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क्या संघ को श्राप है कि उसके झूठ ही उसका अन्त करेंगे…!

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बीजेपी को कुतर्क और झूठ से अगाध प्रेम क्यों है! जबकि हमेशा झूठ ही इसके पतन का कारण बनता है! बीजेपी की शारीरिक संरचना (Anatomy) कुत्ते की पूँछ की तरह क्यों है जो लाख जतन के बावजूद टेढ़ी की टेढ़ी ही बनी रहती है! क्यों ऐसा है कि बीजेपी अपनी मूर्खताओं से कोई सबक नहीं लेती! उल्टा एक ग़लती को छिपाने के लिए कुतर्कों का सहारा लेकर सौ ग़लतियाँ और करती है। एक झूठ को छिपाने के लिए सौ झूठ और बोलती है! उपरोक्त बातों की तह में जाने के लिए ज़रा इस लेख में संलग्न निम्न तस्वीर को ग़ौर से देखिए। इसे बीजेपी के प्रचार तंत्र में बैठे लोगों ने निपट मूर्ख भारतीयों के लिए तैयार किया है। क्योंकि इनकी प्रचार सामग्री के झाँसे में सिर्फ़ मूर्ख लोग ही फँस सकते हैं।

बीजेपी के सोशल मीडिया सेल की ओर से फैलाये जा रहे इस क्रिएटिव का मक़सद जनता को सच बताना नहीं बल्कि झूठ फैलाकर राहुल गाँधी का चरित्र हनन करना है। अब सवाल ये है कि यदि बीजेपी की नज़र में राहुल गाँधी वाक़ई पप्पू या नादान, नासमझ, बड़े बाप की बिगड़ी औलाद हैं, तो फिर पूरा भगवा परिवार उन्हें लेकर हमेशा ख़ौफ़ज़दा क्यों रहता है? बीजेपी पर भी काँग्रेस का असहज ख़ौफ़ हमेशा क्यों नज़र आता है? ख़ासकर तब, जबकि उसका दावा है कि वो काँग्रेस मुक्त भारत बना चुकी है! इस झूठ के विपरीत सच ये है कि बीजेपी को अच्छी तरह से पता है कि देरसबेर जो भी हो, लेकिन सिर्फ़ काँग्रेस ही उसकी सत्ता को ध्वस्त कर सकती है!

इसीलिए, बीजेपी का हरेक नेता जब-तब राहुल गाँधी का चरित्र हनन करता रहता है। बीजेपी को ये जन्मजात पीड़ा है कि काँग्रेस, नेहरू-गाँधी परिवार से जुड़े राहुल जैसे व्यक्ति को अपना नेता कैसे मान सकती है? इसी परिवार की मेनका गाँधी और उनका बेटा वरूण गाँधी वंशवाद की देन नहीं है, लेकिन राहुल हैं! इसीलिए, ये दिलचस्प सवाल पैदा होता है कि क्या काँग्रेसियों को अपना नेता तय करने के लिए बीजेपी से मशविरा करना चाहिए? वंशवादी बीमारी से बीजेपी भी अछूती नहीं है। उसके दर्जनों नेता परिवारवाद की नुमाइन्दगी करते हैं, लेकिन उसे सिर्फ़ राहुल को लेकर ऐतराज़ है! यही है ‘गुल खाये, गुलगुले से परहेज़’यानी बिलावजह का दोगलापन। बीजेपी की ऐसी मूर्खतापूर्ण बातें ही उसे ऐसे दलदल में ढकेल देती हैं, जहाँ से वो कभी निकल नहीं पाती।

बीजेपी और उसके वैचारिक गुरुकुल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की ऐसी अतार्किक रणनीति को देखकर ऐसा लगता है कि कभी किसी धर्मात्मा ने इसे श्राप दिया होगा कि इसके झूठ ही इसके पतन की वजह बनेंगे। शायद, ये श्राप महात्मा गाँधी जैसे धर्मात्मा ने अपनी हत्या के वक़्त दिया हो! वर्ना, कोई संघ का पूरा इतिहास उठाकर देख ले, इस संगठन की वैचारिक सोच हमेशा किसी न किसी तरह के झूठ पर ही आश्रित रही है। इसके झूठ ने ही गाँधी की हत्या करवायी। संघ के कार्यकर्ता हमेशा समाज में तरह-तरह का झूठ फैलाकर अपनी पैठ बनाते हैं। लेकिन जब उसके झूठ बेपर्दा हो जाते हैं, तो उसका महल भरभराकर ढह जाता है। जनता पार्टी के शासन के वक़्त, राम मन्दिर आन्दोलन के उफान के वक़्त, वाजपेयी सरकार के पतन के वक़्त और अब मोदी राज की गिरती लोकप्रियता के वक़्त बीजेपी को हमेशा सबसे ज़्यादा आघात उसके अपने ही झूठों से लगता रहा है। लेकिन संघी तो अपनी फ़ितरत से लाचार है!

