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क्या टर्नबुल ने मोदी भक्तों के लिए ऑस्ट्रेलियाई वीज़ा नीति का तोहफ़ा भेजा है?

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मेलबर्न से ख़बर आयी कि ऑस्ट्रेलिया ने अपने 457-वीजा प्रोग्राम को रद्द कर दिया है। इसी की बदौलत ऑस्ट्रेलिया में क़रीब एक लाख विदेशी कामगार हैं। इसके क़रीब 80 फ़ीसदी लाभार्थी भारतीय हैं। साफ़ है कि ऑस्ट्रेलिया अपने देश में ज़्यादा भारतीय नहीं चाहता। बहाना वहाँ की बेरोज़गारी को बनाया गया। वो भी दिल्ली के अक्षरधाम में दिखे नरेन्द्र मोदी और मैल्कम टर्नबुल की गलबहियाँ के बमुश्किल हफ़्ते भर के भीतर! सोशल मीडिया पर ये ख़बर गुलाटी खाने लगी तो वरिष्ठ पत्रकार और अग्रज रमेश परीदा जी का आदेश हुआ कि इस पर एक टिप्पणी लिखूँ कि आख़िर हफ़्ते भर में कोई राजनीतिज्ञ इतना कैसे बदल सकता है? मैंने लिखा कि ऑस्ट्रेलिया की वीज़ा नीति में आये इस बदलाव में, वैसे ही, कुछ भी अप्रत्याशित नहीं है, जैसा बीते तीन साल में हम अलग-अलग मौक़ों पर देख चुके हैं!

याद है न! ये नेपाल में धमाका मचाने गये थे! फिर भूकम्प राहत की आड़ में इन्होंने जो किया और उस पर, उधर से, कैसी प्रतिक्रिया हुई! चीन से एक मेहमान आये थे उनके साथ भी ख़ूब झूले पे झूमा गया, लेकिन मेहमान ने अपने देश लौटकर ख़ूब आँखें तरेरीं! उस NGS में हमारी भद्द पिटवायी गयी, जिससे हमें कुछ भी हासिल नहीं होना है। दिल्ली के हैदराबाद हाउस में बराक के साथ लगायी गयी इनकी चाय की चुस्कियाँ भी कितना भारी ड्रॉमा साबित हुई, उसे अमेरिका की वीज़ा नीति में आये बदलाव से भी समझा जा सकता है।

कोई देश अपने यहाँ विदेशियों को पसन्द नहीं करता। लेकिन आपको बीमारी है, वहाँ जाकर ड्रॉमा करने की। ताकि वो आपकी और आपके भक्तों की लोकप्रियता पर लट्टू हों! अभी आपके देश में नेपाली, बाँग्लादेशी, श्रीलंकाई तमिल भी वैसे ही भव्य जलसे करने लगें तो क्या सवा सौ करोड़ भारतीय बहुत गर्व महसूस करेंगे! ख़ैर…

लाहौर की दावत कौन भूला सकता है! उसका हिसाब पहले तो सीमा पर गोलियों की ज़बरदस्त गड़गड़ाहट से मिला, फिर हिन्दुस्तानियों के हाथ के तोते ऐसे उड़े कि आज कश्मीर घाटी जैसी बेहाल है, वैसी तो आतंकवाद के चरम दौर में भी नहीं थी! ये उन परम राष्ट्रवादियों, हिन्दुत्ववादियों, उत्कट देशभक्तों की उपलब्धियों की बानग़ी भर है जो पानी पी-पीकर उनको कोसा करते थे, जिनके ये पसंगा भी साबित नहीं हुए!

अफ़ग़ानिस्तान को ये जिस सलमा बाँध का तोहफ़ा देने गये थे वो 40 साल में बना था। कश्मीर में ‘पत्थर काटने’ वाली सुरंग 11 साल में बनी! घाटी में घूम रही रेल में इनका कोई योगदान नहीं माना जा सकता। बाँग्लादेश, श्रीलंका, भूटान का हाल हम देख चुके हैं। यूएई में मन्दिर के लिए जगह पाना इनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। उस पर ज़रूर सवा सौ करोड़ भारतीय इतरा सकते हैं। बांग्लादेश के साथ उलझे हुए इलाक़ों का आदान-प्रदान इनकी दूसरी और आख़िरी उपलब्धि मानी जा सकती है।

