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क्या संघ को श्राप है कि उसके झूठ ही उसका अन्त करेंगे…!

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बीजेपी को कुतर्क और झूठ से अगाध प्रेम क्यों है! जबकि हमेशा झूठ ही इसके पतन का कारण बनता है! बीजेपी की शारीरिक संरचना (Anatomy) कुत्ते की पूँछ की तरह क्यों है जो लाख जतन के बावजूद टेढ़ी की टेढ़ी ही बनी रहती है! क्यों ऐसा है कि बीजेपी अपनी मूर्खताओं से कोई सबक नहीं लेती! उल्टा एक ग़लती को छिपाने के लिए कुतर्कों का सहारा लेकर सौ ग़लतियाँ और करती है। एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ और बोलती है! उपरोक्त बातों की तह में जाने के लिए ज़रा इस लेख में संलग्न निम्न तस्वीर को ग़ौर से देखिए। इसे बीजेपी के प्रचार तंत्र में बैठे लोगों ने निपट मूर्ख भारतीयों के लिए तैयार किया है। क्योंकि इनकी प्रचार सामग्री के झाँसे में सिर्फ़ मूर्ख लोग ही फँस सकते हैं।

बीजेपी के सोशल मीडिया सेल की ओर से फैलाये जा रहे इस क्रिएटिव का मक़सद जनता को सच बताना नहीं बल्कि झूठ फैलाकर राहुल गाँधी का चरित्र हनन करना है। अब सवाल ये है कि यदि बीजेपी की नज़र में राहुल गाँधी वाक़ई पप्पू या नादान, नासमझ, बड़े बाप की बिगड़ी औलाद हैं, तो फिर पूरा भगवा परिवार उन्हें लेकर हमेशा ख़ौफ़ज़दा क्यों रहता है? बीजेपी पर भी काँग्रेस का असहज ख़ौफ़ हमेशा क्यों नज़र आता है? ख़ासकर तब, जबकि उसका दावा है कि वो काँग्रेस मुक्त भारत बना चुकी है! इस झूठ के विपरीत सच ये है कि बीजेपी को अच्छी तरह से पता है कि देरसबेर जो भी हो, लेकिन सिर्फ़ काँग्रेस ही उसकी सत्ता को ध्वस्त कर सकती है!

इसीलिए, बीजेपी का हरेक नेता जब-तब राहुल गाँधी का चरित्र हनन करता रहता है। बीजेपी को ये जन्मजात पीड़ा है कि काँग्रेस, नेहरू-गाँधी परिवार से जुड़े राहुल जैसे व्यक्ति को अपना नेता कैसे मान सकती है? इसी परिवार की मेनका गाँधी और उनका बेटा वरूण गाँधी वंशवाद की देन नहीं है, लेकिन राहुल हैं! इसीलिए, ये दिलचस्प सवाल पैदा होता है कि क्या काँग्रेसियों को अपना नेता तय करने के लिए बीजेपी से मशविरा करना चाहिए? वंशवादी बीमारी से बीजेपी भी अछूती नहीं है। उसके दर्जनों नेता परिवारवाद की नुमाइन्दगी करते हैं, लेकिन उसे सिर्फ़ राहुल को लेकर ऐतराज़ है! यही है ‘गुल खाये, गुलगुले से परहेज़’यानी बिलावजह का दोगलापन। बीजेपी की ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें ही उसे ऐसे दलदल में ढकेल देती हैं, जहाँ से वो कभी निकल नहीं पाती।

