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किसानों ने शिवराज सरकार में जगाया डर!

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Shivraj Singh Chauhan
File Photo

संदीप पौराणिक

भोपाल, 18 जून| मध्यप्रदेश के किसान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की ताकत रहे हैं, मगर अब यही किसान उनकी सरकार से नाराज हो चले हैं। किसानों में विद्रोह पनप रहा है, इस बात को सरकार समझ रही है और उसके भीतर इस बात का ‘डर’ घर करने लगा है कि तीन बार सत्ता सौंपने में अहम भूमिका निभाने वाले किसानों के मन में कहीं बदलाव का विचार तो प्रस्फुटित नहीं होने लगा है!

राज्य में 13 वर्षो से भाजपा की सरकार है और 11 साल से शिवराज राज है। इस दौरान राज्य को उपज के उत्पादन के मामले में एक नहीं, पांच बार ‘कृषि कर्मण पुरस्कार’ मिल चुका है और कृषि विकास दर देश में सबसे ज्यादा 20 प्रतिशत से ज्यादा चल रही है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि ऐसा इसलिए संभव हुआ, क्योंकि किसानों को सरकार की ओर से पर्याप्त सुविधाएं दी गईं।

सरकार का दावा है कि किसानों को शून्य प्रतिशत ब्याज पर कर्ज मिल रहा है। इतना ही नहीं, खाद-बीज खरीदने के लिए मिलने वाले एक लाख के कर्ज पर बगैर ब्याज के 90 हजार रुपये लौटाने होते हैं। सिंचाई का रकबा सात लाख से बढ़कर 40 लाख रुपये तक पहुंच गया है।

लेकिन आम किसान यूनियन के संस्थापक सदस्य केदार सिरोही कहते हैं, “राज्य के मुख्यमंत्री ने किसान आंदोलन के बाद कई घोषणाएं की हैं, मगर इससे किसान संतुष्ट नहीं हैं। सरकार किसानों के दवाब में है, उसे लगता है कि अगले वर्ष चुनाव है, किसान एक बड़ा वोट बैंक है। लिहाजा, वह किसी तरह किसान को संतुष्ट करना चाहती है। मगर सरकार की नीयत पर किसानों को शक है।”

एक जून से 10 जून तक चले किसान आंदोलन के दौरान छह जून को मंदसौर में पुलिस ने गोलीबारी की थी, जिसमें पांच किसान और बाद में पिटाई से एक किसान की मौत हो गई। इससे प्रदेश के मालवा-निमांड अंचल सहित अन्य हिस्सों में हिंसा काफी बढ़ गई। बिगड़ते हालात के बीच मुख्यमंत्री चौहान ने कृषि कैबिनेट की बैठक बुलाई और कई फैसले ले डाले। एक हजार करोड़ रुपये का मूल्य स्थिरीकरण कोष और विपणन आयोग तक का ऐलान कर दिया। इतना ही नहीं, प्याज को आठ रुपये सरकार खरीद रही है।

किसानों पर हुई गोलीबारी में पुलिस की भूमिका को झुठलाने के लिए राज्य के गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह से लेकर पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान तक ने असामाजिक तत्वों द्वारा गोली चलाए जाने की बात कही। उनके इस गलत बयान ने इस आंदोलन में आग में घी डालने का काम किया। मुख्यमंत्री चौहान ने गोली कांड की न्यायिक जांच के आदेश दे दिए। इसके महज तीन दिन बाद ही गृहमंत्री कहने लगे कि गोली सुरक्षा बलों ने ही चलाई थी।

सरकार पर उठती उंगली के बीच चौहान ने उपवास शुरू कर दिया, जो महज 28 घंटों में ही खत्म हो गया। मंदसौर से गोलीबारी में मारे गए किसानों के परिजनों को भोपाल लाकर यह कहलवाया गया कि चौहान अपना उपवास खत्म कर लें। उपवास खत्म करते समय चौहान ने ऐलान किया कि राज्य सरकार किसानों के साथ खड़ी है, उनकी हर समस्या का निदान होगा। दालें समर्थन मूल्य पर खरीदी जाएंगी, मंडी में आधा भुगतान नगद व आधा किसान के बैंक खाते में जाएगा।

