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खोखली है मोदी की अर्थ-नीति

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भारत में तीन साल से सूखा है। उम्मीदों का मॉनसून बहुत दूर है। लेकिन अभी सपने मरे नहीं हैं। हमारे लोकतंत्र की मौजूदा तस्वीर कुछ ऐसी ही है! मोदी सरकार नकारा साबित हुई है। इसे ग़लतफ़हमी है कि इसने काले धन की अर्थव्यवस्था पर करारा हमला किया है। इसे लगता है कि दुनिया में भारतीय अर्थव्यवस्था की 7.1 फ़ीसदी वाली विकास दर सबसे तेज़ है। सरकारी निवेश में उछाल की वजह से रोज़गार के अवसर पैदा हो रहे हैं। सरकार समझ रही है कि विदेशी निवेश में इज़ाफ़ा ये बता रहा है कि भारत की विकास यात्रा में निवेशकों का भरोसा बढ़ रहा है। आर्थिक सुधारों ने कारोबार को आसान बना दिया है।

जीएसटी पर आम सहमति बनाने के लिए पिछली सरकार भले ही बहुत तरसी हो, लेकिन इस सरकार को उसमें दिक्कत नहीं हुई। अब इसे 1 जुलाई से लागू होना है। शेयर बाज़ार का सूचकांक ‘सेंसेक्स’ अपने रिकॉर्ड स्तर पर है। ये सब कुछ इसलिए हो पा रहा है कि क्योंकि नोस्त्रादामस की भविष्यवाणी के मुताबिक़, नरेन्द्र मोदी, भारत की तस्वीर बदल रहे हैं! बहरहाल, आइए, अब ऐसे सभी दावों की सच्चाई को ज़रा परखकर देख लिया जाए।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 8 नवम्बर को नोटबन्दी का ऐलान किया। इसकी वजह से अर्थव्यवस्था में मौजूद 86 फ़ीसदी मुद्रा अचानक अवैध बन गयी जो 500 और 1000 रुपये के रूप में प्रचलित थी। इसे काले धन पर हुए सर्ज़िकल हमले की पेश किया गया। लेकिन ये अपने मकसद को हासिल करने में पूरी तरह से विफल साबित हुआ, क्योंकि काला धन, रियल एस्टेट या सोना या विदेश भेजने जैसे काम में ख़प गया। याद रहे कि अर्थव्यवस्था में क़रीब 5 फ़ीसदी काला धन ही चलन में रहता है। इसीलिए कालेधन को बैंकों में जमा करने और निकालने वाले दलालों के लिए नोटबन्दी, एक देवदूत बनकर आया। अब धीरे-धीरे ‘काला धन’ वापस लौट रहा है। इसे अपनी पूरी शक्ति पाने में भले ही थोड़ा वक़्त लगे, लेकिन काले धन की चुनौती बनी रहेगी। उल्टा नोटबन्दी की सबसे तगड़ी मार ग़रीबों पर पड़ी है। इसी तरह जाली नोट और आतंकवाद को नोटबन्दी से भारी चोट पहुँचाने का दावा भी खोखला ही निकला!

7.1 फ़ीसदी की आर्थिक विकास दर वाला दावा भी सन्देहास्पद है। अभी चौथी तिमाही में विकास दर गिरकर 6.1 फ़ीसदी पर थी। ये भी साबित कर रहा है कि नोटबन्दी ने अर्थव्यवस्था पर कितना प्रतिकूल प्रभाव डाला है। निजी निवेश वाला विकास का इंजन ठंडा पड़ा है। घरेलू बचत की दर गिरकर 30 फ़ीसदी पर जा पहुँची है। जबकि यूपीए सरकार में ये जीडीपी का 35 प्रतिशत थी। जून 2016 तक निर्यात में लगातार 19 महीने तक गिरावट दर्ज़ हुई। आईटी सेक्टर में प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए भारी पुनर्निवेश की ज़रूरत है। हाल ही में चार बड़ी कम्पनियों में हुई कर्मचारियों की छँटनी बता रही है कि आईटी क्षेत्र की सेहत कैसी है?

बैंकों का 11 प्रतिशत क़र्ज़ा डूब चुका है। इससे क़र्ज़ पाना मुश्किल हो गया है। माँग में कमी होने की वजह से क़र्ज़ लेने की गतिविधि का बुरी तरह से प्रभावित होना बेहद चिन्ताजनक है। बेरोज़गारी की भरमार है। हर साल रोज़गार की चाहत रखने वालों की संख्या में 1.2 करोड़ लोगों का इज़ाफ़ा हो रहा है। लेकिन साल 2015 में जहाँ 1.35 लाख लोगों को रोज़गार मिला, वहीं 2016 में रोज़गार पाने वालों की तादाद सिर्फ़ 2.31 लाख रहा।