बीजेपी और उसके वैचारिक गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ऐसी अतार्किक रणनीति को देखकर ऐसा लगता है कि कभी किसी धर्मात्मा ने इसे श्राप दिया होगा कि इसके झूठ ही इसके पतन की वजह बनेंगे। शायद, ये श्राप महात्मा गाँधी जैसे धर्मात्मा ने अपनी हत्या के वक़्त दिया हो! वर्ना, कोई संघ का पूरा इतिहास उठाकर देख ले, इस संगठन की वैचारिक सोच हमेशा किसी न किसी तरह के झूठ पर ही आश्रित रही है। इसके झूठ ने ही गाँधी की हत्या करवायी। संघ के कार्यकर्ता हमेशा समाज में तरह-तरह का झूठ फैलाकर अपनी पैठ बनाते हैं। लेकिन जब उसके झूठ बेपर्दा हो जाते हैं, तो उसका महल भरभराकर ढह जाता है। जनता पार्टी के शासन के वक़्त, राम मन्दिर आन्दोलन के उफान के वक़्त, वाजपेयी सरकार के पतन के वक़्त और अब मोदी राज की गिरती लोकप्रियता के वक़्त बीजेपी को हमेशा सबसे ज़्यादा आघात उसके अपने ही झूठों से लगता रहा है। लेकिन संघी तो अपनी फ़ितरत से लाचार है!

अब ज़रा बीजेपी के इस सोशल मीडिया क्रिएटिव पर ग़ौर कीजिए। इसमें राहुल गाँधी के हवाले से जो बात फैलायी जा रही है, वो उसने कभी कही ही नहीं। राहुल को तो छोड़िए, काँग्रेस के किसी भी चंगू-मंगू नेता ने भी कभी ये नहीं कहा कि मर्सीडिज और आटा पर जीएसटी की एक ही दर लागू होनी चाहिए। या, काँग्रेस सत्ता में आएगी तो ऐसा ही करके दिखाएगी। ये कपोल-कल्पना है! बेहद दुर्भावनापूर्ण! मर्सीडिज और आटा की तुलना, हरेक लिहाज़ से असंगत है। सिर्फ़ निपट मूर्ख ही ऐसी तुलना कर सकते हैं! ऐसे क्रिएटिव को डिज़ाइन करने वालों से कौन पूछे कि भाई, ज़रा ये तो बताओ कि आटा या गेहूँ पर कोई टैक्स है क्या? क्या पहले कभी किसी भी सरकार में इस पर टैक्स लगता था? यदि हाँ, तो कब और कितना? साफ़ है कि बीजेपी जनता में झूठ फैलाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। मज़े की बात ये है कि बीजेपी को कतई ये डर नहीं सताता कि जब उसके झूठ की पोल खुलेगी तो जनता क्या हाल करेगी!

सच्चाई तो ये है कि 18 हो या 28 फ़ीसदी, ये टैक्स की महज एक दर है! टैक्स की दर कैसी हो, कितनी हो, इसके भी मान्य अर्थशास्त्रीय सिद्धान्त हैं। ये उसी तरह से है जैसे दाल में नमक की मात्रा के नियम है। इसकी मात्रा को ग़रीबी-अमीरी से नहीं जोड़ा जा सकता। इसीलिए, यदि नियम ये होता कि सभी कारों पर एक लाख रुपये टैक्स लगेगा। तब ये आलोचना सही हो सकती है कि मँहगी और सस्ती कारों पर एक जैसा टैक्स ग़लत है। लेकिन जब आप कारों पर 18% टैक्स लगाने की बात करेंगे तो इसका मतलब ये है कि 5 लाख वाली कार पर 90 हज़ार रुपये GST लगेगा तो एक करोड़ रुपये की कार पर 18 लाख रुपये GST होगा।90 हज़ार और 18 लाख में जो अन्तर है उसकी व्याख्या ज़रूरी ग़रीबी-अमीरी से जोड़ी जा सकती है।

