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क्यों बीजेपी के ‘मिशन-2019’ से साफ़ है कि ‘बहुत कठिन है डगर पनघट की!’

PM Modi
File Photo

बीजेपी, अपने भगवा ख़ानदान के ऐसे भक्तों की सेना तैयार कर रही है जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एकलौते राजनीतिक विकल्प के रूप में स्थापित कर सके! इरादा है कि इस काम को संघ के अफ़वाह और प्रपंच-तंत्र के माध्यम से किया जाए। ताकि 2014 की तरह  2019 में भी मोदी-राज का जय-घोष करते हुए फ़तह सुनिश्चित की जा सके! इसी लक्ष्य को ‘मिशन-2019’ नाम दिया गया है। किसी भी परिपक्व और केन्द्रीकृत राजनीतिक दल के लिए निश्चित रूप से ऐसी दूरदर्शिता सराहनीय है। लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त की वजह से ये बहुत चुनौतीपूर्ण है। इसीलिए पार्टी ने अभी से मिशन-2019 का ढोल पीटना शुरू कर दिया है!

वैसे तो बीजेपी के पीछे एनडीए भी पूरी ताक़त से खड़ा है। लेकिन मोदी राज की वास्तविक उपलब्धियों का ग्राफ़ बेहद मायूसी भरा है। इसी तथ्य ने संघ परिवार के चोटी के चिन्तकों और विचारकों को पशोपेश में डाल रखा है। उन्हें 2014 की पुनरावृति में ख़ासी मुश्किल दिख रही है। यही संकट बहुत विकट है! मनुष्य की तरह पार्टियाँ भी अनुभव से ही परिपक्व होती हैं। अच्छी बात ये है कि बीजेपी और संघ परिवार अनुभव से सीखने और उसी हिसाब से अपनी रणनीति बनाने और उसमें जुट जाने जैसा माहौल बना रही हैं। जबकि बीजेपी का हरेक विरोधी ये माने बैठा है कि अभी मोदी सरकार के दो साल और बाक़ी हैं। और, दो साल लम्बा वक़्त होता है। अभी से जान झोंकने की क्या ज़रूरत है!

बीजेपी को अच्छी तरह से पता है कि पिछली बार तो जुमलेबाज़ी चल गयी। लेकिन अगली बार जनता को उल्लू बनाने के लिए नये तमाशों और तिकड़मों की ज़रूरत होगी। इन्हीं तमाशों को चमकाने के लिए सबसे पहले ये डुगडुगी बजायी गयी है कि ‘देखो, देखो… चुनाव दो साल दूर है। इसके बावजूद बीजेपी ने अभी से कमर कसना शुरू कर दिया है!’ इसके लिए पहली रणनीति है कि ‘मूर्ख और मतान्ध मतदाताओं, ख़ासकर मन्द-बुद्धि हिन्दुओं में ये हवा बनायी जाए कि दो साल पहले से चुनाव की रणनीति पर काम चालू कर देना ही अपने आप में बहुत बड़ी उपलब्धि है! इसीलिए ये अद्भुत भी है!’ ये नुस्ख़ा उन राज्यों के लिए है, जहाँ 2014 में बीजेपी ने अपने विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया था।

लेकिन मिशन-2019 के तहत असली दाँव तो क्षेत्रीय पार्टियों के गढ़ में सेंधमारी करने का है। बेशक़, ये हरेक तरह से उचित है और सियासी दलों को ऐसे ही सोचना भी चाहिए। बीजेपी के लिए ‘काँग्रेस मुक्त भारत’ को परवान चढ़ाने के बाद अब सभी क्षेत्रीय पार्टियों का सफ़ाया भी ज़रूरी हो गया है! अगला सवाल ये कि क्या इसके लिए बीजेपी अभी से नरेन्द्र मोदी की ब्रॉन्डिग को गरमाये रखा जाना चाहेगी? इसीलिए संघ-बीजेपी ने तय किया है कि भले ही मोदी राज में विकास के आँकड़े अफ़सोसनाक हों, लेकिन झूठी तस्वीरें उकेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी! क्योंकि संघ को पता है कि नरेन्द्र मोदी को यदि दोबारा प्रधानमंत्री बनाना है तो बीजेपी को कम से कम ऐसी सवा सौ सीटें जीतनी पड़ेंगी, जो 2014 में उसके पास नहीं थीं।

दरअसल, 2014 में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, झारखंड, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर जैसे राज्यों में बीजेपी ने रिकॉर्ड सीटें जीती थीं। वो बीजेपी का शीर्षस्थ प्रदर्शन था। किसी भी व्यक्ति या पार्टी को शीर्ष पर पहुँचने के बाद नीचे आना ही पड़ता है। बीजेपी भी लाख कोशिश कर ले, लेकिन इन राज्यों में वो 2014 का प्रदर्शन नहीं दोहरा सकती। 2019 तक इन राज्यों में अच्छी ख़ासी सत्ता विरोधी (Anti-incumbency) भावना का पनपना भी स्वाभाविक है। इससे निपटने के लिए भगवा भक्त ये प्रचार करेंगे कि ‘देश में बदलाव के लिए 10 साल चाहिए!’ इसके अलावा, अभी से ही ‘TINA’ (There is no alternative) फैक्टर का माहौल बनाना भी शुरू कर दिया गया है।