बाक़ी अमेरिका, कनाडा, अफ्रीकी देश, इंग्लैंड, फ्राँस, जर्मनी, इटली, पुर्तगाल और रूस से इनके कार्यकाल में अभी तक कोई उपलब्धि नहीं है। ख़ूब ढोल पीटा गया था, लेकिन राफ़ेल का कोई नामोनिशान दिखा नहीं। उल्टा उसका गुणगान करने वाले महारथी मनोहर पर्रिकर भी गोवा की लहरों का मज़ा लेने चले गये। क्योंकि सर्ज़िकल हमले के बाद उनका दिल्ली में दम घुट रहा था! विदेशी निवेश की जितनी भी शहनाई बजायी गयी, बाद में उसके सारे सुर, बेसुरे साबित हुए!

लब्बोलुआब ये कि “भाईयों-बहनों, ये कूटनीति (Diplomacy) मेरे वश की बात नहीं। ये मुझसे नहीं हो सकेगा! लेकिन ऐसा बोलने का साहस भी मुझमें नहीं है।” अभी ऑस्ट्रेलिया को अपने देश में मोदी-भक्तों का बढ़ते जाना, फूटी आँख नहीं सोहा रहा तो इससे पहले अमेरिका भी H1B1 के तहत IT Professionals पर यही खोंच लगा चुका है! क्यों हुआ ऐसा? आप तो ट्रम्प को अपना जन्मजात दोस्त मानते थे! अरे, कोई भी देश ये कभी नहीं चाहेगा कि आप अपने देश में तो सालाना दो करोड़ रोज़गार के अवसरों को पैदा करने की बातें करें और जब करके दिखाने की बारी आये तो आपका काँटा 1.5 लाख रोज़गार की संख्या को भी न पार कर सके!

ढोल पीटें आप, Make in India का और भारत में बनाने के लिए आपके पास कुछ भी ख़ास नहीं हो! छह महीना से ऊपर बीत गया, अभी तक आप दुनिया को बता नहीं सके कि आपकी नोटबन्दी से आपकी अर्थव्यवस्था में क्या चार चाँद लगे! दुनिया के ज़्यादातर देशों में गायें हैं कि लेकिन गौरक्षा को लेकर आप जैसे पागलपन का समर्थन करते हैं, उसे विदेशी मेहमान कभी समझ नहीं पाते! तो फिर वो आपके मुरीद बनेंगे कैसे? आपके लिए वो किसी भी तरह की दरियादिली क्यों दिखाना चाहेंगे?

इसलिए कि आपके ईवीएम पर आरोप लग रहे हैं या इसलिए कि आप अपने लोकतंत्र का प्रतिष्ठा को बहाल करने की ख़ातिर 3200 करोड़ रुपये भी ख़र्च करने की औक़ात नहीं रखते! 12500 करोड़ के हिसाब से ये हर व्यक्ति पर चार रुपये जितना है! इसी तरह, आपके उन्मादी हिन्दुत्व से विदेश में रह रहे हिन्दुओं की भी जैसी साम्प्रदायिक छवि बन रही है, उसके बाद कोई भी दूरदर्शी देश आपके भक्तों को वीज़ा देने में परहेज़ नहीं करेगा तो वो अपनी क़ब्र ही खोदेगा।

आप भूल चुके हैं कि यदि भारत की 65 साल की कोई उपलब्धि रही है तो उसमें कट्टरवाद का कोई योगदान नहीं है। उदारवाद से ही आपके देश ने तरक़्क़ी की है और दुनिया में इज़्ज़त पायी है। लेकिन ये बातें आपको तो क्या आपके गुरुकुल में भी शायद ही किसी के पल्ले पड़े, क्योंकि ‘अब न रहे वो पीने वाले, अब न रही वो मधुशाला!’

