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क्या संघ को श्राप है कि उसके झूठ ही उसका अन्त करेंगे…!

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बीजेपी को कुतर्क और झूठ से अगाध प्रेम क्यों है! जबकि हमेशा झूठ ही इसके पतन का कारण बनता है! बीजेपी की शारीरिक संरचना (Anatomy) कुत्ते की पूँछ की तरह क्यों है जो लाख जतन के बावजूद टेढ़ी की टेढ़ी ही बनी रहती है! क्यों ऐसा है कि बीजेपी अपनी मूर्खताओं से कोई सबक नहीं लेती! उल्टा एक ग़लती को छिपाने के लिए कुतर्कों का सहारा लेकर सौ ग़लतियाँ और करती है। एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ और बोलती है! उपरोक्त बातों की तह में जाने के लिए ज़रा इस लेख में संलग्न निम्न तस्वीर को ग़ौर से देखिए। इसे बीजेपी के प्रचार तंत्र में बैठे लोगों ने निपट मूर्ख भारतीयों के लिए तैयार किया है। क्योंकि इनकी प्रचार सामग्री के झाँसे में सिर्फ़ मूर्ख लोग ही फँस सकते हैं।

बीजेपी के सोशल मीडिया सेल की ओर से फैलाये जा रहे इस क्रिएटिव का मक़सद जनता को सच बताना नहीं बल्कि झूठ फैलाकर राहुल गाँधी का चरित्र हनन करना है। अब सवाल ये है कि यदि बीजेपी की नज़र में राहुल गाँधी वाक़ई पप्पू या नादान, नासमझ, बड़े बाप की बिगड़ी औलाद हैं, तो फिर पूरा भगवा परिवार उन्हें लेकर हमेशा ख़ौफ़ज़दा क्यों रहता है? बीजेपी पर भी काँग्रेस का असहज ख़ौफ़ हमेशा क्यों नज़र आता है? ख़ासकर तब, जबकि उसका दावा है कि वो काँग्रेस मुक्त भारत बना चुकी है! इस झूठ के विपरीत सच ये है कि बीजेपी को अच्छी तरह से पता है कि देरसबेर जो भी हो, लेकिन सिर्फ़ काँग्रेस ही उसकी सत्ता को ध्वस्त कर सकती है!

इसीलिए, बीजेपी का हरेक नेता जब-तब राहुल गाँधी का चरित्र हनन करता रहता है। बीजेपी को ये जन्मजात पीड़ा है कि काँग्रेस, नेहरू-गाँधी परिवार से जुड़े राहुल जैसे व्यक्ति को अपना नेता कैसे मान सकती है? इसी परिवार की मेनका गाँधी और उनका बेटा वरूण गाँधी वंशवाद की देन नहीं है, लेकिन राहुल हैं! इसीलिए, ये दिलचस्प सवाल पैदा होता है कि क्या काँग्रेसियों को अपना नेता तय करने के लिए बीजेपी से मशविरा करना चाहिए? वंशवादी बीमारी से बीजेपी भी अछूती नहीं है। उसके दर्जनों नेता परिवारवाद की नुमाइन्दगी करते हैं, लेकिन उसे सिर्फ़ राहुल को लेकर ऐतराज़ है! यही है ‘गुल खाये, गुलगुले से परहेज़’यानी बिलावजह का दोगलापन। बीजेपी की ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें ही उसे ऐसे दलदल में ढकेल देती हैं, जहाँ से वो कभी निकल नहीं पाती।