अमित शाह, भगवा भक्तों की जो नयी टीम तैयार कर रहे हैं, उसका बस इतना ही काम है कि जहाँ-जहाँ जनता में मोदी सरकार के प्रति गुस्सा उमड़ता दिखायी दे, वहाँ ये बात फैलायी जाए कि ‘मोदी नहीं तो फिर कौन? कोई और दिख नहीं रहा, लिहाज़ा मोदी को ही जारी रखें!’ संघ परिवार का ज़मीनी आँकलन बताता है कि ऐसी सियासी तिकड़मों को सफलतापूर्वक लागू कर लेने के बावजूद, बीजेपी ने 2014 में जो 282 सीटें जीती थी, उसमें से क़रीब सौ सीटें उसके हाथ से निकल जाएँगी। लोकसभा में 336 सीटों वाले एनडीए ख़ेमे के घटक दल भी अपनी कुछेक सीटें गँवाएँगे। लिहाज़ा, सवा सौ सीटों की भरपाई अन्य राज्यों से होना बहुत ज़रूरी है! इसीलिए अमित शाह ने क्षेत्रीय दलों के दबदबे वाले राज्यों में बीजेपी को चमकाने के लिए पूरी ताक़त झोंकना शुरू कर दिया है।

यही वजह है कि हाल के चुनावों में शानदार प्रदर्शन के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने बीजेपी संसदीय दल की बैठक में कहा था, “जीत की ख़ुशी तो ठीक है। लेकिन अभी हमें और परिश्रम करना है। न मैं चैन से बैठूँगा और न चैन से बैठने दूँगा।” मोदी की देखा-देखी अमित शाह ने भी पार्टी के नेताओं, मंत्रियों और सांसदों को समझाया कि “अब वक़्त आराम का नहीं, बल्कि एक्शन का है। सफलता पाने के बावजूद बीजेपी के कार्यकर्ताओं को विश्राम का अधिकार नहीं है। क्योंकि सरकार बनने के बाद अगर विश्राम का भाव पैदा हो गया तो हमें मान लेना चाहिए कि हम अभी परिपक्व कार्यकर्ता नहीं बने हैं।” ये बयान जितने सहज हैं, उससे कहीं ज़्यादा गहरे हैं। इसीलिए बीजेपी ने विश्राम का परित्याग करके ‘मिशन-2019’ को ठेलना शुरू कर दिया है।

अमित शाह उन राज्यों का ताबड़तोड़ दौरा कर रहे हैं, जहाँ बीजेपी की हवा बनानी है। केरल, तमिलनाडु, ओडीशा, आँध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और उत्तर पूर्वी राज्यों में लोकसभा की तक़रीबन 200 सीटें हैं। इसमें से कम से कम 120 सीटें 2019 में जीतने का लक्ष्य रखा है। उत्तर विजय के बाद अब दक्षिण-जय की रणनीति है। पाँच दक्षिणी राज्यों तमिलनाडु, आँध्र प्रदेश, तेलंगाना, केरल और कर्नाटक की कुल 129 लोकसभा सीटों में से कम से कम 60 को जीतने का लक्ष्य तय हुआ है। 2019 के चुनाव से पहले 15 विधानसभाओं के चुनाव होंगे। साल के आख़िर में गुजरात और हिमाचल की बारी है। इन्हें जीतकर बीजेपी अपने विजय-रथ को आगे क्यों नहीं बढ़ाना चाहेगी! इसके अलावा, बात-बात पर 2022 का ढोल पीटने वाले मोदी के भाषण भी, 2019 की ही तैयारी हैं।

नरेन्द्र मोदी ने अपने मंत्रियों और सांसदों को जनता के बीच ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त गुज़ारने को कहा है। हरेक छोटे-बड़े नेता और कार्यकर्ता को सोशल मीडिया का जमकर दोहन करने की हिदायत मिली है। संघ-बीजेपी का मानना है कि 2019 में भी मोबाइल फ़ोन की भूमिका बहुत बड़ी होगी। क्योंकि फ़िलहाल, संघ परिवार की ओर से फैलाये जाने झूठ और अफ़वाह के लिए सोशल मीडिया से बड़ा वरदान और कुछ नहीं है! मोदी का निर्देश है कि सोशल मीडिया पर अति-सक्रियता दिखाकर सरकार की उपलब्धियों का ख़ूब नगाड़ा बजाया जाए, भले ही वो सच्चाई से कोसों दूर हो!

दूसरी ओर, विपक्षी पार्टियाँ अभी आरामतलबी में हैं। थोड़ी-बहुत हलचल भी सिर्फ़ उन्हीं पार्टियों में दिख रही है, जिन्हें निकट भविष्य में चुनाव में जाना है। बाक़ी, इसमें भी कोई शक़ नहीं कि 2019 में बाज़ी पटलने का असली दारोमदार तो विपक्षी एकता पर ही निर्भर करेगा। ये एकता भी 2018 के आख़िर तक ही अपना रूप-स्वरूप हासिल कर पाएगी। बेशक़, विपक्षी ख़ेमे की अगुवाई किसके हाथ में होगी, यही चिरपरिचित यक्ष-प्रश्न और सबसे बड़ा कौतूहल होगा। लेकिन यदि राजनीति सम्भावनाओं का खेल है तो वक़्त आने पर विपक्ष भी अपनी चुनौतियों से उबरने में क्यों कामयाब नहीं होगा! हालाँकि, तब तक मोदी का टीना-फैक्टर तो फड़फड़ाता ही रहेगा। बहरहाल, 2014 जैसी मोदी-लहर शायद ही दोबारा पैदा हो। इसीलिए बीजेपी के लिए सवा सौ नयी सीटें जीतना किसी एवरेस्ट-विजय से कम नहीं होगा!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

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