आपके गुरुजन श्रेष्ठ हिन्दू होने का चाहे जितना दावा करें, लेकिन हैं वो कुएँ के मेंढक ही। न उनका आज़ादी की लड़ाई में कोई योगदान था और न ही लूले-लँगड़े राष्ट्र-निर्माण में! उनके स्वदेशी जागरण को अर्थशास्त्र का पता नहीं, विवेकानन्द केन्द्र को कूटनीति और सामरिकी की अकल नहीं। क्यों सारा आलम मायूसी भरा है? दरअसल, आप ड्रामेबाज़ी करके देश की जनता को तो मूर्ख बना सकते हैं, राज्य दर राज्य भगवा पताकाएँ फहरा सकते हैं, लेकिन विश्व मानचित्र में आपकी ड्रॉमेबाज़ियों का कोई क़द्रदान नहीं हो सकता। कभी होगा भी नहीं! वहाँ आपमें और किम जोंग में ज़्यादा फ़र्क नहीं है!

देख लीजिएगा, इज़राइल से भी आपको ठेंगा ही मिलेगा! आपकी नीयत, है ही इसी लायक़! आप सामने वाले को कुछ नहीं समझने की जिस बीमारी से ग्रस्त हैं, वही कूटनीति का सबसे बड़ा दुश्मन है। आपको मालूम ही नहीं कि कूटनीति में आप कब सफ़ल होते हैं? जब सामने वाले को लगे कि आप उसके हित की बातें कर रहे हैं, जबकि उसके फ़ायदे में आपने अपना फ़ायदा घुसेड़ रखा हो। इसे ‘देकर, लेने की कला’ भी कह सकते हैं। लेकिन आप तो देश की विपक्षी पार्टियों की तरह ही विदेशियों को भी हर वक़्त ललकारना चाहते हैं। क्योंकि आप ख़ुद को ‘स्वघोषित महाशक्ति’ समझते हैं! जबकि ऐसे कपोल-कल्पित महाशक्ति में भी आपका योगदान एक आणे जितना भी नहीं है। क्योंकि आप मूलतः व्यापारी हैं, Statesman नहीं! किसान पैदा करके भूखा मरता है और आप कालाबाज़ारी-जमाख़ोरी करके अरबों-खरबों का वारा न्यारा करते हैं। इस लिहाज़ से आप Colour Blind भी हैं! तो इसका ख़ामियाज़ा देश को तो भोगना ही होगा! यही वजह है ऑस्ट्रेलियाई मेहमान को अक्षरधाम घुमाकर भी आप उसे बरगला नहीं पाते हैं। वो भी वही करता है, जो उसके वोटबैंक को भाता होगा!

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कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया

कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।

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कश्मीर समस्या अब तक इसलिए नहीं सुलझ पाई, क्योंकि हमने इसे हमेशा जमीन के एक टुकड़े की तरह देखा है। हमने कश्मीरियों को कभी भारत का नागरिक माना ही नहीं। दोनों देशों ने कश्मीर को अपने ‘अहं’ का सवाल बना लिया है। आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता, उसकी पैन इस्लामिज्म में कोई दिलचस्पी नहीं है। वह रोजगार और शांति से जीना चाहता है। यह कहना है ‘कश्मीरनामा’ के लेखक अशोक कुमार पांडेय का।

कश्मीर की नब्ज समझने वाले लेखक कहते हैं कि कश्मीरी लोगों को लेकर हमारे अंदर मोहब्बत नहीं, संशय बना हुआ है। वह कहते हैं, “कश्मीर को हमने हिंदू-मुसलमान का मसला बना दिया है। मेरा मानना है कि यदि कश्मीर को अपना मानना है, तो वहां के लोगों की परेशानियों को अपनी परेशानियां समझना होगा। जैसे देखिए, अभी कश्मीर का एक लड़का शताब्दी एक्सप्रेस में बिना टिकट यात्रा करते पाया गया और उसे आतंकवादी और पता नहीं क्या-क्या कह दिया गया, यह सोच खत्म करने की जरूरत है।”

अशोक कुमार पांडेय की किताब ‘कश्मीरनामा’ कश्मीर के भारत में विलय और उसकी परिस्थितियों को बयां करती है। वह कहते हैं, “जब मैं कश्मीर का अध्ययन कर रहा था, तो कश्मीर का मतलब मेरे लिए सिर्फ एक जगह नहीं थी, बल्कि वहां के लोग थे। पिछले कुछ दशकों में कश्मीर का मामला सुलझने की बजाय और उलझ गया है।”

