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ऐसे धर्म-संकट और राष्ट्रीय आपदा की आग़ोश में भारत पहले कभी नहीं फँसा…!

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धर्म-संकट ये कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि भगवा-सूरमाओं के ख़िलाफ़ साज़िश रचने का मुक़दमा चलाया जाएगा। लेकिन 6 दिसम्बर 1992 से अभी तक, क्या 25 साल में भारत की न्यायपालिका इतना भी तय कर पायी है कि बाबरी मसजिद को जबरन ध्वस्त किया जाना क्या अपराध था भी या नहीं?

मैंने अयोध्या में ताला खुलने से पहले भी राम लला को देखा था। फिर ताला खुलते देखा। रथ-यात्रा देखी। कारसेवाएँ होते देखा। कान के पर्दों को ‘जय श्रीराम’ के प्रचंड जय-घोष से सहमते भी देखा। बाबरी मसजिद को ध्वस्त होते देखा। दंगे देखे। सरकारों की बर्ख़ास्तगियाँ देखीं। कारसेवकपुरम् में पत्थरों की तराशी देखी। विवादित स्थल की खुदाई देखी। अदालती कार्रवाई की लीपा-पोती देखी। राम मन्दिर का मुद्दा बनना देखा। नेपथ्य में भेजा जाना। आस्था का अलटना-पलटना देखा। लोगों की निष्ठा देखी। समर्पण देखा। उन्माद देखा। विषाद देखा। लेकिन अभी जैसा धर्म-संकट पहले कभी नहीं दिखा था! ऐसी राष्ट्रीय-आपदा भी अपूर्व है!

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धर्म-संकट ये कि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि भगवा-सूरमाओं के ख़िलाफ़ साज़िश रचने का मुक़दमा चलाया जाएगा। लेकिन 6 दिसम्बर 1992 से अभी तक, क्या 25 साल में भारत की न्यायपालिका इतना भी तय कर पायी है कि बाबरी मसजिद को जबरन ध्वस्त किया जाना क्या अपराध था भी या नहीं? सलमान ख़ान की कार वाले फ़ैसले के बाद से मन में उम्मीदों से ज़्यादा आशंकाएँ पनपने लगती हैं! क्योंकि, मुमकिन है कि कहीं 20-30 साल बाद यही न तय हो जाए कि 6 दिसम्बर को मसजिद का क़त्ल हुआ ही नहीं था! और, जब कोई ग़ुनाह ही नहीं हुआ तो फिर साज़िश किस बात की…! अदालती कार्रवाई के आगे बढ़ने के लिए भी तकनीकी रूप से ये तय होना ज़रूरी है कि आख़िर कोई ग़ुनाह हुआ भी था या नहीं? इसी हिसाब से आरोप तय होते हैं। अदालत की भाषा में इसे ही ‘Issues to be framed’ कहते हैं!

बात बहुत गम्भीर है। परम राम भक्त विनय कटियार ने देश को ज्ञानालोकित किया है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के पीछे सीबीआई की साज़िश है। इसे महज किसी राजनेता का बयान मत समझिए। ये सत्ता-पक्ष के अहम राजनेता हैं। राम-मन्दिर ‘आन्दोलन’ के शूरमा हैं। लिहाज़ा, ये भली-भाँति जानते होंगे कि सीबीआई जैसी शीर्ष जाँच या तोता संस्था जिस साज़िश में शामिल होगी, वो कितनी बड़ी बात है! कितनी बड़ी राष्ट्रीय आपदा है! कहीं ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही तो इस साज़िश के पीछे नहीं छिपे हैं! क्योंकि सीबीआई तो हर तरह से उनके ही मातहत है! देश को इस अत्यन्त गम्भीर सवाल का जवाब सर्वोच्च स्तर से ही मिलना चाहिए। बीजेपी या सरकार के प्रवक्ता की किसी सफ़ाई से बात नहीं बनेगी।

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उधर, साध्वी उमा भारती ने भी तहलका मचा दिया है। इस केन्द्रीय मंत्री ने तो डंके की चोट पर कह दिया कि ‘ज़ुर्म क़बूल है!’ सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उन्होंने कहा कि बाबरी मसजिद के विध्वंस में कोई साज़िश नहीं थी। क्योंकि साज़िश तो लुका-छिपी की जाती है! जबकि अयोध्या में तो जो कुछ हुआ वो ख़ुल्लमख़ुल्ला हुआ! डंके की चोट पर हुआ! इस तरह तो साज़िश का पूरा आरोप ही बेमानी साबित हो गया। लिहाज़ा, साज़िश हुई थी या नहीं, ये तय करने के लिए अदालत में जो मग़ज़मारी हुई, उस सवाल का जवाब तो अब संवैधानिक पद पर आसीन मंत्री महोदया से मिल चुका है। उन्होंने कई बार संविधान की शपथ खायी है, तो झूठ तो बोलेंगी नहीं! अब इसी बात के लिए लखनऊ में और न्यायिक क़वायद को आगे ठेलने से भला क्या हासिल होगा!