अब ज़रा बीजेपी के इस सोशल मीडिया क्रिएटिव पर ग़ौर कीजिए। इसमें राहुल गाँधी के हवाले से जो बात फैलायी जा रही है, वो उसने कभी कही ही नहीं। राहुल को तो छोड़िए, काँग्रेस के किसी भी चंगू-मंगू नेता ने भी कभी ये नहीं कहा कि मर्सीडिज और आटा पर जीएसटी की एक ही दर लागू होनी चाहिए। या, काँग्रेस सत्ता में आएगी तो ऐसा ही करके दिखाएगी। ये कपोल-कल्पना है! बेहद दुर्भावनापूर्ण! मर्सीडिज और आटा की तुलना, हरेक लिहाज़ से असंगत है। सिर्फ़ निपट मूर्ख ही ऐसी तुलना कर सकते हैं! ऐसे क्रिएटिव को डिज़ाइन करने वालों से कौन पूछे कि भाई, ज़रा ये तो बताओ कि आटा या गेहूँ पर कोई टैक्स है क्या? क्या पहले कभी किसी भी सरकार में इस पर टैक्स लगता था? यदि हाँ, तो कब और कितना? साफ़ है कि बीजेपी जनता में झूठ फैलाकर अपना उल्लू सीधा करना चाहती है। मज़े की बात ये है कि बीजेपी को कतई ये डर नहीं सताता कि जब उसके झूठ की पोल खुलेगी तो जनता क्या हाल करेगी!

सच्चाई तो ये है कि 18 हो या 28 फ़ीसदी, ये टैक्स की महज एक दर है! टैक्स की दर कैसी हो, कितनी हो, इसके भी मान्य अर्थशास्त्रीय सिद्धान्त हैं। ये उसी तरह से है जैसे दाल में नमक की मात्रा के नियम है। इसकी मात्रा को ग़रीबी-अमीरी से नहीं जोड़ा जा सकता। इसीलिए, यदि नियम ये होता कि सभी कारों पर एक लाख रुपये टैक्स लगेगा। तब ये आलोचना सही हो सकती है कि मँहगी और सस्ती कारों पर एक जैसा टैक्स ग़लत है। लेकिन जब आप कारों पर 18% टैक्स लगाने की बात करेंगे तो इसका मतलब ये है कि 5 लाख वाली कार पर 90 हज़ार रुपये GST लगेगा तो एक करोड़ रुपये की कार पर 18 लाख रुपये GST होगा।90 हज़ार और 18 लाख में जो अन्तर है उसकी व्याख्या ज़रूरी ग़रीबी-अमीरी से जोड़ी जा सकती है।

इसका काल्पनिक पहलू ये भी हो सकता है कि यदि कोई महँगी कार के हज़ार पुर्ज़े ख़रीदकर भी उसकी असेंबलिंग कर ले तो भी टैक्स को नुकसान नहीं हो सकता। क्योंकि सैद्धान्तिक रूप से ही सही, 18-28 के फ़ार्मूले में टैक्स चोरी मुमकिन है! इसके अलावा, टैक्स को हमेशा ‘आइसिंग ऑन द केक’ की तरह न्यूनतम होना चाहिए। टैक्स का सिद्धान्त ये कहता है कि यदि इसकी दर ऊँची होगी तो चीज़ों के महँगा होने की वजह से खपत गिर जाएगी। खपत गिरने से टैक्स भी गिरेगा और ऊँची दर से बचने के लिए टैक्स चोरी के हथकंड़ों को उकसावा मिलेगी। इसके भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा। इसीलिए यदि कोई सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को मारकर खाना चाहेगा तो क्या आप उसे विवेकशील समझेंगे!