इसका काल्पनिक पहलू ये भी हो सकता है कि यदि कोई महँगी कार के हज़ार पुर्ज़े ख़रीदकर भी उसकी असेंबलिंग कर ले तो भी टैक्स को नुकसान नहीं हो सकता। क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से ही सही, 18-28 के फ़ार्मूले में टैक्स चोरी मुमकिन है! इसके अलावा, टैक्स को हमेशा ‘आइसिंग ऑन द केक’ की तरह न्यूनतम होना चाहिए। टैक्स का सिद्धान्त ये कहता है कि यदि इसकी दर ऊँची होगी तो चीज़ों के महँगा होने की वजह से खपत गिर जाएगी। खपत गिरने से टैक्स भी गिरेगा और ऊँची दर से बचने के लिए टैक्स चोरी के हथकंड़ों को उकसावा मिलेगी। इसके भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा। इसीलिए यदि कोई सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को मारकर खाना चाहेगा तो क्या आप उसे विवेकशील समझेंगे!

जैसे अपरिमित ज्ञान को जानने के लिए अलग-अलग विषय बनाये गये, वैसे ही अलग-अलग चीज़ों के लिए अलग-अलग टैक्स का विधान भी बनाना गया। याद कीजिए, उन परिस्थितियों को जब देश ने सोने पर आयात शुल्क ख़त्म किया था। आयात पर टैक्स लगाकर राजस्व जुटाना हमेशा सही माना गया है। फिर उसे ख़त्म क्यों किया गया? इस प्रश्न का उत्तर है: तस्करी रोकने के लिए! बेशक, सोने की ख़पत ग़रीबों में नहीं होती। लेकिन तस्करी किसी भी अर्थतंत्र के लिए कलंक और चुनौती है। इसकी रोकथाम के लिए हर देश को एक क़ीमत चुकानी पड़ती है। यही वजह है कि अलग-अलग चीज़ों के लिए अलग-अलग आर्थिक नीति बनाने की ज़रूरत पड़ती है। ऐसा हमेशा से होता रहा है और हमेशा होता रहेगा। और, जहाँ ऐसा नहीं होगा, वहाँ का मुहावरा होगा, ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा, टके सेर  भाजी टके सेर खाजा!’

अगली बात, यदि मोदी सरकार के GST में ख़ामियाँ नहीं होतीं तो उन्हें जुलाई से अब तक मोदी-जेटली को इतने परिवर्तन क्यों करने पड़े! दरअसल, सरकार में बैठे मूर्ख नेता ग़लतियाँ करने से तभी बचेंगे, जब उनमें ऐसी विनम्रता हो कि वो अनुभवी लोगों के मशविरे से लाभ उठाने से गुरेज़ नहीं करें। इतिहास गवाह है कि जिन्हें ये गुमान हो जाए कि वो सर्वज्ञ हैं, उन्हें किसी मशविरे की ज़रूरत नहीं, तब उनसे छोटी-मोटी भूल नहीं बल्कि भयंकर ग़लतियाँ होंगी! जो उन्हें थूककर चाटने के लिए मज़बूर कर देंगी! यही अभी हो रहा है। ऐसी ही मूर्खता, नोटबन्दी के वक़्त भी की गयी थी। उसका अंज़ाम भी जब जनता के सामने आया तो मोदी सरकार के सारे झूठ, भरभराकर ढह गये।

सच तो ये है कि भगवा ख़ानदान को अब जीएसटी और नोटबन्दी जैसे फ़ैसलों को अपनी नीतिगत और वैचारिक भूल मान लेना चाहिए। मसला तो ये जनता से माफ़ी माँगने लायक भी है। हालाँकि, राजनीतिक दल कभी आसानी से माफ़ी नहीं माँगते। लेकिन दोनों ही नीतियों का अकाट्य प्रतिफल देश के सामने है। संघियों को ये समझना पड़ेगा कि उनकी ग़लत नीतियों का अंज़ाम जब जनता भुगत रही हो, तब उसे झूठी दलीलों से नहीं बरगलाया जा सकता! अफ़सोस कि संघी इस तथ्य को कभी समझना नहीं चाहेंगे और इसीलिए जनता इन्हें ज़रूर सबक सिखाएगी। गुरुदासपुर के बाद चित्रकूट से आया जनादेश देख भी ये अहंकारी परिवार सतर्क नहीं हो सकता!

