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क्या संघ को श्राप है कि उसके झूठ ही उसका अन्त करेंगे…!

बीजेपी को कुतर्क और झूठ से अगाध प्रेम क्यों है! जबकि हमेशा झूठ ही इसके पतन का कारण बनता है! बीजेपी की शारीरिक संरचना (Anatomy) कुत्ते की पूँछ की तरह क्यों है जो लाख जतन के बावजूद टेढ़ी की टेढ़ी ही बनी रहती है! क्यों ऐसा है कि बीजेपी अपनी मूर्खताओं से कोई सबक नहीं लेती! उल्टा एक ग़लती को छिपाने के लिए कुतर्कों का सहारा लेकर सौ ग़लतियाँ और करती है। एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ और बोलती है! उपरोक्त बातों की तह में जाने के लिए ज़रा इस लेख में संलग्न निम्न तस्वीर को ग़ौर से देखिए। इसे बीजेपी के प्रचार तंत्र में बैठे लोगों ने निपट मूर्ख भारतीयों के लिए तैयार किया है। क्योंकि इनकी प्रचार सामग्री के झाँसे में सिर्फ़ मूर्ख लोग ही फँस सकते हैं।

बीजेपी के सोशल मीडिया सेल की ओर से फैलाये जा रहे इस क्रिएटिव का मक़सद जनता को सच बताना नहीं बल्कि झूठ फैलाकर राहुल गाँधी का चरित्र हनन करना है। अब सवाल ये है कि यदि बीजेपी की नज़र में राहुल गाँधी वाक़ई पप्पू या नादान, नासमझ, बड़े बाप की बिगड़ी औलाद हैं, तो फिर पूरा भगवा परिवार उन्हें लेकर हमेशा ख़ौफ़ज़दा क्यों रहता है? बीजेपी पर भी काँग्रेस का असहज ख़ौफ़ हमेशा क्यों नज़र आता है? ख़ासकर तब, जबकि उसका दावा है कि वो काँग्रेस मुक्त भारत बना चुकी है! इस झूठ के विपरीत सच ये है कि बीजेपी को अच्छी तरह से पता है कि देरसबेर जो भी हो, लेकिन सिर्फ़ काँग्रेस ही उसकी सत्ता को ध्वस्त कर सकती है!

इसीलिए, बीजेपी का हरेक नेता जब-तब राहुल गाँधी का चरित्र हनन करता रहता है। बीजेपी को ये जन्मजात पीड़ा है कि काँग्रेस, नेहरू-गाँधी परिवार से जुड़े राहुल जैसे व्यक्ति को अपना नेता कैसे मान सकती है? इसी परिवार की मेनका गाँधी और उनका बेटा वरूण गाँधी वंशवाद की देन नहीं है, लेकिन राहुल हैं! इसीलिए, ये दिलचस्प सवाल पैदा होता है कि क्या काँग्रेसियों को अपना नेता तय करने के लिए बीजेपी से मशविरा करना चाहिए? वंशवादी बीमारी से बीजेपी भी अछूती नहीं है। उसके दर्जनों नेता परिवारवाद की नुमाइन्दगी करते हैं, लेकिन उसे सिर्फ़ राहुल को लेकर ऐतराज़ है! यही है ‘गुल खाये, गुलगुले से परहेज़’यानी बिलावजह का दोगलापन। बीजेपी की ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें ही उसे ऐसे दलदल में ढकेल देती हैं, जहाँ से वो कभी निकल नहीं पाती।

बीजेपी और उसके वैचारिक गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ऐसी अतार्किक रणनीति को देखकर ऐसा लगता है कि कभी किसी धर्मात्मा ने इसे श्राप दिया होगा कि इसके झूठ ही इसके पतन की वजह बनेंगे। शायद, ये श्राप महात्मा गाँधी जैसे धर्मात्मा ने अपनी हत्या के वक़्त दिया हो! वर्ना, कोई संघ का पूरा इतिहास उठाकर देख ले, इस संगठन की वैचारिक सोच हमेशा किसी न किसी तरह के झूठ पर ही आश्रित रही है। इसके झूठ ने ही गाँधी की हत्या करवायी। संघ के कार्यकर्ता हमेशा समाज में तरह-तरह का झूठ फैलाकर अपनी पैठ बनाते हैं। लेकिन जब उसके झूठ बेपर्दा हो जाते हैं, तो उसका महल भरभराकर ढह जाता है। जनता पार्टी के शासन के वक़्त, राम मन्दिर आन्दोलन के उफान के वक़्त, वाजपेयी सरकार के पतन के वक़्त और अब मोदी राज की गिरती लोकप्रियता के वक़्त बीजेपी को हमेशा सबसे ज़्यादा आघात उसके अपने ही झूठों से लगता रहा है। लेकिन संघी तो अपनी फ़ितरत से लाचार है!