वह कहते हैं कि कश्मीर के लोग परेशान हैं कि उनसे जो वादे किए गए थे, उन्हें निभाया नहीं गया। सारी समस्याओं की जड़ यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों कश्मीर पर अपना हक जताना चाहते हैं। पांडेय कहते हैं, “अगर आप कानूनी रूप से देखें, तो कश्मीर और हिंदुस्तान के बीच संधि हुई थी, तो इस लिहाज से कश्मीर पर भारत का हक बनता है। लेकिन पाकिस्तान इसे अलग तरह से परिभाषित करता है। दोनों देशों ने इसे अपने अहं का सवाल बना लिया है।”

उन्होंने कहा, “इन सभी उलझनों के बीच में पैन इस्लामिज्म ने प्रवेश किया। पैन इस्लामिज्म के बाद यह पूरा मूवमेंट ही बदल गया। सच्चाई यह है कि आम कश्मीरी पाकिस्तान को पसंद नहीं करता। पैन इस्लामिज्म में उसकी कोई दिलचस्पी नहीं है। वह चैन की जिंदगी गुजर-बसर करना चाहता है। वह चाहता है कि कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों की संख्या में घटाई जाए। नौकरियां दी जाएं और वह हिंदुस्तान में शांति से रह सके।”

अशोक पांडेय की इस किताब का आज प्रगति मैदान में विश्व पुस्तक मेले में औपचारिक लोकार्पण हुआ। किताब के बारे में वह कहते हैं, “इस किताब को पूरा करने में उन्हें चार साल लगे। इनमें से दो साल शोध कार्यो में, जबकि दो साल लेखन में लगे। इस दौरान मैंने 125 किताबों की मदद ली, जिसमें आठ से नौ शोधग्रंथ भी हैं। इस सिलसिले में चार बार कश्मीर जाना हुआ।”

उन्होंने कहा, “यह शोधकार्य था। इसलिए जरूरी था दस्तावेज इकट्ठा करना। इसे लेकर मैंने श्रीनगर विश्वविद्यालय, जम्मू और कश्मीर के शोपियां और कई गांवों की खाक छानी। इंटरनेट से भी काफी मदद ली। कुछ ऐसे लोगों से भी मिला, जो पहले आतंकवादी थे लेकिन अब मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर की एक समस्या यह भी है कि यहां कभी जनमत संग्रह नहीं हो पाया और इसके लिए हिंदुस्तान अकेला जिम्मेदार नहीं है, पाकिस्तान भी उतना ही जिम्मेदार है। हमने कश्मीर की समस्या को हिंदू-मुसलमान समस्या में तब्दील कर दिया है। दूसरी बात है कि कश्मीर लोग सिर्फ घूमने जाते हैं। यह सिर्फ पर्यटन तक सिमट गया है, कश्मीरियों से कोई संवाद नहीं है। दोनों के बीच में संवाद बेहद जरूरी है। मैंने किताब के अंत में यही बात लिखी है कि यदि कश्मीर के स्कूली बच्चे अन्य राज्यों में जाएं और वहां के छात्र यहां आएं तो संवाद की स्थिति बेहतर हो सकती है।”

वह कहते हैं, “कश्मीर में जिस तरह का माहौल है, उस पर लेबल चिपकाना बहुत गलत है। हम किसी को देशद्रोही या देशभक्त नहीं कह सकते। कश्मीर के साथ दिक्कत यही है कि वहां उद्योग-कारखाने नहीं हैं, लोगों के पास नौकरियां नहीं हैं, कहीं विकास नहीं है और ऊपर से कश्मीरियों का अपमान अलग से। मेरे लिए विकास का सीधा मतलब है कि लोगों को रोजगार मिले। लोगों को पढ़ने का मौका मिले।”

पांडेय कहते हैं, “कश्मीर के मसले पर सभी सरकारों ने कोई न कोई गलती की है। इंदिरा गांधी की अपनी गलतियां थीं, राजीव गांधी की अपनी और वाजपेयी जी के समय में कुछ काम जरूर हुआ, लेकिन वो कहीं पहुंच नहीं पाया। उसके बाद की सरकार की अपनी गलतियां और इस सरकार की अपनी गलतियां हैं। दिक्कत यही है कि कश्मीर को हमने कभी अपना नहीं समझा। हम सिर्फ यह मान बैठे हैं कि यह एक ऐसा इलाका है, जिस पर हमें कब्जा रखना है। इस मानसिकता को खत्म करना होगा। “