इस लिहाज़ से देखें तब तो अब सारे के सारे मुक़दमे में फ़ैसला सुनाने की घड़ी आ चुकी है! साफ़ है कि यदि भारतीय दंड संहिता के तहत भगवा ख़ानदान के लोगों को ‘आपराधिक साज़िश’ के ग़ुनाह से स्थायी अभयदान नहीं हासिल है तो उमा भारती का बयान ही सरासर क़बूल-ए-ज़ुर्म है! इसलिए जी करता है कि कहूँ कि “हे न्यायपालिका जी, अब यदि आपमें हिम्मत है तो सीधे ग़ुनाह की सज़ा सुनाइए और अपराधियों को सज़ा भुगतने के लिए मज़बूर करके दिखाइए! वर्ना, ऐलान कर दीजिए कि आपके बूते का कुछ नहीं! देश आपको भी वैसे ही बर्दाश्त कर लेगा जैसे इन राम-भक्तों को किया गया है!”

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद सोशल मीडिया पर वो राजनीतिक टीकाकार कुकुरमुत्तों की तरह छा गये जो मानने लगे कि अब लाल कृष्ण आडवाणी के लिए राष्ट्रपति बनने का अवसर भी चला गया! ऐसे दुःखी और चिन्तित लोगों ने किसी को भी ये नहीं बताया कि क्या कभी किसी ने आडवाणी से वादा किया था, उन्हें ढाँढ़स बँधाया था कि आप बीजेपी को अलविदा कहकर नहीं जाएँ, क्योंकि वक़्त आने पर आपको राष्ट्रपति बना दिया जाएगा? यदि हाँ, तो ‘साज़िश’ का मुक़दमा भर चलने से लौह-पुरुष उस पद के लिए अयोग्य कैसे साबित हो जाएँगे? कहाँ लिखा है कि दाग़ी छवि वाले नेता, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, मंत्री, सांसद और विधायक तो बन सकते हैं, लेकिन राष्ट्रपति नहीं?

अरे भाई, देश के जो भी लोग संविधान के मुताबिक़, पद और गोपनीयता की शपथ लेकर गद्दीनशीं होते हैं, वो सभी संवैधानिक पद ही होते हैं! लिहाज़ा, इसी मामले के आरोपी कल्याण सिंह यदि महामहिम राज्यपाल हो सकते हैं, उमा भारती यदि माननीय केन्द्रीय कैबिनेट मंत्री हो सकती हैं, मुरली मनोहर जोशी और लाल कृष्ण आडवाणी भी तो सिर्फ़ आरोपी ही हैं! उन्हें कोई सज़ा तो मिली नहीं है। इस मामले के सभी आरोपियों को हमारी न्यायपालिका उनके जीते-जी कभी सज़ा नहीं दे पाएगी। यदि निचली अदालत दो साल में फ़ैसला सुना देगी तब भी…! क्योंकि उसके बाद भी तो हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक सज़ा को चुनौती देने की लँगड़ी टाँग वाली दौड़ चलेगी ही…! लिहाज़ा, अपात्रता के आधार पर किसी भी नेता को किसी भी पद तक पहुँचने पर न तो कोई रोक है और ना ही हो सकती है।

यही वक़्त है जब आपको उन लोगों की मंशा को भी सन्देह से देखना चाहिए जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद संवैधानिक पदों पर बैठे आरोपियों से इस्तीफ़े की माँग कर रहे हैं। कौन नहीं जानता कि राजनेता चाहे किसी भी पार्टी का हो, उस पर जब भी कोई आरोप लगता है तो वो किसी साज़िश के तहत, दुर्भावनापूर्ण और राजनीतिक बदले की भावना की वजह से ही होता है। हर नेता जीवन-पर्यान्त सच्चा, ईमानदार, जनता को भगवान समझने वाला और जनसेवा के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर देने वाला होता है। भगवा ख़ानदान में मौजूद हरेक नेता हमेशा इन सदगुणों से ओत-प्रोत होता है। लिहाज़ा, इनकी ओर से ये माँग तो उठ सकती है कि वीरभद्र सिंह इस्तीफ़ा दें! लेकिन लाल कृष्ण आडवाणी, कल्याण सिंह, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती जैसे सिद्ध महापुरुषों से इस्तीफ़े की माँग करना भी पाप है। सबको ऐसे पाप से बचना चाहिए! राष्ट्रीय आपदा की इस नाज़ुक घड़ी में संयम ही सबसे बड़ा आभूषण है!

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