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क्या टर्नबुल ने मोदी भक्तों के लिए ऑस्ट्रेलियाई वीज़ा नीति का तोहफ़ा भेजा है?

मेलबर्न से ख़बर आयी कि ऑस्ट्रेलिया ने अपने 457-वीजा प्रोग्राम को रद्द कर दिया है। इसी की बदौलत ऑस्ट्रेलिया में क़रीब एक लाख विदेशी कामगार हैं। इसके क़रीब 80 फ़ीसदी लाभार्थी भारतीय हैं। साफ़ है कि ऑस्ट्रेलिया अपने देश में ज़्यादा भारतीय नहीं चाहता। बहाना वहाँ की बेरोज़गारी को बनाया गया। वो भी दिल्ली के अक्षरधाम में दिखे नरेन्द्र मोदी और मैल्कम टर्नबुल की गलबहियाँ के बमुश्किल हफ़्ते भर के भीतर! सोशल मीडिया पर ये ख़बर गुलाटी खाने लगी तो वरिष्ठ पत्रकार और अग्रज रमेश परीदा जी का आदेश हुआ कि इस पर एक टिप्पणी लिखूँ कि आख़िर हफ़्ते भर में कोई राजनीतिज्ञ इतना कैसे बदल सकता है? मैंने लिखा कि ऑस्ट्रेलिया की वीज़ा नीति में आये इस बदलाव में, वैसे ही, कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है, जैसा बीते तीन साल में हम अलग-अलग मौक़ों पर देख चुके हैं!

याद है न! ये नेपाल में धमाका मचाने गये थे! फिर भूकम्प राहत की आड़ में इन्होंने जो किया और उस पर, उधर से, कैसी प्रतिक्रिया हुई! चीन से एक मेहमान आये थे उनके साथ भी ख़ूब झूले पे झूमा गया, लेकिन मेहमान ने अपने देश लौटकर ख़ूब आँखें तरेरीं! उस NGS में हमारी भद्द पिटवायी गयी, जिससे हमें कुछ भी हासिल नहीं होना है। दिल्ली के हैदराबाद हाउस में बराक के साथ लगायी गयी इनकी चाय की चुस्कियाँ भी कितना भारी ड्रॉमा साबित हुई, उसे अमेरिका की वीज़ा नीति में आये बदलाव से भी समझा जा सकता है।

कोई देश अपने यहाँ विदेशियों को पसन्द नहीं करता। लेकिन आपको बीमारी है, वहाँ जाकर ड्रॉमा करने की। ताकि वो आपकी और आपके भक्तों की लोकप्रियता पर लट्टू हों! अभी आपके देश में नेपाली, बाँग्लादेशी, श्रीलंकाई तमिल भी वैसे ही भव्य जलसे करने लगें तो क्या सवा सौ करोड़ भारतीय बहुत गर्व महसूस करेंगे! ख़ैर…

लाहौर की दावत कौन भूला सकता है! उसका हिसाब पहले तो सीमा पर गोलियों की ज़बरदस्त गड़गड़ाहट से मिला, फिर हिन्दुस्तानियों के हाथ के तोते ऐसे उड़े कि आज कश्मीर घाटी जैसी बेहाल है, वैसी तो आतंकवाद के चरम दौर में भी नहीं थी! ये उन परम राष्ट्रवादियों, हिन्दुत्ववादियों, उत्कट देशभक्तों की उपलब्धियों की बानग़ी भर है जो पानी पी-पीकर उनको कोसा करते थे, जिनके ये पसंगा भी साबित नहीं हुए!

अफ़ग़ानिस्तान को ये जिस सलमा बाँध का तोहफ़ा देने गये थे वो 40 साल में बना था। कश्मीर में ‘पत्थर काटने’ वाली सुरंग 11 साल में बनी! घाटी में घूम रही रेल में इनका कोई योगदान नहीं माना जा सकता। बाँग्लादेश, श्रीलंका, भूटान का हाल हम देख चुके हैं। यूएई में मन्दिर के लिए जगह पाना इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। उस पर ज़रूर सवा सौ करोड़ भारतीय इतरा सकते हैं। बांग्लादेश के साथ उलझे हुए इलाक़ों का आदान-प्रदान इनकी दूसरी और आख़िरी उपलब्धि मानी जा सकती है।

बाक़ी अमेरिका, कनाडा, अफ्रीकी देश, इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी, इटली, पुर्तगाल और रूस से इनके कार्यकाल में अभी तक कोई उपलब्धि नहीं है। ख़ूब ढोल पीटा गया था, लेकिन राफ़ेल का कोई नामोनिशान दिखा नहीं। उल्टा उसका गुणगान करने वाले महारथी मनोहर पर्रिकर भी गोवा की लहरों का मज़ा लेने चले गये। क्योंकि सर्ज़िकल हमले के बाद उनका दिल्ली में दम घुट रहा था! विदेशी निवेश की जितनी भी शहनाई बजायी गयी, बाद में उसके सारे सुर, बेसुरे साबित हुए!