अब ज़रा बीजेपी के इस सोशल मीडिया क्रिएटिव पर ग़ौर कीजिए। इसमें राहुल गाँधी के हवाले से जो बात फैलायी जा रही है, वो उसने कभी कही ही नहीं। राहुल को तो छोड़िए, काँग्रेस के किसी भी चंगू-मंगू नेता ने भी कभी ये नहीं कहा कि मर्सीडिज और आटा पर जीएसटी की एक ही दर लागू होनी चाहिए। या, काँग्रेस सत्ता में आएगी तो ऐसा ही करके दिखाएगी। ये कपोल-कल्पना है! बेहद दुर्भावनापूर्ण! मर्सीडिज और आटा की तुलना, हरेक लिहाज़ से असंगत है। सिर्फ़ निपट मूर्ख ही ऐसी तुलना कर सकते हैं! ऐसे क्रिएटिव को डिज़ाइन करने वालों से कौन पूछे कि भाई, ज़रा ये तो बताओ कि आटा या गेहूँ पर कोई टैक्स है क्या? क्या पहले कभी किसी भी सरकार में इस पर टैक्स लगता था? यदि हाँ, तो कब और कितना? साफ़ है कि बीजेपी जनता में झूठ फैलाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। मज़े की बात ये है कि बीजेपी को कतई ये डर नहीं सताता कि जब उसके झूठ की पोल खुलेगी तो जनता क्या हाल करेगी!

सच्चाई तो ये है कि 18 हो या 28 फ़ीसदी, ये टैक्स की महज एक दर है! टैक्स की दर कैसी हो, कितनी हो, इसके भी मान्य अर्थशास्त्रीय सिद्धान्त हैं। ये उसी तरह से है जैसे दाल में नमक की मात्रा के नियम है। इसकी मात्रा को ग़रीबी-अमीरी से नहीं जोड़ा जा सकता। इसीलिए, यदि नियम ये होता कि सभी कारों पर एक लाख रुपये टैक्स लगेगा। तब ये आलोचना सही हो सकती है कि मँहगी और सस्ती कारों पर एक जैसा टैक्स ग़लत है। लेकिन जब आप कारों पर 18% टैक्स लगाने की बात करेंगे तो इसका मतलब ये है कि 5 लाख वाली कार पर 90 हज़ार रुपये GST लगेगा तो एक करोड़ रुपये की कार पर 18 लाख रुपये GST होगा।90 हज़ार और 18 लाख में जो अन्तर है उसकी व्याख्या ज़रूरी ग़रीबी-अमीरी से जोड़ी जा सकती है।

इसका काल्पनिक पहलू ये भी हो सकता है कि यदि कोई महँगी कार के हज़ार पुर्ज़े ख़रीदकर भी उसकी असेंबलिंग कर ले तो भी टैक्स को नुकसान नहीं हो सकता। क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से ही सही, 18-28 के फ़ार्मूले में टैक्स चोरी मुमकिन है! इसके अलावा, टैक्स को हमेशा ‘आइसिंग ऑन द केक’ की तरह न्यूनतम होना चाहिए। टैक्स का सिद्धान्त ये कहता है कि यदि इसकी दर ऊँची होगी तो चीज़ों के महँगा होने की वजह से खपत गिर जाएगी। खपत गिरने से टैक्स भी गिरेगा और ऊँची दर से बचने के लिए टैक्स चोरी के हथकंड़ों को उकसावा मिलेगी। इसके भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा। इसीलिए यदि कोई सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को मारकर खाना चाहेगा तो क्या आप उसे विवेकशील समझेंगे!