बीजेपी और उसके वैचारिक गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ऐसी अतार्किक रणनीति को देखकर ऐसा लगता है कि कभी किसी धर्मात्मा ने इसे श्राप दिया होगा कि इसके झूठ ही इसके पतन की वजह बनेंगे। शायद, ये श्राप महात्मा गाँधी जैसे धर्मात्मा ने अपनी हत्या के वक़्त दिया हो! वर्ना, कोई संघ का पूरा इतिहास उठाकर देख ले, इस संगठन की वैचारिक सोच हमेशा किसी न किसी तरह के झूठ पर ही आश्रित रही है। इसके झूठ ने ही गाँधी की हत्या करवायी। संघ के कार्यकर्ता हमेशा समाज में तरह-तरह का झूठ फैलाकर अपनी पैठ बनाते हैं। लेकिन जब उसके झूठ बेपर्दा हो जाते हैं, तो उसका महल भरभराकर ढह जाता है। जनता पार्टी के शासन के वक़्त, राम मन्दिर आन्दोलन के उफान के वक़्त, वाजपेयी सरकार के पतन के वक़्त और अब मोदी राज की गिरती लोकप्रियता के वक़्त बीजेपी को हमेशा सबसे ज़्यादा आघात उसके अपने ही झूठों से लगता रहा है। लेकिन संघी तो अपनी फ़ितरत से लाचार है!

अब ज़रा बीजेपी के इस सोशल मीडिया क्रिएटिव पर ग़ौर कीजिए। इसमें राहुल गाँधी के हवाले से जो बात फैलायी जा रही है, वो उसने कभी कही ही नहीं। राहुल को तो छोड़िए, काँग्रेस के किसी भी चंगू-मंगू नेता ने भी कभी ये नहीं कहा कि मर्सीडिज और आटा पर जीएसटी की एक ही दर लागू होनी चाहिए। या, काँग्रेस सत्ता में आएगी तो ऐसा ही करके दिखाएगी। ये कपोल-कल्पना है! बेहद दुर्भावनापूर्ण! मर्सीडिज और आटा की तुलना, हरेक लिहाज़ से असंगत है। सिर्फ़ निपट मूर्ख ही ऐसी तुलना कर सकते हैं! ऐसे क्रिएटिव को डिज़ाइन करने वालों से कौन पूछे कि भाई, ज़रा ये तो बताओ कि आटा या गेहूँ पर कोई टैक्स है क्या? क्या पहले कभी किसी भी सरकार में इस पर टैक्स लगता था? यदि हाँ, तो कब और कितना? साफ़ है कि बीजेपी जनता में झूठ फैलाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। मज़े की बात ये है कि बीजेपी को कतई ये डर नहीं सताता कि जब उसके झूठ की पोल खुलेगी तो जनता क्या हाल करेगी!

सच्चाई तो ये है कि 18 हो या 28 फ़ीसदी, ये टैक्स की महज एक दर है! टैक्स की दर कैसी हो, कितनी हो, इसके भी मान्य अर्थशास्त्रीय सिद्धान्त हैं। ये उसी तरह से है जैसे दाल में नमक की मात्रा के नियम है। इसकी मात्रा को ग़रीबी-अमीरी से नहीं जोड़ा जा सकता। इसीलिए, यदि नियम ये होता कि सभी कारों पर एक लाख रुपये टैक्स लगेगा। तब ये आलोचना सही हो सकती है कि मँहगी और सस्ती कारों पर एक जैसा टैक्स ग़लत है। लेकिन जब आप कारों पर 18% टैक्स लगाने की बात करेंगे तो इसका मतलब ये है कि 5 लाख वाली कार पर 90 हज़ार रुपये GST लगेगा तो एक करोड़ रुपये की कार पर 18 लाख रुपये GST होगा।90 हज़ार और 18 लाख में जो अन्तर है उसकी व्याख्या ज़रूरी ग़रीबी-अमीरी से जोड़ी जा सकती है।

इसका काल्पनिक पहलू ये भी हो सकता है कि यदि कोई महँगी कार के हज़ार पुर्ज़े ख़रीदकर भी उसकी असेंबलिंग कर ले तो भी टैक्स को नुकसान नहीं हो सकता। क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से ही सही, 18-28 के फ़ार्मूले में टैक्स चोरी मुमकिन है! इसके अलावा, टैक्स को हमेशा ‘आइसिंग ऑन द केक’ की तरह न्यूनतम होना चाहिए। टैक्स का सिद्धान्त ये कहता है कि यदि इसकी दर ऊँची होगी तो चीज़ों के महँगा होने की वजह से खपत गिर जाएगी। खपत गिरने से टैक्स भी गिरेगा और ऊँची दर से बचने के लिए टैक्स चोरी के हथकंड़ों को उकसावा मिलेगी। इसके भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा। इसीलिए यदि कोई सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को मारकर खाना चाहेगा तो क्या आप उसे विवेकशील समझेंगे!