वह कहते हैं कि देश में हर जगह बवाल हो रहा है, हरियाणा में आरक्षण को लेकर कितनी हिंसा हुई। बिहार में जमकर बवाल हुआ। दलितों को छोटी सी बातों पर उन्हें मार दिया जाता है, खाप पंचायतों की करनी किसी से छिपी हुई न हीं है, लेकिन वे देशविरोधी नहीं कहलाते। वहीं, जब बात कश्मीर की आती है तो बलवा करने वाले को फौरन देशद्रोही बता दिया जाता है। हम कश्मीर को गैर मानकर चलते हैं। वे नाराज हैं और अपनी बात कहते हैं तो समझा जाता है कि वे पाकिस्तान का समर्थन कर रहे हैं। यही मानसिकता उन्हें एक दिन पाकिस्तान के पक्ष में धकेल देगी।

पांडेय कहते हैं, “नरेंद्र मोदी जब गुजरात में भाजपा के महासचिव थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर समस्या के समाधान के लिए तीन ‘डी’ सूत्र जरूरी है- डेवलपमेंट, डेमोक्रेसी और डायलॉग और जब ये तीनों असफल रहें तो चौथे डी ‘डिफेंस’ का प्रयोग करना चाहिए, लेकिन दिक्कत यह है कि कश्मीर में अक्सर चौथा डी पहले प्रयोग में लाया जाता है। अगर पहले तीनों डी का सही तरीके से उपयोग किया जाए, थोड़ा धीरज रखा जाए, सेना को नियंत्रण में रखा जाए और लोगों का विश्वास जीता जाए तो एक दशक में ही कश्मीर में काफी हद तक आतंकवाद खत्म हो जाएगा।”

वह आगे कहते हैं, “कश्मीर में 2010 से लेकर 2014 तक आतंकवाद नियंत्रित था, लेकिन अचानक हिरोइज्म की शुरुआत हुई और काफी सारे लोग सड़कों पर आने शुरू हो गए।”

By : रीतू तोमर

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‘स्लोगन बाबा’ ने गंगा प्रेमियों को भी ठगा : राजेंद्र सिंह

गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।

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Ganga Polluton

लगभग पौने चार वर्षो में केंद्र सरकार गंगा नदी की अविरलता और इसे प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए कोई सार्थक काम कर पाने में नाकाम रही। इससे गंगा प्रेमी नाराज हैं। दुनिया में ‘जलपुरुष’ के नाम से विख्यात राजेंद्र सिंह का तो यहां तक कहना है कि ‘स्लोगन बाबा (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) ने गंगा प्रेमियों को भी ठगने में कसर नहीं छोड़ी है।’

स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह ने आईएएनएस से फोन पर चर्चा के दौरान कहा, “वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में जब केंद्र में नई सरकार आई थी, तो इस बात की आस बंधी थी कि गंगा नदी का रूप व स्वरूप बदलेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री बनने से पहले नरेंद्र मोदी ने कहा था- ‘गंगा मां ने मुझे बुलाया है।’ उनकी इस बात पर प्रो. जी.डी. गुप्ता, नदी प्रेमी और संत समाज शांत होकर बैठ गया था, बीते पौने चार साल के कार्यकाल को देखें तो पता चलता है कि केंद्र सरकार ने अपने उन वादों को ही भुला दिया है, जो चुनाव के दौरान किए गए थे, अब तो सरकार गंगा माई का नाम ही नहीं लेती।”

Image result for स्टॉकहोम वॉटर प्राइज से सम्मानित राजेंद्र सिंह

Waterman India Rajendra Singh

बीते पौने चार वर्ष तक गंगा प्रेमियों के किसी तरह की आवाज न उठाने के सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “सभी गंगा प्रेमियों को इस बात का भरोसा था कि नई सरकार वही करेगी, जो उसने चुनाव से पहले कहा था। मगर वैसा कुछ नहीं हुआ। तीन साल तक इंतजार किया, अब गंगा प्रेमियों में बेचैनी है, क्योंकि जो वादा किया गया था, उसके ठीक उलट हो रहा है।”

उन्होंने कहा, “गंगा पर बैराज बनाए जा रहे हैं, गंदे नाले मिल रहे हैं, इससे गंगा तो और खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगी। लिहाजा, अब तो वर्तमान सरकार पुरानी सरकार से ज्यादा संवेदनहीन दिखाई देने लगी है।”