जैसे अपरिमित ज्ञान को जानने के लिए अलग-अलग विषय बनाये गये, वैसे ही अलग-अलग चीज़ों के लिए अलग-अलग टैक्स का विधान भी बनाना गया। याद कीजिए, उन परिस्थितियों को जब देश ने सोने पर आयात शुल्क ख़त्म किया था। आयात पर टैक्स लगाकर राजस्व जुटाना हमेशा सही माना गया है। फिर उसे ख़त्म क्यों किया गया? इस प्रश्न का उत्तर है: तस्करी रोकने के लिए! बेशक, सोने की ख़पत ग़रीबों में नहीं होती। लेकिन तस्करी किसी भी अर्थतंत्र के लिए कलंक और चुनौती है। इसकी रोकथाम के लिए हर देश को एक क़ीमत चुकानी पड़ती है। यही वजह है कि अलग-अलग चीज़ों के लिए अलग-अलग आर्थिक नीति बनाने की ज़रूरत पड़ती है। ऐसा हमेशा से होता रहा है और हमेशा होता रहेगा। और, जहाँ ऐसा नहीं होगा, वहाँ का मुहावरा होगा, ‘अन्धेर नगरी चौपट राजा, टके सेर  भाजी टके सेर खाजा!’

अगली बात, यदि मोदी सरकार के GST में ख़ामियाँ नहीं होतीं तो उन्हें जुलाई से अब तक मोदी-जेटली को इतने परिवर्तन क्यों करने पड़े! दरअसल, सरकार में बैठे मूर्ख नेता ग़लतियाँ करने से तभी बचेंगे, जब उनमें ऐसी विनम्रता हो कि वो अनुभवी लोगों के मशविरे से लाभ उठाने से गुरेज़ नहीं करें। इतिहास गवाह है कि जिन्हें ये गुमान हो जाए कि वो सर्वज्ञ हैं, उन्हें किसी मशविरे की ज़रूरत नहीं, तब उनसे छोटी-मोटी भूल नहीं बल्कि भयंकर ग़लतियाँ होंगी! जो उन्हें थूककर चाटने के लिए मज़बूर कर देंगी! यही अभी हो रहा है। ऐसी ही मूर्खता, नोटबन्दी के वक़्त भी की गयी थी। उसका अंज़ाम भी जब जनता के सामने आया तो मोदी सरकार के सारे झूठ, भरभराकर ढह गये।

सच तो ये है कि भगवा ख़ानदान को अब जीएसटी और नोटबन्दी जैसे फ़ैसलों को अपनी नीतिगत और वैचारिक भूल मान लेना चाहिए। मसला तो ये जनता से माफ़ी माँगने लायक भी है। हालाँकि, राजनीतिक दल कभी आसानी से माफ़ी नहीं माँगते। लेकिन दोनों ही नीतियों का अकाट्य प्रतिफल देश के सामने है। संघियों को ये समझना पड़ेगा कि उनकी ग़लत नीतियों का अंज़ाम जब जनता भुगत रही हो, तब उसे झूठी दलीलों से नहीं बरगलाया जा सकता! अफ़सोस कि संघी इस तथ्य को कभी समझना नहीं चाहेंगे और इसीलिए जनता इन्हें ज़रूर सबक सिखाएगी। गुरुदासपुर के बाद चित्रकूट से आया जनादेश देख भी ये अहंकारी परिवार सतर्क नहीं हो सकता!

दरअसल, किसी को पसन्द या नापसन्द करने की निश्चित वजह का होना ज़रूरी नहीं होता। ज़्यादातर मोदी भक्त ये नहीं जानते कि वो क्यों हिन्दुत्व की तलवारें भाँजते फिर रहे हैं? कहाँ हिन्दुओं की जान पर बनी है?क्या काँग्रेस के ज़माने में हिन्दुओं पर मुसलमान ज़ुल्म किया करते थे? क्या वो, हिन्दुओं को घर में घुसकर मार डालते थे? बीजेपी की तुष्टिकरण की दलीलों में कुछ दम भले हो, लेकिन क्या मोदी राज में हिन्दुओं का ऐसा तुष्टिकरण और ध्रुवीकरण नहीं किया गया जिसने इन्हें अनावश्यक रूप से उच्चशृंखल, उद्दंड, वहशी और अतार्किक बना डाला है? इसीलिए, ये समझना बेहद ज़रूरी है कि बीजेपी, कैसे देश के बहुसंख्यक हिन्दुओं को मूर्ख बनाकर अपनी सत्ता बचाने के लिए देश का सत्यानाश कर रही है। ऐसा सिर्फ़ इसलिए हो पा रहा है कि हमने तर्क और कुतर्क की बारीकियों को समझते हुए तथ्यों को परखना बन्द कर दिया है। तभी तो हमसे कहा जाता है कि हमें मानना ही पड़ेगा कि ‘विकास’ हो रहा है, क्योंकि वो कह रहे हैं! हम दिख क्या रहा है? महसूस क्या हो रहा है? इन तथ्यों को कौन गौण बनाना चाहता है!