लब्बोलुआब ये कि “भाईयों-बहनों, ये कूटनीति (Diplomacy) मेरे वश की बात नहीं। ये मुझसे नहीं हो सकेगा! लेकिन ऐसा बोलने का साहस भी मुझमें नहीं है।” अभी ऑस्ट्रेलिया को अपने देश में मोदी-भक्तों का बढ़ते जाना, फूटी आँख नहीं सोहा रहा तो इससे पहले अमेरिका भी H1B1 के तहत IT Professionals पर यही खोंच लगा चुका है! क्यों हुआ ऐसा? आप तो ट्रम्प को अपना जन्मजात दोस्त मानते थे! अरे, कोई भी देश ये कभी नहीं चाहेगा कि आप अपने देश में तो सालाना दो करोड़ रोज़गार के अवसरों को पैदा करने की बातें करें और जब करके दिखाने की बारी आये तो आपका काँटा 1.5 लाख रोज़गार की संख्या को भी न पार कर सके!

ढोल पीटें आप, Make in India का और भारत में बनाने के लिए आपके पास कुछ भी ख़ास नहीं हो! छह महीना से ऊपर बीत गया, अभी तक आप दुनिया को बता नहीं सके कि आपकी नोटबन्दी से आपकी अर्थव्यवस्था में क्या चार चाँद लगे! दुनिया के ज़्यादातर देशों में गायें हैं कि लेकिन गौरक्षा को लेकर आप जैसे पागलपन का समर्थन करते हैं, उसे विदेशी मेहमान कभी समझ नहीं पाते! तो फिर वो आपके मुरीद बनेंगे कैसे? आपके लिए वो किसी भी तरह की दरियादिली क्यों दिखाना चाहेंगे?

इसलिए कि आपके ईवीएम पर आरोप लग रहे हैं या इसलिए कि आप अपने लोकतंत्र का प्रतिष्ठा को बहाल करने की ख़ातिर 3200 करोड़ रुपये भी ख़र्च करने की औक़ात नहीं रखते! 12500 करोड़ के हिसाब से ये हर व्यक्ति पर चार रुपये जितना है! इसी तरह, आपके उन्मादी हिन्दुत्व से विदेश में रह रहे हिन्दुओं की भी जैसी साम्प्रदायिक छवि बन रही है, उसके बाद कोई भी दूरदर्शी देश आपके भक्तों को वीज़ा देने में परहेज़ नहीं करेगा तो वो अपनी क़ब्र ही खोदेगा।

आप भूल चुके हैं कि यदि भारत की 65 साल की कोई उपलब्धि रही है तो उसमें कट्टरवाद का कोई योगदान नहीं है। उदारवाद से ही आपके देश ने तरक़्क़ी की है और दुनिया में इज़्ज़त पायी है। लेकिन ये बातें आपको तो क्या आपके गुरुकुल में भी शायद ही किसी के पल्ले पड़े, क्योंकि ‘अब न रहे वो पीने वाले, अब न रही वो मधुशाला!’

आपके गुरुजन श्रेष्ठ हिन्दू होने का चाहे जितना दावा करें, लेकिन हैं वो कुएँ के मेंढक ही। न उनका आज़ादी की लड़ाई में कोई योगदान था और न ही लूले-लँगड़े राष्ट्र-निर्माण में! उनके स्वदेशी जागरण को अर्थशास्त्र का पता नहीं, विवेकानन्द केन्द्र को कूटनीति और सामरिकी की अकल नहीं। क्यों सारा आलम मायूसी भरा है? दरअसल, आप ड्रामेबाज़ी करके देश की जनता को तो मूर्ख बना सकते हैं, राज्य दर राज्य भगवा पताकाएँ फहरा सकते हैं, लेकिन विश्व मानचित्र में आपकी ड्रॉमेबाज़ियों का कोई क़द्रदान नहीं हो सकता। कभी होगा भी नहीं! वहाँ आपमें और किम जोंग में ज़्यादा फ़र्क नहीं है!

देख लीजिएगा, इज़राइल से भी आपको ठेंगा ही मिलेगा! आपकी नीयत, है ही इसी लायक़! आप सामने वाले को कुछ नहीं समझने की जिस बीमारी से ग्रस्त हैं, वही कूटनीति का सबसे बड़ा दुश्मन है। आपको मालूम ही नहीं कि कूटनीति में आप कब सफ़ल होते हैं? जब सामने वाले को लगे कि आप उसके हित की बातें कर रहे हैं, जबकि उसके फ़ायदे में आपने अपना फ़ायदा घुसेड़ रखा हो। इसे ‘देकर, लेने की कला’ भी कह सकते हैं। लेकिन आप तो देश की विपक्षी पार्टियों की तरह ही विदेशियों को भी हर वक़्त ललकारना चाहते हैं। क्योंकि आप ख़ुद को ‘स्वघोषित महाशक्ति’ समझते हैं! जबकि ऐसे कपोल-कल्पित महाशक्ति में भी आपका योगदान एक आणे जितना भी नहीं है। क्योंकि आप मूलतः व्यापारी हैं, Statesman नहीं! किसान पैदा करके भूखा मरता है और आप कालाबाज़ारी-जमाख़ोरी करके अरबों-खरबों का वारा न्यारा करते हैं। इस लिहाज़ से आप Colour Blind भी हैं! तो इसका ख़ामियाज़ा देश को तो भोगना ही होगा! यही वजह है ऑस्ट्रेलियाई मेहमान को अक्षरधाम घुमाकर भी आप उसे बरगला नहीं पाते हैं। वो भी वही करता है, जो उसके वोटबैंक को भाता होगा!

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