मंदसौर गोलीकांड के एक सप्ताह बाद मुख्यमंत्री चौहान ने प्रभावित किसानों के परिजनों से मुलाकात की, तो वहां पीड़ितों ने कई तरह के सवाल किए, जिनका उनके पास कोई जवाब नहीं था। चौहान ने सरकार द्वारा एक करोड़ रुपये का मुआवजा और एक सदस्य को नौकरी की बात गोली से मारे गए सभी किसान परिवारों से की। घनश्याम धाकड़ की पत्नी रेखा ने तो अपने पति की मांग कर डाली, वहीं अभिषेक के परिजनों ने यही कहा कि चौहान ने आने में देर कर दी।

बीते पांच दिनों में राज्य में 10 किसानों ने मौत को गले लगा लिया है। कांग्रेस शिवराज को ‘यमराज’ तक कहने लगी है।

कांग्रेस नेता और राज्यसभा सदस्य सत्यव्रत चतुर्वेदी ने कहा कि यह सरकार किसानों की बात करती है, कर्ज और सुविधाएं देने का दावा करती है, मगर इसका जवाब उसके पास नहीं है कि उसके शासनकाल में 21 हजार किसानों ने खुदकुशी क्यों की है?

एक तरफ जहां किसानों का आक्रोश थमने का नाम नहीं ले रहा है, किसान कर्ज और सूदखोरों से परेशान होकर आत्महत्या कर रहे हैं, तो दूसरी ओर कांग्रेस ने पूर्व मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया की अगुवाई में भोपाल में सत्याग्रह और खरगोन के खलघाट में किसान सम्मेलन कर सरकार पर जमकर हमले किए। इस दौरान कांग्रेस में एकजुटता भी नजर आई।

वरिष्ठ पत्रकार भारत शर्मा का मानना है कि आंदोलनों से सरकारें तब तक नहीं डरतीं, जब तक उनकी कुर्सी को खतरा न हो। मध्यप्रदेश में अभी चुनाव को डेढ़ साल है, लिहाजा सरकार कितनी डरी है, यह अभी नहीं कहा जा सकता। हां, मंदसौर में गोली चलाने वालों पर मामला दर्ज न होने से इतना जरूर लगता है कि सरकार अपने ही अंदाज में चल रही है।

उन्होंने कहा, “मगर मुख्यमंत्री चौहान के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि जरूर प्रभावित हुई है और इसको लेकर वे चिंतित भी है। यही कारण है कि चौहान और उनकी सरकार के मंत्री गांव-गांव पहुंचकर डैमेज कंट्रोल में लग गए हैं।”

किसान आंदोलन के बाद चौहान ने मंत्रियों से लेकर विधायकों तक के साथ बैठकें कर डाली है और उनसे कहा है कि वे अपने-अपने क्षेत्र में जाकर सरकार द्वारा किसान हित में लिए गए निर्णयों से अवगत कराएं। किसानों में असंतोष हो तो उसे शांत करें। वहीं संगठन ने कार्यकर्ताओं को घर-घर तक जाने के निर्देश दिए हैं।

–आईएएनएस

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येदियुरप्पा के बाद प्रोटेम स्पीकर के चयन में भी राज्यपाल का शर्मनाक रवैया

उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

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KG Bopaiah

पुरानी कहावत है कि ‘चोर चोरी से जाए, मगर हेराफ़ेरी से जाए!’ फ़िलहाल, कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला का रवैया बिल्कुल इसी कहावत के मुताबिक़ है। वजुभाई वाला का बर्ताव उन शातिर अपराधियों जैसा भी है जो एक झूठ या ग़लती को छिपाने के लिए बार-बार झूठ बोलता है या ग़लती पर ग़लती ही करता चला जाता है। राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का पहला कर्त्तव्य होना चाहिए कि उसका आचरण संवैधानिक, विधायी और न्यायिक सुचिता के अनुकूल हो और वो सार्वजनिक जीवन में नैतिकता का सबसे बड़ा संरक्षक हो!

बदकिस्मती से वजुभाई वाला ने लोकलाज़ की सारी सीमाओं को तार-तार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से ये बात साफ़ हो चुकी है कि वजुभाई वाला एक निष्पक्ष राज्यपाल की तरह नहीं बल्कि बीजेपी की कठपुलती और एजेंट की तरह व्यवहार कर रहे हैं। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने प्रोटेम स्पीकर यानी कार्यवाहक सभापति की देखरेख में विधानसभा में बहुमत का परीक्षण करवाने का आदेश दिया। लेकिन बेहयाई की सारी सीमाओं और विधायी परम्पराओं को तोड़ते हुए राज्यपाल ने केजी बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त कर दिया। जबकि नव-निर्वाचित विधायकों में उनके भी वरिष्ठ लोग मौजूद हैं।