Mukesh Kumar Singh

मुकेश कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार

(ये लेखक के निजी विचार हैं।)

 

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बस, एक-एक बार ही जीते विश्वास और अविश्वास

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No-trust motion Parliament

संसदीय लोकतंत्र में ऐसे अनोखे मौक़े भी आते हैं जब विश्वास या अविश्वास का मतलब एक ही होता है! सरकार को गिराने के लिए अविश्वास और बचाने के लिए विश्वास प्रस्ताव लाया जाता है। विपक्ष का प्रस्ताव सरकार के प्रति अविश्वास और गुस्सा दिखाने के लिए होता है तो प्रधानमंत्री का प्रस्ताव अपने लिए विश्वास की दुहाई माँगता है! दोनों से सरकार की ताक़त और उसकी क़िस्मत तय होती हैं। दोनों से बहुमत की जाँच होती है। दोनों लोकसभा के एक ही नियम से संचालित होते हैं।

विश्वास और अविश्वास को मिलाकर, लोकसभा में अब तक 27 बार शक्ति-परीक्षण के मौके आये हैं। विपक्ष की ओर से 20 बार अविश्वास प्रस्ताव लाये गये। लेकिन वो सिर्फ़ एक बार ही सरकार गिरा पाया। जुलाई 1979 में मोरारजी देसाई को अपने ख़िलाफ़ पेश हुए अविश्वास प्रस्ताव के पारित होने पर इस्तीफ़ा देना पड़ा। दूसरी ओर, अब तक 7 बार प्रधानमंत्रियों को विश्वास मत पेश करना पड़ा है। इसमें से 6 बार उन्हें हार मिली। जुलाई 2008 में विश्वास मत जीतने वाले मनमोहन सिंह एकलौते प्रधानमंत्री बने।

प्रथम अविश्वास प्रस्ताव की नौबत तीसरी लोकसभा में आयी। अगस्त 1963 में समाजवादी नेता आचार्य जेबी कृपलानी ने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया। वो चार दिनों तक चली 21 घंटे लम्बी बहस के बाद गिर गया। लाल बहादुर शास्त्री ने भी अपने छोटे कार्यकाल के बावजूद तीन बार अविश्वास प्रस्तावों को नाकाम किया। सबसे ज़्यादा अविश्वास प्रस्तावों के सामने अडिग रहने का कीर्तिमान इन्दिरा गाँधी के नाम है। उन्होंने 15 बार अविश्वास प्रस्तावों को परास्त किया। 1966 से 1975 के बीच 12 बार और 1981 से 1982 के दरम्यान तीन बार।

मोरारजी देसाई ने दो बार शक्ति-परीक्षण का सामना किया। 1977 में उन्होंने पहला विश्वास प्रस्ताव जीता था। लेकिन 1979 में दूसरे अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में वोटिंग की नौबत आने से पहले जब मोरारजी ने पाया कि वो बहुमत गँवा बैठे हैं तो उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया। वो पहला मौक़ा था जब अविश्वास प्रस्ताव पारित होने की वजह से सरकार गिरी थी। बाक़ी जितनी भी सरकारें अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले गिरीं, वो सभी विश्वास प्रस्तावों के पारित नहीं होने से सत्ता से बाहर हुई थीं।

पहली बार जुलाई 2008 में मनमोहन सिंह की ओर से लाया गया विश्वास प्रस्ताव लोकसभा में पारित हुआ। जबकि उससे पहले पेश हुए तीन विश्वास प्रस्तावों को नकारा जा चुका था। 1990 में विश्वनाथ प्रताप सिंह, 1997 में एचडी देवेगौड़ा और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के विश्वास प्रस्ताव लोकसभा ने पारित नहीं किये। तीन मौके ऐसे भी रहे जब प्रधानमंत्री ने अपने विश्वास प्रस्ताव पर मत-विभाजन यानी वोटिंग की नौबत आने से पहले ही इस्तीफ़ा दे दिया। जुलाई 1979 में मोरारीजी देसाई, अगस्त 1979 में चौधरी चरण सिंह और मई 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी ने विश्वास प्रस्ताव पर मतदान होने से पहले इस्तीफ़ा दे दिया था।