‘जलपुरुष’ ने याद दिलाया कि वर्तमान सरकार ने नोटीफिकेशन कर गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित किया था, मगर गंगा को वैसा सम्मान नहीं मिला, जैसा प्रोटोकॉल के तहत मिलना चाहिए था। गंगा को वही सम्मान दिया जाए, जो राष्ट्रंीय ध्वज को दिया जाता है।

सरकार आखिर गंगा की अविरलता के लिए काम क्यों नहीं कर रही? इस सवाल पर राजेंद्र सिंह ने कहा, “उन्हें लगता है कि गंगा माई की सफाई में कोई कमाई नहीं हो सकती, इसलिए उस काम को किया ही न जाए। ऐसा सरकार से जुड़े लोगों ने सोचा। छोटे-छोटे काम भी अपने दल से जुड़े लोगों को ही दिया गया है।”

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अपनी मांगों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “रिवर और सीवर को अलग-अलग किया जाए, हिमालय से गंगासागर तक गंगा को साफ किया जाए, गंगा के दोनों ओर की जमीन का संरक्षण हो, न कि विकास के नाम पर उद्योगपतियों को सौंपने की साजिश रची जाए।”

राजेंद्र सिंह का आरोप है, “कुछ पाखंडी गुरुओं ने नदियों की जमीन पर पौधरोपण करने के नाम पर सरकारों से जमीन और पैसे पाने के लिए सहमतिपत्र तैयार किए हैं। यह संकट पुराने संकट से बड़ा है, क्योंकि इसमें किसानी की जमीन बड़े औद्योगिक घरानों को दिलाने का षड्यंत्र नजर आता है। इस षड्यंत्र के बारे में भी गंगा के किसानों को बताना जरूरी है। इस सब संकटों के समाधान के लिए गंगा प्रेमी एक साथ बैठकर चर्चा करने की तैयारी में हैं।”

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लोकतांत्रिक देश में पार्टियां प्राइवेट लिमिटेड!

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Indian Politics

इसमें कोई शक नहीं कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र हैं, जिस पर गर्व भी है। सच्चाई भी है कि सरकार केंद्र या राज्य कहीं भी हो, पार्टियों के अंदर का लोकतंत्र दूर-दूर तक गायब है। विडंबना, कुटिलता या एकाधिकारवादी प्रवृत्ति, कुछ भी कहें, भारत में शुरू से ही राजनीतिक पार्टियां व्यक्ति के आसरे या प्रभाव से ही प्रभावित रही हैं।

फिलहाल ‘आप’ में भी इसी बात को लेकर घमासान मचा है, तो नया क्या है? रिवाज सरीखे तमाम पार्टियां ‘आम’ आदमी से ‘खास’ बन जाती हैं। गर्व कीजिए कि सरकारें तो लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई होती हैं! ऐसे में ‘आप’ पर ही तोहमत क्यों?

दरअसल, राजनीति शह-मात का खेल है। नकेल जिसके हाथ है, पार्टी उसके नाम है। पुराने दौर से अब तक कमोवेश यही सिलसिला जारी है। ऐसी विविधता दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र, यानी भारत में ही दिखती है। खुश होइए कि लोकतंत्र जिंदाबाद है।

अहम यह कि पार्टियों के भीतर लोकतंत्र रहा ही कब? गांधीजी ने कांग्रेस के लिए देशभर में सदस्य बनाए। जिले तक को तवज्जो दी। सम्मेलनों में अध्यक्ष चुनने की शुरुआत हुई। लेकिन तब भी गांधीजी की पसंद खास होती थी। वर्ष 1937 को देखिए, पहला चर्चित चुनाव हुआ, तब सरदार पटेल संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष थे, लेकिन उम्मीदवारों का चयन पूरी तरह से केंद्रीकृत रहा। कुछ लोकतंत्र बचा रहा, जिसे बाद में इंदिराजी ने खत्म कर दिया। अब अमूमन सारी पार्टियां यही व्यवहार कर रही हैं। एक-एक सीट आलाकमान से तय होती है।