दरअसल, किसी को पसन्द या नापसन्द करने की निश्चित वजह का होना ज़रूरी नहीं होता। ज़्यादातर मोदी भक्त ये नहीं जानते कि वो क्यों हिन्दुत्व की तलवारें भाँजते फिर रहे हैं? कहाँ हिन्दुओं की जान पर बनी है?क्या काँग्रेस के ज़माने में हिन्दुओं पर मुसलमान ज़ुल्म किया करते थे? क्या वो, हिन्दुओं को घर में घुसकर मार डालते थे? बीजेपी की तुष्टिकरण की दलीलों में कुछ दम भले हो, लेकिन क्या मोदी राज में हिन्दुओं का ऐसा तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण नहीं किया गया जिसने इन्हें अनावश्यक रूप से उच्चशृंखल, उद्दंड, वहशी और अतार्किक बना डाला है? इसीलिए, ये समझना बेहद ज़रूरी है कि बीजेपी, कैसे देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर अपनी सत्ता बचाने के लिए देश का सत्यानाश कर रही है। ऐसा सिर्फ़ इसलिए हो पा रहा है कि हमने तर्क और कुतर्क की बारीकियों को समझते हुए तथ्यों को परखना बन्द कर दिया है। तभी तो हमसे कहा जाता है कि हमें मानना ही पड़ेगा कि ‘विकास’ हो रहा है, क्योंकि वो कह रहे हैं! हम दिख क्या रहा है? महसूस क्या हो रहा है? इन तथ्यों को कौन गौण बनाना चाहता है!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

 

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‘मी टू मूवमेंट’ का एकजुट होकर समर्थन करना चाहिए : महेश भट्ट

“हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

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mahesh bhatt

नई दिल्ली, 16 अक्टूबर | फिल्मों के जरिए बेबाकी से सामाजिक मुद्दों को सुनहरे पर्दे पर उतारने वाले निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट ने देश में चल रहे ‘मी टू मूवमेंट’ पर भी बेबाकी से अपनी राय दी है। उन्होंने कहा है कि यह कुछ ऐसा है, जिससे हम अलग-अलग विचार रखकर नहीं निपट सकते हैं। हमें पूरी जिम्मेदारी व एकजुटता के साथ इसका समर्थन करना चाहिए।

महेश भट्ट 12 अक्टूबर को रिलीज हुई अपनी होम प्रोडक्शन की फिल्म ‘जलेबी’ के प्रचार के लिए दिल्ली आए थे। उन्होंने बताया कि उनकी फिल्म में दिखाया गया प्यार किस तरह हिंदी फिल्मों में दिखाए जाने वाले पारंपरिक प्यार से अलग है।

महेश से जब पूछा गया कि फिल्म की कहानी अन्य प्रेम कहानियों से कितनी अलग है तो उन्होंने आईएएनएस को बताया, “हमारी फिल्म प्यार के उतार-चढ़ावों और उसकी बारीकियों से बड़ी हिम्मत से आंख मिलाती है। यह पारंपरिक हिंदी फिल्मों से इतर है। इसके अंत में लिखा आता है ‘एंड दे लिव्ड हैपिली एवर आफ्टर’। लेकिन वास्तव में प्यार परियों की कहानी से परे है। इंसानी सोच ने प्यार को शादी की परंपरा से जोड़ दिया, लेकिन प्यार तो कुदरत की देन है।

उन्होंने कहा, “आप देखें कि इस देश में राधा-कृष्ण के प्रेम को मंदिरों में बिठाया गया है, जबकि राधा-कृष्ण का प्यार शादी के बंधन तक सीमित नहीं था। हमारी फिल्म एक तरह से इसी तरह के प्यार और दो इंसानों की भावनाओं को पेश करती है।”