इसीलिए, काँग्रेस-जेडीएस गठबन्धन ने राज्यपाल के इस फ़ैसले को भी पक्षपातपूर्ण और विधायी परम्पराओं के ख़िलाफ़ बताया है। इस धड़े का कहना है कि बोपय्या जहाँ 4 कार्यकाल (टर्म) से विधायक हैं और 2008 में स्पीकर भी रह चुके हैं वो प्रोटेम स्पीकर बनाये जाने के लिए सर्वथा अयोग्य हैं। क्योंकि सदन में दो विधायक ऐसे हैं जो 8 टर्म का अनुभव रखते हैं और उम्र में भी बोपय्या से बड़े हैं। इनमें पहले स्थान पर हैं काँग्रेस के आरवी देशपांडे और बीजेपी के उमेश विश्वनाथ कट्टी। इन दोनों में से भी उमेश के मुक़ाबले देशपांडे की उम्र अधिक है।

काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि प्रोटेम स्पीकर के चयन का मुद्दा राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों के दायरे में नहीं आता है। बल्कि इसका निर्धारण विधायी परम्पराओं के मुताबिक़ होता है। इस परम्परा के मुताबिक़, सबसे अनुभवी या उम्रदराज़ विधायक को प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है। उधर, राज्यपाल के फ़ैसले को सही ठहराते हुए बीजेपी ने दलील दी है कि चार टर्म की वरिष्ठता भी कम नहीं होती। बोपय्या को इसलिए वरीयता दी गयी है क्योंकि वो पूर्व स्पीकर रह चुके हैं।

लेकिन काँग्रेस-जेडीएस का कहना है कि बोपय्या जब स्पीकर रहे तो कई मौकों पर उनका आचरण निष्पक्ष नहीं रहा। उन्होंने बीजेपी के पक्ष में काम किया। 2008 में बोपय्या को प्रोटेम स्पीकर बनाने के फ़ैसले की इसलिए भी अनदेखी की गयी क्योंकि तब एक-एक वोट की मारामारी वाले हालात नहीं थे। दोनों पक्षों की इसी टकराहट को देखते हुए काँग्रेस-जेडीएस की ओर से देर शाम एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया गया।

विधायी परम्परा ये है कि नयी विधानसभा के चुनाव के बाद राज्यपाल सबसे अनुभवी या/और उम्रदराज़ राजनेता को प्रोटेम स्पीकर नियुक्त करते हैं। प्रोटेम स्पीकर का काम है कि वो सभी विधायकों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाये। इसके बाद सदन के सभी विधायक अपना नया स्पीकर चुनते हैं। नये स्पीकर का चुनाव सत्ता पक्ष का पहला शक्ति परीक्षण होता है। क्योंकि स्पीकर को भी सदन के बहुमत से ही चुना जाता है। अब यदि सत्ता पक्ष के पास बहुमत नहीं हुआ तो उसका स्पीकर चुना नहीं जा सकता।

सामान्य तौर पर नये स्पीकर को अपने निर्वाचन के तुरन्त बाद सदन के संचालन से जुड़े नियमों के मुताबिक़, विश्वास मत पर बहस और मतदान का संचालन करना होता है। किस पक्ष को कितने मत मिले और प्रस्ताव का क्या हश्र हुआ ये तय करने का अधिकार स्पीकर का ही होता है। स्पीकर का फ़ैसला एक तरह से अन्तिम ही होता है। क्योंकि उसे हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में ही चुनौती दी जा सकती है। इन अदालती कार्रवाई में भी ज़्यादा से ज़्यादा स्पीकर के फ़ैसले को ग़लत करार दिया जाता है। स्पीकर की दुर्भावनापूर्ण कार्रवाई के लिए उन्हें दंडित नहीं किया जा सकता।

इसीलिए. जब कभी स्पीकर का आचरण पक्षपातपूर्ण होता है तो विधानसभा में अव्यवस्था फैल जाती है। यही अव्यवस्था अन्ततः विधायकों के बीच की हिंसा में बदल जाती है। स्पीकर के आपत्तिजनक व्यवहार की वजह से देश की कई विधानसभाओं में कई बार शर्मसार करने वाली हिंसक वारदातें हो चुकी हैं। उन प्रसंगों को देखते हुए राज्यपाल वजुभाई वाला का ये फ़र्ज़ बनाता था कि वो सुप्रीम कोर्ट से मुँह की खाने के बाद तो अपनी बदनीयत से बाज़ आते। लेकिन अफ़सोस कि राज्यपाल की गरिमा को बीजेपी ने अपना मोहरा बना दिया है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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सत्ता के नाटक का कर्नाटक में खेल