जैसे अपरिमित ज्ञान को जानने के लिए अलग-अलग विषय बनाये गये, वैसे ही अलग-अलग चीज़ों के लिए अलग-अलग टैक्स का विधान भी बनाना गया। याद कीजिए, उन परिस्थितियों को जब देश ने सोने पर आयात शुल्क ख़त्म किया था। आयात पर टैक्स लगाकर राजस्व जुटाना हमेशा सही माना गया है। फिर उसे ख़त्म क्यों किया गया? इस प्रश्न का उत्तर है: तस्करी रोकने के लिए! बेशक, सोने की ख़पत ग़रीबों में नहीं होती। लेकिन तस्करी किसी भी अर्थतंत्र के लिए कलंक और चुनौती है। इसकी रोकथाम के लिए हर देश को एक क़ीमत चुकानी पड़ती है। यही वजह है कि अलग-अलग चीज़ों के लिए अलग-अलग आर्थिक नीति बनाने की ज़रूरत पड़ती है। ऐसा हमेशा से होता रहा है और हमेशा होता रहेगा। और, जहाँ ऐसा नहीं होगा, वहाँ का मुहावरा होगा, ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा, टके सेर  भाजी टके सेर खाजा!’

अगली बात, यदि मोदी सरकार के GST में ख़ामियाँ नहीं होतीं तो उन्हें जुलाई से अब तक मोदी-जेटली को इतने परिवर्तन क्यों करने पड़े! दरअसल, सरकार में बैठे मूर्ख नेता ग़लतियाँ करने से तभी बचेंगे, जब उनमें ऐसी विनम्रता हो कि वो अनुभवी लोगों के मशविरे से लाभ उठाने से गुरेज़ नहीं करें। इतिहास गवाह है कि जिन्हें ये गुमान हो जाए कि वो सर्वज्ञ हैं, उन्हें किसी मशविरे की ज़रूरत नहीं, तब उनसे छोटी-मोटी भूल नहीं बल्कि भयंकर ग़लतियाँ होंगी! जो उन्हें थूककर चाटने के लिए मज़बूर कर देंगी! यही अभी हो रहा है। ऐसी ही मूर्खता, नोटबन्दी के वक़्त भी की गयी थी। उसका अंज़ाम भी जब जनता के सामने आया तो मोदी सरकार के सारे झूठ, भरभराकर ढह गये।

सच तो ये है कि भगवा ख़ानदान को अब जीएसटी और नोटबन्दी जैसे फ़ैसलों को अपनी नीतिगत और वैचारिक भूल मान लेना चाहिए। मसला तो ये जनता से माफ़ी माँगने लायक भी है। हालाँकि, राजनीतिक दल कभी आसानी से माफ़ी नहीं माँगते। लेकिन दोनों ही नीतियों का अकाट्य प्रतिफल देश के सामने है। संघियों को ये समझना पड़ेगा कि उनकी ग़लत नीतियों का अंज़ाम जब जनता भुगत रही हो, तब उसे झूठी दलीलों से नहीं बरगलाया जा सकता! अफ़सोस कि संघी इस तथ्य को कभी समझना नहीं चाहेंगे और इसीलिए जनता इन्हें ज़रूर सबक सिखाएगी। गुरुदासपुर के बाद चित्रकूट से आया जनादेश देख भी ये अहंकारी परिवार सतर्क नहीं हो सकता!