महेश कहते हैं, “फिल्म की सबसे खास बात यह है कि इसने नौजवान पीढ़ी को बहुत सम्मान दिया है। फिल्म के माध्यम से बताया गया है कि यह आज के दौर के जो युवा हैं या दर्शक हैं, वे जिंदगी से जुड़ी इस गहरी बात को समझेंगे।”

‘जलेबी’ के पोस्टर ने सुर्खियां और विवाद दोनों बटोरे थे। इसमें फिल्म की हीरोइन ट्रेन की खिड़की से चेहरा निकालकर हीरो को ‘किस’ करती नजर आती है। इसका जिक्र करने पर महेश हंसते हुए कहते हैं, “यह मार्केटिंग की जरूरत थी कि हम फिल्म की पहली ऐसी तस्वीर जारी करें, जिससे हल्ला मच जाए और देखिए आज आप भी यही सवाल पूछ रही हैं।..दरअसल, जब से हमारे संचार के माध्यम बदले हैं और हम शब्दों से तस्वीरों पर आए हैं, तब से अभिव्यक्ति ज्यादा असरदार हो गई है। तस्वीरों का असर ज्यादा होता है..उसका मिजाज कुछ अलग होता है। वास्तव में यह तस्वीर महिलाओं की आजादी को प्रतिबिंबित करती है।”

फिल्म की पृष्ठभूमि पुरानी दिल्ली है। इसके पीछे की वजह पूछे जाने पर महेश ने कहा, “इसका श्रेय फिल्म के निर्देशक (पुष्पदीप भारद्वाज) को जाता है। इनकी परवरिश पुरानी दिल्ली की जिन गलियों में हुई है, उन्होंने उन्हीं गलियों को पर्दे पर उतारा है। कोई शख्स जब किसी दौर में जिन पलों को जीता है तो जब वह उन्हें पर्दे पर उतारता है तो उसकी अदा कुछ और होती है।

महेश कहते हैं, “हमने यहां ‘जन्नत 2’ भी शूट की थी जिसके निर्देशक कुणाल देशमुख थे। वह बहुत काबिल निर्देशक हैं, मगर उन्होंने दिल्ली को पर्दे पर उस तरह से पेश नहीं किया जिस तरह पुष्पद्वीप ने किया है, क्योंकि इन्होंने उसे जिया है, और जब आप किसी चीज को महसूस करके फिल्माते हैं तो उसमें आपकी एक तड़प या महक आ जाती है।”

‘मी टू मूवमेंट’ के बारे में आलिया भट्ट के पापा ने कहा, “हमें इस पहल का समर्थन करना चाहिए। यहां हमें अपनी जिम्मेदारी भी निभाने की जरूरत है। हम अलग-अलग राय रखकर इस समस्या का हल नहीं निकाल सकते, हम संवेदना और समझदारी के साथ इसका समाधान तलाशना होगा।”

–आईएएनएस

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‘आयुष्मान योजना काफी नहीं, लोगों को मिले स्वास्थ्य का अधिकार’

मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।

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Picture Credit : Quartz

नई दिल्ली, 17 अक्टूबर | देश में एक तरफ जहां महिला सशक्तिकरण का बड़ा जोरो-शोरो से ढिंढोरा पीटा जाता है, वहीं एक विश्वविद्यालय की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, देश में कामकाजी 92 प्रतिशत महिलाओं को प्रति माह 10,000 रुपये से भी कम की तनख्वाह मिलती है। इस मामले में पुरुष थोड़ा बेहतर स्थिति में हैं। लेकिन हैरत की बात यह है कि 82 प्रतिशत पुरुषों को भी 10,000 रुपये प्रति माह से कम की तनख्वाह मिलती है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र ने श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधार पर स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने देश में कामकाजी पुरुषों और महिलाओं पर आंकड़े तैयार किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, 2015 में राष्ट्रीय स्तर पर 67 प्रतिशत परिवारों की मासिक आमदनी 10,000 रुपये थी जबकि सातवें केंद्रीय वेतन आयोग (सीपीसी) द्वारा अनुशंसित न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये प्रति माह है। इससे साफ होता है कि भारत में एक बड़े तबके को मजदूरी के रूप में उचित भुगतान नहीं मिल रहा है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है। यह आंकड़े पूरे भारत के हैं।”