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Yeddyrappa

खंडित जनादेश, राज्यपाल का स्वविवेक और लोकतंत्र की परीक्षा ऐसा ही कुछ माहौल कर्नाटक में चुनाव नतीजों के बाद दिख रहा है। नतीजों के मायने क्या कहें कांग्रेस मुक्त भारत या नए गठबंधन युक्त राजनीतिक संभावनाएं? इतना जरूर है कि इंदिरा गांधी ने राजनीति में जो पहचान बनाई थी उसे वो उतार-चढ़ाव के बावजूद 4.5 दशक तक बरकरार रख पाईं तो क्या नरेन्द्र मोदी की पहचान वैसी ही राजनीति की नई पैकेजिंग तो नहीं? सवाल कई हैं और जवाब भी समय के साथ मिलता जाएगा।

फिलाहाल कर्नाटक की सियासी तस्वीर काफी दिलचस्प हो गई है। गेंद राज्यपाल के पाले में है। वह सबसे बड़े दल को सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं या बहुमत का आंकड़ा पार कर चुके कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को? गोवा, मेघालय और मणिपुर की थोड़ा पहले की सियासी तस्वीरों की नजीर सामने है। जिन हालातों में राज्यपालों ने बहुमत वाले गठबंधन को वहां सरकार बनाने का न्योता दिया, क्या वैसा ही न्योता कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन को यहां मिलेगा या सबसे बड़े दल भाजपा को? जेडीएस-कांग्रेस की साझा सीटें बहुमत के पार हैं यहां भी दावा मजबूत है। ऐसे में राज्यपाल चाहें तो बहुमत के आंकड़े को देखते हुए कांग्रेस-जेडीएस को भी सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं।

अब यहीं इंतजार करना होगा, लेकिन कर्नाटक के ही पूर्व मुख्यमंत्री एसआर बोम्मई बनाम केंद्र सरकार का एक अहम मामला नजीर बन सकता है जिसमें सर्वोच्च न्यायालय आदेश दे चुका है कि बहुमत का फैसला राजनिवास में नहीं बल्कि विधानसभा के पटल पर होगा। कई तरह के तर्को से हटकर सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार बनाने का न्योता देने का अधिकार राज्यपाल को उनके विवेक पर छोड़ रखा है। राज्यपाल चुनाव से पहले या बाद में बने गठबंधन को भी न्योता दे सकते हैं लेकिन संतुष्ट हों कि वह सदन में बहुमत साबित करेगा।

राज्यपाल का फैसला गलत भी हो सकता है फिर भी उनसे यह अधिकार छीना नहीं गया है। हां बहुमत सदन में ही साबित करना होगा। जस्टिस आरएस सरकारिया कमिशन ने विकल्पों और उनकी प्राथमिकताओं को साफ किया है लेकिन साथ ही राज्यपाल के खुद के फैसले को भी अहम बताया है। संविधान में गठबंधन सरकार बनने पर राज्यपाल को कैसे मुख्यमंत्री की नियुक्ति करनी है, इस बारे में कुछ साफ नहीं है।

कर्नाटक के नतीजे सभी दलों के लिए काफी सबक देने वाले हैं क्योंकि शुरू में लगा कि भाजपा स्पष्ट बहुमत की ओर अग्रसर है लेकिन बाद में 104 पर ही अटक गई। जबकि कांग्रेस दूसरे और जेडीएस तीसरे नंबर रह गई। प्रधानमंत्री ने सबसे ज्यादा 21 जन सभाएं कर्नाटक में की थीं वहीं अमित शाह ने पूरी ताकत झोंक दी थी। वोट शेयर के मामले में कांग्रेस जीतकर भी हार गई और भाजपा हारकर भी जीत गई। भाजपा और कांग्रेस के बीच मत प्रतिशत क्रमश: 37 प्रतिशत और 38 प्रतिशत है।