प्रदेश, जिला, नगर, यहां तक कि वार्ड की अहमियत नकारा है। सुप्रीमो पद्धति जन्मी और पार्टियां एक तरह से प्राइवेट लिमिटेड बनती चली गईं। राजनैतिक अनुभव या समाजसेवा से इतर फिल्मी स्टारों ने भी बहती गंगा में गोते लगाए। दर्जनों स्टार देखते-देखते बड़े नेता बन गए, वहीं कई मुख्यमंत्री तक हुए। भला रिटायर्ड या इस्तीफा दिए नौकरशाह या सैन्य अधिकारी क्यों पीछे रहते? भारत की राजनीति सरकारी पदों की अहमियत को भुनाने का मौका जो देती है।

अभी तो आम आदमी पार्टी की बात है, धारा का रुख देख भ्रष्टाचार विरोधी गोते लगाए गए। समाज-सेवक से लेकर नौकरशाह, कवि से लेकर पत्रकार, सभी ने बहती बयार को समझा और एक आंदोलन उपजाया। भारतीय इतिहास में जितनी तेजी से इस पार्टी ने झंडा गाड़ा, यकीनन जात-पात, अगड़े-पिछड़े और फिल्मी लोकप्रियता के नाम की राजनीति भी पीछे हो गई।

आम आदमी की पार्टी कहां से चली और धीरे-धीरे कहां पहुंच गई, सबको दिख रहा है। जब बारी लोकतंत्र में आहूति देने की आई, तो उच्च सदन के खास यजमान एकाएक अवतरित हुए! कहने की जरूरत नहीं कि लोकतंत्र में मतदाता केवल एक वोट बनकर रह गया है, जिसकी अहमियत चंद सेकेंड में बटन दबाने से ज्यादा कुछ नहीं। बाद में उसकी क्या पूछ परख है, खुली किताब है।

दूसरी पार्टियां ‘आप’ के घमासान पर विलाप करें या प्रलाप, लेकिन जब बात उनकी होती है तो लोकतंत्र की दुहाई देते नहीं अघाते। पार्टी कुछ नहीं होती, होते हैं उनको चलाने वाले ही बलशाली और महारथी।

अब मोदी-शाह के कमल की बहार हो, राहुल की कांग्रेस का हाथ हो, केजरीवाल के आप की झाड़ू, अखिलेश-मुलायम की साइकिल, मायावती का हाथी, ममता के दो फूल, लालू का लालटेन, उद्धव का तीर कमान, राज ठाकरे का रेल इंजन, अभिनेत्री जयललिता के बाद पनीर सेल्वम-पलनीस्वामी की दो पत्तियां, करुणानिधि का उगता सूरज, शरद पवार की घड़ी, बीजू जनता दल का शंख, कभी जॉर्ज फर्नांडीज तो अब नीतीश के जद (यू) का तीर, अभिनेता एनटी रामाराव के बाद चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी की साइिकल। हाल-फिलहाल रजनीकांत की दहाड़। इनके अलावा देश में न जाने कितने क्षत्रप और उनकी पार्टियां हैं, सच्चाई सबको पता है।

दलों का दलदल हो या हमाम, बस नजर का पर्दा ही है, जिसमें सब कुछ दिखकर भी कुछ नहीं दिखता। यही भारतीय लोकतंत्र है। अब इसे खूबी कहें या दाग, पार्टी तो चलाते हैं केवल सरताज। ऐसे में आम आदमी की क्या हैसियत? जो अंदर है, वह बाहर दिखता जरूर है। अब इस पर चीत्कार करें या आर्तनाद, कोई फर्क नहीं पड़ता।

कहने को कुछ भी कह लें, लेकिन हकीकत यही है कि कम से कम भारतीय राजनीति की यही सुंदरता है, उसका कलेवर हाड़-मांस का तो नहीं, कांच का भी नहीं, लेकिन फिर भी इतना कुछ पारदर्शी है कि सब कुछ दिखता है। इसे मत-मतांतर का फेर, सपनों की सौदागीरी, शब्दों की बाजीगरी कुछ भी कह लें।

लेकिन जानते, देखते और समझते हुए भी दलदल में हर बार हमारा वोट गोता खाकर रह जाता है और हम कहते हैं कि ‘अबकी बार हमारी सरकार।’ इतना कहना ही क्या कम है? तो आइए, एक बार फिर से कहें ‘लोकतंत्र जिंदाबाद’।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व पत्रकार हैं, ये उनके निजी विचार हैं)

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