उन्होंने कहा, “मेट्रो शहरों में इसकी स्थिति अलग होगी क्योंकि गांवों और छोटे शहरों की तुलना में इन शहरों में महिलाओं और पुरुषों की आमदनी अधिक है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुताबिक, चिंता की बात यह है कि विनिर्माण क्षेत्र में भी 90 प्रतिशत उद्योग मजदूरों को न्यूनतम वेतन से नीचे मजदूरी का भुगतान करते हैं। असंगठित क्षेत्र की हालत और भी ज्यादा खराब है। अध्ययन के मुताबिक, तीन दशकों में संगठित क्षेत्र की उत्पादक कंपनियों में श्रमिकों की उत्पादकता छह प्रतिशत तक बढ़ी है, जबकि उनके वेतन में मात्र 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

क्या आप मानते हैं कि शिक्षित युवाओं के लिए वर्तमान हालात काफी खराब हो चुके हैं, जिस पर सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने कहा, “आज की स्थिति निश्चित रूप से काफी खराब है, खासकर भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में। हमें उन कॉलेजों से बाहर आने वाले बड़ी संख्या में शिक्षित युवाओं का बेहतर उपयोग करने की आवश्यकता है।”

इस स्थिति को कैसे बेहतर बनाया जा सकता है, के सवाल पर उन्होंने आईएएनएस को बताया, “स्थिति को बेहतर बनाने के लिए कुछ उपाय किए जा सकते हैं, जैसे अगर सरकार सीधे गांवों व छोटे शहरों में रोजगार पैदा करे, इसके साथ ही बेहतर बुनियादी ढांचे (बिजली, सड़कों) उपलब्ध कराएं और युवाओं को कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध को सुनिश्चित करें, जिससे कुछ हद तक हालात सुधर सकते हैं।”

श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, 2015-16 के दौरान, भारत की बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी जबकि 2013-14 में यह 4.9 फीसदी थी। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि बेरोजगारी दर शहरी क्षेत्रों (4.9 फीसदी) की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों (5.1 फीसदी) नें मामूली रूप से अधिक है।

अध्ययन के मुताबिक, पुरुषों की तुलना में महिलाओं के बीच बेरोजगारी दर अधिक है। राष्ट्रीय स्तर पर महिला बेरोजगारी दर जहां 8.7 प्रतिशत है वहीं पुरुषों के बीच यह दर चार प्रतिशत है। काम में लगे हुए व्यक्तियों में से अधिकांश व्यक्ति स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं। राष्ट्र स्तर पर 46.6 प्रतिशत श्रमिकों स्वयं रोजगार में लगे हुए हैं, इसके बाद 32.8 प्रतिशत सामयिक मजदूर हैं।

अध्ययन के मुताबिक, भारत में केवल 17 प्रतिशत व्यक्ति वेतन पर कार्य करते हैं और शेष 3.7 प्रतिशत संविदा कर्मी हैं।

–आईएएनएस

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नई नौकरियां नहीं पैदा हुई, देश में बढ़ी बेरोजगारी दर

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

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unemployment in India

नई दिल्ली/बेंगलुरू, 16 अक्टूबर | अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के सतत रोजगार केंद्र की एक हालिया रिपोर्ट में बेरोजगारी दर के 20 वर्षो में सबसे अधिक होने की बात कही गई है। रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने भारत में बेरोजगारी दर के बढ़ने की वजह नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना और शिक्षित युवाओं के तेजी से श्रमबल में शामिल होने को बताया है।

अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लिबरल स्टडीज, अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर और देश में बढ़ती बेरोजगारी पर से पर्दा उठाने वाली स्टेट ऑफ वर्किं ग इंडिया, 2018 रिपोर्ट के मुख्य लेखक अमित बसोले ने बेंगलुरू से आईएएनएस को ई-मेल के माध्यम से बताया, “यह आंकड़े श्रम ब्यूरो के पांचवीं वार्षिक रोजगार-बेरोजगारी सर्वेक्षण (2015-2016) पर आधारित है।”

श्रम मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक, कई सालों तक बेरोजगारी दर दो से तीन प्रतिशत के आसपास रहने के बाद साल 2015 में पांच प्रतिशत पर पहुंच गई, इसके साथ ही युवाओं में बेरोजगारी की दर 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

अमित बसोले ने कहा, “देश में बढ़ती बेरोजगारी के पीछे दो कारक हैं, पहला 2013 से 2015 के बीच नौकरियों के सृजन की गति धीमी होना, कार्यबल बढ़ने के बजाए कम होना क्योंकि कुल कार्यबल (नौकरियों में लगे लोगों की संख्या) बढ़ने की बजाय घट गया है। दूसरा कारक यह है कि श्रम बल में प्रवेश करने वाले अधिक शिक्षित युवा, जो उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया, 2018 रिपोर्ट में कहा गया है कि 2015 में बेरोजगारी दर पांच प्रतिशत थी, जो पिछले 20 वर्षो में सबसे ज्यादा देखी गई है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि नहीं हुई है। अध्ययन के मुताबिक, जीडीपी में 10 फीसदी की वृद्धि के परिणामस्वरूप रोजगार में एक प्रतिशत से भी कम की वृद्धि हुई है। रिपोर्ट में बढ़ती बेरोजगारी को भारत के लिए एक नई समस्या बताया गया है।

इन हालात से निपटने के लिए क्या सरकार ने पर्याप्त कदम उठाए हैं, इस पर अर्थशास्त्र के सहायक प्रोफेसर अमित बसोले ने बताया, “इन हालात पर सरकार के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना थोड़ा मुश्किल है, विशेष रूप से 2015 के बाद क्योंकि उसके बाद से सरकार ने समग्र रोजगार की स्थिति पर कोई डेटा जारी नहीं किया है। सेंटर फॉर मॉनीटरिंग द इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) जैसे निजी स्रोतों के उपलब्ध डेटा से पता चलता है कि नौकरियों का सृजन कमजोर ही बना रहेगा। सीएमआईई डेटा यह भी इंगित करता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप नौकरियों में कमी आई है, सरकार ने इस पर भी कोई डेटा जारी नहीं किया है।”

स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2018 की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत में अंडर एंप्लॉयमेंट और कम मजदूरी की भी समस्या हैं। उच्च शिक्षा प्राप्त और युवाओं में बेरोजगारी 16 प्रतिशत तक पहुंच गई है। बेरोजगारी पूरे देश में हैं, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित देश के उत्तरी राज्य हैं।

अमित बसोले ने यह भी कहा कि भारत के नौकरी बाजार की प्रकृति बदल गई है क्योंकि बाजार में अब अधिक शिक्षित लोग आ चुके हैं, वह उपलब्ध किसी भी काम को करने के बजाय सही नौकरी की प्रतीक्षा करना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा, “पिछले दशक में श्रम बाजार बदल गया है, विभिन्न डिग्रियों के अनुरूप रोजगार पैदा नहीं हुए हैं।”

हालात को सामान्य बनाने के लिए किस तरह के कदम उठाए जाने चाहिए, इस सवाल पर रिपोर्ट के मुख्य लेखक ने आईएएनएस को बताया, “यह हालात को सामान्य बनाने का सवाल नहीं है। इसके बजाय, हमें एक उचित राष्ट्रीय रोजगार नीति विकसित करने की आवश्यकता है, जो केंद्र द्वारा आर्थिक नीति बनाने में नौकरियों का सृजन करेगी।”

–आईएएनएस

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