हां, कर्नाटक में ही इतिहास फिर खुद को दोहरा रहा है। लगभग 2004 वाली स्थिति है। उस वक्त भाजपा को 79, कांग्रेस को 65 और जेडीएस को 58 सीटें मिली थीं। कांग्रेस एसएम कृष्णा को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी जबकि देवगौड़ा एन धरम सिंह को। तब भी कांग्रेस को झुकना पड़ा था। यकीनन देवगौड़ा का ठीक वैसा ही दांव 2018 के इस चुनाव में दिखा जब उन्होंने भाजपा और कांग्रेस दोनों को चित्त कर दिया। इस चुनाव में फिर रोचक स्थिति बनी कि राजनीति में कोई दुश्मन या दोस्त नहीं होता है। याद कीजिए 2005 में कुमार स्वामी से मतभेदों के कारण ही सिद्धारमैया पार्टी से निकाले गए थे लेकिन हालात देखिए 12 साल बाद उन्हीं सिद्धारमैया ने अपने राजनैतिक विरोधी का नाम मुख्यमंत्री के लिए आगे किया।

फिलाहाल कर्नाटक नतीजों को 2019 का सेमीफाइनल कहना जल्दबाजी होगी क्योंकि अभी सबसे अधिक सांसद देने वाले उप्र के कैराना में 28 मई को होने जा रहे उपचुनाव में नए फार्मूले की टेस्टिंग होगी। यहां सपा-बसपा के बजाय अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल के चिन्ह पर सपा उम्मीदवार तबस्सुम का लड़ना और बसपा का समर्थन करना बड़ा पैंतरा है। निश्चित रूप से यह जहां भाजपा को परेशान करने वाला है वहीं 2019 के आम चुनाव के लिए गठबंधन की नई संभावनाओं का दरवाजा भी खोलता दिख रहा है। लेकिन मप्र और राजस्थान में हुए उपचुनावों में कांग्रेस को मिली सफलता के बाद कर्नाटक के नतीजों ने मंसूबों पर पानी फेर दिया है।

साल के आखिर में मप्र, राजस्थान, छग में विधानसभा चुनाव हैं और यहां भाजपा से मुकाबले के लिए कांग्रेस जोश में थी। यकीनन कांग्रेस का मनोबल गिरा होगा क्योंकि तीनों राज्यों में मुख्य विपक्षी भूमिका में वही है। साथ ही गठबंधन के लिहाज से तीनों राज्यों की राजनैतिक पैंतरेबाजी भी जुदा है। ऐसे में तीनों राज्य में अलग-अलग क्षेत्रीय पार्टियों का दबदबा देश की गठबंधन राजनीति में निश्चित रूप से बेहद उलझा और नाजुक होगा। फिलहाल कर्नाटक के नाटक पर सबकी नजर है।

By : ऋतुपर्ण दवे

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

–आईएएनएस

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मोदी-लहर का कच्चा चिट्ठा

2018 में ही बीजेपी को मोदी-लहर की सबसे बड़ी अग्नि-परीक्षा अभी बाक़ी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इसी साल मोदी-लहर को सबसे बड़ी चुनौती उस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में झेलनी है, जहाँ अभी वो सत्ता में है। इन राज्यों में मोदी-लहर का ज़बरदस्त मुक़ाबला सत्ता-विरोधी लहर से होना है।

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narendra modi wave in india

ये सच है कि 2014 में केन्द्र में सत्ता पाने के बाद बीजेपी का प्रदर्शन लगातार बेहतर होता गया है। ये भी सच है कि मोदी युग में काँग्रेस को एक के बाद एक करके कई राज्यों की सत्ता से बाहर होना पड़ा है। लेकिन याद रखिए कि बीजेपी की सारी की सारी कमाई नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की बदौलत नहीं है। मोदी-शाह के राष्ट्रीय पटल पर आने से पहले भी देश के 31 राज्यों में से 14 में बीजेपी या उसके सहयोगी दल की सरकारें थीं। अब 22 राज्यों में भगवा परचम ज़रूर लहरा रहा है, लेकिन मोदी-शाह का प्रदर्शन भी वैसा चमचदार नहीं है, जैसा भक्तों की ओर से फैलाये जाने वाले झूठ के ज़रिये पेश किया जाता है। मिसाल के तौर पर मोदी-लहर को ही लीजिए। नरेन्द्र मोदी सरकार के कामकाज की तरह मोदी-लहर की भी जैसी डुगडुगी बजायी जाती है, वैसी वो कतई नहीं है।

जो लोग मोदी-लहर का गुणगान करते हैं वो भूल जाते हैं कि ये लहर जिस साल चलती है, उसके अगले साल नहीं चलती! मसलन…

2014 में मोदी-लहर थी तो बीजेपी ने लोकसभा के अलावा महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, हरियाणा और झारखंड पर क़ब्ज़ा जमाया।

2015 में मोदी-लहर नहीं थी! तभी तो बीजेपी को दिल्ली और बिहार में हार का मुँह देखना पड़ा!