सरकारी क्षेत्र में ज़रूर नौकरी के कुछ अवसर बने हैं। लेकिन जब तक निजी क्षेत्र में भारी निवेश नहीं होगा तब तक रोज़गार के अवसरों में सन्तोषजनक तेज़ी नहीं लायी जा सकती। आईटी, इलेक्ट्रानिक्स और रक्षा जैसे अर्थव्यवस्था के चुनिन्दा क्षेत्रों में ही विदेश निवेश है। लेकिन इससे खेती-बाड़ी और मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े छोटे तथा मझोले उद्योग-धन्धों में रोज़गार नहीं बढ़ता। बुनियादी क्षेत्र यानी कोर सेक्टर में विदेश निवेश के लिए भरोसेमन्द माहौल बनाने के लिए दिसम्बर 2015 में बनाये गये एनआईआईएफ यानी नैशनल इंवेस्टमेंट एंड इंफ्रास्टक्चर फंड ने अभी तक एक भी प्रोजेक्ट में निवेश नहीं किया है। प्रधानमंत्री मोदी को लगता है कि डिजिटाइज़ेशन के बढ़ते प्रभाव को देखकर विदेश निवेशक यहाँ पैसा लगाएँगे। लेकिन सच्चाई तो ये है कि ज़्यादातर भारतीयों की आमदनी 10 हज़ार रुपये महीना से कम है और इसीलिए वो अपना ज़्यादातर लेन-देन बैंकिंग और डिजिटाइज़ेशन के बग़ैर ही करते हैं।

हम जानते हैं कि सेंसेक्स का रिकॉर्ड स्तर ये नहीं बता सकता कि अर्थव्यवस्था की हालत कैसी है? रियल एस्टेट से कोई कमाई हो नहीं रही है, बैंकों से मिलने वाले ब्याज़ की दर बहुत कम है। लिहाज़ा, शेयर बाज़ार में निवेश ही इकलौता विकल्प है। लेकिन सेसेंक्स की ऐसी तेज़ी बहुत जोख़िम भरी है, क्योंकि इसका बुलबुला जब फूटता है तो निवेशकों को भारी चोट पहुँचाती है।

जहाँ तक कारोबार के लिए माकूल माहौल यानी ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ बनाने का ताल्लुक है तो विश्व बैंक ने 190 देशों की फ़ेहरिस्त में भारत को 130 वें स्थान पर बताया है। ज़रा सोचिए कि क्या ऐसी ही तब्दीलियाँ लाने का वादा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2014 में किया था? उनके सपने हमें तब तक बरगलाते रहेंगे जब तक कि नौकरशाही के दाँव-पेंच को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी नियम-क़ायदे और निगरानी तंत्र को नहीं बनाया जाता।

मौजूदा सरकार तो व्यापारियों, कारोबारियों और उद्यमियों को आतंकित करके रखना चाहती है, हमारे टैक्स अधिकारियों की भूमिका फ़िरौती ऐंठने वालों जैसी है, हमारी जाँच एजेंसियाँ ऐसे सरकारी हथकंडों की तरह काम करती हैं जहाँ व्यापार-कारोबार का समृद्ध होना असम्भव है। इसीलिए बिज़नेस का भारत से पलायन हो रहा है। बड़े व्यापारी अब विदेश में निवेश को प्राथमिकता दे रहे हैं। यही हक़ीक़त है। ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ अब ख़्याली पुलाव बन चुका है। सुधारों की रफ़्तार बहुत धीमी और मामूली है। बड़े बदलावों का जो सपना दिखाया गया, जो वादे किये गये थे, उन्हें अब भुलाया जा चुका है।

मूलतः जिस जीएसटी (वस्तु और सेवा कर) की कल्पना की गयी है, वो तो अब एक भूत बन चुका है। यदि किसी सुधार की आत्मा ही मर जाए तो फिर उसे लेकर बनी आम सहमति पर जश्न मनाने का कोई तुक़ नहीं हो सकता। बिजली और रियल एस्टेट को जीएसटी के दायरे से बाहर रखना बहुत बड़ी ग़लती थी। मोदी सरकार ने ‘एक देश एक कर’ के पूरे सपने पर ही पानी फेर दिया। देश को ‘एक देश आठ कर’ वाली व्यवस्था दी जा रही है। टैक्स की इतनी सारी दरों से नौकरशाही के झगड़े बढ़ेंगे। बारम्बर रजिस्ट्रेशन करवाने की ज़रूरत से छोटे और मझोले क्षेत्रों की कमर टूट जाएगी।

व्यापारियों की शिकायत है कि जीएसटी को लेकर वित्त मंत्री अनावश्यक हड़बड़ी में हैं। वो चाहते हैं कि तैयारियों के पूरा होने तक इसे टाल दिया जाए। कई राज्य सरकारों का भी यही नज़रिया है। लेकिन जीएसटी जैसे ऐतिहासिक क़ानून को जिस तरह के समझौतों के साथ लागू किया जा रहा है, उसने इसकी सारी चमक पर ही बट्टा लगा दिया है। कुलमिलाकर, अर्थव्यवस्था भारी दबाव में है। शायद, मोदी के प्रशंसकों को ठीक से पता नहीं है कि नोस्त्रादामस की भविष्यवाणी का मतलब क्या है?

By : Kapil Sibal

(The writer, a senior Congress leader, is former Union Law Minister and a lawyer)

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