जैसे अपरिमित ज्ञान को जानने के लिए अलग-अलग विषय बनाये गये, वैसे ही अलग-अलग चीज़ों के लिए अलग-अलग टैक्स का विधान भी बनाना गया। याद कीजिए, उन परिस्थितियों को जब देश ने सोने पर आयात शुल्क ख़त्म किया था। आयात पर टैक्स लगाकर राजस्व जुटाना हमेशा सही माना गया है। फिर उसे ख़त्म क्यों किया गया? इस प्रश्न का उत्तर है: तस्करी रोकने के लिए! बेशक, सोने की ख़पत ग़रीबों में नहीं होती। लेकिन तस्करी किसी भी अर्थतंत्र के लिए कलंक और चुनौती है। इसकी रोकथाम के लिए हर देश को एक क़ीमत चुकानी पड़ती है। यही वजह है कि अलग-अलग चीज़ों के लिए अलग-अलग आर्थिक नीति बनाने की ज़रूरत पड़ती है। ऐसा हमेशा से होता रहा है और हमेशा होता रहेगा। और, जहाँ ऐसा नहीं होगा, वहाँ का मुहावरा होगा, ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा, टके सेर  भाजी टके सेर खाजा!’

अगली बात, यदि मोदी सरकार के GST में ख़ामियाँ नहीं होतीं तो उन्हें जुलाई से अब तक मोदी-जेटली को इतने परिवर्तन क्यों करने पड़े! दरअसल, सरकार में बैठे मूर्ख नेता ग़लतियाँ करने से तभी बचेंगे, जब उनमें ऐसी विनम्रता हो कि वो अनुभवी लोगों के मशविरे से लाभ उठाने से गुरेज़ नहीं करें। इतिहास गवाह है कि जिन्हें ये गुमान हो जाए कि वो सर्वज्ञ हैं, उन्हें किसी मशविरे की ज़रूरत नहीं, तब उनसे छोटी-मोटी भूल नहीं बल्कि भयंकर ग़लतियाँ होंगी! जो उन्हें थूककर चाटने के लिए मज़बूर कर देंगी! यही अभी हो रहा है। ऐसी ही मूर्खता, नोटबन्दी के वक़्त भी की गयी थी। उसका अंज़ाम भी जब जनता के सामने आया तो मोदी सरकार के सारे झूठ, भरभराकर ढह गये।

सच तो ये है कि भगवा ख़ानदान को अब जीएसटी और नोटबन्दी जैसे फ़ैसलों को अपनी नीतिगत और वैचारिक भूल मान लेना चाहिए। मसला तो ये जनता से माफ़ी माँगने लायक भी है। हालाँकि, राजनीतिक दल कभी आसानी से माफ़ी नहीं माँगते। लेकिन दोनों ही नीतियों का अकाट्य प्रतिफल देश के सामने है। संघियों को ये समझना पड़ेगा कि उनकी ग़लत नीतियों का अंज़ाम जब जनता भुगत रही हो, तब उसे झूठी दलीलों से नहीं बरगलाया जा सकता! अफ़सोस कि संघी इस तथ्य को कभी समझना नहीं चाहेंगे और इसीलिए जनता इन्हें ज़रूर सबक सिखाएगी। गुरुदासपुर के बाद चित्रकूट से आया जनादेश देख भी ये अहंकारी परिवार सतर्क नहीं हो सकता!

दरअसल, किसी को पसन्द या नापसन्द करने की निश्चित वजह का होना ज़रूरी नहीं होता। ज़्यादातर मोदी भक्त ये नहीं जानते कि वो क्यों हिन्दुत्व की तलवारें भाँजते फिर रहे हैं? कहाँ हिन्दुओं की जान पर बनी है?क्या काँग्रेस के ज़माने में हिन्दुओं पर मुसलमान ज़ुल्म किया करते थे? क्या वो, हिन्दुओं को घर में घुसकर मार डालते थे? बीजेपी की तुष्टिकरण की दलीलों में कुछ दम भले हो, लेकिन क्या मोदी राज में हिन्दुओं का ऐसा तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण नहीं किया गया जिसने इन्हें अनावश्यक रूप से उच्चशृंखल, उद्दंड, वहशी और अतार्किक बना डाला है? इसीलिए, ये समझना बेहद ज़रूरी है कि बीजेपी, कैसे देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर अपनी सत्ता बचाने के लिए देश का सत्यानाश कर रही है। ऐसा सिर्फ़ इसलिए हो पा रहा है कि हमने तर्क और कुतर्क की बारीकियों को समझते हुए तथ्यों को परखना बन्द कर दिया है। तभी तो हमसे कहा जाता है कि हमें मानना ही पड़ेगा कि ‘विकास’ हो रहा है, क्योंकि वो कह रहे हैं! हम दिख क्या रहा है? महसूस क्या हो रहा है? इन तथ्यों को कौन गौण बनाना चाहता है!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

 

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