2016 में मोदी-लहर बेहद मामूली थी। बीजेपी सिर्फ़ असम जीत सकी। जबकि पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में उसे हार झेलनी पड़ी।

2017 में मोदी-लहर वापस लौटी। हिमाचल, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में बीजेपी ने तख़्ता पटल किया। गोवा और मणिपुर में उसके तिकड़म और ख़रीद-फ़रोख़्त सफल रही। लेकिन पंजाब में उसे झटका लगा, जबकि गुजरात में उसने बड़ी मुश्किल से अपनी लाज़ बचायी।

2018 में मोदी-लहर की रंगत धूप-छाँव जैसी हो गयी। कर्नाटक में जैसी मोदी-लहर चली उसने बीजेपी को सत्ता के पाले से पहले ही पटक दिया। त्रिपुरा और नगालैंड में आंशिक लहर रही। जबकि मेघालय में गोवा और मणिपुर की ख़रीद-फ़रोख़्त वाली तिकड़म को ही दोहराया गया।

2018 में ही बीजेपी को मोदी-लहर की सबसे बड़ी अग्नि-परीक्षा अभी बाक़ी है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले इसी साल मोदी-लहर को सबसे बड़ी चुनौती उस राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में झेलनी है, जहाँ अभी वो सत्ता में है। इन राज्यों में मोदी-लहर का ज़बरदस्त मुक़ाबला सत्ता-विरोधी लहर से होना है। इन तीनों बीजेपी शासित राज्यों के अलावा मोदी-लहर की जाँच उत्तर-पूर्व के छोटे से राज्य मिज़ोरम में भी होगी!

••• सबसे दिलचस्प बात ये है कि जिस ‘मोदी-लहर’ या ‘मोदी का करिश्मा’ या ‘मोदी का जादू’ पर भक्त मंडली इतराती फिरती है, उसने 2014 में ही अपना दम तोड़ना शुरू कर दिया था! तथाकथित मोदी-लहर की बदौलत लोकसभा की 282 सीटें जीतने वाली बीजेपी, 2014 से अब तक हुई 23 संसदीय सीटों के उपचुनाव में सिर्फ़ 4 सीटों पर ही अपनी जीत को बरक़रार रख सकी। ये सीटें हैं – वडोदरा, शाहडोल, लखीमपुर (असम) और बीड। दूसरी ओर, काँग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली बीजेपी को 2014 से लेकर अभी तक अपनी 7 जीती हुई सीटों से हाथ धोना पड़ा है। इनमें से रतलाम, अमृतसर, गुरदासपुर, अजमेर और अलवर की सीटें जहाँ काँग्रेस ने जीतीं। वहीं फूलपुर और गोरखपुर की सीटों को उस समाजवादी पार्टी ने बीजेपी से छीना है, जो काँग्रेस का मित्र-दल है। माना जा रहा है कि विपक्ष का साझा उम्मीदवार ही, 28 मई को कैराना सीट को भी, मोदी-लहर को आठवीं चपत देने वाला है।

उपरोक्त तथ्यों से साफ़ है कि 2014 वाली मोदी-लहर 2015 में नदारद थी, 2016 में इसकी औक़ात मामूली हवा जैसी ही थी, क्योंकि असम में 15 साल से चल रही काँग्रेस के तरूण गोगोई की सरकार के ख़िलाफ़ सत्ता विरोधी लहर को सियासी जगत में बेहद स्वाभाविक माना गया। 2017 वाली मोदी-लहर का ज़ायक़ा ऐसा रहा मानो दाल में कंकड़ों की भरमार रही हो। सत्ता हथियाने के लिए होने वाली तिकड़म, विधायकों की ख़रीद-फ़रोख़्त की नीति, ईवीएम पर लगे सवालिया निशान तथा चुनाव आयोग का पक्षपातपूर्ण रवैये को भी बाक़ायदा दाल के कंकड़ों की तरह देखा जा सकता है। 2018 की पहली छमाही के दौरान यदि मोदी-लहर की वापसी नहीं हो पायी तो फ़िलहाल, ऐसे कोई आसार नहीं दिखते कि साल की दूसरी छमाही में कोई बीजेपी को बीते हुए दिन लौटा पाएगा!

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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