दरअसल, किसी को पसन्द या नापसन्द करने की निश्चित वजह का होना ज़रूरी नहीं होता। ज़्यादातर मोदी भक्त ये नहीं जानते कि वो क्यों हिन्दुत्व की तलवारें भाँजते फिर रहे हैं? कहाँ हिन्दुओं की जान पर बनी है?क्या काँग्रेस के ज़माने में हिन्दुओं पर मुसलमान ज़ुल्म किया करते थे? क्या वो, हिन्दुओं को घर में घुसकर मार डालते थे? बीजेपी की तुष्टिकरण की दलीलों में कुछ दम भले हो, लेकिन क्या मोदी राज में हिन्दुओं का ऐसा तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण नहीं किया गया जिसने इन्हें अनावश्यक रूप से उच्चशृंखल, उद्दंड, वहशी और अतार्किक बना डाला है? इसीलिए, ये समझना बेहद ज़रूरी है कि बीजेपी, कैसे देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर अपनी सत्ता बचाने के लिए देश का सत्यानाश कर रही है। ऐसा सिर्फ़ इसलिए हो पा रहा है कि हमने तर्क और कुतर्क की बारीकियों को समझते हुए तथ्यों को परखना बन्द कर दिया है। तभी तो हमसे कहा जाता है कि हमें मानना ही पड़ेगा कि ‘विकास’ हो रहा है, क्योंकि वो कह रहे हैं! हम दिख क्या रहा है? महसूस क्या हो रहा है? इन तथ्यों को कौन गौण बनाना चाहता है!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

 

ओपिनियन

हज 2018 होगा महंगा, मगर सब्सिडी की समाप्ति वजह नहीं

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

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हज 2018 की यात्रा पिछले साल के मुकाबले ज्यादा महंगी रहने वाली है। लेकिन इसकी वजह सरकार द्वारा मंगलवार को सब्सिडी समाप्त करने की घोषणा नहीं है।

इसके पीछे का कारण हज के दौरान सऊदी अरब में होने वाला खर्च है, जिसमें रहना, परिवहन, खाना और दूसरी चीजें शामिल हैं। यहां ध्यान दिलाने वाली बात यह है कि सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी इन खर्चो का वहन नहीं करती और साथ ही वह हवाई सफर में भी सीमित है।

भारतीय हज समिति (एचसीआई) के अध्यक्ष महबूब अली कैसर ने आईएएनएस को बताया कि कीमतों पर नियंत्रण के लिए सऊदी प्रशासन से सौदेबाजी करना कठिन था, लेकिन इस साल स्थानीय कारक हज की यात्रा में खर्चा बढ़ा सकते हैं।

2017 में एचसीआई हज के लिए साधारण आवास (अजीजिया) के साथ दो लाख रुपये और डीलक्स आवास (ग्रीन) के साथ 234,000 रुपये वसूलता था। डीलक्स आवास (ग्रीन) मक्का में हरम के समीप है।

कैसर ने कहा, “पिछले साल से सऊदी अरब में बिजली का शुल्क तीन गुना बढ़ गया है। इसके साथ ही पेट्रोल की कीमतें भी दोगुनी हो चुकी हैं। आवास की कीमतें भी बढ़ रही हैं। ये सभी कारक इस साल हज में आने वाली कुल लागत को बढ़ा सकते हैं।”

उन्होंने कहा कि इस वक्त हज 2018 में प्रत्येक श्रद्धालु पर आने वाली अंतिम लागत का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।

उन्होंने कहा, “ऐसा मानना बेमानी होगी कि बिजली की कीमतों में तीन गुना और पेट्रोल की कीमतों में दोगुनी वृद्धि हो जाने पर हर बार सऊदी अरब में सभी चीजों की कीमतें समान रहेंगी। दूसरा, सऊदी के लोग सौदेबाजी करने वालों को गाली देते हैं और हमें उनसे हर रियाल के लिए वास्तव में बहुत सौदेबाजी करनी पड़ी।”

कैसर ने कहा, “तब भी, हम अपना सर्वश्रेष्ठ देने का प्रयास कर रहे हैं और उनसे बहुत सौदेबाजी कर रहे हैं, ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि कीमतें जबरदस्त रूप से न बढ़ें।”

केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने मंगलवार को इस साल से हज सब्सिडी की समाप्ति की घोषणा की थी।

कैसर ने कहा कि एचसीआई को पता था कि ऐसा होने वाला है और इसके लिए हम मानसिक रूप से तैयार थे।

उन्होंने कहा, “किसी भी हालत में सब्सिडी को वापस लेने का फैसला मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद और बेंगलुरू जैसे बड़े शहरों के हवाई किराए को प्रभावित नहीं करेगा, लेकिन श्रीनगर, गया जैसे छोटी जगहों से किराया बढ़ सकता है। लेकिन इन राज्यों के लोग जहां किराया कम है, जैसे मुंबई, दिल्ली और अहमदाबाद जाकर उड़ानें पकड़ सकते हैं।”