नरसिम्हा राव ने तीन बार और राजीव गाँधी तथा अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों को एक-एक बार अविश्वास प्रस्ताव को हराने का मौक़ा मिला। वाजपेयी ने 17 अप्रैल 1999 को एक वोट से अपने विश्वास प्रस्ताव पर हार का मुँह देखा। लेकिन चार साल बाद 2003 में उनके ख़िलाफ़ पेश हुआ अविश्वास प्रस्ताव पारित नहीं हुआ।

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ज़रा हटके

अब कौन कहेगा, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो’

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Gopaldas Neeraj

नई दिल्ली, 19 जुलाई | ‘लिखे जो खत तुझे‘, ‘ऐ भाई! जरा देख के चलो‘, ‘दिल आज शायर है‘, ‘जीवन की बगिया महकेगी‘, ‘खिलते हैं गुल यहां’ जैसे मशहूर गानों के जरिए लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले हिंदी के प्रख्यात गीतकार और कवि गोपाल दास नीरज 93 वर्ष की उम्र में गुरुवार को दुनिया छोड़ चले, लेकिन ऐसा जिंदादिल कवि कभी मरता है क्या!

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले स्थित पुरवली गांव में 4 जनवरी, 1925 को जन्मे गोपाल दास नीरज जब छह वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। सन् 1942 में एटा से हाईस्कूल परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास करने के बाद उन्होंने इटावा की कचहरी में कुछ समय टाइपिस्ट का काम किया। उसके बाद सिनेमाघर की एक दुकान पर नौकरी की, लेकिन लिखने की कला अपने हाथ में समेटे गोपाल दास लंबी बेकारी के बाद दिल्ली आ गए।

दिल्ली आकर उन्होंने सफाई विभाग में टाइपिस्ट की नौकरी की। वहां से नौकरी छूट जाने पर कानपुर के डीएवी कॉलेज में क्लर्की की। फिर बाल्कट ब्रदर्स नाम की एक प्राइवेट कंपनी में पांच साल तक टाइपिस्ट का काम किया। नौकरी करने के साथ प्राइवेट परीक्षाएं देकर 1949 में 12वीं, 1951 में बीए और 1953 में प्रथम श्रेणी में हिंदी से एमए पास किया।

Image result for neeraj poet पद्मभूषण सम्मान

‘दर्द दिया है’, ‘आसावरी’, ‘बादलों से सलाम लेता हू’ं, ‘गीत जो गाए नहीं’, ‘कुछ दोहे नीरज के’, ‘नीरज की पाती’ जैसे रचना संग्रह, ‘तमाम उम्र मैं इक अजनबी के घर में रहा’, ‘हम तेरी चाह में, ऐ यार! वहां तक पहुंचे’, ‘अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाया जाए’, ‘दूर से दूर तलक एक भी दरख्त न था’ , ‘पीछे है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिये’ जैसी गजलें लिखने वाले मशहूर कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज को 1991 में पद्मश्री और 2007 में पद्मभूषण सम्मान से भी नवाजा गया था।

उत्तर प्रदेश सरकार ने भी यश भारती सम्मान से सम्मानित कर उनके दमदार लेखनी को सराहा था। बॉलीवुड फिल्मों में कई सुपरहिट गाने लिखकर अपना लोहा मनवाया था। उन्हें उनकी लेखनी के लिए कई बार सम्मानित किया गया था। उन्होंने तीन बार फिल्म फेयर अवार्ड भी अपने नाम किया था।

हिंदी मंचों के प्रसिद्ध कवियों में शुमार नीरज को अंतिम दिनों में सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, जिस कारण मंगलवार को तबीयत बिगड़ने के बाद आगरा के लोटस हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था, लेकिन तबीयत ज्यादा खराब होने पर उन्हें एम्स लाया गया, हालांकि बुधवार को तबीयत में सुधार की भी खबरें आई थीं, लेकिन अगले दिन नीरज ने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके लाखों चाहने वालों का दिल आज रोएगा बहुत, उनकी प्रसिद्ध कविता ‘रोने वाला ही गाता है’ सबको ढाढस बंधाएगी। कवि कभी मरता नहीं, नीरज सदियों अपनी रचनाओं के रूप में जीवित रहेंगे। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!!!

