहीं अंबेडकर के नाम पर जोड़-तोड़ की कोशिशें तो कहीं इस कोशिश पर ऐतराज की नई राजनीति शुरू हो गई है। यह सच है कि दलितों के शोषण और अत्याचार का एक सदियों पुराना और लंबा सिलसिला है जो अब भी किसी न किसी रूप में बरकरार है।

गुलाम भारत में अंबेडकर के राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष ने दलितों को जहां राह दिखाई, वहीं आजाद भारत में दलितों के सम्मानजनक स्थान के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया। लेकिन लगता नहीं कि आत्मसम्मान और गरिमा की लड़ाई में दलित समुदाय अब भी अकेला है। अंबेडकर का उपयोग सभी दल करना चाहते हैं।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि स्कूल में पढ़ते समय भीम की प्रतिभा और लगन को देखकर महादेव अंबेडकर नामक ब्राह्मण अध्यापक अपने बेहद प्रिय इस छात्र को दोपहर की छुट्टी के समय अपने भोजन से चावल, दाल, रोटी देते थे। यह अत्यधिक स्नेह ही था जो भीमराव का उपनाम सकपाल घराने के अंबेवाडी गांव के चलते अंबेवाडेकर से बदलकर अपना ब्राह्मण उपनाम अंबेडकर कर दिया, बल्कि स्कूल के रजिस्टर तक में बदल डाला।

इस तरह दलित भीम के नाम के साथ ब्राह्मण अंबेडकर का नाम सदैव के लिए जुड़ गया, लेकिन राजनीति की फितरत देखिए कि भीमराव अंबेडकर के नाम पर राजनीति थमने का नाम नहीं ले रही है, जबकि उनका स्थान शुरू से ही राजनीति से कहीं ऊपर था, है और रहेगा।

By : ऋतुपर्ण दवे

–आईएएनएस

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आगरा-लखनऊ एक्सप्रेसवे पर बढ़ रही हैं दुर्घटनाएं

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स्वास्थ्य6 hours ago

खीरा खाने से होंगे ये फायदे, रहेगा वजन कंट्रोल

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राष्ट्रीय6 hours ago

प्रधानमंत्री मोदी आज रूस होंगे रवाना

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मनोरंजन7 hours ago

अलगाव के बाद पहली बार साथ नजर आए जॉन सीना, निकी बेला

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शहर7 hours ago

उत्तर प्रदेश: 13 पेटी अवैध शराब के साथ 3 तस्कर गिरफ्तार

yashwant sinha
राष्ट्रीय3 days ago

कर्नाटक के नाटक से आहत यशवन्त सिन्हा, राष्ट्रपति भवन के बाहर धरने पर बैठे

HD Deve Gowda
राजनीति1 week ago

देवगौड़ा के गठबंधन वाले बयान से कांग्रेस को फायदा

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ज़रा हटके4 weeks ago

उज्जवला योजना : सिलेंडर मिला, गैस भरवाने के पैसे नहीं

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खेल2 weeks ago

पुलिस-वकील के साथ शमी के घर पहुंचीं हसीन जहां

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चुनाव2 weeks ago

कांग्रेस कर्नाटक में 115-120 सीटें जीतेगी : अहमद पटेल

Kamal Nath Sciendia
ब्लॉग3 weeks ago

मप्र कांग्रेस में अनुभवी और युवा का समन्वय

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चुनाव4 weeks ago

कर्नाटक चुनाव: कांग्रेस ने जारी की स्टार प्रचारकों की लिस्‍ट, अखिलेश और तेजस्‍वी का भी नाम शामिल

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लाइफस्टाइल4 weeks ago

इस गर्मी चटख रंगों के कपड़ों से पाएं आकर्षक लुक

CJI Dipak Misra
ब्लॉग4 weeks ago

अब सुप्रीम कोर्ट ही तय करेगा कि उसके मुखिया पर महाभियोग चलेगा या नहीं?

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ब्लॉग3 weeks ago

ज़रा देखिए तो कि न्यायपालिका के पतन की दुहाई कौन दे रहा है!

yashwant sinha
राष्ट्रीय3 days ago

कर्नाटक के नाटक से आहत यशवन्त सिन्हा, राष्ट्रपति भवन के बाहर धरने पर बैठे

kapil sibal
राजनीति1 week ago

कर्नाटक चुनाव: बीजेपी प्रत्‍याशी श्रीमुलु की उम्‍मीदवारी रद्द करने की कांग्रेस ने EC से की मांग

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राजनीति2 weeks ago

जिन्ना और श्यामा प्रसाद के ज़रिये संजय सिंह का बीजेपी पर करारा हमला

Sona Mohapatra
मनोरंजन3 weeks ago

सोना महापात्रा को छोटे कपड़ों में सूफी गाना गाने पर मिली धमकी

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मनोरंजन4 weeks ago

करीना की फिल्म ‘वीरे दी वेडिंग’ का ट्रेलर लॉन्च

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शहर4 weeks ago

एयर इंडिया के प्लेन में उड़ान के दौरान गिरी खिड़की

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खेल1 month ago

आईपीएल-11: गेल के शतक से पंजाब ने दर्ज की तीसरी जीत

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मनोरंजन1 month ago

नेहा कक्कड़ ने बॉयफ्रेंड हिमांश कोहली को बनाया ‘हमसफर’, देखें वीडियो

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राष्ट्रीय1 month ago

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मनोरंजन1 month ago

आलिया भट्ट की फिल्म ‘Raazi’ का ट्रेलर रिलीज

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