हालांकि आने वाले वर्षो में हज की लागत कम होने के आसार हैं, क्योंकि भारत सरकार पहले से ही जेद्दाह जाने वाले समुद्री रास्ते को पुनर्जीवित करने की दिशा में काम कर रही है।

नकवी ने कहा कि सरकार ने इस बाबत पहले से ही इस दिशा में सक्रिय कदम उठाए हैं और एक बार लागू होने के बाद किराये में जबरदस्त गिरावट आएगी।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा कि हज सब्सिडी की शुरुआत 1980 (जब आजाद एचसीआई के सदस्य थे) के दशक में हुई थी, जब हज यात्रियों को ढोने वाली जहाजें पुरानी होने लगी थीं।

आजाद ने कहा, “बजट की कमी के कारण सरकार ने नई जहाजों की खरीद पर पैसा नहीं खर्च किया था। इस लिए श्रद्धालुओं को जेद्दाह ले जाने के लिए उड़ानें शुरू करने का फैसला किया गया था। लेकिन हवाई सफर जहाज के किराए से चार गुना महंगा था। इसलिए सरकार ने उस लागत का वहन करने के लिए सब्सिडी का भुगतान करना शुरू किया था।”

समुद्री रास्ते को 1995 में बंद कर दिया गया था।

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कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

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कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

Image result for स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह

Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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काँग्रेसियों की अग्निपरीक्षा! इन्हें ही एक बार फिर देश को आज़ाद करवाना होगा

atal bihari vajpai
ज़रा हटके3 weeks ago

आजीवन क्यों कुंवारे रह गए अटल बिहारी बाजपेयी?

ananth-kumar-hegde
ओपिनियन3 weeks ago

ज़रा सोचिए कि क्या भारत के 69 फ़ीसदी सेक्युलर ख़ुद को हरामी बताये जाने से ख़ुश होंगे!

hardik-nitin
राजनीति3 weeks ago

नितिन पटेल की नाराजगी पर हार्दिक की चुटकी, कहा- ’10 एमएलए लेकर आओ, मनमाफिक पद पाओ’

Modi Manmohan Sonia
ओपिनियन4 weeks ago

2G मामले में ट्रायल कोर्ट के फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट और विपक्ष दोनों ग़लत साबित हुए!

rape case
ओपिनियन4 weeks ago

2017 In Retrospect : दुष्कर्म के 5 चर्चित मामलों ने खोली महिला सुरक्षा की पोल

jammu and kashmir
राजनीति35 mins ago

सदन के भीतर ही BJP विधायकों ने निर्दलीय MLA को पीटा, देखें वीडियो

tapssi
मनोरंजन2 hours ago

तापसी पन्नू की फिल्म ‘दिल जंगली’ का ट्रेलर रिलीज…

sitaraman
राष्ट्रीय1 day ago

सुखोई-30 लड़ाकू विमान में उड़ान भरने वाली देश की पहली महिला रक्षा मंत्री बनीं निर्मला सीतारमण

bjp leader
शहर1 day ago

बीजेपी नेता ने अधिकारी को जड़ा थप्पड़, देखें वीडियो…

shivraj singh chouhan
राजनीति2 days ago

शिवराज सिंह ने किसको जड़ा थप्पड़? देखें वीडियो…

अंतरराष्ट्रीय4 days ago

PoK में पाक सरकार के खिलाफ प्रदर्शन, सड़कों पर उतरे व्यापारी

Supreme Court Judges
राष्ट्रीय6 days ago

पहली बार SC के जज आए सामने, कहा- ‘हम नहीं बोले तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा’

gadkari
राजनीति7 days ago

नौसेना पर बरसे गडकरी, कहा- ‘दक्षिणी मुंबई में नहीं दूंगा एक इंच जमीन’

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शहर1 week ago

मुंबई के हुक्काबार में जमकर तोड़फोड़

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शहर1 week ago

आर्मी-डे परेड की रिहर्सल के दौरान 3 जवान घायल…देखें वीडियो

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