–आईएएनएस

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ज़रा हटके

ग्रेटर नोएडा : इमारत में इसी सप्ताह हुआ था ‘गृह प्रवेश’

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Greater Noida building collapse

ग्रेटर नोएडा, 18 जुलाई (आईएएनएस)| ग्रेटर नोएडा में मंगलवार रात धराशायी हुई इमारत में हाल ही में अपनी मां के साथ रहने आए शिव त्रिवेदी (25) ने इसी सप्ताहांत गृह प्रवेश की पूजा आयोजित की थी। उनके सपनों के घर को सजाने के लिए उनकी साली अपने एक वर्षीय बच्चे के साथ यहीं रुक गईं थीं।

बुधवार को वे सभी एक बहुमजिला इमारत के उनकी इमारत के ऊपर ढहने से उसके मलवे में फंसे थे और इसमें उनके जीवित नहीं रहने की संभावना है।

दर्जनों बचाव कर्मी मलबे को हटाने के लिए क्रेनों और बुलडोजरों का इस्तेमाल कर रहे हैं। दूर रोते हुए खड़े त्रिवेदी परिवार के सदस्य मलवे में फंसे चारों लोगों के जीवन की प्रार्थना कर रहे थे।

Greater Noida Building

नोएडी की एक कंपनी में शाखा प्रबंधक शिव उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में रह रहे अपने माता-पिता के दो बेटों में छोटे हैं। तीन साल पहले बेहतर जीवन की तलाश में वे नोएडा रहने लगे थे।

उनके पिता ने कहा कि शिव परिवार के लिए आशा की किरण है और हमेशा से ही होनहार रहे हैं।

शिव ने दिल्ली आने के मात्र तीन सालों के अंदर इसी मार्च में ये घर खरीदा था।

शिव के एक चाचा ने आईएएनएस को बताया, “उसने काफी कम उम्र में बहुत कुछ हासिल कर लिया था। मेरी आयु 50 है और मैं अपने परिवार के लिए घर नहीं खरीद सकता। लेकिन उसने मात्र 25 वर्ष की आयु में घर खरीद लिया।”

उन्होंने अपने कार्यालय में आखिरी बार मंगलवार को रात लगभग 8.50 बजे बात की थी। लेकिन उसके बाद से उनसे संपर्क नहीं हो सका क्योंकि वे इस हादसे का शिकार हो गए। उनकी इमारत दिल्ली के व्यावसायिक केंद्र कनॉट प्लेस से लगभग 30 किलोमीटर दूर स्थित है।

शिव के पिता, बड़े भाई, दो चाचा, चचेरे भाई और अन्य करीबी रिश्तेदार बुधवार सुबह तक घटनास्थल पर पहुंच गए थे।

शिव के भाई राम त्रिवेदी (27) ने आईएएनएस को बताया, “मुझे विश्वास है कि वे मलबे में हैं और उनके जीवित होने का भी पूर्ण विश्वास है लेकिन उन्हें जल्दी निकाले जाने की जरूरत है।”

पेशे से वकील राम ने कहा कि शिव ने शनिवार को गृह प्रवेश पूजा का आयोजन किया था जिसके बाद शिव की मां, साली और उनकी एक वर्षीय बेटी को छोड़कर लगभग सभी लोग मैनपुरी चले गए थे। ये लोग नए घर में कुछ दिन उनके साथ रहने और घर को व्यवस्थित करने के लिए यहीं रुक गए थे।

विचलित राम ने बैठने से मना कर दिया, इस दौरान वे मुट्ठी बांधे लगातार मलबे की तरफ देख रहे थे।

परिजनों ने आरोप लगाया कि इमारत के निर्माण में बिल्डर ने घटिया निर्माण सामग्री का उपयोग किया था। उन्होंने बचाव अभियान के देर से शुरू होने की भी शिकायत की, जिससे इमारत में फंसे हुए लोगों के जीवित बचने की उम्मीद कम हो गई है।

शिव के एक रिश्तेदार ने क्षेत्र में नियमों में ढिलाई का आरोप लगाते हुए कहा, “इतना समय हो गया है और हमारे परिवार का अभी तक कोई पता नहीं लगा है। उन्होंने अगर रात में ही बचाव अभियान शुरू किया होता तो मेरे परिवार को बचाया जा सकता था।”

–आईएएनएस

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